Wednesday, February 11, 2026
होमअपनी बातसंपादकीय - ‘सेंसर की भेंट’ के पचास साल

संपादकीय – ‘सेंसर की भेंट’ के पचास साल

इमरजेंसी के काल को ‘जेलबंदी और नसबंदी’ का काल कहा जा सकता है। राजनीतिक नेताओं के लिए जेलबंदी और आम आदमी के लिए नसबंदी! हमने कांग्रेस के राज में देखा है कि नाम के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे, मगर पीछे से सरकार सोनिया गाँधी चला रही थीं। ठीक इसी तरह इमरजेंसी में प्रधानमंत्री तो इंदिरा गाँधी ही थीं, मगर ‘सुपर प्रधानमंत्री’ थे संजय गाँधी। तमाम निर्णय वे ही ले रहे थे।

बात जून 1975 की है। मैं जीवन के 22 साल पूरे कर चुका था… 23वें में चल रहा था, और उस समय मैं दिल्ली में रहता था। मेरा जीवन व्यस्त रहा करता था – सुबह बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी करता था और शाम को दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी की पढ़ाई। उन दिनों हम युवा लोगों के प्रेरणा हुआ करते थे – संजय गाँधी। मैं भी उन युवाओं में शामिल था, जिन्होंने शपथ ली थी कि अपने विवाह में दहेज नहीं लेंगे। 
मगर 25 जून 1975 की रात ने जैसे हम सबका जीवन ही बदल दिया। अगले ही दिन यानि कि 26 जून की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर ऐलान कर दिया कि देश के हालात इतने ख़राब हो चुके हैं कि इमरजेंसी लगानी पड़ रही है। अगली सुबह पूरे देश ने रेडियो पर इंदिरा गाँधी की आवाज में संदेश सुना था। उन्होंने कहा था – “भाइयो और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है।”
हमने आसानी से प्रधानमंत्री की बात को मान लिया। दरअसल सच तो यह है कि हम जैसे आम आदमी को तो कुछ मालूम ही नहीं था, कि आपातकाल या इमरजेंसी होती क्या है… यह किस बला का नाम है? इंदिरा गाँधी के लिए हम लोगों के मन में सम्मान था, और जनता का उनमें विश्वास था कि उन्होंने जो भी किया ठीक ही किया होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि उस समय के राजनीतिक नेताओं को भी इस बात का आभास नहीं होगा कि इमरजेंसी में उन पर क्या बीतने वाली है। हम जिस संविधान की रोज़-रोज़ दुहाई देते नहीं थकते, उस संविधान का कोई सत्तारूढ़ दल कैसे दुरुपयोग कर सकता है, यह हम मुड़ कर देखते हैं, तभी समझ पाते हैं।
इमरजेंसी के इस काल को ‘जेलबंदी और नसबंदी’ का काल कहा जा सकता है। राजनीतिक नेताओं के लिए जेलबंदी और आम आदमी के लिए नसबंदी! हमने कांग्रेस के राज में देखा है कि नाम के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे, मगर पीछे से सरकार सोनिया गाँधी चला रही थीं। ठीक इसी तरह इमरजेंसी में प्रधानमंत्री तो इंदिरा गाँधी ही थीं, मगर ‘सुपर प्रधानमंत्री’ थे संजय गाँधी। तमाम निर्णय वे ही ले रहे थे। 
पुरवाई के ऐसे बहुत से पाठक होंगे, जिन्होंने इमरजेंसी के बारे में केवल कहानियाँ सुनी होंगी या फिर कुछ पढ़ा होगा… वे इमरजेंसी के डर को महसूस नहीं कर सकते। उस काल में डर का कैसा माहौल खड़ा कर दिया गया था, इसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है। उन दिनों संजय गाँधी की एक मंडली थी, जिसमें बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और अंबिका सोनी प्रमुख थे। वहीं एक नाम रुख़साना सुल्ताना का भी जुड़ा था… यह नाम कुछ ख़ास था, जो बहुत से लोगों की आँख में खटकता था। 
जब हम इमरजेंसी लागू करने के कारण को खोजते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अपनी कुर्सी को बचाए रखने के लिए इंदिरा गाँधी ने यह कदम उठाया। हुआ कुछ यूँ कि 1971 के चुनावों में इंदिरा गाँधी रायबरेली से कांग्रेस पार्टी की प्रत्याशी थीं। उनके सामने चुनाव लड़ रहे थे, समाजवादी नेता राजनारायण। इंदिरा गाँधी भारी मतों से चुनाव जीत गईं। मगर ज़िद के पक्के राजनारायण ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इंदिरा गाँधी के विरुद्ध एक याचिका दायर करते हुए, उन पर चुनाव के दौरान धांधली का आरोप लगा दिया। 
राजनारायण ने आरोप लगाया था कि इंदिरा गाँधी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर एक सरकारी कर्मचारी थे, और उन्होंने अपने चुनावी कार्य के लिए सरकारी अधिकारियों का इस्तेमाल किया। यानि कि सीधा-सीधा सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का आरोप। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में अपने निर्णय से इतिहास ही रच दिया। सबसे पहले तो भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि देश के प्रधानमंत्री को अदालत में पेश होना पड़ा। इंदिरा गाँधी दो दिन अदालत में हाज़िर हुईं और उन्होंने सवालों के जवाब दिए। 

पेशी के दौरान प्रधानमंत्री को एक कुर्सी दी गई थी, जो उपस्थित वकीलों की अपेक्षा ऊँची थी, परंतु न्यायाधीश की कुर्सी से डेढ़ इंच नीची| सतीश त्रिवेदी के अनुसार, “यह संकेत था कि देश का कोई भी नागरिक न्याय के मंच पर समान है, चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो.” वकीलों को सख़्त हिदायत दी गई थी, कि वे प्रधानमंत्री के सम्मान में अपनी कुर्सी से खड़े न हों, क्योंकि वे अदालत में प्रधानमंत्री की हैसियत से नहीं आ रही हैं। यानि कि माहौल ऐसा था जो कि इंदिरा गाँधी के अहम को बुरी तरह आहत कर रहा था। ज़ाहिर है कि वे तो विश्वास ही नहीं कर पा रही होंगी, कि कानून के सामने अमीर-ग़रीब सब समान होते हैं। 
12 फरवरी 1975 को सुनवाई के दौरान कई चर्चित हस्तियों की गवाही हुई। इंदिरा गाँधी की ओर से पीएन हक्सर पेश हुए। वहीं राजनारायण की ओर से लालकृष्ण आडवाणी, कर्पूरी ठाकुर और एस निजलिंगप्पा ने गवाही दी। वकील के रूप में एस.सी. खरे, शांति भूषण, आरसी श्रीवास्तव, अटॉर्नी जनरल नीरेन डे और यूपी के महाधिवक्ता एसएन कक्कड़ कोर्ट में मौजूद रहें।
इंदिरा गाँधी पर लगाए गए सात में से पाँच आरोपों को अदालत ने निरस्त कर दिया। मगर दो आरोप इंदिरा गाँधी के विरुद्ध निर्णय देने के लिए काफ़ी थे। अदालत ने माना कि चुनाव के दौरान चुनावी गतिविधियों में सरकारी अधिकारियों की मदद ली गई और दूसरा यह कि एक विशेष सरकारी अधिकारी द्वारा प्रचार का प्रबंधन संभाला गया। जबकि वह उस समय औपचारिक रूप से सरकारी सेवा में काम कर रहा था। केस की पूरी सुनवाई के बाद जस्टिस सिन्हा ने अपना निर्णय सुनाया कि गड़बड़ियों का आरोप सही है। उन्होंने इंदिरा गाँधी की जीत को निरस्त कर दिया और उन पर  6 साल के लिए चुनाव में खड़े होने पर रोक लगा दी। 
इमरजेंसी लागू करने के कारण को जानना, हमारे पुरवाई के पाठकों के लिए  बहुत ज़रूरी था… इसीलिए  मैंने लगभग विस्तार से केस के मामले में जानकारी आपके सामने रखी। अदालत के फ़ैसले से आहत और कुर्सी छिनने के डर से बेचैन इंदिरा गाँधी ने भारत के संविधान की धज्जियाँ उड़ाते हुए कुछ असंवैधानिक फ़ैसले लिए। 1971 के पाकिस्तान युद्ध के बाद महँगाई बढ़ रही थी, आर्थिक संकट गहरा रहा था और विपक्षी दल लगातार इंदिरा गाँधी पर दबाव बना रहे थे। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में तमाम विरोधी दल मिल कर जो माहौल बना रहे थे, उनके लिए इंदिरा गाँधी के विरुद्ध अदालती निर्णय जैसे एक सुनहरा मौका बन रहा था। 
जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया और सशस्त्र बलों से आग्रह किया कि वे सरकार के ग़लत आदेशों को मानने से इंकार कर दें। 25 जून 1975 की रात विपक्षी नेताओं पर कहर बनकर टूटा था । आधी रात के समय देश भर के नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया। वामपंथ से लेकर घोर दक्षिणपंथी नेताओं में से किसी को भी नहीं बख़्शा गया। जून की गर्मी में जेलों में लोग ठूँसे हुए थे। जानवरों से बदतर हालात थे। संजय गाँधी ने खुले रूप से कह दिया था कि विपक्षी नेता कीड़े-मकौड़े से अधिक नहीं हैं। वे उन सबको कुचल कर रख देंगे। वैसे उस समय तो लालू प्रसाद यादव भी जेल गए थे। मगर राजनीति इंसान से क्या कुछ नहीं करवा लेती। 
वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर जी के अनुसार, “यदि उनके (इंदिरा गाँधी) पास तानाशाही प्रवृत्ति नहीं होती और असुरक्षा का अनुभव नहीं होता, तो वे अदालत के इस निर्णय को लोकतांत्रिक तरीके से लेतीं, लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।” मगर हुआ इसका ठीक उलट – एक आम भारतीय के मूलभूत अधिकारों का पूरी तरह से निलंबन कर दिया गया। इंदिरा गांधी या संजय गांधी के विरुद्ध एक भी शब्द बोलने का मतलब था कि आपको जेल में डाल दिया जाएगा और फिर आपके रिश्तेदार आपको ढूंढते रह जाएंगे। 
अंग्रेज़ी के वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल एवं अजय बोस ने अपनी पुस्तक – ‘ For Reasons of State – Delhi Under Emergency’ में लिखा है कि सरकारी अधिकारियों पर नसबंदी कोटा पूरा करने का बहुत दबाव था। जूनियर अधिकारियों ने इस आदेश को बेरहमी से लागू किया। दिहाड़ी वाले मज़दूरों से कहा गया कि आपको कोई एडवांस नहीं मिलेगा, कोई नौकरी नहीं मिलेगी, जब तक कि तुम सब नसबंदी नहीं करवा लोगे। कुछ ग़रीब लोगों ने तो लालच में नसबंदी करवा भी ली, क्योंकि नसबंदी करवाने पर उन्हें लगभग महीने भर की पगार के बराबर पैसे मिल जाते थे। बहुत-सी औरतें विलाप करते हुए रोती थीं, कि इंदिरा और संजय ने तो हमें विधवा बना दिया। हमारे घरवाले तो मर्द ही नहीं रहे! कई बार तो ऐसा भी हुआ कि लोगों को घरों से उठा-उठा कर उनकी नसबंदी करवा दी गई। बीस साल से सत्तर साल के बीच किसी भी मर्द की नसबंदी की जा रही थी। 

संजय गाँधी का तूफ़ान अवैध निर्माण पर भी कहर बन कर टूटा। एक लाख बीस हज़ार झुग्गी झोंपड़ियाँ तोड़ी गईं और सात लाख से अधिक लोग बेघर हो गए।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट पुरानी सब्ज़ी मंडी हुआ करती थी। उसके पास ही बर्फ़खाना होता था। बस स्टॉप का नाम था ‘सब्ज़ी मंडी बरफ़खाना’। उस सब्ज़ी मंडी के दुकानदारों को हुक्म दिया गया कि अपनी-अपनी दुकान को ख़ुद ही तोड़ दें। वरना सरकार तोड़ेगी, तो तोड़ने के पैसे भी लेगी और कचरा उठाने के भी। उस सब्ज़ी मंडी का कचरा हटा कर वहाँ संजय गाँधी ने अपनी नानी के नाम पर ‘कमला नेहरू रिज’ का निर्माण करवा दिया। नेहरू गाँधी परिवार का कोई सदस्य ऐसा नहीं छूटा होगा, जिसके नाम पर कोई मार्ग या पार्क या एअरपोर्ट का नाम न रखा गया हो।
तुर्कमान गेट पर अवैध निर्माण के दौरान ख़ासी हिंसा और संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई थी। इसे मुसलमानों के विरुद्ध समझा गया। उस समय डीडीए के अध्यक्ष थे जगमोहन। पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच गोलीबारी भी हो गई थी। 
इमरजेंसी के सबसे बड़े शिकार थे, समाचार माध्यम और न्यायालय। आम आदमी अपने मानवाधिकारों के लिए अदालत का दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता था। समाचार पत्रों के ख़बरों का पूरी तरह सेंसर किया जाता था। यहाँ तक कि इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक जागरण समेत अधिकांश समाचार पत्रों ने संपादकीय वाला भाग ब्लैंक छोड़ दिया था। दैनिक जागरण ने आपातकाल लगाने के फैसले का विरोध करते हुए अपने संपादकीय पृष्ठ को खाली छोड़ दिया था। अखबार के संपादकीय पेज पर लिखा था, “नया लोकतंत्र? (सेंसर लागू) … अंत में लिखा था… शांत रहें! वहीं पंजाब के बहुत से अख़बारों के संपादकीय पर लिखा था – “सेंसर की भेंट!” सरकार ने 200 से अधिक पत्रकारों को जेलों में ठूँस दिया था। 
कुछ लोगों को इस बात पर आश्चर्य होता था कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी ने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक श्री रामनाथ गोयनका को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया। इस बारे में  गोयनका जी ने स्वयं बताया था – कि एक बार उन्होंने फ़िरोज़ गांधी को इंडियन एक्सप्रेस में नौकरी दी थी। यह इमरजेंसी से बहुत पहले की बात है। उस समय इंदिरा और फ़िरोज़ दोनों ही गोयनका जी के बहुत करीबी थे। गोयनका जी उनके लिए पिता तुल्य थे। 
उन दिनों इंदिरा और फ़िरोज़ अपनी उथल-पुथल भरी शादी के मुश्किल दौर से गुज़र रहे थे और उनमें से प्रत्येक ने एक-दूसरे पर कई तरह के व्यक्तिगत अपराधों का आरोप लगाते हुए गोयनका जी को कई पत्र लिखे थे। रामनाथ गोयनका ने इन बेहद निजी पत्रों को सुरक्षित रख लिया था। रामनाथ गोयनका के अनुसार, इंदिरा गाँधी ने खुद को यह विश्वास दिला लिया था कि अगर उन्होंने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया होता, तो ये निजी पत्र तुरंत दुनिया भर के विदेशी प्रेस में प्रकाशित हो जाते। 
आज जो लोग हाथ में आज संविधान की प्रतियाँ उठाए शोर मचाते हैं कि भारत में अघोषित आपातकाल लागू है… वे नहीं जानते कि आपातकाल में जो लोग इंदिरा और संजय गाँधी के साथ नहीं थे, उनकी क्या हालत थी। आज आप प्रेस काँफ़्रेस और टीवी पर जो कह सकते हैं, उस तरह की बात आप 25 जून 1975 की रात के बाद 21 महीने तक अपने होंठों तक लाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। इन 21 महीनों में जितने ख़तरनाक परिवर्तन संविधान में किए गए, क्या वे कभी वापस हो पाएंगे… क्या कभी कोई ऐसी सरकार तीन चौथाई बहुमत से जीत कर आएगी, जो वह सब कर सके?
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
RELATED ARTICLES

54 टिप्पणी

  1. आपातकाल की पूरी कुंडली को खंगाल कर एक एक पहलू को प्रस्तुत करता हुआ एक समीचीन संदर्भ को रेखांकित करता,,,जानदार और जानदार संपादकीय।
    यह युवा लोगों के लिए यह बतौर रेडी रेकनर भी साबित हुआ है। यदि कोई जानना चाहे कि इमरजेंसी क्या थी तो यह संपादकीय संदर्भित किया जा सकता है।
    एक बेबाक चित्रण और वह भी तटस्थ और सटीक शब्दों में,,,वस्तुतः इस अमृत काल में ऐसे ही संपादकीय ,आलेख या संस्मरण पाठकों हेतु तैयार किए जाने चाहिएं।
    पत्रिका समूह और उसके निडर और स्पष्टवादी संपादक को सलाम।

  2. पुरवाई पत्रिका के इस बार का संपादकीय- सेंसर की भेंट के पचास साल’ आपातकाल की विभीषिका पर केंद्रित है। यह आपातकाल लोकतंत्र के लिए एक दाग के रूप में देखा गया है। उसका कारण है- सरकार के विरुद्ध बोलने पर विपक्ष के नेताओं को जेल में डालना, मीडिया पर सेंसर और आम-आदमी के मुंह बंद करवाना ये दाग नहीं है तो क्या है। जिस सरकार को, जिस पार्टी को देश ने पूजा हो उसके साथ अचानक ऐसा व्यवहार होने लगे तो उसका हतप्रभ होना स्वाभाविक था। जनता इंदिरा गांधी को ही देश मानने लगी थी। लोग इसे भी सहन कर जाते। लेकिन जबरन नसबंदी , पकड़-पकड़ नसबंदी ने लोगों को भयभीत दिया।
    उस समय मैं पांच छः साल का रहा होऊंगा। देश में क्या चल रहा था इसका ज्ञान नहीं था किन्तु इतना पता था कि सारे टीचरों की नसबंदी कर दी गई थी और आम लोगों को जबरन पकड़ कर नसबंदी की जा रही थी। लोग इतने भयभीत थे कि किसी भी वाहन की आवाज भर सुना जाए तो गांव में धूल उड़ जाती थी। मतलब सारे लोग दौड़ लगाकर ज्वार बाजरा के खेतों में मूंड़ औंधा कर घुस जाते थे। मैंने कोरोना काल का भय देखा है पर आपातकाल के भय के सामने कुछ भी नहीं था। मेरे पिता और चाचा ऐसे सांसत में रहते थे कि उन्हें देखकर हम रो देते थे।
    इमरजेंसी खत्म होने के बाद गांव के लोगों ने चैन की सांस ली थी। अब यह भय व्यंग्य में तब्दील हो गया था। लोग व्यंग्य में गाते –
    इंदिरा तोरे राज में, दो चीजन की हान।
    चकबंदी में खेत बिगड़ गए, नसबंदी में ज्वान।।
    इमरजेंसी पर सर आपने बहुत ही शोध पूर्ण संपादकीय लिखा है। इसे पढ़कर पूरा दृश्य आंखों के सामने स्पष्ट हो जाता है। उस समय की परिस्थितियां कितनी खौफनाक थी इसे पढ़कर जाना जा सकता है।
    इमरजेंसी में संपादकीय के जो पृष्ठ खाली छोड़ दिए गए थे वे आज इस पत्रिका में पूर्ण हो गए हैं।
    बढ़िया संपादकीय के लिए तेजेन्द्र सर जी को बहुत-बहुत बधाई।

    • ‘चकबंदी में खेत बिगड़ गये / नसबंदी में जवान’!… भाई लखनलाल पाल जी इमरजेंसी को लेकर आप को अपने बचपन की बातें भी याद हैं और आज का व्यंग्य भी। आप संपादकीय को जिस गहराई से पढ़ते हैं, उससे मुझे अधिक से अधिक शोध करने की प्रेरणा मिलती है।

    • अनिमा जी, आपको संपादकीय की सच्चाई ने स्तब्ध कर दिया; यह हमारे लिए संपादकीय की सफलता का प्रमाण है।

  3. इमरजेंसी काल के बारे में जिस विस्तार से आपने लिखा है, उतनी जानकारी तो कंगना रनौत अभिनीत फिल्म इमरजेंसी देखकर भी नहीं हुई थी। हां उस समय इंदिरा गांधी का दबदबा किस कदर था इसे देवकांत बरुआ के कथन ‘इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’ से समझा जा सकता है। जेपी का वह समय उनकी सक्रियता का था। विरोधी पार्टियों के लोग इमरजेंसी से बहुत अधिक प्रभावित हुए थे। आपने स्वयं लिखा है कि जानवरों की तरह उन्हें जेलों में ठूंसा गया। उस समय संजय गांधी का नाम बहुत आता था क्योंकि इंदिरा गांधी उन्हीं के परामर्श के अनुसार काम करती थीं। बहुत से पत्रकारों को जेल में डाला गया किंतु रामनाथ गोयनका जी बच गए;इसके पीछे जो कारण आपने दिया उससे एक नई जानकारी मिली। आपके संपादकीय की यह सबसे
    बड़ी विशेषता रहती है कि आप अत्यंत शोध पूर्ण ढंग से उसे लिखते हैं।
    आलेख इतना महत्वपूर्ण है कि इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहेगा। हार्दिक बधाई।

  4. इमरजेंसी के 50 साल पढ़ कर बचपन का जमाना याद आ गया । बहुत ही शानदार सम्पादकीय के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी को साधुवाद

  5. कुछ नए सच्चाई के साथ बहुत बढ़िया संपादकीय पढ़ने को मिला हार्दिक शुभकामनाएं

    • संगीता जी, बहुत से तथ्य समय की धूल के नीचे छिप जाते हैं। उन्हें धूल से निकाल कर, अच्छी तरह सफ़ाई करके आपके सामने प्रस्तुत करना हमारा प्रयास रहता है।

  6. सेंसर के 50 साल पढ़ कर बचपन का जमाना याद आ गया । बहुत ही शानदार सम्पादकीय के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी को साधुवाद

  7. आज का संपादकीय पढ़ कर कहीं ऐसा लगा की निर्भीक पत्रकारिता का एक ऋण जो आप पर रहा होगा उससे आज आप उऋण हो गये हो.. जेलबंदी से जो लौटे वो पूर्ण इंसान तो रहे पर नसबंदी ने तो पूरी एक क़ौम के अस्तित्व को कटघरे में ला खड़ा किया… परिणाम प्रत्यक्ष है आटे में नमक बन कर रह गए… भरे पूरे परिवारों के संदर्भ ही समाप्त हो गए और 2 से शांति 3 se क्रांति, 1 या 2 बच्चे – hote हैं घर में अच्छे, हम एक ही फूल खिलाएँगे ( कुछ तो कसम खाए रहे कि हम ऐसे ही मर मरा जाएंगे ) ke नारों ने नसबंदी को और कामयाबी दी … परंतु आपातकाल के बाद भी किसी ने चेताया नहीं कि नसबंदी के पीछे षड्यंत्र क्या थे? 21 महीनों में जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कौमें तबाह कर दी गयीं .. राजनीतिक फेरबदल तो फिर संतुलित हो गए पर वो परिवार जिनको कुटुम्ब कहा जाता था नसबंदी ki बलि ऐसे चढ़े कि आज तक वो रौनकें नही लौटी वो 5 मामा 6 मौसियों 10 ममेरे ,मौसेरे भाई बहनो वाला ननिहाल और 4 ताऊ जी, 5 चाचाजी, 5 bhua जी वाला दादके परिवार की चहल पहल शरारतें समय की स्मृति बन ke रह गए … हमारी अगली नस्लें इस गर्मजोशी से वंचित है तो इस के मूल में नसबंदी की भयावहता ही हैl
    भावुक हो रही मेरी कलम.. ise विश्राम deti हूं… आज ka संपादकीय एक पत्रकार की टीस है.. emergency में 21 महीने दफन रही पत्रकारिता और दफना दिए गए पत्रकारों को श्रद्धांजली है .. संपादक महोदय की कलम और पैनी हो…

    • किरण जी, आपने तो पुरवाई के संपादक को बहुत भारी ज़िम्मेदारी सौंप दी है। हमारा पूरा प्रयास रहेगा कि आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरते रहें।

  8. आपातकाल पर आपने विस्तार से लिखा, मुझे अच्छी तरह याद है उस दिन मैं शिवकाशी था, बैंगलोर ऑडिट में गया था वहां से शिवकाशी मामाजी के घर गया था , मामा जी के लड़के और भाभी जी के साथ उस दिन हमलोग कार से कोट्टायम सेवन फॉल देखने जा रहे थे, मार्ग में कार रेडियो पर सुना कि इंदिरा गांधी को चुनावको निरस्त कर दिया गया है और उन्हें प्रधान मंत्री की गद्दी छोड़नी होगी, तभी मैंने यह कहा था और मेरी डायरी में भी लिखित है कि कुछ बड़ा होगा ऐसा जो कभी न हुआ है। और 26 जून की प्रातः मैं शिवकाशी से मदुरै , मद्रास होता हुआ कलकत्ता सिउभ की फ्लाइट से लैंड किया तो सब कुछ असामान्य था न्यूज़ पेपर नहीं आये थे। हेस्टिंग्स घर पहुंचने पर देखा फोर्ट विलियम में स्पेशल चहलपहल थी। 12 बजे पता चला कि संघ जे सभी कार्यकर्ताओं को अरेस्ट कर लिया गया है। चिंता हुई तुरंत घर जमशेडपर फोन किया किबसब कुशल तो हॉइ न। सब कुशल नहीं था रितं को संयोग से चाचा को लेने पुलिस आयी थी पर वे नहीं मिले उन्हें दूर हटने को कह दिया गया।

    • हमारे संपादकीय ने आपको अपने युवा दिनों की याद दिला दी। आपके पास उस काल की निजी यादें मौजूद हैं। युवा पीढ़ी तक इमरजेंसी की सच्चाई पहुंचाना ज़रूरी है।

  9. आदरणीय संपादक महोदय
    इस अत्यंत स्पष्ट ,निर्भीक और साहसी (दुस्साहसी?)संपादकीय के लिए बधाई
    आपके स्पष्टवादिता ,निष्पक्ष पत्रकारिता को नमन!
    विपक्षी नेताओं और बुद्धिजीवियों की तो दुर्दशा थी ही, तुर्कमान गेट जैसे कांडों पर सामान्य जनता भी त्रस्त हुई। सरकारी सेवा में रथ कर्मचारियों के वेतन इसलिए रोक दिए गए कि वे अपने निर्धारित कोटे की संख्या में नसबंदी नहीं कर पाए। 18- 20 वर्ष की आयु के नवयुवकों की भी नसबंदी जबरन करा दी गई ! श्रीमान संजय गांधी का रुतबा तो किसी खूंखार तानाशाह से कमतर न था। जिस तरफ वे दौरे पर निकलते, वहां के सरकारी अधिकारी थर थर कांपते थे ,जब तक कि उनका दौरा पूरा ना हो जाए।
    नव युवाओं को इमरजेंसी की स्थितियों से परिचित कराने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

    • आदरणीय सरोजिनी जी, आपने अपनी यादों के झरोखों से उस काल की सच्ची तस्वीर पेश कर दी है। हार्दिक धन्यवाद।

  10. सर्वप्रथम तो पुरवाई डिजिटल पत्रिका को उपलब्ध कराने के लिए संपादक माननीय तेजेंद्र शर्मा साहब का आभार व्यक्त करता हूं पुरवाई का संपादकीय का हफ्ते भर का बेसब्री से इंतजार रहता है. कारण पेशेगत व्यस्तता के चलते समयभाव रहता है और आजकल डिजिटल मीडिया पर अनाप सनाप ,ऊलजुल पढ़कर समय की बरबादी और मन मिजाज बिल्कुल ही दूषित और खराब हो जाता है जिससे कि मानसिक और शारीरिक व्याधियां हो जाती उस स्थिति में जब पुरवाई का संपादकीय पढ़ने को मिल जाए तो मन और आत्मा दोनों तृप्त हो जाते .
    इस सप्ताह के संपादकीय का शीर्षक ही कुछ और से अलग हटकर है *सेंसर के भेंट *के पचास साल
    आइए समझे ये सेंसर क्या होता है * सरकार द्वारा चिट्ठी पत्री,सिनेमा आदि की प्रकाशन से पहले सरकार द्वारा जांच पड़ताल यानी कि नॉर्थ कोरिया की तरह सरकार जो चाहेगी वही आपको कहना है लिखना है यानि मुंह पर ताला लगना जनता की अभिव्यक्ति पर ताला लग जाना क्या सटीक शीर्षक है .सोशल मीडिया पर तो इस सेंसर को,आपातकाल और इमेजेंसी को भी लोग सेलेब्रिट कर रहे जैसे को सुखदाई इवेंट हो. इमर्जेंसी त्रासदी थी, यातना था और लोकतंत्र के लिए काला अध्याय था
    संपादक महोदय ने इसे सिलसिले बार ढंग से क्रिस्टल क्लियर की तरह समझाया है वो सारगर्भित है.
    सही में इमर्जेंसी जेलबंदी और नसबंदी था भयानक और भयावह स्थिति थी आदमी घर से निकलता था काम पर शाम में घर लौट पाता नहीं पता चलता था उसका नसबंदी हो गया अस्पताल में पाया जाता था. संघ कार्यकता की शादी थी वर्मा भैया दूल्हा थे उन्हें बारात से लौटे ही पति पत्नी को जेल में डाल दिया गया .
    उस समय मैं दशमीं कक्षा में पढ़ता था गर्मियों की छुटियां मनाकर अपने गांव जो पटने के पास लौटा था .उस साल सन 1975 में खूब गर्मी पड़ी थी अमूनन 15 जून तक मानसून आ जाता था लेकिन उस बरस सूर्यदेव अग्नि बरसाकर पृथ्वी को झुलस रहे थे ,लोगों को क्या पता कि इससे बड़ा संकट इमर्जेंसी आनेवाला है . जिसका सिलसिले बार ढंग से तेजेन्द्र से वर्णन किया है मै प्रत्यक्षदर्शी रहा भयावह माहौल का, पूरा झेला कारण मेरे एक चाचा संघी रहे उन्हें भी 21 महीने 18 दिन रहना पड़ा जेल में शिक्षक भी थे नौकरी भी उनकी जाती रही.
    यह संपादकीय उन लोगों के लिए है जो अभी पचास वर्ष से कम उम्र के है सर पूरी बात समझा दी है. सभी तत्वों और तथ्यों को माला में पिरो दिया है.
    संपादक श्री तेजेन्द्र से और पूरे पुरवाई टीम को आभार और साधु साधु
    श्री शिव शंकर

    • सिंह साहब, इतनी अधिक तारीफ़ कहीं हमारा दिमाग़ ना ख़राब कर दें। आपने क्योंकि इमरजेंसी के 21 महीने स्वयं भोग रखे हैं, आप संपादकीय में व्यक्त दर्द को बेहतर समझ सकते हैं! हार्दिक धन्यवाद।

  11. जितेन्द्र भाई: आपका इस बार का सम्पादकीय बहुत ज़बरदस्त है। अपनी कुर्सी कायम रखने के लिए जो पचास साल पहले इन्द्रा गांधी ने संजय गान्धी को आगे करके, या वो खुद हुआ था आगे, भारत और भारतवासियों पर जो इन्तिहा ज़ुल्म किए थे,उनकी याद्दाश्त को ताज़ा कराने के लिए बहुत बहुत साधुवाद। ज़बर्दस्ती जेलबन्दी, नसबन्दी, समाचार पत्रों पर censorship और भारत के संविधान की धज्जियाँ उड़ाकर इन्हों ने “बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा” वाली कहावत को साकार कर दिया है। इस सब के बावजूद भी आजकल के हालात को देखते हुए, नेहरू पीढ़ी के Prince of Wales राहुल गांधी और उसके चमचे जिस बेशर्मी से अपनी देशभक्ती को प्रोमोट कर रहें हैं, वो काबिले तारीफ़ है। देखने में तो ऐसा लगता है कि भारत की जन्ता का attention span बहुत छोटा है और उसने सब कुछ भुला दिया, इतिहास से कुछ नहीं सीखा, और इस परिवार के सारे घिनौने और काले कारनामों को अपने ज़हन से निकाल दिया। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी जन्ता ने इसे क्षमा कर दिया हो, जो जन्ता का बड़प्पन है। यदि यह क्षमादान है तो इसका एहसान मानो, लेकिन इन बेशर्मों ने तो अब भी अपनी मनमानी करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी। सत्तर साल तक सत्ता में रहने से नेहरू ख़ान्दान और काँग्रेसियों के मुंह ख़ून लग गया है और सत्ता खो जाने पर अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोच रही है। जैसे जैसे अब नेहरू परिवार के काले कार्नामे सामने आरहे हैं, उसके हिसाब से, अगर इन में थोड़ी सा भी आत्मसम्मान बाकी है, तो इन सब को “स्वयं” अपना निवास दस जनपथ से हटाकर तिहाड़ जेल में ले लेना चाहिए।

    • जनता का attention span सच में बहुत छोटा है। आज की युवा पीढ़ी के लिए तो दूसरा विश्व युद्ध, 1947 का बंटवारा, 1962 का चीनी आक्रमण और 1971 में भारत द्वारा बांग्लादेश का निर्माण करना – सभी कहानियां हैं। उन्हें याद दिलाते रहने की आवश्यकता है।

      • आप ने बिल्कुल ठीक कहा है जितेन्द्र भाई। समय की भागा दौड़ी में हम भूल रहे हैं कि हमारा इतिहास क्या है। सत्तर साल तक तो हमारे गले में मुग़लों के इतिहास को ज़बर्द्सती ठूँसा गया। समय आगया है कि इस और भी ध्यान दिया जाए।

        • मुझे इसीलिये महसूस हुआ कि युवा पीढ़ी को इस काल की जानकारी उपलब्ध करवाना हमारी ज़िम्मेदारी है।

  12. धन्यवाद, ऐसे ही सम्पादकीय की आपसे अपेक्षा थी, मै उस समय 8 साल था , मुझे समझ नहीं आता था कि लोग चौराहे पर खड़े हुए लोग डरे सहमें क्यों रहते थे या एक भी पुलिस वाले को देख कर सब तितर- बितर क्यों हो जाते थे.. ये निश्चित है कि आपातकाल को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता जो कतिपय लोग करने में गुरेज नहीं करते , वहीं राजनीति इस मामले में कितनी बेशर्म है इसका कोई शानी नहीं ।

  13. सचमुच घुटन का एक विकट समय था वह। आपने एक शब्द चित्र सा बना दिया है उस काल खंड का। यह संभवतः वही समय था जब संविधान में भारत के लिए सेक्युलर शब्द जोड़ दिया गया था।

  14. बहुत महत्वपूर्ण है इस बार का संपादकीय। बहुत सारी जानकारी मिली।
    निःशब्द
    बधाई

  15. आदरणीय तेजेंद्र जी
    नमस्कार
    आपातकाल की विभीषिकाओं के संदर्भ में लिखे आपके संपादकीय ने उन दिनों की अनेक दुखती रगों के दर्द को एकबारगी फिर से महसूस करा दिया है।
    उन दिनों मैं पटरे के कपड़े का पायजामा पहनने वाला 16 साल का सीधासादा किसान का लड़का था। मुझे खूब याद है हमारे गाँव में नसबंदी करनेवाले सरकारी अमले की आने की खबर सुनकर गाँव लोग किस तरह बदहवास होकर खेतों की ओर भाग गए थे। गांव में औरतों बूढ़ों तथा बच्चों को छोड़कर बहुत सारे लोग घर छोड़कर खेतों और जंगल में भाग गए थे।तीन-चार दिन तक खेतों में छुपे रहे। कोई ज्वार के खेत में छुपा रहा, कोई जंगल में झाड़ी में छुपा बैठा रहा। आपातकाल का दंश और नसबंदी की दहशत मैंने खेतों में छुपे रहे पिता के घर लौटने पर उनके चेहरे पर साफ-साफ महसूस की थी…। बाद में पता चला कि पड़ोस के गाँव के किसी बुजुर्ग की जबरन नसबंदी कर दी गई है।
    आपके संपादकीय में आपातकाल से जुड़ी बहुत सारी अनजानी बातें भी उजागर हुई हैं। जिन्हें पढ़कर अनेक पाठक लाभाविन्त होंगे।
    आपका यह संपादकीय ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है।
    आपकी निर्भीक कलम को बार-बार सैल्यूट करता हूँ।
    बहुत-बहुत धन्यवाद

    • भाई रामशंकर भारती जी, – आपातकाल का दंश और नसबंदी दहशत – आज की युवा पीढ़ी आसानी से समझ नहीं सकती है। आपके समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  16. बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक सम्पादकीय। आपने इस विषय पर जितना विस्तार से लिखा है आदरणीय तेजेन्द्र जी, वह हम जैसी पीढ़ी के लिए बहुत ग़ौरतलब है जो उस दौर में लगभग बाल अवस्था में ही थे; और बड़े-बूढ़ों से ही सुनी बातों को समझने का प्रयास ही किया करते थे।
    आपके इस संपादकीय को निःसन्देह आपातकाल के दौर का समग्र विवेचना सहित निष्कर्ष कहा जा सकता है, जो सहज ही आज की पीढ़ी को जागृत करने में सक्षम है।
    संपादकीय के अंत में आप के कहे शब्द “आज जो लोग हाथ में…” निःसन्देह एक तमाचा है, उन लोगों के मुख पर; जो आज हर बात में संविधान की दुहाई देकर वर्तमान सरकार को घेरना चाहते हैं।
    हार्दिक बधाई और प्रशंसा के साथ सादर आदरणीय।

    • विरेन्द्र भाई संपादकीय आपके दिल तक पहुंच सका, यही हमारी सफलता है। हार्दिक धन्यवाद।

  17. आपातकाल का दौर हमारी पीढ़ी के लिए अविस्मरणीय है ।यद्यपि छात्र जीवन था ,तो20सूत्रीय आर्थिक कार्यक्रम को सिलेबस में शामिल कर दिया गया था ।जिन्हें पढ़ना भी था भाषण का, कविता का मुख्य विषय था उन दिनों ।उस समय युवाओं को सब अच्छा अच्छा ही लग रहा था ,बड़े तस्करों का पकड़ा जाना, अवैद्य सम्पत्तियों को जब्त करना ये सरकार की प्रशंसा में अखबार की मुख्य बातें होती थी । आज सोचकर लगता है कि वो सब स्वहित में था देशहित में नहीं ।
    Dr Prabha mishra

  18. आदरणीय प्रभा जी, 20-सूत्री कार्यक्रम का पाठ्यक्रम में शामिल होना उस सरकार की सोच को दर्शाता है। बहुत दहशत भरा काल था।

  19. सादर प्रणाम भाई। बेहद संवेदनशील मुद्दा उठाया है आपने इस बार भी,हमेशा की तरह। पुरवाई का संपादकीय मेरे लिए विगत इतिहास से जुडने समझने का एक सशक्त माध्यम है।जहां बहुत सी बातें अपने उलझाव और विवाद के भय से अनसुनी अनकही रह जाती हैं,उन्हें जब आप सच्चाई के साथ सुनते हैं मन चौंकता है,चेतना दिग्भ्रमित हो जाती है जिनमें एक था आपातकाल।मै तब बहुत छोटी थी लेकिन पिताजी और उनके मित्रों को चिंतित होकर रेडियों से एक एक पल की खबर सुनते जरुर देखा है।मैं तो यह.सोच भी नहीं सकती थी कि जिस संविधान की लोग कसम खाते हैं,हमें उसका सम्मान करना सिखाया जाता था उसका कभी एक.प्रधानमंत्री भी इस तरह मजाक उडाकर कसम तोड सकता है। अब जब बहुत कुछ जाना और समझ पायी हूं जहां तक मेरा मन व्यथित और विचलित हो गया है। संतोष यही है कि न्यायालयने अपना निर्णय निष्पक्ष सुनाया औरदेश की प्रधानमंत्री को.भी कोर्टमें पेश होना पडा औरउन्हे जज से नीची कुर्सीदेकर बताया गया कि न्याय सदैवसबके लिएएक है।जैसा संपादकीयमें आपने लिखा है। *यह संकेत था कि देश का कोई भी नागरिक न्याय के मंच पर समान है। चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो*। बहुत ही अच्छा लगा वर्षों बाद जो बातें आज सामने आयी हैं सारे संदर्भों के.साथ उसे देश को जानना जरुरी था। हार्दिक आभार आपका,मै पहली बार बहुत सी बातों को जान पाई। धन्यवाद भाई, बहुत बहुत धन्यवाद पुरवाई को।…..पद्मा मिश्र

    • पद्मा इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। हमें एहसास होता है कि यह हमारा कर्तव्य है कि हम आपकी और आपके बाद की पीढ़ियों को इमरजेंसी काल के हालात से परिचित करवा सकें। ऐसा इसलिये भी कि हम नहीं चाहते भारत को कभी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़े।

  20. आपकी बेबाक़ लेखनी ने आपातकाल के उन बुरे दहशत भरे समय का ऐसा विस्तृत वर्णन किया है, जिसने उन दिनों की याद ताज़ा कर दी।डरे, सहमे- सहमे से लोग। घुटन भरा माहौल । कई बेचारे गरीब अविवाहितों की नसबंदी करवा दी। विवाहोत्सव में चार लोग अधिक चले गए तो पिटाई हो गई।विरोध का एक शब्द निकला नहीं कि जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ। कैसा समय था, कैसा भयभीत कर देने वाला वातावरण, जो इतिहास में एक काला पन्ना बनकर रह गया। कभी मैं इन्दिरा गांधी को मानती थी, पर उसके बाद वह मेरे दिल से उतर गईं।
    महत्वपूर्ण सम्पादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुदर्शन जी, आपने बिल्कुल ठीक कहा… एक ओर तो अविवाहितों की नसबंदी हो गई तो दूसरी ओर बूढ़ों को भी नहीं बख़्शा गया।

  21. आपातकाल की पूरी कुंडली को खंगाल कर उसके एक एक पहलू को प्रस्तुत करता हुआ एक समीचीन संदर्भ को रेखांकित करता,,, जानदार और शानदार संपादकीय।

    यह युवा लोगों के लिए यह बतौर रेडी रेकनर भी साबित हुआ है। अब यदि कोई जानना चाहे कि इमरजेंसी क्या थी तो यह संपादकीय संदर्भित किया जा सकता है।

    एक बेबाक चित्रण और वह भी तटस्थ और सटीक शब्दों में,,,वस्तुतः इस अमृत काल में ऐसे ही संपादकीय ,आलेख या संस्मरण पाठकों हेतु तैयार किए जाने चाहिएं।

    पत्रिका समूह और उसके निडर और स्पष्टवादी संपादक को सलाम।
    सूर्यकांत शर्मा

    • भाई सूर्यकांत जी, हमारा उद्देश्य भी यही रहा है कि युवा पीढ़ी को उनके इतिहास के इस डरावने चैप्टर से परिचित करवाया जाए। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  22. आदरणीय, आपातकाल स्वतंत्र भारत के राजनीति के उत्तर लोकतांत्रिक इतिहास की ऐतिहासिक, सर्वाधिक विवादास्पद और अविस्मरणीय घटना जिसने संवैधानिक संकट, तो उत्पन्न किया ही साथ ही प्रेस स्वतंत्रता पर रोक व मानवाधिकार का हनन भी किया गया; इस पूरे परिदृश्य को अपने संपादकीय के माध्यम से अपनी पारखी दृष्टि और प्रत्यक्ष दर्शी अनुभवकर्ता के रूप में जीवंत संस्मरण के रूप में आपने प्रस्तुत किया है, जिसमें अनेक ऐतिहासिक तथ्यों, दस्तावेजों व उद्धरणों का समावेश तो है ही, इसके दुरुपयोगों,दुष्परिणामों के यथार्थ को मानवीय दृष्टि प्रदान की है। न केवल ऐतिहासिक संदर्भ में अपितु वर्तमान संदर्भ में भी आपका यह लेख अत्यंत प्रासंगिक है। इस लेख में आपकी ये पंक्तियां,”आज जो लोग हाथ में आज संविधान की प्रतियाँ उठाए शोर मचाते हैं कि भारत में अघोषित आपातकाल लागू है… वे नहीं जानते कि….
    ….. आज आप प्रेस काँफ़्रेस और टीवी पर जो कह सकते हैं, उस तरह की बात आप 25 जून 1975 की रात के बाद 21 महीने तक अपने होंठों तक लाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। इन 21 महीनों में जितने ख़तरनाक परिवर्तन संविधान में किए गए, क्या वे कभी वापस हो पाएंगे… क्या कभी कोई ऐसी सरकार तीन चौथाई बहुमत से जीत कर आएगी, जो वह सब कर सके?”,भारतीय राजनीति को तुलनात्मक दृष्टि प्रदान करती है साथ ही आज की भारतीय लोकतंत्र और राजनीति पर प्रभावशील तीक्ष्ण व्यंग्य भी है, जो पाठक वर्ग को से संबंधित विषय के प्रति चिंतन के लिए आंदोलन करता है।
    अतः आपका यह संपादकीय ऐतिहासिक तथ्यों से समृद्ध और वैचारिक दृष्टिकोण से संपृक्त है, जो राजनीतिक और लोकतंत्र के प्रति शासन और जनता की प्रतिबद्धता और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए
    संकल्पित है।
    साधुवाद ।

    • प्रिय ऋतु, आपने बेहद सटीक टिप्पणई के माध्यम से इमरजेंसी काल को जैसे चित्रित ही कर दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

  23. 1974 में एअरइंडिया का Accounts Department चार नये मंज़िला भवन में शिफ़्ट हुआ था हम बहुत खुश थे पर Emergency लगते ही मानो मनहूसियतों ने हमें घेर लिया था अपने ही साथियों से खुलकर बात करने में डर जैसा महसूस होता था क्योंकि सूत्रों ने ख़बर दी थी कि MISA के तहत कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को भी बर्खास्त करने की योजना बनाई जा रही है। ईर्ष्या द्वेष के चलते मेरा नाम भी लिया जा रहा था। ख़ैर ऐसा कुछ नहीं हुआ पर सबका दिल तो दहल गया ही था। चारों तरफ़ pindrop ख़ामोशी का आलम था। आफिस के बाहर भी किसी से बात करने की हिम्मत नहीं होती थी। हाँ एक बात ज़रूर हो गई थी कि सारे काम समय से होने लग गये थे यहाँ तक कि ट्रेन के arrival departure के वक़्त से आप अपनी घड़ी मिला सकते थे।
    मुंबई (तब बंबई) शहर थम सा गया था। “बंबई रात की बाँहों में “ वाला नजारा देखने को नहीं मिल रहा था। शहर में या उसके बाहर क्या कुछ विशेष हो रहा था कुछ भी नहीं मालूम पड़ रहा था जो कुछ हम जाने वह सब 21 महीने बाद ही जाने।
    वह दौर याद आता है तो आज भी सिहरन पैदा हो जाती है। ईश्वर न करे कि फिर कभी वह काला दौर भारत में आए।
    सचमुच संविधान की निर्मम हत्या की गई थी। आपने बड़ी ही विस्तृत जानकारी दी है संक्षिप्त में। उस समय के बाद के पुरवाई के पाठकों के लिए आवश्यक संपादकीय।

    • भाई इन्द्रजीत जी, आप तो हमारे बड़े भाई हैं, तो ज़ाहिर है कि आपके अनुभव हमसे कहीं अधिक ऑथेंटिक होंगे। सच में उस दौर की याद से सिहरन पैदा हो जाती है।

  24. हमारे मोहल्ले में एक सिंह साहब हैं।जिनकी विवाह पूर्व ही नसबंदी कर दी गयी थी इमरजेंसी के दौरान।आज भी वो उस संत्रास से मुक्त न हो पाये।ऐसे अनगिनत युवाओं की पीड़ा को शब्द दे दिये आपके संपादकीय ने।बहुत ही बुरा समय था।हमारे फूफा जी राजनीति में थे तो उनके भूमिगत होने के बाद हमारे घर तक की तलाशी ली गयी थी।जो किया उसका अंजाम संजय गांधी और इंदिरा गाँधी ने भुगता भी।ऊपर वाले की लाठी की आवाज सुनाई नहीं पड़ती पर जीवन मरणांतक बना देती है।

  25. https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-emergency/

    आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    आपके इस बार के संपादकीय के माध्यम से हम इमरजेंसी के काले और कड़वे पक्ष का अत्याचार व दर्द जान सके।
    जेलबंदी और नसबंदी सुनते रहे, पर उसकी भयावहता से अनभिज्ञ ही थे।आज संपादकीय पढ़कर,सच कहें तो स्तब्ध रह गये।
    इस वक्त पीछे लौटते हुए याद करने की कोशिश करते हैं तो 25 साल की उम्र में सरस्वती शिशु मंदिर के सभी शिक्षकों का अंडर ग्रांउड होना याद आता है ,जहाँ हमारी बहनें व उनके जैसी अन्य ,उन स्कूलों के लिये फ्री सेवा दे रही थीं।
    बहरहाल पूरा संपादकीय पढ़कर महसूस हुआ कि राजसत्ता का अंधा मोह किस हद तक विनाशकारी हो सकता है।जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिये इस तरह हो यह अकल्पनीय है। राजनीतिक लोभ के मद्देनजर कूटनीतिक दाँव किस हद तक अमानवीय हो सकते हैं!!! सोचना मुश्किल होता है
    *आपातकाल घोषित हो या अघोषित; हर हाल में बुरा है।*
    भोगनेवाला ही अपना दर्द समझ सकता है।
    ईश्वर न करे कि भविष्य में कभी किसी दुश्मन को भी इस तरह कि स्थितियों से गुजरना पड़े।
    इस अप्रत्याशित, अकल्पनीय है व डरावने सत्य की स्थिति पुनः न बने, ऐसी प्रार्थना ही कर सकते हैं।
    इस संपादकीय ने शॉक्ड किया। आपकी निर्भीकता को सलाम।
    थोड़ा लिखे को अधिक समझें।
    इस सत्य से रूबरू करवाने के लिए आपका शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

    • आदरणीय नीलिमा जी हैरानी है कि आप उस काल की तुलना किसी अघोषित आपातकाल से कर रही हैं, जो कि पूरी तरह से आपकी कल्पना शक्ति की उपज है। शायद आपको और आपके परिवार को 1975 जून के बाद के 21 महीनों में किसी प्रकार की समस्या महसूस नहीं हुई होगी। वरना आप कभी भी वर्तमान की उस काल से तुलना नहीं करतीं। दरअसल क्या होता है कि जब हम किसी राजनीतिक दल विशेष के साथ जुड़े होते हैं, तो हम ऑब्जेक्टिव यानी कि तटस्थ होकर नहीं सोच पाते। मगर लोकतंत्र की यही तो महानता है। आप अपनी बात अपने अंदाज़ में रख सकते हैं।

  26. इस बार का आप का संपादकीय हमारे देश के
    उस ऐतिहासिक समय के विस्तृत विवरण देता हुआ हमें उस अन्याय व सरकारी अत्याचार के प्रति सजग करता है जो उन दिनों सभी भारतीयों के मन में असुरक्षा का भाव ले आया था।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest