Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – ऑनर किलिंग… झूठे सम्मान के लिए हत्या…!

हैरानी तो यह सोच कर होती है कि एक ओर इंसान अंतरिक्ष में पहुँच  रहा है… मंगल ग्रह पर पाँव रख रहा है… कृत्रिम बौद्धिकता का विकास कर रहा है, और दूसरी ओर अपने ही परिवार के सदस्यों की हत्या कर रहा है… और वह भी ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर। भला ऐसा आत्मसम्मान किस काम का?

परंपराएँ आसानी से पीछा नहीं छोड़ती हैं!… 
भारत का इतिहास पढ़ते हुए हम राजपूतानी शान के बारे में बहुत-सी कहानियाँ सुनते आए हैं। जिसे सुनकर एक हद तक हमारे मन में गर्व की अनुभूति भी होती है। लेकिन थोड़ी-सी हैरानी भी होती है कि यदि राजपूत इतने ही वीर और स्वाभिमानी थे, तो मुग़लों के सेनापति बन कर भारतीयों के विरुद्ध ही क्यों तलवार उठाते थे? वहीं राजपूतानी शान पर कुर्बान हो जाने वाली वीरांगनाओं की कहानियाँ भी हैं, जो सम्मान के लिए जौहर की रस्म अदा करते हुए अपने शरीर को भस्म कर देती थीं। यह प्रथा शौर्य, त्याग, निष्ठा और नारी जीवन की अस्मिता का प्रतीक मानी जाती है। रानी पद्मिनी द्वारा अपने पति राजा रत्न सिंह की मृत्यु के बाद अलाउद्दीन खिलजी से अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अन्य राजपूत महिलाओं के साथ एक विशाल अग्निकुंड में कूद कर जान देने की घटना हमारे इतिहास का अटूट हिस्सा है। 
पूरा पंजाब ऐसी घटनाओं से अटा पड़ा है, जब परिवारों में और गाँवों में मान और प्रतिष्ठा को लेकर कई-कई पीढ़ियाँ आपस में लड़ती रहीं, और एक-दूसरे का ख़ून बहाती रहीं। वहाँ तो पुत्र की चाहत ही इसलिए होती थी कि वह बड़ा होकर परिवार की लड़ाई लड़ेगा। पंजाबी साहित्य और पंजाब-केंद्रित हिंदी साहित्य में झूठी शान और स्वाभिमान को लेकर प्रायः ऐसी दुश्मनियों के चित्रण देखे जा सकते हैं   
समस्या एक अलग रूप धारण कर लेती है, जब एक जाति की बेटी किसी दूसरी जाति या एक धर्म की बेटी किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार कर बैठती है और उसके साथ विवाह करना चाहती है। ऐसे में ख़ानदान की इज्ज़त ख़तरे में पड़ जाती है, और बहुत बार ‘ऑनर किलिंग’ पर जा कर ही ख़त्म होती है। आजकल तो लव-जिहाद जैसे किस्से भी समाचारों में अपनी जगह बनाए हुए हैं। मगर सवाल यह है कि ऑनर किलिंग का आख़िर इस सदी में औचित्य क्या है?
पुरवाई के पाठक सोच रहे होंगे कि आज हमारा संपादक ‘ऑनर किलिंग’ जैसे विषय पर क्यों बात करना चाह रहा है। इसके पीछे इस विषय पर ब्रिटेन की सरकार द्वारा नई परिभाषा गढ़े जाने का निर्णय है। क्योंकि ब्रिटेन में इस परंपरा को किसी प्रकार की वैद्यता नहीं मिली हुई है। मगर देखा गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और दक्षिण एशिया के कुछ अन्य देशों से लड़कियों को ज़बरदस्ती वहाँ ले जाकर उनका विवाह उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध परिवार द्वारा चुने गये लड़के से करवा दिया जाता है, विरोध  करने पर डांटना, मारना और हत्या करने तक की नौबत आ जाती है। 
2021 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जिसको लेकर ब्रिटेन की सरकार और न्याय-व्यवस्था, ‘ऑनर किलिंग’ को लेकर ख़ासी सक्रिय हो गई है। पाकिस्तान से ब्रिटेन में आकर बसे एक परिवार की लड़की फ़ौज़िया जावेद (Fawziyah Javed) के पति काशिफ़ अनवर ने एडिनबरॉ शहर में फ़ौज़िया जावेद को खड़ी चट्टान से पचास फ़ुट नीचे धक्का दे कर गिरा दिया, और मरने के लिए वहीं छोड़ दिया। उस समय फौजिया गर्भवती थी। 

मरते-मरते फ़ौज़िया ने पुलिस को सच्चाई बता दी और उसके पति को उम्र कैद की सज़ा हो गई, जिसे  वह आज भी भुगत रहा है। मृत्यु से पहले फ़ौज़िया जावेद ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाई थी, जिसमें उसने अपने पति के हिंसात्मक रवैये के बारे में ज़िक्र किया था। काशिफ़ अपनी पत्नी की पिटाई तक कर दिया करता था। फ़ौज़िया ने तय कर लिया था कि वह अपने पति से अलग हो जाएगी, मगर उसके पति ने उसे ऐसा मौक़ा ही नहीं दिया… इससे पहले ही उसकी हत्या कर दी। 
फ़ौज़िया की माँ यास्मीन जावेद के अनुसार, फ़ौज़िया का पति काशिफ़ ‘दुष्ट, ईर्ष्यालु और असुरक्षित भावना’ वाला इंसान था। वह फ़ौज़िया के स्वतंत्र और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा था। वह टिपिकल पाकिस्तानी मर्द की सोच के हिसाब से चल रहा था, जबकि फ़ौज़िया ब्रिटने की पढ़ी-लिखी खुले विचारों वाली लड़की थी। उसने कई बार फ़ौज़िया को चेतावनी भी दी थी, कि वह ब्रिटिश लड़कियों जैसा व्यवहार करना छोड़ दे।  
 फ़ौज़िया के परिवार और मित्रों के अनुसार वह एक निःस्वार्थ, उदार, दयालु और लोकप्रिय लड़की थी। वह बड़े दिल की इंसान थी, और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर रहती थी। वह एक वकील थी और उसने बहुत से लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला। वह एक ऐसी शख़्सियत थी, जो अपनी ख़ूबसूरत मुस्कान और मिलनसार व्यक्तित्व से पूरे माहौल को रौशन कर देती थी।  
फ़ौज़िया की माँ यास्मीन जावेद का कहना है कि काशिफ़ अनवर को यह बात पसंद नहीं थी, कि फ़ौज़िया की अपनी आवाज़ हो, अपनी राय हो… लीड्स की फ़ौज़िया जावेद ने 25 दिसंबर 2020 को एक इस्लामी समारोह में ऑप्टिकल असिस्टेंट काशिफ़ अनवर से शादी की।

उनकी शादी के तीन महीने बाद ही अनवर ने हिंसात्मक व्यवहार करते हुए फ़ौज़िया को एक कब्रिस्तान में बेहोश कर दिया था।  फ़ौज़िया की मौत के संदर्भ में दर्ज अदालती मामले में इस बात का उल्लेख किया गया है। लगभग उसी समय, उसने उनके चेहरे पर तकिया रख दिया और उसके सिर पर मुक्का मारा था । अदालत को यह भी बताया गया कि अनवर ने फ़ौज़िया की जानकारी के बिना उसके बैंक खाते से £12,000/- निकाल लिए थे ।
यू.के. में ‘ऑनर किलिंग’ को लेकर बहुत स्पष्ट परिभाषा स्थापित है। यहाँ ऑनर यानि कि सम्मान-आधारित दुर्व्यवहार को एक ऐसा अपराध या घटना माना जाता है, जो किसी परिवार या समुदाय के ‘सम्मान’ की रक्षा या बचाव के लिए किया जाता है।
यदि आपके परिवार या समुदाय को लगता है कि आपने किसी खास तरीके से व्यवहार करके उन्हें शर्मिंदा किया है, तो आपको उनके ‘सम्मान’ के नियम को तोड़ने के लिए दंडित किया जा सकता है ।
ब्रिटेन की होम सेक्रेटरी (गृहमंत्री) इवेट कूपर ने इस विषय पर सख़्त टिप्पणी करते हुए कहा, “ ‘सम्मान’ पर आधारित सभी प्रकार के दुर्व्यवहार विनाशकारी अपराध हैं, जो जीवन को तहस-नहस कर सकते हैं, इनमें कहीं कोई ‘सम्मान’ नहीं होता। लंबे समय से इन अपराधों को अक्सर विशेषज्ञों द्वारा ग़लत समझा जाता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप पीड़ितों को वह सहायता नहीं मिल पाती, जिसके वे हकदार हैं।”
इवेट कूपर ने चेतावनी देते हुए कहा, “कोई भी ग़लतफ़हमी में न रहे… हम यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे कि अपराधियों को सज़ा मिले और पीड़ितों की सुरक्षा हो सके।”
महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ हिंसा और उनकी सुरक्षा का विभाग देखने वाले मंत्री जेस फिलिप्स ने कहा कि- “ऐसी घटनाएँ अपराध-पीड़ितों को अकल्पनीय और दीर्घकालिक शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुँचा सकती हैं। हमारे समाज में इनके लिए कोई जगह नहीं है और हमें इन्हें रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।”
यू.के. में इन अपराधों को मध्य पूर्वी संस्कृतियों से जुड़े अपराध के रूप में माना जाता है। लेकिन दुनिया के अन्य देशों में भी  ऐसी सोच मौजूद हैं, कि किसी ने खुद को, अपने परिवार और समुदाय को अपने व्यवहार से शर्मसार किया हो । इन मामलों में हालाँकि ज़्यादातर पीड़ित महिलाएँ ही होती हैं, फिर भी पुरुषों को समलैंगिकता, विकलांगता या किसी दुश्मन परिवार या किसी दूसरे कल्चर की महिला के साथ संबंध होने के दावों के कारण निशाना बनाया जाता है।
हैरानी तो यह सोच कर होती है कि एक ओर इंसान अंतरिक्ष में पहुँच  रहा है… मंगल ग्रह पर पाँव रख रहा है… कृत्रिम बौद्धिकता का विकास कर रहा है, और दूसरी ओर अपने ही परिवार के सदस्यों की हत्या कर रहा है… और वह भी ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर। भला ऐसा आत्मसम्मान किस काम का?
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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46 टिप्पणी

  1. आदरणीय संपादक महोदय,
    इस बार का आपका संपादकीय राजनीति ,सामाजिकता , धार्मिकता आदि भौतिक विषयों से हटकर सीधे-सीधे मानविक, मानसिक विषय पर आ गया है।
    चंद्रमा पर जाना,कृत्रिम बुद्धिमता विकसित ,करना प्राणदायी औषधियों का अन्वेषण इत्यादि सभी भौतिक जीवन के लिए किए गए अनुसंधान और प्रगति हैं, जबकि तथा कथित ऑनर किलिंग मनुष्य की या यूं कहिए कि पुरुष की आदिम असुरक्षा की भावना का अवशिष्ठ चिन्ह है, जिस पर विजय पाने में अभी न जाने कितना समय लगेगा। मनुष्य में सामाजिकता का भी विकास जिस ढंग से हुआ उसमें यह ‘झूठी शान ‘बहुत ऊंचा स्थान पा गई है। यदि तर्क की दृष्टि से सोचा जाए तो देश के लिए मरना ,जाति के लिए, धर्म केलिए मरना गौरव की बात है तो
    परिवार की ” प्रतिष्ठा’ के लिए मरना भी गौरव की बात हो सकती है! अब विडंबना यह सामने आती है कि यदि ‘मरना’ गौरव की बात हो सकती है तो ‘मारना’ दंडनीय अपराध क्यों हो गया? लेकिन इसका तात्पर्य यह कतई नहीं कि मैं ऑनर किलिंग की तरफदारी कर रही हूॅं। इस अपराध के लिए वही दंड विधान होना चाहिए जो हत्या के लिए है।
    लीक से हट कर विषय सुनने के लिए शाबाश !!!

    • सरोजिनी जी आपकी शाबाशी ने बहुत हौसला बढ़ाया है। मैंने संपादकीय में झूठी शान और झूठी प्रतिष्ठा की बात की है…

  2. बहुत ही समसामायिक विषय उठाया है आपने सर.. आजकल भारत में तो आये दिन ऐसी ख़बरें मीडिया के माध्यम से पता चलती रहती हैं… वास्तव में बहुत क्रोध आता है, दुःख भी होता है हमारा समाज, हम तरक़्क़ी कर रहे हैं या गर्त में जा रहे हैं… इस जघन्य अपराध पर अलग से एक सख़्त कानून बनाने कि आवश्यकता है..

    • आपने बिल्कुल ठीक कहा मनीष… सख़्त कानून बनाए जाने की आवश्यकता है। स्नेहाशीष।

  3. इस बार का संपादकीय- ‘ऑनर किलिंग… झूठे सम्मान के लिए हत्या’ भारत में यह सदियों से चली आ रही परंपरा है जिसमें घर की लड़की या महिला को इज्जत की खातिर मार दिया जाता है। यह कैसी विडम्बना है कि यह कुकृत्य अपनों के द्वारा किया जाता है। वही अपने शर्मशार होने की अपेक्षा गर्व महसूस करते है।
    कहीं-कहीं तो खाफ पंचायतें संविधान को धता बताकर सीधे मृत्यु दण्ड का आदेश दे देती हैं। हमारा समाज भी इस कुकृत्य के लिए बराबर का दोषी होता है। जिसकी लड़की अन्य जाति या धर्म के लड़के के साथ भाग जाती है या शादी कर लेती है और अगर पिता चुप बैठ जाए तो समाज के लोग उसे जीने नहीं देते हैं। थोड़ी सी कहासुनी में उसी बात को उछालते हैं। बिरादरी उसके घर में शादी ब्याह करने में हिचकती है। कुल मिलाकर उसे ऐसा एहसास करा देते हैं जैसे उसने गौहत्या का पाप किया हो।
    हम चांद पर नहीं चाहे आठों ग्रहों पर झंडा गाड़ आएं पर अपनी सड़ी-गली मानसिकता को न छोड़ेंगे। एप्पल का मोबाइल हाथ में लेंगे, कम्प्यूटर से पढ़ाई करेंगे, राहु केतु राक्षस नहीं थे और न वे सूर्य चन्द्रमा को निगलते हैं बल्कि पृथ्वी के घूमने से ग्रहण लगते हैं इस बात को स्वीकार कर लेंगे। मतलब जो भी आविष्कार होंगे सब स्वीकार कर लेंगे पर ये घटिया मान्यताओं को न छोड़ेंगे। बंदरिया के मरे बच्चे की तरह छाती से चिपटाए रहेंगे। भारतीय समाज की असली हकीकत यही है।
    ब्रिटेन इन मान्यताओं को मिटा सकता है। उसने ऐसे करतब करके दिखाये हैं। भारत में सती प्रथा का अंत उन्होंने किया था। वे करके न जाते तो शायद ही हम इसका अंत कर पाते। वोट की राजनीति ऐसा करने ही न देती।
    यह जानकर अच्छा लगा कि ब्रिटेन की सरकार इस मामले में सख्त हो चुकी है। यह मानवता के हित में ठोस कदम है।
    सर आपने इस विषय को उठाकर अच्छा किया। धूमिल हो चुकी आशाओं को नई ऊर्जा दे दी है। कम से कम पाठक इस विषय पर कुछ तो सोचेंगे। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद सर

    • लखन लाल पाल जी
      आपने जो टिप्पणी लिखी है उससे असहमति का तो कोई प्रश्न नहीं उठाता परंतु सती प्रथा के लिए जो आपके मन में धारणा है कि अंग्रेजों ने यह प्रथा बंद करवाई तो शायद आप राजा राममोहन राय को भूल गए। 200 वर्ष तक हमारे ऊपर राज्य करने वाले ब्रितानियों की यही तो खूबी थी कि वह हर अच्छे कार्य का श्रेय अपने ऊपर ले लेते थे।
      हमारे यहां की नहीं था कुंठित होती रही और वह वैज्ञानिक संगीतकार सभी कुछ बनते रहे। जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत को अंग्रेजों से अधिक और किसी ने भारत के ऊपर चरितार्थ नहीं किया। सोने की चिड़िया देश को दरिद्र बनाकर छोड़ गए। हम आज भी अपने उधर के लिए पश्चिमोन्मुख ही रहते हैं।।

      • जी, सरोजिनी जी, राजा राममोहन राय जी की भाभी के साथ यह घटना हुई थी। इसे देखकर ही उन्होने इसके विरोध में आवाज उठाई थी। उनकायोगदान था किन्तु अंग्रेजों ने इस प्रथा को अमानवीय मानकर कानून बनाया और इसे जड़ से खत्म कर दिया। वे तो विदेशी थे उन्हें इन भूखे नंगों से क्या मतलब था कि वे कानून बनाते। लेकिन उन्होंने बनाया।
        आज के भारत को देख लीजिए, महिलाओं के हित में कानून बनाया जाता है तो सरकारों के पसीने छूट जाते हैं तब लागू हो पाता है। अंग्रेजों के जाने के बाद कितने ऐसे कानून बने हैं जिनसे उनका भला हुआ है। सती प्रथा जड़ से खत्म करके चले गए और हमने 80 साल होने जा रहे हैं,आनर किलिंग खत्म नहीं कर पाया है। 80 साल एक संख्या होती है। हम श्रेय लें तो किस बात का लें

        • भारतीयों के ‘भूखे-नंगे’ होने की बात आपने खूब कही, आप समझते हैं कि अंग्रेज भारत का उद्धार करने आए थे हम ‘भूखे नंगों की सहायता करने?
          सती प्रथा का उद्भव ही आततायियों से असुरक्षित स्त्रियों को बचाने के लिए हुआ होगा,मेरा ऐसा मानना है, वरना तो मनु स्मृति के अनुसार वहीं गृहस्थ आदर्श है जो विधवा बहन, बेटी, भाभी या अन्य किसी स्त्री को सादर आश्रय और सुरक्षा देता है। विधवा स्त्रियों की सम्पत्ति हड़प लेना अपेक्षाकृत सहज होता है।

          • अपने देश की बुराई करने में मुझे भी अच्छा नहीं लगता है। जब देश में अच्छा होता है तो मुझे खुशी होती है। उसका इजहार मैं आदरणीय तेजेन्द्र सर जी की संपादकीयों पर टिप्पणियां लिखकर कर चुका हूं। लेकिन कुछ सच्चाइयों से मुख नहीं मोड़ा जा सकता है। जैसे कि अंग्रेजों से पहले संपूर्ण भारत कभी एक नहीं रहा। टुकड़ों में बंटा विभिन्न राजपरिवारों की जागीर रहा है। और जब मन हुआ किसी ताकतवर राजा ने उन्हें अपदस्थ किया और खुद राजा बन बैठा। आज जो भारत है – पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण यह अंग्रेजों का दिया हुआ है। अगर अंग्रेज़ नहीं आए होते तो आप सोच सकती थी कि इतना बड़ा भूभाग हमारा होता। हमारी बुद्धि वहां तक दौड़ ही नहीं सकती थी। इस देश में भी कई देश होते।हम कभी भी इतना बड़ा भारत नहीं बना सकते थे। हममें नहीं थी वो क्षमता। अंग्रेज बनाकर दे गए। भले ही आम-आदमी इतनी गहराई से न सोचे पर अंत:करण ये सब समझता है। तभी तो उनकी गुलामी सहकर भी उनके प्रति हमारी घृणा नहीं है।
            अंग्रेज बहादुर शिक्षा को गुरुकुलों से आजाद करके आम आदमी के बीच लेकर आए। आप कल्पना कर सकती हैं कि हमारे लोग आम आदमी को शिक्षित करने की सोच सकते थे।आम आदमी को कभी शिक्षा दी ही नहीं गई। शिक्षा अंग्रेजों की देन है। छुआछूत की बीमारी का इलाज उन्होंने वहीं स्कूलों से शुरू किया। मैं गुलामी के पक्ष में नहीं हूं तो जड़ता के पक्ष में भी नहीं हूं। अगर जड़ता मानव का खून पीने लगे तो उसके उद्धार के लिए कुछ समय की गुलामी बुरी नहीं है।
            मनुस्मृति की बात को तो छोड़ ही दीजिए। इस पर न जाएं तो ही अच्छा है। क्योंकि मानव मानव की घोर असमानता वाली बात ने देश को गर्त में लाकर डाल दिया है।
            खैर आप स्वीकार करें या न करें, मैं स्वीकार करता हूं कि उन्होंने हमारी राजनीति और समाज नीति को प्रभावित ही नहीं किया है बल्कि बदल दिया है। हम उन्हीं के द्वारा बदले हुए नियमों पर आज भी चल रहे हैं।
            आज हम लोकतंत्र में जी रहे हैं, हमारी अपनी सरकारें हैं पर खाप पंचायतें आज भी फल-फूल रही हैं। हम नहीं कर पा रहे हैं कुछ।

    • प्रिय भाई आपने गहन विश्लेष्ण करते हुए एक चेतावनी देती हुई टिप्पणी लिखी है और ब्रिटेन की सरकार को एक ज़िम्मेदारी सौंपी है। वैसे सती प्रथा बंद करवाने में राजा राम मोहन राय का योगदान अद्वितीय था।

  4. मनुष्य सामाजिक प्राणी है और जिस समाज में वह जन्म लेता है वहां के संस्कार इसके स्वभाव में आ जाते हैं। यही कारण है कि बहुत पढ़े लिखे भी समाज में अपने सम्मान को बनाए रखने के लिए ऑनर किलिग़ करवा देते हैं क्योंकि उनके समाज में उन कार्यों का बहिष्कार किया गया है।
    आपका संपादकीय हमेशा की तरह विचारों को पोषित करता है।

    • संगीता जी, झूठी शान और प्रतिष्ठा… ऐसा अपराध करवा देती है। मॉडर्न कहलाना और होना दो अलग स्थितियां हैं। टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  5. जी, सरोजिनी जी, राजा राममोहन राय जी की भाभी के साथ यह घटना हुई थी। इसे देखकर ही उन्होने इसके विरोध में आवाज उठाई थी। उनकायोगदान था किन्तु अंग्रेजों ने इस प्रथा को अमानवीय मानकर कानून बनाया और इसे जड़ से खत्म कर दिया। वे तो विदेशी थे उन्हें इन भूखे नंगों से क्या मतलब था कि वे कानून बनाते। लेकिन उन्होंने बनाया।
    आज के भारत को देख लीजिए, महिलाओं के हित में कानून बनाया जाता है तो सरकारों के पसीने छूट जाते हैं तब लागू हो पाता है। अंग्रेजों के जाने के बाद कितने ऐसे कानून बने हैं जिनसे उनका भला हुआ है। सती प्रथा जड़ से खत्म करके चले गए और हमने 80 साल होने जा रहे हैं,आनर किलिंग खत्म नहीं कर पाया है। 80 साल एक संख्या होती है। हम श्रेय लें तो किस बात का लें

  6. सादर नमस्कार सर….
    दुःखद! इस तरह की अव्यवस्था समाज के लिए भयानक तो है ही.. साथ ही प्रगतिशील राष्ट्र के लिए एक बाधा भी है। अपराधी को कठोर दंड से दण्डित करना ऐसी मानसिकता रखनेवालों को चेतावनी भी है।
    प्रत्येक महत्वपूर्ण विषयों पर आपका लिखा संपादकीय पाठकों को नए विचारों से जोड़ता है।
    बहुत ही दुःखद परिणाम हुआ… फ़ौजिया का…। ऐसे अपराध और अपराधियों के लिए हमारे समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

    साधुवाद…

  7. प्रणाम आदरणीय।
    भारत में ऑनर किलिंग का संबंध युवती के अस्वीकार्य यौन व्यवहार से है। इसका कारण है यौन शुचिता पर हमारा अत्यधिक आग्रह। अब जितनी यौन स्वच्छंदता भारत में है, उसे देखते हुए तो ऑनर किलिंग बिलकुल भी नहीं है।
    आपने मुस्लिम समाज से उदाहरण लेकर उनकी अनुदार, दकियानूसी सोच पर प्रकाश डाला। भारत में भी इस तरह के समाचार मिलते हैं।

    पुरुष द्वारा स्त्री का शोषण आम बात है। लेकिन दोनों को साथ रहना है। इसलिए एक- दूसरे के लिए जगह तो छोड़नी ही पड़ेगी। जिस समाज में हम रहते हैं, उसके जीवन- मूल्य हमारे व्यवहार पर असर डालते हैं। इसे स्वीकार करके ही हम समरसता में जी सकते हैं। इस्लाम के अनुयायी ऐसा नहीं मानते यह उनका दुर्भाग्य है।

  8. सादर अभिवादन सर
    इस बार का संपादकीय विचलित करने वाला है । सच कितनी निर्दयता से लोग किसी की हत्या कर देते हैं । क्या ये इंसान कहलाने लायक हैं । हम कह देते हैं कैसा पाशविक कार्य है मगर पशु भी ऐसे तो नहीं होते होंगे । इस तरह के अपराधों के लिए किए दण्ड के साथ समाज की मानसिकता को सही दिशा देने हेतु कार्य करने होंगे । साधुवाद…

  9. धर्मवीर भारती ने वर्षों पहले कहा था, कट्टर से कट्टर व्यक्ति को भी रॉकेट चलाना आदि टेक्नोलॉजी को अपना लेना बड़ा आसान लगता है।
    पर हर इंसान का खून लाल है, इंसान इंसान में फर्क नहीं, इस आधुनिक दृष्टिकोण को अपना लेना कठिन लगता है। यह बड़ी समस्या है।
    संपादकीय भी इस बात की पुष्टि करते हुए ताल में ताल मिलाता है।

    • भारती जी के वक्तव्य को उद्धृत कर आपने संपादकीय को नये आयाम दिये हैं भाई हरिहर झा जी।

  10. आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
    आपका यह संपादकीय — “ऑनर किलिंग… झूठे सम्मान के लिए हत्या…” — समय की सबसे गंभीर और गूढ़ समस्याओं में से एक को जो साहस, संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ उठाता है, वह वाकई प्रेरणादायक है।
    आपने जिस तरह मानवता की चरम विरोधाभासों को उजागर किया — एक ओर मानव अंतरिक्ष में कदम रख रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित कर रहा है; वहीं दूसरी ओर ‘ऑनर किलिंग’ जैसी अमानवीय घटना हो रही है — वह अत्यंत मार्मिक लेकिन हकीकत है। इस विरोधाभास को आपने इतने तथ्यात्मक और भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया कि हर पाठक के मन में एक गहरी बेचैनी पैदा हो जाती है।
    इतिहास से प्रेरित होकर आपने यह दिखाया कि संस्कृति और परंपरा यदि अंधे विश्वास का रूप ले जाएं, तो वे मानवता की वंदना इतनी आसानी से हत्या का औचित्य नहीं बना सकतीं। आपने राजपूताना शौर्य और जौहर जैसी तमाम महाकाव्यात्मक कहानियों का जिक्र कर उन्हें वर्तमान युग की बेबुनियाद ‘ऑनर’ रीति-रिवाजों से जोड़ा — यह कौशल प्रशंसनीय है।
    आपका लेख हमें याद दिलाता है कि आज का समाज इतने प्रगतिशील होने के बावजूद, इन प्राचीन सोचों से कितनी जल्दी मुक्ति पा नहीं सका। यह हमें आत्मविश्वास से सोचने, परंपराओं को चुनौती देने और मानवता की मानवीय मूल्यों की रक्षा करने के लिए प्रेरित करता है।
    आपके रचनात्मक और विचारोत्तेजक लेखन के लिए हार्दिक धन्यवाद। आपकी कलम हम सबके लिए सचेत करने वाला दीपक बनी रहे — यही शुभकामनाएँ । – डॉ. शैलेश शुक्ला [email protected]

    • हैरानी होती है शैलेश भाई कि हम कितनी भी तरक्की क्यों ना कर लें मगर पुरानी और कट्टर परंपराओं से छुटकारा नहीं पा सकते।

  11. जिस ऑनर में किलिंग मौजूद है – उसे ऑनर नहीं हैवानियत कहना उचित होगा। इस मामले में ब्रिटेन का कानून दुरुस्त है।
    एक और समकालीन मुद्दे पर इस हफ्ते का संपादकीय बहुत ही सराहनीय और प्रासंगिक है। संपादक जी को हार्दिक बधाई।

  12. इस सप्ताह के अपने संपादकीय में आप ने ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर हो रही स्त्रियों की हत्याओं के विरुद्ध ज़ोरदार आवाज़ उठाई है और ऐसे हत्यारों को सख्त दंड देने के पक्ष में बात की है।
    इसे आप ने सही ही मानसिक पिछड़ेपन का नाम दिया है। तथा इस पर आश्चर्य भी व्यक्त किया है कि इस में ऑनर की बात आती ही कहां से है…..
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

  13. संपादकीय पढ़ कर मन उद्वेलित हो गया है। रही सही क़सर टिप्पणियों ने पूरी कर दी। ब्रिटेन में एक मुस्लिम स्त्री के साथ जो हुआ, उस पर माननीय संपादक जी ने लिखा तो बहुतों के मन का आक्रोश दिखा। हमारे देश का बहु चर्चित, आरुषि हत्या काण्ड, शायद इतने आक्रोश को जगा नहीं पाया। भारत को टुकड़े-टुकड़े काटने वाले। छुआछूत को वीभत्स्तम रूप तक पहुंचाने वाले, सिर पर मैला ढाने की परम्परा की नींव डालने वाले, कुटिल अंग्रेज़ बहादुर का गौरव गान पढ़ कर, लगा कि भारतीय मानस की गुलामी और अंग्रेजों की प्रचार नीति के foot print बहुत गहरे हैं।

    ब्रिटेन की घटना ने, भारत में हो रही तथाकथित ऑनर किलिंग का इतिहास कटुता के साथ याद दिला दिया। न्याय तो इसके लिए नहीं मिला है युग युगों से। ब्रिटेन में भी न्याय का ऊंट किस करवट बैठेगा, भविष्य के गर्भ में है।

    भारतीय समाज स्त्रियों के दृष्टिकोण से ग़ज़ब दोगला है। एक ओर बेटी बहन माँ, इज़्ज़त का सिंबल हैं। दूसरी ओर स्त्री मात्र एक भोग्या है।

    विश्व की अन्य संस्कृतियों की उतनी गहराई से जानकारी नहीं है, लेकिन इसाई और इस्लाम मज़हब में तो शायद, हिंदुओं से भी अधिक दुर्गति है स्त्रियों की। Google इसाई संस्कृति के आधिपत्य में है, अतः उस धर्म की सच्ची जानकारी नहीं मिलती। जहां प्रमाण थे, वो पुस्तकें आज मुझे उपलब्ध नहीं अतः उस विषय में कुछ नहीं कहूंगी।

    भारत में स्त्री के लिए, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता,” लिख कर महिलाओं को देवी बना दिया गया। यानी इन्सान होने के हक़ छीन लिए गए। महिलाएं अपने आपको, महानता की परिभाषा में फिट करती, इन्सानी सुख- दुःख भूल गईं।

    यहां की बहुपत्नी प्रथा, राजपूतानी शान की ड्योढ़ियों की कथा पढ़ लें तो स्त्री शोषण की सीमाएं मिलेंगी। इसी शान के लिए राजस्थान में गाँव के गाँव हैं, जहां पीढ़ियों से बारात नहीं आई, क्योंकि बेटियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। प्रसूति कराने वाली धाय जानती थी कि, स्त्री संतान के जीवित होने का संदेश परिवार तक नहीं पहुंचना चाहिए। कहते हैं मुंह में नमक का डला, डाल दिया जाता था या सौर में ही खोद कर गाड़ देते थे बच्चियों को। ये ऑनर किलिंग ही थी। जिसके लिए कब कहां न्याय की गुहार हुई???

    गर्भपात की और भ्रूण जाँच की सुविधा के बाद तो भारत का सेक्स रेशियो ही गड़बड़ा गया। इसे क्या कहेंगे? सरकार चेती और नियम बने। जिन्हें तोड़ कर आज भी सब कुछ चल रहा है। जनता सुखी थी, पुत्रियों से मुक्त, न्याय मांगने कितने गए। हम सभी हमाम में नंगे हैं।

    भारत जहां सुन्दर स्त्री को नगर वधू बनाया जाता रहा (किसी की बेटी रही होगी, बहन भी शायद), देव दासी और आदिम धंधा वेश्या…। तब स्त्री इज़्ज़त नहीं होती, तब जाति, सम्मान और इज़्ज़त आड़े नहीं आती…!

    वह स्त्री अपनी बहन बेटी जो नहीं। शादी करके ‘बेटी के बोझ’ से आजाद होना, पुण्य पाना भी, जीवन सार्थक करना है। स्त्री तो कठपुतली है, भले ही वो बीवी, बहू , बेटी या बहिन हो। इच्छा-अनिच्छा कुछ भी देखे बिना, योग्य , अयोग्य, बूढ़े, रोगी, चरित्र भ्रष्ट वर से ब्याह दो, बेटी बेंच दो। क्योंकि स्त्री की जुबान होना, अपना व्यक्तित्व होना, यहां के मर्दों (पिता, ससुर पति और भाई) को स्वीकार नहीं क्योंकि यहां स्त्री इज़्ज़त है, सम्मान है कुल की नाक है…। आज भी आंकड़े देखिए तो गुजरात, लापता लड़कियों की गुमशुदगी में नम्बर वन है। कितने लोग विरोध कर रहे हैं?

    आरुषि हत्या कांड भी अनसुलझा ऑनर किलिंग का केस था। खाप न्यायालय जैसा लखन जी लिखा है, मृत्यु दंड देने लगता है। ये सरकार की जिम्मेदारी है, खाप पंचायत पर रोक लगाए। जन विद्रोह कहां है?

    ये कैसी इज़्ज़त है जो संबंधों के साथ बदलती रहती है। आपने ब्रिटेन की पृष्ठभूमि में लिखा। आशा है कि न्याय हो… विश्वास नहीं है, रत्ती भर, क्योंकि पुरुष, स्त्री के साथ, प्रागैतिहासिक काल से, न्याय कभी कर ही नहीं सका।

    लेकिन एक पुरुष होते हुए, आपने ये विषय उठाया, इस प्रयत्न के लिए हार्दिक बधाई। कुछ पाठकों के मन में सुगबुगाहट हुई। चार दिन की चांदनी है। फिर बेताल उसी डाल लटकेगा।

    भ्रूण हत्या हो, वयस्क ऑनर किलिंग हो, महिलाओं का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार हो, बेमेल विवाह हों। ब्राइड बर्निग हो, कॉल गर्लस की बढ़ती संख्या हो, जनाक्रोश नहीं होगा, क्योंकि पुरुष हर स्थिति में फायदे में रहेंगे।

    हां, इधर कुछ विवाहित पुरुषों की हत्या और आत्महत्या के गिनती के केस क्या आए, आक्रोश का भूचाल क्या, सूनामी आ गया…

  14. आदरणीय,
    बहुत सही कहा आपने, परंपराएं आसानी से पीछा नहीं छोड़ती हैं, अन्यथा क्या कारण है कि विभिन्न क्षेत्रों में कल्पनातीत प्रगति के बाद भी, मानव समाज अभी आदिम संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाया है।
    राजपूतों के लिए कभी कहा जाता था “12 बरिस लौ कुकुर जीवै औ तेरह लौ जिए सियार/ बरिस18 क्षत्रिय जीवै ,आगे जीवन को धिक्कार” यानी यदि 18 वर्ष की उम्र तक क्षत्रिय लड़ -भिड़ कर मर नहीं गया तो क्या खाक जिया! उसके जीवन को धिक्कार है ।कई बार लोग बड़े अभिमान से अपने पूर्वजों के बारे में ऐसी बातें बताते हैं जिनमें झूठी शान के लिए उन्होंने अपना ही अहित कर डाला। झूठे सम्मान की सीमा कहां तक हो सकती है, इसे अपने फ़ौज़िया जावेद और काशिफ़ अनवर के प्रसंग द्वारा बताया है। काशिफ़ ने पत्नी की हत्या सिर्फ़ इसलिए कर दी की फ़ौजिया खुले विचारों वाली लड़की थीं। अनवर बेशक ब्रिटेन में था किंतु वह अपने पाकिस्तान को भुला नहीं पाया था।
    यह जानकर अच्छा लगा कि वर्तमान में ब्रिटेन की होम सेक्रेटरी इवेट कूपर इस ख्याल की है कि सम्मान पर आधारित सभी प्रकार के दुर्व्यवहार विनाशकारी अपराध हैं जो जीवन को तहस-नहस कर डालते हैं ।‌ यह स्वाभाविक लगता है कि दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसी सोच आवश्यक रूप से मौजूद रही होगी कि किसी के आचरण से परिवार या समुदाय को शर्मिंदा होना पड़ता हो। आखिर परिवार और समाज लगभग पूरी दुनिया में ही कमोबेश एक से हैं।
    वर्तमान में ऑनर किलिंग को किसी भी रूप में स्वीकार किया जाना अमानवीय है। इसे जघन्यअपराध की श्रेणी में शुमार किया जाना चाहिए। विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए आपका बहुत आभार।

    • आपने सही कहा विद्या जी, ऑनर किलिंग को जघन्य अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिये। इस सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

  15. Honor किलिंग एक अच्छा संपादकीय जो भारत और भारत से इतर बरतानिया में इस प्रासंगिक मुद्दे को दृष्टि विशेष से पड़ताल करता है। अंतरिक्ष और इसी प्रकार की अन्य उपलब्धियों से इतराते और उसे चुनावों या अन्य तरीके से अपने नेतृत्व की खासियत बताती सियासत और समाज दोनों को समझना होगा कि यह अमानवीय स्थिति कब तक जारी रहेगी।
    उम्दा संपादकीय हेतु बधाई।

  16. आदरणीय तेजेन्द्र जी !

    पहले तो शीर्षक देखकर आश्चर्य हुआ। हमारे लिए नया था। पढ़ने पर सारी जानकारी समझ में आई।

    हिंदी में कहावत है- *बद अच्छा बदनाम बुरा* बदकिस्मती अच्छी है बदनामी से।

    एक लंबे समय से जो पितृसत्तात्मक सामाजिक मानसिकता अहम् रूढ़ियों और परंपराओं की जंजीरों में गसी हुई है,उससे बाहर निकलना सहजता से स्वीकार नहीं होता।
    स्त्री के घूंघट और बुर्के से बाहर आने के बावजूद आज भी एक पुरुष अपने को अपने घर में राजा ही समझता है।
    काश लोग यह बात समझ पाते कि सम्मान कोई वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके ,वह एक भाव है जो अपने चरित्र और कर्मों पर निर्भर है।उसे कमाना पड़ता है, निभाना पड़ता है।

    वैवाहिक संबंध के बाद पुरुष और पत्नी परिवार की गाड़ी के दो पहियों की तरह हैं जिनमें सामंजस्य होना बहुत जरूरी है।पता नहीं कब यह बात लोग समझ पाएंगे।
    इस तरह की घटनाएँ तकलीफ देती हैं। लड़कियों को लेकर माता-पिता इसीलिये अधिक पोजेसिव होते हैं।

    फ़ौज़िया जावेद को लेकर लिखे गए संपादकीय को पढ़कर फ़ौज़िया के लिए तो बहुत तकलीफ हुई।

    जो लोग अपना देश छोड़कर विदेशों में बस जाते हैं उन्हें किसी भी नाजायज काम को करने के पहले उससे संबंधित देश के कानून को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। बेहतर होता कि तलाक देकर दूसरी शादी कर लेता।
    न ही पत्नी का सम्मान कर पाए ,न ही अपना सम्मान बचा पाए।
    ऐसे लोग दरअसल सम्मान का अर्थ समझते ही नहीं हैं।

    इस संपादकीय का सबसे बड़ा पहलू जिसने
    प्रभावित किया वह है *”सम्मान”* के संबंध में वहाँ का कानून!

    पढ़ कर अच्छा लगा कि वहाँ पर सम्मान आधारित दुर्व्यवहार को एक ऐसा अपराध या घटना माना जाता है जो किसी परिवार या समुदाय के सम्मान की रक्षा या बचाव के लिए किया जाता है और सम्मान के नियम को तोड़ने के लिए दंडित किया जाता है।

    इवेट कूपर की टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है और चेतावनी आवश्यक।

    सुरक्षा विभाग के मंत्री जेस फिलिप्स ने जो भी कहा वह 100 टके सच है।

    जो बीमार और जड़ मानसिकता से ग्रसित लोग होते हैं, उन्हें चाँद और मंगल पर जाने के विकास से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे अपने सीमित दायरों में ही अपनी जिंदगी के उलट फेर में लगे रहते हैं।

    काश यह नियम और यह कानून हमारे देश में भी बन पाए। सच में परिवर्तन की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण होगा।
    पर यहाँ तो संभव हो ही नहीं सकता।
    हर बार की तरह एक नई घटना, समस्या और कानून की जानकारी देने वाले संपादकीय के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

    एक बात बहुत सकारात्मक है!!!! आप लंदन में हैं तो कुछ तो आपकी कहानियों के माध्यम से लंदन को जाना,लंदन के रेलवे को जाना और विषय के अनुरूप लंदन के कानून को भी जान रहे हैं।

    • नीलिमा जी, आप का कहना है कि आपने मेरी “कहानियों के माध्यम से लन्दन को जाना, लन्दन रेलवे को जाना, और विषय के अनुरूप लन्दन के कानून को भी जान रही हैं”। यह एक कहानीकार और संपादक के रूप में बहुत संतुष्टि देता है। आपको हार्दिक धन्यवाद।

  17. सच्चाई यह है कि विकास क्रम में मनुष्य आज भी अपनी कुछ मूलभूत वृत्तियों से मुक्त नहीं हो पाया है – वानर कपियों में भी शिशु हत्या के ऐसे मामले देखे गये हैं जिनमें मादाओं पर अधिपत्य के लिये दूसरे नर से उत्पन्न शिशुओं को मार दिया जाता है। दुखद है कि ऐसी ही कुछ प्रवृत्तियाँ मनुष्य में भी आज भी हैं। अब यह विचारणीय जरुर है कि कुछ समुदायों में यह प्रवृत्ति अधिक क्यों है?

  18. समसामयिक, महत्वपूर्ण,विचारोत्तेजक सम्पादकीय। सच में मानव ने विकास की सीढ़ियाँ चढ़ लीं हैं, वह चाँद मंगल पर भी पहुँच गया, लेकिन रूढ़िवादी सोच के लोग महिलाओं को अपनी इच्छा से धरती पर भी चलने का अधिकार नहीं देते।हरियाणा में तो जाति-पाति और झूठी परम्पराओं के नाम पर आए दिन ऑनर किलिंग की ख़बरें पढ़ने-सुनने को मिलती रहती रहती हैं। अलग-अलग खाप के लोग क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते हैं। जहाँ भी क़ानून बनें, कठोर ही होने चाहिएँ।

  19. कभी कभी ऑनर किलिंग बदले की भावना,रंजिश,ईर्ष्यावश भी होती है। और इन सब में टारगेट महिला ही होती है। समझ न आता कि ऐसा क्यों? एक तरफ तो महिला का घर नहीं माना जाता ससुराल दूसरी तरफ हर बात के लिए वही जिम्मेवार। और किसी पुरुष ने कुछ अनुचित किया तो प्रताड़ित उसे न कर उसके घर की महिलाओं को करना कौन सा न्याय है? महिलाओं के साथ यह दोहरा बर्ताब कब तक और क्यों?एक तरफ तो उन्हें हाशिए सेपरे रखा जाता है दूसरी ओर इस्तेमाल।

  20. आपके संपादकीय के विषय सदा समसामयिक होते हैं जो पाठक को झंझोड़ंते हैं, चिंतन के लिए बाध्य करते हैं, इनको पढकर भीतर से संवेदना की ऐसी लहर भी उठती है जो बेचैन करती है और कई बार कुछ न कुछ आपके प्रबुद्ध पाठकों की लेखनी भी पीड़ा उगलती है जो स्वाभाविक है क्योंकि आपकी पुरवाई के पाठक. केवल पाठक भर ही नही ं हैं, उन्हें सरोकार है अपने चारों ओर पसरी संवेदनशील विकृतियों से, उनके मस्तिष्क में चिंतन और हृदय में बेचैनी पसरती है और वे बोले, लिखे बिना सहज नहीं रह पाते। यह संपादकीय अथवा किसी भी लेखन की सफ़लता है।
    जब इंसान इंसानियत से ही गुरेज़ करेगा तब क्या वह इंसान है? ऐसे लोग बात करें सम्मान की….? मज़ाक नहीं लगता? बातें होती हैं मार्डनिटी की, चाँद की,उन्नति की.. लेकिन कैसी उन्नति, कैसा सम्मान? पहले हम अपने सामने बिखरी हुई काँच किरचें तो समेट लें, न जाने कितने टुकड़ों में विभाजित आईने को जोड़ तो लें, तभी अपने चेहरे पहचान पाएंगे।
    कोई संशय नहीं कि हमारी इंसानियत के तमग़े हमारे पास हैं ही नहीं हम कहाँ से सच्चाई व ईमानदारी से बात करेंगे, ऐसे संवेदनशील विषयों पर,? बहुत मित्रों ने अपने मन की व्यथाएं उतारी हैं। संपादकीय को गंभीरता से पढने पर आक्रोश की मानसिक स्थिति भी है, भ्रम की भी! पीड़ा की तो है ही।
    साधुवाद आपको

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