‘जोहात्सु’ शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है, जो सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक दबाव के कारण बिना अपना कोई निशान छोड़े अपने वर्तमान जीवन से छुटकारा पाना चाहते हैं और एक नई पहचान के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करना चाहते हैं। जापान में कुछ कंपनियाँ हैं, जिन्हें ‘नाइट मूविंग’ कंपनी कहा जाता है, ये इंसान को ‘जोहात्सु’ बनने में सहायता पहुँचाती हैं, जिसके वे दाम भी वसूलती हैं। वे कंपनियाँ व्यक्ति के वर्तमान जीवन की हर पहचान को मिटा देती हैं, और एक नया ठिकाना और माहौल उपलब्ध करा देती हैं।
1950 में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी- ‘आरज़ू’। इस फ़िल्म के कलाकार थे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल। गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, और संगीतकार थे- अनिल बिस्वास। शाहिद लतीफ़ के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म का एक गीत था, जिसे तलत महमूद ने गाया था। गीत के एक अंतरे की पंक्तियाँ कुछ यूँ कहती हैं- “जा कर कहीं खो जाऊँ मैं / नींद आए और सो जाऊँ मैं / दुनिया मुझे ढूँढे/ मगर मेरा निशां कोई न हो।”
जीवन की आपाधापी में कई ऐसे पल आते हैं, जब व्यक्ति ये सोचता है कि काश सब कुछ छोड़ कर वह इस दुनिया से कहीं दूर चला जाए… जहाँ उसे कोई न जानता हो और न ही दुनियादारी का कोई झंझट उसे सताए। ‘पुरवाई’ के पाठकों को यह बताना चाहेंगे कि इंसान की ये कल्पना इसी दुनिया में साकार हो रही है…
पिछले कुछ दिनों से जापान के बारे में कुछ शोध कर रहा था, तो मुझे इस गीत की बहुत शिद्दत से याद आई। एक शब्द बार-बार मेरे ज़ेहन में उभर का आ रहा था – ‘जोहात्सु’! जापानी भाषा के इस शब्द का अर्थ है- ‘भाप की तरह उड़ जाना या वाष्पीकृत हो जाना’ । जापान में दुनियादारी से परेशान कुछ लोग अब ‘जोहात्सु’ बन कर गायब हो रहे हैं ।
‘जोहात्सु’ शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है, जो सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक दबाव के कारण बिना अपना कोई निशान छोड़े अपने वर्तमान जीवन से छुटकारा पाना चाहते हैं और एक नई पहचान के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करना चाहते हैं। जापान में कुछ कंपनियाँ हैं, जिन्हें ‘नाइट मूविंग’ कंपनी कहा जाता है, ये इंसान को ‘जोहात्सु’ बनने में सहायता पहुँचाती हैं, जिसके वे दाम भी वसूलती हैं। वे कंपनियाँ व्यक्ति के वर्तमान जीवन की हर पहचान को मिटा देती हैं, और एक नया ठिकाना और माहौल उपलब्ध करा देती हैं।
जापान में गोपनीयता के कानून ख़ासे सख़्त हैं। वहाँ की पुलिस किसी लापता इंसान की तलाश तब तक नहीं करती, जब तक कि उसके विरुद्ध किसी प्रकार की अपराधिक गतिविधि की रिपोर्ट न की गई हो, या फिर उस पर किसी प्रकार का शक न हो। ‘जोहात्सु’ शब्द का इस्तेमाल 1960 के दशक में समाजशास्त्री हिरोकी नाकामोरी ने सबसे पहले किया था, जब लोग अचानक ग़ायब होने लगे थे। अब तो यह जापान की संस्कृति का एक हिस्सा बन गया है।
हम अवश्य जानना चाहेंगे कि आख़िर वे क्या कारण हैं कि इंसान अपनी वर्षों में अर्जित की गई पहचान को भुला देना चाहता है? दरअसल ‘जोहात्सु’ के कारण लगभग वे ही हैं, जो किसी इंसान को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। यदि हमें कोई सूची बनाना हो कि कोई इंसान ‘जोहात्सु’ क्यों होना चाहता है, तो पहला कारण तो भारी कर्ज़ या आर्थिक दबाव ही माना जाएगा। आर्थिक दबाव का मतलब यही है कि इंसान के पास कमाई का कोई ज़रिया नहीं और ख़र्चे वही हो रहे हैं, जो अच्छे दिनों में होते थे।
जीवन में नाकामी, सामाजिक अस्वीकृति, परिवार में तनाव भी इंसान को ‘जोहात्सु’ बनने के लिए प्रेरित करते हैं। जापान के लोग तलाक़ के लिए कानून रास्ते अपनाने से कहीं अधिक ग़ायब होने को बेहतर मानते हैं | क्योंकि वहाँ तलाक़ की प्रक्रिया ख़ासी जटिल होती है। भावनात्मक और मानसिक समस्याओं से बचने का भी यह एक रामबाण तरीका है।
‘जोहात्सु’ बनने वाला व्यक्ति अपना बैंक खाता और डिजिटल पहचान पूरी तरह से ग़ायब कर देता है। वह घर परिवार और अपने कार्यालय को बिना कुछ बताए बस सीन से ग़ायब हो जाता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के दशक में नाइट मूविंग कंपनी शुरू करने वाले शो हतोरी का कहना है कि लापता होने के पीछे का कारण हमेशा नकारात्मक नहीं होता। बहुत से लोग तो नई नौकरी या नई शादी के चक्कर में भी ‘जोहात्सु’ बन जाते हैं।
एक मज़ेदार किस्सा यह भी है कि एक नाइट मूविंग कंपनी चलाने वाली एक महिला खुद 17 साल से लापता है! वह घरेलू हिंसा से तंग आ चुकी थी… इसके बाद वह खुद गायब हो गई। अब वह दूसरे लोगों को अपनी ही तरह ग़ायब होने में सहायता करती है। यहाँ तक कि वह ग़ायब होने के इच्छुक लोगों से इसका कारण भी नहीं पूछती। एक व्यक्ति अपने परिवार से यह कह कर निकला था कि वह बिज़नेस ट्रिप पर जा रहा है। जबकि सच यह है कि वह ‘जोहात्सु’ बनने के लिए निकला था। उसे परिवार से अलग होने का दुःख अवश्य है, मगर अब वह उनके पास वापस नहीं जाना चाहता है ।
42 वर्ष के एख शख़्स ने अपनी रामकहानी सुनाते हुए बताया कि, “मैं इंसानी रिश्तों से तंग आ चुका था, तो मैंने एक छोटा सूटकेस लिया और ग़ायब हो गया।” ‘जोहात्सु’ बनने वाला तो नई ज़िंदगी की राह पर बढ़ जाता है, लेकिन उसके पीछे रह गए लोग उसे तलाशते रहते हैं। कई बार वे इन सवालों के जवाब भी तलाशते रह जाते हैं कि आखिर जाने वाले ने ऐसा क्यों किया? लेकिन भाप बनकर उड़ जाने वालों को भला इसकी परवाह कब होती है!
स्वामी रामदेव ने भी इस विषय पर अपनी राय प्रकट की। वे कहते हैं, “मुझे तो इस पर एक पुराना गाना याद आ रहा है ‘संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे।’ अब वे ठहरे योग गुरू। इसलिए वे ‘जोहात्सु’ को भी अस्वस्थ शरीर के साथ जोड़ते हुए कहते हैं – “आप बेशक घर-परिवार-समाज छोड़ दें। अपने लिए नई पहचान, नई दुनिया तैयार कर लें, लेकिन अगर आप अपनी खराब सेहत से परेशान हैं तब क्या करेंगे? सेहत तो आपके साथ-साथ साए की तरह चलेगी और वह तो अच्छी आदतों से ही सुधरेगी। कहने का मतलब ये है कि अगर आप अपनी जिंदगी अपनी सेहत से परेशान हैं, तो भागिए नहीं मुसीबतों से लड़ना सीखिए, अपनी परेशानियों का इलाज ढूँढिए।”
‘जोहात्सु’ बनाने वाली एजेंसियाँ $350 से $2,100 के बीच ख़र्च करवाते हैं। यह रेट कुछ स्थितियों पर निर्भर करते हैं जैसे कि ग्राहक का सामान, यात्रा की दूरी, रात में स्थानांतरण, बच्चों के शामिल होने, या लेनदारों से बचने की आवश्यकता। इसी आधार पर रेट तय किया जाता है।
इस विषय पर पिछले वर्ष एक मार्मिक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई थी। इसका एक प्रमुख केंद्र जापान की सबसे प्रसिद्ध नाइट मूवर्स कंपनियों में से एक-योनिगेया TSC की संस्थापक साइता हैं। सुरक्षा कारणों से वे केवल अपने उपनाम से ही जानी जाना पसंद करती हैं। स्वयं साइता भी एक ‘जोहात्सु’ हैं। उनकी कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह संगठन देश का “घरेलू हिंसा और पीछा करने की घटनाओं की पीड़िताओं द्वारा संचालित एकमात्र निजी संगठन” है।
धंधे की शुरूआत एक फ़ोन कॉल से शुरू होती है, जिसमें शुरूआती विवरण पर चर्चा होती है। फिर आमने-सामने वाली मुलाक़ात होती है। यदि ऐसा करना सुरक्षित हो, तो ग्राहक के घर पर ही यह मीटिंग रखी जाती है, ताकि संस्था उस जगह के बारे में बेहतर जानकारी हासिल कर सके जहाँ से उनका ग्राहक भागना चाहता है। एक बार तमाम बातों पर सहमति हो जाने के बाद ग्राहक को एक गुप्त स्थान पर स्थानांतरित करने की तैयारी शुरू हो जाती है।
इस प्रक्रिया का अंतिम चरण ही वह जगह है- जहाँ से फ़िल्म शुरू होती है। शुरुआती दृश्य में हम, साइता और एक कर्मचारी को एक कार में, एक ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार करते हुए देखते हैं, जो एक अपमानजनक रिश्ता ढो रहा है और अपने घर से भागने की फ़िराक में हैं। कुछ ही मिनटों बाद वह ग्राहक (जिसका चेहरा दिखाया नहीं जाता) जल्दी से गाड़ी में बैठ जाता है, और वे तेज़ी से गाड़ी चलाकर चले जाते हैं। उसकी साथी नहाने गई थी और वह ‘जोहात्सु’ बन कर एक नई दुनिया में नया जीवन जीने के लिए निकल पड़ा था।
इस विषय को लेकर सवाल बहुत से खड़े किए जा सकते हैं- जापानी समाज के बारे में भी और इंसानी रिश्तों और ज़िम्मेदारी निभाने के बारे में भी। सवाल यह भी उठता है कि ‘जोहात्सु’ तो ग़ायब हो जाएंगे, मगर उनके पीछे छूट गए लोग क्या करेंगे… क्या उनके द्वारा पैदा की गई स्थितियों से वे अकेले जूझते रहेंगे.. क्या ‘जोहात्सु’ प्रथा भारत जैसे देश में अपनाई जा सकती है? वैसे तो मियां ज़ौक भी कह गये… “मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे?” अब किसी शायर को ‘जोहात्सु’ के बारे में भी एक नया शेर गढ़ना होगा!
दुनिया मुझे ढूंढे मगर मेरा निशां कोई न हो…जोहात्सु का ज्ञान आपने बहुत विस्तृत रूप में दिया। हैरान हूं जानकर।
दोबारा पढ़ूंगी। आपको साधुवाद !
हार्दिक आभार वीणा जी।
It’s an interesting and informative article, and it also reminds me of when T-Mobile changed its name from One2One.
In India, something a bit similar is Sanyas, when someone leaves everything behind. I guess every country has its own version, just called by different names. Thanks for sharing,
Thanks so much Pooja for your meaningful response.
पुरवाई के इस अंक में …..
“जोहात्सु “ के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई ।जापान में प्रचलित इस प्रथा के कारणों पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है ।
सामाजिक प्रथाओं के लिहाज़ से “ जोहात्सु “ एक तरह से जीवन -संघर्षों से पलायन ही है ।समस्याओं का समाधान असंभाव्य होने की स्थिति में ऐसी प्रथाएं प्रचलित होती हैं ।इसमें एक तरह से व्यक्ति अपने मनोभावों का समूचा रूपान्तरण करता है -बिलकुल नये कलेवर में ।
जापान में “जोहात्सु “ के अभ्युदय और विकास की कड़ियों को संपादक तेजेंद्र शर्मा जी ने सिलसिले वार उदाहरण देकर नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं को रेखांकित किया है ।प्रारब्ध का परिणाम और नवीन की चिंताएँ “ जोहेत्सु “ के लिए भले त्याज्य हों , सामाजिक चिंता तो बढ़ती ही है ।ऐसी स्थितियां बहुत मार्मिक भी होती हैं ।
भारतीय समाज को आज की भौतिकता के जद्दोजहद में संपादक ने प्राश्निक के रूप में एक तरह से आगाह किया है ।
सही बात तो यह है कि “ जोहेत्सु “ जैसी प्रथा भारत ही नहीं ,दुनिया में कहीं के लिए ठीक नहीं है – प्रथा या प्रचलन के नज़रिए से ।असल में ऐसी समस्याओं के मूल कारकों का समाधान होना अत्यंत आवश्यक है ।ऐसी प्रथाओं को निर्मूल कर ही वैश्विक मानव जीवन को बेहतर बनाया जा सकेगा ।जीवन से पलायन , विफलता ही है ।स्वरूप अलग -अलग हो सकता है ।प्रथा के रूप में तो नहीं, घटना के रुप में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते रहे हैं ।
वैसे एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर सम्पादक ने ध्यान खींचा है ।
यह बधाई की विषयवस्तु नहीं है ।कहा जा सकता है,
सम्पादक की दूरदर्शिता का प्रमाण है ।
मीनकेतन प्रधान
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
21/9/25
प्रिय भाई मीनकेतन जी, आपने संपादकीय को बहुत गंभीरता से पढ़ा है और सामाजिक दृष्टिकोण से उस पर सार्थक टिप्पणी भी की है। आपकी बात से सहमत हूं।
नाइट मूवर्स कंपनियां व जोहात्सु के बारे में जानना सर्वथा एक नई जानकारी है। अगर इसका सकारात्मक पहलू देखें तो आत्महत्या से बेहतर है लेकिन नकारात्मक पहलू पर तो बहुत कुछ है कहने के लिए। पीछे रहने वालों को एक शून्य में छोड़ देना… अपने आप में ही अपराध है। समस्याओं से पलायन भगोड़ा करता है और इसकी सजा उसके अपने भुगतते हैं। आपके संपादकीय से बहुत जानकारी बढ़ती है।
सुधा आपने दोनों स्थितियों को सही रेखांकित किया है।
” ज़िन्दगी देने वाले सुन, तेरी दुनियाँ से दिल भर गया !
मैं यहाँ जीते जी मर गया ! ”
ये सोच नई नहीं है ! अपने हालात से इनसान हमेशा से परेशान होता रहा है और आगे भी होता रहेगा ! ज़ोहत्सु से निबटने के लिए उसकी हिम्मत कितनी विकसित हुई है! हालात से लड़ने का बौद्धिक विकास कितना हुआ है! विषय गम्भीर है और गहन विचारणीय है! नाइट मूविंग इसका निवारण नहीं है! मनोवैज्ञानिक स्तर पर शोध कार्य आवश्यक है !
धन्यवाद कैलाश भाई।
बहुत ही अच्छा इंफॉर्मेटिव एंड इंट्रेस्टिंग आर्टिकल है। मैंने पहले कभी नहीं ये शब्द सुना रहा।
सारिका, ‘पुरवाई’ पत्रिका का प्रयास रहता है कि जीवन से जुड़े अनछुए पहलू भी अपने पाठकों की पहुंच तक लाए जाएं।
कुछ दिनों पहले एक मूवी देखी थी, three of us… उसमें जयदीप अहलावत का चरित्र ,अपने गायब हुए पिता के खाने के रोष, और मिल जाने की आशा के बीच पेंडुलम सा झूलता दिखता है, वह दृश्य और यह लेख, दोनों कहीं आ कर मिल जाते हैं।
साथ में, भारतीय समाज जहां अभी तक ” choosing myself over everything” वाली सोच का कब्ज़ा नहीं हुआ है, जोहात्सु जैसी प्रथा कब तक मान्य होगी कहना मुश्किल है।
रोचक विषय!
आस्था आपने जयदीप अहलावत की फ़िल्म से जोड़कर संपादकीय को भारतीय परिवेश से जोड़ दिया है। हार्दिक धन्यवाद।
सादर नमस्कार सर…
बहुत ही सुंदर और गहन विचार से परिपूर्ण संपादकीय है। यह सत्य है कि हम अपनी स्थिति से कभी कभी विरक्त हो जाते हैं पर मानसिक स्तर पर यदि दुर्बल हो जाए तो ऐसी भावनाएँ आती हैं.. इससे लड़कर सामना किया जा सकता है… किसी मनोवैज्ञानिक की राय ली जा सकती है….
हम स्वयं ही ऐसी परिस्थिति को जन्म देते हैं जाने अनजाने में.. और कोई उपाय नहीं मिलता इससे मुक्ति पाने का…
आप सदैव समस्या के साथ समाधान भी बता देते हैं अपने लेख में…. सभी वर्ग के पाठकों को ऐसी स्थिति की जानकारी देने हेतु साधुवाद…
अनिमा आप पूरी शिद्दत से नये संपादकीय की प्रतीक्षा करती हैं और अपनी टिप्पणी से हमारा हौसला बढ़ाती हैं। आपकी बात से सहमत।
जोहात्सु के बारे में जानना नया किन्तु अजब ज्ञान है, ये निश्चित रूप से समस्याओं से भागना ही हुआ।
ठीक कहा आपने आलोक भाई।
आदरणीय संपादक महोदय ने इस बार भी एक नई जानकारी हमारे समक्ष प्रस्तुत की है । पढ़ कर बहुत अच्छा लगा फिर भी मन में एक प्रश्न है? कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान, नाम , फेम सब वाष्पित कर सकते हैं इस जोहात्सु के माध्यम से , लेकीन क्या वह अपने मन , मस्तिष्क व मानसिकता को बदल सकेगा? क्या मनोवैज्ञानिक तौर पर यह हो सका है? क्या यह प्रणाली अपने कर्तव्य और ज़िम्मेदारी से भागने की नहीं है। जैसे बाबा राम देव ने इसे शारीरिक बिमारी या स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा है। वैसे ही यदि हम इसे भारतीय समाज की दृष्टि से देखें तो यह सामाजिक पलायन है। आप अपनी पहचान, नाम सब बदल सकते हैं पर इन सभी के बाद भी आप आप ही रहेंगे ।
ऋतु, आपने अपनी टिप्पणी में संपादकीय पर गहरी दृष्टि डाली है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेंद्र जी ,
नमन है आपको इस अत्यंत रोचक प्रथा(?)/ व्यवसाय से हमें परिचित कराने का।
आपको नमन करने के बाद नमन करती हूं उस देश जापान को जिसने ‘हाराकिरी’ और ‘किन्शुगी’ प्रथाओं के बाद इस नए ‘जोहात्सू’का प्रचलन अपने समाज में चलाया।
संभवत: जब से मानवीय सभ्यता का विकास हुआ तब से जीवन में पारिवारिक और सामाजिक असुरक्षा और उससे
विरक्ति का भाव शाश्वत चला आ रहा है। शुद्धोधन सुत सिद्धार्थ संभवत: विश्व के पहले जोहात्सू का पालन करने वाले मनुष्य थे, जो विश्व में पूजित भी हुए।
जब तक मनुष्य घर गृहस्थी से ऊब कर, उससे भाग कर मुक्ति पाना चाहे उस अवस्था तक पहुंचने पर हमारी संस्कृति ने वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था कर दी थी।
घर छोड़कर संन्यासी होने की परंपरा तो भारत में बहुत प्राचीन है हमारे आदि शंकराचार्य ने भी तो यही किया था। आज के हमारे भारतवर्ष के प्रधानमंत्री माननीय श्री मोदी ने भी तो परिवार छोड़कर नवयौवन की अवस्था में ही हिमालय की ओर ,कुछ समय के लिए ,प्रस्थान किया था। यह सभी जोहात्सू ही तो कर रहे थे। पूर्ण रूप से नहीं तो आंशिक ही सही,!!
मानसिक रूप से ‘जोहात्सू’ के उदाहरण तो काव्य साहित्य में भरे पड़े हैं-
ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहां कोई ना हो’
तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं ए मालिक बुला ले।
कबिरा खड़ा बजार में लिए लुआठी हाथ जो घर फूंकै के आपना चलै हमारे साथ।
तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला मैं बहुत दूर ,बहुत दूर ,बहुत दूर चला।।
हम छोड़ चले हैं महफि़ल को, याद आए कभी तो मत रोना।।
तो साहब संसार से ऊब कर भागने वाले तो बहुत हैं परंतु जो पीछे रह गए उनके बारे में सोचने वाले बहुत कम । जो उनके बारे में सोचते हैं वे जोहात्सू नहीं करते। विविधता से खड़े रहकर संसार का सामना करते हैं।
हां मानवी ‘पीड़ा ‘/ निराशा/हताशा से पैसे बनाने का गुर तो कोई जापानियों से सीखे।।
सब बुद्धि और भाग्य का फेर है।
सरोजिनी जी, आपकी टिप्पणी रुचिकर भी है और गंभीर भी। वो शैलेन्द्र ने कहा है ना – “जो जिससे मिला सीखा हमने, गैरों को भी अपनाया हम ने…”
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।
जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !
हार्दिक आभार भाई जय शंकर जी।
क्या कहने भ्राता श्री बहुत ही शानदार
थैंकूज़ कपिल!
“जोहात्सु के बारे में सुनकर मुझे बहुत अजीब लगा। अपने लोगों को छोड़कर एक ऐसी दुनिया में चले जाना, जहां सब कुछ फिर से नए सिरे से शुरू करना पड़े—यह ठीक नहीं लगता। मेरा मानना है कि हमें जिस दुनिया में हैं, उसी को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
यह मेरा व्यक्तिगत विचार है।
आपने जो जानकारियाँ साझा कीं, उन्हें पढ़कर अच्छा लगा। इससे एक नई बात जानने और सीखने का अवसर मिला।
धन्यवाद सर ☺️
मंजुश्री, आपकी सोच एक सधे हुए संतुलित व्यक्ति की सोच है। मगर जो सच है उसे जानना भी आवश्यक है। हार्दिक धन्यवाद।
नई जानकारी के लिए धन्यवाद।
भारत में सदा समझा जाता रहा है कि भौतिक वातावरण के साथ साथ मनोदशा और आत्मिक उत्थान से व्यक्तित्व बदलता है। यह संन्यास की अवधारणा का मूल है।
(फिर पलायन और पाखंड हर जगह प्रविष्ट हो जाता है।)
जहां संन्यास के रूप में जोहात्सु स्वीकृत संस्था हो वहां प्राइवेट कंपनियों की गुंजाइश नहीं।
जी भाई हरिहर जी!
“तेजेन्द्र शर्मा जी का यह लेख ‘जोहात्सु’ प्रथा पर सूक्ष्म और मार्मिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह न केवल जापानी समाज में दबाव और संरचनाओं को उजागर करता है, बल्कि इंसानी मन की गहन उलझनों और अकेलेपन की पीड़ा को भी सामने लाता है। लेख पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या भागना वास्तव में समाधान है, या रिश्तों, जिम्मेदारियों और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखना ही असली चुनौती है। इसके साथ ही यह याद दिलाता है कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति से पीछे छूटे रिश्तों और भावनाओं की कीमत क्या होती है। इस प्रकार यह लेख सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक दृष्टि से सोचने पर विवश करता है और पाठक को अपनी ही ज़िंदगी और समाज की जटिलताओं पर चिंतन करने का अवसर देता है।
सुनीता जी आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैंं। आपने कहा है कि, “यह लेख सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक दृष्टि से सोचने पर विवश करता है और पाठक को अपनी ही ज़िंदगी और समाज की जटिलताओं पर चिंतन करने का अवसर देता है।” – आपका हार्दिक आभार।
‘जोहात्सु’ शब्द का अर्थ बताते हुए आपने बताया है कि जापान में सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक दबाव के कारण जो लोग अपने वर्तमान को भुलाकर नया जीवन प्रारम्भ करना चाहते हैं उन्हें ‘जोहात्सु’ कहा जाता है।
ऐसे लोगों की सहायता के लिए नाइट मूविंग नामक कंपनी की अस्तित्व में आ गई हैं। वे कंपनियाँ व्यक्ति के वर्तमान जीवन की हर पहचान को मिटाकर उसे नये जीवन नया परिवेश देती हैं. अपनी इस सेवा के लिए ये एजेंसियाँ $350 से $2,100 वसूलती हैं। पता नहीं ये कम्पनियां इंसान को वाष्पीकृत कर उसका भला कर रहीं हैं या उसका शोषण कर बिजनिस कर रही हैं। आखिर इंसान अपनी परेशानियों से मुक्त होने के लिए कब तक भागेगा?
क्या ऐसा इंसान वाष्पीकृत एक बार होगा या बार -बार? मेरा मानना है कि यह स्थिति इंसान के मानसिक असुंतलन को द्योतक है या दूसरे शब्दों में अवसाद का।
इंसान एक भावुक एवं संवेदनशील प्राणी है। वह चाहकर भी न अपने अतीत से भाग सकता न ही अपने अतीत से जुड़े लोगों से। अगर कोई ऐसा कहता या करता है तो मेरा मानना है कि वह झूठ की दीवार खड़ी कर रहा है।
एक नये विषय से पाठकों से परिचित कराने के लिए साधुवाद।
सुधा जी आपने कहा है कि, “मेरा मानना है कि यह स्थिति इंसान के मानसिक असुंतलन को द्योतक है या दूसरे शब्दों में अवसाद का। इंसान एक भावुक एवं संवेदनशील प्राणी है। वह चाहकर भी न अपने अतीत से भाग सकता न ही अपने अतीत से जुड़े लोगों से।” यह एक बेहतरीन दृष्टिकोण है। हार्दिक धन्यवाद।
भँवर का सर न चकराए, न दिल लहरों का डूबे
ले कश्ती आप कर दी मैंने , तूफ़ां के हवाले ।
Dr Prabha mishra
वाह प्रभा जी।
आज का सम्पादकीय गम्भीर और विचारणीय तो है ही, नवीन एवं रोचक भी है।आज जापान में जोहात्सु प्रथा एक व्यवसाय के रूप में पनप रही है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं। सामाजिक, आर्थिक अथवा व्यक्तिगत कारणों से डरकर भाप बनकर छुप जाना, समस्याओं का हल नहीं हो सकता। यह पलायन नकारात्मक है। पीछे रह जाने वाला परिवार नई समस्याओं से जूझने के लिए बच जाता है। फिर वे जोहात्सु हो जाएँगे । पलायन के पीछे कोई विशेष लक्ष्य हो तो वह सकारात्मक हो जाता है। आदि शंकराचार्य, सिद्थार्थ या मोदी जी आदि उनके पलायन का उद्देश्य था। नई-नई जानकारियाँ देने के लिए साधुवाद।
सुदर्शन जी आपने जोहात्सु की तुलना आदि शंकराचार्य, सिद्धार्थ और मोदी जी से की है… साथ ही आपको नई जानकारियों ने ख़ुशी भी दी है। हार्दिक धन्यवाद।
इस बार का संपादकीय-“दुनिया मुझे ढूंढे मगर…! एक ऐसे विषय को लेकर लिखा गया है जिसमें कुछ मानव विषम परिस्थितियों से मुकाबला न कर पाने के कारण वे पलायन का रास्ता अपना लेते हैं। खासकर जापान जैसे देश में इसका चलन काफी है। इसे उस भाषा में जोहात्सु कहा जाता है।
संपादक जी ने इस प्रवृत्ति को घटना की अपेक्षा मानव के मनोविज्ञान को टटोलने की कोशिश की है। मेरी समझ में यह कोशिश काफी सफल कही जाएगी।एक मनुष्य अपने पहले के व्यक्तित्व को त्यागकर रुपए खर्च करके दूसरा व्यक्तित्व धारण कर लेता है। ‘नाइट मूविंग’ जैसी कंपनियां इस काम को गोपनीय तरीके से करती हैं।यह केवल शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी बदलाव हो जाता है।
इस संदर्भ में जब आप ये प्रश्न उठाते हैं कि वह अपने परिवार को भूल पाता है या नहीं। उसके परिवार वाले क्या सोचते हैं, ये चीजें बहुत देर तक दिमाग में टकराती रहती हैं।
इस विषय पर बनी कुछ फिल्मों के उदाहरण यह तस्दीक करती है कि लोगों को इस बारे में जानकारी है या फिल्म के माध्यम से दी जा रही है।
, भारतीय फिल्मों के गाने भले ही जोहात्सु को लेकर नहीं रचे गए हैं पर आपने उनको इस विषय में संदर्भित कर दिया है। उनकी सटीकता ऐसी है जैसे सच में इसी के लिए रचे गए हैं ये गाने।
बाबा रामदेव का दार्शनिक मत भी कम मारक नहीं है। आदमी रूप बदल सकता है पर शरीर की बीमारी तो न बदल जाएगी। बीमारी रूप देखकर नहीं आती है कि हमने रूप बदल लिया है तो वह हमें पहचान नहीं पाएगी। बाबा रामदेव के मतानुसार आप कितने भी रूप बदलो, स्वस्थ रहना है तो योगा करना पड़ेगा। हां भाई, बाबा रामदेव तो अपने में अडिग हैं
भारत के लोग कठिन परिस्थितियों से हार जाते हैं तो आत्महत्या कर लेते हैं पर जापानी लोग पहली जिंदगी को छोड़कर दूसरी जिंदगी जीने लगते हैं।
सही तो है, मरना क्या इतना आसान है! इसके लिए न जाने कितने कुओं से होकर गुजरना पड़ता है तब अपने आपको खत्म कर पाते हैं। पत्नी का क्या होगा, बेटे बेटियां कहां जाएंगे, ये उस समय दिमाग में तूफान मचाते हैं। भयंकर द्वंद्व चलता है, फिर जिसकी जीत होती है उसी का परिणाम सामने होता है।
फिलहाल जोहात्सु मेरे लिए एकदम नया विषय है। इस संपादकीय के पहले मैंने न तो इसे सुना था और न उसके सिस्टम की जानकारी थी।
विषय व संपादकीय दोनों बढ़िया है। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखनलाल पाल जी आपने संपादकीय का विश्लेषण करने के बाद कहा है कि – “फिलहाल जोहात्सु मेरे लिए एकदम नया विषय है। इस संपादकीय के पहले मैंने न तो इसे सुना था और न उसके सिस्टम की जानकारी थी। विषय व संपादकीय दोनों बढ़िया है। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।”… पुरवाई का प्रयास रहता है कि आप जैसे सुधि पाठकों के लिये नये नये विषय लेकर आए।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
हर बार आपके संपादकीय सिर्फ देश ही नहीं दुनिया के भी अजीबोगरीब विषयों से रूबरू करवाते हैं।कभी-कभी चौंकाते ही नहीं… डराते भी हैं। चिंतित होना तो लाज़मी है। यह एक बिल्कुल नई खबर है!
यह बात बिल्कुल सही है कि कभी-कभी जीवन की आपाधापी में ऐसा मन होता है कि सब छोड़कर कहीं ऐसी जगह चले जाएँ, जहाँ कोई न जानता हो ना पहचानता हो, लेकिन थोड़ी देर के लिए जाना और हमेशा के लिए जाना; दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर है।
बड़ा आश्चर्य यह है कि वहाँ नाइट मूविंग नाम से कंपनी है जो इस काम को करने में मदद करती है।और इसके लिये वो कंपनियाँ दाम वसूलती हैं।
एक पल के लिए आपकी कहानी ‘कब्र का मुनाफा’ याद आ गई।
अपने पुराने जीवन को पूरी तरह भूलकर दुनिया की नजरों में गुम होकर नए जीवन की चाहत या शुरुआत!… अपेक्षाओं के फल कितने कड़वे और कितने मीठे! यह तो खाने के बाद ही पता चलता है!
सच कहा जाए तो यह एक बेहद चिंतित कर देने वाला विषय है। ईश्वर करे कि जापान तक ही सीमित रहे। यह बाज़ारवाद की एक नई पाठशाला है। गुम होने के बाद गुमशुदा लोग जहाँ जा रहे हैं वहाँ क्या हो रहा है? यह तो बाहर किसी को भी नहीं पता!
यह सर्वाधिक चिंता है। इसके लाभ तो पता नहीं हैं पर नुकसान ज्यादा महसूस हो रहे हैं। इससे अपराधों के बढ़ने की संभावना भी है। सामने वाला तो गुम हो गया। कोई उसे मार कर अंगों का व्यापार भी कर सकता है तो किसी को क्या पता चलेगा? क्या यह संभव नहीं?
यह जानकारी भी हमारे लिए आश्चर्यजनक है कि लापता लोगों को जापान में नहीं ढूँढा जाता जब तक कि वह किसी आपराधिक मामले में लिप्त न हो। कितनी अजीब बात है! कैसे-कैसे कानून हैं भई! घरेलू हिंसा वाली बात तो समझ में आती है लेकिन जोहात्सु का ही चयन क्यों?
यह बात तो सही है कि जाने वाला तो चला जाएगा लेकिन उसके पीछे जो कुछ उसने किया है उसको भुगतने वालों का क्या होगा? उनकी चिंता, परेशानी, अपनापन और उसके बाद आप उनके लिए जो परेशानियाँ छोड़ कर आए हैं उसकी तकलीफ़, मुश्किलें, उनका क्या? भारत में तो क्या कहीं भी ऐसा नहीं ही होना चाहिये।
इंसान की अपनी कमजोरी ही उसे ‘जोहात्सु’ बनने के लिए मजबूर करती है। आपकी कमजोरी से आपका आत्मबल कमजोर होता है । और कमजोर को दबाने में सभी समर्थ होते हैं। जो सामने ताकतवर है वह उसका लाभ उठा सकेगा और किस रूप में उठाएगा इसकी कोई गैरंटी नहीं।
विवेक कहता है कि जिन रास्तों की जानकारी नहीं है उस रास्ते पर नहीं जाना चाहिये।और जो इस रास्ते पर जानबूझकर निकलता है वह हिम्मत वाला होता है। पर यहाँ तो यह बात ही उल्टी है। जो उन अनजान रास्तों पर जा रहा है उसका तो स्वयं का ही आत्मबल कमजोर है।
दुनिया में अच्छे लोगों की कमी है जो आपका हित सोच सकें। आज का जनमानस लाभ की नीति पर चलने वाली सोच रखता है।… यह तो सीधे-सीधे अपने आप को मृत्यु के मुँह में धकेलने जैसा है!
कितनी अजीब बात है कि जिस दुनिया में जी रहे हैं, देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, जिसके बारे में सब मालूम है। जहाँ सब अपने हैं, उससे जूझने के बजाय उसे छोड़कर ऐसी दुनिया में प्रवेश करना जिसकी एबीसीडी का भी कोई ज्ञान नहीं है!
इससे तो भारतीय संस्कृति बेहतर लगती है। यहाँ गुरु परंपरा का यदि निर्वाह किया जाए तो रास्ता दिखाने के लिए परिवार नहीं तो गुरु तो होता है।
बहरहाल यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ जिंदगी जुएँ की तरह नजर आती है।
इस संपादकीय ने तो इतना डराया कि दिमाग में जोंक की तरह चिपक गया। हताशा की किस हद पर पहुँचकर इंसान यह कदम उठाता होगा… पता नहीं।
यह बिल्कुल आत्महत्या करने जैसा ही है! बस यही वह नाजुक स्थिति रहती है जहाँ किसी के थाम लेने की आवश्यकता होती है जो प्रेरणा-पुंज बनकर सामने आ जाए, संभाल ले। सेल्फ कॉन्फिडेंस बहुत जरूरी है यह जानना जरूरी है कि – “गिरना नहीं है गिर के संभालना है जिंदगी।”
ज़ौक ने सही कहा कि,” “मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे!”
पता चला “आसमान से गिरे खजूर पर अटके”
न इधर के रहे न उधर के।
जब हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम फेंका गया था और उसके बाद अत्यधिक मुश्किल क्षणों में भी जिस तरह उन्होंने अपने आप को संभाला, वह काबिल-ए-तारीफ था ! उस जापान को जितना हम जानते थे आज इस संपादकीय को पढ़ने के बाद उसके लिये अफसोस ही हो रहा है।
वाकई यह बहुत दुखद है, बहुत दुखद। यह प्रत्यक्ष रूप से न दिखाई देने वाला अणु बम है भविष्य इसके दुष्प्रभाव देखेगा।
दुनिया की इस तरह कीअनजान खबरों से रूबरू करवाने के लिए तेजेन्द्र जी! आपका शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
धन्यवाद आदरणीय।
तेजेन्द्र भाई: जापान की जोहात्सु रीति के बारे में जानकारी के किए बहुत बहुत साधुवाद। विपरीत हालातों को देखते हुए इंसान जोहात्सु बनने का कदम तो उठा लेते हैं और ‘नाइट मूविंग’ जैसी कंपनियाँ, एक फ़ीस लेकर, उनकी पुरानी पहचान को बिल्कुम समाप्त करके एक नई पहचान बनाने में मदद तो करती हैं लेकिन इस नए बदलाव के साथ जो रहते हैं उसका success rate क्या है, इस बारे में यह आंकड़े उपलब्ध हैं क्या? इतना बड़ा कदम उठाने से पहले क्या जोहात्सु बनने वालों को कोई cooling period दिया जाता है या नहीं।
अपने इस सम्पादकीय का निचोड़ आपके अंतिम पैराग्राफ़ में है कि जोहास्तु लेने वाले तो ग़ायब हो जाएँगे लेकिन जिनको मुसीबत में पीछै छोड़ जाएंगे उनका क्या होगा? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है।
विजय भाई, इस संपादकीय को लिखते समय मैं भी ख़ासी भीतरी हलचल से गुज़रा हूं।
जितेन्द्र भाई: अपने comments अपलोड करने से पहले मेरे दिमाग़ में भी बहुत हलचल थी। फिर भी हिम्मत करके पोस्ट कर दिया।
सर जी यही तो हिम्मत करवा लेती है।
प्रिय संपादक महोदय!
जोहात्सु शब्द पहली बार जाना। मेरा 40 वर्षो से एक जापानी भाई है जिसका विवाह मेरे घर से ही कोटा के एक पँजाबी परिवार की लड़ंकी से लगभग 30 वर्ष पूर्व हुआ था।
तकाशी शिनोदा अब 3 युवा बेटियों का पिता है और 4 ग्रैंड संस का नाना!बहुत मस्त है अपने परिवार के साथ। इस बार आया तो इतना प्रसन्न था कि मैं क्या परिवार ही उसकी बातें सुनकर, उसके चेहरे पर इतनी प्रसन्नता देख अभिभूतथा और आश्चर्य चकित भी!
कारण था,टोकियो की जिस यूनिवर्सिटी से वह एक शोध कर रहा है, उसके लिए उसने 100 वर्ष तक अपना नाम पक्का कर लिया है।
अभी तो वही कर रहा है, ऊसके बाद थहाँ सेंट ज़ेवियर्स से उसके विषय पर काम करने वाले कुछ युवा प्रोफ़ैसर्स मिल गए हैं जिन्होने अपने छात्रोँ को इस योजना पर काम करने के लिए टीम बना ली है जो 100वर्ष तक उसके नाम से इस प्रजोक्ट पर काम करेगु. यानि 100 वर्षों तक तो उसका शुरु किया गया काम अमर हो ही गया ।
जोहात्सु के बारे में जानकर मेरा दिमाग़ तुरंत दोनो स्थितियों का मिलान करने लगा। एक ओर एक आदमी बाद में भी बना रहना चाहता है और दूसरी ओर उसी परिवेश का इंसान स्वयं के नाम को ज़िंदा सोचने की कल्पना से फूला नहीं समा रहा तो उसी परिवेश का दूसरा बंदा जीते जी ग़ायब होने की प्रकिया में व्यस्त है।
सच में इस दुनिया में जितने लोग, उतने दिमाग़!
प्रश्न यह भी सामने आया कि जो हमारा देश चरैवेति!चरैवेति!में पूर्ण आस्था रखता है उसके समक्ष यदि यह चिंतन होगा तो क्या उसके लिए यह दुविधा जनक नहीं होगा?
वर्तमान स्थिति एक दूसरे पर हावी होने में कहाँ देर लगाती है? शीनोदा से इस विषय पर चर्चा करने का भाव उत्पन्न हो रहा है। उसने कितनी ही बातें मुझसे साझा की हैं। इस शब्द व उसके पीछे की संवेदना कितनी अजीब व प्रचुर
है!
मनुष्य कहीं भी चला जाए, अपने इस जुड़ाव से कैसे पूरी प्रकार मुक्त हो सकता है? मैं तो उलझन में हूँ, बहुत सारे प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।
आपको साधुवाद
आदरणीय प्रणव जी, आपने शीनोदा के विषय में बता कर हमारे मन में भी उत्सुकता जगा दी है। आप उनसे अवश्य चर्चा कीजियेगा। अंग्रेज़ी में कहते हैं ना – From the Horse’s mouth!… फिर अपनी बातचीत हमारे साथ साझा कीजियेगा।
जी अवश्य, धन्यवाद
जोहात्सु… महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद
आपका स्वागत है संगीता जी।
‘जोहात्सु’ व ‘नाइट मूविंग’ की अवधारणाओं के विषय में जानकारी देते हुए आप ने जिन फ़िल्मी गीतों व मनोवैज्ञानिक संकल्पनाओं के संदर्भ दिए हैं, उन्हों ने आप के इस संपादकीय को अतिरिक्त गहराई प्रदान कर दी है। हम पाठकों को चौंकाने के साथ-साथ मानव- जन की मनमौजी प्रकृति पर मनन करने को भी आप का यह संपादकीय हमें बाध्य करता है।
धन्यवाद व शुभ कामनांए, तेजेन्द्र जी।
दीपक जी, आपकी टिप्पणी हमारे लिये हमेशा महत्वपूर्ण होती है। हार्दिक आभार।
जोहात्सु शब्द मेरे लिए नया है मैने इसे गूगल बाबा से पूछा तो वाष्पीकरण या गायब हो जाना है। जब पूरा लेख पड़ा तो पता चला की जीवन से पलायन है संपादक महोदय ने इतने विस्तार से उदाहरण देकर प्रस्तुत किया कि बातें समझ में आई।आज से बीस वर्ष पहले मेरे एक मित्र के पिता जो एक प्रतिष्ठि पुस्तक दुकान के मालिक थे नवयुग साहित्य मंदिर वो अचानक ही सबकुछ छोड़कर चले गए।मेरा गुरुकुल बैद्यनाथधाम से आर मित्र उच्य विद्यालय में नामांकन हुआ पुस्तक खरीदने क्रम में उनसे जान पहचान हो। गई वो मुझसे अपने पुत्र जो मेरा सहपाठी था रंजन उसके पढ़ाई के बारे पूछा करते और चिंतित भी रहते क्योंकि वह पढ़ने में मन लगाता था उन्हें लगता था कि रंजन नहीं पढ़ेगा तो उनके विरासत को नहीं सम्हाल पाएगा। यही कोई बात जनवरी 1990की रही होगी मै सुबह उनसे मिलने गया पुस्तक भी खरीदनी थी उनके दुकान और घर में कोहराम मचा हुआ था पता चला। चंदर चाचा कही चले गए आज तक उनका कुछ भी पता नहीं चला मै उस घटना को यहां याद करता हूं तो लगता है चन्दर चाचा जोहात्सु हो गए। जापान जैसे विकसित राष्ट्र में आम बात हो गई है जो भयावह है।
लेकिन है हिंदुस्तानी बचपन से यह गीत सुनकर बड़े हुए की दुनिया में आएं तो जीना पड़ेगा जीवन।अगर झर है तो पीना ही पड़ेगा ।अभी भी हिंदुस्तानी प्रायद्वीप में सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था इतनी दुरुस्त है कि जोहात्सु की संख्या कम होगी ।
सम्पादक महोदय द्वारा पुरवाई के हरेक अंक में। सामायिक शब्दों और घटनाओं से रूबरू करवाते है उनका ज्ञान और कल्पनाशीलता को सलाम
भाई सिंह साहब, आपने अपने निजी जीवन से एक घटना का उदाहरण देकर चन्दर चाचा का जोहात्सु होने के बारे में बताया। इन्सान पर दबाव इतने अधिक बढ़ गये हैं कि समझ ही नहीं आता कि इन्सान जाए तो जाए कहां।
मेरे लिये तो बिल्कुल नयी जानकारी है जोहात्सु। हलांकि कुछ अन्य स्वरुपों में तनिक विभिन्नता के साथ यह प्रवृत्ति हमारे यहां भी है। जैसे जोगी संन्यासी बन जाना। सांसारिक पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त एक अनजान जिन्दगी। वानप्रस्थ प्रस्थान भी ऐसा ही उपक्रम है। गौतम बुद्ध भी तो सब कुछ छोड़ ऐसे ही आत्म निर्वासन को चुना था।
अरविंद भाई, दुनिया में इतना कुछ ऐसा है जिसकी जानकारी हमतक नहीं पहुंच पाती। पुरवाई का एक उद्देश्य ऐसे अनछुए विषयों को खोज निकालना भी है।
आपके संपादकीय से हम देश दुनिया के बारे में नई-नई जानकारी प्राप्त करते हैं। इस बार आपने ‘जोहात्सु’के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। पुरानी पहचान मिटा कर नई जिंदगी जीने वालों
के बारे में तो सुना है, जो देर- सबेर पकड़े भी जाते हैं और कई बार नहीं भी किंतु इसके पीछे कोई संस्था कार्य-रत हो, यह जानकारी विस्मयकारी है। यह उचित चिंता है कि जोहात्बसु नने वाले तो अपने कष्टमय जीवन से मुक्ति पा जाएंगे किंतु उनके पीछे परिवार का क्या होगा? यह तो पलायन वृत्ति हो गई ,जो किसी तरह सराहनीय नहीं है। जापान के लोग अपनी कर्मठता के लिए ,देश -प्रेम के लिए जाने जाते हैं और वहां इस तरह की पलायन वृत्ति, यह बहुत निंदनीय है।
एक नई जानकारी युक्त संपादकीय के लिए हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें।
विद्या जी जो लोग जवानी में सन्यास ले लेते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं – उनके पीछे परिवार का जो हाल होता है वो इससे कुछ ख़ास अलग नहीं होता… सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
यूं तो अक्सर सवाल भी आप हो जवाब भी आप ही रहते हो पुरवाई की हर दिल अजीज संपादकीय में ,
हर दिल अजीज यूं कि
देश जहां, की नवीनतम बातों की जानकारियां ,परेशानियां वर्तमान की ,चिंता कल की क्या होगा,कैसे निपटा जाएगा
मास्टर की ,मास्टर माइंड प्रिय तेजेंद्र सर है ना ,
वैसे हर हाल में आपका शुक्रिया बनता है कि
आपके सानिध्य में हम कॉन्चम कॉन्चम
याने थोड़ा थोड़ा इंटरनेशनल दिमाग के होते जा रहे हैं
जोहात्सु ,
बिना शक एकदम नई जानकारी लेकिन समस्या पुरानी, मेरे ख्याल से 70% से ऊपर लोगों के दिमाग में यह बात जरूर आती होगी कभी ना कभी की ए मेरे दिल कहीं और चल गम की दुनिया से दिल भर गया ढूंढ ले अब कोई घर नया,
परंतु बाकायदा कोई संस्था इसके लिए कार्य करें यह एक नई बात पता चली, अब बताइए धन्यवाद बनता है या नहीं बनता? आपको इस ग्रुप में मेरे ख्याल से 80% लोगों को यह बात
पता नहीं होगी,
इसीलिए तो हम कह रहे हैं कि हम भी कुछ आपके साथ इंटरनेशनल होते जा रहे हैं
वैसे हमारे भारतवर्ष में पुरुषों में पलायनवादी प्रथा ज्यादा रही है ,जैसे
ईश्वर को प्राप्त करना हो तो हिमालय पर चले जाओ
एक लड़के की चाह में 6लड़कियां हो गई तो कौन पाले,भाग जाओ,
घर में जिम्मेदारियां का बोझ हो तो छोड़-छाड़ कर भाग जाओ, निकम्में हो तो बाबा बन जाओ ,
भीख मांग कर खाओ
लेकिन मैंने जहां तक देखा है भारत में स्त्रियां कम भागती है, पति छोड़कर चला भी जाए तो झाड़ू पोछा करके बच्चों का पेट पाल लेंगी , भागेगी नहीं, पति निकम्मा हो दरुआ हो तो मेहनत मजदूरी कर
लेंगी,लेकिन परिवार को का पालन करने से पीछे नहीं हटेंगी,
बेटा परिवार का साथ ना दे माता-पिता का ध्यान न रखें लेकिन लड़की अगर होगी तो वह अपने मां-बाप का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी , न जाने कितने कष्ट कितनी घरेलू हिंसा कितना शोषण प्रताड़ना सहकर भी भारतीय स्त्रियां घर को बचाती है, जीवन से पलायन नहीं करती , जोहात्सु बनने की नहीं सोचती,मुसीबत का सामना करती है भारतीय स्त्रियां ,
तो हम सोच सकते हैं अभी कि भारतीय स्त्रियां जोहात्सु बनने से अभी दूर हैं
वैसे संस्था का कार्य अच्छा भी है बुरा भी है
अच्छा यूं की आदमी जीवन ही खत्म करदे उससे बेहतर है कि वह दूसरी पहचान में जिंदा तो रहे, और बुरा इसलिए की जिन परिस्थितियों में आदमी घर छोड़ कर चला जाता है बिना बताए उसके घर वालों पर क्या गुजरती है यह कोई नहीं जान सकता। दूसरा अपराधी भी भाग सकते हैं और अपराधियों को बचाना याने गुनाह करना
सबसे अच्छी बात जवाब में प्रिय तेजेंद्र कर अपने स्वयं कही है कि इंसान को किसी भी समस्याओं से भागना नहीं चाहिए ,
सामना करना चाहिए ,अरे
मरते तो वह भी नहीं है जिनके दोनों हाथ दोनों पैर गल चुके हैं बे भी जीवन की सजा को रेल से कट कर या पानी में डूबकर नहीं खत्म करते, वह भी सोचते हैं की जीवन में प्रभु ने कुछ सजा दी है तो उसे यही काट ले
वरना अगले जन्म में भी कहीं सजा ना भुगतना पड़े
इसलिए जैसा भी कठिन समय आए, जोहात्सु मत बने ,न जीवन को खत्म करें
क्योंकि मर के भी चैन न आया तो फिर कहां जाएंगे ,ठीक है सर परफेक्ट पुरवाई का आभार आपको सेल्यूट
कुन्ती हरिराम झांसी
कुन्ती जी, आपने मज़े ले-लेकर अपनी टिप्पणी लिखी है… शब्द आनंद से सराबोर हैं। पुरवाई अपनी तारीफ़ सुन कर शरमा रही है।
यह रुचिकर संपादकीय पढ़ने के बाद हम अपनी बात मियां ज़ौंक के कथन से ही करेंगे , कि “मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे?” दुनिया से तो इंसान भाग सकता है, ख़ुद से कैसे भाग पायेगा? अपनी कमज़ोरियों, अपनी सोच , व्यवहार और बीमारियों ( मानसिक व शारीरिक दोनों) से कैसे भागेगा? नई जगह पर उसे सुकून और शान्ति मिल जायेंगे, क्या गारंटी है ?
ऐसे सुविधा किसी को भी स्वार्थी और कमज़ोर बना सकती है कि ज़रा सी तकलीफ़ हुई और भाग जाओ… ख़ुद का सोचो , बाक़ी सब भाड़ में जाओ!
यह सच है कि ऐसे दूर चले जाने ख़याल ज़ेहन में आते हैं , हमें तो संन्यास लेने का मन भी हो जाता है लेकिन अपने परिवार और दायित्वों को पूरा किये बिना चले जाना स्वार्थपरक लगता है।
स्थिति से भागने की सुविधा देने के बजाए उससे लड़ने की हिम्मत देना और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान ज़्यादा सही उपचार होता ।
शुक्र है हमारे यहां परिवार नामक संस्था सबसे मजबूत सम्बल है अपने अस्तित्व को बनाये और बचाये रखने के लिए।
आज का सम्पादकीय बिल्कुल नई जानकारी लेकर आया है, इसके लिए आदरणीय तेजेन्द्र सर की शोधपरक दृष्टि/प्रवृत्ति को सलाम है।
रचना जी,आपने कहा है कि – हमारे यहां परिवार नामक संस्था सबसे मज़बूत सम्बल है -… यह सच भी है। आपको संपादकीय में निहित नई जानकारी पसंद आई… यह हमारे लिये महत्वपूर्ण है।