विदेशों में नारी की प्रगति यात्रा के साथ-साथ लिंग-परिवर्तन के मामलों ने पुरुष और नारी के बीच के अंतर को धुंधला-सा कर दिया है । दरअसल ब्रिटेन में एक पुरुष ने (जिसका नाम एडम ग्राहम था), 2016 और 2019 में दो महिलाओं का बलात्कार किया। एडम उस समय विवाहित भी था और उसकी पत्नी का नाम था – शॉना ग्राहम। एडम पर मुकद्दमा चला और 2023 में उसे 8 वर्ष की सज़ा सुनाई गई। मगर इस बीच एक ऐसी घटना घटित हो चुकी थी, जिसने सारा घटनाक्रम ही बदल दिया था। हुआ कुछ यूँ कि एडम ग्राहम ने इस बीच लिंग परिवर्तन कर लिया और अब उसने अपने आपको एक औरत घोषित कर दिया था। उसने अपना एक नया नाम भी रख लिया था – इसला ब्रायसन!
हिन्दी साहित्य में जब कभी नारी की बात होती है, तो जयशंकर प्रसाद की एक पंक्ति याद आ जाती है – “नारी तुम केवल श्रद्धा हो…” साथ ही साथ उनकी एक पंक्ति – “तुम दान कर चुकी पहले ही / जीवन के सोने-से सपने।”
जयशंकर प्रसाद की कविता के बाद भारत की नारी एक लंबी यात्रा पूरी कर चुकी है। भारत में नारियाँ प्रधान मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री जैसी ऊँची पदवियों पर विराजमान हो चुकी हैं। वे नर्स, डॉक्टर, वकील, पायलट, ऑटोरिक्शा चालक जैसे काम कर रही हैं। यहाँ तक कि भारतवंशी महिला अमरीका की उपराष्ट्रपति तक बन चुकी हैं। इसलिए आज की भारतीय नारी प्रसाद की ‘श्रद्धा’ से बहुत आगे बढ़ चुकी है।
विदेशों में नारी की प्रगति यात्रा के साथ-साथ लिंग-परिवर्तन के मामलों ने पुरुष और नारी के बीच के अंतर को धुंधला-सा कर दिया है । दरअसल ब्रिटेन में एक पुरुष ने (जिसका नाम एडम ग्राहम था), 2016 और 2019 में दो महिलाओं का बलात्कार किया। एडम उस समय विवाहित भी था और उसकी पत्नी का नाम था – शॉना ग्राहम।

एडम पर मुकद्दमा चला और 2023 में उसे 8 वर्ष की सज़ा सुनाई गई। मगर इस बीच एक ऐसी घटना घटित हो चुकी थी, जिसने सारा घटनाक्रम ही बदल दिया था। हुआ कुछ यूँ कि एडम ग्राहम ने इस बीच लिंग परिवर्तन कर लिया और अब उसने अपने आपको एक औरत घोषित कर दिया था। उसने अपना एक नया नाम भी रख लिया था – इसला ब्रायसन!
इसलिए जब इसला ब्रायसन को 8 साल की सज़ा सुनाई गई, तो मसला यह उठ खड़ा हुआ कि उसे किस जेल में भेजा जाए – मर्दों के या महिलाओं के? जेल अधिकारियों को जब बताया गया कि अब इसला ब्रायसन महिला है, तो उसे स्टर्लिंग इलाके की कॉरन्टन वेल महिलाओं के जेल में भेज दिया गया। मगर इस निर्णय पर विवाद खड़ा हो गया। क्योंकि इसला ब्रायसन जब पुरुष थी, तो उसने दो महिलाओं का रेप किया था। इसलिए उसे महिलाओं के जेल में भेजने से वहाँ की महिला कैदियों को ख़तरे में डालने जैसा हो जाता।
विवाद के केन्द्र में एक ही मुद्दा था कि क्या किसी बलात्कारी को यह सुविधा दी जा सकती है कि वह स्वयं को महिला घोषित कर सके और उसकी बात मान भी ली जाए।
स्कॉटलैंड की संसद में निकोला स्टर्जन से यह सवाल भी पूछा गया कि क्या वे बलात्कारी इसला ब्रायसन को महिला मानती हैं? तब निकोला ने बताया कि इसला ब्रायसन को महिला जेल से निकाल कर पुरुष जेल में भेजा जाएगा। इससे उन तमाम मामलों पर एक बार फिर निगाह डालनी पड़ी, जिसमें सज़ायाफ़्ता मुजरिम ने अपने लिंग-परिवर्तन की घोषणा कर दी थी।
स्मरण रहे कि यदि कोई इंसान थर्ड जेंडर पैदा होता है, यानि कि बोलचाल की भाषा में हिजड़ा या किन्नर, तो उसे बचपन में ही थर्ड जेंडर घोषित कर दिया जाता है। वह अपना लिंग बदलवा कर किन्नर या हिजड़ा नहीं बनता है । ध्यान देने लायक बात यह भी है कि पश्चिमी समाज में समान-लिंग संबंधों को काफ़ी हद तक स्वीकार कर लिया गया है। अब तो ‘गे’ या ‘लेस्बियन’ जोड़े सार्वजनिक रूप से साथ-साथ रहते हैं। मगर इसला ब्रायसन का मामला एकदम अलग है।
ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर लंबा मुकद्दमा चला कि ट्रांसजेंडर महिला को महिला माना जाए या नहीं। दूसरी बात यह कि क्या किसी के कहने मात्र से मान लिया जाए कि वह महिला है या पुरुष? इस मुद्दे पर महिलाओं के अधिकार वाले पक्ष और ट्रांसजेंडर महिलाओं वाले पक्ष अपने-अपने हिसाब से दलीलें दे रहे थे। लगभग दो वर्षों तक केस चलता रहा और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल 2025 को अपना निर्णय सुना दिया।
फ़ैसला एकदम स्पष्ट शब्दों में था कि ‘महिला’ की कानूनी परिभाषा जन्म के समय उस इंसान के लिंग (सेक्स) पर आधारित होगी… यानी जन्म के समय जिसका सेक्स लड़की का होगा, वही महिला या स्त्री कहलाने की हक़दार होगी।
ब्रिटेन में 2004 में जेंडर रेकग्निशन एक्ट पास किया गया था, ताकि ट्रांस-समुदाय का जीवन कानूनी तौर पर बेहतर हो सके। इस एक्ट के बाद उन्हें सर्टिफिकेट दिया जाने लगा, जिससे उनके लिए अपनी पहचान साबित करना आसान हो गया था। इसके बाद 2010 में सेक्स के आधार पर अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए इक्वलिटी एक्ट लाया गया। इन दोनों ही कानूनों का जिक्र अदालत ने अपने फैसले में किया है।
इसला ब्रायसन ने अपने अधिकारों की बहुत दुहाई दी, मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दृढ़ रुख़ अपनाया और जन्म के समय के लिंग निर्धारण को ही सबूत माना। पूरे ब्रिटेन में सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर बहुत बहसबाज़ी हुई।
स्कॉटिश सरकार और कैंपेन ग्रुप फॉर वुमेन स्कॉटलैंड (FWS) के बीच वर्षों से जो बहस या लड़ाई चल रही थी, उसे सुप्रीम कोर्ट तक लाया गया था। इस कैंपेन ग्रुप ने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अधिक महिलाओं को काम पर रखने के उद्देश्य से बने एक अस्पष्ट कानून पर स्कॉटिश अदालतों में दलीलें हारने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील शुरू की थी।
FWS की डायरेक्टर ट्रिना बज ने फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अगर महिला की परिभाषा को जैविक आधार से न जोड़ा जाए, तो पब्लिक बोर्ड में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर भी पुरुष ही बैठे दिखाई देंगे। यह तो महिलाओं के साथ धोखा होगा। FWS को मशहूर लेखिका जे.के. रॉलिंग का भी समर्थन मिला है। जे.के. रॉलिंग विश्व-विख्यात उपन्यास ‘हैरी पॉटर’ की लेखिका हैं। उन्होंने पहले भी कहा था कि ट्रांस अधिकारों की आड़ में जैविक महिलाओं के हक को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ़ एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि ट्रांस महिलाओं को महिलाओं के लिए आरक्षित जगहों से बाहर करना सही तरीका नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पहले अस्पताल, पब्लिक टॉयलेट, स्कूल और जेलों में ट्रांस जेंडर महिलाएं आम महिलाओं के साथ ही जाया करती थीं। मगर अब उन्हें जैविक महिलाओं वाली सुविधाएं नहीं मिल पाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा, कि अदालत इस फ़ैसले को किसी समूह की कीमत पर किसी दूसरे समूह की जीत के तौर पर नहीं देखती। फ़ैसले में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया, कि ट्रांस समुदाय को कानून के दूसरे प्रावधानों के तहत सुरक्षा सुविधाएं पहले ही मिली हुई हैं।


पत्रकारिता का एक अहम कर्तव्य हैं कि समाज में चल रही घटनाओं को औचित्य और समग्रता की दृष्टि से आम जन को प्रस्तुत किया जाय।
यह संपादकीय उसी जिम्मेदारी का वहन कर रूप में देखा जा सकता है।इस बार का संपादकीय पुरुष के महिला बनने जिसका अपराधिक मामला था और कोर्ट के सामने एक अजीब सी स्थिति भी आई।
इस पूरे प्रकरण में राजनैतिक परिदृश्य से लेकर न्यायिक और मानवीय पहलू तक काफी
प्रभावित हुए। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री की परिभाषा को अद्यतन कर ही दिया और इस महिला पहले पुरुष को सजा भुगतने के लिए पुरुषों की जेल में ही भेज दिया है।
भारतीय संस्कृति में स्त्री पुरुष और किन्नर की मूल प्रवृतियों पर बहुत साफ स्थिति रखी गई है।
इसे आम भाषा में फितरत कभी भी नहीं बदलती है।
विज्ञान और तकनीक ने इंसानी संस्कृति और समाज को काफी बदल कर रख दिया है।अतः अब वैश्विक स्तर या राष्ट्रीय या देसी परिप्रेक्ष्य अब समानता की ओर काफी आगे बढ़ चुके हैं।
यह संपादकीय पाठकों से भी उनकी राय पूछता है और यही संपादक की या लेखक की खूबी है कि संपादकीय या रचना ,,,पाठकों को विक्रम और बेताल के समीकरण पर ला खड़ा करे।
इस प्रकार के संपादकीय एक्टिव रीडिंग सोसायटी या पढ़ने वाला सक्रिय समाज सृजित हुआ है कि नहीं का बैरोमीटर भी है।
अनूठे परन्तु सत्य संपादकीय हेतु संपादक महोदय को बधाई।
भाई सूर्यकान्त जी, आपने तो इतनी जल्दी से संपादकीय पढ़ कर उस पर अपनी प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी भी लिख दी, कि हम हैरान हो गये। आपको संपादकीय का विषय पसन्द आया और हमारा शोध भी – यह हमारे लिये ख़ुशी का बायस है। हार्दिक आभार।
संपादक महोदय की संपादकीय उनकी कहानियों की तरह ही अलग-अलग, किंतु पाठकों को अपने साथ विचार-विमर्श करने के लिए विवश करती है, जिसके लिए वे निश्चय ही बधाई के पात्र हैं।
हार्दिक आभार सुषमा जी।
नारी की सुप्रीम परिभाषा में जय शंकर प्रसाद की कविता ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो…से लेकर नारी के बढ़ते कद के साथ मेडिकल साइंस के असंभव को संभव करने तथा इससे उत्पन्न कठिनाईयों का विश्लेषण बहुत ही सूक्ष्मता से किया है।
संपादकीय में एडम ग्राहम जिसने दो स्त्रियों का बलात्कार किया था को ज़ब सजा मिली तब तक वह लिंग परिवर्तन करवाकर इसला ब्रायसम बन चुका था।
समस्या तब आई ज़ब जेल अधिकारियों को यह समझ में नहीं आया कि उसे पुरुषों वाली जेल में रखा जाये या महिलाओं वाली। फिर मुक़दमा चला जिसमें ब्रिटेन की अदालत के द्वारा दिए गये फैसले में इस स्थिति का निवारण करते हुए फैसला दिया गया कि व्यक्ति का लिंग उसके जन्म के समय जो था वही रहेगा। शायद इस फैसले का कारण यह भी है कि लिंग परिवर्तन से व्यक्ति का मूल स्वभाव में परिवर्तन असंभव है।
लिंग परिवर्तन के बारे में सुना तो था किन्तु यह स्थिति कल्पना से परे थी। पाठकों को लिंग परिवर्तन से उत्पन्न विषम स्थितियों से परिचित कराने के लिए साधुवाद।
सुधा जी आपको संपादकीय द्वारा रेखांकित की गई विषम परिस्थितियों ने प्रभावित किया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
पुरवाई पत्रिका का संपादकीय-” नारी सुप्रीम परिभाषा” नए समाज की नई परिभाषा लेकर आया है। मनुष्य जितना विकसित होता जाता है उतनी ही उसके सामने चुनौतियां आ रही हैं। कुछ चुनौतियां वह खुद ही खड़ी कर देता है तो कुछ चुनौतियां बाहरी भी होती हैं।
ब्रिटेन में लिंग परिवर्तन वाले मामले ने कोर्ट के सामने ऐसी ही चुनौती पेश कर दी थी। पुरुष एडम ग्राहम लिंग परिवर्तन करके स्त्री इस्ला ब्रायसन बन जाता है। अब उसे स्त्री माना जाए या पुरुष।
मैं ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूरी तरह से सहमत हूं। सहमत ही नहीं मैं उनके ज्ञान का कायल भी हो गया हूं। इतना सुपर फैसला सुनाया कि मुंह से अनायास ही प्रशंसा में शब्द निकल ही पड़ते हैं। यह फैसला पूरी दुनिया के लिए आदर्श फैसला माना जाएगा।
भारतीय क्रिकेटर के पुत्र का कायान्तरण आपकी संपादकीय से ही जान पाया हूं। तस्वीर देखकर लगता ही नहीं है कि यह कभी लड़का रहा होगा।
सच कहूं सर तो इस संपादकीय ने मेरा सिर चकरा दिया है। ये विषय ही ऐसा है।
फिर मैं सोचता हूं कि अगर आप नवीन विषयों का चयन नहीं करेंगे तो लोग यही सोचेंगे कि वही घिसा-पिटा संपादकीय है। संपादकीय भी तो मौलिकता की मांग करता है। मौलिकता खत्म तो संपादकीय काहे का। तेजेन्द्र सर जी आपका संपादकीय हर बार नएपन से पाठकों से रूबरू करवा देता है। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल जी, आपको ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पसंद आया यह जान कर अच्छा लगा। आपने लिखा है – “सच कहूं सर तो इस संपादकीय ने मेरा सिर चकरा दिया है। ये विषय ही ऐसा है।” हर संपादक ऐसी टिप्पणी की वर्षों प्रतीक्षा करता होगा। हार्दिक धन्यवाद।
वाह संपादक जी वाह!
कहां किस धुंधले, अनजान कोने-अंतरे से ऐसे अनसुने,विचित्र,परंतु महत्वपूर्ण विषय चुनकर आप लाते हैं अपने संपादकीय के लिए?
सचमुच आपकी तीव्र और पारखी दृष्टि को नमन और शुभकामनाएं।
अदालत के इस निर्णय पर बहुत-बहुत प्रसन्न हूं!
सृष्टि कर्ता के काम में दखल देने का मनुष्य को कतई अधिकार नहीं है।उसकी बनाई प्रकृति से जो हम छेड़छाड़ कर रहे हैं,धीरे-धीरे इसके दुष्प्रभाव से मानवता प्रभावित होने लगी है। और अधिक दुस्साहस महा प्रलय को बहुत शीघ्र ही ले आएगा।
ईश्वर हमें सद्बुद्धि दें।
संपादकीय के इस अद्भुत विषय के लिए बधाइयां और भविष्य के लिए शुभकामनाएं
सरोजिनी जी, आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं और आप उनमें उठाए गये विषयों से जुड़ पाती हैं, यह हमारे लिये दिली प्रसन्नता का विषय है। आपकी शुभकामनाओं के लिये हार्दि धन्यवाद।
नारी की गरिमा और संवेदनाएं किसी सर्जरी से प्राप्त नहीं किया जा सकता है फिर शारीरिक संरचना को तो बदला जा सकता है लेकिन मानसिक और भावनात्मक स्वरूप को बिल्कुल नहीं। न्यायालय ने सही परिभाषित किया कि जन्म के समय वाले जेंडर को ही माना जायेगा।
आज की सम्पादकीय विचारणीय है । आपको बधाई।
रेखा जी, आपने संपादकीय को लेकर एक बहुत संवेदनशील पहलू उठाया है। हार्दिक आभार।
सम्पादकीय एकदम ज्वलंत और समसामयिक विषय पर है। लिंग परिवर्तन की वैज्ञानिक उपलब्धि का संकट मानवीय, प्रशासनिक, सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर अनेक चुनौतियों को जन्म दे रहा है, प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। सम्बद्ध व्यक्ति को
संघर्ष और जीवट के लिए प्रतिबद्ध कर रहा है। प्रश्न यह भी है कि शरीर के साथ क्या मन- संवेग भी बदलते हैं? सम्पादकीय को इस अछूते विषय पर केन्द्रित करने के लिए बधाई।
इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद मधु जी।
जाति का मतलब ही है -जो “जात” यानी जन्म से हो। वर्ण व्यवस्था वरण किये गये व्यवसाय पर आधारित थी। और जाति व्यवस्था जन्मना संयोग के आधार पर।
पुरुष और स्त्री जाति हैं और ब्राह्मण क्षत्रिय वर्ण।
सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ऐतिहासिक और अद्भुत निर्णय के साथ इन अपराधियों के जीवन में हस्तक्षेप किया।
अब तो और इस अपराधी को पुरुष जेल में ही बन्द करना चाहिए ।ताकि जैसे इसने महिला का बलात्कार किया था।वैसे ही पुरुष कैदियों के द्वारा इसका बलात्कार होता तो इसका प्रायश्चित होता।
लेकिन आजकल लड़के लिंग परिवर्तन करके और हार्मोनल छेड़ छाड़ कर तेजी से लड़की बन रहे हैं यह बहुत अजीब मसला है
लड़को के अन्दर जो पुरुषत्व पुल्लिंग भाव था वह स्त्रीलिंग क्यो होना चहता है। क्या यह कोई बीमारी है ,मानसिक विकृति है या स्त्रीत्व की ओर झुकाव का कोई सामाजिक उत्थान भावना कामकर रही।
यह आसानी से हजम होने वाली बात नहीं ।स्वाभाविक भी नहीं। जिसने स्त्री क बलात्कार किया वही स्त्री क्यों होना चाहता है।यह जानते हुए कि कोई पुरुष उसके साथ वैसा ही बलात्कार कर सकता है। यह कोई साधारण मसला नहीं। बहुत पेचीदा बात है।
इस परिवर्तन की मानसिक जड़ कहाँ है यह मनोविज्ञान की एक बहुत चौकाने वाली समस्या है। गे और लेस्बियन से आगे की।
स्त्री के अभाव में पुरुषों के द्वारा उनकी काम भावना किसी पुल्लिंग शरीर के कम उम्र कोमल शरीर के माध्यम. से शान्त करने का रास्ता बनाती थी । पहले भी समाज में यह अपराध की तेह चोरी छिपे होता था। स्त्रियों के भीतर भी पार्टनर के अभाव में इस टाइप का सम्बन्ध एक प्राकृतिक उत्तेजना के शमन के रूप में उसी छिपे रुप में मौजूद था। आज उसका रुप प्रत्यक्ष गे या लेस्बियन बनकर आ गया। लेकिन यह ट्रांसजेडर उसके आगे की समस्या है।कोई स्त्री पुरुष बनना चाहे तो पुरुषवादी कामना का एक रुप हो सकता है।लेकिन स्त्री बनता हुआ पुरुष कैसे इतने युगों के अपने पुरुषत्व के अहं को विसर्जित करके स्त्री का रुप लेना चाहता है यह सामान्य भारतीय व्यक्ति के लिए कल्पना से परे की चीज है। और विज्ञान का चमत्कार देखिये कि कुछ समय पहले पुरुष शरीर में वह क्रिकेटर एक सुन्दर जवान दिख रहा है और सर्जरी के बाद वही एक बदली हुई खूबसूरत स्त्री बन गय।
पुराणों में राजकुमारी इला की कहानी इस तरह की एक गुत्थी है। जो एक राजकुमार के सरोवर में स्नान करके निकलने के बाद एक युवती के शरीर में परिवर्तित हो गया था
पहले के जमाने में शहरी फैशन में गाँव के लड़के मोछमुण्डा बनके रुप बदलने लगे थे भोजपुरी के गायक मनोज तिवारी ने गाना गाया–ए हो मोछ मुण्डा भ इया लागत बाय बबुनी।
अब तो साक्षात् बबुनी(लड़की) बनने के लिए लिंग सर्जरी और हार्मोनल उपचार तक करवाना पसन्द करने लगे लड़के। इसकी वजह क्या हो सकती है।
क्या धन वैभव सुख सुविधा के अर्जन के बाद बढ़ा हुआ उन्माद लड़को के भीतर स्त्रैण भावना का एक कौतूहल पूर्ण प्रयोगवादी प्रवृत्ति के रुप मे उभरा है। या मनोविकृति , कौतूहल और सोशल स्टन्ट से अधिक भी इसका कोई मजबूत कारण है!
डॉ. सच्चिदानन्द जी, आपकी विस्तृत टिप्पणी संपादकीय से जुड़े कई विष्य और सवाल उठाती है। इन मु्द्दों पर विचार करना ज़रूरी है। आपका हार्दिक आभार।
विषय गम्भीर भी है, रोचक भी और चिंताजनक भी। मुंबई में कुछ वर्ष पहले सम्पत्ति विवाद के चलते एक बड़े industrialist खानदान में भी ऐसा किस्सा हुआ था जो देशभर में बहस और चर्चा का विषय था।
रिंकु जी, बहुत बहुत शुक्रिया।
क्या बात सर हर बार चुन चुन कर विषय लाते हैं आपका आज का संपादकीय पढ़कर एक पुराना गाना याद आ रहा है। देख तेरे संसार की क्या हालत हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान,कितना बदल गया इंसान।
अंजु, आपकी प्यारी सी टिप्पणी बहुत कुछ कह जाती है। बहुत बहुत शुक्रिया।
न जाने कितनी मनोव्यथाओं के बाद ऐसे निर्णय लिए जाते होंगे! विचारोत्तेजक संपादकीय। सामयिक, शोधपरक, सुचिंतित और सटीक। बधाई स्वीकारें।
दिल से शुक्रिया हंसा!
नारी नारी न रही
पुरुष पुरुष न रहा
हे प्रभु हमे तेरा
ऐतबार न रहा….
जय हो सर।
तेजेन्द्र भाई: इस बार का सम्पादकीय तो बहुत ही मज़ेदार है। ट्राँसजैन्डर लोगों का बिना किसी ठोस सबूत के केवल मुँह ज़ुबानी कहने से कि मैं एक लड़का हूँ या लकड़ी हूँ काफ़ी नहीं है। ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने जो लिंग की परिभाषा की पुष्टी की है वो बहुत सराहनीय है। FWS की डायरेक्टर ने बिल्कुल सही कहा है कि “अगर महिला की परिभाषा को जैविक आधार से न जोड़ा जाए, तो पब्लिक बोर्ड में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर भी पुरुष ही बैठे दिखाई देंगे। अब तक किन्नरों या फिर हिजड़ों की कोई पहचान नहीं थी। उन बेचारों को अब थर्ड जैन्डर नाम से अपनी पहचान मिल गई है, यह बहुत अच्छी बात है। सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद।
विजय भाई, ब्रिटेन में महिला बलात्कारियों की संख्या में ख़ासी बढ़ोत्तरी हुई है। पता चला कि दरअसल वे महिला के वेश में पुरुष थे।
तेजेन्द्र भाई: जिस बात का मुझे डर था उसकी confirmation आप ने कर दी। Trans gender के नाम पर और अपना उल्लू सीधा करने के लिए और हब्स को मिटाने के लिए लोग ऐसे ऐसे घिनौने काम करते हैं सोचा भी नहीं था। ट्रंप ने पहले ही दिन कहा था कि अमरीका में केवल दो ही सैक्स हैं आदमी और औरत।कितनी सच्चाई है इस बात में। आपस के जो natural सम्बंध हैं उसका ऐसे लोगों ने मज़ाक बना लिया है और सरकार अपनी वोटौं के लिये इन सब सम्बन्धों को अपना पूरा सहयोग दे रही है।
विजय भाई, स्थिति ब्रिटेन में और भी चिंताजनक थी। “I feel that I am a woman!”… यह कह देने भर से आपको औरत मान लिया जाता था।
समाज आज जिन जटिलताओं और परिवर्तनों से गुजर रहा है,यह घटना उसका एक उदाहरण भर है।लेकिन समाज की संरचना में जेवीय आधार एक प्रमुख फैक्टर रहा है और इस जटिल मामले में ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने उचित निर्णय दिया है,इससे मैं भी सहमत हूं।आज भी पुरुष और महिला की जेवीय संरचना और उनके वैचारिक भावनात्मक सोच में फर्क है,और प्रत्येक को उनके अनुसार जीने का हक मिलना चाहिए।अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक सामाजिक अराजकता
फैल सकती है।
भाई इंद्र कुमार जी, ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने एक उदाहरण स्थापित किया है विश्व भर की अदालतों के लिए।
आदरणीय संपादक जी
इस संपादकीय को पढ़कर कुछ अलग सा जनने को मिला, बहुत अच्छा लगा, जो भी संपादकीय आप लिखते हैं और मैं उसे पढ़ती हूं तो मेरे मन में एक नई भावना और एक नई सोच जाग्रत होती है कि अरे ऐसा भी होता है, लोग अपने लिए कानून के लिए और समाज के लिए क्या-क्या नहीं कर लेते हैं, किसी कहानी की तरह लिखा गया संपादकीय मुझे बहुत अच्छा लगा एक बहुत नये आयाम वाले संपादकीय के लिए शुभकामनायें सर जी
सीमा, हमारा प्रयास रहता है कि हर बार कुछ नया लिखा जाए। कभी कभी सफल भी हो जाता हूं। हार्दिक आभार।
प्रायः सभी देशों में गे अपराधी को पुरुष जेल में और लेस्बियन अपराधी को महिला जेल में रखा जाता है। दोनों मामलों में साथी अपराधियों को विरोध हो सकता है।
यहां विरोध को दरकिनार किया जाता है क्योंकि पुरुष या स्त्री की प्रतीति महत्वपूर्ण रोल अदा करती है।
पर यदि ये बलात्कारी होते तो इस केस से ज्यादा खतरनाक होते।
इस हिसाब से तत्कालीन सेक्स ( न कि जन्म से ) को इस केस में ध्यान में रखा जाना चाहिए।
विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए धन्यवाद!
भाई हरिहर झा जी, आपने संपादकीय का संज्ञान लेकर सार्थक टिप्पणी की; आपको हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी
इस बार का संपादकीय भीतर तक हलचल मचा। लिंग परिवर्तन कराकर स्त्री से पुरुष, पुरुष से स्त्री बनने की घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रहीं हैं। आपके गहन अध्ययन और शोधपूर्ण वैचारिकी का कायल हूँ। आप अपने संपादकीय के माध्यम से ‘पुरवाई’ में ऐसे मौलिक और ज्वलंत मुद्दे लेकर उपस्थित होते हैं जिससे पाठकों के न केवल ज्ञान में वृद्धि होती है, बल्कि उनमे भावनात्मक रूप से एक वैचारिकता भी जन्म लेती है।
एक बेहतर और उम्दा संपादकीय के लिए बधाई।
भाई रामशंकर भारती जी, आप जिस तरह उत्साह बढ़ाते हैं, और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है।
बड़ा ही अजब और विचित्र स्थिति का निर्माण हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रभावी निर्णय दिया, धन्यवाद आपके सम्पादकीय से वैश्विक स्तर के विषयों की जानकारी हो पाती है हमें।
प्रिय आलोक, एक वैश्विक पत्रिका के संपादक का दायित्व निभाने का प्रयास करता हूं। आपकी टिप्पणी हौसला बढ़ाती है।
निश्चित रूप से मेडिकल साइंस कल्पनाओं से परे तरक्की कर रहा है। पर इस केस में आरोपित व्यक्ति महिलाओं के संदर्भ में सबसे घृणित और अक्षम्य अपराध रेप का दो बार आरोपी हैं उसको ऐसी स्वतंत्रता कैसे मिल सकती है कि वह कोर्ट को अपने अधिकारों के प्रति चुनौती दे सके। यह तो न्यायपालिका को तय करना होगा कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो , घटना के आरोपियों को सजा समय पर हो। और यह विषय आने के पश्चात ऐसे अस्पतालों पर भी पुलिस वेरिफिकेशन जैसे नियम लागू होने चाहिए।निकट भविष्य में ऐसा कैसे पुनरावृत्ति ना हो , यह भी सुनिश्चित हो। यदि कोई सोचता भी है तो उसे अपनी स्थिति न्यायपालिका की तरफ से स्पष्ट हो.
शुभम, आपने सही सवाल उठाए हैं। इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
जब कुदरत के फैसले को इंसान नकार रहे हो तब न्यायिक फैसले ही सर्वमान्य होंगे।
अच्छे विषय पर बात है ।
Dr Prabha mishra
हार्दिक आभार प्रभा जी।
आ0तेजेन्द्र जी! और कुछ पढ़ पाऊँ या नहीं आपका सम्पादकीय अवश्य पढ़ती हूँ और उस पर मंथन भी करती हँ। दरअसल प्राणी विज्ञान की छात्रा होने के कारण कुछ विचित्र बातें मुझे पता हैं जैसे पहले जीव एसैक्सुल थे न मेल न फीमेल ! बस उनके दो हिस्से हो जाते और वंश बढ़ जाता। Evolution of sex धीरे-धीरे हुआ लिंग अलग-अलग पहचाने नहीं जाते थे फिर दो अलग अलग लिंग स्थापित हुए फिर भी कई प्राणी ऐसे थे जो आवश्यकतानुसार लिंग परिवर्तित कर सकते थे। जैसे यदि एक मादा के आस-पास उसी species के दूसरे जीव नर बन जाते थे।
ख़ैर विज्ञान ने असंभव को संभव कर दिखाया है।
ब्रिटिश अदालत के फ़ैसले से इत्तेफ़ाक रखते हुए मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहती हूँ कि ट्राँसजेंडर के ट्राँजेंडर होने में उनका कोई कुसूर नहीं है और उनके लिये विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिएँ बहुत युगों तक वो आम लोगों जैसे अधिकारों से वंचित रहे हैं (विशेष तौर पर भारत में ) उन्हे समान्य अधिकार मिलने चाहिएँ और उन्हें नौकरी जहाँ पर उचित लगे मिलनी ही चाहिये। लेस्बियन औरत और गे पुरुष होते हैं वो वैसे ही व्यवहारित किये जाएँ।
ज्योत्सना जी, किसी भी पत्रिका के लिए गर्व का विषय है कि उसके संपादकीय को इतने लगाव से पढ़ा जाता है। जी किन्नरों (trans-gender) को इस निर्णय से कोई नुक्सान नहीं होगा। आपको हार्दिक धन्यवाद।
https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-gender-change-issue/
तेजेन्द्र जी!
अकल्पनीय वह अनपेक्षित संपादकीय है इस बार का। पुरानी बात तो छोड़ ही दें,आज भी इस विषय पर बात करने के पहले 10 बार सोचना पड़ता है साहित्य में भले ही इस पर बात हो जाए लेकिन घर में अगर बच्चे हैं तो इस तरह की कोई बात आज भी नहीं होती।
दो गानों को थोड़ा-थोड़ा लें- दुनिया ओ दुनिया!… ये कहाँ आ गए हम तेरे साथ चलते चलते… विकास का नक्शा और उसका प्रभाव इस तरह होगा ऐसा तो कभी सोचा भी ना था।
एक पल के लिए महाभारत की शिखंडी याद आ गई। वह भी पुरुष से स्त्री बनी थी। पांडवों के साथ थी और भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि कोई स्त्री अगर उसके सामने होगी तो वे धनुष नहीं उठाएँगे।पर उसका तो फिर भी एक उद्देश्य था, भीष्म की मृत्यु! और बदला भी!
पर यहाँ तो उद्देश्य गलत काम को करके अपने को बचाना था। शारीरिक परिवर्तन से क्या-क्या बदला जा सकता है? बदलने और होने में अंतर होता है। हम जज के फैसले का समर्थन करते हैं।
महिला जेल में न रखने का निर्णय बिल्कुल सही था। जेंडर बदल लेने से भी भावनाएँ बदलना संभव नहीं। दूषित मानसिकता नहीं बदली जा सकती।
“आर्यन ने बाक़ायदा ब्रिटेन के शहर मैनचेस्टर से अपनी सर्जरी करवाई थी। वह इसला ब्रायसन की तरह केवल बोलकर महिला नहीं बना। ”
इसे पढ़ कर तो ऐसा लगा कि उसने सर्जरी नहीं करवाई थी, वह झूठ बोल रहा था। तब तो न्यायालय को इसका संज्ञान लेना चाहिए था क्योंकि वह न्यायालय के साथ भी फ्रॉड कर रहा है।
जहाँ तक ट्रांसजेंडर की बात, वह उनकी मजबूरी है। ईश्वर ने उन्हें वैसा बनाया पर फिर भी इसमें जो महिलाएँ होती हैं वे निहायत बदतमीज और बेशर्म होती हैं, कम ही ऐसी होती है जो अच्छी होती हैं। आदमी की इज्जत उतारने में एक पल नहीं लगता उन्हें। यह जो हमने देखा है वह हम बता रहे हैं।
ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है और स्त्री की परिभाषा को अंतिम रूप दे दिया है वह काबिले तारीफ है।
अनजान न होते हुए भी जिसे छूने से सब बचते हैं,ऐसे अनछुए और विशिष्ट संपादकीय पर लिखने का साहस आप जैसे संपादक की ही कलम कर सकती है, इसके लिए बधाई तो बनती है!
पुरवाई का बहुत-बहुत आभार जो संपादकीय के माध्यम से देश दुनिया की हर खबर से
जागरूक और सचेत करने के लिये हर सप्ताह तत्पर रहती है।
नीलिमा जी, आपने ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया है। आपने गहराई से संपादकीय पढ़ कर एक विस्तृत टिप्पणी की है। आपने आनाया बांगर और इसला ब्रायसन की तुलना भी की है। आपका हार्दिक आभार।
पता नहीं कौन सी खुशी पाने के लिए प्रकृति के विरुद्ध जाने का साहस करने लगे हैं विक्षिप्त लोग.. कौन सी कुंठाएं ऐसे विकृत विचारों को पनपने का अवसर देती हैं ?
क्या ही गारन्टी है कि यह सहअस्तित्व पक्का किसी खुशी का ही बायस बनेगा ? मेरे परिचितों में ਕਿਸੀ ka very much intelligent/ academically topper बेटा विदेश उच्च शिक्षा के लिए गया और माँ बाबा को एहसास bhi होने नहीं दिया ..जब लौटा तो ल़डकियों के वेश में.. उसके नए अवतार ने..या कहो कि नयी योनि ने पूरे खानदान
को गहरे घाव दिए .पूरा घर स्तब्ध , सुन्न ..पिता तो सदमें
से नहीं उभरे.. ..किधर चल दी हमारी पीढ़ियां..? बेहद नवाचारी विषय को शब्दों में सहेजने के लिए संपादक महोदय की कलम को सलाम… प्रश्न छोड़ता है इसबार का संपादकीय.. उत्तर शीघ्र ढूढ़ने होंगे .. अन्यथा…..‼️⁉️⁉️
किरण जी, आप पुरवाई के संपादकीयों पर रेग्युलर प्रतिक्रिया देती हैं। आपने अपने अनुभव क्षेत्र से एक घटना के बारे में बात करके संपादकीय को और भी महत्व प्रदान की है। हार्दिक आभार।
सामयिक वैचारिक मुद्दा। जिसने विचार तंतुओं को झंकृत किया। हम सभी में सेक्स की अभिव्यक्ति सेकेंड सेक्सुअली डिवेलपमंट से उभार पाती है। शारीरिक या मानसिक दोनों। एक आनुवंशिकी का गंभीर अध्येता होन के कारण कह सकता हूं दरअसल जन्म के समय ही गुणसूत्रों का विन्यास दिखता है वही असली नर या मादा लिंग है। मगर यहां भी मामला सामान्य क्रोमोसोम विन्यास XY XX यानी स्पष्टतः नर और मादा के इस आम तौर के संघटन को अतिक्रमित कर जाता है। तरह तरह के गुणसूत्र विन्यास अन्यान्य कारणो से आनुवंशिक संरचना ( जेनेटिक सेक्स) को जन्मते है किंतु भौतिक अपीयरेंस में फर्क बढ़ता चलता है। और तरह सामाजिक दंश झेलने की व्यथा शुरु होती है। सबसे बुरी स्थिति तो हिजड़े की होती है। जिनमें अस्पष्ट बाह्य लैंगिक विभेदन के न होने से कोई नर तो कोई मादा हिजडा बन अपनी अपनी अभिशप्त जीवन ढ़ोता है।
मनुष्य को छोड़ दें तो सेक्स डिटरमिनेशन की प्रणाली तो जीव जगत मैं और भी लचकीली है। जैसे छिपकली वर्ग कई प्रजातियों के अंडे भिन्न भिन्न तापक्रमों पर प्रस्फुटित होकर अलग लैंगिक अभिव्यक्ति को उभारते है। और विकास के दौरान भी यह लचीली सेक्स डिटरमिनेशन प्रणालियों में अदला बदला हो सकती है और निषेचन सफल रहता है। मछलियों में खासकर निषेचित टिलैपिया के अंडे अपने मूल जेनेटिक सेक्स को भारी पुरुष मादा हार्मोनों के अनुप्रयोग से बदलने का सफल परीक्षण दर्शाते हैं। मगर हार्मोन के बाहरी प्रभाव को हटाने पर वे अपने मूल सेक्स की पुनर्प्राप्ति कर लेते हैं। वैज्ञानिक ऐसा सेक्स परिवर्तन व्यावसायिक लाभों के लिये करते हैं। टिलैपिया बहुप्रजनन का प्राणी है। किसानों को नर टिलैपिया पालने में फायदा इसलिये है कि उनमें मादा की तरह हैवी गोनैड डिवेलपमेंट के चलते कायिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है। उत्पादन घट जाता है जबकि नर का गोनैड विकास उल्लेखनीय नहीं होता।
क्लमशः
भाई आपने अपनी टिप्पणी क्रमशः पर छोड़ी है – इसी से पता चलता है कि आप संपादकीय को कितनी गंभीरता से पढ़ रहे हैं। आपने XY और XX Chromosomes की बात विस्तार से की है। इस वैज्ञानिक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
सुप्रभात, प्रणाम भाई।
इस बार आपके.संपादकीय में बहुत ही अछूता और नया साल विषय उठाया गया ,जिस पर कम चर्चा हुई है।कम से कम भारत में ऐसे मामले कम आये.हैं।परंतु आपने जिस तरह समुचित सूक्ष्म विश्लेषण के साथ यह मुद्दा उठाया है बहुत अच्छी तरह समझाया भी।सचमुच सराहनीय है। हमने प्रसाद की श्रद्धा को जिस कोमलता,करुणा बुद्धिमत्ता के.साथ सम्मानित किया है हमारे लिए नारी का वही स्वरूप पूज्यनीय है।परंतु अपने बचाव के लिए लिंग परिवर्तन या किसी और उद्देश्य से हो ,इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
उचित है। पता महीं आधुनिक विज्ञान और तकनीक न जाने कितने रुपों में चमत्कृत करते रहेंगे।बहुत सुंदर, संवेदनशील और सारगर्भित संपादकीय के लिए बहुत बहुत धन्यावाद। मै भी समझ.सकी,जहां तक। आपके संपादकीय पढकर बहुत कुछ सीखने जानने को मिलता है।आभार।…पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
प्रिय पद्मा, तुम्हारी प्रतिक्रिया की हमेशा प्रतीक्षा रहती है। तुम्हारी टिप्पणी शांत मगर गहरी होती है।
विगत टिप्पणी के आगे –
इस तरह के प्राकृतिक परिहास के मामलों में मनुष्य ने अपने निहित स्वार्थ ढूंढ़ लिये है। ओलंपिक मुक्केबाज के महिला मुकाबले में जन्मजात XY पुरुष घुस जा रहे हैं तो कहीं आपराधिक मामलों से जैसा कि आपने उल्लेख किया है लैंगिक मुखावटों का जानबूझकर कर इस्तेमाल किया जा रहा है।
अरविंद भाई आपने दूसरे भाग में खेलों में इस प्रवृत्ति के ग़लत इस्तेमाल की बात कही है। बहुत शुक्रिया।
प्रश्न महत्वपूर्ण और विचारणीय है। बलात्कारी पुरुष स्त्री बनकर स्त्रियों के मध्य रहे।