भारतीय संसद का मानसून सत्र हंगामों की भेंट चढ़ गया। कोई नई बात नहीं हुई। पिछले कुछ वर्षों से हर सत्र में यही होता है। किसी न किसी मुद्दे को लेकर विपक्ष संसद में नारेबाज़ी करता है; बैनर लेकर खड़ा हो जाता है; संसद के ‘वेल’ में इकट्ठा हो जाता है, और बिल के पुर्ज़े-पुर्ज़े करके गृहमंत्री के मुँह पर फेंकता है। भारत की संसद का यह दृश्य भारतीयों के लिए वैश्विक स्तर पर शर्म का मुद्दा है। विदेश में लोग सवाल करते हैं, कि जिस देश के सांसद, संसद में गुंडागर्दी करते हैं, तो उस देश के प्रवासियों से क्या उम्मीद की जा सकती है? हम कभी ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ कॉमंस या हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में इस प्रकार के व्यवहार की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
भारतीय लोकसभा के 543 सदस्य हैं, तो राज्यसभा के 245 सदस्य, अर्थात कुल मिलाकर 788 सांसद की ज़िम्मेदारी है कि वे देश की शासन व्यवस्था को चलाएं। वर्ष 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री श्री पवन बंसल ने संसद में सूचना देते हुए बताया था कि संसद को एक मिनट चलाने के लिए 2.5 लाख रुपए ख़र्च होते हैं; यानि कि एक घंटे के लिए 1.5 करोड़ रुपये करदाता की जेब से निकल जाते हैं। याद रहे कि ये आंकड़े 2012 के हैं। 13 साल में यह राशि कई गुना बढ़ चुकी होगी।
जिस संस्था पर करदाता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता हो, उसके सदस्यों से कम से कम यह अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे ईमानदारी से अपना काम करें। उनका काम है- नये कानून बनाना और नियम एवं परंपरा के हिसाब से देश को चलाना। मगर हमारे सांसद न तो नियमों की परवाह करते हैं, और न हीपरंपराओं की। आज हर सांसद के लिए देश से अधिक महत्व अपनी पार्टी और उसकी जीत है। वोट बैंक की राजनीति ने तमाम राजनीतिक दलों में निराशाजनक स्थिति उत्पन्न कर दी है।
मानसून सत्र की समाप्ति पर लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने दर्दभरी आवाज़ में सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा, “जनप्रतिनिधि के रूप में हमारे आचरण और कार्यप्रणाली को पूरा देश देखता है। जनता की हमसे बड़ी उम्मीदे रहती हैं कि हम उनकी समस्याओं और व्यापक जनहित के मुद्दों पर, महत्वपूर्ण विधेयकों पर, संसद की मर्यादा के अनुरूप गंभीर और सार्थक चर्चा करें।”
“लोकसभा अथवा संसद परिसर में नारेबाज़ी करना, तख्तियाँ दिखाना और नियोजित गतिरोध, संसदीय मर्यादा को आहत करता है। इस सत्र में जिस प्रकार की भाषा और आचरण देखा गया, वह संसद की गरिमा के अनुकूल तो कदापि नहीं है । हम सभी का दायित्व है कि हम सदन में स्वस्थ परंपराओं के निर्माण में सहयोग करें। इस गरिमामयी सदन में हमें नारेबाज़ी और व्यवधान से बचते हुए गंभीर और सार्थक चर्चा को आगे बढ़ाना चाहिए। संसद सदस्य के रूप में हमें अपने कार्य और व्यवहार से देश और दुनिया के समक्ष एक आदर्श स्थापित करना चाहिए । सदन और संसद परिसर में हमारी भाषा सदैव संयमित और मर्यादित होनी चाहिए।”
“सहमति और असहमति होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु हमारा सामूहिक प्रयास होना चाहिए कि सदन गरिमा, मर्यादा और शालीनता के साथ चले। हमें विचार करना होगा कि हम देश के नागरिकों को देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के माध्यम से क्या संदेश दे रहे हैं। मुझे विश्वास है कि इस विषय पर सभी राजनीतिक दल और माननीय सदस्य गंभीर विचार और आत्म-मंथन करेंगे।”
बशीर बद्र का एक शेर है कि ‘दुश्मनीजमकरकरो, लेकिनयेगुंजाईशरहे/जबकभीहमदोस्तहोजाएँ, तोशर्मिंदानहों’। मगर इस बार विपक्षी नेताओं ने दुश्मनी इतनी बढ़ा दी कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा आयोजित चाय-पार्टी का भी बहिष्कार कर दिया। जब पुराने भारतीय नेताओं की गरिमा को स्मरण करते हैं, तो आज के सांसद उथले और अशिष्ट प्रतीत होते हैं।
मानसून सत्र में लोकसभा सांसदों को देशहित के बारे में 120 घंटे चर्चा करनी थी। भारत के ज़िम्मेदार नेताओं ने उसमें से केवल 37 घंटे काम किए, और बाक़ी के 83 घंटे नारे लगाए, बहिष्कार किया और संसद के मामलों को सड़कों तक ले गए। लोकसभा में कुल 31 प्रतिशत काम ही हो पाया, उसमें से भी अधिकांश समय ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर खर्च हो गया।
वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा का प्रदर्शन लोकसभा से थोड़ा बेहतर रहा, जहाँ 120 घंटों के निर्धारित कार्यकाल में सांसदों ने 47 घंटे काम करके लोकसभा से बढ़त बना ली। किंतु राज्यसभा सांसदों ने भी अपने हितों के लिए हंगामा करते हुए देशहित के 73 घंटे नष्ट कर दिए। परिणामस्वरूप, यहाँ भी केवल 38 प्रतिशत कामकाज ही हो सका, जबकि शेष 62 प्रतिशत समय नारेबाज़ी और हंगामों की भेंट चढ़ गया।
सांसदों को अब जवाबदेह होना पड़ेगा। उन्हें यह बताना होगा कि संसद के मानसून सत्र में उन्होंने वास्तव में क्या किया। लोकसभा में 83 घंटे की नारेबाज़ी और बहिष्कार से आम नागरिकों के 124 करोड़ 50 लाख रुपए बर्बाद कर दिए गए, वहीं राज्यसभा में 73 घंटे बर्बाद करके करदाताओं के 80 करोड़ रुपये स्वाहा कर दिए गए। इसका सीधा अर्थ यह है कि दोनों सदनों ने मिलकर कुल 204 करोड़ 50 लाख रुपए नारेबाज़ी और हंगामों की भेंट चढ़ा दिए। अब सांसदों को अपने इस आचरण का औचित्य आम जनता के सामने स्पष्ट करना होगा।
बेशर्मी के साथ दांत निपोर कर जनता का पैसा बर्बाद करने वाले सांसदों में एक निर्दलीय सांसद ऐसा भी है, जिसके मन में करदाता के पैसों को लेकर कुछ दर्द मौजूद है। इनका नाम है- उमेशभाई बाबुभाई पटेल और ये दमन और दीव के सांसद हैं। उमेशभाई बाबुभाई पटेल ने सांसदों के वेतन में कटौती की माँग करते हुए संसद परिसर में प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि सदन में कामकाज न होने की वजह से जो पैसा बर्बादहुआ, उसे सांसदों की पगार से वसूला जाना चाहिए। उमेश पटेल ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से देश की जनता से माफ़ी माँगने की अपील की है।
दुःख तो इस बात का है कि जो 12 विधेयक लोकसभा या राज्यसभा में पारित हो सके, उन पर कोई बहस नहीं हुई… मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुई… बस शोरगुल के बीच ध्वनि मत से वे विधेयक पारित हो गए। लंदन में जब पार्लियामेंट का सेशन चल रहा होता है, तो उसे देखने के लिए पर्यटक भी पास लेकर पहुँच जाते हैं। मुझे सोच कर डर लगता है कि यदि कोई विदेशी भारत की संसद की कार्यवाही देखने के लिए लोकसभा या राज्यसभा की दर्शक दीर्घा में पहुँच जाए, तो वह अपने मन में भारत के बारे में कैसी राय लेकर लौटेगा।
यह सोच कर हैरानी होती है कि भारतीय सांसदों को इस बात का भी कोई ख़ौफ़ नहीं है कि जनता उनके बारे में क्या सोचती होगी… समय आ गया है कि भारतीय सांसदों- सत्ता एवं विपक्ष को संसद में परिपक्व व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाए। हम तो यह भी नहीं कह सकते कि ऐसा कानून बनाया जाए, कि संसद में नारे लगाने और हंगामा करने वाले सांसदों का चुनाव निरस्त कर दिया जाए। मगर जब कानून बनाने वाले ही कानून की धज्जियाँ उड़ाने में आनंद की अनुभूति करें, तो कानून बनाएगा कौन? कहीं एक कहावत पढ़ी थी… “ बाड़ लगाई खेत को बाड़ खेत को खाए / राजा ही चोरी करे नियाव कोन चुकाए।”
सभी भारतवासियों और विशेष रूप से मिडिल क्लास के आक्रोश को बयां करता ,यह संपादकीय आज विरल बन गया है। विरल इसलिए कि मीडिया ने भारत में इस ख़बर को वायरल होने ही नहीं दिया।कभी कुत्तों का मुद्दा तो कभी थप्पड़ का और भी बहुत कुछ।
सरकारी कामकाज का नियम है नो वर्क नो पे यानी काम नहीं तो दाम यानी पगार नहीं,,,इस गोल्डन रूल को लागू करने का मौका ,ईश्वर ने हमें भी दिया था और हमारी रीढ़ की हड्डी की अग्नि परीक्षा हुई और ईश्वर और गुरु ने हमें शिवी और दधीचि सी दृढ़ता और सार्थकता दी।
इन सांसद महोदय को कोटि कोटि प्रणाम।
हमारा राजनैतिक सिस्टम अब लगता है कि किसी संकट की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।जब चाहा अपनी सैलरी बढ़ा ली बस एक प्रस्तावक और मेजें ही तो चंद सेकंड को थपथपानी हैं।इसमें कौन सा सांस फूलना या मेहनत है और जनता की गाढ़ी कमाई और मलाई जेब में ,ताउम्र।
काश ये तालियां या थपथपाहट,सैलरी त्यागने कम करने या नो वर्क नो पे के लागू करने पर ही ध्वनित होतीं।
संपादक महोदय और पत्रिका परिवार को दिल से दुआ और बधाई।
खैर बात संपादकीय की।इन सांसद महोदय को
प्रिय भाई सूर्य कांत जी, आपने सही कहा है कि सांसद केवल एक बात पर एकमत हो पाते हैं – अपनी पगार और भत्ते बढ़ाना। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
सादर नमस्कार आदरणीय सर…
अत्यंत महत्वपूर्ण विषय.. आप विदेश में रहते हुए भी कई ऐसे विषयों पर निपक्ष व निडर लिख जाते हैं.. पर यहाँ की जनता सबकुछ सामने देखकर भी मौन रहती है…कानून..नियम..सुप्रीम कोर्ट …न्यायाधीश…. ये सभी केवल शब्द हैं…. अर्थहीन भी… वास्तवमें शिक्षित हो या अल्प शिक्षित.. दोनों एक जैसा व्यवहार करते हैं… गरिमा मर्यादा जैसे शब्द भी उनके लिए मृतप्राय हैं….
संपादकीय पढ़ने के पश्चात् मेरा पाठक-मन सदैव
प्रश्नों के वलय में रहता है….
भारतीय संसद को लेकर सांसद की चिंता भारतीय नागरिकों की चिंता है। खासकर विधेयकों पर चर्चा न होना दायित्व से मुकरना है।विपक्ष को आलोचना, संशोधन और विकल्प देना चाहिए।
आपके संपादकीय अलग कोण लिए होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादक वरिष्ठ पत्रकार भाई तेजेंद्र शर्मा अपने संपादकीय में अक्सर उन विषयों को भी उठाते हैं जो महत्वपूर्ण होते हुए भी निहित स्वार्थों के कारण नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। तो कभी – कभी जिन पर क्षणिक संज्ञान लेकर उन्हें विस्मित कर दिया जाता है। यह कहकर इतिश्री कर ली जाती है कि यह तो अमुक व्यक्ति सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए ऐसा कर रहा है, कह रहा है, दिख रहा है, दिखा रहा है आदि-आदि।
निर्दलीय सांसद उमेश भाईबाबु भाई पटेल ने संसद में गैरजिम्मेदाराना आचरण करनेवालों, संसद में कोई विधाई कामकाज न होने तथा पूरा समय होहल्ला में निकल जाने पर चिंता करते हुए संसद चलाने में खर्च हुए जनता के धन की भरपाई को सांसदों से वसूलने की माँग की है। उनकी यह मांग लोकतंत्र की मूल आत्मा का आर्तनाद है, उच्छवास हैं…
मगर उनकी यह आवाज कितनी दूर तक जाएगी, कहना मुश्किल है।
कभी सुना था– दिल्ली ऊँचा सुनती है…
भारतीय संसद का वर्तमान स्वरूप जिस तरह गैर जिम्मेदाराना देखने को मिल रहा है उससे एक बात तो पूरी तरह से साफ है देश की संसद में बैठे हुए लोग जनता के धन के दुरुपयोग की चिंता किए बगैर अपने निहित स्वार्थों के लिए, ओछी दलगत राजनीति के लिए अलोकतांत्रिक रवैया अपनाते रहते हैं। वास्तव में देश की जनता के साथ यह एक क्रूर मजाक है।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी संसद में संसद सदस्यों द्वारा किये जा रहे असंसदीय आचरण बिना कामकाज के समय की बर्बादी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सभी देशवासियों का आह्वान करता बढ़िया संपादकीय।
डॉ० रामशंकर भारती
भाई रामशंकर भारती जी, आपने संपादकीय में शामिल तमाम मुद्दों का संज्ञान लिया है। गैर-ज़िम्मेदाराना आचरण एवं लोकतांत्रिक मूल्यों पर चिन्ता जताई है। संपादकीय के समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।
‘नक्कारखाने में बजी एक छोटी सी तूती’ की आवाज को अपने संपादकीय का विषय बनाने के लिए संपादक जी आपको कोटिश: बधाइयां। लेकिन यह लड़ाई ‘दिए और तूफान की है’! संसद की कार्यवाही में बाधाउपस्थित करने वाले सांसदों को अवश्य अनुशासनहीनता का दोषी माना जाए ना चाहिए और उन्हें भविष्य में कम से कम 2 वर्ष तक किसी भी चुनाव में खड़े होने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ईमानदार करदाता अपने को छला हुआ तब अनुभव करता है जब सरकार उसकी खून पसीने की कमाई से मुक्तखोरी को उत्तरबढ़ावा देती है, चुने हुए सांसदों का वेतन और भत्ते का लाभ लेते हुए काम न करना भी मुफ़्त खोरी का ही एक रूप है।
श्री उमेश जी को संपादकीय के माध्यम से सम्मानित करने के लिए एक बार फिर से बधाइयां।
सरोजिनी जी, उमेश पटेल जैसे सांसद हमें और भी चाहियें। सभी सांसदों को अपनी और अपने दल की चिन्ता है। देश के बारे में कोई नहीं सोच रहा। इन मुफ़्तखोरों को सबक सिखाने का वक्त आ गया है।
तेजेंद्र जी, आदर्श स्थिति तो वही होगी जब सारे सांसद उमेश जी जैसे ही हो परंतु ऐसी स्थिति तो मात्र कल्पना में ही हो सकती है, हां हम सभी की प्रार्थना यही होनी चाहिए कि उमेश जी की ‘प्रजाति’ के सांसदों का “वंशवृद्धि ‘ हो जैसे अंग्रेजी में रहते हैं ‘मे देयर ड्राइव इंक्रीज’ आमीन।
पुरवाई के इस बार के संपादकीय- ‘ भारतीय संसद का एकमात्र जिम्मेदार सांसद’ में भारतीय संसद के सांसदों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। ये आपका कथन सही है कि ‘सभी सांसदों को परिपक्व व्यवहार के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।’ इससे उनके आचरणों में सुधार होगा और वे जनता की समस्याओं को गंभीरता से वहां उठाएंगे। जनता की भलाई के लिए ही तो संसद का निर्माण हुआ है कि यहां सभी सांसद मिल बैठकर जनता के हित की बात करें। आप और हम जैसे सभी संवेदनशील लोग उनकी हरकतों से शर्मिन्दा होते हैं। होना भी चाहिए। जनता को भी चाहिए कि उनसे पूछे कि हमारे लिए आपने वहां क्या काम किया? ब्रिटेन के हाउस वाली बात वाकई में प्रशंसनीय है। यह जानकर और अच्छा लगा कि वहां के आमजन पास लेकर हाउस की कार्यवाही को देख सुन सकते है।
लेकिन भारत को उस स्थिति तक पहुंचने में समय लगेगा। देखते हैं कब तक हम उस स्थिति में आ पाते हैं।
भारतीय पक्ष और विपक्ष आपस में शत्रुतापूर्ण व्यवहार ही कर रहे हैं जबकि ऐसा पहले देखने को नहीं मिलता था। खासकर कांग्रेस और भाजपा के पहली पंक्ति के नेता एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते हैं। इसके कई कारण हैं पर उन कारणों में जाना मैं ठीक नहीं समझता हूं।
आपने संपादकीय में मानसून सत्र के खर्च के आंकड़े साझा किए हैं। 205 करोड़ के लगभग के खर्च का आंकड़ा काफी बड़ा है। निर्दलीय सांसद उमेश भाई बाबू भाई पटेल ने इस खर्च को सांसदों के वेतन से काटने की बात कही है। उनका कहना सही भी है कि काम नहीं होने दिया है तो उस पैसे को वसूला जाए। उनकी इस संवेदनशीलता को नमन करता हूं। लेकिन दुर्भाग्य कि उनकी संवेदनशीलता उस शोर में दबकर रह जाएगी। पैसा वसूली नहीं होगी।
सांसदों के वेतन बढ़ने वाली बात पर मैंने कभी हंगामा होते हुए नहीं देखा है। सभी सुई के छेद से होकर निकल जाते हैं। पेंशन भी जमकर लेते हैं। कर्मचारियों की पेंशन देने के लिए बुरा मुंह बनाते हैं। कहते हैं कि पेंशन देने से अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। पूंजीपतियों ने बैंक खाली कर दिए। लोन लेकर अपने को दिवालिया घोषित कर लेते हैं। और जनता की गाढ़ी कमाई को यूं ही डकार जाते हैं।खैर….
आपके इस संपादकीय ने ये तो स्पष्ट कर दिया है कि सांसदों का संसद में कार्य व्यवहार ठीक नहीं है। इसमें सुधार करना होगा। ताकि हम अनुशासन और गरिमा में विश्व के सामने अपनी छवि ठीक कर सकें। संसार के लोग हमें सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखते है और उसकी प्रशंसा करते है। इसलिए हमें चाहिए कि हम इसमें भी सुधार करें और देश के सम्मान को बढ़ाएं।
मैं तो कहता हूं कि इस संपादकीय को हर सांसद द्वारा पढ़ा जाना चाहिए।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आपने तो संपादकीय को पूरी तरह से खंगाल कर हर मुद्दे पर अपनी बात रखी है। आपने कहा है कि – इस संपादकीय को हर सांसद द्वारा पढ़ा जाना चाहिये -, यह पुरवाई पत्रिका के लिये आत्याधिक महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।
उमेशभाई बाबूभाई पटेल को मैंने भी सुना था. उनकी व्यथा हर उस सांसद की है जो अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए कुछ करना या आवाज़ उठाना चाहता है। उनकी व्यथा भारत के प्रत्येक नागरिक की भी व्यथा है। एक समय था ज़ब विपक्ष के नेता अटल बिहारी बाजपेई या सुषमा स्वराज बोलती थीं तो सारा देश सुनता था, अब विपक्ष का कोई नेता ऐसा नहीं है जो जनता की आवाज उठा सके। अब तो अपशब्दों की भरमार है। ताज़ा उदाहरण है नारा -वोट चोर गद्दी छोड़।
जनता के मत का अनादर उचित नहीं है, शायद इन्हें इतना भी भान नहीं। जनता ही उन्हें गद्दी पर बिठाती है तथा वही उतारती भी है। प्रवासी भारतीय तो अपने देश के सांसदों की प्रवृति पर शर्मिंदा होंगे ही, प्रबुद्ध भारतीय भी लोकतंत्र में आई इस गिरावट पर शर्मिंदा हैं।
लंदन में रहते हुए भी भारतीय राजनीति पर पैनी नजर आपके देश प्रेम का प्रतीक है। उमेशभाई बाबू भाई पटेल जैसे सांसद की ओर
ध्यान आकर्षित करने वाले संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी, लंदन में रह कर जब मैं भारत की ओर देखता हूं, तो मेरी दृष्टि किसी राजनीतिक रंग से रंगी हुई नहीं होती। मैं पूरी तरह से भारत को स्नेह करने वाले लोगों की सुनता और पढ़ता हूं। आपको संपादकीय पसंद आया इसके लिये हार्दिक आभार।
लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ पत्रकारिता को किसने कहा यह तो पता नहीं पर क्यों कहा हमारी प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवाई के संपादक महोदय के सूक्ष्म ही नहीं स्थूल विषयों पर भी निर्भीकता से चलायी गयी लेखनी से समझ आता है l सामान्य भारतीय( आम आदमी ) करदाता की अव्यक्त टीस को आपने इस संपादकीय में जो अभिव्यक्ति दी है वो पैनी पत्रकारिता की ही नहीं .. दूर रह कर भी आप की अपने राष्ट्र की खंडित हो रही संसदीय गरिमा के प्रति चिंता और असुरक्षा की भावना का भी प्रमाण है l बेहद पीड़ादायी होता है हर माह आपकी तनख्वाह मे से एक मोटी रकम का आयकर के नाम पर कट जाना और उसके बाद भी आपके दैनिक जीवन के उपयोग की हर खास / आम चीज पर टैक्स भरना l ऐसे में उस टैक्स की बर्बादी के मंजर इस तरह देखना लोकतंत्र में आम लोगों की आस्था को चरमरा देता हैं lसंसद का मॉनसून सत्र हंगामे के साथ खत्म हुआ। यह सत्र निराशाजनक रहा, क्योंकि सरकार और विपक्ष में टकराव हुआ। राज्यसभा में केवल 41.15 घंटे और लोकसभा में 37 घंटे काम हुआ। कई सवाल अधूरे रहे, जिनका जवाब देश जानना चाहता था। संसद के बीच प्रॉडक्टिविटी के लिहाज से यह सेशन बेहद निराशाजनक कहा जाएगा। सरकार और विपक्ष के बीच टकराव के कारण दोनों सदन लगातार बाधित रहे। यहां दोनों पक्षों से ज्यादा समझदारी और संतुलित नजरिये की अपेक्षा थी। आंकड़े ही इस सत्र की पूरी कहानी बता देते हैं। राज्यसभा में केवल 41.15 घंटे काम हो पाया और लोकसभा में 37 घंटे। लोकसभा की कार्यवाही के लिए 419 तारांकित प्रश्न शामिल किए गए थे और इनमें से महज 55 का मौखिक उत्तर मिल सका।सत्र शुरू होने के पहले कार्य मंत्रणा समिति में सरकार और विपक्ष के बीच कुछ मुद्दों पर चर्चा की सहमति बनी थी। लेकिन, सत्र शुरू होने के साथ ही उसे भुला दिया गया। संसदीय परंपरा में विरोध भी अधिकार है, लेकिन इसकी वजह से सदन की गरिमा और उसके कामकाज पर असर नहीं पड़ना चाहिए। दुर्भाग्य से देश ने इस सत्र में यही देखा- वे जरूरी मुद्दे जिनका जवाब देश जानना चाहता था, शोर शराबे की भेंट चढ़ते रहे। यह सेशन ऐसे वक्त हो रहा था, जब भारत नई चुनौतियों से गुजर रहा है। विदेश और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर हालात तेजी से करवट ले रहे हैं। ऐसे में और भी अहम हो जाता है कि संसद में इस पर सार्थक चर्चा होती और वाद-विवाद से रास्ता निकाला जाता। चिंताजनक बात यह है कि संसदीय कार्यवाही का ऐसा अंजाम अब आम हो चुका है। पिछले शीत सत्र में ही लोकसभा के 65 से ज्यादा घंटे बर्बाद हुए थे। एक अपवाद बजट सत्र को माना जा सकता है, जब राज्यसभा की प्रॉडक्टविटी 119%, जबकि लोकसभा की 118% रही। जब संपादक महोदय आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का यह बेहद चौंकाने वाला तथ्य पढ़ा कि संसद सत्र को चलाने में हर मिनट ढाई लाख रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं तो mere भी कान लाल हो गए ..ऐसे में सदन जब काम नहीं करता, तो जनता की गाढ़ी कमाई के इन रुपयों के साथ देश का बेहद कीमती समय भी जाया हो जाता है।हाल में सरकार और विपक्ष के रिश्तों और संवाद में जो गिरावट आई है, मॉनसून सत्र उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकतंत्र में संवाद और आपसी सम्मान के बिना काम नहीं चलता। विरोध जरूरी है, पर मुद्दों पर और सकारात्मक उद्देश्य के साथ।…. आम आदमी के प्रश्नों को शब्द देता बेहद अनिवार्य उपयोगी और सतर्क संपादकीय… अनवरत लिखें संपादक महोदय … यशस्वी हों l
किरण जी आपने आंकड़ों को बढ़िया ढंग से खंगाला है। करदाता द्वारा भरे गये टैक्स का कैसे दुरुपयोग किया जाता है, भारतीय संसद उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। संपादकीय पर टिप्पणी के लिये विशेष धन्यवाद।
बिल्कुल सही बात लिखा आपने बड़ी शर्म आती है मुझे तो संसद की बहस सुनने जाओ तो सिर्फ हंगामा के कुछ नहीं होता।
बिल्कुल सही लिखा अपनी बधाई आप निडर होकर लगते हैं यह बहुत बड़ी बात है।
आ. तेजेंद्र जी, आपके सम्पादकीय से पूर्णतया सहमत हूँ। सबसे पहले तो आपको साधुवाद कि विदेश में रहते हुए भी आप अपने देश की हर छोटी-बड़ी समस्या से हमें अवगत कराते हैं।वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, पहले भी था, लेकिन संसद के बाहर सांसद मित्रता के भाव से मिला करते थे। आज के सांसदों का आचरण देखकर शर्मिंदगी महसूस होती है।पक्ष को अपना शत्रु समझने लगे हैं।उन्हें न तो देश की न ही जनता की परवाह है।करदाताओं विशेषकर मध्यम वर्ग के पैसों को लूट रहे हैं।निजी स्वार्थ और कुर्सी की भूख उन्हें गर्त में लिए जा रही है।
मैंने पिछले वर्ष कैनेडा प्रवास के दौरान ओटावा में आधे घंटे के लिए पार्लियामेंट में पक्ष और विपक्ष के सांसद को अपना तर्क देते सुना था। कितनी शालीनता से उन्होंने अपनी बात कही।हमारे सांसद क्या सही ढंग से अपनी बात नहीं कह सकते।
आपने बिलकुल सही कहा है कि भारतीय सांसदों, सत्ता और विपक्ष को संसद में परिपक्व व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाए।उनके आचरण के विरुध्द क़ानून बनाना कठिन है, लेकिन असम्भव नहीं।
कहावत है -“ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, पर यह भी सच है कि कभी-कभी अकेला चना भी ऐसा भाड़ फोड़ता है कि वह खिल-खिल जाता है।” निराशा में भी आशा की किरण दिखाई देती है। यह जानकर खुशी हुई कि निर्दलीय सांसद उमेशभाई बाबुभाई पटेल के मन में करदाताओं के पैसे को लेकर कुछ तो दर्द है।एक दीपक कई दीपकों को रौशन कर देता है।ऐसे ही हम भी आशा कर सकते हैं कि उनके मन का दर्द औरों को भी द्रवित कर दे।
कुछ भी हो, कैसे भी हो, सांसदों को अपने आचरण, अपने व्यवहार को बदलना तो पड़ेगा, नहीं तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद मजाक बनकर रह जाएगी
सार्थक,सटीक समसामयिक सम्पादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
सुदर्शन जी, आपका कहना है कि एक अकेला शख़्स बहुत से परिवर्तन ला सकता है। आपने सटीक टिप्पणी की है कि – “कुछ भी हो, कैसे भी हो, सांसदों को अपने आचरण, अपने व्यवहार को बदलना तो पड़ेगा, नहीं तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद मजाक बनकर रह जाएगी।”
सबसे पहले मैं संपादक महोदय को।साधुवाद देना चाहूंगा जो लंदन में रहते हुए तमाम अपने देश भारत की संसद की बाते बड़े ही।बारीकी।और बेबाकी।से रखते है। सांसद उमेश पटेल जी का त हे दिल से स्वागत है जिन्होंने भारतीय जनता के बारे में सोचा।आज भी भारतीय संसद में चोर लुटेरे बैठे है।पूरे भारतीय महाद्वीप में कमोवेश हर देश में एक ही हालत है।चाहे भारत हो, पाकिस्तान हो, बंगला देश हो,नेपाल हो श्री लंका स्थिति और राजनेता द्वारा भद्ताचार चरम पर है एक।जन क्रांति पूरे महाद्वीप के देश में जरूरत है
संपादक महोदय का आभार जो।ज्वलंत।मुद्दों को आपने उजागर किया वो काबिले तारीफ है
अपने ये झुठलाया दिया
हम तो चले परदेश हम परदेशी हो गए।
हमें तो इसी मिट्टी में ही मिलना है
सैल्यूट तेजेन्द्र शर्मा साहब
आपके संपादकीय ऐसे ही मुद्दों के चयन के कारण विशेष होते हैं। पार्लियामेंट यानि उल्लुओं का एक समूह – आखिर इनसे और क्या अपेक्षा की जा सकती है? भारत में तो लगता है इन्हीं के आचरण को देखकर ही उल्लुओं को मूर्ख माना गया है। इन दिनों तो झूठ फरेब का ऐसे विमर्श का दौर जारी है कि राजनीति का बेहद ही अशालीन रूप दिख रहा है।
इस सप्ताह के अपने संपादकीय में आप हमारे भारतीय संसद में अनुशासन की अनुपस्थिति का उल्लेख करते हुए उन निर्दलीय सांसद,उमेशभाई बाबुभाई पटेल के उस प्रस्ताव की सराहना करते हैं जिस के अंतर्गत सांसदों के वेतन में से उन सभी घंटों को बर्बाद करने का हर्जाना वसूल करना चाहिए जिन के उत्पाती व्यवहार के कारण संसद की कार्रवाई को बार-बार स्थगित करना पड़ता है।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारा संसद सुचारु रूप से अपने सत्र के संपूर्ण घंटों का सम्पूरित लाभ नहीं उठा पा रहा।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आदरणीय दीपक जी, आपने निर्दलीय सांसद – श्री उमेश भाई बाबुभाई पटेल के प्रस्ताव की सराहना करते हुए अपनी संसद के मामले में भी सटीक टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।
संपादक महोदय, सादर प्रणाम
खरी-खरी कही है आपने.
भारतीय राजनीति का अंधकार गहराता जा रहा है। सत्ता को किसी भी तरह से पा लेने की कोशिशें चलती रहती हैं। स्वार्थपरता केंद्र में है।
भारत के समस्त मतदाताओं की ओर से आपने यह अक्षय प्रश्न उठाया है। एकमात्र सांसद की आवाज़ इस गहन अंधकार में मशाल की तरह प्रज्वलित है.
अपने संपादकीय धर्म का निर्वाह करते हुए पूर्व की भांति अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे को तर्क और तथ्य के साथ प्रस्तुत किया है, आपको हार्दिक बधाई.
तेजेन्द्र भाई: 240 करोड़ 50 लाख रुपयों जो नारेबाज़ी और गुण्डागर्दी में बर्बाद हुए हैं उसका कारण ढ़ूण्डने के लिय़ अधिक दूर जाने की ज़रूरत नहीं। यह सब वो लोग हैं जिन के मुँह ख़ून लगा हुआ है। सत्ता हाथ से निकल गई है और उसको जायज़ या नाजायज़ तरीकों से छीनने में न तो इन्हें कोई शरम है और न ही कोई ग़ैरत। देश जाए भाड़ में। इस सब के बावजूद भी देश में अभी भी उमेशभाई बाबुभाई जैसे चरित्रवान हैं जिन्हें देश की फ़िकर है।
रहा इन सांसदों से जवाबदेही का सवाल? सो वो भी कर के देख लो। यह बेशर्म लोग जवाबदेही तो क्या देंगे। उलटा उसकी के बजाय सांसद में जो थोड़ा बहुत काम हो रहा है उसको भी नहीं होने देंगे। इन लोगों को तो इतनी तमीज़ भी नहीं है कि विपक्ष की ज़िम्मेवारियों को समझ सकें। एक timely मुद्दा उठाकर जन्ता को जागर करने के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई, आपने भारत के सांसदों के चेहरे बेनकाब करते हुए कहा है कि – ये बेशर्म लोग जवाबदेही तो क्या देंगे। उलटा उसकी के बजाय सांसद में जो थोड़ा बहुत काम हो रहा है उसको भी नहीं होने देंगे। – आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा होती है सर।
संपादकीय के शीर्षक ने जिज्ञासा पैदा की और खुशी भी हुई कि चलो, कोई एक सांसद तो अच्छा और जिम्मेदार है। आजकल नेताओं की श्रेणी में ईमानदार और जिम्मेदार लोग जरा मुश्किल से दिखाई देते हैं। उत्सुकता-वश जब आगे बढ़े तो गंभीरता हावी होती चली गई।
अब की बार के संपादकीय का विषय बहुत गंभीर और चिंतनीय है।
हमें पता था कि पैसा खर्च तो होता है पर इतना पैसा खर्च होता है… संसद की बैठक में एक दिन के हिसाब से… यह पता नहीं था सच कहें तो जानने की कोशिश भी नहीं की थी… और इतने गंभीर विषय पर इतनी अगंभीरता… इतनी लापरवाही… इतनी अदूरदर्शिता…
आपने बिल्कुल सही कहा,निश्चित रूप से जिस संस्था में कर दाता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता हो उनसे ईमानदारी की विश्वसनीयता अपेक्षित रहती है।
ये सभी अपनी पार्टी व पार्टी के हित तक सीमित हो कर रह गये। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सत्र की समाप्ति पर जो भी कुछ कहा उसमें विषय के प्रति उनका दुख वह उनकी चिंता पूरी तरह सही है। काबिल-ए-गौर है और विचारणीय भी।
सदन की महत्ता को समझते हुए उसके गौरव को बनाए रखना आवश्यक है। पर पता नहीं यह बात सभी को कब समझ में आएगी!
वैचारिक मतभेद विषय गत हो सकते हैं पर परस्पर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिये। पद की गरिमा का ध्यान रखना जरूरी है।
इस बार के संपादकीय ने बहुत ही ज्यादा दुखी किया।
सारी कार्यवाही देश- दुनिया के लोग देखते हैं। यह देश के सम्मान का विषय है।वे यह नहीं सोचते कि जो देख रहे हैं उन तक क्या संदेश जा रहा है?
124 करोड़ 50 लाख रुपए कम नहीं होते। अगर यह पैसे जनता के हित के लिये उपयोग होते हैं तो न जाने कितने घर बस जाते! यह कोई छोटा-मोटा नुकसान नहीं है और ना ही ऐसा जिसे अनदेखा किया जाए।
कितनी अजीब बात है कि देश की जनता कोरोना के बाद से कर्ज के बोझ से दबी जा रही है। आत्महत्याएँ कर रहे हैं लोग। पर शासकों को इसकी परवाह नहीं। वाकई जिसका दुख उसी का होता है। जिनका पेट भरा होता है वह भूख की तकलीफ को नहीं समझ सकते।
इतना पैसा अगर देश के विकास में लगा होता तो कितना कुछ हो सकता था। कुल मिलाकर वक्त और पैसे दोनों की बर्बादी हुई।
दमन-दीव के सांसद उमेश भाई बाबू भाई पटेल की माँग जायज है। यह जरूरी भी है शायद तभी इन्हें समझ में आए !!
विश्वास नहीं होता कि आज के समय में सदन में कोई एक व्यक्ति इतनी ईमानदार सोच रखने वाला भी है। सांसदों की पगार कटनी ही चाहिये। ऐसे व्यक्तित्व को प्रणाम। काश सभी सांसद इतने गंभीर हो पाएँ।
आपने ब्रिटेन की संसद के बारे में बताया। यहाँ अगर ऐसा हो तो खुले आम ही देश की इज्जत की धज्जियाँ उड़ जाएँगी।
पिछले चुनावों मैं चयनित होने के बाद किये गए कार्य व बर्ताव को देखकर ही अगले चुनाव में लड़ने की एंट्री होनी चाहिये। पर कहावत है- “अंधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह -चीन्ह कर देय”
संपादकीय को पढ़कर सच में बहुत ही अधिक दुख हुआ इसी को “अंधेर” कहते हैं।
अब तो यह विश्वास और दृढ़ हो गया कि देश को चलाने के लिए ऐसी योग्यता, ऐसी अर्हंताओं से युक्त, ऐसी परीक्षा पास करना आवश्यक कर दिया जाए, जो IAS, IPS के लेवल से भी ऊपर की हो। कैरेक्टर वेरिफिकेशन आवश्यक हो, जिस तरह हर छोटी या बड़ी शासकीय नौकरी के लिये आवश्यक होता है। हर विभाग के मंत्री के लिये आवश्यक हो कि वो अपने संदर्भित मंत्रित्व पद पर विषय विशेष योग्यता प्राप्त हो। इसके बाद ही किसी को भी चुनाव लड़ने का अधिकार मिले। चाहे सेना के स्तर का ना हो फिर भी उसके ही तरह काम में और समय के अनुरूप अनुशासित हो।
इतनी मेहनत करके बड़ी बड़ी पोस्ट पर काम करने वाले IAS और IPS ऑफिसर ऐसे सांसदों की रक्षा के लिए क्यों खड़े रहें… वह भी जय हिंद की सेल्यूट के साथ।
नौकरी के हर पद के लिये परीक्षाओं का एक निश्चित और निर्धारित मापदंड होता है। और साथ में होता है पुलिस वेरीफिकेशन। चरित्र प्रमाण पत्र! फिर नेताओं के लिए कुछ भी जरूरी क्यों नहीं है? देश चलाना क्या परिवार चलाने से अधिक उत्तरदायित्व-पूर्ण काम नहीं है? छोटा-मोटा काम है? जिसे हाथ में लकड़ी लेकर जानवरों की तरह हाँक दिया जाए!
पढ़ाई आजकल इतनी महंगी हो गई है कि स्कूल में पढ़ाने में ही माता-पिताओं की तनख्वाह आधी से ज्यादा लग जाती है। बच्चे लोन ले-लेकर पढ़ते हैं और उसके बाद भी नौकरी के लिए मारे- मारे घूमते हैं।
फिर देश चलाने के लिये देश के नेताओं के लिये इस तरह का कोई भी कानून क्यों नहीं है?
वैसे आपने जायज चिंता व्यक्त की है कि संविधान बनाने वाले भी यही हैं। फिर क्या किया जाए और कैसे किया जाए?
इस बार के संपादकीय ने काफी विचलित किया और दुख भी हुआ। बेहद-बेहद ज्वलंत, महत्वपूर्ण और विचार करने योग्य गंभीर विषय की जानकारी देने वाले विषय पर कलम चलाने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।
आपके संपादकीय को पढ़कर देश और दुनिया की जानकारियों से बहुत समृद्ध हो रहे हैं।
नीलिमा जी, आपने बहुत गहराई से संपादकीय पढ़ कर एक विस्तृत टिप्पणी की है। आपने लिखा है कि – आपके संपादकीय को पढ़कर देश और दुनिया की जानकारियों से बहुत समृद्ध हो रहे हैं। – यह तो पुरवाई के संपादक मंडल के लिये सच में गर्व की बात है कि आप जैसे सजग पाठक ऐसा सोचते हैं। काश भारत के सांसद इस संपादकीय के मर्म को समझ पाएं।
प्रिय भाई तेजेंद्र जी,
हमेशा की तरह एक तीखा लेकिन जरूरी, बहुत जरूरी संपादकीय। आपने कथित माननीयों के अशिष्ट और अमर्यादित आचरण को धज्जी-धज्जी उधेड़कर दिखाया है, और उन सभी लोगों की चिंताओं को उजागर किया है, जो रोज-रोज सांसदों के इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार को देखकर दुखी और क्षुब्ध होते हैं। कुल मिलाकर तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी इससे सवाल उठते हैं।
हिंदी के बड़े कवि हैं धूमिल। उन्होंने कभी लिखा था, *हमारी संसद तेली की वह घानी है, जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है।* मुझे लगता है, आज तो हालत यह है कि तेल नदारत, पूरा पानी है।
आपने उमेश भाई पटेल का बहुत अच्छा उदाहरण दिया। आखिर कोई तो है, जो सांसदों के इस भद्दे आचरण को देखकर शर्मिंदा हो रहा है, और ईमानदारी से सवाल खड़े कर रहा है। वही सवाल जो कल पूरा देश पूछेगा।
आदरणीय तेजेन्द्र भाई,
प्रणाम।
बहुत सुंदर सार्थक सारगर्भित और संवेदनशील संपादकीय के लिए अशेष साधुवाद बधाई।
सादर नमन आपकी लेखनी को और प्रबुद्ध चिंतन कौ।सचमुच भारतीय संसद पर इतनी बेबाकी से सच्ची बात कहना और उसका गहराई से अनुशीलन प्रस्तुत करना सराहनीय और साहसी कदम है।हम लोकसभा को लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं ।मंदिर में जन कल्याण की कामना की जाती है न कि आत्मप्रचार विवाद बहस.और नारेबाजी।अंतत: संसद का बहिष्कार। यहां.सार्थक निरर्थक कुछ भी कहा जा सकता है जनता की आवाज को दबाया जा सकता है या लोकतंत्र के नाम पर अनर्गल प्रलाप किया जाना यह किसने अधिकार दिया हमारे माननीय सांसदों को? संसद का बहिष्कार देश की आर्थिक व्यवस्था पर भी कुठाराघात है क्योंकि न कानून शांति से बनने दिया जाता है न उनका पालन ही किया जाता है। आपने अपने संपादकीय के माध्यम से लिखा है –जिस संस्था पर करदाता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता हो, उसके सदस्यों से कम से कम यह अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे ईमानदारी से अपना काम करें।
आपने सांसद उमेश भाई बाबूलालई पटेल का उदाहरण दिया है.जिन्हने जनता के हित में अपनी आवाज उठाई है,उनकी सराहना करती हूं ।संपादकीय में आपने लिखा–
संसद में एक निर्दलीय सांसद ऐसा भी है, जिसके मन में करदाता के पैसों को लेकर कुछ दर्द मौजूद है इनका नाम है– उमेशभाई बाबुभाई पटेल और ये दमन और दीव के सांसद हैं। उमेशभाई बाबुभाई पटेल ने सांसदों के वेतन में कटौती की माँग करते हुए संसद परिसर में प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि *सदन में कामकाज न होने की वजह से जो पैसा बरबाद हुआ, उसे सांसदों की पगार से वसूला जाना चाहिए*।भारतीय संसद की कार्यवाही पूरा.विश्व देखता.है।जिसकी अनियमितताओं और. हंगामेदार कार्यशैली से हम.क्या दिखा रहे हैं दुनिया को? इस संपादकीय के लिए बहुत बहुत बधाई आपको।काश सभी प्रेरित हो पाते।मैं जितना समझती.हूं राजनीति को ,आपके संपादकीय पढकर ही।आभार। यह प्रतिक्रिया भी एक लघु प्रयास है।धन्यवाद।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
बहुत ही बढ़िया विषय पर संपादकीय लिखा है आपने। देश में रहते हुए मेरे लिए ये एक खबर थी।
मुझे नहीं पता था ये सराहनीय बात।
चुन कर मोती लाने के लिए धन्यवाद आपका।
सभी भारतवासियों और विशेष रूप से मिडिल क्लास के आक्रोश को बयां करता ,यह संपादकीय आज विरल बन गया है। विरल इसलिए कि मीडिया ने भारत में इस ख़बर को वायरल होने ही नहीं दिया।कभी कुत्तों का मुद्दा तो कभी थप्पड़ का और भी बहुत कुछ।
सरकारी कामकाज का नियम है नो वर्क नो पे यानी काम नहीं तो दाम यानी पगार नहीं,,,इस गोल्डन रूल को लागू करने का मौका ,ईश्वर ने हमें भी दिया था और हमारी रीढ़ की हड्डी की अग्नि परीक्षा हुई और ईश्वर और गुरु ने हमें शिवी और दधीचि सी दृढ़ता और सार्थकता दी।
इन सांसद महोदय को कोटि कोटि प्रणाम।
हमारा राजनैतिक सिस्टम अब लगता है कि किसी संकट की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।जब चाहा अपनी सैलरी बढ़ा ली बस एक प्रस्तावक और मेजें ही तो चंद सेकंड को थपथपानी हैं।इसमें कौन सा सांस फूलना या मेहनत है और जनता की गाढ़ी कमाई और मलाई जेब में ,ताउम्र।
काश ये तालियां या थपथपाहट,सैलरी त्यागने कम करने या नो वर्क नो पे के लागू करने पर ही ध्वनित होतीं।
संपादक महोदय और पत्रिका परिवार को दिल से दुआ और बधाई।
खैर बात संपादकीय की।इन सांसद महोदय को
प्रिय भाई सूर्य कांत जी, आपने सही कहा है कि सांसद केवल एक बात पर एकमत हो पाते हैं – अपनी पगार और भत्ते बढ़ाना। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
सादर नमस्कार आदरणीय सर…
अत्यंत महत्वपूर्ण विषय.. आप विदेश में रहते हुए भी कई ऐसे विषयों पर निपक्ष व निडर लिख जाते हैं.. पर यहाँ की जनता सबकुछ सामने देखकर भी मौन रहती है…कानून..नियम..सुप्रीम कोर्ट …न्यायाधीश…. ये सभी केवल शब्द हैं…. अर्थहीन भी… वास्तवमें शिक्षित हो या अल्प शिक्षित.. दोनों एक जैसा व्यवहार करते हैं… गरिमा मर्यादा जैसे शब्द भी उनके लिए मृतप्राय हैं….
संपादकीय पढ़ने के पश्चात् मेरा पाठक-मन सदैव
प्रश्नों के वलय में रहता है….
साधुवाद
अनिमा जी, भारत में रहते हुए इस निडर टिप्पणी के लिये बधाई और शुभकामनाएं।
भारतीय संसद को लेकर सांसद की चिंता भारतीय नागरिकों की चिंता है। खासकर विधेयकों पर चर्चा न होना दायित्व से मुकरना है।विपक्ष को आलोचना, संशोधन और विकल्प देना चाहिए।
आपके संपादकीय अलग कोण लिए होते हैं।
सर जी, आपने संपादकीय को सभी कोणों से समझ कर टिप्पणी की। आपका दिल से शुक्रिया।
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादक वरिष्ठ पत्रकार भाई तेजेंद्र शर्मा अपने संपादकीय में अक्सर उन विषयों को भी उठाते हैं जो महत्वपूर्ण होते हुए भी निहित स्वार्थों के कारण नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। तो कभी – कभी जिन पर क्षणिक संज्ञान लेकर उन्हें विस्मित कर दिया जाता है। यह कहकर इतिश्री कर ली जाती है कि यह तो अमुक व्यक्ति सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए ऐसा कर रहा है, कह रहा है, दिख रहा है, दिखा रहा है आदि-आदि।
निर्दलीय सांसद उमेश भाईबाबु भाई पटेल ने संसद में गैरजिम्मेदाराना आचरण करनेवालों, संसद में कोई विधाई कामकाज न होने तथा पूरा समय होहल्ला में निकल जाने पर चिंता करते हुए संसद चलाने में खर्च हुए जनता के धन की भरपाई को सांसदों से वसूलने की माँग की है। उनकी यह मांग लोकतंत्र की मूल आत्मा का आर्तनाद है, उच्छवास हैं…
मगर उनकी यह आवाज कितनी दूर तक जाएगी, कहना मुश्किल है।
कभी सुना था– दिल्ली ऊँचा सुनती है…
भारतीय संसद का वर्तमान स्वरूप जिस तरह गैर जिम्मेदाराना देखने को मिल रहा है उससे एक बात तो पूरी तरह से साफ है देश की संसद में बैठे हुए लोग जनता के धन के दुरुपयोग की चिंता किए बगैर अपने निहित स्वार्थों के लिए, ओछी दलगत राजनीति के लिए अलोकतांत्रिक रवैया अपनाते रहते हैं। वास्तव में देश की जनता के साथ यह एक क्रूर मजाक है।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी संसद में संसद सदस्यों द्वारा किये जा रहे असंसदीय आचरण बिना कामकाज के समय की बर्बादी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सभी देशवासियों का आह्वान करता बढ़िया संपादकीय।
डॉ० रामशंकर भारती
भाई रामशंकर भारती जी, आपने संपादकीय में शामिल तमाम मुद्दों का संज्ञान लिया है। गैर-ज़िम्मेदाराना आचरण एवं लोकतांत्रिक मूल्यों पर चिन्ता जताई है। संपादकीय के समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।
‘नक्कारखाने में बजी एक छोटी सी तूती’ की आवाज को अपने संपादकीय का विषय बनाने के लिए संपादक जी आपको कोटिश: बधाइयां। लेकिन यह लड़ाई ‘दिए और तूफान की है’! संसद की कार्यवाही में बाधाउपस्थित करने वाले सांसदों को अवश्य अनुशासनहीनता का दोषी माना जाए ना चाहिए और उन्हें भविष्य में कम से कम 2 वर्ष तक किसी भी चुनाव में खड़े होने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ईमानदार करदाता अपने को छला हुआ तब अनुभव करता है जब सरकार उसकी खून पसीने की कमाई से मुक्तखोरी को उत्तरबढ़ावा देती है, चुने हुए सांसदों का वेतन और भत्ते का लाभ लेते हुए काम न करना भी मुफ़्त खोरी का ही एक रूप है।
श्री उमेश जी को संपादकीय के माध्यम से सम्मानित करने के लिए एक बार फिर से बधाइयां।
सरोजिनी जी, उमेश पटेल जैसे सांसद हमें और भी चाहियें। सभी सांसदों को अपनी और अपने दल की चिन्ता है। देश के बारे में कोई नहीं सोच रहा। इन मुफ़्तखोरों को सबक सिखाने का वक्त आ गया है।
तेजेंद्र जी, आदर्श स्थिति तो वही होगी जब सारे सांसद उमेश जी जैसे ही हो परंतु ऐसी स्थिति तो मात्र कल्पना में ही हो सकती है, हां हम सभी की प्रार्थना यही होनी चाहिए कि उमेश जी की ‘प्रजाति’ के सांसदों का “वंशवृद्धि ‘ हो जैसे अंग्रेजी में रहते हैं ‘मे देयर ड्राइव इंक्रीज’ आमीन।
सही कहा आपने।
पुरवाई के इस बार के संपादकीय- ‘ भारतीय संसद का एकमात्र जिम्मेदार सांसद’ में भारतीय संसद के सांसदों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। ये आपका कथन सही है कि ‘सभी सांसदों को परिपक्व व्यवहार के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।’ इससे उनके आचरणों में सुधार होगा और वे जनता की समस्याओं को गंभीरता से वहां उठाएंगे। जनता की भलाई के लिए ही तो संसद का निर्माण हुआ है कि यहां सभी सांसद मिल बैठकर जनता के हित की बात करें। आप और हम जैसे सभी संवेदनशील लोग उनकी हरकतों से शर्मिन्दा होते हैं। होना भी चाहिए। जनता को भी चाहिए कि उनसे पूछे कि हमारे लिए आपने वहां क्या काम किया? ब्रिटेन के हाउस वाली बात वाकई में प्रशंसनीय है। यह जानकर और अच्छा लगा कि वहां के आमजन पास लेकर हाउस की कार्यवाही को देख सुन सकते है।
लेकिन भारत को उस स्थिति तक पहुंचने में समय लगेगा। देखते हैं कब तक हम उस स्थिति में आ पाते हैं।
भारतीय पक्ष और विपक्ष आपस में शत्रुतापूर्ण व्यवहार ही कर रहे हैं जबकि ऐसा पहले देखने को नहीं मिलता था। खासकर कांग्रेस और भाजपा के पहली पंक्ति के नेता एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते हैं। इसके कई कारण हैं पर उन कारणों में जाना मैं ठीक नहीं समझता हूं।
आपने संपादकीय में मानसून सत्र के खर्च के आंकड़े साझा किए हैं। 205 करोड़ के लगभग के खर्च का आंकड़ा काफी बड़ा है। निर्दलीय सांसद उमेश भाई बाबू भाई पटेल ने इस खर्च को सांसदों के वेतन से काटने की बात कही है। उनका कहना सही भी है कि काम नहीं होने दिया है तो उस पैसे को वसूला जाए। उनकी इस संवेदनशीलता को नमन करता हूं। लेकिन दुर्भाग्य कि उनकी संवेदनशीलता उस शोर में दबकर रह जाएगी। पैसा वसूली नहीं होगी।
सांसदों के वेतन बढ़ने वाली बात पर मैंने कभी हंगामा होते हुए नहीं देखा है। सभी सुई के छेद से होकर निकल जाते हैं। पेंशन भी जमकर लेते हैं। कर्मचारियों की पेंशन देने के लिए बुरा मुंह बनाते हैं। कहते हैं कि पेंशन देने से अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। पूंजीपतियों ने बैंक खाली कर दिए। लोन लेकर अपने को दिवालिया घोषित कर लेते हैं। और जनता की गाढ़ी कमाई को यूं ही डकार जाते हैं।खैर….
आपके इस संपादकीय ने ये तो स्पष्ट कर दिया है कि सांसदों का संसद में कार्य व्यवहार ठीक नहीं है। इसमें सुधार करना होगा। ताकि हम अनुशासन और गरिमा में विश्व के सामने अपनी छवि ठीक कर सकें। संसार के लोग हमें सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखते है और उसकी प्रशंसा करते है। इसलिए हमें चाहिए कि हम इसमें भी सुधार करें और देश के सम्मान को बढ़ाएं।
मैं तो कहता हूं कि इस संपादकीय को हर सांसद द्वारा पढ़ा जाना चाहिए।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आपने तो संपादकीय को पूरी तरह से खंगाल कर हर मुद्दे पर अपनी बात रखी है। आपने कहा है कि – इस संपादकीय को हर सांसद द्वारा पढ़ा जाना चाहिये -, यह पुरवाई पत्रिका के लिये आत्याधिक महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।
उमेशभाई बाबूभाई पटेल को मैंने भी सुना था. उनकी व्यथा हर उस सांसद की है जो अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए कुछ करना या आवाज़ उठाना चाहता है। उनकी व्यथा भारत के प्रत्येक नागरिक की भी व्यथा है। एक समय था ज़ब विपक्ष के नेता अटल बिहारी बाजपेई या सुषमा स्वराज बोलती थीं तो सारा देश सुनता था, अब विपक्ष का कोई नेता ऐसा नहीं है जो जनता की आवाज उठा सके। अब तो अपशब्दों की भरमार है। ताज़ा उदाहरण है नारा -वोट चोर गद्दी छोड़।
जनता के मत का अनादर उचित नहीं है, शायद इन्हें इतना भी भान नहीं। जनता ही उन्हें गद्दी पर बिठाती है तथा वही उतारती भी है। प्रवासी भारतीय तो अपने देश के सांसदों की प्रवृति पर शर्मिंदा होंगे ही, प्रबुद्ध भारतीय भी लोकतंत्र में आई इस गिरावट पर शर्मिंदा हैं।
लंदन में रहते हुए भी भारतीय राजनीति पर पैनी नजर आपके देश प्रेम का प्रतीक है। उमेशभाई बाबू भाई पटेल जैसे सांसद की ओर
ध्यान आकर्षित करने वाले संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी, लंदन में रह कर जब मैं भारत की ओर देखता हूं, तो मेरी दृष्टि किसी राजनीतिक रंग से रंगी हुई नहीं होती। मैं पूरी तरह से भारत को स्नेह करने वाले लोगों की सुनता और पढ़ता हूं। आपको संपादकीय पसंद आया इसके लिये हार्दिक आभार।
लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ पत्रकारिता को किसने कहा यह तो पता नहीं पर क्यों कहा हमारी प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवाई के संपादक महोदय के सूक्ष्म ही नहीं स्थूल विषयों पर भी निर्भीकता से चलायी गयी लेखनी से समझ आता है l सामान्य भारतीय( आम आदमी ) करदाता की अव्यक्त टीस को आपने इस संपादकीय में जो अभिव्यक्ति दी है वो पैनी पत्रकारिता की ही नहीं .. दूर रह कर भी आप की अपने राष्ट्र की खंडित हो रही संसदीय गरिमा के प्रति चिंता और असुरक्षा की भावना का भी प्रमाण है l बेहद पीड़ादायी होता है हर माह आपकी तनख्वाह मे से एक मोटी रकम का आयकर के नाम पर कट जाना और उसके बाद भी आपके दैनिक जीवन के उपयोग की हर खास / आम चीज पर टैक्स भरना l ऐसे में उस टैक्स की बर्बादी के मंजर इस तरह देखना लोकतंत्र में आम लोगों की आस्था को चरमरा देता हैं lसंसद का मॉनसून सत्र हंगामे के साथ खत्म हुआ। यह सत्र निराशाजनक रहा, क्योंकि सरकार और विपक्ष में टकराव हुआ। राज्यसभा में केवल 41.15 घंटे और लोकसभा में 37 घंटे काम हुआ। कई सवाल अधूरे रहे, जिनका जवाब देश जानना चाहता था। संसद के बीच प्रॉडक्टिविटी के लिहाज से यह सेशन बेहद निराशाजनक कहा जाएगा। सरकार और विपक्ष के बीच टकराव के कारण दोनों सदन लगातार बाधित रहे। यहां दोनों पक्षों से ज्यादा समझदारी और संतुलित नजरिये की अपेक्षा थी। आंकड़े ही इस सत्र की पूरी कहानी बता देते हैं। राज्यसभा में केवल 41.15 घंटे काम हो पाया और लोकसभा में 37 घंटे। लोकसभा की कार्यवाही के लिए 419 तारांकित प्रश्न शामिल किए गए थे और इनमें से महज 55 का मौखिक उत्तर मिल सका।सत्र शुरू होने के पहले कार्य मंत्रणा समिति में सरकार और विपक्ष के बीच कुछ मुद्दों पर चर्चा की सहमति बनी थी। लेकिन, सत्र शुरू होने के साथ ही उसे भुला दिया गया। संसदीय परंपरा में विरोध भी अधिकार है, लेकिन इसकी वजह से सदन की गरिमा और उसके कामकाज पर असर नहीं पड़ना चाहिए। दुर्भाग्य से देश ने इस सत्र में यही देखा- वे जरूरी मुद्दे जिनका जवाब देश जानना चाहता था, शोर शराबे की भेंट चढ़ते रहे। यह सेशन ऐसे वक्त हो रहा था, जब भारत नई चुनौतियों से गुजर रहा है। विदेश और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर हालात तेजी से करवट ले रहे हैं। ऐसे में और भी अहम हो जाता है कि संसद में इस पर सार्थक चर्चा होती और वाद-विवाद से रास्ता निकाला जाता। चिंताजनक बात यह है कि संसदीय कार्यवाही का ऐसा अंजाम अब आम हो चुका है। पिछले शीत सत्र में ही लोकसभा के 65 से ज्यादा घंटे बर्बाद हुए थे। एक अपवाद बजट सत्र को माना जा सकता है, जब राज्यसभा की प्रॉडक्टविटी 119%, जबकि लोकसभा की 118% रही। जब संपादक महोदय आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का यह बेहद चौंकाने वाला तथ्य पढ़ा कि संसद सत्र को चलाने में हर मिनट ढाई लाख रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं तो mere भी कान लाल हो गए ..ऐसे में सदन जब काम नहीं करता, तो जनता की गाढ़ी कमाई के इन रुपयों के साथ देश का बेहद कीमती समय भी जाया हो जाता है।हाल में सरकार और विपक्ष के रिश्तों और संवाद में जो गिरावट आई है, मॉनसून सत्र उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकतंत्र में संवाद और आपसी सम्मान के बिना काम नहीं चलता। विरोध जरूरी है, पर मुद्दों पर और सकारात्मक उद्देश्य के साथ।…. आम आदमी के प्रश्नों को शब्द देता बेहद अनिवार्य उपयोगी और सतर्क संपादकीय… अनवरत लिखें संपादक महोदय … यशस्वी हों l
किरण जी आपने आंकड़ों को बढ़िया ढंग से खंगाला है। करदाता द्वारा भरे गये टैक्स का कैसे दुरुपयोग किया जाता है, भारतीय संसद उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। संपादकीय पर टिप्पणी के लिये विशेष धन्यवाद।
बहुत ही उम्दा संपादकीय सर टिप्पणी क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा। शुक्रिया कहूंगा बस
यह अपने आप में एक संपूर्ण टिप्पणी है तेजस!
बिल्कुल सही बात लिखा आपने बड़ी शर्म आती है मुझे तो संसद की बहस सुनने जाओ तो सिर्फ हंगामा के कुछ नहीं होता।
बिल्कुल सही लिखा अपनी बधाई आप निडर होकर लगते हैं यह बहुत बड़ी बात है।
आदरणीय भाग्यम जी, सच लिखने के लिये इधर-उधर के बारे में सोचना नहीं होता। संसद में हंगामे के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।
आ. तेजेंद्र जी, आपके सम्पादकीय से पूर्णतया सहमत हूँ। सबसे पहले तो आपको साधुवाद कि विदेश में रहते हुए भी आप अपने देश की हर छोटी-बड़ी समस्या से हमें अवगत कराते हैं।वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, पहले भी था, लेकिन संसद के बाहर सांसद मित्रता के भाव से मिला करते थे। आज के सांसदों का आचरण देखकर शर्मिंदगी महसूस होती है।पक्ष को अपना शत्रु समझने लगे हैं।उन्हें न तो देश की न ही जनता की परवाह है।करदाताओं विशेषकर मध्यम वर्ग के पैसों को लूट रहे हैं।निजी स्वार्थ और कुर्सी की भूख उन्हें गर्त में लिए जा रही है।
मैंने पिछले वर्ष कैनेडा प्रवास के दौरान ओटावा में आधे घंटे के लिए पार्लियामेंट में पक्ष और विपक्ष के सांसद को अपना तर्क देते सुना था। कितनी शालीनता से उन्होंने अपनी बात कही।हमारे सांसद क्या सही ढंग से अपनी बात नहीं कह सकते।
आपने बिलकुल सही कहा है कि भारतीय सांसदों, सत्ता और विपक्ष को संसद में परिपक्व व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाए।उनके आचरण के विरुध्द क़ानून बनाना कठिन है, लेकिन असम्भव नहीं।
कहावत है -“ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, पर यह भी सच है कि कभी-कभी अकेला चना भी ऐसा भाड़ फोड़ता है कि वह खिल-खिल जाता है।” निराशा में भी आशा की किरण दिखाई देती है। यह जानकर खुशी हुई कि निर्दलीय सांसद उमेशभाई बाबुभाई पटेल के मन में करदाताओं के पैसे को लेकर कुछ तो दर्द है।एक दीपक कई दीपकों को रौशन कर देता है।ऐसे ही हम भी आशा कर सकते हैं कि उनके मन का दर्द औरों को भी द्रवित कर दे।
कुछ भी हो, कैसे भी हो, सांसदों को अपने आचरण, अपने व्यवहार को बदलना तो पड़ेगा, नहीं तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद मजाक बनकर रह जाएगी
सार्थक,सटीक समसामयिक सम्पादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
सुदर्शन जी, आपका कहना है कि एक अकेला शख़्स बहुत से परिवर्तन ला सकता है। आपने सटीक टिप्पणी की है कि – “कुछ भी हो, कैसे भी हो, सांसदों को अपने आचरण, अपने व्यवहार को बदलना तो पड़ेगा, नहीं तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद मजाक बनकर रह जाएगी।”
सर बहुत ही सरल एवं प्रभावशाली सम्पादकीय,समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं आप ने तो सब कुछ एकदम अलग ढंग से परोस दिया है।
मेहनत की जरूरत नहीं पाठक को।
आदरणीय मुक्ति जी, इस प्यारी सी टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार।
सबसे पहले मैं संपादक महोदय को।साधुवाद देना चाहूंगा जो लंदन में रहते हुए तमाम अपने देश भारत की संसद की बाते बड़े ही।बारीकी।और बेबाकी।से रखते है। सांसद उमेश पटेल जी का त हे दिल से स्वागत है जिन्होंने भारतीय जनता के बारे में सोचा।आज भी भारतीय संसद में चोर लुटेरे बैठे है।पूरे भारतीय महाद्वीप में कमोवेश हर देश में एक ही हालत है।चाहे भारत हो, पाकिस्तान हो, बंगला देश हो,नेपाल हो श्री लंका स्थिति और राजनेता द्वारा भद्ताचार चरम पर है एक।जन क्रांति पूरे महाद्वीप के देश में जरूरत है
संपादक महोदय का आभार जो।ज्वलंत।मुद्दों को आपने उजागर किया वो काबिले तारीफ है
अपने ये झुठलाया दिया
हम तो चले परदेश हम परदेशी हो गए।
हमें तो इसी मिट्टी में ही मिलना है
सैल्यूट तेजेन्द्र शर्मा साहब
भाई सिंह साहेब, आपने संपादकीय को समर्थन दिया और अपनी ज़िम्मेदारियां भी निभाते जा रहे हैं। आप स्नेह बनाए रखें।
आपके संपादकीय ऐसे ही मुद्दों के चयन के कारण विशेष होते हैं। पार्लियामेंट यानि उल्लुओं का एक समूह – आखिर इनसे और क्या अपेक्षा की जा सकती है? भारत में तो लगता है इन्हीं के आचरण को देखकर ही उल्लुओं को मूर्ख माना गया है। इन दिनों तो झूठ फरेब का ऐसे विमर्श का दौर जारी है कि राजनीति का बेहद ही अशालीन रूप दिख रहा है।
आपने कम शब्दों में संसद का पूरा ख़ाका खींच डाला है अरविंद भाई। धन्यवाद।
इस सप्ताह के अपने संपादकीय में आप हमारे भारतीय संसद में अनुशासन की अनुपस्थिति का उल्लेख करते हुए उन निर्दलीय सांसद,उमेशभाई बाबुभाई पटेल के उस प्रस्ताव की सराहना करते हैं जिस के अंतर्गत सांसदों के वेतन में से उन सभी घंटों को बर्बाद करने का हर्जाना वसूल करना चाहिए जिन के उत्पाती व्यवहार के कारण संसद की कार्रवाई को बार-बार स्थगित करना पड़ता है।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारा संसद सुचारु रूप से अपने सत्र के संपूर्ण घंटों का सम्पूरित लाभ नहीं उठा पा रहा।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आदरणीय दीपक जी, आपने निर्दलीय सांसद – श्री उमेश भाई बाबुभाई पटेल के प्रस्ताव की सराहना करते हुए अपनी संसद के मामले में भी सटीक टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।
संपादक महोदय, सादर प्रणाम
खरी-खरी कही है आपने.
भारतीय राजनीति का अंधकार गहराता जा रहा है। सत्ता को किसी भी तरह से पा लेने की कोशिशें चलती रहती हैं। स्वार्थपरता केंद्र में है।
भारत के समस्त मतदाताओं की ओर से आपने यह अक्षय प्रश्न उठाया है। एकमात्र सांसद की आवाज़ इस गहन अंधकार में मशाल की तरह प्रज्वलित है.
अपने संपादकीय धर्म का निर्वाह करते हुए पूर्व की भांति अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे को तर्क और तथ्य के साथ प्रस्तुत किया है, आपको हार्दिक बधाई.
भाई जयशंकर तिवारी जी – आपके तो नाम में ही जय शंकर है… आपकी टिप्पणी हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। स्नेह बनाए रखें।
तेजेन्द्र भाई: 240 करोड़ 50 लाख रुपयों जो नारेबाज़ी और गुण्डागर्दी में बर्बाद हुए हैं उसका कारण ढ़ूण्डने के लिय़ अधिक दूर जाने की ज़रूरत नहीं। यह सब वो लोग हैं जिन के मुँह ख़ून लगा हुआ है। सत्ता हाथ से निकल गई है और उसको जायज़ या नाजायज़ तरीकों से छीनने में न तो इन्हें कोई शरम है और न ही कोई ग़ैरत। देश जाए भाड़ में। इस सब के बावजूद भी देश में अभी भी उमेशभाई बाबुभाई जैसे चरित्रवान हैं जिन्हें देश की फ़िकर है।
रहा इन सांसदों से जवाबदेही का सवाल? सो वो भी कर के देख लो। यह बेशर्म लोग जवाबदेही तो क्या देंगे। उलटा उसकी के बजाय सांसद में जो थोड़ा बहुत काम हो रहा है उसको भी नहीं होने देंगे। इन लोगों को तो इतनी तमीज़ भी नहीं है कि विपक्ष की ज़िम्मेवारियों को समझ सकें। एक timely मुद्दा उठाकर जन्ता को जागर करने के लिए बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई, आपने भारत के सांसदों के चेहरे बेनकाब करते हुए कहा है कि – ये बेशर्म लोग जवाबदेही तो क्या देंगे। उलटा उसकी के बजाय सांसद में जो थोड़ा बहुत काम हो रहा है उसको भी नहीं होने देंगे। – आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा होती है सर।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
संपादकीय के शीर्षक ने जिज्ञासा पैदा की और खुशी भी हुई कि चलो, कोई एक सांसद तो अच्छा और जिम्मेदार है। आजकल नेताओं की श्रेणी में ईमानदार और जिम्मेदार लोग जरा मुश्किल से दिखाई देते हैं। उत्सुकता-वश जब आगे बढ़े तो गंभीरता हावी होती चली गई।
अब की बार के संपादकीय का विषय बहुत गंभीर और चिंतनीय है।
हमें पता था कि पैसा खर्च तो होता है पर इतना पैसा खर्च होता है… संसद की बैठक में एक दिन के हिसाब से… यह पता नहीं था सच कहें तो जानने की कोशिश भी नहीं की थी… और इतने गंभीर विषय पर इतनी अगंभीरता… इतनी लापरवाही… इतनी अदूरदर्शिता…
आपने बिल्कुल सही कहा,निश्चित रूप से जिस संस्था में कर दाता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता हो उनसे ईमानदारी की विश्वसनीयता अपेक्षित रहती है।
ये सभी अपनी पार्टी व पार्टी के हित तक सीमित हो कर रह गये। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सत्र की समाप्ति पर जो भी कुछ कहा उसमें विषय के प्रति उनका दुख वह उनकी चिंता पूरी तरह सही है। काबिल-ए-गौर है और विचारणीय भी।
सदन की महत्ता को समझते हुए उसके गौरव को बनाए रखना आवश्यक है। पर पता नहीं यह बात सभी को कब समझ में आएगी!
वैचारिक मतभेद विषय गत हो सकते हैं पर परस्पर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिये। पद की गरिमा का ध्यान रखना जरूरी है।
इस बार के संपादकीय ने बहुत ही ज्यादा दुखी किया।
सारी कार्यवाही देश- दुनिया के लोग देखते हैं। यह देश के सम्मान का विषय है।वे यह नहीं सोचते कि जो देख रहे हैं उन तक क्या संदेश जा रहा है?
124 करोड़ 50 लाख रुपए कम नहीं होते। अगर यह पैसे जनता के हित के लिये उपयोग होते हैं तो न जाने कितने घर बस जाते! यह कोई छोटा-मोटा नुकसान नहीं है और ना ही ऐसा जिसे अनदेखा किया जाए।
कितनी अजीब बात है कि देश की जनता कोरोना के बाद से कर्ज के बोझ से दबी जा रही है। आत्महत्याएँ कर रहे हैं लोग। पर शासकों को इसकी परवाह नहीं। वाकई जिसका दुख उसी का होता है। जिनका पेट भरा होता है वह भूख की तकलीफ को नहीं समझ सकते।
इतना पैसा अगर देश के विकास में लगा होता तो कितना कुछ हो सकता था। कुल मिलाकर वक्त और पैसे दोनों की बर्बादी हुई।
दमन-दीव के सांसद उमेश भाई बाबू भाई पटेल की माँग जायज है। यह जरूरी भी है शायद तभी इन्हें समझ में आए !!
विश्वास नहीं होता कि आज के समय में सदन में कोई एक व्यक्ति इतनी ईमानदार सोच रखने वाला भी है। सांसदों की पगार कटनी ही चाहिये। ऐसे व्यक्तित्व को प्रणाम। काश सभी सांसद इतने गंभीर हो पाएँ।
आपने ब्रिटेन की संसद के बारे में बताया। यहाँ अगर ऐसा हो तो खुले आम ही देश की इज्जत की धज्जियाँ उड़ जाएँगी।
पिछले चुनावों मैं चयनित होने के बाद किये गए कार्य व बर्ताव को देखकर ही अगले चुनाव में लड़ने की एंट्री होनी चाहिये। पर कहावत है- “अंधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह -चीन्ह कर देय”
संपादकीय को पढ़कर सच में बहुत ही अधिक दुख हुआ इसी को “अंधेर” कहते हैं।
अब तो यह विश्वास और दृढ़ हो गया कि देश को चलाने के लिए ऐसी योग्यता, ऐसी अर्हंताओं से युक्त, ऐसी परीक्षा पास करना आवश्यक कर दिया जाए, जो IAS, IPS के लेवल से भी ऊपर की हो। कैरेक्टर वेरिफिकेशन आवश्यक हो, जिस तरह हर छोटी या बड़ी शासकीय नौकरी के लिये आवश्यक होता है। हर विभाग के मंत्री के लिये आवश्यक हो कि वो अपने संदर्भित मंत्रित्व पद पर विषय विशेष योग्यता प्राप्त हो। इसके बाद ही किसी को भी चुनाव लड़ने का अधिकार मिले। चाहे सेना के स्तर का ना हो फिर भी उसके ही तरह काम में और समय के अनुरूप अनुशासित हो।
इतनी मेहनत करके बड़ी बड़ी पोस्ट पर काम करने वाले IAS और IPS ऑफिसर ऐसे सांसदों की रक्षा के लिए क्यों खड़े रहें… वह भी जय हिंद की सेल्यूट के साथ।
नौकरी के हर पद के लिये परीक्षाओं का एक निश्चित और निर्धारित मापदंड होता है। और साथ में होता है पुलिस वेरीफिकेशन। चरित्र प्रमाण पत्र! फिर नेताओं के लिए कुछ भी जरूरी क्यों नहीं है? देश चलाना क्या परिवार चलाने से अधिक उत्तरदायित्व-पूर्ण काम नहीं है? छोटा-मोटा काम है? जिसे हाथ में लकड़ी लेकर जानवरों की तरह हाँक दिया जाए!
पढ़ाई आजकल इतनी महंगी हो गई है कि स्कूल में पढ़ाने में ही माता-पिताओं की तनख्वाह आधी से ज्यादा लग जाती है। बच्चे लोन ले-लेकर पढ़ते हैं और उसके बाद भी नौकरी के लिए मारे- मारे घूमते हैं।
फिर देश चलाने के लिये देश के नेताओं के लिये इस तरह का कोई भी कानून क्यों नहीं है?
वैसे आपने जायज चिंता व्यक्त की है कि संविधान बनाने वाले भी यही हैं। फिर क्या किया जाए और कैसे किया जाए?
इस बार के संपादकीय ने काफी विचलित किया और दुख भी हुआ। बेहद-बेहद ज्वलंत, महत्वपूर्ण और विचार करने योग्य गंभीर विषय की जानकारी देने वाले विषय पर कलम चलाने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।
आपके संपादकीय को पढ़कर देश और दुनिया की जानकारियों से बहुत समृद्ध हो रहे हैं।
नीलिमा जी, आपने बहुत गहराई से संपादकीय पढ़ कर एक विस्तृत टिप्पणी की है। आपने लिखा है कि – आपके संपादकीय को पढ़कर देश और दुनिया की जानकारियों से बहुत समृद्ध हो रहे हैं। – यह तो पुरवाई के संपादक मंडल के लिये सच में गर्व की बात है कि आप जैसे सजग पाठक ऐसा सोचते हैं। काश भारत के सांसद इस संपादकीय के मर्म को समझ पाएं।
प्रिय भाई तेजेंद्र जी,
हमेशा की तरह एक तीखा लेकिन जरूरी, बहुत जरूरी संपादकीय। आपने कथित माननीयों के अशिष्ट और अमर्यादित आचरण को धज्जी-धज्जी उधेड़कर दिखाया है, और उन सभी लोगों की चिंताओं को उजागर किया है, जो रोज-रोज सांसदों के इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार को देखकर दुखी और क्षुब्ध होते हैं। कुल मिलाकर तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी इससे सवाल उठते हैं।
हिंदी के बड़े कवि हैं धूमिल। उन्होंने कभी लिखा था, *हमारी संसद तेली की वह घानी है, जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है।* मुझे लगता है, आज तो हालत यह है कि तेल नदारत, पूरा पानी है।
आपने उमेश भाई पटेल का बहुत अच्छा उदाहरण दिया। आखिर कोई तो है, जो सांसदों के इस भद्दे आचरण को देखकर शर्मिंदा हो रहा है, और ईमानदारी से सवाल खड़े कर रहा है। वही सवाल जो कल पूरा देश पूछेगा।
स्नेह,
प्रकाश मनु
आदरणीय तेजेन्द्र भाई,
प्रणाम।
बहुत सुंदर सार्थक सारगर्भित और संवेदनशील संपादकीय के लिए अशेष साधुवाद बधाई।
सादर नमन आपकी लेखनी को और प्रबुद्ध चिंतन कौ।सचमुच भारतीय संसद पर इतनी बेबाकी से सच्ची बात कहना और उसका गहराई से अनुशीलन प्रस्तुत करना सराहनीय और साहसी कदम है।हम लोकसभा को लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं ।मंदिर में जन कल्याण की कामना की जाती है न कि आत्मप्रचार विवाद बहस.और नारेबाजी।अंतत: संसद का बहिष्कार। यहां.सार्थक निरर्थक कुछ भी कहा जा सकता है जनता की आवाज को दबाया जा सकता है या लोकतंत्र के नाम पर अनर्गल प्रलाप किया जाना यह किसने अधिकार दिया हमारे माननीय सांसदों को? संसद का बहिष्कार देश की आर्थिक व्यवस्था पर भी कुठाराघात है क्योंकि न कानून शांति से बनने दिया जाता है न उनका पालन ही किया जाता है। आपने अपने संपादकीय के माध्यम से लिखा है –जिस संस्था पर करदाता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता हो, उसके सदस्यों से कम से कम यह अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे ईमानदारी से अपना काम करें।
आपने सांसद उमेश भाई बाबूलालई पटेल का उदाहरण दिया है.जिन्हने जनता के हित में अपनी आवाज उठाई है,उनकी सराहना करती हूं ।संपादकीय में आपने लिखा–
संसद में एक निर्दलीय सांसद ऐसा भी है, जिसके मन में करदाता के पैसों को लेकर कुछ दर्द मौजूद है इनका नाम है– उमेशभाई बाबुभाई पटेल और ये दमन और दीव के सांसद हैं। उमेशभाई बाबुभाई पटेल ने सांसदों के वेतन में कटौती की माँग करते हुए संसद परिसर में प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि *सदन में कामकाज न होने की वजह से जो पैसा बरबाद हुआ, उसे सांसदों की पगार से वसूला जाना चाहिए*।भारतीय संसद की कार्यवाही पूरा.विश्व देखता.है।जिसकी अनियमितताओं और. हंगामेदार कार्यशैली से हम.क्या दिखा रहे हैं दुनिया को? इस संपादकीय के लिए बहुत बहुत बधाई आपको।काश सभी प्रेरित हो पाते।मैं जितना समझती.हूं राजनीति को ,आपके संपादकीय पढकर ही।आभार। यह प्रतिक्रिया भी एक लघु प्रयास है।धन्यवाद।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
बहुत ही बढ़िया विषय पर संपादकीय लिखा है आपने। देश में रहते हुए मेरे लिए ये एक खबर थी।
मुझे नहीं पता था ये सराहनीय बात।
चुन कर मोती लाने के लिए धन्यवाद आपका।