अंग्रेज़ी में एक कहावत है, “there are no free lunches!” इसका सीधा-सादा अर्थ है कि कोई भी चीज़ मुफ़्त नहीं मिलती। हर शै की एक कीमत होती है। सच तो यह है कि पाकिस्तान का समाचारपत्र डॉन भी यही कह रहा है। डॉन में बाकिर सज्जाद सैयद ने लिखा है कि ट्रंप ने मुनीर को लंच पर तब बुलाया जब पाकिस्तान ने ईरान के समर्थन का ऐलान कर दिया था। इस लंच की कीमत में शामिल होगा अमरीका द्वारा ईरान के विरुद्ध पाकिस्तान के एअरबेस और लॉन्च पैड का इस्तेमाल।
विश्व इस समय एक हिंसक दौर से गुज़र रहा है। इसराइल और हमास का संघर्ष, रुस-यूक्रेन युद्ध, पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा भारतीय सैलानियों की हत्या, भारत का ऑपरेशन सिंदूर और अब इसराइल-ईरान युद्ध। आजकल हर युद्ध में एक नाम समान रूप से उभर कर सामने आ रहा है – अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप!
डॉनल्ड ट्रंप ने शोर मचा दिया था कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़फ़ायर करवा दिया था और उनके कहने से युद्ध रुक गया। भारत ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया और अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी तीसरे पक्ष का इस मसले में दख़ल बर्दाश्त नहीं करेगा।
भारत के विदेश मंत्रालय का स्टैंड एकदम साफ़ है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने निहत्थे भारतीयों की हत्या की। इसके जवाब में भारत ने आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंप तबाह किये। भारत के विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने पाकिस्तान से कहा कि हमने जो करना है हम कर चुके। यदि आप अब मामले को तूल देंगे तो हम भी उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे।
पाकिस्तान नहीं माना और उसने भारत पर मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं। उसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान के ग्यारह से अधिक हवाई बेस तबाह कर डाले। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और उप-प्रधानमंत्री ने अपने हवाई अड्डे तबाह होने की बात टीवी चैनलों पर स्वीकार की।
इस समय तक सोशल मीडिया में तथाकथित सच्ची ख़बरें फैलने लगीं। टीवी चैनलों में शोर मच गया कि पाकिस्तान में न्यूक्लियर लीक हो गया है और अमरीका ने दबाव डाल कर सीज़फ़ायर करवा दिया है। भारत के विपक्षी दलों ने अपनी-अपनी ढपली बजानी शुरू कर दी और अपना-अपना राग सुनाना शुरू कर दिया। सबसे अधिक शोरीला राग था – ‘राग नरेन्दर सरेंडर!’
इस बीच इसराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो गया और अचानक ट्रंप को पाकिस्तान पर बहुत प्यार आने लगा। उसने आसिम मुनीर को लंच पर व्हाइट हाउस आने का न्यौता दे डाला। देखा गया कि आसिम मुनीर व्हाइट हाउस में कार पर सवार हो कर नहीं पहुंचा बल्कि पैदल अपने दल-बल के साथ और व्हाइट हाउस सुरक्षा कर्मियों से घिरा पहुंचा। यदि मुनीर पाकिस्तान के राष्ट्रपति होते तो उनकी कार सीधी व्हाइट हाउस के अंदर रुकती और उन्हें सादर भीतर ले जाता जाता।

इस निजी लंच के लिये राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने फ़ेल्ड मार्शल आसिम मुनीर के लिये तीन-कोर्स मीनू तैयार करवाया जिसमें हर आइटम हलाल रहा। पहले कोर्स में बकरी के दूध से बनाए चीज़ से बनाया गया केक; टमाटर का जैम; छाछ में बनाए बिस्कुट के टुकड़े; और ताज़ा हरे सलाद का पत्ता।
मेन कोर्स में रखा गया – युवा रोस्ट लैंब, फ़्रेंच सॉस में छोटे प्याज़ और कैरोलाइना गोल्ड चावलों से बना पुलाव जिनमें मीट, सी-फ़ूड और सब्ज़ियां डाली जाती हैं।
अंत में मीठे के तौर पर नेक्ट्रीन का टार्ट और आइस्क्रीम परोसे गये। बेचारे मुनीर मियां को एक तो खाना पंजाबी स्वाद का नहीं मिला ऊपर से उस ट्रंपियन लंच के बदले में जो कुछ देना पड़ेगा उसके लिये कितनी आलोचना सहनी होगी।
सवाल यह उठता है कि वो डॉनल्ड ट्रंप जो पहलगाम हत्याओं को आतंकवादी गतिविधि कह कर आलोचना कर रहे थे अचानक कैसे कहने लगे – आई लव पाकिस्तान? ट्रंप ने कहा, “आई लव पाकिस्तान. मैंने एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की। वे एक शानदार व्यक्ति हैं। अब हम उनके साथ ट्रेड डील कर सकते हैं।” ट्रंप कई बार भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर का क्रेडिट खुद को दे चुके हैं, लेकिन भारत ने हर बार ट्रंप के दावों को खारिज किया है।
ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार पाने की ज़बरदस्त चाहत है। उनमें और पाकिस्तान में एक समानता है कि दोनों कोई भी वक्तव्य जारी कर देते हैं और फिर वहां से यू-टर्न कर जाते हैं। ट्रंप दो कश्तियों में सवार होना चाहते हैं… एक ही सांस में दोहरी बात करते हैं – मुझे पाकिस्तान से प्यार है, और पीएम मोदी शानदार हैं। हर तरफ़ यही चर्चा है कि आसिम मुनीर (पाकिस्तान) ने डॉनल्ड ट्रंप के नाम का प्रस्ताव नोबल शांति पुरस्कार के लिये किया है।

इस लंच की चर्चा पूरी दुनिया में है। अंग्रेज़ी में एक कहावत है, “there are no free lunches!” इसका सीधा-सादा अर्थ है कि कोई भी चीज़ मुफ़्त नहीं मिलती। हर शै की एक कीमत होती है। सच तो यह है कि पाकिस्तान का समाचारपत्र डॉन भी यही कह रहा है। डॉन में बाकिर सज्जाद सैयद ने लिखा है कि ट्रंप ने मुनीर को लंच पर तब बुलाया जब पाकिस्तान ने ईरान के समर्थन का ऐलान कर दिया था। इस लंच की कीमत में शामिल होगा अमरीका द्वारा ईरान के विरुद्ध पाकिस्तान के एअरबेस और लॉञ्च पैड का इस्तेमाल।
सोचने की बात यह है कि पाकिस्तान के परमाणु बम को इस्लामिक बम कहा जाता रहा है। मगर जब फ़ेल्ड मार्शल डॉनल्ड ट्रंप के साथ बैठ कर “रैक ऑफ़ स्प्रिंग लैंब” का आनन्द उठाएगा तो इसकी कीमत तो अदा करनी होगी। 16 जून, 2025 को ईरान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने जो दावा किया वो इस्लामी जगत के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। इस ईरानी अधिकारी का कहना था कि अगर इसरायल ने ईरान पर परमाणु बम का इस्तेमाल किया, तो पाकिस्तान भी इसरायल पर परमाणु हमला करेगा। मगर पाकिस्तान ने एकदम यू-टर्न करते हुए इस बात से साफ़ इन्कार कर दिया कि वह इसराइल पर कोई परमाणु हमला करेगा।
अमरीकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के पूर्व अधिकारी और अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ विश्लेषक माइकल रूबिन का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी सेनाओं की केंद्रीय कमान (CENTCOM) के अधिकारी पाकिस्तान के साथ मीठी-मीठी बातें सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ईरान के विरुद्ध रणनीतिक सहयोग चाहिए। रूबिन ने साफ कहा, “डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान को अमेरिका का मित्र इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उन्हें इस दोस्ती से कुछ हासिल करना है। वे चाहते हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिका को उन परमाणु सामग्रियों को कहीं न कहीं ले जाना होगा, और हो सकता है कि इसके लिए पाकिस्तान चुना जाए.”


ट्रंप अपनी इन्हीं मक्कारी भरी गतिविधियों से पूरी दुनिया में आलोचना के पात्र बन गये हैं। भारत के प्रधानमंत्री ने उनको माकूल जवाब दे दिया है। ट्रंप की मक्कारी को समझने और उसके झांसे में नहीं आने की जरुरत है।
सही कहा अरविंद भाई। धन्यवाद।
वाह आदरणीय बेहतरीन लंच का स्वाद निराला है
हार्दिक धन्यवाद भावना।
आज पूरी दुनिया देख रही है कि अब भारत पुराना भारत नहीं है वह एक नया इतिहास गढ़ रहा है। आपने बहुत ही शानदार तरीके से चुटकीले अंदाज में फ़ेल्ड मार्शल शब्द का प्रयोग किया शायद ट्रंप को भी यही गलतफहमी हो गई है कि जब आसिम मुनीर फील्ड मार्शल बन सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं शांति नोबल पुरस्कार मिल सकता है। नोबेल कमेटी -तुम अल्ट्रा लिबरल बन जाओ तब भी तुम्हें शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा
ज़बरदस्तम अंजु! बहुत बहुत शुक्रिया।
अमेरिका के साथ पाकिस्तान की सैन्य शक्ति गठबंधन पर बहुत ही बेहतरीन लेख
बहुत शुक्रिया संगीता।
इस बार का संपादकीय- ‘व्हाइट हाउस में लंच की कीमत तुम क्या जानो मुनीर मियां…!’ ताजे वैश्विक घटनाक्रम को लेकर लिखा गया है। ईरान इजरायल युद्ध इसके केंद्र में है। ट्रंप महोदय, सिर्री जैसी बातें भले ही करे लेकिन अपने लिए चालू इंसान हैं। जो जो हसरतें वे पाले बैठे हैं उन सबको वे इसी कार्यकाल में हासिल कर लेना चाहते हैं। दोबारा राष्ट्रपति तो बन गए अब तीसरी बार इस पद पर न पहुंच पाएंगे। अमेरिका में तीसरे कार्यकाल का नियम नहीं है।
वे नोबेल पुरस्कार के लिए डौलया रहे हैं कि किसी तरह से मिल जाए। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने इस पुरस्कार के लिए उनका नाम आगे बढ़ा दिया है। अब ट्रंप उसी को दिखाते घूम रहे हैं। उनके हर वक्तव्य में अनेक बार नोबेल पुरस्कार निसृत होता है।
कोई भी चीज मुफ्त नहीं मिलती है यह बात पाकिस्तान जानता है। इनके इतिहास ही ऐसे हैं। वे इसके अभ्यस्त हो चुके हैं। व्हाइट हाउस फील्ड मार्शल को पैदल चलाता है फिर व्यंजन खिलाता हैं।अब आने वाले फील्ड मार्शलों के लिए यह आसान लगने लगेगा। मतलब बेइज्जती जैसी कोई बात न रह जाएगी।
भारत, पाक सीजफायर की मध्यस्थता की माला जपना वे न तो बंद कर रहे हैं और न करेंगे। इस उबाऊ बयान को तो अब उनका खुद का परिवार भी न सुनता होगा।
ट्रंप जिस तरह से अपना परिचय दे रहे हैं मुझे नहीं लगता है कि आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाने का आइडिया इनका होगा। अमेरिकी सरकार की जो अंदरुनी पावर है उन्होंने ही मुनीर को फंसाया होगा। मुनीर फंस गया है। सुना है उसने अमेरिका को दो एअर बेस दे दिए हैं। मुझे लग रहा है कि पाकिस्तान इस चाल में बुरी तरह से फंस गया है। अब मना करता है तो इस युद्ध के बाद अमेरिका लपेट लेगा और हां करता है तो ईरान दुर्गत कर देगा।
अमेरिका के संबंध में चीनी रिपोर्ट देखी है। उसमें कहा गया है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोई ऐसा साल नहीं गुजरा है जब उसने युद्ध न किया हो। जिस साल गोला-बारूद नहीं चलाए उस साल किसी न किसी देश की सत्ता पलट दी । विश्व शांत रहना चाहे तो रह नहीं सकता है।
संपादकीय में वर्तमान मसले पर आपने वाजिब चीजें उठाई है। जिसमें आसिम मुनीर को खिलाया गया भोजन काफी इंटरेस्टिंग है। हम जैसे आम आदमी उस भोजन का नाम नहीं जानते हैं लेकिन आपके द्वारा सृजित किया गया वातावरण मुस्कान ला देता है। फेल्ड मार्शल शब्द भी इसी में शामिल है।
बढ़िया संपादकीय के लिए तेजेन्द्र सर जी को बहुत-बहुत बधाई।
भाई लखनलाल पाल जी, आप प्रत्येक संपादकीय को जिस गहराई से पढ़ते और खंगालते हैं, उससे पाठकों को संपादकीय समझने में ख़ासी सहायता मिलती है। आप की टिप्पणियां हमारे लिये महत्वपूर्ण हैं।
हमारे भारत में पूर्वांचल में एक भोजपुरी कहावत में कहावत है +बिन पेंदी का लौटा
ट्रंप वा खोता और छोटा
अमेरिका ही नहीं इसके आते पूरा का पूरा विश्व तंग और तबाह है , रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य है भी । रह ही बात नोबेल शांति पुरस्कार ओस्लो में बैठे नोबेल एक्सपर्ट भी जान रहे है ।
समीक्षा पूर्ण है
संपादक तेजिंदर सर का आभार और प्रणाम
सिंह साहब आपने तो गजब ही कर डाला है… धन्यवादम…
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने इस बार के संपादकीय में अमेरिका की धूर्तता और मुनीर मियाँ के बहाने पाकिस्तान की मक्कारी की पोल खोल कर रख दी है। अमेरिका का यह इतिहास रहा है कि वह यूज़ एण्ड थ्रो पॉलिसी में यकीन करता है। जब तक उसे लगता रहा कि चीन को कंट्रोल करने के लिए भारत को आगे बढ़ाना चाहिए तब तक वह भारत के साथ पींगे बढ़ाता रहा और अब जबकि उसे ईरान पर हमले करने के लिए पाकिस्तान के एयर बेस की ज़रूरत है तो यह पाकिस्तान के फेल्ड मार्शल को लंच पर बुलाता है। यहां यह तथ्य भी मार्के का है कि ट्रंप ने पूरी कोशिश की कि वह मोदी जी को भी कनाडा से अमेरिका बुलाकर पॉलिटिकल बैलेंस बना ले, लेकिन मोदी जी ने क्रोएशिया यात्रा को प्राथमिकता देकर साबित कर दिया कि भारत को अपने हितों की रक्षा करना बहुत अच्छे ढंग से आता है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जो पाकिस्तान इजरायल को पानी पीकर कोस रहा था, वह अब अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ और इजरायल से मिलकर अप्रत्यक्ष रूप से लड़ने के लिए तैयार हो गया है। अब इस्लामिक एकता का राग कहां गया और इजरायल पर तथाकथित पाकिस्तानी इस्लामिक एटम बम गिराने के ख्वाब कहां चले गए। दूसरी बात यह कि इससे यह भी तय हो गया कि पाकिस्तान के नेताओं की अमेरिका ढेले भर परवाह नहीं करता और उसके लिए वहां का सेनापति ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि जो वह वादा कर देगा, उससे मुकरने की हिम्मत वहां के नेताओं में नहीं है। एक बेहतरीन संपादकीय लेखन के लिए आदरणीय अग्रज बधाई के पात्र हैं।
पुनीत भाई, आपने डॉनल्ड ट्रंप और अमरीका की – यूज़ एण्ड थ्रो पॉलिसी – पर से पर्दा हटा कर सच्चाई के दर्शन करवाए हैं। पाकिस्तान के दोहरे रूप को भी आपने बढ़िया उजागर की है। आभार।
वाह!! वर्तमान परिस्थितियों की अनुपम व्याख्या करता आलेख।
धन्यवाद उषा जी।
“There is no free lunches”- यह कहावत पाकिस्तान के साथ बिलकुल सही साबित होती है। पाकिस्तान को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। दूसरी बात अमरीका का पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को दरकिनार कर उसके आर्मी चीफ को बुलाना, जिससे वहां के विरोधियों को सरकार के खिलाफ बोलने का मौका मिल जाएगा। तीसरा, अमरीका के लिए न कोई स्थायी मित्र या शत्रु होता है। अपनी मौकापरस्ती नीति के चलते पाकिस्तान के साथ अमरीका का संबंध कैसा रहेगा, यह देखना बाकी है।
संपादकीय टिप्पणी बहुत ही प्रासंगिक और सुलझी हुई है। आपको हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
सही पकड़ा है आपने जयंत कर भाई । बहुत शुक्रिया।
वैश्विक संघर्ष की सच्चाई और कारणों से परिचय करवाया।
सत्य को उजागर करता यह संपादकीय मन-मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित करता है। अमेरिका का खेल कितना ही बड़ा क्यों न हो, अब देश को मोदी जी जैसे दृढ़ और निडर सेवक मिले हैं, जो इन शत्रुओं को शक्तिहीन करने का सामर्थ्य भी रखते हैं। आपके संपादकीय में स्पष्टवादिता सदैव झलकती है, जो अत्यंत प्रशंसनीय है।
अनिमा जी, आपने हमेशा पुरवाई के संपादक को अपना समर्थन दिया है। बहुत बहुत शुक्रिया।
बहुत ही शानदार संपादकीय और एक बात यह भी स्पष्ट हो गई इस लंच से की पाकिस्तान मोहरा बनेगा ही। अमेरिका इस्तेमाल कर रहा है उसे लेकिन इसका पता बाद में पड़ेगा जब ज्योतिषीय आंकलन के अनुसार बात सच होगी। 15 अगस्त के बाद कभी भी भारत पाकिस्तान युद्ध एक बार फिर से शुरू हो सकता है। और इस बार भारत छोड़ेगा नहीं। वहीं दूसरी और ईरान इजराइल का।जो। संघर्ष चल रहा है उसमें भारत बोल नहीं रहा कुछ। लिहाजा जो। तटस्थ है समय लिखेगा उनका इतिहास। और ये इतिहास ज्योतिषीय आंकलन के अनुसार तब नजर आएगा जब कई सारे मुस्लिम देश भारत पर हमला करेंगे। इस नए साल की शुरुआत में ही मैंने भी कई भविष्यवाणी की थी जो एकदम सही साबित हो रही है। विश्व के नजरिए से हो या भारत के या आर्थिक, सामाजिक हालातों की भविष्यवाणी।
खैर हो सकता है टिप्पणी आपको थोड़ा अजीब लगे लेकिन फिर से कहूंगा शानदार संपादकीय है सर।
तेजस आप कुछ समय से अपनी ज्योतिषीय भविष्यवाणी कर रहे हो। हम भी देख रहे हैं, शायद तुम्हारी बात सत्य निकल आए। शुभकामनाएं।
आभार आपका सर
शानदार संपादकीय एवं बहुत सदा हुआ सटीक विश्लेषण।
धन्यवाद राजेन्द्र भाई।
पुरवाई की सम्पादकीय वर्तमान परिदृश्य में दुनिया के राजनयिक सम्बन्धों कूटनीति, युद्ध और उसकी रणनीति पर सटीक विश्लेषण है।मानव अधिकारों को ताक पर रखते हुए दुनिया अपने लाभ-हानि में जकड़ी हुई है ।
एक हमारा भारत है जो युद्ध में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षा में संलग्न है ।
जय हिंद
Dr Prabha mishra
आपने सही कहा है प्रभा जी। आपकी टिप्पणी कि – ‘एक हमारा भारत है जो युद्ध में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षा में संलग्न है’ – ग़ौर करने के काबिल है।
आदरणीय संपादक जी,
आपने तो बहुत पहले ही ट्रंप जी को ‘मैकडॉनल्ड ‘कहकर उनके संपूर्ण चरित्र को रेखांकित कर दिया है,संपादकीय में उसकी और भरपूर पुष्टि हो गई है।
बहुत सटीक अति उत्तम संपादकीय। बधाइयां
हार्दिक धन्यवाद सरोजिनी जी।
बहुत शानदार संपादकीय है सर .. अमेरिका द्वारा पाक को नागपाश की तरह जकड़ने की तैयारी है… पाक बेचारा हर तरफ़ से मरेगा…
एकदम सटीक टिप्पणी मनीष। स्नेहाशीष।
शर्माजी, आपने सम्पादकीय में लोकतांत्रिक व्यवस्था को तार तार करते अमेरीका और पाकिस्तान पर स्टीक टिप्पणी की है. भई आप राष्ट्रपति हैं अपना स्टेट्स देख लिया करो और आप मुनीर जी..आप भारत से शिकस्त खाए ऐसे जनरल जिनको पाकिस्तानी P M फील्ड मार्शल का दर्जा देते है!! अब सारी दुनिया दोनों की I love you Pakistan वाले रवैये से हतप्रभ है..इस प्यार में इतनी सहूलियत तो है कि दोनों अब अंधे हुए जा कर ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार मांग रहे है और पाकिस्तान खुद को डॉलर, हथियार और बदले में base देने को तत्पर..मुल्क की जनता जाये भाड़ में इस सावन तो प्यार की पींगे बढ़ायेंगे..या खुदा जोड़ी खूब मिलाई…एक अंधा एक कोढ़ी….
इस सार्थक एवं मज़ेदार टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद देवेन्द्र भाई।
ट्रंप की दोहरी नीति विश्व राजनीतिक परिदृश्य में इसकी छवि धूमिल कर रही है। पाकिस्तान को मोहरा बना रहा है। पाकिस्तान को इतना महत्व देना भारत के लिए सोच का विषय है।
आपने बहुत ही संतुलित संपादकीय लिखा है। बधाई आपको।
समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद सुधा।
रोचक शैली में कड़वा सच! ट्रंप का कुछ भरोसा नहीं कितनी कीमत वसूलेगा और पाकिस्तान के नीचे गिरने का अंत नहीं। मोदी जी ने निमंत्रण स्वीकार न करके विश्व के सामने भारत के आत्मसम्मान का परिचय दिया। इस संपादकीय के लिए बहुत बधाई!
आपने एकदम सही कहा शैलजा। आप तो कनाडा में रह रही हैं… ट्रंप को उस दृष्ट से भी समझ सकती हैं।
आज का आपका संपादकीय व्हाइट हाउस में लंच की कीमत तुम क्या जानो मुनीर मियां…!
आज के हालातों का सटीक विश्लेषण हैं। मुनीर से नोबल प्राइज के लिए नोमीनेट करवा कर,मुनीर के गले में पट्टा बाँधने के साथ मुझे तो लगता है कि ट्रम्प G7 की मीटिंग छोड़कर इसीलिए आये थे कि वह मोदी जी को भी वहां बुलवा कर ऑपरेशन सिंदूर में मध्यस्थता की अपनी बात को सही सिद्ध कर सकें किन्तु मोदी जी के मना करने पर यह संभव नहीं हो पाया वरना उनका मोदीजी को फोन करना, उन्हें बुलाना बेमकसद तो नहीं हो सकता।
अमेरिका ने स्वयंभू बनने के चक्कर में उक्रेन को रूस से युद्ध के लिए तो उकसाया ही, अब इजराइल और ईरान के बीच युद्ध को हवा दे रहा है।
आज तो उसने ईरान के एटॉमिक बेस पर हमला करने का दावा भी किया है।
न जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से कवि प्रदीप जी का लिखा गीत मेरे मन मस्तिष्क में गूंज रहा है…
एटम बमों के जोर पर ऐंठी है ये दुनिया, बारूद के ढेर पर बैठी है ये दुनिया…
काश! नीति नियंता सामान्य लोगों के बारे में भी सोचते क्योंकि मरते और सहते तो वही हैं।
दिमाग़ी तौर से दिवालिया व्यक्ति को अमरीका का राष्ट्रपति बना दिया गया है। इसका ख़मियाज़ा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है।
ट्रंप भी अब ‘पप्पू ‘ जैसी स्थिति में आ गए हैं और उन्हें दुनिया भर ने बहुत गंभीरता से लेना बंद कर दिया है। वे सुबह क्या कहेंगे और शाम को क्या करेंगे, इसके विषय में खुद भी नहीं जानते। यह क्या आश्चर्य नहीं कि इतने बड़े देश का राष्ट्रपति नोबेल के लिए परेशान हैं। हो न हो अमरीका नोबेल जैसा ही कोई पुरस्कार अपने यहां से शुरू कर दे और ऐसा पहला पुरस्कार ट्रंप को ही मिले!
मगर यह पप्पु बहुत ख़तरनाक है… इस बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं… परमाणु अस्त्र हैं।
वाह !शानदार लेख शांति पुरस्कार चाहते हैं ट्रंप? बदमाशी का पुरस्कार मिलना चाहिए! आप लिखते रहिए संपादकीय और हम पढ़ते रहें…
सही कहा आपने भाग्यम जी। अपना समर्थन जारी रखिये।
सटीक, शानदार एवं जानदार सम्पादकीय।मैं आपके सम्पादकीय पहले नहीं पढ़ पायी पर जब से पढ़ने शुरू किए हैं प्रभावित हुए बिना नहीं रही।हार्दिक बधाई।
सुदर्शन जी इस स्नेह और समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।
पाकिस्तान में सेना ही शासन करती रही (1958–1971, 1977–1988, 1999–2008) इन वर्षों में चुने हुए नेता या तो जेल गए, जलावतन हुए या फांसी पर लटका दिए गए। क्या वज़ह है जो मुनीर अभी तक सत्ता पर काबिज़ नहीं हो सके… साम, दाम, दण्ड, *भेद* में कुछ तो है। कौन जाने अपने पोर्ट देने के बाद वह याहिया खान की तरह सत्ता में आ जाएं।
अमेरिका तो पाकिस्तान का मुरीद रहा है, जाने कैसे ओबामा के साथ कुछ समीकरण बदले हैं। अमेरिका किसी का ना हुआ न दोस्त का न दुश्मन का। ट्रंप तो ट्रंप कार्ड न रहकर jack बन गए हैं।
देखना है, गांधी की लाश पर बनने वाले पाकिस्तान के बारे में, ब्रिटिश सरकार ने गांधी को किस मिशन पर लगाया था, जो पाकिस्तान और आज़ाद कश्मीर के रूप में आज तक नासूर की तरह रिस और सड़ रहे हैं। जिसका अन्तिम परिणाम कब आयेगा, कितनी लाशों की ढेर पर?
आज तक उसे कठपुतली की तरह इस्तेमाल करके, CIA के ज़रिए, अमेरिका, तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी से शासित भारत के साथ खिलवाड़ करता आया है।
आशा है कि इस बार कुछ बदलाव होगा।
बहुत संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे पर, एक शोधपरक संपादकीय के लिए बधाई और धन्यवाद।
शैली जी आपने संपादकीय को गहराई से पढ़ कर एक संपूर्ण टिप्पणी लिखी है जो स्थिति को समझने में सहायक है। आपका पुरवाई टीम में भी उल्लेखनीय योगदान रहता है। आपकी टिप्पणी और सहयोग के लिये हार्दिक धन्यवाद।
ट्रंपियन लंच
आदरणीय तेजेंद्र जी, हमेशा की तरह इस बार भी आपने पुरवाई का संपादकीय तथ्यों पर आधारित लिखा है। आपने अमेरिका के चरित्र का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है; द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही दुनिया के मामलों में हस्तक्षेप करना उसकी नीति रही है। मोदी ने उसका आमंत्रण ठुकरा कर देश का सिर ऊंचा किया है। तीन कोर्स मीनू का वर्णन बहुत दिलचस्प है। ‘ट्रंपियन लंच’ पद बहुत अच्छा लगा। आप अपने संपादकीय में अपने कहानीकार का अच्छा उपयोग कर लेते हैं। पाकिस्तान किस तरह अपने वायदे से पलटता है इन सब बातों का आपने चिट्ठा खोला है। ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार पाने की ज़बरदस्त चाहत है। उनमें और पाकिस्तान में एक बात सामान्य है कि दोनों कोई भी वक्तव्य जारी कर देते हैं और फिर वहां से यू टर्न कर जाते हैं। एक ही सांस में दोहरी बात करते हैं। आसिम मुनीर द्वारा डोनाल्ड ट्रंप का नाम शांति नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया जाना अत्यंत चिंतनीय है। अभी ईरान और इसराइल के युद्ध में वह सीधे कूद गया है।
समकालीन स्थितियों को पूरी तरह समझने की दृष्टि से पुरवाई के संपादकीय अत्यंत उपयोगी हैं। इसीलिए मुझ जैसों को अगले संपादकीय की प्रतीक्षा रहती है। बहुत धन्यवाद
विद्या जी आप ख़राब तबीयत के बावजूद निरंतर संपादकीय पढ़ रही हैं और उस पर सारगर्भित टिप्पणी भी कर रही हैं। आपका हृदय से धन्यवाद।
24.6.2025…. संपादकीय सामयिक विषय पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी होता है। तर्क और विचारों से भरा , ज्ञानवर्धक। यह संपादकीय भी इस तथ्य को सत्यापित कर रहा है। इसका शीर्षक तो हास्य-व्यंग से भरा प्रतीकात्मक भी है। आपने इतिहास और घटनाक्रम को बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। यह संपादकीय हिंदी जर्नलिज्म के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना चाहिए। मेरी हार्दिक बधाई !!
हार्दिक आभार भाई हरनेक जी।
अच्छा है अमरीका की दादागिरी भारत में नहीं चली। अमरीका ऐसा देश है जो एक हाथ में आग रखता है तो दूसरे हाथ से पानी बेचता है।
धन्यवाद इंद्रजीत आपका।
Your Editorial of this week is very informative with political overtones as it points out how Pakistan has taken U- turns like Trump by not adhering to their word.
The menu that Trump ordered for Munir is very interesting and almost alien to ordinary Indians like me.
Warm regards
Deepak Sharma
As usual you have been very kind Deepak ji in sending your support to our editorial. Your reaction on the menu is so cute!
(पहले लिखी गई टिप्पणी को निरस्त समझा जाए इस निवेदन के साथ)
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
हर बार की तरह आपका संपादकीय विशेष है! आपने बिल्कुल सच कहा कि व्हाइट हाउस में लंच के पीछे कितने और किसके स्वार्थ, कितने और किसके हित, कितनी और किसकी जरूरत है? यह उस लंच का निमंत्रण, स्वाद व सम्मान का तरीका निर्धारित करता है। वाकई उस लंच की कीमत असाधारण होती है। फ्री में मिला हुए लंच का स्वाद, नीयत पर निर्भर रहता है। अमेरिका का हर कार्य उसी के हित से जुड़ा रहता है। पाकिस्तान का ईरान के प्रति समर्थन इस लंच के निमंत्रण से प्रभावित होने वाला है शायद यह मुनीर को उस समय न पता हो।
और फिर गए भी तो कैसे? पैदल !वह भी सुरक्षा कर्मियों से घिरे हुए। कैसे लोग समझ नहीं पाते कि सिर्फ निमंत्रण ही पर्याप्त नहीं होता, निमंत्रण पर सम्मान का तरीका भी मायने रखता है। “फ़ेल्ड मार्शल” शब्द का प्रयोग करके आपने बहुत बड़ी बात कह दी।
वाकई इस समय विश्व हिंसक दौर से गुजर रहा है। काश लोग समझ पाते कि युद्ध को जितना हो सके उतना टालना चाहिये। पर वर्चस्व की लड़ाई में निर्दोष जनता भी मारी जाती है।
अब तो इस्राइल और ईरान के युद्ध के बीच में अमेरिका इसराइल के समर्थन में कूद ही पड़ा।
अब पाकिस्तान की हालत साँप के मुँह में छछूंदर की तरह हो गई है। न उगलते बने न निगलते बने।
भोजन की रेसिपी तो अपनी समझ से बाहर है। और अपनी नजर में तो उसकी रत्ती भर वैल्यू भी नहीं।
ट्रंपियन लंच शब्द अच्छा लगा!
मोदी और मुनीर के लिए तो एक ही कहावत समझ में आ रही है कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। मोदी जानते हैं कि राष्ट्र के प्रधान के सम्मान के साथ राष्ट्र का सम्मान जुड़ा रहता है। ट्रंप का प्रस्ताव ठुकरा कर उन्होंने राष्ट्र के सम्मान की रक्षा की।
हमें याद आ रहा है कि एक वक्त निक्सन इंतजार करते रह गए थे इंदिरा गाँधी उनसे बिना मिले वापस आ गई थीं।
ताकत का अहं सर चढ़कर बोलता है।
यू टर्न लेने में तो ट्रंप और पाकिस्तान भाई-भाई हैं।
शांति और ट्रंप दोनों ही एक दूसरे के विरोधी हैं।
राजनीति के शतरंज पर शह और मात की चाल चली जा रही है।
आपकी सिर्फ कहानियाँ ही नहीं, बल्कि आपके संपादकीय भी इस बात के गवाह है कि आपकी कलम की नोक (यह लैपटॉप पर चलती आपकी उंगलियाँ) सारे विश्व को नापने की ताकत रखती हैं।
एक महत्वपूर्ण संपादकीय के लिये बधाई आपको।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
आदरणीय नीलिमा जी आपकी टिप्पणी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। यह टिप्पणी भी संपादकीय के विषय पर आपकी पकड़ का सुबूत है। हार्दिक धन्यवाद।
स्पष्टभाषी, निडर संपादक श्री को ह्रदय से धन्यवाद।
पूरा विश्व ही खतरे में है।
कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती, सौ प्रतिशत सटीक तंज। वैसे सब समझते तो हैं ही। अब अगर नासमझी का नाटक है तो…दुनिया भर को साँस लेना दूभर हो रहा है।
सबको सद्बुद्धि दे भगवान् बहुत हो गया।