मुझे यह कहने में ज़रा भी झिझक महसूस नहीं हो रही कि मैंने इससे पहले अपने जीवन में ऐसी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं देखी, जिसमें कोई भारतीय जासूस हो और वह फ़िल्म अंग्रेज़ी के जेम्स बॉन्ड से प्रभावित न हो। फिर जासूस चाहे फ़िरोज़ ख़ान हो, जितेंद्र हो, हृतिक रोशन हो या फिर सलमान ख़ान अथवा शाहरुख़ ख़ान – प्रस्तुति लगभग एक–सी ही होती है। इन जासूसों का वास्तविक जासूसी दुनिया से कुछ खास लेना–देना नहीं होता। आदित्य चोपड़ा को आदित्य धर की फ़िल्म देखकर यह सीखना चाहिए कि जासूस वास्तव में कैसा होता है। ‘धूम’ सीरीज़ वाला जासूस तो जेम्स बॉन्ड की एक घटिया नकल से अधिक कुछ नहीं लगता। भारत में ऐसी फ़िल्मों में आमतौर पर बिकनी पहनी लड़कियाँ, समुद्री बीच, कार रेस, ढिशुम–ढिशुम और फिर पिक्चर ख़त्म!
ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मैं कोई फ़िल्म देखूँ और उस फ़िल्म के बारे में एक पूरा संपादकीय लिखने का जी चाहे। ‘पुरवाई’ का संपादक बनने के बाद बहुत-सी अच्छी फ़िल्में देखने का अवसर मिला, जिनमें बहुत-सी उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण फ़िल्में भी थीं। मगर पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी फ़िल्म को देखने के बाद यह इच्छा जागृत हुई कि उस पर बातचीत की जाए।
अपने जीवन में पहली बार तीन घंटे चौंतीस मिनट लंबी फ़िल्म देखने का मौक़ा मिला। मैं लंदन के हैरो क्षेत्र में रहता हूँ, जहाँ एक ज़माने में ‘सफ़ारी सिनेमा’ हुआ करता था। कोरोना काल में लोगों के सिनेमा देखने पर जो पाबंदियाँ लगीं, उन्होंने सिनेमा हॉल के दरवाज़ों पर ताला लगवा दिया। वहाँ फ़्लैट बनने शुरू हो गए और हमने सोचा कि हिंदी फ़िल्मों का एक अड्डा पूरी तरह से अदृश्य हो गया है।
मगर दो महीने पहले उसी जगह एक नया सिनेमा खुल गया, जिसके ऊपर एक पाँच मंज़िला और दूसरी ग्यारह मंज़िला इमारत बनाई गई है। इस सिनेमा का नाम ‘मेट्रो सिनेमा’ है, जिसमें तीन स्क्रीन हैं, यानी एक ही समय में तीन फ़िल्में दिखाई जा सकती हैं। यहाँ मैंने, ज़किया जी और परवेज़ भाई ने कल फ़िल्म ‘धुरंधर’ देखी।
फ़िल्म की प्रस्तुति आम फ़िल्मों से बिल्कुल अलग है। फ़िल्म में सात चैप्टर हैं। एक तरह से इस फ़िल्म को ‘धुरंधर पार्ट-1’ ही कहा जा सकता है, क्योंकि फ़िल्म के अंत में घोषणा कर दी गई है कि मार्च 2026 में ‘धुरंधर पार्ट-2’ भी रिलीज़ होने वाली है। फ़िल्म की शुरुआत में ही इंडियन एयरलाइन्स की फ़्लाइट IA-814 के अपहरण और उसमें आतंकवादियों के व्यवहार को दिखाया गया है, उसके बाद मुंबई के ताज होटल पर हमला और भारतीय संसद पर हमला दर्शाया गया है। अजय सान्याल (आर. माधवन, जो अजित डोवाल जैसे दिखाई देते हैं) कंधार तो स्वयं गए थे। बाकि दोनों घटनाओं के बाद उनकी प्रतिक्रिया दिखाई जाती है। वहीं रणवीर सिंह को हमज़ा अली मज़हारी बनाकर पाकिस्तान भेजते हैं।
इसके बाद की कहानी कराची शहर के ‘ल्यारी’ इलाके के अंडरवर्ल्ड की तरफ़ मुड़ जाती है। एक-एक करके जो चरित्र सामने आते हैं, उनमें मेजर इक़बाल (अर्जुन रामपाल), रहमान डकैत (अक्षय खन्ना), एस.पी. चौधरी असलम (संजय दत्त) और जमील जमाली (राकेश बेदी) शामिल हैं-ये सभी फ़िल्म को लगातार ऊँचाई प्रदान करते हैं। तीन घंटे चौंतीस मिनट लंबी इस फ़िल्म में इंसान को न तो कुछ सोचने का मौक़ा मिलता है और न ही बोर होने का।
वैसे तो फ़िल्म में नायिका के लिए कुछ ख़ास करने को था नहीं, मगर सारा अर्जुन (यालीना जमाली) ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। वह रणवीर सिंह से उम्र में भी बहुत छोटी दिखती हैं और ऊँचाई में भी। फ़िल्म के एक सीन में जमील जमाली (राकेश बेदी) कहता भी है – “अरे उन्नीस साल की बच्ची है वो, और तू तीस-बत्तीस का तो होगा!”
फ़िल्म की कहानी, संवाद, अभिनय, कला निर्देशन और संगीत, सब उच्च कोटि के हैं। फ़िल्म की शूटिंग थाईलैंड में की गई है, मगर आर्ट डिपार्टमेंट ने वहाँ कराची के ‘ल्यारी’ इलाके को अपनी मेहनत से साकार खड़ा कर दिया है। आदित्य धर ने फ़िल्म स्क्रिप्ट भी लिखा है और संवाद भी। कुछ संवादों पर सिनेमा हॉल में तालियां भी बजती देखी गईं।
अजय सान्याल का संवाद – “हिन्दुस्तानियों का सबसे बड़ा दुश्मन हिन्दुस्तानी ही हैं… पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पे आता है।”… रहमान डकैत – “जो वादा किया हुआ है उसे भूलने की गुस्ताखी मत करना, रहमान डकैत की दी हुई मौत बड़ी कसाई-नुमा होती है।” संजय दत्त (चौधरी असलम) की एंट्री पर डोंगा द्वारा बोला गया संवाद – “बहुत साल पहले एक शैतान और जिन्न में जबरदस्त सेक्स हुआ, नौ महीने बाद जो पैदा हुआ उसका नाम पड़ा चौधरी असलम।” संजय दत्त (SP चौधरी असलम) – “अगर मेरे साथ दगाबाज़ी की न तो मारने से पहले तुझे रंडवा बना दूंगा और जमील साहब आपको खस्सी।” – हर कलाकार को कुछ ऐसे संवाद दिये गये हैं कि उसका चरित्र फ़िल्म के लिये महत्वपूर्ण बन जाता है।
फ़िल्म के जूनियर कलाकारों में सबसे अधिक प्रभावित किया है गौरव गेरा ने जिसने फ़िल्म में भारत के स्पाई एजेंट और इन्फ़ॉर्मर मोहम्मद आलम की भूमिका निभाई है। ‘जस्सी जैसा कोई नहीं’ और अन्य कॉमेडी टीवी सीरियलों में काम करने वाले गौरव गेरा ने अपने किरदार को एक अनूठे शांत ढंग से निभाया है। उसे देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि वह जासूस हो सकता है। उनके अलावा दानिश पंडोर (उज़ेर बलोच), मानव गोहिल (सुशांत बंसल – अजय सान्याल का असिस्टेंट), नवीन कौशिक (डोंगा) आदि ने अपने चरित्रों के साथ पूरा न्याय किया है।
‘धुरंधर’ को पाकिस्तान में तो बैन कर ही दिया गया है, इसके अतिरिक्त इसे छह देशों में रिलीज़ किए जाने की इजाज़त नहीं मिली। इसकी वजह फ़िल्म का एंटी-पाकिस्तानी होना बताया जा रहा है। बॉलीवुड हंगामा ने सूत्रों के हवाले से लिखा है- “बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में ‘धुरंधर’ रिलीज़ नहीं हुई है।”
‘धुरंधर’ को खाड़ी देशों में बैन किए जाने को लेकर रिपोर्ट में आगे लिखा गया है- “ऐसी उम्मीद थी कि ऐसा होगा, क्योंकि फ़िल्म को पाकिस्तान-विरोधी फ़िल्म के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, पहले भी ऐसी फ़िल्में इसी कारण से रिलीज़ होने में असफल रही हैं। फिर भी, ‘धुरंधर’ की टीम ने कोशिश की, लेकिन बदकिस्मती से सभी देशों ने फ़िल्म के कंटेंट को स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि ‘धुरंधर’ खाड़ी देशों में से किसी में भी रिलीज़ नहीं हो पाई है।”
मुझे यह कहने में ज़रा भी झिझक नहीं है कि मैंने अपने जीवन में ऐसी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं देखी, जिसमें कोई भारतीय जासूस हो और वह फ़िल्म अंग्रेज़ी के जेम्स बॉन्ड से प्रभावित न हो। फिर जासूस चाहे जितेंद्र हो, हृतिक रोशन हो या फिर सलमान ख़ान अथवा शाहरुख़ ख़ान – प्रस्तुति लगभग एक-सी ही होती है। इन जासूसों का वास्तविक जासूसी दुनिया से कुछ खास लेना-देना नहीं होता। आदित्य चोपड़ा को आदित्य धर की फ़िल्म देखकर यह सीखना चाहिए कि जासूस वास्तव में कैसा होता है। ‘धूम’ सीरीज़ वाला जासूस तो जेम्स बॉन्ड की एक घटिया नकल से अधिक कुछ नहीं लगता। भारत में ऐसी फ़िल्मों में आमतौर पर बिकनी पहनी लड़कियाँ, समुद्री बीच, कार रेस, ढिशुम-ढिशुम और फिर पिक्चर ख़त्म!
‘धुरंधर’ में भारतीय जासूस का केंद्रीय पात्र रणवीर सिंह ने निभाया है। उनके साथी कलाकार हैं- अक्षय खन्ना, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और राकेश बेदी। रणवीर सिंह ने अपनी भूमिका बहुत ही संयत ढंग से निभाई है। उनके गेट-अप में कहीं कोई ग्लैमर नहीं है। वे एक आम आदमी जैसे दिखाई देते हैं, जो कहीं भी हीरो-गिरी वाले कारनामे नहीं करते। पूरी फ़िल्म में वे लो-प्रोफ़ाइल में रहते हैं। फ़िल्म में तीन जगह तो उन्होंने इतनी कंट्रोल्ड एक्टिंग की है कि बेसाख़्ता मुँह से ‘वाह’ निकल जाती है।
शुरुआत में ही एक दृश्य है, जब हमज़ा (रणवीर सिंह) कराची में दाख़िल होता है और चार पाकिस्तानी युवा खुली सड़क पर उसका बलात्कार करने का प्रयास करते हैं। मगर अचानक वहाँ पुलिस की गाड़ी आ जाने से वे सब भाग खड़े होते हैं। इस दृश्य में हमज़ा का उन चारों से लड़ना, हार जाना और पूरी तरह बेबस हो जाना, रणवीर सिंह के चेहरे के भावों के माध्यम से अदाकारी की एक मिसाल बन जाता है। यह भी साफ़ हो जाता है कि ‘ल्यारी’ इलाके में मर्दों की इज्ज़त भी सुरक्षित नहीं है। वहाँ होमोसेक्सुअल अटैक आम बात है।
जब रणवीर सिंह के साथी जासूस को मेजर इक़बाल (अर्जुन रामपाल) अपनी दरिंदगी दिखाते हुए शारीरिक यातना देता है, उस समय रणवीर सिंह का स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखना और चेहरे पर पूरी तरह नियंत्रित भाव प्रदर्शित करना अदाकारी के एक अलग ही स्तर को दर्शाता है।
और सबसे कठिन सीन वह था, जब मेजर इक़बाल, रहमान डकैत और अन्य लोग मुंबई हमले का लाइव कवरेज देखकर नारे लगा रहे होते हैं और भारतीयों को मरते देखकर ख़ुशियाँ मना रहे होते हैं। उस समय हमज़ा अपने दर्द से भीतर ही भीतर लड़ रहा होता है। इस दृश्य में रणवीर सिंह ने शायद अपने जीवन का श्रेष्ठतम अभिनय किया है।
अक्षय खन्ना ने तो इस फ़िल्म में अभिनय के नए आयाम स्थापित कर दिए हैं। उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उनके सामने कौन-सा कलाकार है। वे अपने फ़िल्मी चरित्र को पूरी तरह से आत्मसात कर लेते हैं और पूरी शिद्दत से उसे जीते हैं। जब उनकी पत्नी (सौम्या टंडन) उन्हें थप्पड़ मारती है, तो अक्षय खन्ना की प्रतिक्रिया सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए किसी अभिनय पाठ्यक्रम से कम नहीं लगती। चाहे उनके सामने रणवीर सिंह हों या संजय दत्त, उन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं होता। जिस दृश्य में अक्षय खन्ना मौजूद होते हैं, वह दृश्य पूरी तरह उन्हीं का हो जाता है। इस फ़िल्म के पार्ट-2 को लेकर एक ख़तरा यह है कि उसमें अक्षय खन्ना मौजूद नहीं होंगे।
‘धुरंधर’ में एक ऐसी घटना का ज़िक्र बहुत आहिस्ता से किया गया है, जिसने भारत के आर्थिक जगत को बुरी तरह हिला दिया था। फ़िल्म में “खनानी ब्रदर्स” की कहानी बस चलते-चलते दिखाई गई है। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि शत-प्रतिशत सच है। ये कराची के दो जुड़वाँ भाई थे-जावेद ख़नानी और अल्ताफ़ ख़नानी। दोनों भाइयों ने 1993 में कराची में ‘खनानी एंड कालिया इंटरनेशनल’ के नाम से ‘मनी एक्सचेंज’ का व्यवसाय शुरू किया, जो धीरे-धीरे पाकिस्तान की सबसे बड़ी ‘मनी एक्सचेंज’ कंपनी बन गई। इनके हाथ में पाकिस्तान का लगभग चालीस प्रतिशत करेंसी बिज़नेस था, लेकिन इनका असली काम ‘हवाला’ का था। फ़िल्म में जावेद ख़नानी को हास्य-पुट के साथ प्रस्तुत किया गया है, मगर वास्तव में वह एक बेहद शातिर खिलाड़ी था।
2006 में भारत के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक नई कंपनी बनाई-‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया’, जिसने इंग्लैंड की कंपनी ‘De La Rue’ से भारत की करेंसी के लिए ‘सिक्योरिटी प्रिंटिंग पेपर’ और ‘सिक्योरिटी थ्रेड’ ख़रीदना शुरू किया। कमाल की बात यह थी कि यही कंपनी पाकिस्तान को भी वैसा ही काग़ज़ और सिक्योरिटी थ्रेड सप्लाई करती थी। जावेद ख़नानी इसी सामग्री से नकली भारतीय करेंसी बनाकर क़तर और नेपाल के ज़रिए भारत में पहुँचाया करता था।
इसके बाद भारत के नए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने ‘De La Rue’ को ब्लैकलिस्ट कर दिया। लेकिन 2012 में चिदंबरम फिर से भारत के वित्त मंत्री बन जाते हैं और उनके सचिव बनते हैं- अरविंद मायाराम। इसके बाद एक बार फिर ब्लैकलिस्ट की गई कंपनी ‘De La Rue’ से पेपर ख़रीदना शुरू कर दिया जाता है।
फ़िल्म में एक भारतीय मंत्री और उसके पुत्र को जावेद ख़नानी के साथ दिखाया गया है, जो ब्रिटेन की कंपनी ‘De La Rue’ से भारत की नकली करेंसी छापने की सामग्री जावेद ख़नानी और अल्ताफ़ ख़नानी को उपलब्ध कराते हैं। भारत की सीबीआई और एन.आई.ए. को यह पता लगाना चाहिए कि वह मंत्री और उसके पुत्र कौन थे।
भारत द्वारा जब नोटबंदी का अचानक ऐलान किया गया, तो उसका असर भारत में तो पड़ा ही, पाकिस्तान में भी एक तरह का भूचाल आ गया। दो सप्ताह के भीतर ही भारत की नकली करेंसी बनाने वाला जावेद ख़नानी आठवीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर लेता है।
‘धुरंधर’ फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें देश-प्रेम के झूठे और ऊँचे नारे नहीं हैं। यहाँ सब कुछ ज़मीन से जुड़ा हुआ है और जो कुछ भी घटित होता है, वह जीवन और वास्तविकता से जुड़ा हुआ है। यह फ़िल्म हर सिने-प्रेमी को देखनी ही चाहिए, और सिनेमा से जुड़ने के इच्छुक तमाम युवाओं को भी इसे देखकर अपने-अपने क्षेत्र से कुछ नया सीखना चाहिए।
क्योंकि मैं आमतौर पर फ़िल्मों की समीक्षा नहीं करता, इसलिए फ़िल्म को स्टार देने की स्थिति में नहीं हूँ।
आपने फिल्म के महत्वपूर्ण पहलुओं को बताते हुए बहुत अच्छी जानकारी दी है। धन्यवाद।
धन्यवाद प्रवीण भाई।
फिल्म और पत्रकारिता के विद्यार्थी ,इस बार के संपादकीय से बहुत कुछ जान और सीख सकते हैं। संपादकीय पुरानी बॉलीवुड फिल्मों और उनके स्वप्निल हीरोज की भी कलई जेम्स बॉन्ड की नकल के तथ्यात्मक और औचित्यपूर्ण तर्क से खोलते हैं।
धुरंधर एक फिल्म जो पटकथा, स्क्रीनप्ले और अभिनय के महारथियों और नवोदितों को एक साथ दमदार और शानदार अंदाज़ से पेश करती है।
संपादकीय फिल्म रिलीज़ की समस्याओं और पाकिस्तान समर्थित देशों में इसकी इजाजत न मिलने के अहम मुद्दों को भी पूरी संजीदगी से पेश करता है।
अभिनय के पक्ष पर भी समुचित और संतुलित टिप्पणियां भावी दर्शकों tc को फिल्म देखने हेतु प्रेरित करती हैं।
यह संपादकीय समीक्षात्मक आलेख का कलेवर और फ्लेवर लेकर पाठकों को मनोरंजन के साथ साथ सूचना की पूरी डोज बखूबी बड़े ही कलात्मक रूप से देता है।
बधाई ,इतने रोचक संपादकीय हेतु।
सूर्यकांत भाई, इस बार टिप्पणियों के जवाब देने में देरी इसलिये हुई कि आप लोग तो टिप्पणी लिख पा रहे थे, मगर मैं जवाब नहीं भेज पा रहा था। तकनीकी परेशानी ने मुझे भी परेशान कर रखा था। ख़ैर देर आये, दुरुस्त आए।
हालांकि ये महज़ एक इतफ़ाक़ ही रहा कि कल देर रात ये फ़िल्म देखने के बाद आपके इस फ़िल्म के संपादकीय पर नजर पड़ी तो फ़िल्म का एक-एक दृश्य जहन में कौंध गया।
फ़िल्म से जुड़ी आपकी चर्चा के हर बिन्दु को विवेचनात्मक स्तर पर एक ‘स्टार’ दिया जा सकता है। फिल्म के साथ साथ उससे जुड़े मुद्दे पर आपकी प्रतिक्रिया संपादकीय को और भी श्रेष्ठ बना देती है। हार्दिक बधाई देना बनता है।
नोटबन्दी और उससे जुड़े मामले पर भारतीयों को आज भी पूरी जानकारी नहीं है, और इस बारे में भारतीय सरकार को अपना पक्ष और खुलकर रखना चाहिए था, जो उस समय नहीं हो सका।
बहरहाल इस तरह की हिंदी सिनेमा का हिस्सा बननी चाहिए, क्योंकि काल्पनिक सिनेमा से अधिक हमारे समाज को जागृत करने के लिए ऐसे विषयों की बहुत अधिक ज़रूरत है।
एक बार फिर से इस बेहतरीन संपादकीय के लिए आपको हार्दिक साधुवाद।
विरेन्द्र भाई, यह भी बढ़िया रहा कि आपने फ़िल्म देखने के बाद संपादकीय पढ़ा। इससे आप संपादकीय को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाए। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये विशेष आभार।
आज के आप के संपादकीय द्वारा विस्तार में फ़िल्म ‘धुरंधर’ की चर्चा पढ़ने पर बहुत सी ऐसी बातें सामने आईं जिन की हम सामान्यजन को संज्ञान न था।
इस फ़िल्म के चरित्र यदि सच में कुछ वास्तविक व्यक्तियों पर आधारित हैं तो यह गहरी चिंता का विषय है।
इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद।
शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी, आपका स्नेह और समर्थन तो हमारे लिये किसी टॉनिक से कम नहीं है।आपको बहुत बहुत शुक्रिया।
दिनांक : 14-12-2025
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
सादर वन्दे।
आपका सम्पादकीय ‘इस बार… धुरंधर…!’ पढ़कर हृदय में गहरी सन्तुष्टि और सहमति का भाव उत्पन्न हुआ। वर्षों से हिन्दी जासूसी सिनेमा जिस कृत्रिमता और खोखले यथार्थ को जी रहा था, उसमें ‘धुरंधर’ का आगमन सचमुच एक निर्णायक और साहसिक मोड़ है। आपने बिलकुल सही रेखांकित किया है कि अब तक भारतीय जासूसों की सिनेमाई प्रस्तुति, किसी-न-किसी रूप में, जेम्स बॉन्ड की छाया से मुक्त नहीं हो सकी थी।
‘धूम’ श्रृंखला जैसे उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि हमारे यहाँ जासूसी फ़िल्में अक्सर बिकनी, समुद्री तट, कार-रेस और ढिशुम-ढिशुम तक सिमट जाती हैं। ऐसे में किसी फ़िल्म का एक अनुभवी सम्पादक और संवेदनशील दर्शक को पूरा सम्पादकीय लिखने के लिए प्रेरित कर देना, अपने आप में उसकी गुणवत्ता और प्रभाव का प्रमाण है।
‘धुरंधर’ की संरचना—सात अध्यायों में बँटी हुई कथा—और IA-814 अपहरण, ताज होटल तथा संसद पर हमले जैसी घटनाओं को गम्भीरता से छूना, यह दर्शाता है कि निर्देशक आदित्य धर ने मनोरंजन नहीं, बल्कि यथार्थ के निकट खड़े सिनेमा को प्रस्तुत करने का साहस किया है। रणवीर सिंह द्वारा निभाया गया हमज़ा अली मज़हारी पारम्परिक हीरो नहीं, बल्कि एक ऐसा जासूस है, जो साधारण दिखता है; लो-प्रोफ़ाइल में रहता है और भीतर-ही-भीतर युद्ध लड़ता है। उसका संयमित अभिनय—विशेषकर कराची में बेबसी के दृश्य और मुम्बई हमले के लाइव कवरेज वाले क्षण—‘कंट्रोल्ड एक्टिंग’ का उत्कृष्ट उदाहरण बन जाता है।
अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत के रूप में अभिनय का ऐसा आयाम रचा है, जो सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य-वस्तु कहा जा सकता है। ऐसा लगता है, मानो वे दृश्य को नहीं निभाते, अपितु दृश्य पर अधिकार कर लेते हैं। उनके अभिनय की तीव्रता यह आशंका भी छोड़ जाती है कि दूसरे भाग में उनकी अनुपस्थिति फ़िल्म के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं, गौरव गेरा जैसे कलाकार का एक शान्त, लगभग अदृश्य-सा स्पाई एजेन्ट बन जाना, इस बात का प्रमाण है कि फ़िल्म में हर चरित्र सोच-समझकर गढ़ा गया है।
फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देश-प्रेम का शोर नहीं, बल्कि यथार्थ की ठोस ज़मीन है। ‘खनानी ब्रदर्स’ की शत-प्रतिशत सच्ची कहानी, नकली भारतीय करेंसी, हवाला नेटवर्क और ब्रिटिश कम्पनी De La Rue से जुड़े संवेदनशील सन्दर्भ—ये सब ‘धुरंधर’ को साधारण फ़िल्म से ऊपर उठाकर सामाजिक-राजनैतिक दस्तावेज़ के निकट ले जाते हैं। नोटबन्दी के बाद जावेद खनानी की आत्महत्या को कथा से जोड़ना, इस प्रामाणिकता को और गहरा करता है।
अन्ततः पाकिस्तान और खाड़ी देशों में फ़िल्म का प्रतिबन्धित होना इस बात का प्रमाण है कि ‘धुरंधर’ ने किसी सुरक्षित, सुविधाजनक रास्ते को नहीं चुना। यह फ़िल्म न केवल देखने योग्य है, बल्कि अनुभव करने योग्य भी है। तीन घण्टे चौंतीस मिनट की यह कृति हर सिने-प्रेमी और सिनेमा के विद्यार्थी के लिए एक आवश्यक अनुभव बन जाती है।
आपका यह सम्पादकीय न केवल ‘धुरंधर’ का समर्थन करता है, बल्कि हिन्दी सिनेमा से जुड़ी हमारी अपेक्षाओं को भी एक नई दिशा देता है—इसके लिए आपको साधुवाद।
-डॉ० चन्द्रशेखर तिवारी
सोनभद्र (उ०प्र०)
भाई चंद्रशेखर जी आपने तो पूरे संपादकीय आलेख के हर बिन्दु को उजागर कर दिया अपनी टिप्पणी में। हार्दिक धन्यवाद आपको।
मैं भी सर यह फिल्म कल ही देखी अपने रणवीर सिंह की जो तीन सीनों का जिक्र किया वास्तव में बहुत ही लाजवाब थे
लाइव कवरेज देखते समय आंखों में आंसू होते हुए आंखों से ना टपकना शानदार एक्टिंग। आपका संपादकीय पढ़ने के बाद मेरी सोच थोड़ी बदल गई क्योंकि कल तक मुझे लग रहा था यह फिल्म सिर्फ यूथ के लिए है क्योंकि मैं अपने 21 साल के बेटे के साथ फिल्म देखने गई थी और जिन संवादों का अपने जिक्र किया बेटे के साथ थोड़ा असहज थे हालांकि हमारी मां बेटे की बॉन्डिंग बहुत अच्छी है। आपके संपादकीय को पढ़कर समझ में आया कि वास्तव में इन जैसे मवाली लोगों की भाषा ऐसी ही होती है जो फिल्म को वास्तविकता देते हैं।
अंजु जी, आपकी टिप्पणी बहुत से पाठकों को फ़िल्म देखने के लिये प्रेरित करेगी। बहुत शुक्रिया।
आदरणीय,
आज का आपका संपादकीय साधारण फ़िल्म-समीक्षा ही नहीं, बल्कि सिनेमा के माध्यम से सत्ता, राजनीति और राष्ट्रीय चेतना की वैचारिक पड़ताल करता है। जिसमें आपने फिल्म को माध्यम बनाकर हिंदी सिनेमा की जासूसी परंपरा, जेम्स बॉन्ड प्रभाव और बाज़ारू राष्ट्रवाद पर सार्थक वैचारिक हस्तक्षेप किया है,जो इस संपादकीय की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आपका संपादकीय दृष्टिकोण स्पष्ट, साहसी और पक्षधर है। जिसमें आपने आलोचनात्मक रूप से रेखांकित किया है, कि ‘धुरंधर’ की परीक्षा मनोरंजन के पैमाने पर नहीं, बल्कि यथार्थ, नैतिकता और राजनीतिक सच्चाइयों के संदर्भ में होनी चाहिये। फिल्म का यह सर्वप्रमुख और सर्वदा प्रमाणिक यह संवाद, “हिंदुस्तानियों का सबसे बड़ा दुश्मन हिंदुस्तानी ही हैं”,
जैसे उद्धरण लेख को वैचारिक धार देते हैं और इसे विचारोत्तेजक बनाते हैं।
इस संपादकीय की भाषा संवादात्मक, तीखी और हस्तक्षेपकारी है,जो संपादकीय विधा की पहचान है। कलाकारों, घटनाओं और संदर्भों का चयन केवल प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि तर्क को पुष्ट करने के लिए किया गया है,जैसे रणवीर सिंह के संयमित अभिनय या अक्षय खन्ना की उपस्थिति को ‘स्टार’ नहीं, ‘चरित्र’ के रूप में देखना।
निष्कर्षत: यह संपादकीय फिल्म-समीक्षा की रूढ़ परिधि को तोड़ते हुए एक वैचारिक हस्ताक्षर है,जो पाठक को निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देता, अपितु उसे सिनेमा, राजनीति सत्ता और राष्ट्रवाद की अंतर्संरचनाओं पर सोचने के लिए विवश करता है। इसी कारण यह लेख अपनी वैचारिक स्पष्टता और संपादकीय साहस के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय बन जाता है।
सादर साधुवाद
ऋतु आपने लिखा है कि – “यह संपादकीय फिल्म-समीक्षा की रूढ़ परिधि को तोड़ते हुए एक वैचारिक हस्ताक्षर है,जो पाठक को निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देता, अपितु उसे सिनेमा, राजनीति सत्ता और राष्ट्रवाद की अंतर्संरचनाओं पर सोचने के लिए विवश करता है। इसी कारण यह लेख अपनी वैचारिक स्पष्टता और संपादकीय साहस के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय बन जाता है। -” संपादकीय कि इससे बेहतर व्याख्या बहुत मुश्किल है। शायद मैं स्वयं भी ना कर पाता।
पीयूष जी, ये तो टिप्पणी स्वीकार ही नहीं कर रहा है
जी भाई, मैं भी जवाब नहीं लिख पा रहा था।
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादकीय — ‘इस बार… धुरंधर!’ पर प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई का संपादकीय ‘इस बार… धुरंधर!’ हाल ही में प्रदर्शित एक भारतीय फिल्म पर केंद्रित है। यह फिल्म पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी है। खासकर पाकिस्तान में तो मानो रोना-पीटना मच गया है। पाकिस्तान के साथ कुछ खाड़ी देशों ने भी यह कहकर फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया कि यह पाकिस्तान-विरोधी है।
दुनिया में किसी भी घटना का जितना अधिक विरोध होता है, वह उतनी ही रहस्यमयी बन जाती है। और जब तक उस रहस्य का उद्घाटन न हो जाए, मनुष्य को चैन कहाँ! इसी जिज्ञासा और रहस्योद्घाटन की चाह में यह फिल्म विश्वभर में बंपर कमाई कर रही है।
यह फिल्म पाकिस्तान के कराची शहर के ल्यारी क्षेत्र को केंद्र में रखकर बनाई गई है और सच्ची घटनाओं पर आधारित है। पाकिस्तान सच का सामना करने का अभ्यस्त नहीं रहा है, इसलिए वह अनावश्यक तड़प रहा है। आपके पिछले संपादकीय में प्रयुक्त ‘झूठिस्तान’ शब्द इस संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है। चाहे देश हो या व्यक्ति—फितरत के अनुसार शब्द अपने आप जन्म लेते हैं, और इस शब्द का जन्म भी स्वाभाविक ही है।
पाकिस्तान को आइना कभी पसंद नहीं आता, क्योंकि उसमें उसका असली चेहरा दिखाई देता है। उसे इस बात का दुख नहीं है कि ल्यारी में पहले कितना खून-खराबा हुआ, बल्कि इस बात की बेचैनी है कि भारत ने उसका सच दुनिया के सामने उजागर कर दिया।
फिल्म की मारधाड़ और हत्याओं को लेकर जो लोग शोर मचा रहे हैं, उन्होंने शायद असली जीवन की त्रासदी को नहीं झेला। फिल्मी हिंसा और वास्तविकता में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। 1993 के सीरियल ब्लास्ट हों, संसद पर हमला हो या 2008 का मुंबई हमला—इन सबमें इंसान मरे हैं, भेड़-बकरियाँ नहीं। इस सच्चाई को ध्यान में रखकर ही बात की जानी चाहिए।
आज समय भारत का है। वह जिस चीज़ पर हाथ रख देता है, वह सोना बन जाती है। आपकी इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि जासूसी के क्षेत्र में अब पूरी भारतीयता झलकती है। हमारे जासूस अपने तरीकों से अभियानों को अंजाम देते हैं, और अब दुनिया उन तरीकों को आत्मसात कर रही है।
ठेठ भारतीयपन दिल को सुकून देता है। यही कारण है कि फिल्म का हर किरदार हमारे ज़ेहन में रच-बस गया है। अक्षय खन्ना, रणवीर सिंह से लेकर सभी कलाकारों ने अपने-अपने पात्रों को जीवंत कर दिया है। फिल्म की कमाई की बात तो छोड़ ही दीजिए—करोड़ों की गिनती पाकिस्तान को करने दीजिए।
यह फिल्म ऐसी है कि पूरा वृहत्तर भारत तो इसे देखेगा ही, दुनिया का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में इसे अवश्य देखेगा। भारत की ज़रा-सी हलचल पर दुनिया कान लगा लेती है—यह तो सचमुच ‘ट्विटर-फाड़’ फिल्म है। भला इसे कौन नहीं देखना चाहेगा!
फिल्म की सफलता अपनी जगह है, लेकिन आपने जिस तरह से इसे अपने संपादकीय में पिरोया है, वह विशेष रूप से पठनीय है। उसमें आपका स्पष्ट विज़न झलकता है, और यह विज़न पाठकों को अपनी चपेट में ले लेने की क्षमता रखता है।
इस बार का संपादकीय अत्यंत उत्कृष्ट है। समसामयिक विषयों पर लिखना बड़े कौशल की माँग करता है। जब पूरी दुनिया किसी एक विषय पर बात कर रही होती है, तब अपने लिए नया क्या बचता है—यह चुनौती मौलिक प्रतिभा ही स्वीकार करती है और वही उन खाली स्थानों को भरती है, जो दूसरों से छूट जाते हैं।
इस बेहतरीन संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई, सर।
भाई लखनलाल पाल जी आपने लिखा है कि – “इस बार का संपादकीय अत्यंत उत्कृष्ट है। समसामयिक विषयों पर लिखना बड़े कौशल की माँग करता है। जब पूरी दुनिया किसी एक विषय पर बात कर रही होती है, तब अपने लिए नया क्या बचता है—यह चुनौती मौलिक प्रतिभा ही स्वीकार करती है और वही उन खाली स्थानों को भरती है, जो दूसरों से छूट जाते हैं।”
हिन्दी सिनेमा और टीवी से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। साहित्य की ही तरह प्रयास रहता है कि अपनी ओरिजिनैलिटी बनाई रखी जाए। आपका बहुत बहुत आभार। इस बार आपको टिप्पणी लिखने में जो कठिनाई हुई, उसके लिये क्षमा याचना।
प्रणाम भाई,
मै फिल्मे अब कम देखती हूं पर न जाने क्यों आपका संपादकीय पढकर इस फिल्म को देखने की इच्छा जाग उठी है।इन आतंकवाद के कभी न भूलने वालें प्रसंगों की सच्चाई को करीब से जानने समझने और उन स्थितियो से सामना बेहद रोमांच और जिज्ञासा उत्पन्न करता है। भारतीय कलाकारों का जीवंत अभिनय और उनका प्रस्तुतिकरण एक भोगा हुआ यथार्थ जैसा है जिससे हम कभी रु ब रु हुए थे।फिल्म की भाषा ,दृश्य और कथ्य नया नहीं परंतु सच के करीब है।पाकिस्तान में पनप रहे आतंकियों की कुत्सित चालें इसी भाषा व जिन्दगी को अपना चुकी हैं। मुस्लिम देशों में इस पर बैन लगना भी कोई हैरानी की बात नहीं।पुरवाई में कहा गया है**#ऐसी उम्मीद थी कि ऐसा होगा, क्योंकि फ़िल्म को पाकिस्तान-विरोधी फ़िल्म के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, पहले भी ऐसी फ़िल्में इसी कारण से रिलीज़ होने में असफल रही हैं।**बहुत ही यादगार अविस्मरणीय संपादकीय के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाए भाई। धन्यवाद पुरवाई।
पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
पद्मा आपने लिखा है कि – “मैं फिल्मे अब कम देखती हूं पर न जाने क्यों आपका संपादकीय पढकर इस फिल्म को देखने की इच्छा जाग उठी है।”
यह तो पुरवाई के संपादकीय की बड़ी सफलता मानी जा सकती है। स्नेहाशीष।
उत्कृष्ट सम्पादकीय। धुरंधर फ़िल्म का जिस तरह से आपने उल्लेख किया है, वह प्रभावशाली है, पिक्चर देखने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई है। साधुवाद
बहुत शुक्रिया सुदर्शन जी। फ़िल्म देख कर एक बार फिर संपादकीय देखियेगा।
इस बार धुरंधर…संपादकीय ने फ़िल्म देखने की जिज्ञासा बढ़ा दी है। 26/11 का लाइव शो देखकर पीड़ा होना, यह हमारे मिडिया की बहुत बड़ी भूल थी जो टॉप के लिए अपना नैतिक कर्तव्य भी भूल जाती है। जासूसी, नोट बंदी,नकली नोटों का छपना इत्यादि बेहद महत्वपूर्ण विषय हैं जो इसलिए फ़िल्म का हिस्सा है। सबसे बड़ी बात फ़िल्म का डायलॉग-भारत के पहले दुश्मन तो भारत के लोग हैं, पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पर है, एकदम सत्य है।
इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुधा जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार के संपादकीय आश्चर्यचकित किया। इस बार धुरंधर!!!!!
यद्यपि आप फिल्मी दुनिया से जुड़े रहे, आपने अभिनय भी किया है। सीरियल में एपिसोड भी लिखे हैं। फिल्मों से संबंधित खूबियों के अतिरिक्त अभिनय की बारीकियों से आप पूरी तरह से वाकिफ़ हैं। बल्कि कुशल हैं कहना ज्यादा ठीक होगा।
लेकिनआपको पहली बार किसी फिल्म की समीक्षा करते हुए संपादकीय में पढ़ा।
जाहिर है कि समीक्षा कुशल कारीगर के द्वारा स्वयं समीक्षित हो रही है।
जहाँ तक हमारी बात है एक लंबे समय से लगभग 10-12 वर्षों से हमने टीवी देखना बंद कर दिया है। कोरोना के समय जरूर हमने रामायण और महाभारत इत्यादि देखे। लेकिन समाचार के डर ने टीवी बंद ही करवा दी थी।
आपने फिल्म की कहानी के बरक्स सभी कलाकारों को जिस तरह से समीक्षित किया है… मन हुआ कि पिक्चर देखी जाए
किंतु हम जानते हैं कि हम नहीं देख पाएंगे। वैसे आपकी समीक्षा को पढ़ने के बाद भी पिक्चर का पूरा आनंद मिला।
संपादकीय का उत्तरार्द्ध काबीलेगौर है।
धुरंधर का। कथानक जिस घटना पर आधारित है उसकी पूरी जानकारी आपको पढ़कर प्राप्त हुई ।
“मनी एक्सचेंज” के किरदार, कराँची के दोनों जुड़वा भाई-जावेद ख़नानी और अल्ताफ़ ख़नानी के,” ख़नानी एंड कालिया इंटरनेशनल”
की जानकारी दी ,वह इस संपादकीय का महत्वपूर्ण अंश है। संभवतः नोट बंदी का दुख और शिकायत दोनों ही इस खबर के बाद खत्म हुई। बड़े कष्ट को समाप्त करने के लिए छोटा कष्ट उठाया जाना तकलीफ देह नहीं होता।
नोटबंदी का वास्तविक कारण तो चाहे जो हो, पर एक अनदेखे या अनजाने निशाने पर सकारात्मक प्रभाव हुआ। कालाबाजारी किसी भी रूप में गई, लेकिन गई।
एक बार फिर चमत्कृत करने वाले संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीय नीलिमा जी आपको संपादकीय चमत्कृत करने वाला लगा… यह संपादकीय की सफलता का द्योतक है। अपने निजी टेंपरामेंट के कारण आप ऐसी फ़िल्म नहीं देख सकते मगर संपादकीय पढ़ कर आनंद उठा सकते हैं।
नमस्ते तेजेन्द्र जी , मैंने अभी तक धुरंधर नहीं देखी लेकिन आपके सम्पादकीय को पढ़ कर लगा कि काफ़ी हद तक देख ली । रणवीर सिंह जिसका किरदार निभा रहे हैं या जिनका get up लिए हैं , मैं मेजर मोहित को बहुत अच्छी तरह जानती हूँ । वह ऐसा ही था । मैंने भी अपनी एक किताब में उसके इस अभियान का उल्लेख किया है । इस ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए आपको साधुवाद ।
शशि जी आप तो फ़ौज से जुड़ी हैं और मोहित को निजी तौर पर जानती हैं… आपकी टिप्पणी इसलिये बहुत अधिक ऑथेंटिक हो जाती है। बहुत बहुत शुक्रिया।
एक ही सांस में आपका संपादकीय पढ़ गई। फिल्म तो अभी नहीं देखी है क्योंकि यहां अमेरिका में कहीं-कहीं लगती है। लेकिन देखने की इच्छा प्रबल हो गई है। ना देख कर भी कहानी बहुत कुछ समझ में आई है और आपने जिन कलाकारों की तारीफों के पुल बांधे हैं, वे कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। बाकी सारा दारोमदार डायरेक्टर के ऊपर है, किस से क्या काम ले लिया। आपकी पारखी नजर ने खूब पहचाना है। आपको सदैव की तरह इस संपादकीय के लिए भी बहुत-बहुत बधाई
वीणा जी, संपादकीय आपको बांध पाया और अपने आपको पढ़वा गया… यह तो हमारे लिये सफलता का प्रमाणपत्र है। बहुत बहुत शुक्रिया।
जितेन्द्र भाई: धुरन्धर फ़िल्म पर आपके इस सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। सारी फ़िल्म का निचोड अजय सान्याल के इस सँवाद में है। “हिन्दुस्तानियों का सबसे बड़ा दुश्मन हिन्दुस्तानी ही हैं… पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पे आता है।”। इस में कोई दोमत नहीं कि हम अपने दूशमन ख़ुद है और इसकी ज़िन्दा और चलती फिर्ती मिसाल गान्धी परिवार है।
अजय सान्याल के इस सँवाद के बाद तो वो सब कारनामें और गन्द जो पाकिस्तान ने फैलाया था/है उसका पर्दा फ़ाश किया गया है।…
विजय भाई, आपने फ़िल्म और संपादकीय का निचोड़ पकड़ लिया है। हार्दिक धन्यवाद।
फिल्म धुरंधर की अपने धारदार समीक्षा की है। superhit
धन्यवाद संगीता।
मुझको आदरणीय माफ करना हम तो आपको ही धुरंधर कहेंगे ।
पुरवाई संपादकीय की पूरी सीरीज का छपना यह बताता है कि, संपादकिय कितनी जबर्दस्त होती है जिन्हें अध्ययन करके पाठक समीक्षा लिखना आलेख लिखना सीख सकते हैं ,
आप स्वयं अभिनय के क्षेत्र में रहे हैं, स्वाभाविक है की फिल्म का ए टू जेड तकनीक से वाकिफ है, और फिर पूरब और पश्चिम दो जहां का तजुर्बा आपको हर क्षेत्र में मजबूती प्रदान करता है, नतीजा आप जो भी कदम रखते हैं वह अंगद का पांव हो जाता है,
यह सत्य कहा आपने कि भारतीय जासूसी फिल्मों में वह जासूसी के पेचों खम नजर नहीं आते और ना ही वह गंभीरता,
फिल्म को देखते ही फिल्म का अंजाम समझ आ जाता है, जेम्स बॉन्ड जासूसी फिल्मों का ब्रांड नाम है जहां उसका दमखम,हाव भाव,खतरनाक स्टंट,
म्यूजिक की ग्रेविटी देखते ही बनती है।
पहली बार कोई जासूसी फिल्म स्तरीय बनी है ।
शोले के बाद यह एक लंबी फिल्म 3 घंटे 34 मिनट, फिल्म का रिकॉर्ड कायम करना इसकी गुणवत्ता को तो बताता ही है साथ ही जब पुरवाई के धुरंधर संपादकीय लिखने वाले आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर इस फिल्म पर संपादकीय लिखते हैं तो मैसेज स्वतह ही तगड़ा जाता है ।
परत दर परत खोलकर धुरंधर फिल्म पर लिखी गई संपादकीय फिल्म देखने को प्रेरित करती है।
सभी किरदारों के लिए लिखे गए यादगार डायलॉग प्रत्येक किरदार को दर्शकों के जहन में छाप छोड़ने के लिए विवश कर देते हैं। थाईलैंड में कराची शहर का ल्यारी इलाका बनाकर हूबहू खड़ा करना फिल्म की कला को शिखर पर ले जाता है।
अजय सान्याल का संवाद दर्शकों पर बहुत जमकर स्ट्राइक करता है हिंदुस्तानियों का सबसे बड़ा दुश्मन हिंदुस्तानी ही है, यह हमें सोचने के लिए मजबूर कर देगा, क्योंकि स्वतंत्रता के पहले से ही कई जय चंद भारत देश को मिटाने में हमेशा शामिल होते रहे हैं।
यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ की फिल्म के मुख्य किरदार रणवीर सिंह जिनका नाम फिल्म में हमजा है
जब वह कराची में दाखिल होते हैं तो पाकिस्तान युवा खुली सड़क पर उनका बलात्कार करने का प्रयास करते हैं, यानी कि वहां मर्दों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं है !
फिल्म मैं यह दृश्य रणवीर सिंह ने बहुत संजीदगी
से निभाया है ।
रणवीर सिंह जोअपनी निजी जिंदगी में, बेहद खुशमिजाज मजाकिया इंसान है उन्होंने इस फिल्म में अपनी गंभीर अभिनय से पूरी तरह चौंका दिया है,
फिल्म में अभिनय करने के दौरान वे पूरी तरह से किरदार की आत्मा में पहुंच जाते हैं जो सचमुच काबिले तारीफ है ।
फिल्म में सभी अभिनेताओं चाहे वह माधवन हो संजय दत्त हो, विनोद खन्ना के बेटे हो या कोई भी जूनियर कलाकार हो सभी ने अपनी अभिनय की पहचान छोड़ी है
खनानी ब्रदर के कारनामे और उसके बाद की गई नोटबंदी, जो कुछ हुआ ठीक ही हुआ का ऐलान करती है।
पूरी फिल्म लगभग सत्य तथ्यों पर आधारित होने के कारण दर्शकों को एक इतनी लंबी अवधि तक बांधे रखने में कामयाब होती है ।
माना की आप आमतौर पर फिल्मों की समीक्षा नहीं करते परंतु पुरवाई के संपादकीय लिखने वाले धुरंधर साहित्यकार जब फिल्म की समीक्षा करते हैं तो स्टार तो अपने आप ही बनते हैं
साधुवाद बेहतरीन संपादकीय के लिए
कुन्ती जी आपकी तारीफ़ ने संपादकीय का औचित्य सिद्ध कर दिया। आपने संपादकीय और संपादक को ही धुरंधर कह दिया है। आपकी तारीफ़ सिर माथे।
नमस्कार तेजेन्द्र जी।
हालांकि मैं आजकल फिल्में कम ही देखती हूं मगर आपके संपादकीय ने जिज्ञासा जगा दी है, तो देखना ही होगा। फिल्म को देखना भी एक कला है और उसकी व्याख्या करना तो और भी बड़ी कला कि जिसमें बात कह भी दी जाए और बात खुले भी नहीं।
आपके इस कौशल के क्या कहने!!
कंधार हाईजैक मेरे ड्यूटी के समय की बात है।
देखना जरूरी है!!
अलका सिन्हा
अलका, आप इस फ़िल्म को अवश्य सही परिप्रेक्ष्य में समझ पाएंगी। आप तो स्वयं गवाह हैं कांधार हाईजैक की। आपको संपादकीय पसंद आया बहुत बहुत शुक्रिया। फ़िल्म अवश्य देखें।
बहुत बढ़िया लिखा है सर आपने। देखने की तीव्र इच्छा है पहले से और अधिक जागृत हो गई है। पर phd और शेयर बाजार के दवाब में कुछ करने का जी ही नहीं करता आजकल। देखूंगा फिर भी समय निकाल कर।
देख ही डालो तेजस…
जितना इस फिल्म के बारे में सुना है, इतना कह सकते हैं कि इसे देखकर किसी भी सच्चे देशभक्त के मन- मस्तिष्क का उदीप्त हो उठना स्वाभाविक है। ऐसे में आपका यह शानदार संपादकीय लिखना अपेक्षित है, स्वागत योग्य है। आपने फिल्म का सार ऐसे साझा किया गया है कि बहुत कुछ समझ में आ भी गया और बाकी के लिए उत्सुकता बढ़ गई।
इस सहज-ग्राह्य संपादकीय को पढ़कर फिल्म देखने की इच्छा और तीव्र हो उठी है। अब तो इसे देखना ही होगा।
रचना यह संपादकीय के लिए सफलता का द्योतक है कि आप फ़िल्म देखने के बारे में सोच रही हैं।
शानदार समीक्षा सर। चूँकि आपको एक्टिंग का अच्छा ख़ासा अनुभव है, आप अदाकारी को सूक्ष्मता से परख सकते हैं। आज ही जाऊँगा देखने।
स्नेहाशीष आशुतोष।
यूँ तो मैं फिल्में कम देखती हूँ और मैं मार-धाड़ वाली फिल्में न के बराबर । धुरंधर रिलीज होने से पहले फिल्म का ट्रेलर देखकर इसे देखने का मन नहीं बन पाया । आपकी प्रतिक्रिया ने फिल्म देखने के लिए प्रेरित किया वहीं कई ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष भी रखे, जिनपर आमतौर से ध्यान नहीं जाता । ये आपके बारीक नजर वाले संपादकीय की सफलता है। जो समीक्षा के साथ इतिहास और भविष्य की ओर भी इशारा कर रहा है । आभार । बहरहाल देखती हूँ फिल्म ।
इस फ़िल्म की तारीफ़ बहुत सुनी है किंतु देख अभी तक नहीं पाई। आपकी समीक्षा पढ़कर लग रहा है, सचमुच अच्छी होगी । फ़िल्म के हर पहलू पर और छोटे- बड़े सभी कलाकारों की भूमिका उल्लेख के साथ फिल्म पर बात की है; साथ ही नई जानकारी भी उपलब्ध कराई है।
हार्दिक आभार।
मुझे देखनी ही है यह फिल्म
एक गहन सम्यक् समीक्षा ! राजनीतिक दांव पेंचों की सही पड़ताल और अभिनय कौशल पर विशेष टिप्पणी इस नोट्स को महत्वपूर्ण बनाता है । बहुत बढ़िया !!
– रूपा सिंह
आपका संपादकीय भी धुरंधर हैं, फिल्म में सभी किरदारों ने जो ऐक्टिंग की है, उसका बिल्कुल सजीव और नाटकीयता से दूर होना फिल्म को अन्य बॉलीवुड फिल्मों से अलग स्थापित करती है।