याद रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली शपथ 26 मई 2014 को ली थी। 8 जून 1980 से लेकर 12 मई 2014 तक भारत में कुल 90 आतंकवादी हमले हुए थे। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 11 वर्षों में 31 ऐसे हमले हुए हैं। हमें देखना यह है कि वर्तमान सरकार का आतंकवाद को लेकर रवैया क्या है। भारत यदि इस समय पाकिस्तान से युद्ध की स्थिति में खड़ा है तो इसका कारण आतंकवादी घटना ही है। क्या मोदी काल से पहले कभी आतंकवादी घटना को इतनी गंभीरता से लिया गया था?
1928 में जन्मे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जब 15 वर्ष के थे, तो उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना को एक पत्र में लिखा था, “मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि हिंदू कभी भी हमारे साथ नहीं रह सकते, वे हम लोगों के दुश्मन हैं।” उनकी यह सोच जीवन पर्यंत उनके साथ रही, कभी बदली नहीं। 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिए गए भाषण में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के ख़िलाफ़ एक हज़ार साल के युद्ध की घोषणा की थी। ये वही इंसान थे, जिन्होंने कहा था कि हम घास की रोटी खा लेंगे मगर एटम बम्ब बना कर रहेंगे।
पाकिस्तानी नागरिकों को उस समय यह अहसास नहीं रहा होगा, कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को सचमुच घास की रोटी खानी पड़ेगी। उनकी नफ़रत तो भारत और हिन्दुओं के प्रति रही, मगर उन्हें 4 अप्रैल 1979 को फाँसी पर लटकाया उनके ही मुल्क के सेना प्रमुख ज़िया उल हक़ ने।
भारत को निरंतर ज़ख़्म देने के लिए ही आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
भुट्टो को श्रद्धांजलि के रूप में ही 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारत को सबसे गहरा ज़ख़्म दिया, जब 26 हिन्दुओं को उनका धर्म पूछने, क़लमा सुनाने और पैंट उतार कर मज़हब पता करने के बाद गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। यही नहीं उन्होंने एक बेवा को तंज़ करते हुए यह भी कहा कि – “जाकर मोदी को बता देना!”
मैं भी एक ज़माने में सोचा करता था कि आतंकवाद का शायद मज़हब नहीं होता। मगर इस घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। अब मैं सोचने लगा हूँ कि आतंकवाद का भी मज़हब हो सकता है और आतंकवादियों का भी, हालांकि ये स्थितियों पर निर्भर करता है।
दरअसल आतंकवादियों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितने इंसानों की हत्या की है। उनकी रुचि इस बात में रहती है कि उनके कृत्य की चर्चा कितनी हुई। इसलिए कहा जा सकता है कि आतंकवादियों के सबसे करीबी दोस्त टीवी एंकर और पत्रकार होते हैं। जिस आतंकवादी घटना को गंभीरता और धैर्य से बताया जाना चाहिए था, उसको लेकर टीवी एंकरों में होड़ सी लग गई, कि कौन कितने ऊँचे शोर भरे अंदाज़ में लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। हर टीवी एंकर पंचम सुर से तो अपनी बात शुरू करता है, लेकिन बात के अंत तक पहुँचते-पहुँचते सरगम हारमोनियम से बाहर निकल जाती है।
इस युद्ध की स्थिति में भारत और पाकिस्तान तो दो दल हैं ही, क्योंकि दोनों के बीच युद्ध हो रहा है। यहाँ और भी अन्य पहलू जुड़ने को तैयार हैं। भारत के विपक्षी दल; पाकिस्तान के विपक्षी दल; भारत के टीवी एंकर; पाकिस्तान के टीवी एंकर; और विदेशों के पत्रकार एवं टीवी एंकर। यानी कि युद्ध एक और दृष्टिकोण पाँच।
पहलगाम में आतंकवादी हमला होते ही (मैं इसे हत्या नहीं मानता। मेरे हिसाब से यह नरसंहार है – जेनोसाइड), भारत की विपक्षी पार्टियां वर्तमान सरकार पर राशन-पानी लेकर चढ़ गई थीं। सोशल मीडिया पर भी अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा के अनुसार लेखक, कवि, पत्रकार शोर मचाने लगे थे। कोई भी ये नहीं समझ पा रहे है कि किसी भी क्रिया की प्रतिक्रिया करने में समय लगता है।
नवंबर 1970 में पूर्वी पाकिस्तान में जनसंहार किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस समय के थल सेनाध्यक्ष सैम मानकेशॉ से तुरंत एक्शन लेने के लिये कहा। सैम मानेकशॉ ने बहुत शालीनता, मगर दृढ़तापूर्वक जवाब दिया कि यदि युद्ध जीतना है और पाकिस्तान के टुकड़े करने हैं तो उन्हें कम से कम छ: महीने का समय चाहिए। इंदिरा जी सैम बहादुर से बहुत नाराज़ हुईं, मगर सैम ने अपने हिसाब से काम शुरू किया और नतीजा हम सबके सामने हैं। हालांकि बुढ़ापे में सैम मानेकशॉ को अपने इस निर्णय का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ा।
मैंने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा था – “इंसान को बोलना सीखने में 5 साल लगते हैं, मगर कब नहीं बोलना, यह सीखने में पूरी उम्र गुज़र जाती है।” हमारे पढ़े-लिखे कवि और लेखक भी सोशल मीडिया पर शोर मचा रहे थे – “आख़िर यह हमला हुआ कैसे? कहाँ थी हमारी सेना? सरकार ने सुरक्षा क्यों नहीं प्रदान की?”
सच तो यह है कि कोई भी सेना साल के 364 दिन तक जो हमले नाकाम करती रहती है, उनकी कोई चर्चा नहीं होती। जो एक हमला कामयाब हो जाता है, उसका ठीकरा सुरक्षा बलों पर फोड़ा जाता है। विश्व का कोई भी ऐसा देश नहीं है, जिसके नाम आतंकवादी घटनाओं के मामले में सौ प्रतिशत सफलता का रिकॉर्ड दर्ज हो। इज़राइल किसी संयुक्त राष्ट्र की बात नहीं सुनता और उसके पास सबसे शक्तिशाली गुप्तचर एजेसी है – वहाँ भी हमास ने आतंकवादी हमला कर ही दिया।
याद रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली शपथ 26 मई 2014 को ली थी। 8 जून 1980 से लेकर 12 मई 2014 तक भारत में कुल 90 आतंकवादी हमले हुए थे। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 11 वर्षों में 31 ऐसे हमले हुए हैं। हमें देखना यह है कि वर्तमान सरकार का आतंकवाद को लेकर रवैया क्या है। भारत यदि इस समय पाकिस्तान से युद्ध की स्थिति में खड़ा है तो इसका कारण आतंकवादी घटना ही है। क्या मोदी काल से पहले कभी आतंकवादी घटना को इतनी गंभीरता से लिया गया था?
वर्तमान ऑपरेशन सिन्दूर के नाम को लेकर भी विपक्षी दलों और सोशल मीडिया के पुरोधाओं ने मीन-मेख निकालना शुरू कर दिया। टी.आर.पी. बढ़ाने के लिये टीवी चैनल जोकरों की बारात बुला कर खड़ी कर देते हैं, जो बिना सोचे समझे, जो मुँह में आता है, बोलते चले जाते हैं। वहाँ कोई विषय पर नहीं बोल रहा होता। सबके सब जो घर से याद करके आए होते हैं, वही बोलते चले जाते हैं। नेता चाहे भारतीय जनता पार्टी के हों, या फिर विपक्षी दलों के, बोलने से पहले कोई सोचता ही नहीं। इस समय की यह माँग थी कि हम भारत के प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री की बात सुनें। उन्हें देश का नेतृत्व करने के लिए चुना गया है। यदि हम उनको काम ही नहीं करने देंगे, तो सही नतीजे निकलेंगे कैसे? जिन लोगों को जल, थल और वायु सेना के काम के बारे में रत्ती भर जानकारी नहीं, वे अचानक रक्षा विशेषज्ञ की तरह सलाह देते हैं – और वह भी चीख़-चीख़ कर।
प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने तमाम मंत्रियों, सचिवों एवं सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के साथ कई मुलाकातें कीं। दो सप्ताह निरंतर विमर्श के बाद ही ऑपरेशन सिंदूर लाँच किया गया। पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर और पंजाब के नौ ठिकाने चुने गये, जहाँ आतंकवादी कैंप चलाए जा रहे थे। इस बात का ख़्याल रखा गया कि किसी फ़ौजी ठिकाने पर हमला न हो जाए। इतनी सूक्ष्मता से निशाने साधे गये कि ठीक ठिकाने पर ही बम्ब गिरे। अबकी बार पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल को सुबूत माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
मगर, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत के समाचारपत्र दि हिन्दू की पत्रकार विजेयता सिंह ने पाकिस्तानी प्रोपेगंडा फैलाने वाली एक ख़बर प्रकाशित कर दी। इस ख़बर में उन्होंने झूठ परोस दिया कि पाकिस्तान द्वारा तीन रफ़ाल विमान गिरा दिए गए। यह एक गंभीर मामला है। सुना है कि उन पर अलग-अलग धाराओं में केस चलाया जाएगा। हालांकि बाद में यह पोस्ट हटा दी गई, मगर उन्हें समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा एक गंभीर मामला है कोई मज़ाक नहीं है।


पूरा लेख पढ़ा। बहुत अच्छे बिंदु उठाकर आपने चौतरफा तीर छोड़कर कई बातें समझा भी दीं व सुझा भी दीं। हम सभी की यही प्रार्थना है कि देश को आतंकवादी घटनाओं से निजात मिले।
हार्दिक आभार सुधा।
हम कभी भी युद्ध नहीं चाहते लेकिन आतंक से मुक्ति जरूर चाहते हैं चाहें वो किसी भी रूप में मिले, और इस इस बार तो आतंक की सारी पराकाष्ठा ही आतंकवादियों ने लांघ ली तो यह स्ट्राइक बनती है खैर अब युद्ध विराम हो गया है…
बहुत सही प्रश्न उठाने और उसकों समझने वाले एक अच्छे आलेख के लिए शुभकामनायें सर जी
बहुत शुक्रिया सीमा।
अभी अभी प्रकाशित पुरवाई पत्रिका का संपादकीय लगभग इलेट्रॉनिक मीडिया से हमकदम हैं।सही शीर्षक के साथ युद्ध एक पहलू अनेक!!!!
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी ने तुरत फुरत समग्रता से इस संपादकीय को लिखा।स्वतंत्रता पूर्व और आज तक का पाकिस्तान का इतिहास और उसकी शैतानियत का पूरा ब्योरा सटीक और सारगर्भित अंदाज़ में दिया है।
हमारे नेतृत्व के शीर्ष आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ने दिखा दिया कि युद्ध मानसिक दृढ़ता और कौशल से लड़े जाते हैं।उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ा,आंतरिक और बाह्य यानी विपक्ष और पाकिस्तान और उसके दोस्तों से भी। सभी को नाथ लिया और उन्हें उनके राष्ट्र धर्म की और कर्तव्य की याद दिलाई?!
बस एक फायदा हमारा आतंकी फैक्ट्री वाला पड़ोसी उठा गया यथा आई एम एफ से क़र्ज़ लेने में कामयाब हो गया है।
फिलहाल सीजफायर है और यह भी श्रेय वर्तमान सरकार,देश की एक जुटता को जाता है। संगठित हैं तो बचेंगे,यही नज़ीर है वर्तमान परिस्थितियों के परिपेक्ष्य में।
पुरवाई पत्रिका परिवार और सुप्रसिद्ध कहानीकार एवं संपादक जी को बधाई और इस बार व्यक्तिगत रूप से भी।
इस सार्थक एवं गंभीर टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई सूर्यकांत जी।
सम्पादकीय को पढ़ ही रही थी कि आजतक न्यूज चैनल से रजत शर्मा कह रहे हैं कि पाकिस्तान के ड्रोन ने श्रीनगर के आसपास सीज़फायर का उल्लंघन कर दिया है ।धोषणा हुए अभी5घँटे भी नहीं हुए और देखिए। ।आगे देखते हैं मध्य रात्रि तक क्या दृश्य नज़र आने वाला है । संकट यथावत है ।
Dr Prabha mishra
जी, यह अमरीकी सीज़फ़ायर भी चीनी क्वालिटी का निकला। दो घंटे में टूट गया।
युद्ध पर सभी बिंदुओं को लेकर लिखा गया एक अच्छा समदकीय, हालांकि पाकिस्तान ने सीज फायर तोड़ दिया है, वो शाम होते ही ड्रोन हमला शुरु कर दिया है अब भारत क्या करेंगा देखने वाली बात होगी
बहुत शुक्रिया आलोक।
आपकी की इच्छा पूर्ण हो गई है युद्ध नियंत्रण में है वैसे युद्ध कोई नहीं चाहता किंतु जब पानी सर से ही ऊपर हो जाए तब क्या ही किया जा सकता है। किन्तु युद्ध अकेला नहीं आता अपने साथ बहुत सारी त्रासदी लेकर आता है। बस भगवान से ये ही प्रार्थना है कि सब जल्द अच्छा हो जाए।
जय हिन्द जय भारत
बिल्कुल सही कहा अंजु। युद्ध कोई नहीं चाहता। मगर जब थोप दिया जाए, तो युद्ध के धर्म का भी पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए।
जिस प्रकार किसी कमरे की ने नींव चार खामबो की मजबूती पर टिकी होती है, इस प्रकार आपका संपादकीय हर दृष्टिकोण से मजबूत दिखाई देता है, युद्द् किसी भी देश के लिए कभी उचित नहीं रहे हैं, परंतु जब बात बेगुनाहों के प्राणों पर बन जाय तो जवाब देना , सबक सिखाना तो बनता ही है,
ये सच हे कि ऐसी विकट स्थिति में देश की मीडिया,विपक्ष,साहित्यकार, लेखक,पत्रकार एवं जनता को अपना पक्ष रखना चाहिए ,लेकिन फिलहाल जो टीवी पर चैनलों पर हम देख रहे हैं ? क्या वे हल दे रहे हैं अथवा जनता को विषम परिस्थिति में भड़काने का कार्य कर रहे हैं? हमे समझना चाहिए ऐसे समय में हम एक जुट होकर रहें ,न कि खुद को प्रकाश में लाने के लिए देश के नागरिकों में गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की सोचें ,
आपकी सर्वोत्तम बात सभी के लिए अनुकरणीय ,सोचने योग्य, की आदमी को बोलना सीखने के लिए लगभग चार वर्ष लग जाते हैं,मगर कब नहीं बोलना है या क्या बोलना है,यह जिंदगी बीतने पर भी ,कोई कोई व्यक्ति कभी नहीं समझ पाते
ये देश ही हमारा शीश है ,मित्रों
संपादकीय को ज्यादा से ज्यादा पढ़े मनन करें चिंतन करें।
प्रिय तेजेंद्र सर एक सटीक सधा हुआ संपादकीय लिखने के लिए साधुवाद
आभार पुरवाई पत्रिका को
कुन्ती जी, पूरा प्रयास रहता है कि भाषा और कॉन्टेंट के हिसाब से संपादकीय में संतुलन बना रहे। पत्रकारिता के धर्म से परिचित हूं। आपकी टिप्पणी बेहतरीन है। हार्दिक धन्यवाद।
परिपक्व , निष्पक्ष और संतुलित संपादकीय।
काश !कि भारत के विपक्षी दल के लोग भी ऐसे संपादकीय पढ़ पाते और उन पर मनन करते।
जहां तक इस्लामिक आतंकवाद की बात है उससे बचने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपा कर अपने को धर्मनिरपेक्ष बताते रहना इसका हल नहीं है। सारी दुनिया गवाह है कि “आतंकवाद का तो धर्म नहीं “होता लेकिन “एक धर्म में आतंकवाद”
अवश्य है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि इस बार के ‘युद्ध- विश्राम’ से भारत अब विश्व में अपनी स्थिति कुछ और मजबूत करें और कुछ ना कुछ हासिल करें इस बार शिमला समझौते और ताशकंद समझौते की तरह कोई समझौता करके छूंछे हाथों ना रह जाए।
जय हिन्द ,जय भारत
सरोजिनी जी संपादकीय को पूरे परिप्रेक्ष्य में पढ़ना और उसमें से रेलेवेंट मुद्दे उठाना – आपकी टिप्पणी की विशेषता है। हार्दिक आभार।
आप की बात से सहमत हूं लेकिन अभी समाचार मिला की पाकिस्तान ने युद्ध विराम को तोड़ते हुए जंग का आगाज किया है.
बहुत बढ़िया संपादकीय
बधाई
धन्यवाद विजय भाई।
आज का संपादकीय युद्ध एक, पहलू अनेक… मैं कयास लगा रहा था कि इस हफ्ते के संपादकीय का विषय कुछ ऐसा ही होगा। कयास तो सही निकला। इसको प्रकाशित करते समय यह भी खबर आ गई कि भारत पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो चुका है। संपादकीय के अंत में आपने इसका जिक्र भी किया है। लेकिन तीन घंटे बाद सीजफायर उल्लंघन की भी खबर आ गई है।
आतंकवाद केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए ख़तरनाक है। पाकिस्तानी आतंकवाद पर आपने जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर आज तक के जनरलों और हुक्मरानों तक की फितरत को संदर्भों के साथ संपादकीय में स्पष्ट कर दिया है। युद्ध की स्थिति में चैनलों और चैनल में बैठे जोकरों पर आपका तंज बेजा नहीं है। बहुत ही सटीक और सत्य के निकट है।
तेजेन्द्र सर जी समसामयिक विषयों पर आपकी संपादकीय बेजोड़ रहती है। तथ्यों के साथ आप अपनी बात कहने में सिद्धहस्त हैं। बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी, आप जिस बारीकी से संपादकीय पढ़ते हैं और बेहतरीन टिप्पणी करते हैं, काबिल-ए-तारीफ़ है। हार्दिक आभार।
नमस्ते सर
जिस गंभीरता से संपादकीय (“मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि हिंदू कभी भी हमारे साथ नहीं रह सकते, वे हम लोगों के दुश्मन हैं।” उनकी यह सोच जीवन पर्यंत उनके साथ रही, कभी बदली नहीं। 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिए गए भाषण में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के ख़िलाफ़ एक हज़ार साल के युद्ध की घोषणा की थी। ये वही इंसान थे, जिन्होंने कहा था कि हम घास की रोटी खा लेंगे मगर एटम बम्ब बना कर रहेंगे।
पाकिस्तानी नागरिकों को उस समय यह अहसास नहीं रहा होगा, कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को सचमुच घास की रोटी खानी पड़ेगी।)
आरंभ होता है और उसके बीच में जिस तरह आपने संपादकीय के बीच में (टीवी एंकरों में होड़ सी लग गई, कि कौन कितने ऊँचे शोर भरे अंदाज़ में लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। हर टीवी एंकर पंचम सुर से तो अपनी बात शुरू करता है, लेकिन बात के अंत तक पहुँचते-पहुँचते सरगम हारमोनियम से बाहर निकल जाती है।) हास्य का तड़का आपने लगाया है लाजवाब है। संपादकीय पढ़कर आनंद तो आया ही साथ ही कई मायनों में इतिहास की समझ भी बढ़ाई आपने।
इन सबके इतर चूंकि मैं आध्यात्मिक किस्म का व्यक्ति हूं तो सब ग्रह नक्षत्र का खेल भी मानता हूं। अभी इस साल बहुत सी ऐसी घटनाएं होंगी जो आम लोगों के लिए विचित्र होगी। फिर दूसरी तरफ समय आ गया दुश्मनों को नेस्तनाबूद करने का इसमें हमें भी बहुत हद तक नुकसान होगा किंतु दुश्मन की कमर क्या सबकुछ टूट जायेगा।
शानदार संपादकीय
भारत माता की जय
आप सकुशल रहें, स्वस्थ रहें
तेजस आपने संपादकीय को गहराई से पढ़ा और उसमें आध्यात्म का एंगल जोड़ा, इससे पाठकों के लिए नये कोण उभर कर सामने आए। जब युवा पीढ़ी पुरवाई से जुड़ती है तो एक अद्भुत संतुष्टि का अहसास होता है।
जब कृष्ण अंतिम कोशिश के रूप में शांति संधि के लिए हस्तिनापुर जा रहे थे तो द्रोपदी ने बड़ी ही व्याकुलता से कृष्ण से पूछा था कि “केशव, तो अब युद्ध नहीं होगा” !!
कृष्ण ने उस समय द्रोपदी से कहा था,” तुम मुझ से ज्यादा दुर्योधन पर विश्वास रखो, वो मेरी हर कोशिश को नाकाम कर देगा”
बस सीजफायर उल्लंघन के बाद यही याद आ रहा है
बहुत खूब
धन्यवाद अंजु।
महाभारत का यह उदाहरण एकदम सटीक बैठता है आज की स्थिति पर।
सादर अभिवादन सर
हर बार की तरह एक और विश्लेषणात्मक संपादकीय । हर पहलू पर गहनता से विचार करके प्रस्तुत करना आपके हर संपादकीय की विशेषता रहती है सर । सीजफायर फिर से शाम को वापिस तोङ दिया गया , आपको भी विदित होगा
हार्दिक आभार रेणुका। स्थिति काफ़ी volatile है।
खरी खरी कहने वाला संपादकीय। इसके लिए बधाई।
आतंकवाद का धर्म होता है। आतंकवाद के जुर्म में किसी को फांसी मिले तो उसे ओसामा की तरह लाश को समुद्र में फेक देना चाहिए। आतंकवादी का धर्म और उस धर्म के फरिश्ते चिल्ला चिल्ला कर बोलेंगे – आतंक का धर्म।
आपका आक्रोश समझ आता है भाई हरिहर जी।
संतुलित विश्लेषण। सच तो यह है कि पाकिस्तान का निर्माण ही हिन्दुओं के प्रति नफरत के आधार पर हुआ था। यह रवैया आज भी नहीं बदला है यह पाकिस्तान के जरनल असीम मुनीर के बयान से सिद्ध होता है। आपने विपक्षी सांसदों के इस पूरी घटना पर अपरिपक्वता को सैम मनिकशा का उदाहरण देते हुए कहा है कि युद्ध की योजना बनाने में समय लगता है, यह पूर्णतः सत्य है। मुझे तो कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का खिलौने वाले एरोप्लेन पर राफेल लिखकर नीबू मिर्च लटकाकर मीडिया पर आकर सरकार पर व्यंग्य कर सुर्खियों में आते देखकर आश्चर्य हुआ था। मुझे तो समझ में नहीं आता कि मिडिया ऐसी खबरों को महत्व ही क्यों देती है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता किन्तु पहलगाम की घटना तो यही सिद्ध करती है। हिंदू ही इतना सहिष्णु है कि इस घटना के पश्चात् भी कहीं कोई हिंसक आंदोलन नहीं हुआ वरना नूपुर शर्मा के एक बयान पर सिर कलम करने का फरमान सुना दिया गया था।
आपने सही कहा कि किसी भी एक्शन के लिए मज़बूत सेना के साथ-साथ मज़बूत नेतृत्व की भी ज़रूरत होती है।
भारत के पास मजबूत नेतृत्व भी है और इच्छा शक्ति भी लेकिन ऐसी क्या मज़बूरी थी कि ट्रम्प के कहने पर भारत को सीज फायर की घोषणा करनी पड़ी लेकिन यह भी सच है कि कुत्ते की दम कभी सीधी नहीं होती…
यह सच है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। युद्ध सदा विनाश की ओर ले जाते हैं, देश का विकास भी रुकता है।
आपके संपादकीय युद्ध एक पहलू अनेक ने बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया है। साधुवाद आपको।
सुधा जी, आपने संपादकीय को समग्रता में समझते हुए एक सार्थक और विस्तृत टिप्पणी लिखी है। इससे पाठकों को संपादकीय समझने में सहायता मिलेगी।
विचारणीय लेख
भारत सदैव रहता युद्ध के विरुद्ध
सही कहा संगीता।
घाटी में धर्म के आधार पर हुआ नृशंस नरसंहार , आपरेशन सिंदूर, सीमा के तनाव, देश के अंदर और बाहर की ओछी राजनीति,आई एम एफ की अबौद्धिक दरियादिली, समझौते और दगाबाजी- आसन्न घटनाक्रम को पूरी शताब्दी के ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ प्रस्तुत करने वाला प्रबुद्ध सम्पादकीय।
हार्दिक आभार मधु जी।
तेजेन्द्र भाई: यह सब जानते हुए भी कि मुसलमानों के दिल में हिन्दुओं के लिए नफ़रत भरी हुई है और इसी बात को लेकर देश का बटवारा “टू नेशँज़ थ्योरी” के आधार पर हुआ था तो फिर क्यों बटवारे के टाइम पर मुसलमानों को भारत में रहने दिया। नेहरू और गाँधी की इस हिमाकत का स्वाद आज सारे भारत वासियों को चखने को मिल रहा है। पहलगाँव के इस नरसिंहार ने आतंकवादियों का धर्म और उनकी जात बता दी है। चाहे जिन्नाह हो या भुट्टो हो या अयूब खाँ हो या ज़िया उल हक हो और या फ़िर आसीम मुनीर हो; यह सब दरिन्दे हैं। इनकी DNA में तो बाप का ख़ून करके तख्त पर बैठना भी जायज़ है। भारत की सब से बड़ी समस्या तो अपने देश में बैठे ग़द्दार हैं जो अपनी कुर्सी के लिये मुसलमानों का तुष्टीकरण करने से बाज़ नहीं आते। इन लोगों को शायद मालूम नहीं कि जिन मुसलमानों की वोटों से यह कुर्सी पर विराजमान हैं वही मुसलमान वक्त आने पर इनकी वो ठुकाई करेंगे जैसे ज़िया उल हक ने भुट्टो की की थी।
पहलगाँव में जो क्रूरता इन जानवरों ने दिखाई थी और जिस दृढ़ निश्चय से आदरणीय मोदी ने भारतीय सेना को आदेश देकर इनको इन की औकात दिखादी है वो एक सच्ची इंसानियत की जीती जागती तसवीर है। पाकिस्तान में बसे आतंकी तो वहाँ पर पूजे जाते थे। आतंकियों की दफ़नाने की बहुत सारी तसवीर सामने आई हैं और उन में वर्दी पहने हुए सेना के अफ़सरों का होना इस बात की पुख़ती करता है कि यह सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। अपनी स्पीच में आज मोदी जी ने देश को बताया कि हमारी लड़ाई तो केवल आतंकवाद को जड़ से समाप्त करना है। हम सेना के अड्डों को या फिर आम जंता पर कोई हमला नहीं करेंगे। इसे कहते हैं भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति और भारतीय चरित्र। और दूसरी तरफ़ कमीने पाकिस्तानी जिन्होंने न केवल भारत के मन्दिरों और गुर्द्वारों पर हमला किया बल्कि अपनी तरफ़ से जंता को भी नहीं बख्शा। समय आगया है कि इस साँप का सिर एक दम कुचल दिया जाए। मोदी जी, इन थोड़े बहुत गद्दारं को छोड़कर, सारा देश आपके साथ है। बस अब कुछ दिन की बात और है। मोदी जी का दृढ़ निश्चय आब इनका काल बन कर आगया है और जल्दी ही यह लोग जहन्नुम में चक्की पीस रने होंगे। ****भारत माता की जय़****
भाई विजय विक्रान्त जी, लगता है कि इस बार के संपादकीय ने आपके दिल की भावनाओं को झिंझोड़ दिया है। आपने पूरे मन से अपने विचार इस टिप्पणी में उंडेल दिये हैं। हार्दिक आभार।
‘युद्ध एक पहलू अनेक’ सम्पादकीय का यह शीर्षक ही बहुत कुछ बयां कर जाता है. तदनुरूप सम्पादक महोदय जी ने अपनी लेखनी को चौतरफा चलाते हुए अनेक पहलुओं पर संतुलित भाष्य किया है. स्थिति का सही एवं सटीक विश्लेषण किया है. सम्पादकीय में प्रस्तुत आंकड़े, घटनाओं का ज़िक्र, मानसिक सोच आदि पहलुओं पर बारीकी से अध्ययन किया गया है और अपनी बात की पुष्टि की है. वाकई तेजेन्द्र भाई बड़ी गम्भीरता और गहनता से अपनी बात को रखते हैं और एक नया परिदृश्य पाठकों के सामने खड़ा कर देते हैं. यह एक जागरूक सम्पादक की पहचान है. भाई जी मेरा अभिनंदन स्वीकार करें.
जय हिंद
रमेश भाई, प्रयास रहता है कि आपकी भावनाओं को भी अपने शब्दों में प्रस्तुत कर सकूं। आपकी प्रतिक्रिया बता देती है सफलता मिली या नहीं। बहुत शुक्रिया।
‘युद्ध एक पहलू अनेक’ सम्पादकीय का यह शीर्षक ही बहुत कुछ बयां कर जाता है. तदनुरूप सम्पादक महोदय जी ने अपनी लेखनी को चौतरफा चलाते हुए अनेक पहलुओं पर संतुलित भाष्य किया है. स्थिति का सही एवं सटीक विश्लेषण किया है. सम्पादकीय में प्रस्तुत आंकड़े, घटनाओं का ज़िक्र, मानसिक सोच आदि पहलुओं पर बारीकी से अध्ययन किया गया है और अपनी बात की पुष्टि की है. वाकई तेजेन्द्र भाई बड़ी गम्भीरता और गहनता से अपनी बात को रखते हैं और एक नया परिदृश्य पाठकों के सामने खड़ा कर देते हैं. यह एक जागरूक एवं प्रबुद्ध सम्पादक की पहचान है. भाई जी मेरा अभिनंदन स्वीकार करें.
जय हिंद
समकालीन परिवेश में लिखा गया बेहतरीन लेख हार्दिक शुभकामनाएं
हार्दिक आभार संगीता।
Your Editorial sums up so well the present times of tensions n anxieties in the light of this Indo- Pak war which may have got a pause at the moment.
You have also mentioned the manner in which the war events were questioned by foreign correspondents.
Thanks n warm regards,Tejendra ji
Deepak Sharma
Thanks so much for your guiding remarks Deepak ji. We do wait for your reaction!
सामयिक परिस्थितियों के संदर्भ में लिखा गया आपका यह सम्पादकीय बहुत विचारपूर्ण एवं सारगर्भित है। कृपया साधुवाद स्वीकारें। आतंकवाद से आतंकित बने रहने की बजाय उसका समूल विनाश करना आज बहुत ज़रूरी है।
आज रक्षा के क्षेत्र में बहुत ही चौकस रहने की ज़रूरत है।
हमें हमारी सैन्य शक्ति पर भरोसा है। सकारात्मक परिणामों की हमें आशा रखनी चाहिए।
आज बहुत ग़लत सलत टाइप होकर सामने आ रहा है। यह क्या तकनीकी मज़ाक है।