एक बहुत ही मज़ेदार स्थिति उत्पन्न हो गई है। ट्रंप भारत पर तो टैरिफ़ और जुर्माना लगा रहे हैं क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है। मगर पुतिन के साथ अलास्का में होने वाली मीटिंग से पहले अस्थाई रूप से 20 अगस्त तक अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध हटा रहा है। ट्रंप की दिमाग़ी स्थिति इस बात से समझी जा सकती है, कि जिस रूस के कारण भारत पर टैरिफ़ और जुर्माना लगाया जा रहा है, उसी रूस पर से प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं।
भारत के इतिहास में बार-बार बताया गया है कि जब किसी छोटे राज्य के राजा का दिमाग़ ख़राब होता था, तो वे निरंतर ग़लत फ़ैसले लेते थे, और अपने राज्य में अराजकता फैला देते थे | सोचिए, अगर विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राजा के दिमाग़ की एक चूल ढीली हो जाए तो वह पूरी दुनिया का कितना नुकसान कर सकता है?
अपने पहले राष्ट्रपतित्व काल में भी डॉनल्ड ट्रंप पारंपरिक राष्ट्रपतियों से बिल्कुल अलग दिखाई देते थे। मगर पिछले राष्ट्रपति चुनाव में हारने के बाद, जब उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़े और आम अपराधी की तरह उनसे व्यवहार किया गया, तो उनके भीतर बदले की भावना उबलने लगी। उनके दिल में बस एक ही भावना हलचल मचाए हुए थी, कि मुझे अपने आपको दुनिया का श्रेष्ठतम राष्ट्राध्यक्ष साबित करना है।
पूरे विश्व को ये आभास हो रहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं डॉनल्ड ट्रंप निजी रूप से एक-दूसरे के दोस्त हैं। हालाँकि मुझे ये बात कभी समझ नहीं आयी कि दो देशों के मुखिया अचानक एक-दूसरे के निजी दोस्त कैसे बन सकते हैं? हर मुखिया के लिए पहले उसका देश होता है, उसके बाद ही सामरिक रिश्ते। मगर जिस तरह भारत और अमेरिका में ट्रंप-मोदी शो आयोजित किए गए, उससे ये ग़लतफ़हमी पैदा होना लाज़िमी था कि भारत और अमेरिका के रिश्ते प्रगाढ़ हैं।
इस बीच डॉनल्ड ट्रंप को एक बीमारी ने घेर लिया- ‘नोबेल शांति पुरस्कारेइया’। वे दिन रात बस एक ही ख़्वाब देखने लगे कि वे दुनिया में शांति के मसीहा बना कर भेजे गए हैं। उनका काम है, देशों के बीच की लड़ाइयाँ ख़त्म करवाना और नॉर्वे की राजधानी ऑस्लो में जाकर नोबेल शांति पुरस्कार ग्रहण करना।
उनकी दिक्कतें शुरू हुईं- ऑपरेशन सिंदूर के बाद। जब भारत ने पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों और हवाई अड्डों की बैंड बजा दी, तो पाकिस्तान ने गुहार लगाई कि और न मारिए। भारत के विदेश मंत्री ने तो पहले ही कह दिया था, कि हमारा उद्देश्य तो केवल आतंकी ठिकानों को तहस-नहस करना था। अगर पाकिस्तान प्रतिक्रिया में हमला नहीं करेगा तो भारत का काम हो चुका है।
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर पर युद्ध-विराम की बात मान ली। मगर डॉनल्ड ट्रंप हर रोज़ दिन में दो बार यह घोषणा किए बिना नहीं बाज़ आ पाते थे, कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध-विराम उन्होंने ही करवाया है। उन्होंने ये बात इतनी बार कही कि उन्हें स्वयं भी इस पर विश्वास हो गया कि ये सच है। और जो बाकी की कसर बची थी, उसे भारत के विपक्षी दलों ने टीवी पर चिल्ला-चिल्ला कर पूरा कर दिया, कि ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्ध-विराम करवाया है।
पाकिस्तान के ‘फ़ेल्ड’ मार्शल मुनीर ने ट्रंप की हर बात मान ली और अमरीका में जाकर व्हाइट हाउस में उनके साथ लंच भी किया। एवज़ में मुनीर मियां ने ट्रंप के नाम की अर्ज़ी नोबेल शांति पुरस्कार के लिये भर भी दी।
जब भारत ने ट्रंप के इस बात को मानने से इनकार कर दिया, कि ऑपरेशन सिंदूर को रोकने में ट्रंप का कोई हाथ है, तो ट्रंप के अहम को ठेस लगी और वे घायल साँप की तरह फुफकारने लगे। अब निजी दोस्ती गई तेल लेने… पहले तो शोर मचा रहे थे कि भारत और पाकिस्तान का युद्ध रुकवाने के लिए उन्होंने ट्रेड डील करने का वादा किया है। अब भारत पर लगा 25% टैरिफ़ और 25% जुर्माना क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल ख़रीदता है।
एक बहुत ही मज़ेदार स्थिति उत्पन्न हो गई है। ट्रंप भारत पर तो टैरिफ़ और जुर्माना लगा रहे हैं क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है। मगर पुतिन के साथ अलास्का में होने वाली मीटिंग से पहले अस्थाई रूप से 20 अगस्त तक अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध हटा रहा है। ट्रंप की दिमाग़ी स्थिति इस बात से समझी जा सकती है, कि जिस रूस के कारण भारत पर टैरिफ़ और जुर्माना लगाया जा रहा है, उसी रूस पर से प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं। यानि कि भारत से ट्रंप की नाराज़गी अन्य कारणों से है।
मेरे प्रिय मित्र और पूर्व राजनयिक विकास स्वरूप अमेरिकी विषयों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने हाल ही में तीन कारण बताए हैं , जिनके कारण ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ़ लगाने का फ़ैसला किया है-
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BRICS से नाराजगी– ट्रंप मानते हैं कि BRICS एक एंटी-अमेरिका गठबंधन है, जो डॉलर के विकल्प के रूप में नई मुद्रा लाना चाहता है।
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ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor)– भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष-विराम को लेकर ट्रंप दावा करते हैं कि यह उनकी वजह से हुआ, जबकि वास्तव में ये दोनों देशों के DGMO स्तर पर हुए समझौते का परिणाम था।
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भारत का ट्रंप को श्रेय न देना– पाकिस्तान ने ट्रंप को श्रेय दिया और उनके नाम को नोबेल पुरस्कार के लिए आगे बढ़ाया, लेकिन भारत ने हमेशा कहा कि हम किसी बाहरी मध्यस्थता को नहीं मानते।

अत्यंत सारगर्भित लेख बहुत-बहुत धन्यवाद
श्रीमान जी
यह सब जानकर एक ही बात समझ आती है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि। अपना ढ़ोल अपना राग।
उषा जी, टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
वर्तमान परिदृश्य में एकदम सही सम्पादकीय
धन्यवाद आलोक भाई।
वस्तुनिष्ठ विश्लेषण। ट्रंप की धमकियों से नरेंद्र मोदी घबराने वाले नहीं हैं। अब ट्रंप को कई और देश भी गंभीरता से नहीं ले रहे।
ट्रंप भारत का बाल भी बांका नहीं कर पायेंगे। चिल्लाते रहने से कुछ नहीं होगा। भारत जल्द ही विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा। सबसे युवा देश और जहां इतना बड़ा बाजार हो अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।
आपने सही कहा अरविंद भाई। धन्यवाद।
इस बार का संपादकीय एक पुरानी परन्तु अहम कहावत की याद दिलाता है,,,, सूत ना पुनि और जुलाहों में लठम लठ्ठा,,,,बस ट्रंप का भी यही हाल है।वे नोबेल शांति पुरस्कार में इतने दूर तक जाकर गर्त में गिरे हैं कि जहां से वे आत्मप्रशंसा भंवर में डूब सकते हैं और यूँ भी वे स्वयं और अपने शक्तिशाली देश को हास्यास्पद बना चुके हैं। रूस पर उनकी चली नहीं तो भारत पर टैरिफ का हंटर चला दिया।पाकिस्तान के मुनीर पर दांव चला तो नोबेल पुरस्कार और वो भी शांति का?!?!? मुंगेरी लाल का सपना शुरू हो गया।
एक बात और ट्रंप लोकतंत्र की मिसाल रहे अमेरिका के राष्ट्रपति है और अब उन्होंने भारतीय विपक्ष को भी लगता है कि गोद ले लिया है और नतीजा कि वे आए दिन शोर मचा रहे है कि ट्रंप ने ही आखिर अपने दबाव में भारत और पाकिस्तान में टैरिफ डील का टुकड़ा दिखा कर युद्ध रुकवा ही दिया।
एक और स्थानीय कहावत जो थोड़ी और कड़वी और औघड़ है और यहां पर मौजूं है
बाल हठ त्रिया हठ और राज हठ
अब ये कौन सा हठ है।
ट्रंप अब अपना आपा खो चुके हैं। संपादक महोदय ने इस ज्वलंत मुद्दे को असरदार और मज़ेदार ढंग से उठाया है।
साधु साधु साधु
बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ की सही कही आपने! सच में ट्रंप अपना आपा खो बैठे हैं। आपको हार्दिक धन्यवाद।
बहुत ही शानदार संपादकीय लेख नमन
बहुत शुक्रिया कपिल।
बहुत सुंदर और तीखा संपादकीय! ट्रंप जैसा क्षणे तुष्टा क्षणे दुष्टा स्वभाव वाला राष्ट्राध्यक्ष दूसरे देशों से ज़्यादा अपने देश के लिए ही घातक सिद्ध होने वाला है। मैंने उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प के बजाय ‘डोनाल्ड टैरिफ’ नाम दिया है और बहुत संभव है इतिहास उन्हें इसी नाम से दर्ज करें। आश्चर्य है कि कथित रूप से बहुत बुद्धिमान समझे जाने वाले अमरीका ने ट्रंप को अपना राष्ट्रपति कैसे चुन लिया, वह भी दोबारा। यदि गल्ती से भी उन्हें नोबेल दे दिया गया तो नोबेल पुरस्कारों की साख भी मिट्टी में मिल जाएगी।
– कमलेश भट्ट कमल, ग्रेटर नोएडा वेस्ट, भारत
आप से पूरी तरह सहमत कमलेश भाई।
आदरणीय संपादक महोदय, इस बार तो आपने जो ट्रंप जी की हालत का हवाल सुनाया है उससे मुझे बस एक कहावत ज़ूबान परआ रही है-
‘सौ सौ जूते खाए तमाशा घुस के देखै’
या फिर
“लातों के- – – – नहीं मानते, या फिर “खिसियानी बिल्ली खंम्भा नोचे”
बस ईश्वर से निरंतर प्रार्थना रहती है कि सत्ता के लिए पगलाए हुए विपक्ष को सद्बुद्धि मिले।
बहुत-बहुत अच्छा संपादकीय !बधाइयां स्पष्टवादिता के लिए।
जय हो सरोजिनी जी! भारतीय विपक्षी दलों के लिए आपकी टिप्पणी से सहमत।
पुरवाई पत्रिका का संपादकीय -‘ तुम मुझे नोबेल दो… नहीं तो मैं टैरिफ दूंगा ‘ वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर केंद्रित है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूरी दुनिया को टैरिफ वाले जिंद से हलकान कर दिया है। दुनिया ट्रंप को जब तक समझने की कोशिश करती है तब तक वे नया खेल कर जाते हैं। ‘दिमाग खराब’ वाली बात लिखकर संपादक महोदय जी उनके व्यक्तित्व के काफी निकट पहुंच गए हैं। उन्होंने अपनी हरकतें ही ऐसी बना ली है कि दुनिया उनको हल्के में लेने लगी है। लेकिन भारत के लिए अमेरिका अब सहज नहीं रह गया है। क्योंकि अमेरिका भारत को अभी उस स्तर का नहीं मान रहा है जैसा चीन और रूस को मानता है। अभी भी उसे लगता है कि भारत हड़काने में आ जाएगा।
बात बिगड़ गई आपरेशन सिंदूर से। यह आपरेशन विश्व के सफलतम आपरेशनों में अग्रगण्य रहा। हमारे विपक्ष ने इसको बहुत हलका करने की कोशिश की जिसमें वे कुछ हद तक सफल रहे हैं।
14 अगस्त को पाक का स्वतंत्रता दिवस था। पाक द्वारा बहुत सी चीजें छिपाने के बावजूद इस दिवस पर वहां के राष्ट्रपति ने 150 शहीद सैनिकों के परिजनों को सम्मान दिए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां कैसी तबाही मचाई होगी भारतीय सेना ने।
आपरेशन सिंदूर में चीन की बुरी गत हो गई । वहीं भारतीय जवानों ने अमेरिकी हथियारों की मार्केट वैल्यू खराब कर दी। अमेरिका तिलमिला गया। ट्रंप महोदय इसी में संतोष कर लेना चाहते थे कि उन्हें सीज फायर का क्रेडिट ही मिल जाए। पर भारत सरकार ने क्रेडिट लेने ही नहीं दिया। और उनके नोबेल पुरस्कार की हसरत अधूरी रह गई।
हमारे बुंदेलखंड में एक कहावत है कि लुगायसौ और घुडा़यसौ ऐसे उतावले हो जाते है कि उन्हें कुछ दिखता ही नहीं। लुगायसौ यानी पत्नी चाहने वाले को कुछ भी करना पड़े वह करेगा पर पत्नी मिल जाए। ऐसे ही घोड़ा के शौकीन की हालत होती है। ट्रंप महोदय पुरस्करायसौ है सो उतावली में आय-बाय कर रहे हैं।
आपकी इस बात से सहमत हूं कि राष्ट्राध्यक्षों की आपसी व्यक्तिगत दोस्ती नहीं हो सकती है। अगर करते हैं तो वे बड़ी भूल कर रहे हैं ।
भारत सरकार का हर देश से दोस्ताना रवैया रहा है। मोदी जी ने चीन, पाकिस्तान से इसी तरह का व्यवहार किया है। चूंकि 1962 के युद्ध ने हमें बहुत सिखाया है। ‘हिन्दी चीनी भाई भाई’ वाले नारे ने वह सिखा दिया जो हमने इतिहास में तमाम धोखे खाने के बावजूद इससे पहले सीखा ही नहीं था। सरकार ने दोस्ती चाहे जिस राष्ट्राध्यक्ष से की हो लेकिन अपने पैर जमीन पर ही रहने दिए। यही कारण है कि हम हर जगह सफल रहे।
ट्रंप ने भारत पर टैरिफ रूस से तेल खरीदने पर लगाया है। यह तो दुनिया को बताने के लिए है। ट्रंप को चुभ रहा है सफल आपरेशन। हमें लग रहा है कि ये सब ट्रंप अकेले कर रहे है। अमेरिका की सारी पावर ट्रंप के पीछे खड़ी है। लेकिन भारत के साइलेंट दांव-पेंच के आगे पस्त पड़े हुए हैं। उन्हें डर है कि ब्रिक्स देश अपनी करेंसी ईजाद न कर ले। अगर ऐसा हो गया तो डालर सौत का बेटा बनकर रह जाएगा।
अमेरिका को दूसरा डर ये है कि कहीं भारत फेसबुक, व्हाट्स एप, यूट्यूब, आदि का विकल्प न खोज ले। अगर ऐसा हो गया तो अमेरिका बहुत हद तक बैठ जाएगा। और भारत की अर्थव्यवस्था आसमान छूने लगेगी। अमेरिका को फिर से कारखाने खोलने पड़ेंगे जोकि ऐसा वह सोच भी नहीं सकता है। वह भारत पर बांग्लादेश वाला फार्मूला अपना सकता है। या फिर पाक से युद्ध में उलझा सकता है। पाक को फ्री के हथियार और पैसा सूट भी करते है।
हर देश दूसरे देश को अपने अनुकूल बनाने के लिए वह विपक्ष का सहारा लेता है, यह कूटनीति है। लेकिन भारत सरकार अभी इससे दो कदम आगे चल रही है। अब देखना बाकी हैं कि सरकार इन परिस्थितियों से कैसे निपटती है।
इस बार का संपादकीय खूब मुखर होकर लिखा गया है। इस साहस के लिए तेजेन्द्र सर जी बधाई के पात्र हैं।
भाई लखन लाल पाल जी आपने संपादकीय को कई कोणों से परखा है। आपने संपादक के बारे में भी कुछ बेहतरीन शब्दों का इस्तेमाल किया है। If I can make it, I will surely attend
शानदार सम्पादकीय, जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है।
हार्दिक धन्यवाद महेश भाई।
नमस्कार आदरणीय सर जी
पूरे संपादकीय पढ़ते समय मेरे मन में एक ही विचार चल रहा था कि भारत सबके लिए सदियों से शत्रु बना रहा…(कारण भी घरमें छिपे शत्रु ही हैं)इसका अर्थ यही है कि जिसके शत्रु अधिक हो उसकी महिमा अकल्पनीय है…. ट्रंप का तो जो होगा सो होगा.. वह तो पराया है… पर घर के शत्रुओं को चुप कराने का यदि कोई विकल्प है तो वह है साधारण जनता की एकता… विपक्षी का जन्म इसीलिए ही हुआ है कि देश को विभाजित करे और लोगों में भय और अराजकता फैलाए…
शेष वाक्य आपका सम्भावनाओं को आमंत्रित करता है… पर… विपक्षी नेता कम… कुछ और हो गए हैं….
साधुवाद
अनिमा जी, आपके दिल का दर्द आपके शब्दों में महसूस किया जा सकता है। हार्दिक धन्यवाद।
तुम मुझे नोबेल दो…नहीं तो मैं तुम्हें टैरिफ दूंगा…अत्यंत सामायिक एवं बिग बॉस की मानसिकता का सटीक विश्लेषण।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद युद्धविराम करवाने की घोषणा का भारत के नकारने पर उनका नोबेल पुरस्कार पाने की आकांक्षा पर कुठाराघात होने पर वह इजराइल, ईरान युद्ध तथा अब रूस और उक्रेन युद्ध रुकवाने की कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ पाकिस्तान के अतिरिक्त उन्हें किसी ने भाव नहीं दिया। अब नोबेल शांति पुरस्कार की चाह में ट्रम्प ऐसे मसखरे के रुप में प्रतिष्ठापित होने लगे हैं जिन पर कोई विश्वास नहीं करता।
आपने सही कहा कि आमतौर पर जब दो बड़े देशों के मुखिया आपस में बातचीत करते हैं, तो उससे पहले राजनयिक स्तर पर बातचीत हो चुकी होती है। किसी नतीजे पर पहुंचा जा चुका होता है। नेता लोग केवल हस्ताक्षर करते हैं और प्रेस वार्ता। यहां तो ट्रंप को इतनी जल्दी थी कि उसने अपने अफ़सरों वाला काम भी अपने ज़िम्मे ले लिया।
अब ट्रंप का यह कहना कि वे यूक्रेन, नाटो और यूरोपीय देशों से बात करेंगे और उन्हें बातचीत का ब्यौरा देंगे के बारे में मेरा भी मानना है कि आमतौर पर हर ऑफिस में पिरामिड सिस्टम काम करता है। मुखिया जो कहता है, वह सर्वमान्य होता है तभी उसकी बात का वजन होता है, उसकी बात सुनी जाती है किन्तु यहाँ तो ट्रम्प का वन मैन शो है।
कई बार तो यह भी सुनने में आया कि भारत पर टैरिफ़ कम होगा या ज्यादा, यह पुतिन से मुलाक़ात के बाद तय होगा। सच तो यह है कि ट्रम्प भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का आंकलन करने में चूक गये। उनको अपना दोस्त मानने वाले ट्रम्प यह भूल गये कि उनके लिए देश प्रथम है। उसके लिए कोई समझौता नहीं कर सकते। इस सन्दर्भ में विपक्ष कि भूमिका पर भी आपने सार्थक प्रश्न उठाये हैं।
विश्लेषणात्मक रोचक, जानकारी से युक्त संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी आपने संपादकीय को समग्रता में विष्लेषित किया है। हर मुद्दे को छुआ और समझाया है। हार्दिक धन्यवाद।
विनाश काले, विपरीत बुद्धि। ट्रंप का यही हाल है । बेहतरीन सम्पादकीय। तेजेंद्र जी आपके सम्पादकीय हमेशा ही समसामयिक, रोचक और ज्ञानवर्धक होते हैं ।साधुवाद
दिल से शुक्रिया सुदर्शन जी।
‘तुम मुझे नोबेल दो….. नहीं तो मैं टैरिफ दूंगा’ शीर्षक के अंतर्गत लिखे संपादकीय में आपने ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ और जुर्माना लगाए जाने के कारण तथा परिणाम का बहुत गहराई में विश्लेषण किया है। दुनिया में सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले देश अमेरिका के राष्ट्रपति के फैसले से न सिर्फ उनका देश प्रभावित होता है अपितु इसका वैश्विक प्रभाव होता है। ट्रंप किसी भी मुद्दे पर क्या रुख अपनाएंगे, पहले से अंदाज नहीं लगाया जा सकता इसका सबसे बड़ा उदाहरण आपने दिया है ” “भारत और अमेरिका के बीच विपक्षीय व्यापार समझौते की बात
चल रही थी उस समय दोनों देशों का लक्ष्य था कि अक्टूबर नवंबर तक इस बातचीत का पहला चरण पूरा हो जाए।” अब अप्रत्याशित रूप से यह टैरिफ! ट्रंप शांति का नोबेल पुरस्कार पाने की इतनी हड़बड़ी में हैं कि वह स्थितियों का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं। रूस और भारत की अर्थव्यवस्था को उन्होंने मृत अर्थव्यवस्था कहा जबकि भारत तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और ऐसा उन्हीं के देश की संस्था ने स्वीकार किया है।पाकिस्तान के ‘फेल्ड’ मार्शल, आपने संपादकीय में ऐसे चुटीले
शब्दों का इस्तेमाल किया है जिससे भाषा में रोचकता बहुत बढ़ गई है।
तथ्यों से भरपूर संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
विद्या जी आप हमेशा संपादकीय के विषय और भाषा पर सार्थक टिप्पणियां करती हैं। इस बार भी… बहुत शुक्रिया।
वाह, बहुत अच्छा संपादकीय भाई तेजेंद्र जी। आपने अपनी तीखी कलम से मूर्खता और घमंड से भरी ट्रंप की शख्सियत को तार-तार कर दिया।
मुझे यह शख्स मूर्खता और घमंड से भरा एक गुब्बारा लगता है, जिसमें मूर्खता ज्यादा है या घमंड, मैं तय नहीं कर पाता। शायद मूर्खता ही ज्यादा हो!
स्नेह,
प्रकाश मनु
सर आपकी टिप्पणी किसी सम्मान या पुरस्कार से कम नहीं । हार्दिक आभार।
समसामयिक संपादकीय
धन्यवाद नीलिमा जी।
इस सप्ताह के अपने संपादकीय को अधिकांशतः ट्रंंप व रूस की अलास्का मीटिंग तथा ट्रंप की राजनैतिक नीतियों पर आधारित करते हुए उस के घमंड की चर्चा करने के साथ-साथ आप ने भारत की विदेशागत नीति पर भी अपने विचार हमारे सामने रखे हैं।
समसामयिक विषयों पर आप के संपादकीयों के द्वारा हमारी जानकारी में सदैव वृद्धि होती है।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आदरणीय दीपक जी, हमारा प्रयास रहता है कि हर बार अपने पाठकों को किसी महत्वपूर्ण विषय से जोड़ा जाए। आपका स्नेह हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।
सभी को.सादर प्रणाम के.साथ सुप्रभात की मंगलकामनाए संपादकीय और आप.सभी की सारगर्भित रोचक टिप्पणियों को पढने के बाद पहली बार ट्रंप जैसे रोचक मूर्खता और अहंकार से भरे व्यक्तित्व को इतने रुपों में जानने का सुख मिला। बहुआयामी संपादकीय, मेरे लिए हमेशा ज्ञान वर्धक होता है।महत्वपूर्ण विषयों पर मैं तेजेन्द्र भाई के संपादकीय पढकर संतुष्ट हो लेती हूं,समाचारपत्र नहीं।आप सबने बहुत बहुत अच्छा लिखा हार्दिक बधाई। मैं अपनी ओर से ट्रंप के लिए केवल यही कहना चाहती हूं *ऊंट रे ऊंट तेरी कौन सी कल सीधी*।..पद्मा मिश्रा
पद्मा, आपने कम शब्दों में बहुत सार्थक बातें लिखी हैं… आप हर सप्ताह संपादकीय को पढ़ने के लिये समय निकालती हैं और अपनी सार्थक टिप्पणी अवश्य लिखती हैं। हार्दिक धन्यवाद।
बढ़िया व्यंग्यात्मक आलोचना की है आपने बहुत बढ़िया लेख
हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार का संपादकीय ट्रंप की हरकतों को देखते हुए शांति के नोबेल पुरस्कार की चाहत रखने की बात को लेकर हास्यास्पद लगा।
कितनी अजीब बात है!! सारे विश्व की शांति को भंग करके, हलचल मचाकर,अशांति फैलाने वाला, दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष शांति के लिये नोबेल पुरस्कार की अपेक्षा करता है
वह भी नॉबेल लायक कुछ किये बिना ही?
वैसे सिरफिरे राष्ट्राध्यक्षों के लिए भी कोई नॉबेल घोषित होना चाहिये।
अजीब बात तो यह भी है कि रूस को छूट दी जा रही है जो तेल दे रहा है भारत को और भारत पर 10 से 50% का टैरिफ लगाया जा रहा है।यहाँ तो दिमाग की उल्टी गंगा बहती प्रतीत हो रही है।
कुछ लोगों चुप्पी शैतान की तरह होते हैं।वे खामोशी से अपना काम करते हैं। और अपने कामों से अचानक दुनिया को चौंका देते हैं।
कुछ लोगों की प्रकृति दूर से ही भौंकने की होती है और वह अपने को बड़ा वीर समझते हैं कुछ ऐसी ही स्थिति मोदी और ट्रंप के मध्य है।
इस संपादकीय को पढ़ते हुए सरदार पूर्ण सिंह के निबंध “सच्ची वीरता” का एक अंश याद आ रहा है। यह निबंध हमारे दिल के बहुत करीब है-
*सच्चे वीर पुरुष धीर- गंभीर और आज़ाद होते हैं। उनके मन की गंभीरता और शांति समुद्र की तरह विशाल और गहरी, या आकाश की तरह स्थिर और अचल होती है। वे कभी चंचल नहीं होते।*
मोदी जी की तुलना में ट्रंप के लिए यही कहा जा सकता है कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली।
ट्रंप जैसे बीमार मानसिकता से ग्रस्त राष्ट्राध्यक्ष की महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर दुनिया का भविष्य दाँव पर है।
संसार में कुछ लोग दक्ष और रावण की तरह होते हैं। अभिमान जिनके सिर पर काल बनकर सवार रहता है। उन्हें सिर्फ समय ही सुधार सकता है। आगे आगे देखिये होता है क्या?
ऐसे समय पर अपने देश में भी विरोधी पक्ष को चाहिए ऐसे समय में विरोध भूलकर देश के हित एकमत हों।
हर सप्ताह संपादकीय के माध्यम से दिमागी कसरत से मस्तिष्क में हलचल मचा देने के लिए आपका शुक्रिया।
पुरवाई का आभार तो बनता है।
पुनश्च –
सरदार पूर्ण सिंह वाला अंश मोदी जी के संदर्भ में उद्धृत किया है! वे ट्रंप की तरह चंचल नहीं होते। चंचलता में गांभीर्य की कमी होती है।उश्रंखलता का आभास होता है और जो कहा जाता है उसमें स्थायित्व नहीं होता। यह बात हमें लिखनी चाहिए थी, दिमाग में भी थी लेकिन लिखते से छूट गई थी।
नीलिमा जी, दो इंस्टालमेंट वाली विशेष टिप्पणी के लिए विशेष धन्यवाद ।
विपक्षी दलों को भारत की अर्थव्यवस्था, मान-मर्यादा की चिंता नहीं है, उन्हें चिंता है अपनी सत्ता कैसे बचायी जाए।