Sunday, March 8, 2026
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संपादकीय – इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम

हमारे बचपन में जब कभी कोई विदेश जाता था, तो कहा जाता कि  “मुण्डा वलैत गया है।” यानी कि विदेश जाने का एक ही अर्थ था कि विलायत गया है। चाहे कोई अमेरिका गया है या हाँगकाँग या फिर नैरोबी या युगांडा… हमारे लिए विलायत ही गया होता था। सवाल यह भी है कि क्या कभी हमने सोचा कि यह विलायत आख़िर है क्या बला! जहाँ से गोरे अंग्रेज़ भारत पर राज करने आए थे, दरअसल उसी की कल्पना को विलायत कहा जाता था। तो आज हम इस बात का पता लगाते हैं कि आख़िर वह विलायत है क्या…?

इस समय पूरे विश्व का ध्यान ईरान, इज़राइल और अमेरिका पर केंद्रित है। पूरा मिडल-ईस्ट बंब-धमाकों से त्रस्त है। भारत का विपक्ष इन सबका ज़िम्मेदार भारत के प्रधानमंत्री को ठहरा रहा है। पूरी दुनिया में ट्रंप की दादागिरी की आलोचना हो रही है। ईरान की नारी-शक्ति ख़ामेनाई की मृत्यु पर ख़ुश हो रही है। दुनिया तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है। ऐसे में ज़ाहिर है कि ‘पुरवाई’ के पाठक अपेक्षा कर रहे होंगे कि आज का संपादकीय इसी विषय पर केंद्रित हो। 
एक संपादक के तौर पर मैंने महसूस किया है कि राजनीति और धर्म दो ऐसे विषय हैं, जिन पर निष्पक्ष होकर न तो लिखा जा सकता है, और न ही बोला जा सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चक्कर में मैंने कई मित्र खो दिए हैं। मज़ेदार बात यह है कि जिन मित्रों ने मुझसे बात करनी बंद कर दी है। मैं यह सोच कर हैरान हो लेता हूं कि जिस इन्सान को हम कभी मिलने वाले ही नहीं है, उसके चक्कर में अपनी मित्रता क्यों खोने को तैयार हो जाते हैं।  
इस बात को ध्यान में रखते हुए,  यह तय किया गया कि इस सप्ताह हम एक बिल्कुल अलग ही विषय की जानकारी अपने पाठकों को देंगे।… आपने ये चार नाम अवश्य ही सुन रखे होंगे – इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम… क्या आपने कभी सोचा कि ये नाम क्या एक ही देश के हैं, या फिर इन नामों के पीछे कोई और इतिहास भी है। 
हमारे बचपन में जब कभी कोई विदेश जाता था, तो कहा जाता कि  “मुण्डा वलैत गया है।” यानी कि विदेश जाने का एक ही अर्थ था कि विलायत गया है। चाहे कोई अमेरिका गया है या हाँगकाँग या फिर नैरोबी या युगांडा… हमारे लिए विलायत ही गया होता था। सवाल यह भी है कि क्या कभी हमने सोचा कि यह विलायत आख़िर है क्या बला! जहाँ से गोरे अंग्रेज़ भारत पर राज करने आए थे, दरअसल उसी की कल्पना को विलायत कहा जाता था। तो आज हम इस बात का पता लगाते हैं कि आख़िर वह विलायत है क्या…?
वर्ष 1535 से पहले वेल्स, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड तीन अलग-अलग राज्य हुआ करते थे। 1536 में हेनरी VIII ने एक बिल पास किया  ‘एक्ट ऑफ़ यूनियन’ – एक कानून, जिसने मूल रूप से इंग्लैंड और वेल्स की न्यायिक प्रणालियों को मिला दिया, जिससे वेल्स प्रभावी रूप से इंग्लैंड का एक प्रांत बन गया। हालाँकि, इससे पहले, वेल्स के विभिन्न क्षेत्रों पर सदियों से एंग्लो-नॉर्मन शासन था, कुछ जगहों पर लगभग 500 साल। मगर स्कॉटलैंड अभी भी एक स्वतंत्र राज्य था। 
इंग्लैंड और स्कॉटलैंड का आधिकारिक तौर पर 1 मई 1707 को एकजुट होकर ‘ग्रेट ब्रिटेन’ राज्य का गठन किया। यह राजनीतिक एकता 1707 के संघ अधिनियम के माध्यम से स्थापित किया गया था, जिसे स्कॉटिश और अंग्रेजी दोनों संसदों द्वारा पारित किया गया था, जिसके अंतर्गत दोनों राज्यों को एक ही राज्य में मिला दिया गया, और उनकी संसदों का विलय कर दिया।
यहाँ हमें स्मरण रहे कि इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड की आज भी अलग-अलग राजधानियाँ हैं, और अलग-अलग संसद भी है। इंग्लैंड की राजधानी है लन्दन, जो कि यूनाइटेड किंगडम की भी राजधानी है। वेल्स की राजधानी है कार्डिफ़, स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिनबरॉ। दरअसल एडिनबरॉ 1437 से स्कॉटलैंड की राजधानी है। ठीक इसी तरह उत्तरी आयरलैंड की राजधानी है बेल्फ़ास्ट। 
जहाँ तक करेंसी का सवाल है, पूरे यूनाइटेड किंगडम में ब्रिटिश पाउंड करेंसी के रूप में चलता है। ब्रिटिश करेंसी के सिक्के तो ढलते भी वेल्स में ही हैं। मगर स्कॉटलैंड की सरकार अपने तीन बैंकों से भी पाउंड के नोट छापती है। विदेश और रक्षा के तमाम अख़्तियार इंग्लैंड के पास सुरक्षित हैं। 
जहाँ तक आयरलैंड का प्रश्न है, इंग्लैंड ने 700 वर्षों तक आयरलैंड पर राज किया था। कहा जाता है कि आयरलैंड इंग्लैंड की पहली कॉलोनी थी। 1922 में आयरलैंड एक अलग देश बन गया, मगर उत्तरी आयरलैंड पर इंग्लैंड का कब्ज़ा बना रहा। वहाँ की करेंसी भी ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग ही है। मगर जैसे ही आप उत्तरी आयरलैंड से आयरलैंड में प्रवेश करते हैं तो वहाँ की करेंसी बन जाती है यूरो। उत्तरी आयरलैंड की राजधानी है बेल्फ़ास्ट तो आयरलैंड की राजधानी है डबलिन। 
इस तरह से हम यह कह सकते हैं कि इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड से मिल कर ‘ग्रेट ब्रिटेन’ बनता है, और ये तीनों राज्य ब्रिटेन के घटक देश कहलाए जाते हैं- अंग्रेज़ी में ‘कॉन्सिटिचुएंट कंट्रीज़’।  मगर जब उसमें उत्तरी आयरलैंड भी मिल जाता है, तो बनता है यूनाइटेड किंगडम। मगर बोलचाल की भाषा में ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम को केवल ब्रिटेन कह कर भी बुलाया जाता है। 
यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि ओलंपिक खेलों में तो यूनाइटेड किंगडम एक देश की तरह भाग लेता है, वहीं बहुत से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड स्वतंत्र देशों की तरह प्रतिभागी होते हैं। 
कहा जाता है कि ब्रिटिश लोग आदतों के गुलाम हैं, और कई खेल राजनीतिक बदलावों के बावजूद अपने मूल स्वरूप में ही बने रहे हैं… उदाहरण के लिए : फ़ुटबॉल इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड का खेल है; रग्बी यूनियन इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और आयरलैंड (संयुक्त) का खेल है; टेस्ट क्रिकेट को इंग्लैंड का खेल कहा जाता है, लेकिन इसमें इंग्लैंड और वेल्स भी शामिल हैं; टेनिस डेविस कप ग्रेट ब्रिटेन का खेल है।
स्कॉटलैंड ने भी अंग्रेज़ी साहित्य को बड़े दिग्गज लेखक दिए हैं। सर वाल्टर स्कॉट (1771-1832), आर्थर कॉनन डॉयल (1859-1930) – जिन्होंने शर्लक होम्स जैसे चरित्र का सृजन किया, कवि रॉबर्ट बर्न्स (1759-1796), रॉबर्ट लुई स्टीवन्सन (1850-1894), पीटर पैन जैसे चरित्र का निर्माण करने वाले जे. एम. बैरी (1860-1937) कुछ ऐसे दिग्गज नाम हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य को समृद्ध किया है। 
आयरलैंड के अंग्रेज़ी लेखकों के नाम पढ़ कर तो सिर श्रद्धा से झुक जाता है। ‘गुलीवर ट्रैवल्स’ जैसी महान रचना के लेखक जोनाथन स्विफ़्ट, विलियम बटलर येट्स, सी.एस. लुई, ऑस्कर वाइल्ड और जेम्स जॉयस सभी आयरिश मूल के लेखक और कवि थे। मगर साहित्य सबको अपने भीतर समेट लेता है, इसलिए ये तमाम महान लेखक केवल अंग्रेज़ी के लेखक कहलाते हैं, और भारत के विश्वविद्यालयों में भी इन्हें अंग्रेज़ी साहित्य के पाठ्यक्रम में बिना किसी देश का नाम लिए शामिल कर लिया जाता है। 
मुझसे एक अंग्रेज़ सांसद ने, जो कि मेरे मित्र भी हैं, एक बार सवाल पूछा, “एक बात बताओ भाई, तुम लोग इंग्लैंड में आने के बाद भी इंडियन, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी क्यों बने रहते हो… ब्रिटिश क्यों नहीं बन जाते?”
मेरा जवाब बहुत सीधा था। मैंने कहा, “टोनी, असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी लोग हैं। तुम लोग तो बँटे हुए लोग हो। कोई इंग्लिश है तो कोई स्कॉटिश, कोई वेल्श है तो कोई आयरिश… क्या तुम कभी अपने आपको ब्रिटिश कहते हो?” मैंने उसे एक उदाहरण दिया कि मुझे एक अंग्रेज़ महिला न्यूयॉर्क में मिली। उसके बोलने के अंदाज़ से मुझे पता चल गया कि वह ब्रिटेन से है। मैंने उस महिला से पूछ लिया, “क्या आप लंदन से हैं?… तो उसने जवाब दिया… नो.. नो… मैं स्कॉटिश हूँ!”
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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1 टिप्पणी

  1. रोचक और तथ्यात्मक सूचनाओं से सुसज्जित संपादकीय। यह संपादकीय पहले तो अमेरिकी राष्ट्रपति का कारनामों का संदर्भ दिया है और यह मौजूदा परिस्थितियों का काला काल खंड है,जिसने सभी को अस्त व्यस्त यानी त्रस्त कर रखा है।कोई बारूद से दुखी है तो कोई बारूद की धांस से।कोई जेब से खाली हो रहा है तो कोई जीवन से खाली।
    सियासत है कि अपनी चाल से या धमक से चल रही है। फिर यही संपादकीय ग्रेट ब्रिटेन के इतिहास को सार रूप से रोचक अंदाज़ से बताया है।
    यही अति विकसित राष्ट्र की कलई और मानसिकता की ब्रेन मैपिंग बड़े ही व्यावहारिक रूप से देता है।
    बधाई हो ।

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