Sunday, March 1, 2026
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संपादकीय – पैसे निकालने की जादुई मशीन

जिस तरह से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास हो रहा है, हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि भविष्य में एटीएम मशीनों का स्वरूप क्या रहेगा। हमने देखा है कि हमारे सामने टेप रिकॉर्डर, वीसीआर, पेजर, फ़्लॉपी, सीडी और डीवीडी जैसे आविष्कार आए और फिर हमारे जीवन से ग़ायब हो गए। जिस गति से तकनीकी विकास हो रहा है, उसका असर एटीएम मशीनों पर भी अवश्य पड़ेगा।

जीवन में हमें कुछ चीज़ों के इस्तेमाल करने की इतनी आदत हो जाती है कि हम भूल जाते हैं कि इन सुविधाओं के बिना भी हम जीवन ठीक-ठाक बिता लिया करते थे। मगर आज वही सुविधा हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है…और सच तो यह है कि जिस प्रकार तकनीकी प्रगति जारी है, हमें यह भी ज्ञान नहीं है कि यह सुविधा कब तक अपने अस्तित्व को बचाए रख सकेगी।
जी हाँ, आज हम बात कर रहे हैं बैंकों के बाहर लगी एटीएम मशीन की, जिसमें से हम जब चाहें डेबिट या क्रेडिट कार्ड डालकर पैसे निकाल सकते हैं। न तो बैंक के भीतर जाने का चक्कर और न ही कैशियर के सामने कतार में खड़े होने का झंझट। एटीएम मशीन का अर्थ है ‘ऑटोमेटेड टेलर मशीन’ (Automated Teller Machine)। यानी वह मशीन, जो बिना किसी मानवीय सहायता के स्वयं ही आपके आदेश पर करारे नोट आपके सामने प्रस्तुत कर देती है।
एक ज़माना था जब बैंक में ‘लेजर’ में प्रविष्टि करने वाले कर्मचारी अलग होते थे और कैशियर एकदम अलग सुरक्षित केबिन में बैठा करते थे। भारत के बैंकों में आप अपना चेक जाकर लेजर-कीपर को देते थे। उसके बाद वह आपको एक टोकन देता था। आपके चेक को लेजर में दर्ज करने के बाद वह एक छोटी कॉपी में आपका विवरण लिखकर अकाउंटेंट के पास भेजता था। अकाउंटेंट उसे पास करके हस्ताक्षर करता था और फिर कैशियर के पास भेज देता था। अंततः कैशियर आपको पैसे देता था।
इस पुरातन विधि से छुटकारा तब मिला, जब कैशियर को नया नाम दिया गया- टेलर’। इस सुविधा के तहत आप सीधे कैशियर के पास जाते और उसे अपना चेक देते। वह स्वयं ही चेक को लेजर में दर्ज कर आपको पैसे दे देता। अब बैंक में एक चमत्कारी बदलाव हो चुका था। आपके और कैशियर के बीच के बिचौलिये हटा दिए गए थे और आपका समय बच रहा था।
ग्राहक-सुविधा का रथ कहीं रुकता नहीं है, वह बस आगे बढ़ता चलता है। हम भारत के लोग बहुत संतुष्ट किस्म के होते हैं, मगर पश्चिमी देशों के लोग बहुत आगे की सोचते हैं। लंदन में एक व्यक्ति था-जॉन शेफर्ड बैरन। वह एक बैंक-नोट बनाने वाली कंपनी में काम करता था। जब वह शनिवार को बैंक से पैसे निकालने आता, तो वहाँ एक लंबी कतार लगी होती। उसे उस कतार में खड़े होने पर बहुत परेशानी होती थी। कई बार ऐसा होता कि उसकी बारी आने से पहले ही बैंक बंद होने का समय हो जाता और वह पैसे निकाल ही नहीं पाता था।
एक ऐसे ही शनिवार को जब जॉन शेफर्ड बैरन बैंक से पैसे नहीं निकाल पाए, तो वे इस परेशानी का हल खोजने के बारे में सोचने लगे। कभी-कभी ऐसा होता है कि श्रेष्ठ विचार गुसलख़ाने में नहाते समय ही आते हैं। जॉन शेफर्ड बैरन को भी एक विचित्र-सा विचार आया। वे सोचने लगे कि आजकल ऐसी मशीनें लगा दी गई हैं, जिनमें सिक्के डालने पर चॉकलेट बाहर आ जाती है। तो क्यों न एक ऐसी मशीन बनाई जाए, जिसमें चेक डालें और पैसे बाहर आ जाएँ। स्मरण  रहे कि यह 1967 का ज़माना था और अभी बैंक कार्ड का दौर नहीं आया था। यह ज़माना चेक-बुक और कैशियर का था।
सेना में काम कर चुके जॉन शेफर्ड बैरन ने एक ऐसी मशीन के बारे में सोचा, जिसमें एक पिन डाला जाए और पिन को पढ़कर समझने के बाद मशीन ग्राहक को पैसे दे दे। फ़ौजी व्यक्ति ने अपने आर्मी नंबर को ही पिन के रूप में इस्तेमाल किया। पिन छह अंकों का था। यहाँ भी उनकी पत्नी ने आपत्ति जताई कि छह अंकों का पिन याद करना कठिन है, तो जॉन शेफर्ड बैरन ने चार अंकों वाले पिन की ईजाद कर दी।
मगर इस समय तक मशीन में कार्ड का इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ था। मशीन से भी चेक द्वारा ही पैसे निकाले जाते थे। इन विशेष प्रकार के चेकों पर एक रेडियो-एक्टिव पदार्थ लगा होता था, जिसे मशीन पढ़ लेती थी। चेक लगाने के बाद ‘पिन’ एंटर करना होता था।
जॉन शेफर्ड बैरन ने इस तरह की छह मशीनें बनाईं और उन्हें अलग-अलग जगहों पर लगाया गया। सबसे पहली मशीन लंदन के एनफ़ील्ड इलाके में स्थित बार्कलेज़ बैंक में 27 जून 1967 को लगाई गई। इस मशीन के सबसे पहले ग्राहक बने ब्रिटिश कॉमेडी अभिनेता रेग वार्ने । उन्होंने इस मशीन से दस पाउंड निकाले। और हाँ, इस मशीन से एक बार में अधिकतम 10 पाउंड (आज के हिसाब से करीब 1,000 रुपये और 1967 के हिसाब से करीब 180 रुपये) ही निकाले जा सकते थे।
मेरा मानना है कि विश्व के सबसे बड़े दो आविष्कार हैं- पहिया और बिजली। जब पहिए में बिजली लग गई, तो इंसान का जीवन बदलता चला गया। तकनीक के विकास में बिजली का अद्भुत योगदान है। 27 जून 1967 से शुरू हुई एटीएम की यात्रा आज कहाँ तक पहुँच चुकी है, यह हमें हैरान करने के लिए काफ़ी है।
पहला आधुनिक, चुंबकीय पट्टी वाला कार्ड-आधारित एटीएम 1969 में न्यूयॉर्क के रॉकविल सेंटर में केमिकल बैंक द्वारा स्थापित किया गया था। यह दीवार में निर्मित था और केवल नकदी (कैश) निकालने का काम करता था। वर्ष 1971 तक ऐसा एटीएम नहीं बनाया गया था, जो आज के “संपूर्ण कैशियर” के सभी कार्यों को करने में सक्षम हो।
धीरे-धीरे संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और जापान में 1970 के दशक में दूसरी पीढ़ी के एटीएम स्थापित किए गए, जिनमें नकद जमा करवाने की सुविधा भी मुहैया करवाई गई। 1995 में स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ अमेरिकन हिस्ट्री ने डोक्यूटेल और वेट्ज़ेल को नेटवर्क्ड एटीएम के आविष्कारक के रूप में मान्यता दी, और आज दुनिया भर में लाखों इकाइयाँ एक साथ जुड़ी हुई हैं।
आज भारत में भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से एक है ‘एटीएम’, और इस मशीन का इस्तेमाल लगभग हर दिन होता है, चाहे हमें पैसे निकालने हों, जमा करने हों, बैलेंस चेक करना हो या पैसे ट्रांसफ़र करने हों। एटीएम मशीनें अब नए बैंकिंग सिस्टम का एक अटूट हिस्सा बन चुकी हैं।
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली रिसर्च फ़ाउंडेशन के अनुसार, भारत में पहला एटीएम 1987 में HSBC बैंक ने अपनी मुंबई शाखा में लगाया था। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, आज देश में 2 लाख से अधिक एटीएम मौजूद हैं, जिनके ज़रिए लाखों ग्राहक हर दिन अपनी बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।
वर्तमान में हम एटीएम के माध्यम से डेबिट या एटीएम कार्ड और पिन का उपयोग करके बैंक से नकदी निकाल सकते हैं, मिनी स्टेटमेंट ले सकते हैं, खाते का बैलेंस पता कर सकते हैं और कुछ उन्नत मशीनों में पैसे तथा चेक जमा भी कर सकते हैं। अब ऐसी मशीनें भी बन चुकी हैं, जिनमें खातों के बीच पैसे ट्रांसफ़र करना, कुछ बिलों का भुगतान करना या पिन बदलना जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।
बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र भारत में ट्रेन में एटीएम लगाने वाला पहला बैंक बन गया है। पंचवटी एक्सप्रेस में बैंक ऑफ महाराष्ट्र का एटीएम यात्रियों की सुविधा के लिए लगाया गया, जो एक पायलट प्रोजेक्ट था। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो अन्य भारतीय रेलों में भी यह सुविधा उपलब्ध करवाई जा सकेगी।
याद रखने योग्य बात यह है कि बैंकों ने एक दिन में एटीएम से निकाली जाने वाली राशि की सीमा तय कर रखी है। जैसे लंदन में आप एटीएम से तीन सौ पाउंड की राशि एक दिन में निकाल सकते हैं, मगर अपने बैंक की किसी भी शाखा के एटीएम से पाँच सौ पाउंड निकालने की सुविधा है। भारत में यह भी सुनने में आ रहा है कि अब एटीएम से पैसे निकालने पर भी शुल्क लगाने के बारे में विचार किया जा रहा है।
स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने लद्दाख के लेह में स्थित खारदुंग ला दर्रे पर 18,379 फीट की ऊँचाई पर एक एटीएम का उद्घाटन 14 जुलाई, 2021 को किया। यह एटीएम भारत का सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित एटीएम है, और इस तरह के चुनौतीपूर्ण स्थान पर ऐसी सेवा प्रदान करने वाला यह पहला बैंक है। यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने आई.एन.एस. विक्रांत पर भी एटीएम मशीन लगाकर एक प्रकार का रिकॉर्ड कायम किया।

 

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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8 टिप्पणी

  1. वाह क्या कहने! इस संपादकीय को पढ़ने से कोई भी पाठक अचंभित हुए नहीं रह सकता।
    ATM का कितना सुंदर सहज परंतु सार्थक वर्णन। यह संपादकीय किशोरों और युवाओं को बहुत भाएगा।आम जन को भी एक नायाब जानकारी से लैस कर दिया है ।

    • भाई सूर्यकान्त जी, यही प्रयास रहता है कि संपादकीय सभी उम्र के लोगों को अपना सा लगे।

  2. तकनीकी तो अब अलाउद्दीन का चराग
    होती जा रही है आने वाले समय में और भी चमत्कार नज़र आने वाले हैं ।
    रोचक सम्पादकीय
    Dr Prabha mishra

  3. विषय-विशेष विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद। याद आता है कि मैने अपना पहला अकाउंट 1973 में कॉलेज के दिनों, पंजाब नेशनल बैंक के साथ खोला था, और पहली बार ATM का उपयोग 1991 में कनॉट प्लेस में किया था क्योंकि ATM मशीनें गिनती भर की हुआ करती थी। खाता खोला क्योंकि दिल्ली प्रेस प्रकाशन गृह खुले दिल से एक आलेख के तीस रुपए का भुगतान चेक के माध्यम से किया करते थे। वो अकाउंट अभी भी रखा हुआ है।

    • बिमल जी इतनी प्यारी टिप्पणी के लिये दिल से धन्यवाद… पढ़ते हुए बहुत अच्छा लग रहा था।

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