Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – हिंदी कविता का आम आदमी काल

बहुत सालों पहले की बात है कि वरिष्ठ कवि अरुण कमल लंदन आए थे। हमने एक कार्यक्रम उनके सम्मान में आयोजित किया था, जिसमें कुछ उर्दू वाले शायर भी मौजूद थे। जब अरुण जी से अपनी कविता सुनाने को कहा गया, तो उन्होंने भी यही कहा, कि उनके पास अपनी डायरी नहीं है, इसलिए वे अपनी कविता नहीं सुना पाएंगे। मगर उन्होंने आगे कहा कि उन्हें फ़ैज़ की एक नज़्म याद है। और उन्होंने फ़ैज़ की नज़्म सुना दी।मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आज की हिंदी कविता कैसी है, जो अपने रचयिता तक को याद नहीं हो पाती है?

पिछले रविवार को मुझे लंदन में अपने घर के निकट ही एक गृह-प्रवेश आयोजन में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ मेरा परिचय लखनऊ के एक डॉक्टर साहब से करवाया गया। क्योंकि सब मेरे हिंदी साहित्य के प्रति लगाव से परिचित थे, तो मुझे यह भी बताया गया कि डॉक्टर साहब एक कवि हैं। मैंने पहले तो डॉक्टर साहब से पूछा कि वे तो अदब के शहर से आते हैं, क्या ग़ज़ल लिखते हैं या नज़्म। वे इसके जवाब में चुप्पी साधे रहे। मैंने उसके बाद पूरे सम्मान के साथ उनसे अपनी कोई रचना सुनाने का आग्रह किया। इस पर उनका जवाब मिला, “दरअसल, मैं अपनी डायरी साथ नहीं लाया। इसलिए सुना नहीं पाऊँगा।”
यह मेरे साथ लंदन में दूसरी बार हुआ था, कि भारत से आया कोई कवि अपनी कविता इसलिए नहीं सुना पाएं, क्योंकि उनके पास अपनी डायरी नहीं थी। बहुत सालों पहले की बात है कि वरिष्ठ कवि अरुण कमल लंदन आए थे। हमने एक कार्यक्रम उनके सम्मान में आयोजित किया था, जिसमें कुछ उर्दू वाले शायर भी मौजूद थे। जब अरुण जी से अपनी कविता सुनाने को कहा गया, तो उन्होंने भी यही कहा, कि उनके पास अपनी डायरी नहीं है, इसलिए वे अपनी कविता नहीं सुना पाएंगे। मगर उन्होंने आगे कहा कि उन्हें फ़ैज़ की एक नज़्म याद है। और उन्होंने फ़ैज़ की नज़्म सुना दी। 
मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आज की हिंदी कविता कैसी है, जो अपने रचयिता तक को याद नहीं हो पाती है?… क्यों आज के कवि को अपनी ही रचना सुनाने के लिए अपनी डायरी या फिर स्मार्ट फ़ोन की बैसाखी की ज़रूरत पड़ती है। सवाल तो यह भी मन में उठता है कि आज लिखी जा रही रचना को कविता कहने की मजबूरी क्या है?
भारत में जून 1975 में एमरजेंसी लगी थी, उस समय संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़ करके उसमें सेक्युलर, सोशलिस्ट और अखंडता शब्द जोड़े गए थे। तो हिंदी कविता के संविधान से कब छेड़छाड़ की गई और तय किया गया कि कविता आम आदमी के संघर्ष तक सीमित रहेगी और कविता का मुख्य काम सत्ता का विरोध है? हिंदी कविता में आम आदमी काल कब से शुरू हुआ और कब तय हुआ कि कविता में काव्यात्मकता और कवित्त हटा कर उसमें कथ्य और गद्य जोड़ दिया जाए?
वैसे तो निराला के समय से ही अतुकांत कविता लिखने की शुरूआत हो गई थी। मगर उस काल में कविता अतुकांत हुई थी, बेतुकी नहीं। निराला महाकवि थे। उन्हें छंद का केवल ज्ञान ही नहीं था, बल्कि वे उसके उस्ताद थे। जो व्यक्ति छंद को समझता है, वो छंद को तोड़ने की प्रवीणता और अधिकार रखता है। उनकी कविताओं में लय और मीटर बाक़ायदा मौजूद रहता था… बस वे तुक नहीं मिलाते थे। उनकी कविता को बाक़ायदा गाया जा सकता था। 
जैसे-जैसे समय गुज़रता गया, कविता में से कविता के तमाम रस ग़ायब होते गए। अब कविता का अर्थ हो गया था- सत्ता का विरोध, मज़दूर, किसान और भ्रष्टाचार! जो कुछ कविता के नाम पर परोसा जाने लगा, वे तमाम विषय आलेख, निबंध या फिर संपादकीय के लिए थे। राजनीतिक विचारधारा का बोझ कविता के कंधों पर डाला जाने लगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “राजनीति एक खेल है, जिसे चालाक लोग खेलते हैं, मूर्ख लोग दिन भर चर्चा करते हैं!” कवि को मूर्ख बना कर राजनीति पर कविता के माध्यम से चर्चा करने के कार्य पर लगा दिया गया। और कवि भी यह मान बैठा कि उसका काम कविता रचना नहीं है… कविता के माध्यम से राजनीति करनी है। 
जबसे कविता अतुकांत हुई है, उसमें बात भी सीधे-सीधे होने लगी है। कविता वाली नफ़ासत कहीं खो-सी गई है। सोशल मीडिया यानि कि फ़ेसबुक और व्हाट्सएप पर पोस्ट होने वाली कविताएं तो जैसे हालात पर तबसरा जैसी होती हैं। चाहे सुनामी हो या फिर कोरोना… कविताओं की सुनामी रुकने का नाम ही नहीं लेती। 
भरत मुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में आठ रसों का वर्णन किया है: श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, रौद्र रस, वीर रस, भयानक रस, वीभत्स रस और अद्भुत रस। कालांतर में इसमें पहले नवां रस जुड़ा, और आजकल ग्यारह रस माने जाने लगे हैं। बाकि के तीन रस हैं – शांत रस, वात्सल्य रस एवं भक्ति रस। मगर वर्तमान छंद-विहीन, लय-विहीन, तुक-विहीन, ताल-विहीन कविता के पुरोधाओं का कहना है कि कविता का मुख्य उद्देश्य है सत्ता का विरोध… आम आदमी का दर्द, भ्रष्टाचार आदि- आदि। बाकि के तमाम रसों को अलमारी में बंद करके रख दिया जाए। 
मुझे याद आता है एक किस्सा। मुंबई के एक हिंदी कवि ने धमाका किया और कहा कि तुकांत कविता के मुक़ाबले अतुकांत कविता लिखना अधिक कठिन कार्य है। इस पर वरिष्ठ कवि सूर्यभानु गुप्त ने तीखी चुटकी लेते हुए नवभारत टाइम्स में लिखा, “यह कहना कि तुकांत कविता के मुकाबले अतुकांत कविता लिखना अधिक कठिन कार्य है; यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई नपुंसक यह कहे कि बच्चे पैदा करने से अधिक कठिन कार्य है बच्चे न पैदा करना !” मैंने दो दिन पहले ही आदरणीय सूर्यभानु गुप्त से मुंबई में बात करके उनसे पुष्टि भी कर ली, कि उन्होंने यही कहा था। वैसे मित्रों को बता दूँ, कि भाई सूर्यभानु गुप्त इन दिनों बीमार चल रहे हैं। मेरे मुंबई के जो मित्र यह संपादकीय पढ़ें, वे उनसे बात करके उनका हाल पूछ सकते हैं। सूर्यभानु जी शाम के समय आसानी से बात कर पाते हैं।  
आज के अतुकांतश्री कवियों से मेरी यह छोटी-सी गुज़ारिश है, कि भाईयो और बहनों आप विषय कोई भी उठाएं, मगर उसे लिखें कविता की तरह, जैसे कि कविता लिखी जानी चाहिए। 1957 में एक फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ‘मदर इंडिया’ – उसमें शकील बदायूँनी ने बढ़ती जनसंख्या पर एक अंतरा लिखा था “संसार में तेरे लूट मची / और जान के पड़ गए लाले, और जान के पड़ गए लाले / अब रोक जनम की चक्की रे / अब रोक जनम की चक्की रे संसार चलाने वाले।” तो देखिए कि जो सच्चा कवि होता है, वह विषय कोई भी उठाए, मगर लिखता कविता ही है।
शैलेन्द्र तो जनकवि थे। उनके यहाँ तो उदाहरणों की भरमार है – “तू ज़िन्दा है, तू ज़िन्दगी की जीत पे यकीन कर /  अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर ”; “चूल्हा है ठंडा पड़ा, और पेट में आग है / गरमा गरम रोटियां, कितना हँसी  ख़्वाब है”; “रात दिन, रात दिन एक ख़्याल, एक ख़्याल / रोटियां कम हैं क्यों, क्यों है अकाल, क्यों है अकाल / इस दुनिया में कमी है, ये चोरी किसने की है, / कहाँ है सारा माल”। और कवि प्रदीप तो कहते ही हैं कि “देख तेरे इंसान की हालत /  क्या हो गई भगवान / कितना बदल गया इंसान”। 
यहाँ सोचने की बात यह है कि सिनेमा के गीतकार इतनी बड़ी बात कह जाते हैं, और वह भी छंद और तुक के अनुशासन में बँध कर। मगर तथाकथित खुले दिल और दिमाग़ वाले कवि न तो बात बड़ी कर पाते हैं, और न ही कविता के अनुशासन का आदर कर पाते हैं। 
अभी हाल ही में एक हाई कोर्ट के जज के यहाँ जब नोटों का अंबार निकला, तो हमारे लंदन के प्रवासी कवि आशुतोष कुमार ने एक बहुत ही ख़ूबसूरत शेर लिखा – “जारी है आज भी वो खेल पुराने वाला / हर मुलाज़िम ही निकलता है ख़ज़ाने वाला।” कविता में कम से कम शब्द ख़र्च करते हुए बड़ी से बड़ी बात कही जा सकती है। 
जब निदा फ़ाज़ली लिखते हैं – “घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें / किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए”; या फिर राजेश रेड्डी कहते हैं कि, “मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा / बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है” – तो समझ आता कि बात को कविता में कैसे कहा जाता है। 
अगर बात राजनीति और सामाजिक विद्रूपताओं की हो, तो हमारे छोटे भाई समान मित्र दीक्षित दंकौरी के यहाँ तो शेरों की भरमार है – न मांझी, न रहबर, न हक़ में हवाएं, / है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफ़र है”; “सियासत की वफादारी हवाएं जानती हैं, / कहाँ कितना बरसना है, घटाएं जानती है”; “नाम भी हो गया है दौलत भी, / अब तू यूँ कर कि तू खुदा हो जा”; वो रहबर है, कि रहज़न है, वो क्या है, / पता पहले लगाना चाहिए था”। इसे कहते हैं कविता में अपनी बात कहना। सीधे-सीधे गद्य में पंक्तियाँ लिख कर उसे कविता कहने से कविता वाली बात नहीं बनती है। 
ऊपर मैंने कुछ गीतों का उदाहरण हिंदी  फ़िल्मों से लिया था। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हमारे गीतकार या नवगीतकार केवल श्रृंगार रस से भरपूर लिख रहे हैं। देहरादून के बुद्धिनाथ मिश्र के कुछ गीत आज के समय और समाज से जूझते बाक़ायदा दिखाई देते हैं – “एक उड़ान तुम्हारी, धरती से / नभ की ऊँचाई तक / एक कहानी मेरी भी शौहरत से तन्हाई तक।… चलन नहीं अब नाम / बुज़ुर्गों का लेना त्यौहारों पर / उग आईं अनजान वनस्पतियाँ / मन की दीवारों पर।”
“कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए / कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए / यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है / चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए” – ऐसी शायरी करने वाले दुष्यंत कुमार की कविताएं भी समाज को चुनौती देती दिखाई देती हैं। मगर उन पर तो एक पूरा संपादकीय अलग से लिखना होगा… उनकी कविताओं और शायरी के इतने आयाम हैं कि एक संपादकीय भी उन्हें समेट नहीं पाएगा।
अंग्रेज़ी कवि सैम्युल टेलर कॉलरिज (वर्डसवर्थ के समकालीन) ने कहा था  – “Words in their best order is Prose but Best words in their best order is Poetry!” सर्वोत्तम क्रम में लिखे गए  शब्द उत्तम गद्य है; मगर सर्वोत्तम क्रम में लिखे गए सर्वोत्तम शब्द उत्तम पद्य है!”
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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57 टिप्पणी

  1. एक क्लासिक सा संपादकीय ,जो आज के अतुकान्त कविता युग में तुकांत और लयात्मक कविता की न केवल याद दिलाता है ,वरन स्पष्ट रूप से उसकी उपादेयता को भी उकेरता भी है।
    कविता जब लय में आएगी तो याद भी रहेगी।
    यह भी एक दुखद पहलू है कि कवि को उसकी स्वयं की रचना याद नहीं है????साफ साफ वजह है कि लयात्मकता और तुकांत कविता का अब परदे के पीछे चले जाना।
    यूं अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है।यही सब काम अब आधुनिक कवि और कविता कर रहे हैं।
    संपादकीय सच्चे अर्थों में अतुकान्त कविता पर औचित्य पूर्ण और तार्किक ढंग से तंज़ कसता है।
    बधाई साफ साफ संपादकीय हेतु।

    • कविता पर अर्थशास्त्र का सिद्धांत लागू करके आपने कमाल कर दित्ता है। थैंकूज़।

  2. कविता ऐसी हो जो सुनकर भी हमें याद रहें। वैसे पता नहीं क्या-क्या लोग लिखते हैं!

  3. आपने आम आदमी कविता अच्छी बात कही। मैं वास्तविक कवि उन्हें ही मानती हूं, जो कवि लय, स्वर और भावों के तारतम्य से जुड़ी थी। लिखती मैं भी अतुकांत ही हूं लेकिन अपने को कवि नहीं कहती और कविता संग्रह भी इसीलिए प्रकाशित नहीं करवाया कि वह अभिव्यक्ति तो अच्छी है लेकिन पता नहीं क्या समझा जाय। इसके बाद भी अवसर पर दो चार कविताएं सुना ही सकते हैं बिना डायरी के।
    कविता शब्दशः वहीं हो कभी डायरी लिखी गई हो। कुछ लिखे गये विषय ऐसे होते हैं कि स्वयं ने लिखा है तो कविता पढ़ी ही जा सकती है।

  4. छंद मुक्त कविता में विचारों की प्रधानता रहती है। काव्य सौष्ठव नदारद होता है। जबकि अतुकांत कविता में भाव , लयात्मकता हो सकती हैँ। निराला जी की कविता तोड़ती पत्थर आज भी याद है।हिन्दी कविता के प्रति सचेत करता समसामयिक उम्दा सम्पादकीय।

    • हार्दिक धन्यवाद सुदर्शन जी। यह कुछ ऐसा ही है कि बिना चाय की पत्ती से बने पेय को चाय कहा जाए!

  5. इस बार के पुरवाई का संपादकीय-‘ हिन्दी कविता का आम आदमी काल’ में आधुनिक कविता लेखन पर सवाल उठाए गए हैं। सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि आज की कविता पद्य के कलेवर को त्यागकर गद्य में ढल चुकी है। दिमाग की दुनिया का सबसे बढ़िया उपज गद्य को माना गया है। पर गद्य ढीट भी बहुत है, जो इसे उपजाता है उसी के मत्थे नहीं चढ़ता है। कागज पर जन्म तो ठीक-ठाक ले लेता है पर उस जन्मदाता को भूल जाता है, बेटों की तरह।
    पद्य में एक लय होती है। उसमें नफासत होती है। हर पंक्ति में अनुशासन होता है, उसमें उतार-चढ़ाव होता है। जो भी रस उसमें डाल दो खिल उठता है। ये कारक कविता को याद रखने में सहायक होते है।
    इस बात से सहमत हूं कि अतुकांत कविता याद नहीं रहती है। साहित्यकार बिना देखे उसे नहीं पढ़ सकता है।
    लेकिन इन अतुकांत कविताओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। अतुकांत कविताएं भी बढ़िया लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। वो तो अयोग्य कवियों ने अतुकांत के नाम पर अनर्गल लिखना शुरू कर दिया और कविता की रेढ़ मार दी।
    कविता आदिकाल से गेय ही रही है। पक्षियों के चहचहाने से लेकर नदी झरनों की कल-कल में संगीत और गेयता है। मनुष्य भला इससे अछूता कैसे रह सकता है। यहां तक कि गेयता तो रोने में भी होती है।
    पर बदलाव संसार का नियम है। कविता इससे अछूती कैसे रह सकती है। उसने भी अपना कलेवर चेंज कर लिया। यह चेंजिंग अच्छा है या बुरा है इसे तो समय निर्धारित करेगा।
    भारतीय जीवन पद्धति में खान-पान रहन-सहन और पहनावे में बराबर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पहनावा तो ऐसा हो गया है कि अच्छे से अच्छे प्रगतिशील भी मुंह बाए जा रहे हैं। कविता के बदलाव को मैं ऐसे ही मानता हूं।
    आपने अपने संपादकीय में अपनी बात को पूरे संदर्भों के साथ रखा है और अपने कहे कि पुष्टि की है। यह संपादकीय तार्किक और पठनीय तो है ही साथ ही यह एक अलग तरह का दस्तावेज बन गया है। आने वाले समय में इसे कोट किया जाएगा, मैं ऐसा मानता हूं।
    आखिरी बात तो यही कहूंगा सर कि अतुकांत कविता को उसके रचयिता बिना डायरी या आईफोन के नहीं पढ़ पाते हैं तो उनके पीछे मत पड़िएगा ।
    इस संपादकीय का यह विषय काफी चैलेंजिंग है। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखन लाल पाल जी – भारतीयों के जीवन में तो पैदा होने से अंतिम संस्कार तक सुर है। शैलेन्द्र के अनुसार – ” हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।” कविता में से काव्यात्मकता निकाल कर जो बचता है, उसे कविता कहने की मजबूरी क्या है?

  6. सर चरण स्पर्श

    मेरे शे’र को उद्धृत करने के लिए हार्दिक आभार । इतने बड़े शायरों के बीच अपना नाम देख कर सुखद आश्चर्य हुआ। बहुत बहुत धन्यवाद सर।

    • आशुतोष युवा लेखन को रेखांकित करना हमारी ज़िम्मेदारी का एक हिस्सा है। स्नेहाशीष।

  7. तेजेन्द्र शर्मा जी ने समकालीन कविता के अंतर्विरोधों और उसकी गिरती हुई स्मृति-शक्ति को जिस व्यंग्यात्मक और तथापि आत्मीय स्वर में प्रस्तुत किया है, वह न केवल विचारोत्तेजक है, बल्कि हिंदी कविता के भविष्य की ओर संकेत भी करता है।
    कविता की लय, छंद और भाव की स्मरणीयता पर जो प्रश्न खड़े किए गए हैं, वे केवल तकनीकी नहीं, बल्कि काव्यात्मा से जुड़े हैं। कविता का कर्ता जब स्वयं अपनी रचना को याद नहीं रख पाता, तो यह रचना प्रक्रिया की आत्मविस्मृति का भी संकेत है।
    यह आलेख अतुकांत कविता को सिरे से खारिज नहीं करता, बल्कि उसे कविता के अनुशासन और सौंदर्य-बोध से जोड़ने की एक ईमानदार अपील करता है। उद्धृत गीतों और शेरों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि गद्य विषयवस्तु को कितना भी गंभीर क्यों न बना दे, जब तक उसमें काव्यात्मकता का संचार नहीं होगा, तब तक वह ‘कविता’ नहीं बन सकेगा।
    यह लेख न केवल विचारों की बहस में जोड़ता है, बल्कि हिंदी कविता के वर्तमान परिदृश्य का दस्तावेज़ भी बनता है। इसके लिए तेजेन्द्र जी को साधुवाद।

    • भाई गोपालदास जी, आपने संपादकीय की आत्मा को पकड़ा है। मुझे यह डर था कि कहीं पाठक इस संपादकीय की ग़लत व्याख्या ना कर बैठें। आपकी टिप्पणी ने हौसला बढ़ाया है। हार्दिक धन्यवाद।

  8. बहुत सुंदर संपादकीय, थोड़ी सी सुधार निराला अतुकांत कवि नहीं थी बल्कि छंद मुक्त कवि थे । वह आता
    दो टूक कलेजे के करता
    पछताता आता
    तुक मिलती है। आंतरिक लय भी है। परंतु आजकल तो सपाट बयानबाजी होती है गद्य को तोड़ तोड़ कर कविता बन गयी कोई कवित्त नहीं होता
    मम्मट की परिभाषा फैल ह्यो जाती है।

    • सुरेश भाई आपसे गुज़ारिश है कि निराला जी वाला पैराग्राफ़ एक बार फिर पढ़ लें। हार्दिक धन्यवाद।

  9. ‘हिन्दी कविता का आम आदमी काल’ संपादकीय आज कविता के गिरते स्तर का सूचक है।
    मुंबई के किसी हिन्दी कवि का कहना कि तुकांत कविता के मुक़ाबले अतुकांत कविता लिखना अधिक कठिन कार्य है, अत्यंत हास्यास्पद है।

    यह भी सच है कि सोशल मिडिया पर नित नया पेस्ट करने के कारण कविता के स्तर में गिरावट आई है। नित नये सामयिक विषय पर कलम चलाते तथाकथित कवियों को स्वयं की कविताएं कैसे याद होंगी जिनके लिए उन्होंने चिंतन मनन किया ही नहीं किया।

    • सुधा जी, आपने कम शब्दों में सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आपका अभिनन्दन।

  10. जितेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय के लिए जितनी बार भी साधुवाद दिया जाए, बहुत कम है। मैं कोई कवि नहीं हूँ लेकिन कभी कभी, जब भी कुछ लिखने को दिल करता है, लिख लेता हूँ। मेरा यह लेखन सदा तुकांत होता है। और लेखकों की अतुकांत कविताओं को पढ़ने के बाद, देखा देखी, इस नए चलन को अपनाने के लिए, जब कभी भी अतुकांत में लिखने की कोशिश की, दिमाग पर, आगे लिखने के लिए, एक ब्रेक सी लग जाती है। आख़िर इस नए चलन को, जिस में अपनी ही कविताएँ को पढ़ने के लिए कवि को डायरी की ज़रूरत पडती है, क्यों अपनाया जा रहा है? आप ने जो जो मिसालें दी हैं वो वाकई बेमिसाल हैं। हिन्दी कविता का क्या भविष्य होगा वो तो समय ही बतायेगा।

    • विजय भाई आपका निरंतर समर्थन हमारा उत्साहवर्धन करता है। स्नेह बनाए रखें।

  11. मैं एक पत्रिका को अपनी 40 गजलें भेजा. उन्होंने एक भी नहीं छापी खेद सहित वापस कर दिया. फिर अंत में 5 ग़ज़ल और भेजा. और यह भी लिखा या तो आपको गजल आती नहीं है या तो ग़ज़ल की समझ नहीं है.
    उन्होंने लिखा कि मेरी पत्रिका में गजल नहीं छपती.
    ऐसी भी कई संपादक हैं जो कविता और गजल का अंतर नहीं समझते. बहुमत पत्रिका में गजल छपती नहीं. कोलकाता की एक पत्रिका है उसके संपादक को गजल की समझ नहीं है. यह सिर्फ कविता छापते हैं.
    सवाल यह है कि साहित्य में ऐसा भेद क्यों? कविता लिखने वालों को अपनी कविता याद नहीं रहती, गजल लिखने वालों को अपनी ग़ज़ल याद रहती है
    दिल्ली में अपने कुछ मित्रों को मैंने कहा कि अपनी ग़ज़ल की किताब भेजूं क्या?
    उन्होंने बड़े प्यार से कहा की गजल हम पढ़ते नहीं, गजल सुनते हैं.
    कवि ज्यादा हो गए हैं और शायर बहुत कम. साहित्य आज तक में भी सिर्फ एक महोदय कविता सुनाते हैं जब मैंने कहा -कभी गजल भी सुनाया करिए. उन्होंने कुछ कहा नहीं.
    जाहिर सी बात है कि आज के दौर में कभी थोक में हो गए हैं. क्या लिखते हैं पता नहीं. निराला जी ने आज नई कविता को जन्म देकर पता नहीं उपकार किया या अच्छा नहीं किए, कुछ कह नहीं सकते

    • भाई रमेश जी निराला छंद के भगवान थे; इसलिए उन्हें छंद तोड़ना आता था। आज के कवि को छंद का पता है ना बहर का। वे आलेख को कविता समझ बैठते हैं।

  12. जब से ये सब बातें समझ आने लगी हैं, अपना तो कविताई का भूत उतर गया है
    बहुत अच्छा संपादकीय। बधाई और साधुवाद आपको

  13. सुविचारित, सुचिंतित, कविता के प्रति आत्मीयता से गहन शोधपरक बात कहीं आपने।
    बहुत अच्छा संपादकीय। छंद, रस, छिपी भीनी सुगंध आवश्यक कविताई के लिए। मुक्त छंद में भी लाई जा सकती है। कविता तुकांत हो या अतुकांत, लय विहीन नहीं हो। उदाहरणों के साथ आपने एकदम सही बात सही ढंग से प्रस्तुत की।

  14. पुरवाई के इस बार के संपादकीय में आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने कविता सृजन में व्याप्त अराजकता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है, जिसकी आज के दौर में चर्चा अपेक्षित ही नहीं अपरिहार्य भी है। विगत दिनों मैने भी कुछ फेसबुक पोस्ट के माध्यम से इस चिंता को व्यक्त किया था किंतु विद्वान संपादक महोदय ने इस विषय पर पुरवाई के संपादकीय के माध्यम से गंभीर चर्चा की है और आज यह समय की मांग भी है कि कविता को पोस्टरबाजी और तथाकथित व्यवस्था विरोध के नाम पर फूहड़ गद्य में बदलने से बचाया जाए। संपादक महोदय ने उचित ही लिखा है कि आज की कविता यदि उसके रचयिता को ही याद नहीं रहती तो भला वह कैसे अपनी कविता के कालजयी होने का भ्रम पाल सकता है। उन्होंने सोदाहरण सिद्ध किया है कि हिंदी ग़ज़ल अपने शिल्प में इन तथाकथित कविताओं से बेहतर भी है और प्रभावमय भी। इसके अतिरिक्त फिल्मी गीतों तथा गीत एवं नवगीत की प्रभावोत्पादकता स्वतः प्रमाणित है क्योंकि ये आज भी हमारी जबान पर चढ़े हुए हैं और विभिन्न मनोदशाओं में हम इनको गुनगुनाया करते हैं। अगर आदरणीय संपादक महोदय के संपादकीय से हिंदी कविता के कर्णधार रंच मात्र भी खुद को बदलते हैं तो यह इस संपादकीय की सार्थकता होगी और हिंदी कविता जगत के प्रति उनका उपकार भी होगा।

    • पुनीत भाई आपने अपनी टिप्पणी के माध्यम से संपादकीय की आत्मा पाठकों को परोस दी है। आपकी टिप्पणी साहित्यिक भी है और अकादमिक भी। हार्दिक धन्यवाद।

  15. बंधुवर, आपने हमलोगों के दर्द को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभारकर मरहम का काम किया है। कुछ ही दिन पहले देहरादून के एक कवि-पत्रकार ने मेरा विस्तृत साक्षात्कार छापा था,जिसका शीर्षक ही था -‘हिन्दी कविता के हत्यारे हैं हिन्दी के प्रोफेसर। ‘ पिछले पचास वर्षों में हिंदी का उच्च शिक्षा जगत ने जितनी नीचता की है, उसकी सानी नहीं है। हिंदी का प्रोफेसर होते ही वह छंदमुक्त कविताओं की लड़ी लगा देता है, लोभी प्रकाशक उसे छाप देता है, उन कविताओं को पाठ्यक्रमों में जिस किसी तरह ठूस दिया जाता है,उनपर पीएचडी हो जाती है और वैसे ही छात्र गुरुकृपा से सहायक प्रोफेसर बन जाते हैं। यह धूर्तता और बलात्कार का सिलसिला ऐसे ही आगे बढ़ता जा रहा है। परिणाम यह हुआ कि कविता हिन्दी के पाठ्यक्रमों से बाहर ‘कौन बिरिछ तर भींजत होइहैं राम लखन दुनु भाई’ की विपन्न स्थिति में हैं। इसको पलटने के लिए बड़े पैमाने पर ओवरहालिंग की जरूरत है। हमलोग प्रतिरोध तो करते हैं, मगर ‘राबन रथी बिरथ रघुबीरा’ की स्थिति में हैं। आपने अपने सम्पादकीय में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को पूरी शक्ति से उठाकर हिन्दी कविता पर अत्याचार करनेवाले आततायियों को बड़ा तमाचा मारा है। इससे हमें बल मिला है।यह भरोसा भी हुआ है कि हमारे पक्षधर देश की सीमाओं के बाहर भी हैं। आपके इस सम्पादकीय को हम आक्सीजन की तरह उपयोग करेंगे और अधिक से अधिक सुकवियों तक पहुंचा कर उन्हें जीवनदान देंगे। आपको हजारों कृतज्ञ रचनाकारों की ओर से धन्यवाद। अब लगता है कि हिन्दी कविता की रात जल्द खत्म हो जाएगी और प्रभातफेरी होकर रहेगी।

    • सर, आपकी इमोशनल टिप्पणी में कविता को लेकर आपके दर्द को महसूस किया जा सकता है। आजकल कविता के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। यहां तक कि बाल कविता भी अतुकांत हो रही है।

  16. सादर अभिनंदन तेजेंद्र जी
    आभार इस विचारोत्तेजक लेख के लिए। आपका सम्पादकीय हमेशा ही हमारे लिए महत्वपूर्ण एवं मार्गदर्शक होता है । कविता और साहित्य की समकालीन दशा-दिशा पर संवेदनशील, सशक्त और प्रासंगिक हस्तक्षेप

    आपके इस सम्पादकीय को पढ़ते हुए मैंने न केवल साहित्य की गहराइयों को नए सिरे से समझा, बल्कि ऊपर दिए गए विद्वान साहित्यकारों के विचारों से भी बहुत कुछ सीखने और महसूस करने का अवसर मिला।
    एक पाठक के तौर पर यह अनुभव समृद्ध करने वाला रहा।

    एक बार फिर इस विचारोत्तेजक और दिशा-दर्शन लेख के लिए हार्दिक आभार।

    • वंदना जी, आपकी टिप्पणी ने तो संपादकीय का उद्देश्य सफल कर दिया। हमारा प्रयास है कि कविता को उसके असली रूप में एक बार फिर स्थापित किया जा सके। हार्दिक धन्यवाद।

  17. आज के अपने संपादकीय में आप ने समकालीन हिंदी कविता की संरचना पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। साहित्यिक आलोचना के अंतर्गत।
    यह कहते हुए कि कविता अपने अंदर कथ्य और गद्य के तत्व लाने पर शुद्ध
    कविता नहीं रहती, क्यों कि कविता में एक सुनिश्चित लय व प्रवाह का अनुरक्षण अनिवार्य है। और कवि का अपनी कविता में छंद व ताल पर अपना अधिकार बरकरार रखना ही चाहिए। साथ ही उस में ‘रस’ का होना भी ज़रूरी है।आप ने यहां नाट्यशास्त्र के नौ रस के नाम देने के साथ- साथ उन तीन अतिरिक्त रसों का उल्लेख भी किया है जो अब इन नौ में जोड़े गए हैं। तथा इसे खेदपूर्वक बताया है कि आज कल की अधिकांश कविताएं रस- विहीन हैं।
    मुुझे विश्वास है पुरवाई के सभी पाठक आप की इस विवेचना से सहमत होंगे।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

    • दीपक जी, आपने ‘क्लिनिक एनेलिसिस’ करते हुए संपादकीय का औचित्य पाठकों को समझा दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

    • बहुत सही लिखा है आपने। तुक को तोड़ तोड़ कर तुक्का बना देते हैं, बिना लय के लालित्य नहीं रह जाते। व्याकरण के बिना कविता में रस नहीं आता।
      भावों को शब्दों में पिरोना एक कला है, अभिव्यक्ति भी साधना की शक्ति मांगती है

  18. वर्तमान कविता के संदर्भ में आदरणीय तेजेंद्र शर्मा की चिंता निश्चितरुप से जायज है। कविता के नाम पर गद्यात्मक लेखन दौर है। कभी-कभी तो कविता में कविता ढूंढने पर भी नहीं मिलती है। यह दुरावस्था कविता के लिए बहुत घातक है। कविता छंदबद्ध या छंदमुक्त, उसमें कविता जैसा कुछ तो होना ही चाहिए।अनेक कवि इस संपादकीय असहमत भ हो सकते हैं। कविता यदि अपने रचयिता की जुबान पर नहीं चढ़ पाई, उसे ही कंठस्थ नहीं तो फिर वह कविता शेष समाज को कैसे प्रभावित करेगी। निश्चित तौर पर यह विचारणीय प्रश्न है। आपका संपादकीय वर्तमान की छंदमुक्त कविता के औचित्य पर भी गंभीर विमर्श की माँग करता है…
    डॉ० रामशंकर भारती

    • भाई रामशंकर भारती जी आपने न्यूनतम शब्दों में पूरी बात समझा दी है। अब बाक़ी तो कवियों पर निर्भर करता है कि आपकी टिप्पणी और संपादकीय चिंता से कितना कुछ सीख पाते हैं।

  19. कविता में छंद या मुक्तछंद या तुकांत -अतुकांत इतना मायने नहीं रखता जितना कि वह कविता है भी या नहीं।
    यहां मुंबई में एक कवि शीतला प्रसाद निराला ने अपनी छंदबद्ध कविताओं के दस संग्रहों का एक साथ विमोचन एक राजनीतिज्ञ से करवाया था। हिंदी साहित्य का कोई छंद उन्होंने नहीं छोड़ा पर तीन चार सौ कविताओं में कविता एक भी नहीं थी।
    सन सत्तर अस्सी के दशक में मुंबई में छंदबद्ध कविताओं की बाढ़ सी आई थी पर याद रहने लायक कविताएं गिनती की ही रहीं।
    जो हाल छंदबद्ध कविताओं का है वही हाल छंदमुक्त या अतुकांत कविताओं का भी है। मेरे ख़याल से कविता में दृष्टि और दर्शन ही उसे अर्थ देते हैं।यदि कविता अपने पाठक को कुछ भी न दे पाए तो वह ग़ज़ल हो गीत हो या मुक्त छंद हो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

    • भाई हूबनाथ पांडेय जी जिस रचना में कथ्य, गद्य, विचार और विचारधारा भरपूर हो मगर काव्यात्मकता सिरे से ग़ायब हो, उसे कविता कहने की मजबूरी क्या है? अंग्रेज़ी में एक नये तरह का जब लेखन शुरू हुआ, तो उसका नामकरण हुआ ‘नॉवल’! उसे किसी अन्य विधा के नाम से नहीं परोसा गया। वर्तमान में जो परोसा जा रहा है, उसे कविता के नाम से पुकारने की मजबूरी क्या है?

  20. चिन्तनीय संपादकीय
    हमारी अवधारणा के अनुसार निराला ने हिन्दी में अतुकांत कविता लिखकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध ही किया है। निराला जी की कविताएं मुक्तछंद थी जो अपने आप में एक छंद था किन्तु आज की कविताएं छंदमुक्त है जिससे कई भ्रम निर्माण होते हैं। आप की चिंताएं सही है और उससे असहमति का कोई सवाल ही नहीं उभरता
    संपादक महोदय को बहुत बहुत बधाई।
    सुन्दर प्रस्तुति और शुभकामनाएं

    • प्रो विजय, आपकी संक्षिप्त टिप्पणी सटीक भी है और सारगर्भित भी। हार्दिक धन्यवाद।

  21. आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर एक निर्भीक संपादकीय ,आईना दिखाता उन तथाकथित गद्य कवियों को जो कवि निराला के द्वारा शुरू की गई नई कविता की रेढ़ मार रहे हैं,
    कविता सुकुमार है कविता कोमलता का द्योतक है
    कविता इंद्रधनुषी हे,कविता प्रेम है स्नेह हे,कविता राग हे कविता लय है,कविता में वीरता है क्रोध नहीं कविता में संवेदनाएं हैं, प्रतिशोध बदला नहीं,भावनाओं का गागर में सागर है कोई कूड़े का ढेर नहीं
    वह कवि नहीं ,वह कविता नहीं जो कवि को याद नहीं,
    कोई नीरस सा मोबाइल नंबर नहीं है कविता ,जैसे हमारे घर के सदस्यों के भी याद नहीं रख पाते नंबर के लिए भी मोबाइल पर आश्रित दिमाग ,सोचने के लिए दिमाग से पैदल होता जा रहा है
    परन्तु कवि की कविता मोबाइल का नंबर नहीं
    आत्म की आवाज होती हे

    कविता तो जब जब दिल से लिखी जाएगी , तो दिमाग में भी घर कर जाएगी
    चाहे वह पद्य कविता हो या गद्य कविता
    कवि कवि केदारनाथ को देखें

    उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा,
    दुनिया को ,हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।
    निराला को देखें
    वह तोड़ती पत्थर देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर वह तोड़ती पत्थर

    अमृता प्रीतम को देखें

    रात कुड़ी ने दावत दी सितारों के चावल फटक कर,
    यह देग किसने चढ़ा दी चांद की सुराही कौन भर लाया ,
    चांदनी की शराब पीकर, आकाश की आंखें गहरा गई।
    मुक्तिबोध को देखे

    मुझे कदम कदम पर,
    चौराहे मिलते हैं बाहें फैलाए,
    एक पैर रखता हूं कि,
    सो राहैं फूटती है ,
    मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूं।
    मित्रों जरा सोचो और बताओ कि यह चंद कवियों की गद्य कविताएं कहां से याद नहीं रहेंगे ,और इनके भाव तो देखो, इतने गहरे की गागर में सागर जैसे,
    छंद कविता गेय होती है
    गद्य कविता में भी रिदम होती है, लय होती है
    दुष्यंत , अदम गोंडवी,नागार्जुन, त्रिलोचन केदारनाथ की तिकड़ी
    गद्य कविताओं के शीर्ष कवि
    एक से बढ़कर एक गद्य कवि
    यह बात सत्य है कि आज हर कोई कवि होना चाहता है और ऐसे अ कवि जिनकी कविता की किताब में सो कविताओं में से भी एक कविता भी ढूंढे से नहीं मिलती, उन्हीं की वजह से कविता विधा आज दोयम स्तर पर आ गई हे ,कवि ओर कविता के नाम से श्रोता घबराने लगते हैं ,

    प्रिय तेजेंद्र सर क्या खूब विषय उठाया हे आपने आपका दिमाग दिमाग नहीं कंप्यूटर है जो दिन रात चरेवती चरेवती रहता है
    इसे पढ़ने के बाद गद्य कविता लिखने वाला कवि सो बार सोचेगा
    और जो लिखेगा ,उसे दिमाग में भी अंकित करेगा ,
    साधुवाद
    कुन्ती हरिराम झांसी

    • कुन्ती जी आपने महान कवियों की बेहतरीन कविताओं के उदाहरण दिए हैं। ये कवि छंद के ज्ञाता थे। काव्यात्मकता को समझते थे। आज तो दोयम दर्जे के गद्य को कविता बता कर परोसा जा रहा है।

  22. सादर नमस्कार सर सदैव आपके संपादकीय में पाठक की मन की बात होती है। फिरसे अपने मन की बात मुझे आपके संपादकीय में मिली। प्रत्येक उदाहरण सत्य है… कविता की आत्मा यदि कोमल नहीं है.. कविता के शब्दों में यदि लालित्य नहीं है… तो क्या लिखना… क्या पढ़ना… बहुत सार्थक विचार…साधुवाद सर

    • अनिमा जी, आप तो स्वयं ‘सॉनेट’ लिखती हैं जो कि एक मुश्किल विधा है। आपके सॉनेट पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित भी हो चुके हैं। आपके समर्थन के लिए हार्दिक आभार।

  23. मैं अपनी असहमति जाहिर करना चाहता हूं।
    स्मरण शक्ति और काव्यरस अलग अलग वस्तु हैं। कभी तो कविता अपने कवि को याद नहीं रहती , पाठक को याद रह जाती है। पर यह कोई मापदंड नहीं।
    वेद शास्त्र से लेकर शायद सभी भाषा के शास्त्रों में पहले पद्य का जन्म हुआ। गद्य बाद में बने, याद रखने में मुश्किल। इससे गद्य का महत्व कम नहीं होता। यही अंतर तुकांत और अतुकान्त कविता में है। गजल के माइंडसेट से गीत को और छंदमय कविता की सोच से अतुकान्त कविता की आलोचना ठीक नहीं। रस निष्पत्ती से बाहर भी वैचारिकता की विशाल दुनिया है जो अंग्रेजी कविता में भी देखी जाती है।

    मैं यहाँ Melbourne Poets Association में और यहां की मीडिया में, समाज में अंग्रेजी कविता की जो हालत देखता हूं, मुझे हिंदी कविता के लिए निराशा का कोई कारण नहीं दिखता। भारत से बाहर हिंदी कविता हिंदी को जीवित रखने का अनूठा प्रयास करती है।

    कविता अच्छी बुरी हर विधा में होती है। अहम के लिए प्रचार का धंधा हर विधा में होता है। तुकांत कविताओं में भी रद्दी कविताओं की भरमार होती है। फिर अतुकान्त कविता को ही क्यों खास चुन कर उसकी निंदा की जाए?
    स्टेज वाली कविता, काव्यगोष्ठी की कविता और सिर्फ पढ़ी जाने वाली साहित्यिक कविता ( भले इसमें कामायनी शामिल हो या कोई अतुकान्त साहित्यिक रचना) इन तीनों को आलोचना की एक ही लाठी से हांकना तीनों के साथ अन्याय है।

    • भाई हरिहर झा साहब आपकी असहमति का स्वागत है। मैंने ऊपर डॉक्टर हूबनाथ पांडेय जी से एक सवाल पूछा है, आपसे भी वही पूछ रहा हूं:

      “जिस रचना में कथ्य, गद्य, विचार और विचारधारा भरपूर हो मगर काव्यात्मकता सिरे से ग़ायब हो, उसे कविता कहने की मजबूरी क्या है? अंग्रेज़ी में एक नये तरह का जब लेखन शुरू हुआ, तो उसका नामकरण हुआ ‘नॉवल’! उसे किसी अन्य विधा के नाम से नहीं परोसा गया। वर्तमान में जो परोसा जा रहा है, उसे कविता के नाम से पुकारने की मजबूरी क्या है?”

  24. सादर नमस्कार आदरणीय ।
    आपके संपादकीय आलेख को पढ़कर हृदय हर्षविभोर हो गया । आपने मेरे जैसे असंख्य कवियों के मन की बात को अपनी लेखनी के माध्यम से संपादकीय आलेख में उजागर कर विचारों और सोच को उद्वेलित कर दिया ।
    आज के तथाकथित काव्य में टुकड़ों में बंटे लय, यति, गति, तुकांत और रस विहीन गद्य का समावेश कविता की आत्मा को लहूलुहान करने पर आमादा है ।
    जन- मन को जाग्रत करता और समुचित दिशा निर्देश देता आपका संपादकीय आलेख ज्येष्ठ माह की भीषण तपन में बारिश की बूंदों की शीतलता की अनुभूति जैसा है ।
    आपको हार्दिक साधुवाद

    • संगीता, आपकी टिप्पणी आज पढ़ी… पुरवाई की बात आप जैसे सच्चे कवियों की मन की बात है तो संपादकीय सफल है।

  25. आवश्यक विषय। आपने विषय-वस्तु एवं भाषा-शैली दोनों से जुड़े हुए बहुत सटीक मुद्दे उठाए हैं।

    कविता को कविता होना ही चाहिए, यदि तुकांत ना भी हो तो भी आंतरिक लय एक मूलभूत आवश्यकता है।

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