राहुल गाँधी लगातार सरकार पर हमले बोलते रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत सरकार में 90 सचिव हैं, जिनमें केवल तीन ओबीसी समुदाय से आते हैं, और वे सिर्फ पाँच प्रतिशत बजट को नियंत्रित करते हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी आंकड़ों के साथ सबूत पेश करते कि जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार में कुल कितने सचिव थे, और उनमें दलित या ओबीसी की संख्या कितनी थी।
गाँधी जी को लेकर एक कहानी खूब प्रचलित है कि उनके पास एक महिला अपने बच्चे को लेकर गई। उसने कहा, “मेरे बच्चे को मीठा खाने की लत है, आप इसे समझाइए कि यह मीठा खाना छोड़ दे।”
गाँधी जी ने उस महिला को दो महीने बाद आने को कहा। जब वह महिला दो महीने बाद आई, तो गाँधी जी ने उस बच्चे से कहा, “बेटा, ज्यादा मीठा खाना बुरी बात है।”
उस महिला को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह बात तो गाँधी जी पहले दिन ही कह सकते थे… फिर दो महीने इंतज़ार क्यों करवाया! उसने गाँधी जी से पूछ ही लिया, “गाँधी जी, यह बात तो आप पहले दिन ही कह सकते थे। फिर इतनी सी बात कहने के लिए आपने दो महीने क्यों लगा दिए?”
गाँधी जी ने बड़ी ही सहजता से जवाब दिया, “जब आप मेरे पास आई थीं, उस समय मैं भी मीठा खाने का आदी था। पिछले दो महीने में मैंने अपनी वह आदत छोड़ी… उसके बाद ही मैं यह सलाह देने के योग्य हुआ हूँ।”
यह बात कितनी सुंदर और प्रेरक है कि आप तब तक कुछ कहने के हक़दार नहीं हैं, जब तक आप स्वयं उन बातों पर अमल नहीं करते।
आज के राजनेता गाँधी जी के नाम को कैश तो करते हैं, मगर उनके दिखाए गए रास्ते पर चलते नहीं हैं। आज एक ऐसा मुद्दा दिमाग को सोचने पर मजबूर कर रहा है, जिसके बारे में इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की सोच बिल्कुल अलग थी, और राहुल गाँधी ने उसे एक अलग ही मुद्दा बना दिया है।
राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी भारत में जातिविहीन समाज की वकालत करते थे, जबकि राहुल गाँधी उनसे एकदम अलग जातीय जनगणना की बात करते हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने वी.पी. सिंह से मंडल कमीशन को लेकर 6 सितंबर 1990 को लोकसभा में दिए गए एक भाषण में कहा था, “मंडल कमीशन को लागू करने का तरीका मेरे देश को तोड़ने वाला है। इन ‘लेट आवर्स’ में सुझाव है कि इसे वापस ले लिया जाना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा, “इसमें वी.पी. सिंह सरकार के अपने निहित स्वार्थ हैं। देश को इसका बहुत भारी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।”
राजीव गाँधी ने तो यहाँ तक कहा था कि “पिछड़ापन दूर करने के लिए हमें उसकी जड़ तक जाना होगा। केवल जाति की पहचान इस समस्या का हल नहीं है। हमें सबको बराबर का मौका देना चाहिए।” उन्होंने कहा था, “राजनीति करने से समस्या हल नहीं होगी। हम (यानी कि कांग्रेस) पिछड़ापन दूर करने के लिए एक सकारात्मक और विस्तृत योजना बनाने को तैयार हैं।”
राजीव गाँधी ने उसी वक्तव्य में यह भी कहा था, “किसी एक व्यक्ति की ज़िद की वजह से देश को ‘कास्ट वॉर’ में नहीं झोंक देना चाहिए।”
इंदिरा गाँधी ने तो अपने चुनाव का मुख्य नारा ही बना लिया था। 1980 में उन्होंने जातिविहीन समाज की कल्पना करते हुए कहा था- “जात पर ना पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर!”
राहुल गाँधी हर जगह दलितों और पिछड़ों की बात करते हैं। बड़े-बड़े मंचों से कहते हैं कि उन्हें बराबरी का हक मिलना चाहिए। लेकिन उनसे एक सीधा सवाल है-“क्या ये बातें सिर्फ भाषण तक ही सीमित रहेंगी?” अगर सच में बदलाव चाहिए, तो शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं?
आपके अपने रिश्तेदार बड़े बिजनेसमैन हैं, क्या उनकी कंपनियों में दलित और पिछड़े लोग बड़े पदों पर हैं? क्या वहाँ उन्हें सीईओ या बड़ी जिम्मेदारी के पद दिए गए हैं? दूसरों पर सवाल उठाना आसान होता है, लेकिन असली बात तब होती है जब आप खुद उदाहरण पेश करें। यहाँ उन्हें महात्मा गान्धी से प्रेरणा लेनी होगी।
अगर राहुल गाँधी सच में बराबरी दिखाना चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपने ही करीबियों की कंपनियों में दलितों को मौका देकर शुरुआत करनी चाहिए। तभी लोगों को लगेगा कि बात केवल कहने की नहीं, करने की भी है।
राहुल गाँधी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से लगभग बदतमीज़ी से उनकी जाति पूछने लगते हैं। राहुल गाँधी कांशीराम जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित संविधान सम्मेलन में शामिल होने के लिए लखनऊ गए थे। वहाँ सभा को संबोधित करते हुए विपक्ष के नेता ने आरोप लगाया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में जाति पूछकर इंटरव्यू में फेल कर दिया जाता है। उन्होंने कहा, “मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी गया था।” कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने आगे कहा कि इंटरव्यू में बच्चों को निकालने का तरीका है- “आपकी जाति क्या है भैया? आप इंटरव्यू में फेल।” कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि अगर आर.एस.एस. से जुड़े संगठनों की सूची निकाली जाए, तो उसमें भी ओबीसी या एससी वर्ग के लोग नहीं मिलेंगे।
राहुल गाँधी लगातार सरकार पर हमले बोलते रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत सरकार में 90 सचिव हैं, जिनमें केवल तीन ओबीसी समुदाय से आते हैं, और वे सिर्फ पाँच प्रतिशत बजट को नियंत्रित करते हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी आंकड़ों के साथ सबूत पेश करते कि जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार में कुल कितने सचिव थे, और उनमें दलित या ओबीसी की संख्या कितनी थी।
भारत के बहुत से राजनेता, जैसे कि लालू प्रसाद यादव, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर, कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी, केरल के सीएम पिनाराई विजयन और केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार, सभी इलाज कराने के लिए किसी न किसी समय विदेश गए थे। उनमें से अधिकांश को यहाँ भारत में ही उत्कृष्टतम केंद्रों में असाधारण देखभाल मिल सकती थी। फिर वे विदेश क्यों गए? सच तो यह है कि भारत ‘हेल्थ टूरिज्म (चिकित्सा पर्यटन)’ का एक बहुत बड़ा केंद्र है। लोग विश्व भर से अपना इलाज करवाने के लिए भारत आते हैं।
पूर्व में प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों का इलाज कर चुके एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर कहते हैं, “मैं किसी को विदेश जाने की सलाह नहीं दूँगा, क्योंकि भारत में विश्वस्तरीय इलाज बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध है।” मगर फिर भी अमीर भारतीय इलाज के लिए अमेरिका की तरफ भागते हैं। विडंबना यह भी है कि अमेरिका में भी भारतीय डॉक्टर और सर्जन ही उनका इलाज करते हैं। सच तो यह है कि अमेरिका में 40 से 45 हजार विशेषज्ञ चिकित्सा जगत में बड़े ओहदों पर काम कर रहे हैं।
राहुल गाँधी तो इस मामले में भी अपनी जाति व्यवस्था की डुगडुगी बजाने से बाज नहीं आए। उन्होंने सवाल उठा दिया कि, “अपोलो हॉस्पिटल जाओ, वहाँ एससी, एसटी या ओबीसी कम्युनिटी का कोई डॉक्टर नहीं मिलेगा।” सीधा सा सवाल यह उठता है कि जब कोई परिवार अपने मरीज को किसी अस्पताल में लेकर जाता है, क्या परिवार कभी सोचता है कि डॉक्टर किस जाति का है? क्या कोई पिछड़े वर्ग का मरीज अस्पताल में जाकर ऐसा कहेगा कि वह अपना इलाज केवल किसी पिछड़े वर्ग के डॉक्टर से ही करवाएगा?
हम सच्चे मन से सोनिया गाँधी के स्वस्थ होने की कामना करते हैं, मगर लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गाँधी से एक सवाल तो बनता ही है-“राहुल जी, आप जब अपनी माताश्री को सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती करवाने गए, तो क्या आपने इसरार किया कि आपकी माता जी का इलाज केवल कोई एससी, एसटी या ओबीसी डॉक्टर ही करे?”
आज विश्व में ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। तेल एवं गैस की कमी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। वियतनाम की एयरलाइन ने तेल की कमी के चलते अपनी उड़ानों की संख्या में कटौती कर दी है। पूरी दुनिया सोच में पड़ी है।
ऐसे में भारत के लिए अति आवश्यक है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने तलवारें लेकर न खड़े हों, बल्कि साथ-साथ चलते हुए भारत को इस स्थिति से बाहर निकालने की मुहिम चलाएं।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष भूमिका और नेता प्रतिपक्ष की मानसिकता और उनके अतीत का आईना!एक ही संपादकीय!? में बड़े ही सटीक, सार्थक और सहज सरस अंदाज़ खरी खरी सुनाई है।
शायद भारतीय समाचारपत्र भी औचित्यपूर्ण ढंग से कोई ऐसा ही प्रयास करें ।
राहुल गांधी आजकल महाभारत के पात्र अश्वत्थामा के सहोदर के रूप में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं।आपकी राजनैतिक इच्छाएं महत्वकांक्षाएं अपनी जगह है पर जाती व्यवस्था की डुगडुगी बजाकर क्या पाएंगे?
कम से कम बहनजी से ही कुछ सीख लेते।