हम यह कदापि नहीं कहना चाहते कि फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी ने कोई षड्यंत्र रचा है। संभव है कि उनसे यह त्रुटि अनजाने में हुई हो। बेहतर यही होगा कि वे आगे से नियमों का पूर्णतः पालन करें, और उनके समर्थक एवं शुभचिंतक भी उन्हें यह समझाएँ कि किसी भी देश के वीज़ा नियमों का उल्लंघन एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, और इसे कभी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
‘पुरवाई’ के पाठकों को बता दूँ कि इन दिनों भारत में हूँ। आज जिस समय यह संपादकीय लिख रहा हूँ, मेरी दोनों बहनें भाई दूज की तैयारी में लगी हैं। दीपावली, मेरा जन्मदिन और आज भाई दूज… यानि कि उत्सव और त्यौहार और साथ में परिवार।
इस बीच कल फ़ेसबुक पर कथाकार अग्रज शिवमूर्ति जी की पोस्ट पढ़ने को मिली, जिसमें लिखा था – “सुबह देखा, रात बारह बजे भेजा गया फ्रान्चेस्का जी का व्हाट्सएप – ‘शिवमूर्ति जी, देखिए क्या गजब हो गया! दुम दबाकर लंदन वापस जा रही हूँ। पता नहीं, अब कब आना हो पाएगा।’”
“क्या कहूँ? न कुछ कर सकता हूँ, न कुछ कहने की स्थिति में हूँ – सिवाय इसके कि बहुत शर्म महसूस हो रही है।”
मैं फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी को निजी तौर पर जानता हूँ और उनके कार्य से भी भली-भाँति परिचित हूँ। वे कथा यूके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में कभी मेहमान रहीं, तो कभी मेज़बान। वे एक अत्यंत ज़हीन विदुषी महिला हैं – लंदन में हिंदी की प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं और केंब्रिज विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं।
मैं यह समझ नहीं पाया कि भाई शिवमूर्ति जी को शर्म क्यों आ रही थी। क्या उन्होंने इस पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश की? मेरी अपनी सोच यह है कि किसी भी विषय पर पूरा सच जाने बिना टिप्पणी करना उचित नहीं।
मैंने तुरंत गूगल सर्च किया और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समाचार पत्र मेरे सामने खुल गया। इसमें समाचार दिया गया था कि –
“लंदन स्थित शिक्षाविद् और शोधकर्ता फ्राँचेस्का ऑर्सीनी को सोमवार को यहाँ इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भारत में प्रवेश करने से रोका गया, क्योंकि उन्हें इस साल मार्च में ब्लैक-लिस्ट किया गया था। सरकारी सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अपने पिछले दौरों के दौरान अनुसंधान कार्य करने के कारण अपने पर्यटक वीज़ा की शर्तों का उल्लंघन किया था।”
मुझे तुरंत याद आया कि कथा यूके की अध्यक्ष एवं ‘पुरवाई’ पत्रिका की संरक्षक काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी जी को जब आगरा के अंबेडकर विश्वविद्यालय ने एक साहित्यकार के रूप में आमंत्रित किया तो ज़किया जी ने टूरिस्ट वीज़ा अप्लाई कर दिया। भारत सरकार ने उन्हें निर्देश दिया, कि यदि काँफ़्रेंस में भाग लेना है तो काँफ़्रेंस वीज़ा अप्लाई करना होगा। इसलिए उन्हें काँफ़्रेंस वीज़ा अप्लाई करना पड़ा। यह एक तकनीकी ज़रूरत थी – और नियमानुसार उचित भी।
यदि किसी व्यक्ति के पास पर्यटक वीज़ा होता है, तो उसे किसी भी प्रकार के अन्य कार्य करने की अनुमति न तो भारत में होती है और न ही किसी अन्य देश में। यह अवश्य संभव है कि कोई व्यक्ति बिना किसी की नज़र में आए ग़ैर-कानूनी ढंग से कुछ कार्य कर ले और बच भी जाए, लेकिन उसकी स्थिति तब भी कानूनन अनुचित और अवैध ही मानी जाएगी।
भारतीय प्रवासन विभाग ने सूचना दी कि फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी को वीज़ा नियमों के उल्लंघन के कारण भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। एजेंसियों के अनुसार, वे पर्यटक वीज़ा पर भारत आने के बावजूद यहाँ शोध कार्य करती रहीं और विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान भी देती थीं। यह व्यवहार वीज़ा की शर्तों का सीधा उल्लंघन था।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का उल्लंघन करता है, तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है, और फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी के मामले में भी यही कदम उठाया गया।
‘दि वायर’ ऑनलाइन समाचार पत्र एवं मेरे बहुत से हिंदी पत्रकार मित्रों ने सोशल मीडिया पर शोर मचा दिया कि सच बोलने के कारण और वर्तमान सरकार की आलोचना करने के कारण फ़्रेंचेस्का ऑर्सीनी को दिल्ली में प्रवेश से रोक दिया गया। वे हाँगकाँग से दिल्ली आ रही थीं।
इस बीच मुझे ब्रिटेन से अपने मित्र साहित्यकार डॉ. निखिल कौशिक का व्हाट्सएप संदेश प्राप्त हुआ। इस संदेश में उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए मुझे लिखा है –
“प्रिय तेजेन्द्र, मुझे उम्मीद है कि आप अपने साथी साहित्यकारों को समझाएंगे कि भारत एक गंभीर देश है और सिर्फ़ इसलिए कि कोई सेलिब्रिटी है, वह वीज़ा से जुड़े नियमों को दरकिनार नहीं कर सकता है। लोगों को वाजिब वजहों से ही प्रवेश से मना किया जाता है। अगर आप विज़िटर वीज़ा पर किसी देश में प्रवेश करते हैं और कोई परफ़ॉर्मेंस दे रहे हैं, तो यह गैरकानूनी है। यही बात यहाँ भी लागू होती है। मैं अपना अनुभव साझा करना चाहूँगा – मैं चाहता था कि कादर ख़ान (जो कि छुट्टियों में दोस्तों से मिलने आए थे) मेरी फ़िल्म में काम करें। लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनके वीज़ा के कारण उन्हें एक पर्यटक के तौर पर बाहर निकलने की इजाज़त नहीं है। मुझे लगता है कि शायद इसी तरह की कोई बात उन्हें भी परेशान कर सकती है।”
“हम सबके लिए संदेश: वीज़ा का सम्मान करें… वे शाहरुख़ खान, यहाँ तक कि मोदी को भी नहीं बख्शते…”
थोड़ी सी हैरानी मुझे इस बात पर हो रही थी, कि वे तमाम लोग जो इस समय सरकार की आलोचना कर रहे हैं वे उस समय ख़ुशियाँ मना रहे थे, जब अमेरिका एवं ब्रिटेन ने गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए भी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था।
भारत के वीज़ा नियम ऑनलाइन उपलब्ध हैं। इन नियमों को कोई भी चेक कर सकता है। यहाँ अपनी बात करना भी आवश्यक है। मैं अब ब्रिटेन में रहता हूँ और वहाँ का नागरिक हूँ। मेरे पास भारत सरकार द्वारा जारी ओ.सी.आई. यानि कि ओवरसीज़ सिटिज़नशिप ऑफ़ इंडिया का सर्टिफ़िकेट है। मुझे इस कारण भारत में नौकरी करने और कितने भी लंबे समय तक रहने की सुविधा है। मगर मुझ पर कुछ पाबंदियाँ भी लगी हुई हैं कि मैं जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों के कुछ क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सकता। उसके लिए मुझे विशेष परमिट लेने की ज़रूरत पड़ेगी। इस मामले में मुझे भी एक विदेशी समझा जाता है।
ऐसे में यदि मैं हर बार जब भारत आऊँ, और उन क्षेत्रों में घूमना शुरू कर दूँ, जहाँ प्रवेश वर्जित है, तो ज़ाहिर है कि सरकार मेरा ओ.सी.आई. सर्टिफिकेट वापस ले सकती है। स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि वीज़ा की शर्तों को तोड़ता है तो उसे खामियाजा भुगतना होगा। हम बुर्ज़ुआ सोच नहीं रख सकते। चाहे कोई व्यक्ति नियम तोड़ कर किसी रेस्टोरेंट में काम करता हो, और चाहे कोई व्यक्ति नियम तोड़ कर विश्वविद्यालयों में लेक्चर देता हो – वीज़ा की शर्तें दोनों ने तोड़ी हैं। सज़ा दोनों को एक-सी मिलनी चाहिए। यह नहीं कि हम अलग-अलग मामले में अलग-अलग रवैया अपनाएं।
अमेरिका निवासी साहित्यकार एवं आलोचक श्रीमती कविता वाचक्नवी ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है, “फ़्रेंचेस्का ने भारत का पर्यटक वीज़ा लिया हुआ है, और वह विभिन्न संस्थाओं, वि. वि., विभागों, आयोजनों, स्थलों, कार्यशालाओं, संगठनों में जाकर विभिन्न प्रकार के कार्य, भाषण, विचार–विनिमय, उद्बोधन, योजनाओं की रूपरेखा तथा कियान्वयन, पठन–पाठन, लेखन–प्रकाशन, भविष्य की परियोजनाओं आदि पर कार्य करती हैं। पर्यटक वीज़ा पर किसी भी देश में इन सब की अनुमति नहीं होती।”
“बार–बार देश के नियमों की अनदेखी व उल्लंघन दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। फ़्रेंचेस्का ने यह अपराध किया, और दूसरा यह कि जब प्रतिबंध लगा दिया गया, उसके पश्चात् भी देश में घुसने का प्रयास किया और दिल्ली एयरपोर्ट पहुँच गईं। जब इमिग्रेशन ऑफिसर ने रोक दिया व देश में प्रवेश की अनुमति नहीं दी, तो चालाकी से देश पर आरोप लगा कर उस देश में बैठे अपने लोगों के माध्यम से देश के ही लोगों को देश–विरुद्ध भड़काने का षड्यन्त्र करने से भी नहीं रुकी।”
पुरवाई के पाठकों को बताना चाहूंगा कि मैं दो दशकों से अधिक एअर इंडिया में केबिन क्रू की हैसियत से काम कर चुका हूं। विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां जाने का मौक़ा मुझे न मिला हो। ज़ाहिर है, मुझे इमीग्रेशन नियमों की जानकारी अन्य लोगों की तुलना में इक्कीस ही होगी। विमान के क्रू सदस्यों के लिये भी एक नियमावली है, जिसके तहत हमें बाहर के देशों में रहना होता है। उन नियमों की अनदेखी हम नहीं कर सकते। हिन्दी साहित्य और पत्रकार जगत की समस्या यह है कि तमाम लोग हर मामले के विशेषज्ञ बन कर सोशल मीडिया को अपनी टिप्पणियों से रंग देते हैं।
मुझे याद पड़ता है कि जिन दिनों हम जेद्दाह की उड़ान पर जाते थे, तो अपने साथ किसी भी प्रकार के धार्मिक ग्रन्थ – बाइबिल, गीता आदि – की प्रति साथ में नहीं रख सकते थे। यदि सामान चेकिंग के दौरान ऐसी कोई वस्तु मिल जाती तो उसे निकाल कर नष्ट कर दिया जाता। सऊदी अरब में शराब ले जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध था। कुछ ऐसे देश भी हैं जहां ड्रग्स पकड़े जाने पर सीधे-सीधे मृत्यु दंड मिलता है। हमें सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके तुरत-फुरत लाभ उठाने के मुकाबले मामले की गहराई से जांच पड़ताल करने के बाद ही कोई टिप्पणी करनी चाहिये।
हम यह कदापि नहीं कहना चाहते कि फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी ने कोई षड्यंत्र रचा है। संभव है कि उनसे यह त्रुटि अनजाने में हुई हो। बेहतर यही होगा कि वे आगे से नियमों का पूर्णतः पालन करें, और उनके समर्थक एवं शुभचिंतक भी उन्हें यह समझाएँ कि किसी भी देश के वीज़ा नियमों का उल्लंघन एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, और इसे कभी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
आपने अपने संपादकीय के माध्यम से फ़्रेंचेस्का जी के वीजा पर एक रणनीति के तहत फैलाए गए भ्रम-जाल को बेहद स्पष्टता के साथ रेखांकित किया है । मैंने भी उसी दिन अपने सोशल मीडिया पेज पर इसे यूँ लिखा था-
वीज़ा पर चर्चा
लंदन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर फ्रांसेस्का ओरसिनी का नाम काली सूची (ब्लैकलिस्टेड) में होने के कारण उन्हें भारत में प्रवेश से रोका गया है । मार्च,2025 में टूरिस्ट वीजा की शर्तों का उन्होंने उल्लंघन किया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक , फ्रांसेस्का ओरसिनी भारत “पर्यटक वीजा” (tourist visa) पर आई थीं। लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने उस वीजा श्रेणी के अंतर्गत निषिद्ध गतिविधियाँ की थीं — यथा, शोध-कार्य या व्यावसायिक/शैक्षणिक कार्यक्रम में भाग लेना। उक्त उल्लंघन के कारण उन्हें मार्च 2025 में भारतीय आप्रवासन अधिकारियों द्वारा “काली सूची (ब्लैकलिस्ट)” में डाला गया था।
अब कुछ लोग उनके शैक्षणिक योगदान पर बात रख रहे हैं । पर वीजा के नियम किसी को नही बख्शते, यहाँ तक कि इस देश के कई तत्कालीन मुख्यमंत्री और सुपर स्टार शाहरुख़ खान को भी । पर तब यही विचारधारा नकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करती थी ।
सादर
आपने अपने संपादकीय के माध्यम से फ़्रेंचेस्का जी के वीजा पर एक रणनीति के तहत फैलाए गए भ्रम-जाल को बेहद स्पष्टता के साथ रेखांकित किया है । मैंने भी उसी दिन अपने सोशल मीडिया पेज पर इसे यूँ लिखा था-
वीज़ा पर चर्चा
लंदन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर फ्रांसेस्का ओरसिनी का नाम काली सूची (ब्लैकलिस्टेड) में होने के कारण उन्हें भारत में प्रवेश से रोका गया है । मार्च,2025 में टूरिस्ट वीजा की शर्तों का उन्होंने उल्लंघन किया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक , फ्रांसेस्का ओरसिनी भारत “पर्यटक वीजा” (tourist visa) पर आई थीं। लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने उस वीजा श्रेणी के अंतर्गत निषिद्ध गतिविधियाँ की थीं — यथा, शोध-कार्य या व्यावसायिक/शैक्षणिक कार्यक्रम में भाग लेना। उक्त उल्लंघन के कारण उन्हें मार्च 2025 में भारतीय आप्रवासन अधिकारियों द्वारा “काली सूची (ब्लैकलिस्ट)” में डाला गया था।
अब कुछ लोग उनके शैक्षणिक योगदान पर बात रख रहे हैं । पर वीजा के नियम किसी को नही बख्शते, यहाँ तक कि इस देश के कई तत्कालीन मुख्यमंत्री और सुपर स्टार शाहरुख़ खान को भी । पर तब यही विचारधारा नकारात्मक विमर्श प्रस्तुत करती थी ।
समझदारी भरी टिप्पणी।मुझे भी लगा कि कुछ न कुछ मामला है।यह अंतरराष्ट्रीय मामला है, तो इसमें बिना किसी ठोस कारण के ओर्सिनी को नहीं रोका गया होगा।
जी अरुण भाई, मेरा प्रयास रहता है कि टिप्पणी करने से पहले मामले को ठीक से समझ लिया जाए।
एक अलग या विरल अधिक उपयुक्त रहेगा ,कहना,इस बार के संपादकीय को।
सटीक और अनुभवजनित जानकारियों को संजीदगी से परोसा है।भारत और विश्व पटल पर अब भारत भी विकसित देशों की मानिंद नियम कायदों और कानूनों से चलना पिछले दो दशकों से सीख गया है। जब बॉलीवुड के प्रतिष्ठित अभिनेता और देश के नेता को आप अनावश्य रूप से कानूनों के आड़ में अपमानित कर सकते हैं?!!?
तब अब भारत भी उन्हीं मापदंडों पर अमल कर रहा है ,,,और सब चलता है,,,,की गुलामी वाली मानसिकता की भूल रहा है,तो इसमें ग़लत क्या है,,,, भई इंडिया था ऐसा अब तो ये भारत है!यहां पर यहीं का कानून एक देश एक विधान लागू हो गया है,,,तो आने वालों नियम कानून का पालन करते आओ और अतिथि देवो भव की भव्यता को देखें पाएं और खुश हो जाएं।
बधाई हो संपादक महोदय
प्रिय भाई सूर्य कान्त जी, आपने संपादकीय को सही परिप्रेक्ष्य में पढ़ा और समझा है। आपको संपादकीय पसंद आया और भारत के बदलते स्वरूप की आपने सराहना की है… आपको हार्दिक आभार।
अति सुंदर आलेख
धन्यवाद रंजीत भाई।
बिल्कुल सबको स्पष्ट होना बहुत जरूरी है आपने यह लिखकर बहुत अच्छा काम किया बहुत बढ़िया। सबको समझ में तो आए बदनाम करने को लोग तैयार रहते हैं।
आदरणीय भाग्यम जी आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
बेहद जरूरी सम्पादकीय, उम्मीद है उन मित्रों को सच समझ आएगा जो फिजूल में हर जरूरी गैर जरूरी मुद्दे पर सरकार को घेरते रहते हैं
आलोक भाई सच्चाई जानना अति आवश्यक है।
बहुत-बहुत धन्यावाद शर्मा जी। इस संपादकीय की सख़्त ज़रूरत थी। यहाँ भी दुनियाभर के विद्वान अपनी टिप्पणी भेज रहे हैं और सिर्फ़ वर्तमान सरकार को दोष दे रहे हैं, जबकि सच्चाई वही है, जो आप भी लिख रहे हैं। मुझे तो अँग्रेज़ों ने यहाँ जर्मनी से सोआस आने के लिए 2012 में भारतीय पासपोर्ट पर वीज़ा दिया ही नहीं।
Our people in India are carried away by emotions, which unfortunately suppressed the truth and politics the such incidents.
बहुत-बहुत धन्यावाद शर्मा जी। इस संपादकीय की सख़्त ज़रूरत थी। यहाँ भी दुनियाभर के विद्वान अपनी टिप्पणी भेज रहे हैं और सिर्फ़ वर्तमान सरकार को दोष दे रहे हैं, जबकि सच्चाई वही है, जो आप भी लिख रहे हैं। मुझे तो अँग्रेज़ों ने यहाँ जर्मनी से सोआस आने के लिए 2012 में भारतीय पासपोर्ट पर वीज़ा दिया ही नहीं।
Our people in India are carried away by emotions, which unfortunately suppressed the truth and politics the such incidents.
इस बार संपादकीय का विषय एकदम ताजा हैं। ताज़ा इसलिए कि यह घटना अभी-अभी की है और दूसरी ताजा खबर यह कि वीजा के नियम क्या होते हैं मैं बिलकुल नहीं जानता हूं। न इसकी जरूरत पड़ी है और न आगे कभी पड़नी है। इसलिए ऐसे विषयों पर मैं सिर नहीं खपाता हूं।
संपादकीय का विषय – दुम दबाकर भाग रही हूं…! में फ्रेंचेस्का आर्सीनी जो एक शिक्षाविद् , शोधकर्ता एवं हिन्दी की शिक्षिका हैं को भारत सरकार ने दिल्ली से वापस भेज दिया है। कारण वीजा नियमों की अनदेखी।
सोशल मीडिया में पढ़ा है कि लेखिका सरकार विरोधी है, इस कारण ऐसा किया गया। लेकिन बिना कारण के कोई देश ऐसा कैसे कर सकता है, मेरे मन में ये सवाल आया था। सवाल इसलिए आया था कि विपक्ष इस समय सरकार पर काफी हावी है।
यही समझने के लिए मैंने कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश जी का वक्तव्य पढ़ा – फ्रेंचेस्का आर्सीनी का देश में प्रवेश रोकना “स्वायत्त, गंभीर-विचार वाले शोधकार्य के प्रति सरकार की घृणा” का प्रतीक है।”
इधर आपके संपादकीय के माध्यम से वीजा नियमों की जानकारी मिली। आपने इसमें वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीया जकिया ज़ुबैरी जी का उदाहरण दिया है कि वे भी टूरिस्ट वीजा पर भारत आ रही थी लेकिन किसी कार्यक्रम में उन्हें शामिल भी होना था। उन्होंने फिर वही वीजा लिया जो इसके लिए नियम कहता है। देश के बनाए नियम कानूनों पर सभी चलते हैं और चलना चाहिए। नहीं चलेंगे तो उसके लिए प्रावधान भी है।
आर्सीनी जी पिछली बार टूरिस्ट वीजा पर आई थी। लेकिन उनकी गतिविधियां टूरिस्ट वीजा से मेल नहीं खा रही थी इसलिए उन्हें ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया था। क्या वे नहीं जानती थी कि वे ब्लैकलिस्टेड है? जानती होगी, जरूर जानती होंगी! अगर नहीं जानती थी तो उन्हें जानना चाहिए था।
भारत के लोग गुटखा तंबाकू खाकर कहीं भी पीक मार देते है। यूरोपीय देशों में या सिंगापुर, यूएई में ऐसा करेंगे तो वहां के नियम के अनुसार दंड भरना पड़ेगा। हम उनका पक्ष लेकर खूब चिल्लाएं, चिल्लाने से क्या होगा?
इस संपादकीय को पढ़ते समय मेरे दिमाग में तेजेन्द्र सर का नाम बार-बार आ रहा था कि ये भी भारत आते-जाते रहते हैं। साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं तो इनका क्या होता होगा? अच्छा रहा आपने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि आप जम्मू-कश्मीर तथा पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्सों में नहीं जा सकते हैं। आप उन नियमों का पालन करते हैं। कोई दिक्कत नहीं है।
मेरा तो ये कहना है कि आप किसी भी देश में जाइए, वहां के नियमों का पालन कीजिये और सुरक्षित रहिए। नहीं माने, तो भगाए जाओगे। फिर वहां की सरकार को दोष दो या नीति निर्माताओं को , इससे क्या होता है।
सर मैंने आपके एक संपादकीय में पढ़ा था कि लंदन के लोग नियमों को बहुत फालो करते हैं। रेलयात्रा में आपने भारत पाकिस्तान के लोगों को नियम तोड़ने वाले तथा अव्यवस्था फैलाने वाले बताया था। और लंदन के लोगों को शरीफ और हर नियम का अच्छे से पालन करने वाला। आर्सीनी जी तो इंग्लैंड की ही हैं। फिर भारत क्यों? …पाकिस्तान क्यों??
यह संपादकीय मेरे लिए ज्ञानवर्धक है। बहुत सी चीजों की जानकारी इससे प्राप्त हुई है।
संपादकीय धारदार है। इस विषय पर सोशल मीडिया में आग लगी हुई है। आपने इस आग की हकीकत बता दी।
इस संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखन लाल पाल जी आपने लिखा है, “मेरा तो ये कहना है कि आप किसी भी देश में जाइए, वहां के नियमों का पालन कीजिये और सुरक्षित रहिए। नहीं माने, तो भगाए जाओगे। फिर वहां की सरकार को दोष दो या नीति निर्माताओं को , इससे क्या होता है।”
आपको संपादकीय के माध्यम से नई जानकारी मिली यह इस संपादकीय की सफलता का प्रमाण है। आपको हार्दिक धन्यवाद।
वीसा नियमों के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारी देते हुए साहित्यकार के साथ हुई घटना का उल्लेख एक पंथ दो काज।
धन्यवाद उषा जी।
बहुत ही सटीक सार्थक एवं सारगर्भित संपादकीय। वीजा के नियमों का उल्लंघन किसी भी देश के अनुशासन तोडने की तरह है।जैसा कि आपने बताया कि पर्यटक वीजा पर शोध,व्याख्यान या कला प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम वर्जित हैं।यदि सरकार उनका उल्लंघन करने पर दंड देती है या वीजा रद्द कर देती है तो गलत नहीं है।मीडिया को बेवजह अनर्गल प्रचार से बचना होगा।लोग तो भ्रमित होंगे ही देश का सम्मान भी आहत होता है।
आपने बहुत ही सशक्त मुद्दो के आधार पर जितनी सरलता से सच से रुप ब रुप कराया बहुत अच्छा लगा भाई और हम जैसे लोग भी आसानी से इस घटना को.समझ सके।सादर प्रणाम भाई। बहुत बहुत बधाई इस संपादकीय के लिए।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रिय पद्मा, मेरा हमेशा प्रयास रहता है कि तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध करवाई जाए। मैं सेंसेशनलिज़्म के विरुद्ध हूं। अनर्गल प्रचार केवल भावनाएं भड़काता है।
आदरणीय संपादक महोदय,
इस निष्पक्ष और वास्तविकता प्रकट करने वाले संपादकीय के लिए बहुत-बहुत बधाइयां।
आपने जो शिव मूर्ति जी और फ़्रेंचेस्का जी के संवाद में जिन मुहावरों का प्रयोग किया गया है उनसे स्पष्ट है कि वे दोनों जानते हैं कि भारत सरकार के वीज़ा नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है। हिंदी भाषा की विदुषी फ़्रेंचेस्का जी का ‘”दुम दबाकर ‘”भागना मुहावरे का प्रयोग ही स्पष्ट करता है कि स्वयं जानती थीं वह कोई नियम विरुद्ध कार्य कर रही हैं वरना यह मुहावरा वे कभी प्रयोग न करतीं , और फिर शिव मूर्ति जी भी अपनी मित्र के इस नियम विरुद्ध क्रिया से लज्जित अनुभव कर रहे हैं।
विपक्ष जो इतनी निर्लज्जता से उनके वापस भेजे जाने की भर्त्सना कर रहा है, उससे भी यह स्पष्ट होता है कि भारत के नियमों से वह कितने अपरिचित है अथवा नियमों का सम्मान करना नहीं जानते। दोनों ही स्थिति में चिंताजनक और लज्जा जनक है।
आंख खोलने वाले इस संपादकीय के लिए फिर से एक बार बधाइयां
आदरणीय सरोजिनी जी, आपने तो संपादकीय को रेशा-रेशा कर समझा और समझाया है। उम्मीद है कि हमारे पाठकों की आँखें अवश्य खुलेंगी।
फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी जो वीजा नियमों की अनदेखी करने के कारण ब्लेक लिस्ट हो चुकी थीं, उन्हें पुनः भारत में प्रवेश न मिल पाने पर आ0 शिवमूर्ति जी की प्रतिक्रिया के साथ आपने वीजा नियमों की नीर क्षीर विवेक से जो विवेचना की है वह कईयों की जानकारी तो उपलब्ध कराएगी ही, आँखें खोलने वाली भी है।
मैंने भी ज़ब इस आधे-अधूरे ढंग से पेश किये इस समाचार को पढ़ा था तो प्रथम दृष्टया यही मनमस्तिष्क में आया था कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है। मैं भी दो बार अमेरिका जा चुकी हूँ, वहां से मेक्सिको तथा कनाडा भी,एक बार यूरोप टूर पर तथा एक बार दुबई। मैंने यही महसूस किया है कि अगर सारे डॉक्यूमेंट ठीक हैं तो कहीं किसी को रोका टोका नहीं जाता फिर विदुषी हिन्दी की अध्यापिका फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी को क्यों? कहीं कुछ तो गड़बड़ होगा।
भारत में परिवार संग समय बिताने के बावजूद पर्यटन वीजा से सम्बंधित जानकारी देते हुए ज्वलंत विषय संपादकीय के लिए आपको साधुवाद।
सुधा जी परिवार के साथ त्यौहार मनाना और दूसरी तरफ़ एक संपादक का दायित्व निभाना अति आवश्यक है। मेरी निजी व्यस्तता के कोई मायने नहीं। पुरवाई के पाठक वरीयता क्रम में पहले आते हैं।
मैंने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार की नीतियों को धिक्कारते हुए ढेर सारे वामपंथी लेखकों को देखा। ढेर सारे लोग कोई ना कोई मुद्दा तलाशते रहते हैं जिसमें सरकार को घेरा जाए।
लेकिन यह ऐसा मुद्दा नहीं था, जिसमें वैश्विक स्तर पर देश की बदनामी की जाए। मामले की गहरी छानबीन करके ही टिप्पणी की जानी चाहिए।
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने अपने संपादकीय में इस मामले को पूरी तरह साफ कर दिया है। आदरणीय शिव मूर्ति जी सुलझे हुए कथाकार हैं, किंतु उन्होंने भी पूरे मामले को बिना समझे फेसबुक पर स्वयं को लज्जित होने की बात अनावश्यक रूप से की।
हाल ही में आस्ट्रेलिया में एक मलयालम अभिनेत्री नाव्या नायर पर भारी जुर्माना ठोक दिया गया क्योंकि उनके पास 15 सेंटीमीटर लंबी चमेली के फूलों की माला पाई गई। यह पिछले महीने ही हुआ। भाई शिवमूर्ति ने कोई संज्ञान नहीं लिया।
आवश्यक और स्थिति स्पष्ट करता संतुलित संपादकीय। आभार!
सादर
शैलजा
हार्दिक धन्यवाद शैलजा।
भारत की संसद ने इसी वर्ष आप्रवास और विदेशियों विषयक अधिनियम, 2025 पास किया है जो लागू हो चुका है। इस कानून में विदेशी प्रवेश पर सख्त प्रावधान बनाये गये हैं। जब संसद में कानून पारित हो रहा था तो गृह मंत्री महोदय ने कहा था कि भारत कोई धर्मशाला नहीं। विदेशी कानून के अनुसार ही देश में प्रवेश ले सकें गे। उनके कहने के पीछे का आशय भारत में अवैध घुसपैठ करने वालों को ध्यान में रख कर कहा गया था।
अतः अब कोई भारत को बनैना स्टेट न समझे। हर देश की तरह भारत के भी अपने नियम कायदे कानून हैं। चाहे वह हिंदी की बहुत बड़ी विद्वान ही क्यों न हों, नियम तो सभी के लिए समान है। उनको ब्लैक लिस्ट किया गया था तो उसको इसके बारे में जानकारी तो होगी ही, फिर भी भारत की यात्रा पर आ जाना – इसका क्या अर्थ है। माना, उन्होंने यह भूलवश किया हो तो जब उन्हें एयरपोर्ट पर वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया तो उन्हें चुपचाप वापस लौट जाना चाहिए था। परंतु वह तो भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार पर उतर आई और उसके यहां के समर्थक बिना समय गंवाए दुष्प्रचार पर उतर आए हैं।आप के इस संपादकीय से मुद्दे को सही रूप में प्रस्तुत कर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी है। इसके लिए आपको साधुवाद। वरना तो दुष्प्रचार अबाध चलता रहता।
संतोष जी आपने बहुत स्पष्ट ढंग से स्थिति को समझाया है। वीज़ा नियमों को चाहे कोई भी तोड़े, उसे उसका भुगतान तो करना ही पड़ेगा।
जरूरी लेख
सटीक सार्थक एवं ज्ञानवर्धक सम्पादकीय।
धन्यवाद सुदर्शन जी।
एक बहुत ही ज़रूरी पोस्ट..!
कई बार कुछ त्रुटियाँ भूलवश भी होती हैं। और कभी कभी लोग अनदेखा कर देते हैं, कि अब तक काम चला तो आगे भी चल जाएगा। वे यह भूल जाते हैं कि जब भी यह बात नजर में आयेगी, तब क्या होगा।
खैर जो हुआ यह बहुतों के लिए एक सबक है। नियमों से खिलवाड़ अथवा अनदेखी कभी सही नहीं होता। हम विमान यात्रा के पहले ,संदेह की स्थिति में डबल चेक करते हैं , कि यह वस्तु वर्जित है या ले जाई जा सकती है। तब वीजा तो बहुत ही बड़ा मुद्दा है, उसका उल्लंघन उचित नहीं। इस ओर ध्यान दिलाने और सही तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए आपको साधुवाद …
आपने बहुत सार्थक टिप्पणी की है सरस। सभी को इस बात का ख़्याल रखना होगा।
बहुत अच्छी संपादकीय हर बार की तरह कुछ अलग। हाँ ये बात जितनी तेज़ी से फैली उतनी ही जल्दी दब भी गई।
ताज़ा तरीन घटनाओं पर लिखने के लिए शुक्रिया
हार्दिक आभार रीटा जी।
इस सप्ताह के आप के संपादकीय में दी गई भारतीय वीज़ा के स्वरूप की विस्तार- पूर्वक व्याख्या से हमें अच्छी जानकारी मिली।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी आपकी शाबाशी से अहसास हो जाता है कि हम सफल रहे। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार का संपादकीय एक ऐसे विषय पर है जिसकी जानकारी पूर्णरूपेण लगभग उन सभी लोगों को होनी चाहिये ,जो किसी भी कारणवश हवाई यात्राएँ करते हैं, क्योंकि हर देश के वीज़ा के कुछ नियम होते हैं और उन नियमों को फॉलो करना बहुत अधिक आवश्यक होता है। इसीलिए इसकी जानकारी होना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि आप अपने देश से दूसरे देश या एक देश से दूसरे देश क्यों जा रहे हैं यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से जुड़ा है। कारण बताओ जानकारी जरूरी है सावधानी की दृष्टि से।
इस संपादकीय में वीज़ा से संबंधित जितनी भी जानकारियाँ दी गई हैं उन सभी जानकारियों से हम पूरी तरह से ही अनभिज्ञ ही थे। थोड़ा बहुत जो ज्ञान था वह आपकी कहानियों से जाना।
आपने तो स्वयं ही 22 साल एअर इंडिया में जॉब किया है तो आप इसकी बारीक से बारीक जानकारियों से अवगत हैं। आपने ज़किया जी और स्वयं के अनवरत भारत आते-जाते रहने के उदाहरण के माध्यम से संपादकीय के विषय को और अधिक स्पष्ट किया।
ज़किया जी वाले प्रसंग को हमने दो बार पढ़ा। आपने लिखा है कि “ज़किया जी ने जब टूरिस्ट वीज़ा अप्लाई किया था तो उन्हें भारत सरकार ने निर्देश दिया था कि यदि कॉन्फ्रेंस में भाग लेना है तो कॉन्फ्रेंस वीज़ा अप्लाई करना होगा!”
इसका मतलब है कि अगर आप कहीं जाते हैं तो आपको बतलाना होता है कि आप क्यों जा रहे हैं! तो उनके लिए वैसे निर्देश भी दिए जाते होंगे। जब यह इससे पहले आई होंगी तब निर्देश इन्हें भी दिया ही गया होगा। यह गलती अनजाने में हुई नहीं लगती है।
हमको ऐसा लगता है कि जब पहले कुछ नहीं हुआ तो अभी भी कुछ नहीं होगा। ऐसा सोचा गया।
हमारी समझ से तो यह जानबूझकर किया गया है। यह ऐसा विषय भी नहीं है जिसे सामान्य रूप से लिया जाए या इसके प्रति लापरवाही की जाये। इसे किसी भी तरह से हम अनजाने में हुई त्रुटि के रूप में नहीं देख पा रहे हैं। बाकी जो सच है वह ,,,फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी ही बेहतर जानती होंगी।
जब हमने पढ़ना शुरू किया तो आपका भी ख्याल आया था कि आप भी लगभग हर साल ही जाते हैं और कई बार दो बार भी; लेकिन आगे उसमें पढ़ने को मिल ही गया। और आपकी सजगता व हर जानकारी से परिचित हुए।
अपनी जानकारी के तथ्य के रूप में अपने कादर खान, मोदी और शाहरुख खान का उदाहरण भी दिया जो आपके कथ्य की पुष्टि करते हैं।
संपादकीय को पढ़ते हुए हमें आपकी संदिग्ध कहानी की याद आई, जिसमें शाहिद देखता है कि किस प्रकार शाहरुख खान को बार-बार सफाई देने के बावजूद भी लंदन में उतरने की परमीशन नहीं दी जाती है और रोक लिया जाता है। और यहीं से शाहीद के दिमाग में पत्नी शाहिदा को पाकिस्तान में ही रोकने का षड्यंत्र जन्म लेता है।
वैसे उन्होंने अपने लिये जिस मुहावरे का प्रयोग किया है कि ,” दुम दबाकर भाग रही ” वह किसी अच्छे अर्थ में प्रयुक्त नहीं किया जाता है। जब आप कोई गलत काम करने जा रहे हैं तभी आपको पकड़े जाने का भय होता वहीं इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।
जहाँ सच्चाई होती है वहाँ डटकर सामना किया जाता है। आप जानते थे कि आप गलत हैं इसलिए आप डरकर, दुम दबाकर भागे। और अपने लिए स्वयं इस मुहावरे का प्रयोग किया।
*संपादकीय का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कथ्य यह है कि आपने अपराध तो किया ही, चाहे वह जानबूझकर किया हो या अनजाने में। प्रतिबंध के बाद भी देश में घुसने का प्रयास किया और दिल्ली एयरपोर्ट पहुँच गईं। इमिग्रेशन ऑफिसर के द्वारा अनुमति नहीं दी जाने पर चालाकी से देश पर आरोप लगाकर अपने लोगों के माध्यम से लोगों को देश-विरुद्ध भड़काने का षड्यंत्र भी किया।”*
कितनी अजीब बात है कि उन्हें यह बात भी समझ में नहीं आई इससे उनके सम्मान की रक्षा नहीं हो रही बल्कि वे सम्मानजनक लोगों की नजरों से गिर रही हैं।
इसके लिए भी एक अच्छा सा मुहावरा है- *चोरी ऊपर से सीना जोरी।*
आपके इस संपादकीय के माध्यम से वीज़ा और वीजा के नियमों के संबंध में सटीक और महत्वपूर्ण जानकारियों से रूबरू हुए।
जेद्दाह, सऊदी अरब के अतिरिक्त क्रू मेंबर के नियमों की जानकारी भी महत्वपूर्ण है।
वैसे तो आपका हर संपादकीय वैश्विक स्तर पर सामान्य ज्ञान का विस्तृत भंडार है पर इस संपादकीय के माध्यम से हवाई यात्रा में वीजा के महत्व और उसकी संपूर्ण जानकारी से संबंधित महत्वपूर्ण नियमों की जानकारी से समृद्ध हुए।
हो-हल्ला मचाने वाले लोगों को निश्चित रूप से इन विषयों की रत्ती भर भी जानकारी नहीं होगी।यह सही है कि बिना संपूर्ण जानकारी के किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना , राय जाहिर करना, अपना मत प्रकट करना यह विरोध करना किसी भी हिसाब से उचित नहीं।
आज का संपादकीय जरूरत से ज्यादा आई एम पी लगा।
इस संपादकीय के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया तेजेन्द्र जी!
पुरवाई का तो बहुत-बहुत आभार बनता ही है।
आदरणीय नीलिमा जी आपको संपादकीय आई एम पी लगा… यह संपादकीय की सफलता का प्रमाण है। आजकल पुरवाई के संपादकीयों के माध्यम से आपको बहुत नये विषयों की जानकारी हो रही है… यह हमारी शोध टीम के लिये संतोष की बात है। आपने ना केवल संपादकीय को गहराई से पढ़ा बल्कि इतनी विस्तृत टिप्पणी भी लिखी… यह हमारे लिये गर्व की बात है।
इसे कहते है खरी-खरी।बिना लाग -लपेट के पूरे घटनाक्रम की विवेचना , साथ ही वीजा से जुड़े नियमों का भी ज्ञान।आपका हर सम्पादकीय विषय के साथ न्याय करता हुआ।भारत मे रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों के मानसिक स्तर की पोल भी खोलता हुआ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आप यूँ ही बिना लाग के लिखते रहें।लेखनी अमर हो।आप जैसा प्रवासी भारतीय, लाखों भारतीयों को राह दिखाता रहे।
वन्देमातरम
निवेदिता, आपको संपादकीय पसंद आया और आपने इतने ख़ूबसूरत शब्दों से अपनी टिप्पणी को गढ़ा है कि पुरवाई टीम की आत्मा प्रसन्न हो गई। धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: सब से पहले तो जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं और बधाई। चाहे टूरिस्ट विज़ा हो या फिर OCI हो, हम प्रवासी भारतीय जो कभी भारत के नागरिक थे, जब कभी भी भारत जाते हैं तो यह भूल जाते हैं कि अब हम इस देश के नागरिक नहीं रहे हैं। इसी सोच को लेकर हम हर काम में अपनी मन मानी करते हैं। चाहे वो ताज महल जाकर घूमना हो, दिल्ली की हाट हो या किसी ऐसे स्थान पर जाना हो जो विदेशियों के लिए वर्जित हो हम अपने आप को भारत देश के नागरिक की तरह मानने लगते हैं और वैसे ही बीहेव करते हैं। ऐसे लोग कभी कभी तो कुछ स्थानों की entry fee में बचत करने के लिए भी भारतीय बन जाते हैं।
सच बात तो यह है कि बहुत से हम लोगों को इस बात का बिल्कुल ज्ञान ही नहीं है कि विज़ा के फ़ॉर्म पर purpose of journey क्या भरना है। बस टूरिस्ट लिखकर यह समझने लगते हैं कि हमें मन चाहे घूमने का लायसैंस मिल गया है। आपके सम्पादकीय से बहुत सी जानकारी मिली और मुझे पूरी आशा है कि हम प्रवासी भारती भारत जाने से पहले अपने विज़ा की लिमिट को पहचान लेंगे। जहाँ तक Frensesca Orsini का सवाल है तो यह उसकी ग़लती है कि सब कुछ जानते हुए भी उस ने अपने वाज़ा की शर्तों का उल्लंघन किया। रहा मीडिया में भारत को बदनाम करना तो वो तो विपक्ष का जन्म सिद्ध अधिकार है और वो इसका पूरा फ़ायदा उठा रही है।
विजय भाई आपने प्रवासी भारतीयों के बारे में सच्ची टिप्पणी की है। हम मनमानी तो कर जाते हैं। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी और जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिये हार्दिक आभार।
फ्रांसेस्का आर्सीनी के प्रकरण द्वारा, आपने वीज़ा के अनेक प्रकारों पर बहुत अच्छा प्रकाश डाला। संपादकीय इस बात की चेतावनी भी है कि हमें बिना तथ्यपरक अध्ययन के, किसी बात पर किसी भावना के तहत, टिप्पणी नहीं देनी चाहिए। आजकल सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है, जो हमें जानकारी भी देता है और हमारी सोच को प्रभावित भी करता है। अतः यह जरूरी है कि हमें किसी भी सूचना -समाचार पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए। सतर्कता एवं सावधानी जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। यदि हम लापरवाह आचरण करते हैं तो इसका दुष्परिणाम हमें ही भुगतना पड़ता है।
किसी भी बात को फैलाने से पहले उसकी सच्चाई अवश्य
परख लेनी चाहिए। विदेश जाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इस दृष्टि से भी संपादकीय बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत-बहुत धन्यवाद ।
अभी तो लंदन की रोशनी हमने चुरा रखी है!
लन्दन की रोशनी चुराने वाली विद्या जी, आपको इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। हमें सच में आँख मूंंद कर भरोसा नहीं करना चाहिये।
आदरणीय,
इस बार का संपादकीय कई अर्थों में आँखें खोलता हुआ है. वैसे आपकी विवेक सम्मत परख सम्पादकीय के हवाले से अकसर तथ्यों को सामने रखती है. लेकिन इस बार तो सटीक सूचना से हम न केवल जानकार हुए हैं, तेजेंद्र सर, भारत में ही एक वर्ग की सोच को कुछ उजागर होता हुआ देख रहे हैं. अलबत्ता, फ्रेचेस्का ओर्सिनी ने जरूर अपनी भूल, यदि उनसे इस मामले में भूल हुई थी तो, को अपनी लापरवाहियों या फिर कारगुजारियों से अपराध की श्रेणी में डाल दिया.
हार्दिक धन्यवाद.
सौरभ