Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – अमेरिका महान बन गया…!

सवाल यह उठता है कि आख़िर अमेरिका के संविधान में ऐसा क्या है, जिसके कारण ‘शट डाउन’ इतनी आसानी से लगाया जा सकता है? यदि पाकिस्तान जैसे देश की सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पगार देने के पैसे नहीं हैं, तो समझ में आता है; मगर विश्व के सबसे अमीर और शक्तिशाली देश की हालत ऐसी पतली हो, तो सवाल उठना तो लाज़मी है।

“मैं अमेरिका को फिर से महान बना दूंगा!” … “भारत पर 50% टैरिफ़ लागू कर रहा हूँ!” … “भारत और रूस की अर्थव्यवस्था मृतप्राय है!” … “रूस-यूक्रेन युद्ध असल में नरेन्द्र मोदी युद्ध है!” … “मैंने आठ महीने में आठ युद्ध-विराम करवाए!” … “मुझे कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देंगे!” … – ये सब बोलने के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने पहली अक्टूबर को अमेरिका में ‘शट-डाउन’ की घोषणा कर दी। यानि कि अब अमेरिका के सरकारी कर्मचारियों को ज़बरदस्ती छुट्टी पर जाना होगा, या फिर उन्हें बिना पगार के काम करना होगा।
ध्यान देने योग्य बात है कि अमेरिका के महान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी 35 दिन लंबा ‘शट-डाउन’ हुआ था, जो अब तक का सबसे लंबा ‘शट डाउन’ माना जाता है। दरअसल, अमेरिका में ‘शट-डाउन’ कोई नई स्थिति नहीं है। इससे पहले भी कई राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में यह कई बार हो चुका है। रिकॉर्ड के अनुसार, राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के शासनकाल में 8 बार, जिमी कार्टर के दौरान 5 बार, बिल क्लिंटन के समय 2 बार, बराक ओबामा के दौर में 1 बार और जेराल्ड फ़ोर्ड के समय 1 बार शट-डाउन हुआ था।
सवाल यह उठता है कि आख़िर अमेरिका के संविधान में ऐसा क्या है, जिसके कारण ‘शट डाउन’ इतनी आसानी से लगाया जा सकता है? यदि पाकिस्तान जैसे देश की सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पगार देने के पैसे नहीं हैं, तो समझ में आता है; मगर विश्व के सबसे अमीर और शक्तिशाली देश की हालत ऐसी पतली हो, तो सवाल उठना तो लाज़मी है।
अमेरिका में सरकारी ‘शट-डाउन’ तब होता है, जब वार्षिक व्यय विधेयकों पर सहमति नहीं बन पाती है। अमेरिकी सरकार के अलग-अलग विभागों को चलाने के लिए भारी मात्रा में फ़ंड की जरूरत होती है। इसके लिए संसद (कांग्रेस) से बजट या ‘फंडिंग बिल’ पारित कराना जरूरी होता है। लेकिन, जब राजनीतिक मतभेद या गतिरोध की वजह से ‘फंडिंग बिल’ पारित नहीं हो पाता, तो सरकार के पास कानूनी रूप से खर्च करने के लिए फंड नहीं बचता। ऐसी स्थिति में अमेरिकी सरकार को अपनी गैर-जरूरी सेवाएँ बंद करनी पड़ती हैं, जिसे ‘सरकारी शट-डाउन’ कहा जाता है।
राष्ट्रपति ट्रंप और विपक्षी डेमोक्रैटिक पार्टी में स्वास्थ्य सुरक्षा और कमजोर समूहों के लाभों की रक्षा को लेकर असहमति है, और दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मूल राजनीतिक विषय का प्रतिनिधित्व करता है। ट्रंप की पार्टी को सीनेट में अस्थायी ‘फंडिंग बिल’ पास कराने के लिए कम से कम 60 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सिर्फ 55 वोट ही जुट पाए। ऐसे में यह प्रस्ताव गिर गया है, जो डॉनल्ड ट्रंप के लिए असहज स्थिति है। ट्रंप की समस्या यह है कि वे एक ही समय पर बहुत से मोर्चों पर लड़ाई कर रहे हैं। उनकी टैरिफ़ नीति ने वैसे ही अमेरिकी जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ा रखा है।
इस बार के ‘शट-डाउन’ का खतरा और गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि ट्रंप इसकी आड़ में लाखों कर्मचारियों की छंटनी और कई अहम योजनाओं को बंद करने की तैयारी कर सकते हैं। ‘शट डाउन’ से ठीक पहले उन्होंने इसके संकेत भी दे दिए हैं। ट्रंप अमेरिका की समस्याओं का हल नहीं हैं। सच तो यह है कि वर्तमान में डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या हैं। और यदि ग़ौर से देखा जाए, तो वे इस समय पूरे विश्व के लिए एक समस्या बने हुए हैं।
ज़ाहिर है कि यह ज्वलंत प्रश्न उठेगा ही कि इस ‘शट-डाउन’ के दौरान क्या-क्या घटित हो सकता है। सबसे पहले तो कुल सरकारी कर्मचारियों में से 40 फीसदी यानी लगभग 8 लाख कर्मियों को बिना वेतन लंबी छुट्टी पर भेजा जा सकता है।
हेल्थ और ह्यूमन सर्विस विभाग ने अपने 41 प्रतिशत कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने की तैयारी की है। आशंका यह भी है कि कई सरकारी दफ़्तर बंद हो जाएंगे, साथ ही नेशनल पार्क, म्यूज़ियम और कई सरकारी वेबसाइटें भी काम करना बंद कर सकती हैं।
करीब 8 लाख फेडरल कर्मचारियों को बिना वेतन के अनिवार्य छुट्टी पर भेजा जा सकता है, जिसे ‘फ़र्लों’ कहा जाता है। कानून व्यवस्था, सीमा सुरक्षा, मेडिकल और हवाई और रेल आदि जरूरी सेवाएँ जारी रहेंगी। ‘शट-डाउन’ का असर ट्रांसपोर्ट सेवाओं पर दिखेगा, उड़ानों में देरी संभव है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘शट डाउन’ जितना लंबा चलेगा, उसके दुष्प्रभाव उतने ही ज्यादा होंगे। ‘शट-डाउन’ लंबा चला, तो बाज़ारों पर असर दिख सकता है और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी सरकार के ‘शट-डाउन’ के परिणामस्वरूप कई संघीय सेवाओं पर असर पड़ना शुरू हो गया है। इसका प्रभाव भारत स्थित अमेरिकी दूतावास पर भी दिखाई दिया, जब उसने घोषणा की कि ‘शटडाउन’ के कारण उसका ‘X’ पर आधिकारिक अकाउंट नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाएगा। दूतावास ने कहा कि विनियोजन में चूक के चलते अकाउंट पर केवल अत्यावश्यक सुरक्षा और संरक्षा संबंधी जानकारियाँ ही साझा की जाएंगी, जबकि नियमित अपडेट संचालन दोबारा शुरू होने तक निलंबित रहेंगे।
भारत में भी इस विषय पर सोच-विचार अवश्य चल रहा होगा। बहुत से लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि इस प्रकार के ‘शट-डाउन’ से भारतवासियों एवं भारतवंशियों को क्या नुकसान हो सकते हैं। सबसे पहले तो परेशानी होने वाली है- भारतीय छात्रों एवं ‘एच1-बी’ वीज़ा के तहत अमेरिका जाने वाले भारतीय पेशेवरों को। अमेरिका के श्रम विभाग के कर्मचारियों को तो छुट्टी पर भेजा जा चुका है। इसलिए वीज़ा और रोज़गार में तो देरी होना स्वाभाविक है। 
भारत की आई.टी. कंपनियों पर काम का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी कंपनियाँ अपना काम भारतीय कंपनियों को आउटसोर्स कर सकती हैं। और यह भी स्पष्ट है कि जब केवल अति-आवश्यक सेवाओं से ही काम चल रहा होगा, तो व्यापारिक लाइसेंस, अनुमति पत्र आदि मिलने में भी समय लगेगा। इसका असर भारतीय व्यापारियों पर अवश्य पड़ेगा, जो अमेरिका में व्यापार करना चाहते हैं। ‘ई-प्रणाली’ तो लगभग ठप्प ही हो जाएगी। 
अमेरिका में काम कर रहे भारतीय मूल के लोगों को भी उसी तरह पगार मिलने में देरी होगी, जैसे  कि अन्य अमेरिकी लोगों को। उनकी वित्तीय स्थिति पर असर पड़ेगा, अतः प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाली विदेशी मुद्रा में भी कमी आएगी ही। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर अवश्य पड़ेगा। 
अमेरिका में पर्यटन पर विपरीत असर पड़ने की पूरी संभावना है। कई नागरिक सेवाएँ निलंबित या प्रभावित हुई हैं। राष्ट्रीय उद्यान, संग्रहालय और स्मारक बंद हो गए हैं, जिससे पर्यटन और पर्यावरण सुरक्षा पर असर पड़ेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही अनुभवी हों, लेकिन अपने ज़िद्दी स्वभाव के चलते वे कांग्रेस से भिड़ गए और आर्थिक बिल 55-45 मतों से पास नहीं हो सका। अनुमान है कि यदि यह ‘शटडाउन’ एक महीने तक चलता है, तो अमेरिका को हर सप्ताह लगभग 15 अरब डॉलर का नुकसान होगा। करीब 45 हज़ार लोग बेरोज़गार हो सकते हैं। शेयर बाज़ार में आई गिरावट न केवल अमेरिका बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति आम जनता में भय और असमंजस पैदा कर रही है।
शेयर बाज़ार में मंदी आने पर निवेशकों को न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि उनका भरोसा भी डगमगा सकता है। 
जितना लंबा यह ‘शट-डाउन’ चलेगा, अर्थव्यवस्था के लिए संभलना उतना ही कठिन होता जाएगा। अमेरिका के परिवहन विभाग ने पुष्टि की है कि एअर ट्रैफिक कंट्रोल और विमानन से जुड़े कई कर्मचारी बिना वेतन काम कर रहे हैं, जबकि ग्यारह हज़ार से अधिक कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजा गया है। अमेरिकी एयरलाइंस ने भी चेतावनी दी है कि इस राजनीतिक गतिरोध का खामियाजा यात्रियों और विमानन उद्योग- दोनों को उठाना पड़ सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल शुरू से ही विवादों में घिरा रहा है। उन्होंने नैटो सदस्य देशों के नेताओं से बातचीत उस अंदाज़ में की जैसे कोई स्कूल का प्रिंसिपल अपने स्टाफ़ या छात्रों से करता हो। यूक्रेन के राष्ट्रपति को कैमरे के सामने अपमानित कर दिया। उन्होंने टैरिफ़ ऐसे लगाना शुरू किया मानो यह रोज़ सुबह शेयर बाज़ार के भाव बताने की प्रक्रिया हो। यदि हालात नहीं सुधरे तो ट्रंप का सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है। संभव है कि पर्दे के पीछे कुछ हलचल पहले ही शुरू हो चुकी हो। अमेरिका की स्थिति बिगड़ती है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा|
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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51 टिप्पणी

  1. बेहद तार्किक संपादकीय सर। बाकी वैसे कुछ हो न हो हमें तो ये देखना है शेयर बाजार पर क्या असर पड़ेगा पॉजिटिव या नेगेटिव।
    शुक्रिया इतने सुंदर संपादकीय को साझा करने का

  2. बेहद महत्वपूर्ण संपादकीय।पिछले कुछ समय से ट्रंप की अराजक गतिविधियों ने काफी विचलित कर रखा है। जरूरतमंद संस्थाओं को वित्तीय सहायता , ग्राांट्स, लोन, फूड एड देना बंद करना, स्त्री के अधिकारों के प्रति उदासीन होना, ऐसे कई कदम हैं जो बहुत तकलीफदेह हैं। और अब यह शट डाउन।आपका यह आलेख पूरी दुनिया पर होनेवाले इसके प्रभाव पर सर्च लाइट डाल रहा है। आखिर क्या है उसके दिमाग में..!

    • सरस जी, जब आप जैसे जागरूक पाठक भी संपादकीय को सर्चलाइट की तरह देखते हैं, तो पुरवाई पत्रिका को आत्मिक संतोष की प्राप्ति होती है। हार्दिक धन्यवाद।

  3. बहुत ही बेहतरीन ढंग से आपने शट डाउन के विषय में बताया और साथ ही उसके चलते अमेरिका और भारत पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आंकलन किया, जो कि सहज ही ग़ौरतलब है। एक तात्कालिक विषय पर सुंदर और संतुलित संपादकीय सांझा करने के लिए साधुवाद और बधाई आदरणीय तेजेन्द्र सर।

    • विरेंदर भाई, आपको हमारा प्रयास इस कदर पसंद आया… हमारे लिये कॉलर अप वाली स्थिति है। हार्दिक धन्यवाद।

  4. इस बार का संपादकीय-अमेरिका महान बन गया…! अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों पर केंद्रित है। यह सच है कि अमेरिका विश्व की धुरी है। अमेरिका के पूर्व नीति-निर्माता टेलेंटड थे। वे अमेरिका की इस तरह की व्यवस्था करके गए हैं कि ट्रंप जैसे व्यक्ति भी सत्ता संभालेंगे तो देश को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। हां ऊल-जलूल करेंगे तो वह व्यक्ति हंसी का पात्र जरूर बन जाएगा। बन भी रहे हैं।
    विश्व व्यापार की करेंसी अमेरिकी डॉलर है। इससे अमेरिका को इतना कर मिल जाता है कि उसकी अर्थव्यवस्था गड़बड़ न हो पाएगी। बाकी अन्य देशों को आपस में लड़ाकर हथियार बेच लेता है। जो देश हथियार बनाने की सोचते हैं उस पर साम, दाम, दण्ड, भेद से ऐसा करने से रोक देता है। इसी से अमेरिका हथियारों का बादशाह बना हुआ है। इन्हीं से खूब डॉलर बनते हैं।
    लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प की नासमझी के कारण अन्य देश डॉलर का विकल्प ढूंढने की तैयारी करने लगे हैं। ट्रम्प ने यहीं नादानी कर दी । कहते हैं कि एक बार जिस विचार को बंद कमरे में भी प्रसारित कर दिया जाए तो वह एक समय पर पूरे भूमंडल में फैल जाता है। विश्व के हर देश पर टैरिफ और कुछ पर सैंक्शन ने दूसरे देशों को इस ओर सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब अमेरिका (डोनाल्ड ट्रम्प नहीं) इस बात से टेंशन में आ गया है।
    व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा खुद के लिए तो हानिकारक है ही , पूरे देश के लिए भी नुकसानदायक है। नोबेल पुरस्कार का भूत ट्रम्प के सिर पर ऐसे बैठ गया है कि उसके अलावा उन्हें कुछ सूझता ही नहीं है। उनके द्वारा दिए गए नारे कि मैंने आठ महीने में आठ युद्धविराम करवाए… रूस यूक्रेन युद्ध असल में नरेन्द्र मोदी युद्ध है…. आदि इस बात की तस्दीक करते हैं कि यह व्यक्ति स्वार्थ से भरा हुआ है। व्यापारी है तो पैसा की कमी नहीं है। पुरस्कार से अमर हो जाना चाहते हैं। ट्रम्प महोदय अपनी मूर्खताओं से वैसे ही अमर हो चुके हैं। आगे की पीढ़ियां उन्हें उनके इन्हीं कारनामों से याद रखेंगे।
    इन्हें पुरस्कार दे भी दिया जाए तो भी संतुष्ट न होंगे। आगे फिर और कुछ मांगने लगेंगे। आग में घी डालने से आग और भड़कती है।
    आपने सही लिखा है कि ट्रम्प अमेरिका के लिए समस्या तो है ही पूरे विश्व के लिए समस्या बने हुए हैं। शट-डाउन ने वहां के कर्मचारियों की हालत खराब कर दी है। आठ लाख कर्मचारी बहुत होते हैं जिन्हें छुट्टी पर भेजा जा रहा है। इससे वीजा और रोजगार में भी देरी होगी। मतलब शट-डाउन केवल अमेरिका को प्रभावित नहीं कर रहा है बल्कि विश्व को भी प्रभावित कर रहा है खासकर भारत को कुछ ज्यादा ही।
    मैं सोचता हूं कि अमेरिका का शट-डाउन अजीब है कि देश के नागरिक परेशान हैं और सरकार तथा विपक्ष के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। यहां होता तो लोग सड़कों पर आ जाते और विपक्ष सरकार को घेरने में लग जाते हैं। हो सकता है कि शट-डाउन वाला सिस्टम वहां के संविधान में हो।
    अमेरिकी जनता भी सोच रही होगी कि ट्रम्प को अमेरिका का राष्ट्रपति बनाकर जीवन की सबसे बड़ी भूल कर दी। अब सोचने से कुछ नहीं होगा, उनके पूरे कार्यकाल को जैसे-तैसे बिताना पड़ेगा।
    फिलहाल ट्रम्प महोदय इतना तो कर ले रहे हैं कि हर दिन विश्व की राजनीति में छाए रहते हैं। यह तो वही बात है कि बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा। डोनाल्ड ट्रम्प बस इसी ध्येय पर जी रहे हैं।
    डोनाल्ड ट्रम्प की बेवकूफियां भली लगती हैं, उस पर आपका बढ़िया संपादकीय सोने पर सुहागा से कम नहीं है। संपादकीय पढ़कर आनंद आ गया।
    बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • प्रिय भाई, लखनलाल पाल जी। आपने तो शट-डाउन और ट्रंप को लेकर इतनी गहरी पड़ताल की है कि संपादकीय भी ख़ुशी से नाचने लगा है। हार्दिक धन्यवाद कहना तो काफ़ी नहीं होगा।

  5. पप्पू राष्ट्रपति साबित हो रहे हैँ ट्रम्प.. इनको अपने देश से अधिक अपने नोबेल पुरस्कार की लॉबिंग से मतलब है

  6. महाशक्ति कहलाने वाले राष्ट्र अमेरिका की आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों का विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव पर विवेचना से भरपूर है ,साप्ताहिक सम्पादकीय ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  7. पुरवाई के संपादकीय में शट डाउन जैसी प्रक्रिया का पूरा विवरण उससे होने वाले नुकसान, प्रभावित लोगों और देश की समस्याएं सभी का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत किया है।
    शट डाउन में 55 मतों की बात, ट्रंप का रवैया, उनकी जिद्द उनके प्रति लोगों का विरोध सभी का आकलन किया गया है।
    कुल मिलाकर एक देश जो भी निर्णय लेता है तो उससे जुड़े अन्य लोग भी प्रभावित होते हैं।
    सबसे बड़ी बात कर्मचारियों को वेतन न मिलना और उनकी छंटनी का भय भारत पर भी मंडरा रहा है क्योंकि कई भारतीय मूल के लोग वहाँ कर्मचारी, विद्यार्थी एवं व्यवसायी हैं।
    संपादकीय में बहुत तर्कपूर्ण विश्लेषण के लिए के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी को धन्यवाद।

    • पद्मा आपका समर्थन हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आप निरंतर पुरवाई के संपादकीय पढ़ती हैं और उन पर हमारा हौसला बढ़ाती हैं। हार्दिक धन्यवाद।

  8. इस बार का संपादकीय मुझे भी अमेरिका घुमा आया l वहाँ की अर्थिक परिस्थितियों पर “गिद्ध-दृष्टि” से की गई विवेचना न सिर्फ आर्थिक गतिविधियों पर नज़र डालती है, अपितु राजनीतिक तहखाने भी खंगालती है l विश्व मंच के हलचल का विहंगम दृश्य भी बड़ी ख़ूबसूरती से आपने रखा है l
    सरल भाषा में तमाम तथ्य बताते हुए सुन्दर सम्पादकीय! साधुवाद!

    • लीजिये प्रणेंद्र भाई बिना टिकट और बिना वीज़ा आप अमरीका घूम आए… आपने तो हमारी बल्ले-बल्ले कर दी। बहुत शुक्रिया।

  9. आपने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का तार्किक विश्लेषण किया है। हर बार की तरह ज्ञान में वृद्धि करता महत्वपूर्ण सम्पादकीय।साधुवाद तेजेंद्र जी

  10. अति महत्वपूर्ण संपादकीय है….इतनी जानकारी व विवरण देकर आपने पाठकों को सच का दर्पण दिखाया है… साधुवाद सर

  11. पुरवाई के संपादकीय को पढ़ कर अमेरिका और उसके महान राष्ट्रपति ट्रंप महोदय के कारनामों से एक हे से परिचित हुए हैं।
    महान अमेरिका और शांति का नोबल पुरस्कार दोनों इसी महानुभाव को चाहिएं। यूँ भी पूर्व राष्ट्रपति जनाब जो बाइडन ने सही कहा था कि अमेरिका अब आम और गरीब आदमी से अमीर हाथों में जा रहा है।
    और ये अमेरिका बिजनेस मॉडल की मानसिकता वाले हाथों में गया और महानता की कवायद शुरू हो गई।50पर्सेंट का टैरिफ भारत के प्रधानमंत्री के दोस्त ने थोप दिया?!?!?
    अब इस मोगली बाल उपन्यास के शेरखान ने पाकिस्तान रूपी तबाकी ,सियार, को अपना ख़बरी बना किया और उस से नोबेल पुरस्कार की सीढ़ी पर आने का प्रस्ताव पेश करवा लिया।इसके बदले में इस बिन लादेन को पनाह देने वाले देश को बिटकॉइन वाला शकुनि पासा में फंसा दिया है।
    अब शट डाउन का ट्रंप कार्ड खेला ताकि भारत रूपी मोगली और बल्लू भालू रूस को एक साथ पकड़ा जा सके। पर इन सब खड़ूस हरकतों से कहीं ट्रंप अपने ही कारनामों के हाथी के पांव से स्वयं ही ट्रंपल यानी कुचल न लें और फिर इस बार भस्मासुर भारत में ना होकर अमेरिका में अपनी उपस्थिति दर्ज़ न करवा दे।

    • सर जी, तुसी ऐदकी पिच्छे रह गये! आपने संपादकीय को बेहतरीन ढंग से विश्लेषित किया है। बहुत बहुत शुक्रिया।

  12. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    आज का संपादकीय बेहद महत्वपूर्ण है!!!! सिर्फ ट्रंप की हास्यास्पद बातों,ऐलानो और महत्वाकांक्षाओं के लिये ही नहीं, बल्कि अपने अविवेक पूर्ण निर्णय और जिद की वजह से अपने देश और दुनिया को मुश्किलों में डालने की जानकारियों और शट डाउन की वजह से उत्पन्न समस्याओं की लंबी और गंभीर लिस्ट की वजह से भी।

    ओह! पता नहीं कैसे कैसे लोगों को चुन लिया जाता है राष्ट्राध्यक्ष के रूप में।

    अमेरिका जैसे देश का राष्ट्राध्यक्ष इतना बदमिजाज व्यक्ति हो सकता है, हँसी आती है और विश्वास नहीं होता।

    “पर हाथ कंगन को आरसी क्या?”

    अंधेर नगरी और चौपट राजा टाइप स्थित हो गई है अमेरिका की।

    आज का पूरा संपादकीय हमारे लिए नई जानकारियों से भरा हुआ है। पहली बार जाना शटडाउन क्या होता है अमेरिका में।

    शट-डाउन के बाद की स्थिति चिंताजनक है। विश्व बाजार पर प्रभाव तो पड़ेगा यह वैश्विक चिंता की स्थिति है।

    जिन लोगों ने ट्रंप को राष्ट्रपति पद के लिए वोट किया उनके लिये गिरिधर कवि की एक कुंडली याद आ रही है

    बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
    काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥

    जग में होत हंसाय, चित्त में चैन न पावै।
    खान पान सन्मान, राग रंग मनहिं न भावै॥
    कह ‘गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे।
    खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना बिचारे॥

    वास्तव में सारे विश्व में ट्रंप इस समय हास्य का ही पात्र है और वोटर पछता रहे होंगे।

    अगर बातों से कोई देश महान बन जाता तो फिर तो बात ही क्या थी! सारी दुनिया का हर देश महान होता।

    किसी को भी स्वयं पर कभी भी इतना अभिमान नहीं करना चाहिए कि जब समय करवट बदले तो वह किसी को मुँह दिखाने लायक ना रहे।चाहे वह व्यक्ति हो, समाज हो, या राष्ट्राध्यक्ष हो।

    शट डाउन को आपने बेहतरीन तरीके से समझाया कि-

    यह क्या होता है?

    इसका प्रभाव क्या पड़ेगा- देश में, देश के नागरिकों पर ,देश के अन्य विभागों पर और फिर दुनिया में।

    इसके क्या-क्या नुकसान हैं?

    इनके मुकाबले फायदा एक भी नहीं।

    कुल मिलाकर अमेरिका, अमेरिका के निवासी, वहाँ रहने वाले प्रवासी नागरिकों के साथ ही सारा विश्व समस्या की चपेट में।देश और दुनिया इस समय परेशानी में पढ़ने वाली स्थिति में है।
    कितनी बार शटडाउन लगा किस-किस के शासन में; यह भी पता चला,उसके बाद भी शटडाउन हमारे लिए नई जानकारी रही। किसी राज्य की नीति के संबंध में शट डाउन शब्द का प्रयोग हमने पहली बार सुना।

    वैश्विक जानकारी से समृद्ध होना पुरवाई के संपादकीय का लाभ और महत्व है हमारे लिये।

    ट्रंप स्वयं में जितना हास्यास्पद है ,स्थिति उससे अधिक गंभीर हैं।
    वास्तव में डोनाल्ड ट्रम्प किसी समस्या का हल नहीं, बल्कि स्वयं ही समस्या हैं ,सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं सारी दुनिया के लिये।

    8 लाख कर्मचारियों की संख्या कम नहीं होती! बिना वेतन के वे क्या करेंगे?

    क्या अव्यवस्था हो सकती है की लंबी लिस्ट है
    अव्यवस्था से संबंधित लंबी लिस्ट को पढ़कर तो दिमाग ही घूम गया।
    पहली बार यह ख्याल मन में आया कि भारत की स्थिति इतनी भी खराब नहीं अमेरिका के मुकाबले। अगर ऐसी स्थिति यहाँ बनती तो पता नहीं क्या-क्या हो जाता,यह अकल्पनीय है।

    राष्ट्र नायकों की बेवकूफियों, लापरवाहियों ,ज़िद और महत्वाकांक्षाओं की वजह से राष्ट्र, नागरिक और व्यवस्थाओं की नींव हिल जाती है। इन परिस्थितियों के पीछे समस्याओं और मुश्किलों का एक लंबा जखीरा है।

    विकास की किस राह में जा रही है दुनिया? जहाँ शांति और सुकून का नामोनिशान नहीं।

    इस बार के संपादकीय चिंतित किया। जबकि जानते हैं कि फिलहाल इसका कोई समाधान नहीं।

    हमारे लिए तो इस संपादकीय की हर जानकारी नयी है।

    बहुत-बहुत शुक्रिया आपका, संपादकीय के माध्यम से दुनिया की वस्तु स्थिति से रूबरू करवाने के लिये तेजेन्द्र जी!

    • आदरणीय नीलिमा जी, जब आप जैसी जागरूक पाठक भी यह कहती हैं कि आपको संपादकीय से कुछ नया मिला, तो हमारी संपादकीय टीम का संतुष्ट होना जायज़ ही है। आप ऐसे ही हमारी टीम का हौसला बढ़ाती रहें और हम आपको हर बार कुछ ना कुछ नया पेश करते रहेंगे।

  13. प्रिय संपादक,
    अमरीका का कच्चा चिट्ठा पढ़ कर लगा जैसे हिंदुस्तान के बारे में पढ़ रहे हैं।
    हम उस नागवार किस्से का भंडा फोड़ करते तो रहते हैं पर ऐसे लोग गिनती के ही कुछ हैं। जब तक हैं, उम्मीद बाकी है कि किश्ती तूफान से बाहर निकल जाएगी। बाकी तो अल्लाह मालिक है।

  14. इतनी बेबाक संपादकीय के लिए आदरणीय सम्पादक महोदय को हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएँ,,,,”शटडाउन” को आपने अपने संपादकीय इतनी सहजता और सरलता से स्पष्ट कर दिया कि अब केवल राष्ट्राध्यक्ष ट्रंप महोदय द्वारा लिए गए कठोर निर्णय के परिणाम की तस्वीर हमारे पाठक वृन्द के मन मस्तिष्क में स्वत: ही खिंचनी शुरु हो जाएगी, और एक नया सवेरा की प्रतीक्षा अमरीकी और प्रवासी नागरिकों के मन में प्रतिक्षण कोलाहल पैदा करने कारण बनेगा और वैश्विक प्रकोप को जन्म देगा। सादर,,,

  15. जितेन्द्र भाई: बहुत ही ज्ञानवर्धक और रोचक सम्पादकीय है आपका। अमरीका की जो दशा हो रही है उस के लिए स्वयं ट्रंप और ट्रंप ही ज़िम्मेवार है। यदि देखा जाए तो सभी समस्यायों की जड़ यह खुद ही है। अपने चारों ओर चुन चुन कर एक से बढ़कर एक नमूने इकठ्ठे कर रखे हैं। इन हालातों को देखकर तो यही कहना वाजिब होगा;
    हर शाख़ पे उल्लू बैठे हैं – अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा

    • सर जी, आप तो बहुत नज़दीक से सब देख रहे हैं। ट्रंपवाद को बेहतर समझ पा रहे होंगे।

  16. हमेशा की तरह जरूरी विषय पर बढ़िया संपादकीय तेजेंद्रजी। आपके लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

  17. अति सुन्दर सराहनीय तरीके संपादकीय प्रस्तुति दी!
    बड़े तर्कशील ढंग से शट डाउन के बारे मे बताया !
    टैरिफ से तो पूरे भारत देश में खलबली मची हुई है और वीज़ा फीस सौ गुना बढ़ाने से अमरीका में काम ढूंढने वालों पर तो बड़ी गाज गिर गई!
    अब ज़्यादा लिखूंगा तो आप कहेंगे कि मैने भी एक संपादकीय लिख दिया !
    कुल मिला कर आपका लेखन रोचक जानकारी पूर्ण और ज्ञान वर्धक है !
    शुभकामनाओं के साथ

  18. नमस्कार जी ।

    आपकी विहंगम दृष्टि हमेशा नए-नए विषयों पर जाती है । … और ये विषय कहीं न कहीं जन मानुष को अवश्य स्पर्श करते है । अब ‘शट डाउन’ का ही विषय ले लो । डोनाल्ड ट्रम्प की इस नासमझी भरे कदम से अमेरिका की आम जनता पर क्या असर होगा, ये तो वही जानें, पर सबसे बुरा हाल होगा, अमेरिका के लिए आउट सोर्स के लिये आए दूसरे देश के युवाओं पर । इनमें से कुछ तो 35 या 40 की उम्र के भी हो चुके है, उम्र के इस दौर में, फिर से सिरे से, शून्य से जीवन शुरू करना इतना आसान तो नहीं है । कुछ वर्ष पहले कुवैत से भारतीयों को बेदखल किया गया था । उनका क्या बुरा हाल हुआ था वर्णन करना मुश्किल है । ये सब मैंने (आस पड़ोस में) अपनी आँखों से देखा है । कुछ परिवार तो अभी तक इस पीड़ा से उबर नहीं पाए हैं ।

    अमेरिका जैसा समृद्ध देश किसलिए ‘शट डाउन’ का सहारा ले रहा है समझना मुश्किल है । क्या वह अपनी शान दिखाना चाहता है, ‘देखो, मैं कुछ भी कर सकता हूँ, सारी दुनियाँ को अपनी उँगलियों पर नचा सकता हूँ’’ छोटे से छोटे, विकासशील देश भी ऐसा नहीं करते, अनावश्यक सुविधाओं को बंद करना कैसा गरीब देश जैसा साउंड करता है ।

    डोनेल्ड ट्रम्प का यह बिना सोच-समझ के या जिद्दीपन में लिया गया निर्णय, उसे अवश्य ही दुवारा सोचने पर मजबूर कर देगा ।

    आपके संपादकीय हरेक विषय की पूर्णतया, सिलसिलेवार, तारीख और आंकड़ों सहित जानकारी देते हैं। ‘शट डाउन’ की विस्तृत जानकारी इससे पहले कभी नहीं मिली । किस राष्ट्रपति के शासनकाल में कितनी बार ‘शट डाउन’ लगाया गया, क्यों लगाया गया, इतनी अच्छी तरह से कभी नहीं समझाया गया । आपके परिश्रम को नमन है ।

    उषा

    • आदरणीय उषा जी, आपने डॉनल्ड ट्रंप के ज़िद्दीपन को रेखांकित करते हुए पुरवाई के संपादकीयों के विषयों की तारीफ़ की है। हमारा प्रयास रहता है कि आप तक नये से नये विषय लाए जा सकें।

  19. बेहद जरूरी विषय को रेखांकित करना आज के हालात की नब्ज पहचानने जैसा है। इसकी गंभीरता अमरीकी राष्ट्रपति नहीं समझ पा रहें हैं।‌ हालांकि कि वह अमेरिकी हितों का दावा करते हैं पर अपने ही लोगों को नुक्सान पहुंचाने से अमरीका का भला होने से रहा, सभी देशों का भी अहित होगा। अमरीका को भी एक पप्पू मिल गया, भारत में पहले ही अपना पप्पू सिरदर्द बना है, यह पप्पू तो सारी दुनिया के लिये विनाशकारी सिरदर्द सिद्ध होगा। ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • संतोष जी आपने इस नये पप्पु के बारे में ज़बरदस्त चुटकी ली है… सच में ट्रंप का व्यक्तित्व विश्व के लिये किसी ख़तरे से कम नहीं।

  20. अमेरिका विश्व का सर्व प्रमुख देश है; उसकी नीतियों से पूरा विश्व प्रभावित होता है। ऐसे में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि उसका राष्ट्राध्यक्ष एक सुलझा हुआ व्यक्ति हो।
    डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल आरंभ से ही विवादों के घेरे में रहा है। उनके फैसले चौंकाने वाले होते हैं । आपने उनके शटडाउन के विश्व व्यापी परिणाम पर विस्तार में चर्चा की है। भारतीय छात्रों एवं h1b वीज़ा के तहत अमेरिका जाने वाले भारतीय कार्मिकों को इस शटडाउन का नुकसान होगा। अमेरिका में कार्यरत भारतीय मूल के व्यक्तियों को भी वेतन मिलने में देर होगी, इससे हमारे देश में विदेशी मुद्रा की कमी आएगी। अपने अमेरिका के शटडाउन का अपने देश पर पड़ने वाले प्रभाव पर अच्छी चर्चा की है।
    ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी 35 दिन का शटडाउन लगा था और अब फिर वही।
    आपका संपादकीय उकसाने का कार्य करता है। हमने यह खबर पढ़ी और उसे यूं ही नज़रों से गुज़र जाने दिया। आपने जब संपादकीय में उस पर इतने विस्तार से प्रकाश डाला तो एक बार फिर इसके बारे में समझने की जिज्ञासा हुई और उसे संपादकीय में अच्छी तरह पढ़ा। आप वैश्विक घटनाओं के प्रति जागरूक करते हैं इसके लिए हार्दिक आभार और आगे के लिए अनेकशः शुभकामनाएं।

    • विद्या जी, हमारा प्रयास रहता है कि वैश्विक घटनाएं अपने पाठकों की निगाह में अवश्य लाएं। आपके निरंतर समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  21. वाह, बहुत जोरदार संपादकीय। भाई तेजेंद्र जी, आपने तो पूरा शोध ही कर दिया ट्रंप प्रशासन की मौजूदा विडंबनाओं पर।‌ यों भी ट्रंप सरीखे मुंहफट, गैरजिम्मेदार और कुछ-कुछ जोकरनुमा शख्स को अपने देश का राष्ट्रपति चुनकर अमेरिकी जनता ने जो गलती की, वह उस पर अब जरूर पछता रही होगी।

    इस ‘विचित्र क्लाउन’ ने अपने विचित्र करतबों से पूरी दुनिया की नींद हराम कर दी है, तो भला अमेरिका की जनता भी कैसे सुख की नींद सो सकती थी? लिहाजा ट्रंप का शट डाउन उन सबकी आशाओं और उम्मीदों को तार-तार करने आ पहुंचा, जिन्होंने ट्रंप में अमेरिका की महानता के सपने देखे थे। आज वह महानता भूलुंठित सी, जमीन पर औंधी पड़ी है, और ट्रंप अपनी रोज-रोज की विचित्र कारस्तानियों से उसे और चिढ़ा रहे हैं।

    पता नहीं कब तक यह प्रहसन और चलेगा भाई तेजेंद्र जी, मगर फिलवक्त तो ट्रंप का बेसुरा बाजा अमेरिका सहित सारी दुनिया के लिए बवाल मचाता रहेगा, यही नजर आ रहा है।

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

    • सर आपने ट्रंप की बेसुरी बांसुरी को पूरी तरह समझ लिया है। उसने अपने दुस्साहसिक रवैए से पूरे विश्व को मुश्किल में डाल दिया है।

  22. वाह वाह वाह!! तेजेंद्र की हार्दिक धन्यवाद तेजेंद्र की हार्दिक धन्यवाद इतना सुस्पष्ट, सुदृढ़, साहसिक (या किदुस्साहसिक ?) संपादकीय लिखने के लिए। अमेरिका के बारे में भौगोलिक और संस्कृत जानकारियां तो लेखो, निबंधों और मानचित्रों से मिलती रहती हैं परंतु सद्य राजनैतिक, आर्थिक जानकारी तो आपके इस संपादकीय ने दी ।
    आंखें खुल गई इस चौपट राजा की बुद्धि और विवेक की जानकारी पाकर!
    मोदी जी के प्रति किए गए ट्रंप के व्यवहार से तो ‘मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु ही उत्तम है’ यह कहावत पूर्ण रूप से चरितार्थ हुई है!
    बधाइयां और धन्यवाद स्वीकार करें।

    • सरोजिनी जी हमारा दुस्साहसिक संपादकीय आपको पसंद आया इसके लिए हार्दिक धन्यवाद।

  23. अमेरिका महान बन गया संपादकीय में आपने सच ही कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल शुरू से ही विवादों में घिरा रहा है। उन्होंने नैटो सदस्य देशों के नेताओं से बातचीत उस अंदाज़ में की जैसे कोई स्कूल का प्रिंसिपल अपने स्टाफ़ या छात्रों से करता हो।
    मेरा तो मानना है कि सिर्फ नाटो देशों से ही नहीं वरन विश्व के हर देश के साथ टैरिफ़ लगाने की धमकी देकर अपनी बात मनवाने का उनका यही रवैया है। नोबिल पुरस्कार पाने के लिए वह इतने बेताब हैं, कि दिनोंदिन गलतियां करते जा रहे हैं। अमेरिका में हुआ शट डाउनलोड भी इसी का नतीजा है कि वह अपने देश में ही अलग -थलग पड़ते जा रहे हैं।
    सदा की तरह संतुलित विश्लेषण करता संपादकीय।

    • सुधा जी, आपने ट्रंप के चरित्र को पूरी तरह समझा है। आपको संपादकीय संतुलित लगा, हार्दिक आभार।

  24. ट्रम्प सचमुच सिरदर्द ही साबित हो रहे विश्व के लिये।व्यापार,शिक्षा,पर्यटन सभी कुछ उठा कर ताक पर रख दिया है ।अपने मे मग्न गा रहे हैं-

    क्या क्या न किये हमने जुलुम नोबल के वास्ते……..

  25. दिल थाम के बैठिये। नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा होने वाली है। ट्रंप को उनकी आत्मप्रशंसा का ईनाम मिलेगा या फिर जगहंसाई होगी।

    • हो चुकी घोषणा! अब तो एक ही काम हो सकता है कि मोहसिन नक़वी चोरी की गई एशिया कप ट्रॉफ़ी देकर ट्रंप के आंसू पोंछ दें!

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