Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – साथी हाथ मिलाना…!

परंपरा के अनुसार दाएं हाथ से ही हैंड-शेक किया जाता है। इसका मुख्य कारण यही है कि अधिकांश लोग दाएं हाथ से ही काम करते हैं इसलिए वे हथियार भी दाएं हाथ में ही रखते और चलाते हैं। तो सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दाएं हाथ से दाएं हाथ को ही मिलाया जाता था। इस तरह जो प्रथा हिंसा को रोकने के तरीके के रूप में शुरू हुई, वह धीरे-धीरे भरोसे और सम्मान के संकेत में बदल गयी। आज हाथ मिलाना अपनापन जताने और दोस्ती दिखाने के रूप में इस्तेमाल होता है।

इंसान का व्यवहार बहुत दिलचस्प होता है, खासकर बॉडी लैंग्वेज। हम जिस तरह एक-दूसरे से मिलते हैं… शरीर को छूकर अभिवादन करते हैं… वैसा क्यों करते हैं? हर संस्कृति का अभिवादन का तरीका अलग है। भारत के हिन्दू हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं या बड़ों का सम्मान करने के लिए उनके सामने शीश नवाते हैं या फिर पाँव छूते हैं। मुसलमान एक विशेष तरीके से हथेली को उठा कर सलाम वालेकुम कहते हैं। अरबी देशों में गाल से गाल मिलाते हैं… मगर पश्चिमी सभ्यता में हाथ मिलाया जाता है। 
क्योंकि अंग्रेज़ों ने एक समय में पूरे विश्व पर राज किया, तो अधिकांश देशों में हाथ मिलाने का दस्तूर शुरू हो गया। कोरोना वायरस आने से पहले तो पूरे विश्व में हाथ मिलाना अभिवादन का एक सहज तरीका बन चुका था। मगर कोरोना के आगमन के बाद जब पश्चिमी देशों में भी लोगों ने हाथ जोड़ कर अभिवादन शुरू कर दिया, तो उनके चित्र भारतीय मीडिया में उछाले जाने लगे और भारतीय परंपरा की तारीफ़ खुल कर होने लगी। 
आपने ध्यान दिया होगा कि ‘पुरवाई’ का संपादकीय अपने पाठकों के लिए हर विषय की गहरी पड़ताल करता है और सच्ची जानकारी उपलब्ध करवाता है। हमारा मानना है कि हमें यह अवश्य जानना चाहिए कि किसी भी देश या सभ्यता में कोई परंपरा क्यों शुरू हुई? ज़ाहिर है कि हाथ मिलाने की शुरूआत भी तो कहीं न कहीं से हुई ही होगी। तो हमने शुरू की अपनी खोज और जानने का प्रयास किया कि इस परंपरा की शुरूआत कैसे हुई, और इसका आधुनिक स्वरूप क्या है? 
हाथ मिलाना या जिसे हैंड-शेक कहा जाता है अपना अभिवादन एक-दूसरे तक पहुँचाने का एक ऐसा तरीका है, जिसमें शब्दों या भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पश्चिमी आधुनिक समाज में, हम हर दिन, अक्सर दिन में कई बार हैंड-शेक करते हैं, इससे क्या संदेश मिलता है?
जैसे शब्दों का इतिहास होता है, वैसे ही शारीरिक हाव-भाव के भी कई मतलब होते हैं। हाथ मिलाने या हैंड-शेक का इतिहास जानने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि आख़िर इसका मतलब क्या है और हम इसका इस्तेमाल क्यों करते हैं?

हाथ मिलाने का सबसे पुराना रिकॉर्ड नौवीं शताब्दी ईसा पूर्व का है। एक पत्थर के नक्काशी में असीरिया के राजा शलमनेसर तृतीय को बेबीलोन के शासक मर्दुक जाकिर शुमी प्रथम के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है। 
प्राचीन ग्रीस में हाथ मिलाने को डेक्सियोसिस के नाम से जाना जाता था… यह समानता, दोस्ती और आपसी सम्मान का प्रतीक था। ग्रीक मूर्ति और लेखों में जिसमें होमर के महाकाव्य भी शामिल हैं, अक्सर योद्धाओं और सहयोगियों के बीच संबंधों को दिखाने के लिए हाथ मिलाने का इस्तेमाल किया जाता था। 
यह सामने वाले को आश्वस्त करने का एक तरीका था… एक सीधा तरीका कि, “मेरे हाथ में कोई हथियार नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाऊँगा।” जैसे-जैसे रोम में यह रिवाज़ आगे बढ़ा, यह ज़्यादातर हाथ पकड़ने जैसा था। इरादा…? पक्का करें कि जिस व्यक्ति से आप मिला रहे हैं, उसकी आस्तीन में चाकू न हो।
माना जाता है कि सिर्फ़ हाथ बढ़ाने के बजाय हाथ मिलाने की परंपरा मध्ययुगीन यूरोप से आई है। माना जाता है कि ‘नाइट’ (सामंत) किसी का हाथ पकड़कर हिलाते थे, ताकि कोई भी छिपा हुआ हथियार ज़मीन पर गिर जाए। इसी के साथ 17वीं सदी में ‘क्वेकर’ लोगों ने हाथ मिलाने को रोज़ाना के अभिवादन के तौर पर लोकप्रिय बनाया।
परंपरा के अनुसार दाएं हाथ से ही हैंड-शेक किया जाता है। इसका मुख्य कारण यही है कि अधिकांश लोग दाएं हाथ से ही काम करते हैं इसलिए वे हथियार भी दाएं हाथ में ही रखते और चलाते हैं। तो सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दाएं हाथ से दाएं हाथ को ही मिलाया जाता था। इस तरह जो प्रथा हिंसा को रोकने के तरीके के रूप में शुरू हुई, वह धीरे-धीरे भरोसे और सम्मान के संकेत में बदल गयी। आज हाथ मिलाना अपनापन जताने और दोस्ती दिखाने के रूप में इस्तेमाल होता है।
बर्लिन के पेर्गामोंन संग्रहालय (Pergamon Museum in Berlin) में 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व का एक पत्थर रखा हुआ है, जिसमें दो सैनिकों को हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है। इसी प्रकार एथेंस के एक्रोपोलिस संग्रहालय में एक स्तंभ में  हेरा (ज़ीअस की पत्नी और बहन) और एथेना (ज्ञान, साहस और प्रेरणा की देवी) को हाथ मिलाते दिखाया गया है। यह चित्र इस बात को दर्शाता है कि ये दोनों ही बराबरी के सम्मान के हक़दार हैं, और वे दोनों ही एक-दूसरे की उपस्थिति में सहज महसूस करते हैं।   इस काल के कुछ विद्वानों की मान्यता है कि हाथ मिलाने की परंपरा का उदय ‘शांति के प्रदर्शन’ के तौर पर हुआ है जिसमें यह दिखाया जाता है कि दोनों पार्टियों में से किसी के पास भी हथियार नहीं हैं, इसलिए दोनों पक्ष शांति स्थापित करना चाहते हैं । यही कारण है कि वे दोनों हाथ मिलाते हैं। 
आज के ज़माने में हम नए जान-पहचान वालों से, बिज़नेस मीटिंग में, या किसी इनफॉर्मल कॉन्ट्रैक्ट (“हैंड-शेक एग्रीमेंट”) पर सहमति दिखाने के लिए हाथ मिलाते हैं। यह तरीका हर इंसान में अलग-अलग होता है, लेकिन आजकल हाथ मिलाना फॉर्मैलिटी के हिसाब से ठीक-ठाक है। यह उतना अपनापन वाला नहीं होता, जितना आप अपने पार्टनर को गले लगाते या किस करते हैं, और न ही यह उतना फॉर्मल होता है जितना फ़ौज में कोई निचले रैंक का जवान अपने से ऊँचे ओहदे वाले को सैल्यूट करता है।
कई पूर्वी संस्कृतियों में, हाथ मिलाने के स्थान पर झुककर अभिवादन किया जाता है। मार्शल आर्ट के अमेरिकी प्रैक्टिशनर इस प्रथा से वाकिफ हैं… लेकिन विदेश यात्रा करते समय इसकी आदत डालना अभी भी एक चुनौती हो सकती है। स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे कुछ भूमध्य-सागरीय देशों में, कई विपरीत लिंग के लोगों के अभिवादन में हाथ मिलाने की जगह दो हवाई चुंबनों का इस्तेमाल किया जाता है।
इस बीच भिन्न संस्कृतियों ने दूसरों के प्रति अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने के लिए अलग-अलग अभिवादन विकसित किए – चेहरे को रगड़ने से लेकर, चुंबन करने, गले लगाने, बाँहों को पकड़ने और हाथ मिलाने तक के अनेक रूपों में जिनसे हम आज परिचित हैं।
कोविद-19 के ज़माने में हाथ मिलाना ख़तरनाक माना जाने लगा था। कहते हैं न आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। अब लोगों ने हाथ मिलाने की जगह ‘फ़िस्ट बंप’ का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यानी कि वे हाथ की मुट्ठी बना कर एक-दूसरे की मुट्ठी को छू लेते हैं। हममें से जो लोग ज़्यादा सावधानी बरत रहे थे, वे हाथ के नीचे और कोहनी टकरा कर एक नए तरह का अभिवादन करने लगे थे। सच तो यह है कि किसी के साथ “कोहनी रगड़ने” को एक नई परिभाषा मिल रही है। मगर अब कोरोना काल से बाहर आ चुके हैं और मुट्ठी और कोहनी को वापस आराम दिया जाने लगा है और एक बार फिर हाथ से हाथ मिलने लगा है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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44 टिप्पणी

  1. बहुत अच्छी जानकारी । हैंडशेक के साथ जुड़े कितने ही भाव – अनुभाव , आश्वासन, भरोसा , संशय आदि सभी अकस्मात सामने आ गए । बहुत बधाई आपको ।

    शशि पाधा
    वर्जीनिया , यू एस ए

  2. अभिनंदन,हैंड शेक पर संपादकीय के रूप में सुन्दर आलेख जिसमें इस प्रथा के ऐतिहासिक स्वरूप की पड़ताल “गहरे पानी पैठ”कर की गई है। सदैव की भांति इस बार भी आदरणीय डॉ तेजेन्द्र शर्मा जी के ज्ञान वर्धक संपादकीय के लिए हार्दिक आभार।

  3. पुरवाई के सभी संपादकीय पाठकों को सभी विषयों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर समय समय पर करते रहते हैं।
    इस बार का संपादकीय पूरी पड़ताल के बाद हाथ मिलाने या समूचे विश्व में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से स्वागत और भेंट के करने के शिष्टाचारों को सारगर्भित अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।
    बढ़िया संपादकीय हेतु बधाई हो ।

  4. जितेन्द्र भाई: हाथ मिलाने की परम्पररा पर इतनी सुन्दर जानकारी साझा करने के लिए बहुत बहुत साधुवाद। हज़ारों वर्ष पुरानी होते हुए भी इस प्रथा में आवश्यक्ता के अनुसार कोविड के समय में जो बदलाव आए वो तो कभी सोचा भी नहीं था, लेकिन जब ‘अभिवादन भी करना है और दूरी भी बनाए रखनी है’ की चुनौती आई तो ‘फ़िस्ट बंप’ और ‘कोहनी रग़ड़ने’ ने जन्म लिया। समय के साथ साथ इस लिस्ट में कितने और क्या क्या नाम जोड़े जाएँगे वो तो आने वाला समय ही बताएगा।

  5. साथी हाथ मिलाना में अच्छा संदेश है।
    वैसे कोविड काल ने हाथ मिलाने के खतरे बताए
    कुछ मनोवैज्ञानिक कहते हैं हाथ मिलाने से हमारी इक्षा शक्ति ( विल पावर ) दूसरे के पास चली जाती है,बहरहाल अभिवादन केतरीकों पर शोध हुआ ।
    Dr Prabha mishra

  6. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
    पुरवाई का ताज़ा संपादकीय ‘साथी हाथ मिलाना…!’ पढ़कर मन प्रफुल्लित हो उठा। सभ्यता के विकास और मानवीय व्यवहार की परतों को जिस खूबसूरती से आपने शब्दों में पिरोया है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
    इस आलेख की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसने एक साधारण सी दिखने वाली शारीरिक प्रक्रिया ‘हैंड-शेक’ के पीछे छिपे सदियों पुराने इतिहास और मनोविज्ञान को बड़ी ही सहजता से उजागर किया है। असीरिया के राजा शलमनेसर तृतीय और बेबीलोन के शासक की नक्काशी से लेकर मध्ययुगीन यूरोप के योद्धाओं तक का सफ़र तय करते हुए यह लेख हमें बताता है कि जिस हाथ मिलाने को आज हम केवल औपचारिकता समझते हैं, उसकी जड़ें दरअसल ‘सुरक्षा’ और ‘शान्ति’ की तलाश में थीं।
    यह पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ कि कैसे एक हिंसक प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश—यह सुनिश्चित करना कि सामने वाले की आस्तीन में कोई हथियार न हो—कालान्तर में भरोसे और सम्मान का वैश्विक प्रतीक बन गई। ‘डेक्सियोसिस’ की अवधारणा और ग्रीक देवियों हेरा व एथेना के मध्य बराबरी के सम्मान का चित्रण इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य सदैव से ही संवाद और सौहार्द का आकांक्षी रहा है।
    कोरोना काल की विवशताओं और उस दौरान भारतीय परम्परा ‘नमस्ते’ की वैश्विक स्वीकार्यता का ज़िक्र भी सामयिक है। हालांकि, जैसा कि आपने अन्त में बहुत सुन्दर ढंग से लिखा है कि तमाम ‘फ़िस्ट बंप’ और कोहनियों के स्पर्श के बाद अन्ततः मनुष्य अपने स्वाभाविक ‘अपनापन’ की ओर लौट ही आया है और एक बार फिर हाथ से हाथ मिलने लगा है।
    इतिहास, संस्कृति और वर्तमान के इस अद्भुत संगम के लिए आपको और ‘पुरवाई’ की पूरी टीम को साधुवाद। ऐसे शोधपरक और विचारोत्तेजक लेख ही साहित्य और पत्रकारिता की गरिमा को जीवन्त रखते हैं।

    सादर।

    चन्द्रशेखर तिवारी, सोनभद्र, उ०प्र० (भारत)

    • भाई चंद्रशेखर तिवारी जी, आपने तो संपादकीय की पूरी व्याख्या कर डाली। पाठकों को संपादकीय समझने में आसानी होगी। हार्दिक धन्यवाद।

      • सर, आपके इन स्नेहिल शब्दों के लिए हृदय से आभारी हूॅं। सादर अभिवादन स्वीकार करें।

  7. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
    सादर वन्दे।
    पुरवाई का ताज़ा सम्पादकीय ‘साथी हाथ मिलाना…..!’ पढ़कर मन प्रफुल्लित हो उठा। सभ्यता के विकास और मानवीय व्यवहार की परतों को जिस खूबसूरती से आपने शब्दों में पिरोया है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है।
    इस आलेख की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसने एक साधारण सी दिखने वाली शारीरिक प्रक्रिया ‘हैंड-शेक’ के पीछे छिपे सदियों पुराने इतिहास और मनोविज्ञान को बड़ी ही सहजता से उजागर किया है। असीरिया के राजा शलमनेसर तृतीय और बेबीलोन के शासक की नक्काशी से लेकर मध्ययुगीन यूरोप के योद्धाओं तक का सफ़र तय करते हुए यह लेख हमें बताता है कि जिस हाथ मिलाने को आज हम केवल औपचारिकता समझते हैं, उसकी जड़ें दरअसल ‘सुरक्षा’ और ‘शान्ति’ की तलाश में थीं।
    यह पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ कि कैसे एक हिंसक प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश—यह सुनिश्चित करना कि सामने वाले की आस्तीन में कोई हथियार न हो—कालान्तर में भरोसे और सम्मान का वैश्विक प्रतीक बन गई। ‘डेक्सियोसिस’ की अवधारणा और ग्रीक देवियों हेरा व एथेना के मध्य बराबरी के सम्मान का चित्रण इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य सदैव से ही संवाद और सौहार्द का आकांक्षी रहा है।
    कोरोना काल की विवशताओं और उस दौरान भारतीय परम्परा ‘नमस्ते’ की वैश्विक स्वीकार्यता का ज़िक्र भी सामयिक है। हालॉंकि, जैसा कि आपने अन्त में बहुत सुन्दर ढंग से लिखा है कि तमाम ‘फ़िस्ट बंप’ और कोहनियों के स्पर्श के बाद अन्ततः मनुष्य अपने स्वाभाविक ‘अपनापन’ की ओर लौट ही आया है और एक बार फिर हाथ से हाथ मिलने लगा है।
    इतिहास, संस्कृति और वर्तमान के इस अद्भुत संगम के लिए आपको और ‘पुरवाई’ की पूरी टीम को साधुवाद। ऐसे शोधपरक और विचारोत्तेजक लेख ही साहित्य और पत्रकारिता की गरिमा को जीवन्त रखते हैं।
    सादर।
    -चन्द्रशेखर तिवारी, सोनभद्र
    उ०प्र० (भारत)

    • डॉ चंद्रशेखर तिवारी जी, पुरवाई की टीम शोध पूरी शिद्दत से करती है; तभी संपादकीय आपके सामने पहुंचता है। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

      • जी, निश्चित। आपकी इस घोषणा का प्रमाण आपके प्रत्येक सम्पादकीय को पढ़ने के बाद स्वयमेव मिल जाता है।

  8. बहुत महत्वपूर्ण जानकारी से भरा संपादकीय है। हर बार एक नया विषय और उसकी जानकारी
    आपको साधुवाद
    शुभकामनायें

    • निर्देश जी, आप जैसे सृजनात्मक लोग जब संपादकीय की तारीफ़ करते हैं, संपादकीय सफल हो जाता है।

  9. संपादकीय पर प्रतिक्रिया
    इस बार का संपादकीय हैंड-शेक पर केंद्रित है। मानव सभ्यता में हैंड-शेक की परंपरा बहुत पुरानी है। इसी परंपरा की यहां गहन पड़ताल की गई है।
    मानव सामाजिक प्राणी है। प्राचीन काल से ही उसने अपने कार्य-व्यवहार के तरीके ईजाद कर लिए थे। विभिन्न संस्कृतियों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं पर उसका उद्देश्य आपस में मेल-मिलाप ही है।
    हैंडशेक का एक ये तरीका कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का हाथ पकड़कर ऊपर की ओर उठाकर सामने खड़ी भीड़ को(अपने लोगों को) यह आश्वस्ति दिलाता है कि यह व्यक्ति खंजर नहीं छुपाए है। इससे दोस्ती की जा सकती है।
    कालांतर में यह एक प्रथा बन गई। अब हम भूल चुके हैं कि हाथ पकड़कर ऊपर उठाने का मतलब यह होता था। गाल चूमना, गाल रगड़ना या गले मिलना भी आपस में आत्मीयता दर्शाने के तरीके हैं। हमारा भारतीय समाज इस मामले में अलग तरीके का व्यवहार करता है इसलिए विपरीत लिंगी के साथ इस तरह का हैंडशेक असहज करने वाला होता है। यही कारण है कि हमारे देश का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति दूसरे देश में भी अपनी परंपरा का ही निर्वाह करता है।
    मानव समाज के लिए हैंडशेक बहुत जरूरी है। अगर यह न हो तो आपस में दूरियां आ सकती हैं। भारतीय परंपरा में चलते-फिरते या जल्दी में कोई हमारा परिचित, मित्र मिल जाता है तो नमस्कार या राम-राम कर लेते हैं। किसी कारण मन खराब भी होता है तो भी इसमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।
    हम सामने वाले से जाने-अनजाने में कभी हर्ट हो जाते हैं तो राम-राम या नमस्कार न करके जतला देते हैं कि हम आपसे नाराज़ हैं। अगली बार वह व्यक्ति स्वयं आगे बढ़कर नाराज व्यक्ति से राम-राम करके अपनी गलती सुधार लेता है। यह बात सहृदयों के लिए लागू होती है। मूढ़ या बदमिजाज के लिए नहीं।
    हैंडशेक मामूली सा विषय भले ही लगता हो पर मैं मानता हूं कि यह मानवीय मूल्यों का आधार है।
    विषय कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है। अति प्रचलन के कारण भले ही यह घिस गया हो पर इसके मूल में हम जाएंगे तो चमत्कृत हुए बिना न रह सकेंगे। इस संदर्भ में इस संपादकीय को ही पढ़ लीजिए।
    हैंडशेक पर आपका संपादकीय ज्ञानवर्धक है। तार्किकता इसकी पूंजी है। जो कि मूल्यवान है।

    • भाई लखन लाल पाल जी, आपने तो संपादकीय का परत दर परत विश्लेषण कर डाला। हमेशा की तरह बेहतरीन टिप्पणी।

  10. असीरिया के पत्थरों पर उकेरी नक्काशी से लेकर कोरोना काल से गुजरते हुए अभी तक के हाथ मिलाने या हैंड शेक करने अथवा अभिवादन करने के तरीके तक सफर करता हुआ पुरवाई का यह संपादकीय “साथी हाथ मिलाना” बेहद रोचक और जानकारी से पूर्ण है।

    हाथ मिलाना एक प्राचीनतम परंपरा रही है और जैसा कि संपादक महोदय ने लिखा है कि चूंकि दाएं हाथ में हथियार हुआ करते थे तो दाएं हाथ से हाथ मिलाने से यह संकेत भी जाता था कि हाथ मिलाने वाला एक दूसरे को चोट या हानि नहीं पहुंचाएगा। इस परंपरा में यह बात भी निहित होती थी कि हाथों या आस्तीन में कोई हथियार न हो। धीरे धीरे यह दोस्ती, सम्मान और बराबरी का संकेत बन गया। यह प्रेम और सद्भावना का भी प्रतीक है।

    मिलिट्री में फ़ौजियों को अमूमन बड़े ही गर्मजोशी से हाथ मिलाते देखा जाता है।

    हाथों के दबाव से भी मिलाने वाले का भाव पकड़ा जा सकता है। कॉर्पोरेट दुनिया में अथवा राजनयिक मसलों में महिलाओं से हाथ मिलाने में सभ्यता का विशेष ख़्याल रखना जरूरी है।

    संपादक महोदय ने लिखा है कि गले मिलने में जो अपनापन है वह हाथ मिलाने में नहीं। हाथ मिलाना फॉर्मेलिटी तक ठीक है।

    मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
    अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

    कोरोना काल में संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए लोगों ने हाथ मिलाने में सतर्कता बरती। अब एकल परिवार की तरह समाज भी अंतर्मुखी होता चला जा रहा और एक दूसरे के प्रति दोस्ती, सम्मान और प्यार में कमी बढ़ती जा रही। हालांकि कोरोना के पहले से लोगों ने हाथ खींचने शुरू कर दिए थे और हाथ मिलाने में वो गर्मजोशी न रही जिसकी उम्मीद लगाए कोई किसी की तरफ हाथ बढ़ाते हुए चला आता है।
    कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
    ये अजीब मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से चला करो

  11. इस सप्ताह का आप का संपादकीय मनभावने के साथ-साथ सामयिक भी लगा। भाईचारे तथा पारम्परिक आनंद के पारस्परिक आदान- प्रदान के अन्य स्वरूप के विषय में भी आप ने हमें अच्छी जानकारी दी। निकट भविष्य में आने वाले
    क्रिसमस तथा नए वर्ष के अवसर पर भी अक्सर एक हैंडशेक के साथ लोग एक दूसरे को बधाई तो दिया ही करते हैं। इधर के आधुनिक डाक्टर तो हैंडशेक को बल- परीक्षा का भी एक उपकरण बना रहे हैं। कहते हैं वृद्धावस्था में निर्बल पड़ रहे लोग अपने हैंडशेक में उपयुक्त कसाव व मज़बूती नहीं ला पाते।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

    • दीपक जी, आपने डॉक्टरों की राय को संपादकीय के साथ जोड़ कर एक नया आयाम खड़ा कर दिया। हार्दिक धन्यवाद।

  12. आपने अपने संपादकीय- ‘साथी हाथ बढ़ाना’ में विभिन्न संस्कृतियों के अभिवादन के तरीकों के बारे में रोचक जानकारी है।
    इसमें सबसे रोचक है पाश्चात्य देशों की हैंड शेक की प्रथा…हैंड शेक जो दो व्यक्तियों के मध्य विश्वास और गर्म जोशी की प्रथा है, वह कभी दो व्यक्तियों के प्रति अविश्वास का कारण रही थी। हाथ मिलाकर (हिलाकर) यह देखा जाता था कि कहीं उसने बांह के अंदर कोई हथियार तो नहीं छिपा रखा है। आपका हर आलेख खोजपरक तथा तथ्यों पर आधारित रहता है।
    रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी, संपादकीय का शीर्षक है ‘साथी हाथ मिलाना ‘। हमारा प्रयास रहता है कि हमारी रिसर्च में कोई कमी ना रह जाए। आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  13. हमेशा की तरह इस बार भी एक अनूठा विषय, गजब का विश्लेषण..!
    आप भी दूर की कौड़ी खोज लाते हैं…!

  14. आदरणीय तेजेन्द्र जी

    हर बार आपका संपादकीय एक अप्रत्याशित विषय लेकर सामने आता है और सबको आश्चर्यचकित कर देता है। यह रोचक तो होता ही है, साथ ही ज्ञानवर्धक भी! संपादकीय के माध्यम से विश्व की अनजानी व आवश्यक जानकारियों से समृद्ध करने की पुरवाई की यह परंपरा विशेष है जिसका पुरवाई के सभी सदस्यों को बेसब्री से इंतजार रहता है।

    हमने देखा है कि जितनी टिप्पणियाँ संपादकीय पर आती हैं और जितने संतुलन से आप हर टिप्पणी का जवाब देते हैं वह काबिले गौर है और काबिले तारीफ़ भी।
    यह तो सब जानते ही हैं, लेकिन इस बार इसे लिखने से हम इसलिए नहीं रह पाए कि अबकी बार का संपादकीय एक ऐतिहासिक महत्व की पूर्ण जानकारी दे रहा है जिसे वास्तव में जानना ही चाहिये क्योंकि यह अभिवादन के एक प्रकार से जुड़ा है।

    अधिकांशतः लोग सीधे हाथ से ही काम करते हैं, फिर चाहे युद्ध से जुड़ा हो या किसी भी नेक कर्म से।
    जो हाथ युद्ध में मार- काट करता है यह उसी हाथ का दायित्व है कि परस्पर प्रेम के लिए भी वही आगे बढ़े।

    संभवतः यही कारण हो कि अभिवादन के लिए दायाँ हाथ आगे बढ़ता है।

    बिना किसी दुर्भावना जब हाथ मिलता है तो उसमें जोश, उत्साह, उमंग और अपनापन रहता है।
    अभिवादन के अनेक तरीकों से रूबरू हुए।
    अभिवादन करने का तरीका हर देश और धर्म में अपनी संस्कृति के अनुरूप चलता है। कह सकते हैं कि सांस्कृतिक पहचान है।

    बहरहाल हैंडशेक के पीछे की सद्भावना चाहे जो भी हो लेकिन हैंडशेक करते समय उमंग,उत्साह और जोश रहता है जबकि प्रणाम में हाथ जोड़कर सर झुकाना आदर और सम्मान का प्रतीक है।बड़ों के प्रति भी, बड़े पद के प्रति,उम्र में छोटे होने पर भी आदरणीय होने के प्रति! इसमें विनम्रता का भाव है।

    जरूरत के अनुसार अपनी-अपनी जगह सब कुछ उचित है।

    बेहतरीन संपादकीय के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया और पुरवाई का तहेदिल से आभार।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने संपादकीय में अपनी ओर से जो जानकारी जोड़ी है, इससे संपादकीय समृद्ध हुआ है। धन्यवाद।

  15. सादर नमस्कार सर…
    देर हो गई इस संपादकीय को पढ़ते…
    कुछ व्यक्तिगत व्यस्तता के कारण पढ़ नहीं पाई थी….
    आपका शोधपूर्ण लेखन ही पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है… विषय या मुद्दा कोई भी हो… आप उसकी गहराई तक पाठकों को ले जाते हैं…
    हैंड-शैक के पीछे ऐसी कहानी होगी यह नहीं पता था…
    वास्तवमें बहुत ही रोचक है….
    साधुवाद…

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