लंदन एसेंबली या कहा जाए कि ब्रिटेन की सरकार ने भारत सरकार को एक नोटिस भेजा है। इस नोटिस के अनुसार- भारतीय उच्चायोग लंदन की गाड़ियों के सेंट्रल लंदन में प्रवेश पर जो कंजेशन चार्ज बनता है, भारत सरकार ने उसे अब तक जमा नहीं करवाया है। और यह रकम बढ़ते-बढ़ते 92 लाख पाउंड तक पहुँच गई है। डर इस बात का है कि यह छोटी-सी बात कहीं बढ़ते-बढ़ते दो देशों के रिश्तों में खटास पैदा करने का कारण न बन जाए।
पूरी दुनिया में ‘तारा रम पम पम… डॉनल्ड ट्रंप’ इतना अधिक हो रहा है, कि किसी भी अन्य विषय पर ध्यान ही नहीं जा रहा है । भारत का विपक्ष भी पेंडुलम की तरह झूल रहा है, कि सिंदूर, वोटर लिस्ट और ट्रंप में से किसी एक रस्सी को पकड़ कर लटक जाए… मगर आपकी ‘पुरवाई’ पत्रिका तो दूसरी पत्रिकाओं से अलग है… इसलिए हम आपके लिए एक ऐसा विषय लाए हैं, जो इन तीनों से हट कर है।
हम ‘पुरवाई’ के पाठकों को याद दिलाना चाहेंगे, कि इसी साल भारत और ब्रिटेन के बीच एक व्यापार संधि संपन्न हुई, जिसे ‘फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट’ कहा जा रहा है। यूरोपियन यूनियन से अलग होने के बाद यह ब्रिटेन का पहला बड़ा व्यापारिक समझौता है। ऐसा माना जा रहा है कि इस व्यापारिक संधि से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में व्यापार, निवेश, विकास, नौकरी-निर्माण और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
एक ओर जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप टैरिफ़-टैरिफ़ का शोर मचा रहे हैं, वहीं इस व्यापारिक समझौते से भारत और ब्रिटेन, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ मिलने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि इससे व्यापार में आसानी होगी, निवेश बढ़ेगा, रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और नए विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा। तीन साल से चल रही बातचीत के बाद संपन्न हुए इस समझौते का लक्ष्य है कि वर्ष 2040 तक दोनों देशों के बीच व्यापार 25.5 अरब पाउंड तक पहुँच जाए।
अभी हम इस समझौते को लेकर ठीक से तालियाँ भी नहीं बजा पाए थे, कि एक समाचार ने ज़बरदस्त झटका दिया- ‘भारत को ब्रिटेन के ‘लंदन कंजेशन चार्ज’ के रूप में 92 लाख पाउंड्स यानि कि एक अरब सात करोड़ रुपये अदा करने हैं।‘
ज़ाहिर है कि ‘पुरवाई’ के पाठक मुझसे यह सवाल ज़रूर करेंगे कि, ‘संपादक भाई, आप तो लंदन में रहते हैं, इसलिए आपको ठीक-ठाक जानकारी होगी, कि ये ‘लंदन कंजेशन चार्ज’ आखिर है क्या? ज़रा हमें भी समझा दीजिए, ताकि हम भी जान लें कि खाया-पिया कुछ नहीं, और गिलास टूटा अरब रुपये का!’
तो लीजिए, आज हम आपको बताते हैं कि आख़िर लंदन में यह ‘कंजेशन चार्ज’ क्या होता है, क्यों होता है और कितना होता है? अब मेरे पीछे डरावना वाला संगीत बजने लगा है और मैं आपसे बता रहा हूँ – “बात बहुत पुरानी है… साल 2003 का था और लंदन का मेयर एक जिंदा पत्थर था!” अरे उस तरह का पत्थर नहीं… लंदन के मेयर थे, लेबर पार्टी के मिस्टर केन लिविंगस्टोन, जिन्हें अंग्रेज़ लिविंगस्टन पुकारते हैं।
तो एक दिन भाई लिविंगस्टन साहब के दिमाग़ में एक ख़ुराफ़ात सूझी, और वे सोचने लगे कि लंदन सरकार की आमदनी कैसे बढ़ाई जाए। उनके सहयोगी भी अपना-अपना माथा खुजा रहे थे। ऐसे में एक दिन मेयर साहब की कार ट्रैफ़िक में फँस गई। उन्हें महसूस हुआ कि लंदन में ट्रैफ़िक बहुत बढ़ गई है… कंजेशन को कंट्रोल करना होगा… अचानक उनके दिमाग़ की बत्ती जल उठी और निर्णय हो गया, कि लंदन में प्रवेश करने वाले हर वाहन को पाँच पाउंड ‘कंजेशन चार्ज’ के रूप में अदा करना होगा। वर्ष 2003 में पाँच पाउंड काफ़ी बड़ी रकम मानी जाती थी । लोगों ने बहुत भुन-भुन की… मगर आहिस्ता-आहिस्ता सबको इसकी आदत हो गई।
जैसे ही लोगों की भुनभुनाहट कम हुई, केन लिविंगस्टन ने ज़ोर का झटका धीरे से लगा दिया और जुलाई 2005 में कंजेशन चार्ज बढ़ा कर आठ पाउंड कर दिया। अब लंदन के मेयर को शेर के मुँह ख़ून के स्वाद की तरह कंजेशन चार्ज का स्वाद लग गया था, और कंजेशन चार्ज को कमाई का महत्वपूर्ण अंग मान लिया गया।
वक्त बदला, और लंदन के मेयर बने सादिक़ ख़ान… वे पाकिस्तानी मूल के हैं… उनकी पढ़ाई-लिखाई लंदन में ही हुई थी, और अंग्रेज़ी भी अंग्रेज़ों की तरह ही बोलते हैं। लंदन का आम नागरिक आज तक समझने का प्रयास कर रहा है कि इस इंसान के मेयर बनने के बाद क्या कोई एक भी काम ऐसा हुआ, जिससे कि आम नागरिक को किसी प्रकार की भी राहत मिली हो। मेट्रो और लंदन अंडरग्राउंड के किरायों में बेतहाशा वृद्धि हुई और दोनों में ही कर्मचारियों की बेतहाशा छँटनी भी हो गई। आज कार्पेंडर्स पार्क से लंदन के बीच यदि एक दिन का ट्रैवल कार्ड बनवाना पड़े, तो £29/30 यानि कि तीन हज़ार रुपए से ऊपर का ख़र्चा पड़ता है। कार्पेंडर्स पार्क की दूरी लंदन से उतनी ही है, जितनी कि मालाड से मुंबई सेंट्रल की।
इन सब उपलब्धियों के लिए केर स्टामर की सरकार की ओर से सादिक़ ख़ान को ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित भी किया गया । और सर सादिक़ ख़ान ने कंजेशन चार्ज को बढ़ा कर पंद्रह पाउंड प्रतिदिन कर दिया। सुना जा रहा है, अगले साल यानि कि जनवरी 2026 से यह चार्ज बढ़ा कर £18/- प्रतिदिन कर दिया जाएगा।
तो यह तो हो गई कथा- लंदन में कंजेशन चार्ज की। यानि कि हर व्यक्ति, जो अपनी कार सेंट्रल लंदन में लेकर जाएगा, उसे पंद्रह पाउंड का कंजेशन चार्ज देना होगा। यह चार्ज उसे अगले दिन तक भर देना होगा, वरना उस पर £180/- का जुर्माना लग जाएगा। मेयर ने यहाँ थोड़ी दरिया-दिली दिखाते हुए यह रियायत दी है कि यदि 14 दिन के भीतर यह भुगतान किया जाता है, तो पेनाल्टी (ट्रंप वाली नहीं) में पचास प्रतिशत की छूट दे दी जाएगी और आपको केवल नब्बे पाउंड का जुर्माना भरना होगा।
अब आते हैं हम असली मुद्दे पर। लंदन एसेंबली या कहा जाए कि ब्रिटेन की सरकार ने भारत सरकार को एक नोटिस भेजा है, जैसा कि शुरू में बताया गया है। इस नोटिस के अनुसार- भारतीय उच्चायोग लंदन की गाड़ियों के सेंट्रल लंदन में प्रवेश पर जो कंजेशन चार्ज बनता है, भारत सरकार ने उसे अब तक जमा नहीं करवाया है। और यह रकम बढ़ते-बढ़ते 92 लाख पाउंड तक पहुँच गई है। डर इस बात का है कि यह छोटी-सी बात कहीं बढ़ते-बढ़ते दो देशों के रिश्तों में खटास पैदा करने का कारण न बन जाए।
भारत सरकार का कहना है कि जिनेवा कन्वेंशन के हिसाब से उच्चायोग के कर्मचारियों को किसी भी प्रकार का टैक्स देने से छूट मिली हुई है। इसलिए भारत सरकार किसी प्रकार का कंजेशन चार्ज अदा नहीं करेगी। वहीं ब्रिटिश सरकार का कहना है कि कंजेशन चार्ज किसी प्रकार का टैक्स नहीं है। यह एक सर्विस चार्ज है, जैसे कि कार-पार्किंग… जिस प्रकार डिप्लोमैटिक स्टाफ़ को अपनी कार कहीं पार्क करने के लिए पैसे अदा करने पड़ते हैं, ठीक उसी तरह कंजेशन चार्ज भी अदा करना होगा। अभी तक दोनों देशों में इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है।
ट्रांसपोर्ट फ़ॉर लंदन के मुख्य ग्राहक एवं रणनीति अधिकारी एलेक्स विलियम्स ने पिछले अगस्त में भारतीय उच्चायुक्त श्री विक्रम कुमार दोराईस्वामी को लिखे एक पत्र में स्पष्ट किया था कि, “कंजेशन चार्ज कोई ऐसा कर नहीं है, जिससे कि डिप्लोमैटिक स्टाफ़ को छूट मिल सके । यह एक सेवा है, जिसके लिए शुल्क देना पड़ता है।
भारत इस समस्या से जूझने वाला अकेला देश नहीं है। इस सूची में अमेरिका और जापान जैसे देश भी शामिल हैं। सच तो यह है कि 144 देशों पर 18 अरब 83 करोड़ रुपये का कंजेशन चार्ज एवं पेनाल्टी बक़ाया है। मामला पेचिदा है। हमें डर इस बात का भी है, कि कहीं लंदन का यह समाचार पढ़ कर सेंट्रल दिल्ली और दक्षिण मुंबई में भी कंजेशन चार्ज न शुरू हो जाए। तब कम से कम यह तो कहा जा सकेगा कि, “सुनो मियां सादिक़ ख़ान! न तो हमारे डिप्लोमैट लंदन में कंजेशन चार्ज देंगे और न ही हम आपके राजनयिकों से दिल्ली और मुंबई में यह सर्विस चार्ज वसूलेंगे।
मोदी है तो मुमकिन है।
कोई न कोई रास्ता निकल जायेगा ।
Dr Prabha mishra
आभार प्रभा जी।
वाह जी वाह , यह तो बड़ी मज़ेदार कहानी निकली। अचरज इस बात का है कि ब्रिटेन की जनता ने भी इसका विरोध नहीं किया?
जमा करने वाली राशि से लगता है कि भारत सरकार से सूद भी वसूलने की तैयारी है।
स्थिति पर नजर बनाए रखने के लिए ट्रंप की टैरिफ के साथ लंदन की लगान भी एक विषय हो गया।
अति रोचक संपादकीय।
सरोजिनी जी इस मज़ेदार टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
यह तो सच में विचित्र सी स्थिति बनी हुई है। आश्चर्य है कि विपक्ष ने अभी तक इसका गाना क्यों नहीं गाया । क्या यह सम्भव है कि उन्हें इसके बारे में जानकारी ही न हो? कंजेशन चार्ज के नाम पर बहुत बड़ी राशि थोपी गई है भारत पर, इसका सही जवाब अवश्य ही जाना चाहिए यहां से। UK वालों की भारत में उपस्थिति पर भी टैक्स लगा जायें तो शायद कुछ असर हो । मज़ेदार बात है कि लिस्ट में अमेरिका का नाम भी है लेकिन ट्रम्प की टमटम में ब्रिटेन की इस हरक़त का म्यूज़िक नहीं बज रहा । हमें वह भी सुनना है।
बहरहाल, आज वैश्विक मसलों में इतने अव्यवहारिक और अपरिपक्व नीतियों का शुमार पढ़ने में अवश्य हास्लयास्पद लगा रहा है, डर है कहीं गंभीर रूप न ले ले!
रोचक संपादकीय के माध्यम से इस विषय को हमारी जानकारी में लाने के लिए आपका बहुत धन्यवाद सर!
रचना, मुझे ख़ुद हैरानी है कि अभी तक यह ढोल भारत के विपक्षी दलों को क्यों नहीं मिला, वरना तो इस पर भांगड़ा डाल रहे होते!
हद है, इस तरह लंदन वाकई भारत से संबंध बिगाड़ सकता है, ये चार्ज उसके अपने ही देश के लिए ठीक नहीं है तो दूसरे देश के लिए कैसे ठीक हो सकता है? भारत विपक्ष होता तो जब ये लगा था तब ही विरोध करता और लगने नहीं देता
आलोक भाई हर परत के नीचे आश्चर्य छिपा है।
अच्छा विषय उठाया है , कल्याणकारी राज्य दिखने के लिए ऐसे ही जुगाड़ करने पड़ते हैं मित्र !
आपकी मातृ भूमि में कल्याणकारी योजनाओं का भर हम और आप जैसे मदिरा सेवन करने वाले वालंटियर खरीदी हुई बोतल पर एक्साइज ड्यूटी के रूप में चुका रहे हैं , कई बार यह ड्यूटी बोतल में क़ैद मदिरा की असली क़ीमत से कई गुना भी पाई जाती है .
इस लिए जस्ट चिल !
बाऊजी, तुसी इक पटियाला बनाओ थे चिल चिल करो!
एक नया विषय है…। क्या क्या हो रहा है…
वर्तमान समय ऐसा है कि जैसे सब कोई भारत के पीछे नहीं *मोदी* जी के पीछे लगे हुए हैं…
पर.. जो युगपुरुष है.. उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है
ऐसा विषय लाने हेतु धन्यवाद सर…
अनिमा आपने संपादकीय पढ़ा और टिप्पणी की इसके लिए हार्दिक धन्यवाद।
इस अंक का संपादकीय ‘ब्रिटेन का डिप्लोमैटिक कंजेशन ‘ पर केंद्रित है। लंदन असेंबली ने भारतीय उच्चायोग की गाड़ियों पर लंदन में प्रवेश करने पर कंजेशन चार्ज लगा दिया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि यह न कोई टैक्स है और न कोई टैरिफ। मतलब पार्किंग जैसा चार्ज।
दोनों देशों के रिश्तों पर कोई असर होगा ऐसा मुझे नहीं लगता है। क्योंकि ये केवल भारत के लिए नहीं है, विश्व के सभी देशों पर लगाया जा चुका है। इसे मिल बैठकर सुलझाया जा सकता है।
इसमें मुख्य बात जो अपनी ओर आकर्षित करती है वह है वहां की क्रांतिकारी व्यवस्था। भारत के महानगर इससे संक्रमित हो सकते हैं। मेरे हिसाब से यह संक्रमण बुरा नहीं है। अत्यधिक वाहनों ने इतनी अव्यवस्था फैला दी है कि कहीं से निकलना मुश्किल हो रहा है। अतिक्रमण ने तो वैसे ही हालत खस्ता कर दी है। गांव कस्बों में दो पहिया वाहन कहीं भी खड़ा करके रास्ता जाम कर देते हैं। हमें वाहन खरीदने की अक्ल आ गई है पर कहां खड़ा करना है ये समझ अभी तक नहीं आ पाई है। उसे लागू करने में प्रशासन की कितनी इच्छा शक्ति रहेगी है इसे तो समय बताएगा।
बहुत से नए विषयों की जानकारी आपके संपादकीय से प्राप्त हो जाती है। यह पाठकों के लिए अच्छी बात है। पुरवाई के संपादकीय का इस अर्थ में इंतजार रहना पाठक के लिए स्वाभाविक है। एक नए विषय से रूबरू कराने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, हमेशा की तरह आपने संपादकीय की परतें खोलते हुए उसकी समीक्षा कर दी है। हार्दिक आभार।
आज का संपादकीय आदरणीय तेजेन्द्र जी की सटीक और शोधपरक पैनी पत्रकारिता का प्रमाण है l धर्म हो या राजनीति, संस्कृति हो या नैतिकता कहीं भी दरारें आती दिखें तो यह सजग पत्रकार तेजेन्द्र शर्मा अपनी कलम को हथियार बना कर जनजागरण हेतु लेखन में सक्रिय हो जाते हैं l प्रस्तुत संपादकीय भारत और ब्रिटेन के बीच राजनयिक शुल्क विवाद ke मुद्दे पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है l इस विषय से आम जनता बिल्कुल अनभिज्ञ हैं और उनके लिए यह चौंकाने वाले तथ्य है l लंदन में भारतीय राजनयिक वाहनों पर लगने वाले भीड़भाड़ शुल्क (कंजेशन चार्ज) को लेकर उग्र हुए इस विवाद को लेकर ब्रिटेन का कहना है कि यह एक सेवा शुल्क है, जबकि भारत इसे कर मानता है, जिस पर राजनयिक छूट लागू होती है. यह विवाद अब कूटनीतिक गतिरोध में बदल गया है, जिसमें अमेरिका और जापान भारत का समर्थन कर रहे हैंl लंदन में कुछ क्षेत्रों में प्रवेश करने वाले वाहनों पर £15 का दैनिक भीड़भाड़ शुल्क लगता है। ब्रिटेन का कहना है कि यह एक सेवा शुल्क है, इसलिए राजनयिकों को इससे छूट नहीं मिलनी चाहिए l भारत का मानना है कि यह एक कर है, और राजनयिकों को वियना कन्वेंशन के तहत करों से छूट मिलनी चाहिये l. इस विवाद के कारण भारतीय दूतावास पर तक़रीबन 9 मिलियन पाउन्ड, अमेरिकी दूतावास pr 14.6 मिलियन और जापानी दूतावास पर 10 मिलियन से अधिक कंजेशन चार्ज बकाया निकल रहा है सो राजनयिक उन्मुक्ति की कानूनी व्याख्या को लेकर पैदा हुआ यह विवाद अब कूटनीतिक गतिरोध में बदल गया है l भारत ने राजनयिक वाहनों पर शुल्क लगाने के ब्रिटेन के फैसले पर आपत्ति जताई है lइस विवाद के साथ-साथ, दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौते पर भी बातचीत चल रही है, जिसमें कुछ क्षेत्रों में शुल्क कम करने और भारतीय कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों को शामिल करने पर सहमति बनी है.
यह विवाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों और व्यापारिक वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है l सार्थक और अनिवार्य संपादकीय हेतु साधुवाद तेजेन्द्र जी l सक्रियता अनवरत रहे l
किरण जी, आपने समस्या के तमाम डायमेंशन समझ कर उन पर सारगर्भित टिप्पणी की है। हमारा प्रयास रहता है कि तमाम पाठकों का हर बार किसी नये विषय से परिचय करवाएं।
सादर प्रणाम भाई
बिल्कुल ही नया.विषय उठाया आपने इस.बार।अभी हम अमेरिका और. ट्रंप की नीतियों और फलमानों से जूझ ही रहे थे कि अब ब्रिटेन सामने.है।
इस वैश्विक मुद्दे से मिलता जुलता ही भारत के महानगरों में ही.नहीं अब तो छोटे शहरों में भी इसी कारण वाद विवाद और संकट की स्थितियां उत्पन्न हुई हैं और हत्याएं भी। बहुत ही जीवंत सार्थक और सारगर्भित संपादकीय। शायद इस नयी नीति और फैसले से आम जनता .विपक्ष और सरकारी तंत्र भी कुछ सही निर्णय ले पाये। ज्यादा कुछ नहीं जानती राजनीतिक विमर्शों पर लेकिन पुरवाई के संपादकीय सै बहुत कुछ सीखा है। इस नये विषय पर जितनी सरलता और सहजता.से बात रखी गई है तारीफ की जानी चाहिए आदरणीय तेजेन्द्र भाई और उनकी.बौद्धिक संवेदनशीलता की।बहुत आभार भाई एक अच्छे संपादकीय के लिए। धन्यवाद
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा तुम्हारा स्नेह पुरवाई पत्रिका के संपादकीयों को निरंतर प्राप्त होता है। हमारी ओर से स्नेहाशीष
पुरवाई पत्रिका समूह और संपादक द्वारा लिखित संपादकीय की यही विशेषता रहती है कि वह न केवल समीचीन संदर्भों को केंद्रित करते हैं वरन ऐसे मुद्दों को भी केंद्र में लाकर, उसे चर्चा का विषय बनाते हैं और उसे विचारोत्तेजक बहस में लाने का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं; जो हाशिए पर हों या बड़े मुद्दों के कोलाहल में छिप या दब कर रह जाते हैं।
वर्तमान में प्रकाशित संपादकीय कुछ ऐसा ही है।
आजकल की दुनिया में अगर कोई तिकड़मबाज या लंगड़ीबाज है तो वह है सियासत और सियासत भी ऐसी कि जो आत्मकेंद्रित हो इसका उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति,पाकिस्तान के आसिफ मुनीर,लंदन के पूर्व और वर्तमान समय के मेयर सरीखे होते हैं।
कंजेशन चार्ज एक विवादास्पद अवधारणा है।
यह न हो तो बेहतर यदि हो तो आटे में नमक की मानिंद ठीक आचार्य चाणक्य के कौटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णित यथा राजा को प्रजा से कर बाग के माली की मानिंद चंद फूलों की तरह लेना चाहिए।अब यहां तो पांच पाउंड फिर आठ और फिर पंद्रह और बाबा रे बाबा और भी ,,,और विदेशी दूतावासों के वाहनों से भी कंजेशन टैक्स???!!!
ये तो नमक में आटा वाली बात हो गई या फिर एक और कहावत खाली बहू नमक में हाथ अर्थात और कुछ काम नहीं करना और दिखाना भी है के काम तो हो रहा है???!!!
कंजेशन चार्ज कुछ ऐसा ही है,,,,संपादक महोदय ने सही चेताया है कि भारत की सियासत यदि इस ओर घूम गई तो क्या होगा
एक गाना याद आ रहा है उसका बीच का मिश्रा कुछ इस प्रकार है
जब रात है ऐसी मतवाली,
फिर सुबह का आलम क्या होगा?!
बढ़िया और शानदार जानदार संपादकीय के लिए बधाई।
भाई सूर्यकांत शर्मा जी, सबसे पहले तो मैं अपने तमाम पुरवाई परिवार के सदस्यों से क्षमा-प्रार्थी हूं कि मैं अपने जवाब काफ़ी विलंब से लिख पा रहा हूं। दरअसल कुछ ऐसी उलझनों से जूझता रहा कि यह काम पीछे छूटता चला गया। संपादकीय पर इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
92 लाख तक कंजेक्शन चार्ज भारत पर…रोचक जानकारी। यह तो सुना है कि विकसित देशों में पार्किंग शुल्क अत्यधिक है अतः वहां आमजन अपनी कार से जाने की अपेक्षा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेते हैं लेकिन कंजेक्शन चार्ज भी इसका कारण हो सकता है, पता नहीं था। इस समस्या से जूझने वाले भारत के अतिरिक्त अन्य देश भी हैं, यह भी रोचक जानकारी है। इससे बचने के लिए भारत भी दिल्ली मुंबई में कहीं कंजेक्शन चार्ज न लगा दे, यह प्रश्न ही नहीं, सुझाव भी है। यह सुझाव भारत सरकार को अवश्य मान लेना चाहिए।
जहाँ तक विपक्ष का प्रश्न है बिहार चुनाव के मद्देनज़र वह अभी EVM छोड़ फर्जी वोटर लिस्ट और SIR पर ही पर ही नजरें टिकाये हुए है। उससे उसे फुर्सत मिले तो सोचे।
ब्रिटेन का डिप्लोमैटिक कंजेशन, जानकारी से भरपूर सदा की तरह पाठकों को नये विषय से रूबरू कराता संपादकीय।
बधाई आपको।
सुधा जी आपको संपादकीय के माध्यम से नई जानकारियां हासिल हुईं इसका मतलब है कि संपादकीय सफल रहा। आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
अपने अपने गिरेबान में झांक लें। एक कहावत है – “अपना टेंट न देखें पराई फुली निहारें।”
हो सकता कि किसी समझ न आये लेकिन बताती चलूं कि हमारे देश में सेल्स टैक्स में कोई नया संशोधन हुआ कि जीएसटी समय से जमा न करने पर जो फाइन लगाया जायेगा बल्कि उस चार्ज पर जीएसटी लगेगी। ये कानून कल जारी किया गया लेकिन पेनाल्टी पिछले दो साल से वसूल की जायेगी।
ये क्या हैं? मैं इस विषय की ज्ञाता तो नहीं लेकिन अपने कानूनी सलाहकार से यह बात ज्ञात हुई।
रेखा जी, आपने तो फटाफट भारत के टेक्स सिस्टम की जानकारी भी दे डाली… बल्ले बल्ले।
मामला पेचीदा तो है। भारतीय उच्चायोग को यह मामला पहले ही सलटा लेना चाहिए था। कौन देश की सरकार इतनी धनराशि हाथ से जाने देगी?
जी अरविंद भाई मुद्दा तो पेचीदा है। मगर हल अवश्य निकल आएगा।
इस बार का संपादकीय यह बताता है कि सरकार या कोई मेयर किस तरह की लूट मचाकर खजाना भर सकता है और सर की उपाधि तक हासिल कर सकते है। मुझे भी अब भय होने लगा है कि कहीं भारत के मेयर या शहरी विकास मंत्रालय के मुँह में भी यह खून न लग जाए। हालांकि इससे मिलती जुलती शुरुआत लखनऊ में की जा चुकी है, जहां अपने घर के सामने कार खड़ी करने पर भी मासिक टैक्स देना पड़ेगा।
जहां तक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सवाल है तो मुझे लगता है कि देर सबेर लन्दन को राजनयिकों को इसकी छूट देनी ही क्योंकि केवल भारत ही इससे प्रभावित नहीं है और दूसरा पक्ष यह भी है कि एक सौ सात करोड़ रुपए भारत सरकार के लिए इतनी बड़ी रकम नहीं है कि वह चुका न सके। फिलहाल तो हमें ट्रंप काका को मुंह चिढ़ाते हुए भारत ब्रिटेन के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते का जश्न मनाना चाहिए और दोनों। देशों की सरकारों को यह प्रयास करना चाहिए कि अमेरिकी दादागिरी का तोड़ निकालते हुए दुनिया को जियो और जीने दो के सिद्धांत पर विकास के पथ पर आगे ले जाने का कोई सुगम रास्ता निकालें।
जी पुनीत भाई, इस मुद्दे को सुलझाना तो पड़ेगा… कम से कम पुरवाई ने इसे उठाया… वरना भारत में अधिकांश लोग इस बारे में अंधकार में थे।
इस अंक का संपादकीय बहुत ही अच्छा ज्ञानवर्धक और अपने आप में बिल्कुल अलग है संपादक जी ने बहुत ही अध्ययन करके इसको विस्तार दिया है बहुत-बहुत आपको धन्यवाद आभार पाठक का इस और ध्यान देने के लिए।
हार्दिक धन्यवाद प्रियंका जी।
अच्छा मसला उठाया है आपने।भारत के किसी वामपंथी की नजर पड़ गयी तो जश्न मनाएंगे कि एक मसला और मिला मोदी की टांग खींचने का।बिना ये सोचे कि ये चार्ज उनके आने से पहले से चल रहा है।
ये चार्ज भारत को देने में परेशानी भी नहीं होगी।दिल्ली ,मुम्बई जैसे शहरों में प्रदूषण को देखते हुए यहाँ भी यह चार्ज लगा कर सुगमता से दे सकते हैं।हाँ मेट्रो ,बस, लोकल ट्रेन की संख्या बढ़ानी होगी।
एक विचारोत्तेजक संपादकीय हेतु बधाई भाई जी!
निवेदिता जी आपने बढ़िया चुटकी ली है… मज़ेदार।
ये तो बहुत नयी जानकारी मिली । आपके संपादकीय पढकर सचमुच उन मुद्दों के बारे में भी जानकारी मिलती है जिन पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा और महत्वपूर्ण भी हैं । सच गंभीर मुद्दा है यह भी ।
हार्दिक आभार रेणुका जी।
हर सप्ताह नई सोच, नई जानकारी का विश्लेषण करता सम्पादकीय आपके अथक परिश्रम एवं ज्ञान को दर्शाता है। इस प्रशंसनीय कार्य के लिए आपको हार्दिक साधुवाद।
सुदर्शन जी आपकी समर्थन करती टिप्पणी बहुत हौसला बढ़ाती है। धन्यवाद।
Your Editorial of this week acquaits us with something called ‘congestion charge’, the fee imposed on the owners of those vehicles for using the specified congested roads during peak hours and you also inform us what a heavy amount the Indian Government will have to pay for having used those roads during those specified hours.
A very delicate situation indeed.Hope it does lead to any unpleasantness between India n Britain.
Warm regards
Deepak Sharma
Yes Deepak Mam, the situation is quite tricky because the amount involved is quite hefty. Thanks for your supportive comment.
आदरणीय,
आपका यह संपादकीय न केवल एक अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक-राजनयिक विवाद को रोचक रूप में प्रकट करता है,अपितु स्थानीय नीतियों से सम्बद्ध भविष्य में होने वाले वैश्विक संबंधों के दुराव स्थिति को भी भांपता है।
आपकी बेजोड़ तथ्यात्मक,चुटीली शैली प्रत्येक प्रकार के विषयों को चाहे वो रसहीन ही क्यों ना हो, पाठकों को सकारात्मक अनुभव देकर गंभीर विषयों पर विचार करने को प्रेरित करती हैं।
आपने इस संपादकीय में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भगत स्पष्ट किया की 2003 में मेयर मिस्टर केन लिविंगस्टोन( जिनके नाम का हिंदी रूपांतरण अनायास ही सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेर गया) द्वारा लागू कंजेशन चार्ज का उद्देश्य ट्रैफिक नियंत्रण और राजस्व बढ़ाना था,जिसका समय के साथ शुल्क बढ़ता गया, और अब यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ बन चुका है।
जिनेवा कन्वेंशन के तहत राजनयिक छूट का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूर्व में भी विवाद का विषय रहा है, जो राजनीतिक संबंधों और संधियों की व्याख्या से संबंधित है जहां ब्रिटेन का रुख सर्विस चार्ज के रूप में भुगतान अनिवार्य करने का पक्षधर है वहीं भारत इसे टैक्स से छूट की श्रेणी में रखता है।
चिंतन का विषय है कि यदि ऐसे राजनीतिक मुद्दों का कोई समाधान ना निकले तो ऐसी स्थिति में द्विपक्षीय वार्ता और व्यवसायिक अनुबंधो पर परोक्ष तनाव अथवा संकट की स्थिति संभाव्य होती है।
आपके इस संपादकीय को यदि सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो जनता लिए यह मुद्दा राजनयिक विशेषाधिकार बनाम सामान्य नागरिक के नियम का सापेक्षिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
इसके अंतर्गत बात का भी संकेत है कि प्रशासनिक शुल्क,कर और नागरिक सुविधाओं के लिए निर्धारित विधान समय और स्थान के अनुसार परिवर्तनीय है।
निष्कर्षत:आपका यह संपादकीय ऐतिहासिक तथ्यों और सार्थक व्यंग्य का संतुलित संयोजन है,जिसमें
लंदन के कंजेशन चार्ज के संदर्भ , उसके विभिन्न राजनीतिक सामाजिक पहलुओं,भारत ब्रिटेन के राजनीतिक असहमति,उसके दूरगामी प्रभावों को अत्यंत रुचिकर रूप में लिपिबद्ध किया है, जो ना केवल पाठकों को अद्यतन करता है बल्कि राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय विशेषाधिकारों के सामंजस्य,संतुलन और संपर्क संबंधी विभिन्न विषयों पर चिंतन करने को उत्प्रेरित करता है।
सराहनीय अभिव्यक्ति!
ऋतु जी आपकी टिप्पणी भी स्वादानुसार रोचक स्टाइल लिये हैं। ऐसी टिप्पणी किसी भी संपादक के लिये टॉनिक का काम करती है। आभार।
सर, इस बार का आपका संपादकीय एक गंभीर विषय पर बहुत रोचक संपादकीय है। टिप्पणी करने में देर इस लिए हुई की समझ नहीं आया कि स्थिति की गंभीरता पर दुखी हों या रोचकता के आनंद से जो मुस्कान चेहरे पर आई है इसे कायम रखा जाए । जिंदा पत्थर, चलिए बताते हैं,पूरी दुनिया में ता रा रम पम,संपादक भाई आप तो लंदन में रहते हैं आदि से कही गई बात ऐसी लगी जैसे किसी दोस्त से किस्सा सुन रहे हों /सादर । संपादकीय लेखन का यह अनोखा और ताजा अंदाज बहुत भाया ।
फिर भी ये समस्या गंभीर हो सकती है । खासकर यहां भी सरकार को टैक्स का स्वाद न लग जाए । आपने संभावित समस्या के ऊपर जो इशारा किया है वह वाकई विचारणीय है ।
एक अलहदा शैली में लिखे गए इस सम्पादकीय के लिए विशेष बधाई
दिल में दर्द और आँखों में शरारत है… मुझे लगा कि समस्या को ज़रा धीरे से झटके के साथ पेश किया जाए।
पुरवाई का हर संपादकीय जानकारी बढ़ाने वाला होता है । पढ़ने का बाद सोचते है अच्छा ऐसा होता है ये तो हमें पता ही नहीं था । धन्यवाद इसी तरह हमें दुनिया की नई नई बातें और जानकारियां देते रहें ।
महत्वपूर्ण जानकारी की संपादकीय के लिए अभिनंदन।
पढ़ते -पढ़ते लगा था कि कहीं भारत में किसी के दिमाग में इस चार्ज का फितूर न आ जाए ! अंत में आपने आशंका जताई भी 2025 भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंध बिगड़ने का वर्ष है। ईश्वर रक्षा करे कंजेशन से।
ईश्वर रक्षा करें… हार्दिक आभार।
ज्ञानवर्धक जानकारी के साथ बेहतरीन संपादकीय हार्दिक शुभकामनाएं
हार्दिक धन्यवाद संगीता।
आदरणीय तेजेन्द्र जी
इस बार का संपादकीय “लंदन कंजेशन चार्ज” पर केंद्रित है और इसी वजह से काफी वजनदार महसूस हुआ, वह बात अलग है कि शुरुआत रोचक रही।
हेडिंग देखकर तो एकाएक कुछ समझ नहीं पाए। संपादकीय को पढ़ते हुए जब आगे बढ़े तब मामला समझ में आया।
तीन साल के काफी लंबे वक्त के बाद फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट या व्यापार संधि का उद्देश्य तो सकारात्मक लगा पर बीच में ही लंदन कंजेशन चार्ज की काली बिल्ली रास्ता काट गई।
कंजेशन चार्ज को आपने बेहतरीन तरीके से समझाया।
अंग्रेजी शब्दों के हिंदी अर्थ कभी-कभी गजब ढाते हैं। “जिंदा पत्थर था” पढ़कर माथे पर बल पड़ गए। बाद में पता चला केन लिविंगस्टोन
सादिक खान के काम और सर की उपाधि!!! आश्चर्य तो हुआ। कंजेशन चार्ज लंदन के लिए लॉट्री निकलने जैसा हो रहा है। भविष्य सुनहरा है।
राजनयिक और राजनीति शतरंज की बिसात की तरह है और सारी जनता मोहरें,
या फिर साँप सीढ़ी का खेल। जनता गोट है शासन खिलाड़ी। जनता को 98तक लेकर जाता है। जनता खुश और 99 पर ले जाकर साँप से कटवा कर सीधे नीचे उतार देता है।
बेचारी जनता चक्की के दो पाटों के बीच पिसती सी रहती है।
अब -आगे आगे देखिये होता है क्या?
आपको और आपके संपादकीय को पढ़-पढ़ कर दुनिया से जुड़ने का,समझने और जानने का क्रम जारी है।
यह संपादकीय हैरान परेशान करने जैसा लगा। देखें नियति क्या कहती है?
हर सप्ताह संपादकीय के लिये जानकारी हासिल करने व उससे संबंधित तथ्यों को जुटाने के आपके प्रयास व परिश्रम को सलाम
पुरवाई का आभार तो बनता है।
नीलिमा जी हम सब आपको ज्ञान का भंडार मानते हैं। जब आप यह लिखती हैं कि पुरवाई के संपादकीय से आपको कुछ नया सीॉखने को मिलता है, तो लगता है कि हमारा प्रयास पूरी तरह से सफल हो गया। हार्दिक आभार।
नई जानकारी देने के लिए शुक्रिया यही कारण है कि इस पार और उस पार की खाई कभी ख़त्म नहीं होती | सेवा शुल्क लगाने वाले क्यो सोचेंगे कि इसका भार किस पर कितना कैसे पड़ेगा । बस फरमान जारी हो गया । अब देखना यह है कि हम इस समस्या से कैसे निपटते हैं ? उम्मीद यही की जा सकती है कि हमारी विदेश नीति इससे पार पाए ना कि ट्रम्प के साथ दोस्ती की गलबहियाँ बढ़ाते बढ़ाते टेरिफ़ जैसा कोई झटका खाए ।