Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – बुखारेस्ट में हिंदी का वैश्विक उत्सव

बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी साहित्य पर चर्चा नहीं हुई। चर्चा हुई तो केवल इस विषय पर कि भारत के बाहर, विदेशों में हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें पेश रही हैं, और हिंदी भाषाविज्ञान की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं। इन समस्याओं पर केवल बातचीत ही नहीं हुई, बल्कि उनके समाधान भी सुझाए गए, जो विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती अंजु रंजन तक पहुँचे। उन्होंने उन्हें समझा भी और शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।

‘पुरवाई’ के पाठकों के साथ एक सुखद समाचार साझा करना आवश्यक समझता हूँ। 28-29 जनवरी को रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में भारतीय दूतावास द्वारा एक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया। आयोजन स्थल रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी, बुखारेस्ट का सभागार रहा। भारतीय उच्चायोग की ओर से आयोजन के मेज़बान श्री सीतेश सिन्हा रहें।
सबसे पहले शहर का नाम… रोमानिया के निवासी इसे पुकारते हैं ‘ब्युकरिस्टि’ और अंग्रेज़ कहते हैं ‘बुकेरिस्ट’ जबकि भारत में हिन्दी में हम कहते हैं – बुखारेस्ट !
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. कोस्टेल नेग्रिसिया ने स्वागत भाषण में सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और भारत-रोमानिया संबंधों के साथ-साथ हिंदी भाषा के लिए रोमानिया में एक सम्मानजनक स्थिति निर्मित करने का आश्वासन दिया। 

 महामहिम राजदूत श्री मनोज कुमार महापात्र ने हिंदी  भाषा के शिक्षण और प्रशिक्षण को लेकर भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए विदेश मंत्रालय को धन्यवाद दिया कि उसने  यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका और भारत से हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े बुद्धिजीवियों को एक स्थान पर एकत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
भारत से पधारीं श्रीमती अंजु रंजन (संयुक्त सचिव-विदेश मंत्रालय) ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि इतने कम समय में विश्व भर से इतनी बड़ी संख्या में हिंदी प्रेमी रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी में एकत्रित होकर यूरोप में हिंदी भाषा के प्रशिक्षण पर विचार-विमर्श के लिए एकत्र हुए हैं।
समापन सत्र में संयुक्त सचिव ने घोषणा करते हुए कहा कि उनका मंत्रालय निकट भविष्य में एक पोर्टल बनवाएगा, जिसमें वैश्विक स्तर पर पाठ्यक्रम (सिलेबस) प्रकाशित किया जाएगा। वहाँ विश्व भर के हिंदी अध्यापक एवं साहित्यकार अपना परिचय प्रकाशित कर सकेंगे। पोर्टल पर पाठ्य-पुस्तकें भी उपलब्ध करवाने की योजना भविष्य में है। इसके अतिरिक्त एक डेटाबेस भी बनाया जाएगा। जिसमें भारत से बाहर हिंदी भाषा का शिक्षण करवा रही सभी संस्थाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जाएगी।
इस क्षेत्रीय सम्मेलन के लिए भिन्न देशों के भारतीय दूतावासों ने अपनेअपने देश से प्रतिभागियों के नाम की प्रस्तावना की। भारतीय उच्चायोग लंदन ने प्रतिभागी नामांकित करने में विशेष सतर्कता बरती। उपउच्चायुक्त महामहिम श्री कार्तिक पांडेय एवं हिंदी अधिकारी डॉ. अनुराधा पांडेय ने एक तरफ़ तो मुझ जैसे वरिष्ठ लेखक के नाम का चयन किया, तो वहीं दूसरी ओर हिंदी शिक्षण एवं साहित्य से जुड़ी युवा पीढ़ी की ऋचा जैन को इस आयोजन के लिए नामांकित किया। इससे इन दोनों अधिकारियों की दूरदृष्टि का अनुमान लगाया जा सकता है। 

  • इस क्षेत्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए हेंज वर्नर वेस्लर (स्वीडन), अर्चना पैन्यूली (डेनमार्क), डॉक्टर  ऋतु ननंन पांडे (नीदरलैंड), ऋचा जैन (यू.के.), श्रीमती श्रद्धा मिश्रा (जर्मनी), सुश्री मिलेना ब्रतोएवा (बुल्गारिया), श्री एनरिक गैलुड जार्डिएल (स्पेन), सुश्री गयाने नज़रियान (आर्मेनिया), डॉक्टर एलेक्जेंड्रा  ट्यूरेक (पोलैंड), डॉ जानन योगुर्त (तुर्की), डॉ. पीटर सागी (हंगरी), डॉ. मारियस पार्नो (रोमानिया), इयाज़ू स्वेतलाना (मोल्दोवा), सुश्री माताएआ वेडिल्जा (क्रोएशिया), दारिगा कोकेयेवा (कज़ाख़स्तान), मिरेला क्रेस्टी (रोमानिया), प्रो. इंद्रजीत सिंह सलूजा (अमेरिका), श्री प्रेड्रैग सिकोवच्की (सर्बिया) तथा भारत से प्रो. नवीन कुमार एवं श्री के. डी. सिंह गौर पहुँचे थे। विदेश मंत्रालय की श्रीमती सचेतना स्नेही भी पूरे सम्मेलन के दौरान उपस्थित रहीं।
इन सभी वक्ताओं की भागीदारी के लिए चार सत्रों का आयोजन किया गया था। 28 जनवरी को आयोजित पहले सत्र का विषय था- “हिंदी: वैश्विक पहचान और सांस्कृतिक एकता।” जबकि दूसरे सत्र में वक्तागण मिलकर इस बात पर विचार करते रहे, कि “हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ” क्या हैं।
पहले ही दिन डॉ. के. डी. सिंह ने भारत की शिक्षा नीति पर प्रहार करते हुए उसे मैकॉले के षडयंत्र की परंपरा बताया। उन्होंने बहुत तीखे अंदाज़ में भारत में हिंदी की स्थिति की आलोचना करते हुए सम्मेलन में एक तुर्शी पैदा कर दी।  
फिर 29 जनवरी को दो सत्रों के बाद समापन सत्र आयोजित किया गया। पहले सत्र का विषय था- “हिंदी भाषा सिखाने के तरीके।” वहीं अंतिम सत्र आधुनिक समय के सबसे ज्वलंत विषय को समेटे हुए था- “हिंदी- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोमानिया में भारतीय कर्मी: सहयोग के नए आयाम।”

अंतिम सत्र में लंदन से पधारीं ऋचा जैन ने एक पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन के माध्यम से उपस्थित सभी प्रतिभागियों को इस नई तकनीक से परिचित कराया तथा उसके उपयोग और खतरों से अवगत करवाया। ऋचा ने बताया कि “कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैसे काम करती है”, दैनिक बोलचाल की भाषा में मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग के बीच अंतर स्पष्ट किया तथा एआई की महत्वपूर्ण शब्दावली जैसे ‘प्रॉम्प्ट’, ‘ग्राउंडिंग’, ‘हैलुसिनेशन’ आदि से परिचय कराया। उन्होंने यह भी बताया कि हिंदी भाषा के लिए एआई किस प्रकार उपयुक्त है, एआई किस तरह काम की गति और गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक हो सकता है, तथा एआई का उपयोग करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ बरतनी चाहिए। हंगरी से पधारे डॉ. पीटर सागी ने अपने अनुभव साझा किए।
पोलैंड से सेमिनार में पहुँचीं एलेक्जेंड्रा एंटोनिया ट्यूरेक ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि आज का युग ‘डिजिटल युग’ है। आज का युवा जब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ सीखता है और किसी भी प्रकार की परीक्षा के लिए अपने उत्तर पोस्ट करता है, तो वह तुरंत उस पर प्रतिक्रिया भी चाहता है,भले ही वह प्रतिक्रिया किसी इमोजी के रूप में ही क्यों न हो। 

इस क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन की एक और ख़ास बात यह रही, कि दो दिनों के चारों सत्रों का संचालन आपकी ‘पुरवाई’ के संपादक तेजेन्द्र शर्मा, यानी कि मुझे ही करना पड़ा। यह भी एक अलग ही अनुभव रहा, क्योंकि इससे पहले मुझे ऐसा कारनामा अंजाम देने का अवसर नहीं मिला था। संतुष्टि इसी बात की थी कि दूतावास के अधिकारी मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा, “संपादक महोदय, आप तो विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर तमाम हिंदी सम्मेलनों के विरुद्ध लिखते रहते हो, फिर इस छोटे से सम्मेलन में ऐसा क्या था कि आप लंदन से उठकर बुखारेस्ट पहुँच गए?” उन्होंने सोचा था कि मुझे घेर लिया और मैं अनुत्तरित हो जाऊँगा, मगर मैंने उन्हें निराश कर दिया।
मेरा मानना है कि विश्व हिंदी सम्मेलन या भारत में होने वाले अधिकांश हिंदी सम्मेलनों में राजनेता, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि की उपस्थिति का बोलबाला रहता है। मगर किसी में हिम्मत नहीं होती कि इन विभूतियों से यह पूछा जा सके, कि आप विषय पर क्यों नहीं बोल रहे हैं। आयोजक और साहित्यकार इनके पीछे-पीछे घूमते दिखाई देते हैं, और उनके साथ फ़ोटो खिंचवाकर कृतार्थ होते रहते हैं। 
वहीं जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल आदि में सबसे बड़े और महत्वपूर्ण साहित्यकार के रूप में गुलज़ार और जावेद अख़्तर ही छाए रहते हैं, बेचारे अन्य साहित्यकार तो प्रतीक्षा करते रहते हैं। समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है- “जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में इस साल कई बड़े नाम शामिल हो रहे हैं… प्रमुख आकर्षणों में जावेद अख़्तर, सुधा मूर्ति, वीर दास, किरण देसाई, टिम बर्नर्स-ली, विश्वनाथन आनंद, जिमी वेल्स, डी. वाई. चंद्रचूड़, गौर गोपाल दास, अश्विन सांघी समेत कई जाने-माने वक्ता शामिल हैं।” मुझे नहीं लगता कि नमिता गोखले और संजय रॉय का कभी हिंदी साहित्यकारों से कोई विशेष वास्ता भी पड़ा है।
इन बड़े हिंदी सम्मेलनों में मुख्य मंच पर राजनीतिज्ञ विभूतियाँ दिखाई देती हैं, जबकि वरिष्ठ साहित्यकारों को किसी कोने में एक छोटे से कमरे में बिठा दिया जाता है, जहाँ दस-पंद्रह से अधिक श्रोता नहीं होते। जब से पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में आयोजित हुआ है, हम हर विश्व हिंदी सम्मेलन के बाद हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प लेते रहे हैं, और आज तक लेते आ रहे हैं। मगर बुखारेस्ट में आयोजित क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन की बात एकदम अलग रही।

बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी साहित्य पर चर्चा नहीं हुई। चर्चा हुई तो केवल इस विषय पर कि भारत के बाहर, विदेशों में हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें पेश आ रही हैं, और हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं। इन समस्याओं पर केवल बातचीत ही नहीं हुई, बल्कि उनके समाधान भी सुझाए गए, जो विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती अंजु रंजन तक पहुँचे। उन्होंने उन्हें समझा भी और शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।
यह क्षेत्रीय सम्मेलन संभवतः बड़े-बड़े हिंदी सम्मेलनों को एक नई राह दिखाने में सफल हो सकेगा कि सम्मेलन में फैलाव और बड़े नाम आवश्यक नहीं हैं, आवश्यकता है तो विषय केंद्रित बातचीत की। सोच में केवल यही होना चाहिए कि भारत में और विदेशों में हिंदी भाषा को कैसे प्रतिष्ठित किया जा सकता है। हमें पूरा विश्वास है कि अगले क्षेत्रीय सम्मेलन तक इस बार लिए गए निर्णय लागू हो चुके होंगे।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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50 टिप्पणी

  1. अद्भुत सर,आप लोगों ने बहुत मेहनत की महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया।
    सलाम
    ज्ञानवर्धक सम्पादकीय

  2. रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में आयोजित क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन पर आपकी यह प्रतिक्रिया अत्यंत तार्किक और प्रभावशाली है। यह जानकर संतोष होता है कि यह आयोजन केवल औपचारिक भाषणों या साहित्य चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें उन व्यावहारिक चुनौतियों पर गहराई से विचार किया गया जो विदेशों में हिंदी पढ़ाने के दौरान सामने आती हैं। आपका यह कहना बिल्कुल सटीक है कि अक्सर बड़े हिंदी सम्मेलनों में राजनेताओं और वीआईपी अतिथियों की उपस्थिति के कारण मुख्य विषय पीछे छूट जाता है, जबकि बुखारेस्ट के इस सम्मेलन ने सिद्ध किया कि वास्तविक प्रगति के लिए बड़े नामों की भीड़ से अधिक विषय-केंद्रित बातचीत आवश्यक है।
    सम्मेलन में हिंदी साहित्य के बजाय भाषा विज्ञान की वास्तविक समस्याओं और उनके समाधानों पर ध्यान केंद्रित करना एक सराहनीय कदम था। विशेष रूप से आधुनिक युग की मांग को देखते हुए ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (AI), मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग जैसे विषयों को चर्चा में शामिल करना यह दर्शाता है कि हिंदी अब तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को तैयार है। ऋचा जैन द्वारा एआई की शब्दावली जैसे ‘प्रॉम्प्ट’ और ‘हैलुसिनेशन’ के बारे में दी गई जानकारी और इसके उपयोग व खतरों से अवगत कराना हिंदी के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती अंजु रंजन द्वारा समस्याओं को सुनकर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन देना और वैश्विक स्तर पर एक समर्पित पोर्टल व डेटाबेस बनाने की घोषणा करना इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह पोर्टल न केवल वैश्विक पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों को सुलभ बनाएगा, बल्कि विश्व भर के हिंदी शिक्षकों और विद्वानों को एक मंच पर अपना परिचय साझा करने का अवसर भी देगा। लंदन के भारतीय उच्चायोग द्वारा आपके जैसे वरिष्ठ लेखक और युवा पीढ़ी के प्रतिनिधियों का चयन उनकी दूरगामी सोच को स्पष्ट करता है। सम्पादकीय इस बात की गवाही देता है कि सम्मेलन बड़े आयोजनों के लिए एक पथ-प्रदर्शक के रूप में उभरा है, जो यह संदेश देता है कि भाषा की प्रतिष्ठा केवल संकल्पों से नहीं, बल्कि ठोस क्रियान्वयन और सही दिशा में की गई चर्चा से आती है।

  3. सही और सार्थक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में सहभागिता के लिए आपको और इसके आयोजन के लिए आयोजकों को हार्दिक बधाई। आशा है कि ऐसे सम्मेलनों से ही हिंदी के वैश्विक प्रसार का मार्ग प्रशस्त होगा।

  4. विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद। विदेशों में हिंदी के प्रचार के लिए आपको और अन्य बुखारेस्ट में क्षेत्रीय विश्व हिंदी सम्मेलन में जुटे प्रतिनिधियों को उनके प्रयत्नों के लिए धन्यवाद और बधाई। बचपन से पढ़ा था कि रोमानिया में रोमा जिप्सी होते हैं जो हज़ार – डेढ़ हज़ार साल पहले पंजाब और राजस्थान से गये थे और अभी भी भारतीय संस्कृति की पताका फहराते हैं। हिंदी के प्रचार और प्रसार में आपके अनथक प्रयत्न और लगन के प्रयास प्रशंसनीय हैं

  5. हिंदी भाषा /साहित्य के क्षेत्र में इस तरह के अधिवेशन एक महत्वपूर्ण कदम है।
    भाषा के साथ नई तकनीकी पर चर्चा हुई यह और भी प्रासंगिक है ।
    आयोजकों को साधुवाद और समस्त प्रतिभागियों को शुभकामनाएं ।
    Dr Prabha mishra

  6. बहुत ही शानदार विवेचनात्मक, सूचनात्मक, रपट के साथ खुद के विचार साझा किया गया है.
    हिन्दी और हिन्दी के साहित्यकारों के बढ़ते कदम, महत्ता, उनको मिले मान, चर्चा आदि पर खुलकर और अनुकरणीय बात रखी है आपने।
    आपका अनुभव बोल रहा. हिन्दी के प्रति लगाव, प्रगति कामना और सुझाव भी।
    हिन्दी विदेशों में चमक रही तो आप सबकी निःस्वार्थ कोशिशों की वजह से। साधुवाद!
    साथ में बोलतीं तस्वीरें।

    • अनित आपसे जब ऐसी ख़ूबसूरत टिप्पणी पढ़ने को मिलती है तो लगता है कि पुरवाई ठीक-ठाक काम कर पा रही है। दिल से शुक्रिया।

  7. इस बार का संपादकीय, एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित बुखारेस्ट हिंदी सम्मेलन के ऊपर केंद्रित है। इसकी रिपोर्ट कम संपादकीय पढ़ने के बाद लगा कि यदि सम्मेलन होने चाहिए तो ऐसे ही सम्मेलन होने चाहिए । जिसमें हिंदी भाषा को पढ़ाने की स्थिति, समस्याएं,तकनीक का रोल और फिर समाधान वैश्विक स्तर पर सुझाए जाएं।

    यदि भाषा विशेष रूप से हिंदी विश्व की भाषा बनती है तो फिर वसुधैव कुटुंबकम जैसी अवधारणा सत्यता के आलोक में नज़र आएगी।
    संपादक महोदय को इस बात की और बधाई कि उन्हें इस सम्मेलन में चारों सत्रों की अध्यक्षता करने का भी मौका मिला। यह निश्चित रूप से उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सलाम है कि उन्हें इतनी बढ़िया और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मंच पर अध्यक्षता करने को मिली है । यहीं पर संपादकीय में भारतीय सम्मेलनों की स्थिति को भी आईना दिखाया गया है, जहां पर बड़े-बड़े राजनेता विशेष रूप से सियासतदां हमारे सम्मेलनों में छाए रहते हैं और सही मायने में साहित्यकार कहीं किसी दूर कोने में बैठे हुए अपनी बात को कहते रहते हैं। कहीं ना कहीं यह स्थिति चिंतनीय और शोचनीय भी है।एक और तथ्य की विशेष सम्मेलनों में बड़े और नामचीन सेलिब्रिटीज का शिकंजा रहता है जो मठाधीशों की कलई को खोलता है और यह बताता है कि युवा और अनाम हिंदी सेवियों को भी अवसर दिया जाना चाहिए और साथ ही साथ प्रवासी भारतीयों को भी याद रखा जाना चाहिए।
    एक ऐसी ही स्थिति साहित्य अकादमी की सभाओं में भी रहती है ,जहां प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के स्थान पर संपर्क के मधुपर्क वाले पुराने मगरमच्छ उनका स्थान हड़प लेते हैं।
    जय हिंदी।
    सूर्यकांत शर्मा

    • भाई सूर्यकांत जी, आपने संपादकीय को मनोयोग से पढ़ा है और लिखा है – “संपादकीय में भारतीय सम्मेलनों की स्थिति को भी आईना दिखाया गया है, जहां पर बड़े-बड़े राजनेता विशेष रूप से सियासतदां हमारे सम्मेलनों में छाए रहते हैं और सही मायने में साहित्यकार कहीं किसी दूर कोने में बैठे हुए अपनी बात को कहते रहते हैं। कहीं ना कहीं यह स्थिति चिंतनीय और शोचनीय भी है।एक और तथ्य की विशेष सम्मेलनों में बड़े और नामचीन सेलिब्रिटीज का शिकंजा रहता है जो मठाधीशों की कलई को खोलता है और यह बताता है कि युवा और अनाम हिंदी सेवियों को भी अवसर दिया जाना चाहिए और साथ ही साथ प्रवासी भारतीयों को भी याद रखा जाना चाहिए।” – पूरा पुरवाई परिवार आपको हार्दिक धन्यवाद कहता है।

  8. जय हिंद जय भारत हिंदी विश्व पटल पर आपके माध्यम से अपनी पहचान बढ़ा रही है। आपको बहुत-बहुत बधाई

  9. जितेन्द्र भाई: भारत से बाहर, रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में, हिन्दी पढ़ाने में विदेशों में क्या क्या दिक्कतें आरही हैं और हिन्दी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएं क्या हैं; ऐसा विषय तो शायद पहली बार सुनने को मिला। सब से बड़ी बात तो यह है कि, समस्या को लेकर, केवल बातचीत करके ही मामला ख़त्म नहीं किया; उसके लिए सुझाव भी दिए गए।
    सम्मेलन में भाग लेने के लिए तकरीबन बीस देशों से लोग आए, यह बहुत ही सराहनीय है। हिन्दी भाषा का भविष्य बहुत उज्जवल है, यह आपके सम्पादकीय से साफ़ नज़र आता है। आप के संचालन के लिए बहुत बहुत वधाई। ऐसे सम्मेलन के बाद, आब आगे और भी सम्मेलन होंगे, ऐसा मेरा मानना है।
    विजय विक्रान्त – कैनेडा

    • विजय भाई, पुरवाई का मानना है कि जब तक समस्या को समझा नहीं जाएगा, उसका हल नहीं ढूंढा जा सकता। बुखारेस्ट में हमने यही किया। आपकी टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  10. सम्मेलन में भाग लेने और संचालन करने के लिए आपको बधाई। अन्य सम्मेलनों की तरह इसमें केवल औपचारिकता ही नहीं निभाई गई अपितु महत्वपूर्ण मुद्दे को भी उठाया गया है। जानकर अच्छा लगा।विदेशों में रहकर भी आप जैसे जागरूक साहित्यकारों के कारण ही हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है। सम्पादकीय नई रोशनी में आशा जगाने वाला है। साधुवाद आपको। साधुवाद इसके लिए भी की पुरवाई के माध्यम से आपके सम्पादकीय पढ़कर हमारे ज्ञान में वृद्धि हो रही है।

    • सुदर्शन जी इस सार्थक, सारगर्भित और सकारात्मक टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।

  11. अति महत्त्वपूर्ण संपादकीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हिंदी सम्मेलन की समग्र जानकारी प्राप्त हुई। बहुत बहुत धन्यवाद सर

  12. सराहनीय कदम
    हिंदी के प्रति प्रेम से प्रेरित किया गया कार्यक्रम एक अच्छे भविष्य की आशा देता है।
    आयोजकों और हिंदी प्रेमियों को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं

  13. यह महत्वपूर्ण और ठोस कार्यक्रम हुआ। अच्छी बात यह है कि दूतावास ने सहयोग दिया और सुझावों के क्रियान्वयन का आश्वासन भी दिया। ग्लोबलाइजेशन की जगह अब हमें क्षेत्रीय स्तर पर इस प्रकार के मुहिम चलाने होंगे। आपको बहुत बधाई कि आप इन सब प्रकार के कामों में शाब्दिक सहयोग ही नहीं देते बल्कि उसके लिए काम भी करते हैं। इस प्रकार के नेतृत्व की आवश्यकता को आप इसी ऊर्जा और आत्मीयता से पूर्ण करते रहें, बहुत बधाई आपको।

    • प्रिय शैलजा, आपकी टिप्पणी हमारे लिये सच में बहुत महत्वपूर्ण है। दिल से शुक्रिया।

  14. वाह! सकारात्मक, व्यवहारिक बात है यह। जहाँ अन्य सम्मेलन एक फार्मैलिटी भर होते हैँ, फ़ोटौ खिँचाने की होड़ से लेकर अपने बारे में ढिँढोरा पीटने, आगे-पीछे घूमकर एक नाटक सा लगते हैं, उनकी बजाय बेशक छोटा किंतु सफ़ल आयोजन अवश्य ही एक सूदृढ, सार्थक परिणाम की उम्मीद है।
    बधाई आपको, सभी सत्रों में एक सफ़ल संचालक के रूप मेँ अपने सकारात्मक विचारों से सदन को उज्जवलित करने के लिए। जैसे संपादक के रूप में सहज रूप से आप विभिन्न सूचनाएं दे जाते हैं ऐसे ही एक संचालक के रूप में आपने कई प्रश्नों को उठाकर उनके समाधान भी सुझाए होंगे। निश्चय ही आप इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं।

    • आदरणीय प्रणव जी, इस ख़ूबसूरत और सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। प्रयास जारी रहेंगे।

  15. पुरवाई पत्रिका का इस बार का संपादकीय-‘बुखारेस्ट में हिंदी का वैश्विक उत्सव’ में हिंदी के बढ़ते विस्तार को रेखांकित किया गया है। भारतीय पूरी दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। व्यक्ति जब विस्थापित होता है तो उसके साथ भाषा और संस्कृति के अलावा कुछ नहीं होता है। इन्हें वह छोड़ना भी चाहे तो भी वह छोड़ नहीं सकता है। क्योंकि ये चीजें न तो भार होती हैं और न स्थान घेरती हैं। ये शर्ट के बटन में, तकिया के नीचे भी समा जाती हैं। और जब भी मन खाली होता है तो वे उसमें अपना आशियाना बनाकर व्यक्ति के अकेलेपन से निजात दिलाती रहती हैं।
    बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में एक नई बात यह हुई कि इसमें हिंदी साहित्य पर चर्चा न होकर हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें आ रही हैं, इस विषय को उठाया गया है। चूंकि हिंदी हमारी मातृभाषा है इसलिए हमें कभी महसूस ही नहीं होता है कि इसमें कुछ दिक्कतें भी है। हम इसका प्रयोग करते समय ऐसे शब्द, ऐसे वाक्य बोल और लिख जाते हैं जिसकी हमें विशेष समझ नहीं होती है पर वह हमारी दिनचर्या में रहता है इसलिए अधिकतर उसका भाव वही रहता है जो वो कहना चाहता है।
    भारत में हिंदी पढ़ाना बहुत आसान है। लेकिन जो अहिंदी भाषी इसको सीखने की चाहत रखते है, तब उन्हें हर चीज बतानी पड़ती है। पढ़ाने वाले शिक्षक को इन सभी से गुजरना पड़ता है। ऐसे शिक्षक के लिए शब्द भंडार तो अधिक होना ही चाहिए, भाषा विज्ञान का अध्ययन भी उच्च कोटि का हो। तभी वह हिंदी को विश्वव्यापी बना सकता है।
    चूंकि संपादक महोदय ने हिंदी क्षेत्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता की है। और उस सम्मेलन की सारी गतिविधियों को संपादकीय का विषय बना दिया है तो वहां जो कुछ भी हुआ है उसको तो पाठकों के सामने रखा ही है साथ ही अपना विजन भी रखा है।
    भारत में कुछ स्थानों पर देखा-सुना गया है कि वक्ता विषय पर न बोलकर अन्य विषयों पर खूब बोलते हैं। मतलब बारात में दूल्हा दुल्हन की कोई बात नहीं, बस बाराती ही अपनी-अपनी मौज में मस्त होकर जो आया सो बोलते रहते हैं।
    हिंदी सम्मेलनों में नेता या अन्य क्षेत्र के लोगों की उपस्थिति भी विषयांतर होने के लिए उत्तरदाई होती हैं। या फिर प्रसिद्ध हिंदी सेवियों के महिमा मंडन में पूरे के पूरे सत्र ऐसे ही भेंट चढ़ जाते हैं।
    मंत्रालय की निकट भविष्य की योजनाएं जिसमें एक पोर्टल बनाने की भी है और इस पोर्टल में विश्व भर के हिंदी अध्यापक एवं साहित्यकार अपना परिचय प्रकाशित करा सकते हैं। ये योजना हिंदी के लिए सुखद कही जा सकती है।
    ऋचा जैन जी का हिंदी में ए आई के प्रयोग वाली बात मुझे ठीक जंची है। उन्होंने ए आई के गुण और दोष दोनों पर बढ़िया पक्ष रखा है। ये बात तो यूनिवर्सल सच है कि आज का डिजिटल युवा उत्तर की प्रतिक्रिया तुरंत चाहता है भले ही इमोजी में क्यों न हो। यह बात युवाओं अकेले की नहीं रह गई है। अपने उत्तर की तुरंत प्रतिक्रिया सभी चाहने लगे हैं।
    संपादक महोदय जी, यह विषय आज की पीढ़ी के लिए बहुत जरूरी है। उन्हें इसका एहसास होना ही चाहिए कि जब खेत की बात हो तो खेत की ही की जाए, खलिहान को बीच में न लाया जाए।
    “देखते हैं इस संपादकीय का असर …….”

    • प्रिय भाई लखनलाल पाल जी, आपने सही रेखांकित किया है कि – “बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में एक नई बात यह हुई कि इसमें हिंदी साहित्य पर चर्चा न होकर हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें आ रही हैं, इस विषय को उठाया गया है।” विदेशोंं में हिन्दी शिक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस विस्तृत टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।

  16. एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता संपादकीय।
    जयपुर लिट फेस्ट अथवा इसी किस्म के फेस्टिवल्स दरअसल ऐसे नामों पर अधिक केंद्रित रहते हैं जो क्राउड पुलर्स हों। इसीलिए जावेद अख्तर,गुलज़ार, शशि थरूर जैसे नामों को अधिक तवज्जो दी जाती है। साहित्यकार भी होते हैं , परन्तु उनके खेमों में , वही जाते हैं जो उन्हें जानते हैं अथवा जो उनके पाठक हैं और उन्हें सुनना चाहते हैं।
    पर हाँ आपने जिन बातों का उल्लेख किया वास्तव में यह वे मुद्दे हैं जिनपर गौर करना जरूरी है, और जो इस सम्मेलन में किया गया। इससे यह सम्मेलन एक अलग स्तर पर रहा जो हिंदी के लिए माकूल है।
    हमेशा की तरह बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डालते संपादकीय के लिए बधाई..

    • सरस जी आपने ठीक कहा कि गंभीर मुद्दों के लिये क्राउड पुलर्स की आवश्यकता नहीं होती। गंभीर बात नतीजे चाहती है। बहुत शुक्रिया।

  17. श्री तेजेंद्र शर्मा जी
    ——————
    पुरवाई के इस अंक में प्रकाशित आपके सम्पादकीय का कई मायनों में विशेष और अलग महत्त्व है ।

    रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में28-29 जनवरी को सम्पन्न
    क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में समसामयिक रूप से विशेष महत्त्व है ।
    इस द्विदिवसीय आयोजन के सभी सत्रों का संचालन आपके द्वारा किया जाना सुखद और प्रसन्नता दायक है ।
    बहुत बधाई ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान
    रायगढ़ (छत्तीसगढ़)भारत

  18. इस बार के संपादकीय के आप के अनुभव पढ़ने को मिला और हम बेहद समृद्ध हुए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे सार्थक योजनों का होना बड़ी बात है। आपने सफल संचालन किया उसके लिए आपको बधाई हो।
    साथ ही आपने बताया कि किस तरह ये सम्मेलन देश या विदेश में होने वाले अन्य कार्यक्रमों से अलग रहा।
    बहुत ही बढ़िया रिपोर्ट आप ने संपादकीय में पेश किया है।
    साथ ही आप के नाम को भी प्रस्तावित किया गया ये भी ख़ुशख़बरी है।

  19. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    वैसे तो आपका हर संपादकीय महत्वपूर्ण ही होता है और आपकी यात्राएँ भी महत्वपूर्ण होती हैं। किन्तु आपकी यह यात्रा कहीं अधिक कीमती है सर जी! कीमती इसलिये इसके मूल्य कीमती हैं। उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं, बल्कि बहुत महत्वपूर्ण है।

    विषय साहित्य नहीं था। बल्कि विदेश में हिंदी साहित्य को पढ़ाने में आने वाली दिक्कतें व भाषा-विज्ञान की समस्याओं से संबद्ध था।यह विषय ही इस कार्यक्रम को विशेष बनाता है।
    यह खुशी की बात है कि इसमें सिर्फ बातचीत ही नहीं हुई बल्कि समाधान भी सुझाए गये।
    बुखारेस्ट नाम हमने पहली बार सुना था।
    अजीब लग रहा था और सोचा था कि आपसे इसके बारे पूछेंगे, पर आपने पहले ही बता दिया।
    संयुक्त सचिव ने घोषणा करके जो कहा कि मंत्रालय निकट भविष्य में एक पोर्टल बनवाएगा जिसमें वैश्विक स्तर पर पाठ्यक्रम प्रकाशित किया जाएगा और विश्व भर के हिंदी अध्यापक एवं साहित्यकार अपना परिचय प्रकाशित कर सकेंगे, पोर्टल पर पाठ्य पुस्तक भी उपलब्ध करवाने की भविष्य में योजना है।
    अगर यह संभव हुआ तो वैश्विक स्तर पर हिंदी की पहचान बढ़ाने का एक सक्रिय और महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा, इसमें कोई दो मत नहीं कि इससे हिंदी के विस्तार को और दिशा मिलेगी ।
    देश विदेश से पधारे इतने विद्वत्समाज की उपस्थिति इस कार्यक्रम की महानीयता को दर्शाती है।

    भारत से पधारे हुए के डी सिंह के वक्तव्य पर आश्चर्य हुआ। उन्होंने साबित किया कि हिंदी को आगे बढ़ाने में देश के इन जैसे साहित्यकार और संबद्ध पदाधिकारी ही बाधक हैं।

    ऋचा जैन का कार्यक्रम कबीले तारीफ रहा। बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण भी था।
    ए आई की गुणवत्ता और सावधानियाँ, दोनों ही जानना बहुत जरूरी है।
    चारों सत्रों के संचालन के लिए आपका चयन पुरवाई पत्रिका व समूह के लिये गौरव की बात है। निश्चित ही यह
    संचालन एक नया अनुभव रहा होगा आपके लिये।
    बहुत-बहुत बधाई इसके लिए आपको।

    विश्व हिंदी सम्मेलन और भारत में होने वाले हिंदी सम्मेलनों के बारे में आपने जो भी कहा वह पूरी तरह सही था।
    आपने शायद पहले भी इस बात का जिक्र किया है। यह निराशाजनक लगता है कि समारोह तो बहुत होते हैं, बात भी हो जाती है, लेकिन वह विषय छूट जाता है जो आयोजन का कारक होता है।

    उम्मीद है कि विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्री अंजू रंजन जी इस संबंध में सकारात्मक सहयोग देंगी।
    इसमें महत्वपूर्ण आयोजन में आपकी और ऋतु नन्नन की उपस्थिति महत्वपूर्ण है
    अब क्रियान्वयन का इंतजार रहेगा।
    बुखारेस्ट में हिंदी के वैश्विक उत्सव की इतनी विस्तृत और संपूर्ण जानकारी संपादकीय के माध्यम से पाठकों को तक पहुंचाने के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

    हिंदी को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का प्रयास प्रशंसनीय और सराहनीय है।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने हमेशा की तरह संपादकीय पर गंभीर एवं विस्तृत टिप्पणी लिखी है। आप ही की तरह हम भी उम्मीद करते हैं कि विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्री अंजू रंजन जी इस संबंध में सकारात्मक सहयोग देंगी। हार्दिक धन्यवाद।

  20. आदरणीय भाई ,
    सादर प्रणाम।
    एक फिर आपका संपादकीय लीक से हटकर रहा। चर्चा इस बुखारेस्ट में आयोजित हिंदी सम्मेलन के संबध में थी।अपनी हिन्दी भाषा के गौरव और अस्मिता के लिए विद्वान हिन्दी साहित्यकारों का एक साथ एक स्थान पर जुटना और उसके.संरक्षण व संवर्धन के लिए विमर्श बहुत बडी उपलब्धि है। यद्यपि हिन्दी की.मौलिक समस्याओं पर चर्चा न होकर उसके पाठन में आने वाली कठिनाईयों और वैश्विक स्तर पर हिन्दी के संरक्षण व संवर्धन के.लिए विमर्श किया गया जिसमें चार सत्रों का आयोजन किया गया था। 28 जनवरी को आयोजित पहले सत्र का विषय था- “हिंदी: वैश्विक पहचान और सांस्कृतिक एकता।” जबकि दूसरे सत्र में वक्तागण मिलकर इस बात पर विचार करते रहे, कि “हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ” क्या हैं।
    मैं इसे हिन्दी के विकास के लिए सकारात्मक कदम मानती हूं।सभी सत्रों में आपकी अध्यक्षता हमारे लिए गौरव का विषय है।बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाए भाई।
    पद्मा मिश्र

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