Wednesday, May 13, 2026
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संपादकीय – गांधी बनाम गांधी

राहुल गाँधी लगातार सरकार पर हमले बोलते रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत सरकार में 90 सचिव हैं, जिनमें केवल तीन ओबीसी समुदाय से आते हैं, और वे सिर्फ पाँच प्रतिशत बजट को नियंत्रित करते हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी आंकड़ों के साथ सबूत पेश करते कि जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार में कुल कितने सचिव थे, और उनमें दलित या ओबीसी की संख्या कितनी थी।

गाँधी जी को लेकर एक कहानी खूब प्रचलित है कि उनके पास एक महिला अपने बच्चे को लेकर गई। उसने कहा, “मेरे बच्चे को मीठा खाने की लत है, आप इसे समझाइए कि यह मीठा खाना छोड़ दे।”
गाँधी जी ने उस महिला को दो महीने बाद आने को कहा। जब वह महिला दो महीने बाद आई, तो गाँधी जी ने उस बच्चे से कहा, “बेटा, ज्यादा मीठा खाना बुरी बात है।”
उस महिला को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह बात तो गाँधी जी पहले दिन ही कह सकते थे… फिर दो महीने इंतज़ार क्यों करवाया! उसने गाँधी जी से पूछ ही लिया, “गाँधी जी, यह बात तो आप पहले दिन ही कह सकते थे। फिर इतनी सी बात कहने के लिए आपने दो महीने क्यों लगा दिए?”
गाँधी जी ने बड़ी ही सहजता से जवाब दिया, “जब आप मेरे पास आई थीं, उस समय मैं भी मीठा खाने का आदी था। पिछले दो महीने में मैंने अपनी वह आदत छोड़ी… उसके बाद ही मैं यह सलाह देने के योग्य हुआ हूँ।”
यह बात कितनी सुंदर और प्रेरक है कि आप तब तक कुछ कहने के हक़दार नहीं हैं, जब तक आप स्वयं उन बातों पर अमल नहीं करते।
आज के राजनेता गाँधी जी के नाम को कैश तो करते हैं, मगर उनके दिखाए गए रास्ते पर चलते नहीं हैं। आज एक ऐसा मुद्दा दिमाग को सोचने पर मजबूर कर रहा है, जिसके बारे में इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की सोच बिल्कुल अलग थी, और राहुल गाँधी ने उसे एक अलग ही मुद्दा बना दिया है।
राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी भारत में जातिविहीन समाज की वकालत करते थे, जबकि राहुल गाँधी उनसे एकदम अलग जातीय जनगणना की बात करते हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने वी.पी. सिंह से मंडल कमीशन को लेकर 6 सितंबर 1990 को लोकसभा में दिए गए एक भाषण में कहा था, “मंडल कमीशन को लागू करने का तरीका मेरे देश को तोड़ने वाला है। इन ‘लेट आवर्स’ में सुझाव है कि इसे वापस ले लिया जाना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा, “इसमें वी.पी. सिंह सरकार के अपने निहित स्वार्थ हैं। देश को इसका बहुत भारी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।”
राजीव गाँधी ने तो यहाँ तक कहा था कि “पिछड़ापन दूर करने के लिए हमें उसकी जड़ तक जाना होगा। केवल जाति की पहचान इस समस्या का हल नहीं है। हमें सबको बराबर का मौका देना चाहिए।” उन्होंने कहा था, “राजनीति करने से समस्या हल नहीं होगी। हम (यानी कि कांग्रेस) पिछड़ापन दूर करने के लिए एक सकारात्मक और विस्तृत योजना बनाने को तैयार हैं।”
राजीव गाँधी ने उसी वक्तव्य में यह भी कहा था, “किसी एक व्यक्ति की ज़िद की वजह से देश को ‘कास्ट वॉर’ में नहीं झोंक देना चाहिए।”
इंदिरा गाँधी ने तो अपने चुनाव का मुख्य नारा ही बना लिया था। 1980 में उन्होंने जातिविहीन समाज की कल्पना करते हुए कहा था- “जात पर ना पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर!”
राहुल गाँधी हर जगह दलितों और पिछड़ों की बात करते हैं। बड़े-बड़े मंचों से कहते हैं कि उन्हें बराबरी का हक मिलना चाहिए। लेकिन उनसे एक सीधा सवाल है-“क्या ये बातें सिर्फ भाषण तक ही सीमित रहेंगी?” अगर सच में बदलाव चाहिए, तो शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं?
आपके अपने रिश्तेदार बड़े बिजनेसमैन हैं, क्या उनकी कंपनियों में दलित और पिछड़े लोग बड़े पदों पर हैं? क्या वहाँ उन्हें सीईओ या बड़ी जिम्मेदारी के पद दिए गए हैं? दूसरों पर सवाल उठाना आसान होता है, लेकिन असली बात तब होती है जब आप खुद उदाहरण पेश करें। यहाँ उन्हें महात्मा गान्धी से प्रेरणा लेनी होगी।
अगर राहुल गाँधी सच में बराबरी दिखाना चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपने ही करीबियों की कंपनियों में दलितों को मौका देकर शुरुआत करनी चाहिए। तभी लोगों को लगेगा कि बात केवल कहने की नहीं, करने की भी है।
राहुल गाँधी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से लगभग बदतमीज़ी से उनकी जाति पूछने लगते हैं। राहुल गाँधी कांशीराम जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित संविधान सम्मेलन में शामिल होने के लिए लखनऊ गए थे। वहाँ सभा को संबोधित करते हुए विपक्ष के नेता ने आरोप लगाया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में जाति पूछकर इंटरव्यू में फेल कर दिया जाता है। उन्होंने कहा, “मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी गया था।” कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने आगे कहा कि इंटरव्यू में बच्चों को निकालने का तरीका है- “आपकी जाति क्या है भैया? आप इंटरव्यू में फेल।” कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि अगर आर.एस.एस. से जुड़े संगठनों की सूची निकाली जाए, तो उसमें भी ओबीसी या एससी वर्ग के लोग नहीं मिलेंगे।
राहुल गाँधी लगातार सरकार पर हमले बोलते रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत सरकार में 90 सचिव हैं, जिनमें केवल तीन ओबीसी समुदाय से आते हैं, और वे सिर्फ पाँच प्रतिशत बजट को नियंत्रित करते हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी आंकड़ों के साथ सबूत पेश करते कि जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार में कुल कितने सचिव थे, और उनमें दलित या ओबीसी की संख्या कितनी थी।
भारत के बहुत से राजनेता, जैसे कि लालू प्रसाद यादव, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर, कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी, केरल के सीएम पिनाराई विजयन और केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार, सभी इलाज कराने के लिए किसी न किसी समय विदेश गए थे। उनमें से अधिकांश को यहाँ भारत में ही उत्कृष्टतम केंद्रों में असाधारण देखभाल मिल सकती थी। फिर वे विदेश क्यों गए? सच तो यह है कि भारत ‘हेल्थ टूरिज्म (चिकित्सा पर्यटन)’ का एक बहुत बड़ा केंद्र है। लोग विश्व भर से अपना इलाज करवाने के लिए भारत आते हैं।
पूर्व में प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों का इलाज कर चुके एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर कहते हैं, “मैं किसी को विदेश जाने की सलाह नहीं दूँगा, क्योंकि भारत में विश्वस्तरीय इलाज बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध है।” मगर फिर भी अमीर भारतीय इलाज के लिए अमेरिका की तरफ भागते हैं। विडंबना यह भी है कि अमेरिका में भी भारतीय डॉक्टर और सर्जन ही उनका इलाज करते हैं। सच तो यह है कि अमेरिका में 40 से 45 हजार विशेषज्ञ चिकित्सा जगत में बड़े ओहदों पर काम कर रहे हैं।
राहुल गाँधी तो इस मामले में भी अपनी जाति व्यवस्था की डुगडुगी बजाने से बाज नहीं आए। उन्होंने सवाल उठा दिया कि, “अपोलो हॉस्पिटल जाओ, वहाँ एससी, एसटी या ओबीसी कम्युनिटी का कोई डॉक्टर नहीं मिलेगा।” सीधा सा सवाल यह उठता है कि जब कोई परिवार अपने मरीज को किसी अस्पताल में लेकर जाता है, क्या परिवार कभी सोचता है कि डॉक्टर किस जाति का है? क्या कोई पिछड़े वर्ग का मरीज अस्पताल में जाकर ऐसा कहेगा कि वह अपना इलाज केवल किसी पिछड़े वर्ग के डॉक्टर से ही करवाएगा?
हम सच्चे मन से सोनिया गाँधी के स्वस्थ होने की कामना करते हैं, मगर लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गाँधी से एक सवाल तो बनता ही है-“राहुल जी, आप जब अपनी माताश्री को सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती करवाने गए, तो क्या आपने इसरार किया कि आपकी माता जी का इलाज केवल कोई एससी, एसटी या ओबीसी डॉक्टर ही करे?”
आज विश्व में ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। तेल एवं गैस की कमी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। वियतनाम की एयरलाइन ने तेल की कमी के चलते अपनी उड़ानों की संख्या में कटौती कर दी है। पूरी दुनिया सोच में पड़ी है।
ऐसे में भारत के लिए अति आवश्यक है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने तलवारें लेकर न खड़े हों, बल्कि साथ-साथ चलते हुए भारत को इस स्थिति से बाहर निकालने की मुहिम चलाएं।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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38 टिप्पणी

  1. भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष भूमिका और नेता प्रतिपक्ष की मानसिकता और उनके अतीत का आईना!एक ही संपादकीय!? में बड़े ही सटीक, सार्थक और सहज सरस अंदाज़ खरी खरी सुनाई है।
    शायद भारतीय समाचारपत्र भी औचित्यपूर्ण ढंग से कोई ऐसा ही प्रयास करें ।
    राहुल गांधी आजकल महाभारत के पात्र अश्वत्थामा के सहोदर के रूप में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं।आपकी राजनैतिक इच्छाएं महत्वकांक्षाएं अपनी जगह है पर जाती व्यवस्था की डुगडुगी बजाकर क्या पाएंगे?
    कम से कम बहनजी से ही कुछ सीख लेते।

    • भाई सूर्य कांत जी बहुत डरते डरते यह संपादकीय पोस्ट किया। आपके समर्थन से बहुत हौसला मिला।

  2. देश की हालिया घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन और विश्लेषण है ये संपादकीय। इस देश में राजनीति जाति – धर्म से संचालित होती रही है। लोक सभा में विपक्ष के नेता उसे ही अमल में लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी उनकी टाइमिंग गलत है। चिकित्सा व्यवस्था के बारे में आपने एम्स के डॉक्टर की जो बात कोट की, वह भी पूरी तरह सत्य नहीं। छोटे शहरों – राज्यों में आज भी अच्छी चिकित्सा व्यवस्था की दरकार है। लोग चिकित्सक बन कर छोटे शहरों में बड़े-बड़े अस्पताल तो खोल लेते हैं पर वह सिर्फ और सिर्फ फाइव स्टार होटल ही साबित होते रहे हैं। अच्छी चिकित्सा के लिए आज भी लोगों का भरोसा एम्स ही है, वो इसलिए क्योंकि वहां इलाज – जांच के नाम पर लूट-खसोट नहीं है, पर वहां भी अगर रेफरेंस नहीं तो दो महीने, तीन महीने के बाद नंबर मिल पाता है। अगर चिकित्सा व्यवस्था में भी जाति देखा जाने लगा फिर तो मरीज भगवान भरोसे रह जाएगा।
    कुल मिलाकर यह संपादकीय काफी कुछ सोचने और विश्लेषण करने पर मजबूर करती है।

    • प्रियंबरा जी, आपने संपादकीय के बारे में कहा है कि – यह संपादकीय काफ़ी कुछ सोचने और विश्लेषण करने पर मजबूर करता है – साथ ही आपने संपादकीय के समर्थन में टिप्पणी की है कि – अगर चिकित्सा व्यवस्था में भी जाति देखा जाने लगा फिर तो मरीज भगवान भरोसे रह जाएगा। – आपका दिल से शुक्रिया।

  3. नहीं सर.. आपकी इच्छा पूरी नहीं होगी… विपक्ष साथ खड़ा नहीं होगा… उसको सरकार को बदनाम की जो प्रबल इच्छा है… वह वही करेगा…।
    बहुत ही शोधपूर्ण विचार है…। पढ़ते हुए यही लगा कि हमारे देश से अशांति कैसे जाएगी? जड़ कहाँ है?
    हाँ मेरा मानना है कि जाति के आधार पर आरक्षण बंद हो जाए और योग्यता और आय के अनुसार उच्च शिक्षा की सुविधा मिले।

    साधुवाद सर…

    • आदरणीय अनिमा मैम, आपने कम शब्दों में गहरी टिप्पणी करते हुए हमारा समर्थन किया है। आप हर संपादकीय पर अपनी राय अवश्य भेजती हैं। आपको हार्दिक धन्यवाद।

  4. महत्वपूर्ण सम्पादकीय
    यह राहुल गांधी जी को भेजनी चाहिए ताकि
    वे समझ सकें कि भारत से बाहर उनके बारे में क्या सोचा और कहा जा रहा है ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

    • आदरणीय प्रभा जी आपने व्यस्तता और थकावट के बावजूद संपादकीय को पढ़ा और टिप्पणी की… बेहद शुक्रिया। इस संपादकीय को आदरणीय राहुल जी तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।

  5. आपका संपादकीय एक ऐसे ज्वलंत विषय पर है जिसने समाज के हर वर्ग को समान रूप से आंदोलित किया है। राहुल गांधी से आपका प्रश्न केवल सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सोनिया गांधी के स्वास्थ लाभ के लिए शीर्ष सरकारी संस्थान AIIMS के बजाय एक निजी अस्पताल में भर्ती होने पर सवाल उठाए जाने पर ही नहीं बल्कि पूरे उस राजनीतिक अभियान पर है जिसके सहारे विपक्ष समाज के सौहार्द को जातिवाद के नाम पर बांट कर वापिस सत्ता पाने को बेचैन है।
    स्मरणीय हो कि राहुल के पड़नाना जवाहरलाल नेहरू, दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी सभी अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति के विरोधी थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में किसी देश की प्रगति के लिए शीर्ष स्थान भरने के लिए किसी प्रत्याशी की मेधा (मेरिट) को देखना चाहिए न कि उसकी जाति। (“I react strongly against anything which leads to inefficiency and second-rate standards.”). राजीव गांधी ने भी जाति-आधारित आरक्षण को देश की एकता और मेधा के लिए हानिकारक माना था।
    बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान एक सीमित समय के लिए सोचा था ताकि सदियों के सामाजिक उत्पीड़न से समाज के वंचित वर्ग समानता की सोपान पर दूसरों के साथ गर्व से खड़े हो सकें। विडंबना यह रही कि आने वाली सभी सरकारों ने इसे वोट बैंक का स्तंभ बना लिया और एस सी – एस टी वर्ग के लोगों के किन्हीं दूसरे व्यावहारिक और क्रियात्मक प्रयोगों के माध्यम से उत्थान के बारे में कभी नहीं सोचा। किसी भी प्रोफेशन की सफलता के लिए सही और पूरा ज्ञान बहुत आवश्यक है और विशेषतः मेडिकल व्यवसाय में जहां लोगों के स्वास्थ और जीवन के प्रश्न हों। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों को जातिवाद को अपने फायदे के लिए भुनाने के बजाय उन्हें प्रयाप्त वित्तीय सहायता और व्यवसाय कौशलता में परिपूर्णता प्राप्त करने की योजनाओं द्वारा उनके लिए संपूर्ण कल्याण के बारे में सोच कर समाज में विभाजन को समाप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। और ऐसी योजनाओं में मुस्लिम वर्ग के युवा वर्ग को भी शामिल करना चाहिए क्योंकि वे भी उच्च शिक्षा और आर्थिक संपन्नता के अभाव में समाज की मुख्य धारा से कटे हुए हैं। जहां तक सरकारी विभागों में शीर्ष स्थानों पर पिछड़ी जातियों के अफसरों की कमी का सवाल है, ऐसी पदों पर प्रमोशन प्रक्रिया कैबिनेट कमेटी ऑन अपॉइंटमेंट्स देखती है और वहां डोजियर्स और पूर्व रिकॉर्ड देखा जाता है न कि किसी की जाति। इस संदर्भ में मेरी एक कविता भी है जो बहुत कुछ कहती है।

    • आदरणीय बिमल जी, आप तो स्वयं एक डिप्लोमैट रहे हैं और सरकार की कार्य-प्रणाली से पूरी तरह परिचित हैं। आपकी टिप्पणी हमारे लिये मार्गदर्शक का भी काम करती है। आपने जो सुझाव इस टिप्पणी में दिये हैं सरकार को उनका संज्ञान लेना चाहिये।

  6. राहुल सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री को टारगेट करते रहते हैं। बहुत सच्चा संपादकीय।

  7. आपका निर्भीक सम्पादकीय सब लोगों को पढना चाहिए. हताशा में राजनेता ऐसे ही बयान देते हैं.जनता सब समझती है. जाति के आधार पर समाज को बांटने की कोशिश निंदनीय है. वाजपेयी जी ने सही कहा था-सरकारें आयेंगी,जायेंगी. देश को सुरक्षित होना चाहिए.

  8. वाह शर्मा जी, आपने कमाल कर दिया। कुछ ऐसा लिखा कि धीरे से मारा पर झटका जोर का लगा। या यो कहें कि प्यार से मारा पर थप्पड़ जोर का लगा। बहुत खूब यही जवाब बनता था। आरक्षण का खेल लगभग अस्सी वर्षों तक चल गया। अब जिन्हें यह सुविधा मिली वे ऊपर उठ चुके हैं। जिन्हें जीवन में कुछ नहीं करना उनके लिए आरक्षण क्यूं। रही बात राहुल गांधी की तो वह कब, कहां क्या बोलना है यह अभी सीख नहीं पाए हैं। भारत की सम्माननीय कुर्सी पर बैठने के हसीन सपने दिन में देखते रहते हैं। वही सपने टूटे तो अब निकल रही है। उनकी बातों को महत्व न देना हो बेहतर है। बढ़िया संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई

  9. हम पुनः जातिवाद में फंसते जा रहे हैं। जिस जातिवाद ने पूर्व में ही काफी हिंसा कराई, उसी दलदल की ओर बढ़ रहे हैं. दकदल हमें निकलने नहीं देगा।
    इस पागलपन पर उदाहरणों के साथ बहुत जरूरी सामयिक। देश की वाजिब चिंता। सामयिक नहीं, प्रासंगिक सवालों से जूझता हुआ विचारणीय संपादकीय।
    आज के ” गाँधी ” को बोलने-समझने में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि, देश में अराजकता नहीं फैले।
    क्या कहें, आपने दुखती ऊँगली पर बहुत सहज-सरल ढंग से हाथ रखा है।

    • अनिता, आपने लिखा है कि – आज के ” गाँधी ” को बोलने-समझने में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि, देश में अराजकता नहीं फैले।… आपसे सहमत। टिप्पणी के लिये ढेर सा शुक्रिया।

  10. आदरणीय भाई,
    सादर प्रणाम। अशेष धन्यवाद इस सारगर्भित तथ्यपूर्ण विचारणीय संपादकीय के लिए। शुरु में जिस कहानी का उल्लेख हुआ वह.मैने अपनी प्रायमरी कक्षा पांच में पढी थी। आज भी सहज सरल रुप से अपनी बात को कहने समझाने के लिए प्रेरक व प्रासंगिक लगती है। गांधी जी ने जिस सत्य और अहिंसा की बात की उसके मूल को सभी नहीं समझ पाए। बुंदेलखंड के एक यशस्वी कवि मंजुल मयंक की रचना याद आती है
    *सत्य हारा नहीं आज तक शक्ति से,
    नाश.संहार संग्राम के सामने।
    सर झुकाना पड़ेगा परशुराम को,
    शांति के देवता राम के सामने।
    यह पंक्तियाँ गांधी जी के आदर्श, सत्य की मौलिकता को बखूबी बयान करती हैं। वे जाति वर्ग धर्म से परे केवल मानवता की बात करते थे परंतु विपक्ष के नेता राहुल जी का सत्य बिल्कुल विपरीत है। सैकडों जातियों वर्गों में बंटे होने पर भी जिस देश की आत्मा एक ही है वहां जाति पांति.ऊंच नीच के आधार पर एक गलत विचारधारा को हवा देना बिल्कुल उचित नहीं है। मैं अपनी अल्प बुद्धि से जितना समझ पायी संपादकीय का.एक एक शबद ग्राह्य व प्रेरक है। आदरणीय सोनिया जी के स्वस्थ होने की कामन
    के साथ उनके सुपुत्र राहुल जी की सोच को परिष्कृत कर सद्बुद्धि देने की प्रार्थना भी ईश्वर से करती हूं। एस सी एसटी ,निम्न वर्ग, उच्च वर्ग में बांट कर देश को टूटने न दें।आपके संपादकीय ने भारतीय जनमानस की आत्मा को छू लिया है।बहुत ही सरल सहज रुप से इस नकारात्मक विवादित मुद्दे को समझाने का सुंदर प्रयास किया है। राहुल जी के अनर्गल प्रलापों और गतिविधियों की सच्चाई भी उजागर की है। जबकि विपक्ष के नेता का दायित्व देश व लोकतंत्र के प्रति भी उतना ही है जितना एक प्रधानमंत्री या जनसेवक का ।आज विश्व युद्ध की ज्वाला में झुलस रहा है जिसकी आंच हम तक भी आ सकती है ऐसे परिवेश में अनावश्यक बातों को तूल देना सही नहीं।जैसा कि संपादकीय में आपने लिखा है-
    आज विश्व में ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। तेल एवं गैस की कमी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। वियतनाम की एयरलाइन ने तेल की कमी के चलते अपनी उड़ानों की संख्या में कटौती कर दी है। पूरी दुनिया सोच में पड़ी है।
    ऐसे में भारत के लिए अति आवश्यक है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने तलवारें लेकर न खड़े हों, बल्कि साथ-साथ चलते हुए भारत को इस स्थिति से बाहर निकालने की मुहिम चलाएं।
    एक अत्यंत महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए अशेष बधाई व शुभ कामनाए।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • प्रिय पद्मा, आपने संपादकीय को वैश्विक युद्ध की स्थिति के परिप्रेक्षय में रख कर भारत के सत्ता पक्ष और विपक्ष को एक संदेश दिया है। आपकी टिप्पणी सच में सारगर्भित एवं सार्थक है। हार्दिक धन्यवाद।

  11. आरक्षण हमारे देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। अब तो यह वोट बैंक की राजनीति बन गया है जिससे मुक्ति पाना लगभग असंभव है। इससे प्रतिभाओं का दोहन हो रहा है किन्तु ये राजनीतिज्ञ सिर्फ रोटी सेंकने में ही लगे रहते हैं। इनमें राहुल गाँधी की बात और भी अलग है वह तो जहाँ जाते हैं वहीं इस मुद्दे को उठा देते हैं मानो बिना योग्यता के ही किसी को किसी पद पर बैठा दिया जायेगा। सोनिया गाँधी के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती होने तथा उनके इलाज के लिए तथाकथित डॉक्टर की उपलब्धता पर आपका प्रश्न करोड़ों देशवासियों के मन में भी आया होगा। उनमें से एक मैं भी हूँ।
    हम जिस समाज में रहते हैं, उठते हैं, खाते हैं या जहाँ काम करते हैं, उससे दोस्ती करते हुए उसकी जाति नहीं पूछते…फिर जहाँ-तहाँ जाति पूछने का क्या औचित्य?
    राहुल गाँधी में महात्मा गाँधी का लेशमात्र भी अंश नहीं है। उनसे उनकी तुलना बेमानी है।
    ‘गांधी बनाम गाँधी’ संपादकीय में आपने ज्वलंत मुद्दा उठाया है।
    साधुवाद आपको।

    • आदरणीय सुधा जी, आपने सही प्रश्न उठाया है कि – “हम जिस समाज में रहते हैं, उठते हैं, खाते हैं या जहाँ काम करते हैं, उससे दोस्ती करते हुए उसकी जाति नहीं पूछते…फिर जहाँ-तहाँ जाति पूछने का क्या औचित्य?” – आपसे पूरी तरह सहमत। टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  12. एक वर्ग के लिए राहुल जो भी करें सब सही और अब तो लोग ये भी कहते हैं मोदी पीएम हैं वो देखें, राहुल गांधी की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती.. क्या करेंगे ऐसे में ?

  13. इस बार के संपादकीय – ‘गांधी बनाम गांधी’ से मैं सहमत नहीं हूं। महात्मा गांधी और राहुल गांधी से सौ प्रतिशत तुलना करना ठीक नहीं है। क्योंकि समयानुसार कुछ नियमों में परिवर्तन जरूरी हो जाता है। अगर परिवर्तन नहीं होते हैं तो समय उन्हें कुचलकर आगे बढ़ जाता है। गांधी जी अहिंसावादी थे। वे तो देशों को अलग करने वाली सीमाओं के भी खिलाफ थे। आज के समय में सीमाओं की सुरक्षा देश का बड़ा बजट खा जाता है। राहुल गांधी उनके इस नियम पर चलेंगे तो देश का नुक़सान हो जाएगा। मीठा खाने वाले उदाहरण को मैं इसी रूप में देखता हूं। बच्चे ने मीठा खाना छोड़ा था या नहीं, कहानी परिणाम पर चुप्पी साध जाती है।
    लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही यही है कि वह मुद्दों से सरकार को घेरे ताकि सरकार स्वेच्छाचारी न हो सके। राहुल गांधी मुद्दा उठाते हैं और जोर-शोर से उठाते हैं। कभी-कभी सरकार उनके मुद्दों से असहज दिख जाती है। राजनीति में कुछ जुमले भी चलते हैं। जुमलों को यहां बुरा नहीं माना जाता है।
    राहुल गांधी की एक कमजोरी है कि उनके भाषणों में आकर्षण नहीं होता है। रूखापन झलकता है। इसका अभ्यास करना पड़ता है। वे भाजपा को सहजता से न लेकर आक्रामक तरीके से लेते हैं, इसलिए तल्खी निकल आती है।
    रही नौकरियों में एससी, एसटी और ओबीसी की बात तो यह सच्चाई है कि आरक्षण के हिसाब से ऊंचे पदों पर वे उतनी संख्या में नहीं है जितने होने चाहिए। प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण पूरी तरह से लागू नहीं है। इसलिए वहां की बात कहने के हम हकदार नहीं है।
    एक तबका ऐसा है जो इन लोगों को योग्य मानता ही नहीं है। मैं मानता हूं कि सभी तबकों में सभी लोग योग्य नहीं होते हैं और सभी लोग अयोग्य नहीं होते हैं। एससी एसटी तथा ओबीसी में ऐसे अभ्यर्थी भी होते हैं जो आरक्षण से नहीं,अपनी मेरिट से पहुंचते हैं। लेकिन मेरेट की सबसे नीचे की पंक्ति को उठाकर लोग गीत बना लेते हैं और उन्हीं को गाते रहते हैं।
    इंटरव्यू में जाति पूछकर बाहर कर दिया जाता है। सब नहीं तो कुछ तो ऐसा करते ही हैं।
    भारत में जातिवाद कभी खत्म नहीं होगा। विभिन्न जातियों का समूह ही भारत है। कुछ लोग अपनी राजनीति जातियों को तोड़कर ही चमकाती हैं। यहां की जातियां एक थाली का घी है। ठंडा करके अलग-अलग जम सकता है पर गरम मुद्दों पर सब एक हो जाते हैं।
    कोई भी सरकार परफेक्ट नहीं होती है। क्या पता सरकार की आज जो अच्छाइयां है आने वाले कल में वे बुराइयां बन जाएं।
    पत्रकार ,लेखक पिछली सरकारों में उन्हें किसी न किसी मुद्दे पर घेरते रहते थे, लेकिन आज सरकार के पक्ष में बोल रहे हैं। क्या समय वाकई में इतना बदल गया है? समय बदला है या दृष्टिकोण!
    हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं है। मैं सोचता हूं कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपने लिए असहमति का विकल्प रखना चाहिए।

  14. भाई लखन लाल पाल जी, आपकी टिप्पणी के पहले वाक्य – इस बार के संपादकीय – ‘गांधी बनाम गांधी’ से मैं सहमत नहीं हूं। – ने मन को जेन्युइन ख़ुशी प्रदान की। आपने संपादकीय में उठाए मुद्दों पर अपनी राजनीतिक सोच के हिसाब से टिप्पणी की है। मगर मैं आपकी एक बात से पूरी तरह सहमत हूं कि – हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं है। मैं सोचता हूं कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपने लिए असहमति का विकल्प रखना चाहिए।- आपको इस स्पष्टवादी टिप्पणी के लिये दिल से धन्यवाद।

  15. डॉ. रमेश यादव – इस बार का सम्पादकीय भले ही राजनीति से प्रेरित हो, पर बड़ी ही स्पष्टता से सम्पादक महोदय ने अपनी बात को रखा है. जाति व्यवस्था को लेकर अपने सटीक तर्क भी पेश किए हैं. आरक्षण की नीति सीमित समय के लिए देश में लागू की गई थी मगर वोट बैंक के चक्कर में ये आज तक जारी है. राहुल गांधी भी वोटों के लिए जातिगत राजनीति कर रहे हैं. उन्हें पिछड़ों और अगड़ों से कोई लेना देना नहीं है. लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर यहां बात सम्पादकीय को लेकर की जानी चाहिए. सम्पादक जी ने इस दुखती रग पर हाथ रखते हुए इस विषय पर चिंतन करने के लिए मजबूर किया है. देश की यह एक ज्वलन्त समस्या है. जिनको आरक्षण का लाभ मिला है वो इसके पक्ष में बोलेंगे मगर देशहित का क्या होगा? यह सबसे बड़ा प्रश्न है. जो व्यवस्था लागू है उसे चाहकर भी कोई भी सरकार बदल नहीं सकती क्योंकि वोट बैंक खोने का खतरा सबके सर पर है. जाति व्यवस्था को लेकर सम्पादक जी ने मेडिकल व्यवस्था पर जो बात उठाई है वह बेहद ही सटीक, स्पष्ट और तार्किक है. बहरहाल इस सामयिक विषय को छेड़ने के लिए सम्पादक जी को साधुवाद.

  16. इस बार का सम्पादकीय भले ही राजनीति से प्रेरित हो, पर बड़ी ही स्पष्टता से सम्पादक महोदय ने अपनी बात को रखा है. जाति व्यवस्था को लेकर अपने सटीक तर्क भी पेश किए हैं. आरक्षण की नीति सीमित समय के लिए देश में लागू की गई थी मगर वोट बैंक के चक्कर में ये आज तक जारी है. राहुल गांधी भी वोटों के लिए जातिगत राजनीति कर रहे हैं. उन्हें पिछड़ों और अगड़ों से कोई लेना देना नहीं है. लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर यहां बात सम्पादकीय को लेकर की जानी चाहिए. सम्पादक जी ने इस दुखती रग पर हाथ रखते हुए इस विषय पर चिंतन करने के लिए मजबूर किया है. देश की यह एक ज्वलन्त समस्या है. जिनको आरक्षण का लाभ मिला है वो इसके पक्ष में बोलेंगे मगर देशहित का क्या होगा? यह सबसे बड़ा प्रश्न है. जो व्यवस्था लागू है उसे चाहकर भी कोई भी सरकार बदल नहीं सकती क्योंकि वोट बैंक खोने का खतरा सबके सर पर है. जाति व्यवस्था को लेकर सम्पादक जी ने मेडिकल व्यवस्था पर जो बात उठाई है वह बेहद ही सटीक, स्पष्ट और तार्किक है. बहरहाल इस सामयिक विषय को छेड़ने के लिए सम्पादक जी को साधुवाद.

  17. तेजेन्द्र भाई: आपने अपने इस सम्पादकीय में अपने आपको नेता कहने वाले उस शख़्श राहुल गांधी का जिसके प्यार भरे नाम के दो शव्दों में से पहले का पता नहीं कि वो वक्त का फ़ायदा उठाने के लिए भारतीय “राहुल” है या असल में इटैलियन रॉल है। अब रहा दूसरा शव्द? यह होना तो “विंची” चाहिए था मगर इनकी दादी ने अपनी गद्दी कायम करने के लिए “गांधी” नाम चोरी कर लिया (या फिर गांधी जी ने दान में दिया) और एक नए नाम की परम्परा को चालू कर दिया। असल में इन महानुभाव के पार्सी दादा का नाम “फ़िरोज़ जहाँगीर गंधी” था जिस में महात्मा गांधी ने केवल एक मात्रा लगाकर इस ख़ान्दान की काया ही नहीं पलटी बल्कि इसकी तो लॉट्री आ गई। अब देखा जाए तो आपके सम्पादकीय का टाइटल “गंधी बनाम गांधी” होना चाहिए था।
    अब रहा इन हज़रत की हर्कतों का सवाल? सिवाए मुँह खोलने के और कब, कहाँ, कैसे और क्या बोलना है, इस बात की इनको न तो कोई तमीज़ और न ही इतनी अकल। इनकी पूजनीय माताजी ने इनकी बालबुद्धी में कूट कूट कर यह सोच भर दी है कि 1947 के बाद प्रधान मन्त्री के पद पर पहले परनाना जवाहर लाल नेहरू बने, फिर दादी इन्द्रा गांधी आई और फिर उनके बाद पिता राजीव गांधी आए; इसलिए यह कुर्सी की विरासत तो इनकी है और राहुल ही प्रधान मन्त्रौ बनने के असली हकदार है। अब जब वो कुर्सी खिसकती हुई नज़र आरही है तो इन पर “खिसियानी बोल्ली ख़म्बा नोचे वाली” कहावत पूरी बैठती है और इन के अनाप शनाप बयान इस कहावत की पुष्टी करते हैं।

    • विजय भाई, आपकी नाराज़गी आपके शब्दों में महसूस की जा सकती है। यह आपका भारत के प्रति प्रेम भी है। आपके स्नेह के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  18. राजनीतिक पाखंड के लंबरदार हैं राहुल। आपने सही पकड़ा ।मां के ईलाज के लिये उन्होंने ओबीसी /एस सी डाक्टर नहीं देखा।

  19. आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
    आपने संपादकीय ‘गांधी बनाम गांधी’ के माध्यम से वर्तमान राजनीति के दो अलग छोरों के बीच के अंतर्विरोध को बड़ी कुशलता और बेबाकी से उजागर किया है। इस संपादकीय में आपने महात्मा गांधी के उस ऐतिहासिक प्रसंग से अपनी बात शुरू की है, जिसमें गांधी जी किसी को उपदेश देने से पहले स्वयं उस पर अमल करते हैं। यह प्रसंग न केवल संपादकीय की भूमिका को सशक्त बनाता है, बल्कि आधुनिक राजनीति के उस खोखलेपन पर भी करारा प्रहार करता है, जहाँ कथनी और करनी के बीच एक गहरी खाई दिखाई देती है। आपका यह तर्क अत्यंत प्रभावशाली है कि नैतिक अधिकार केवल पद या नाम से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और शुचिता से प्राप्त होता है।
    संपादकीय की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह राहुल गांधी की वर्तमान ‘जाति केंद्रित’ राजनीति की तुलना उनके पूर्वजों (इंदिरा गांधी और राजीव गांधी) के वैचारिक धरातल से करता है। जहाँ इंदिरा जी “जात पर न पात पर…” के नारे के साथ देश को एकजुट करने की बात करती थीं और राजीव गांधी ने संसद में मंडल आयोग के संदर्भ में देश को जातिवाद की आग में झोंकने के खतरों के प्रति आगाह किया था, वहीं राहुल गांधी का वर्तमान रुख इसके ठीक विपरीत जान पड़ता है। आपने इस वैचारिक विचलन को बहुत ही तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है, जो पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह बदलाव किसी सामाजिक उत्थान के लिए है या केवल राजनीतिक अस्तित्व बचाने का एक माध्यम?
    आपने आंकड़ों की बाजीगरी पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी द्वारा केंद्र सरकार के सचिवों की जाति को लेकर किए गए दावों पर आपका यह सुझाव अत्यंत सटीक है कि उन्हें नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, राजीव और मनमोहन सिंह की सरकारों के आंकड़े भी देश के सामने रखने चाहिए। यह समीक्षात्मक दृष्टि दर्शाती है कि कोई भी समस्या रातों-रात पैदा नहीं होती और दशकों के शासन के बाद आज जाति का कार्ड खेलना कहीं न कहीं स्वयं की पूर्ववर्ती सरकारों की विफलता को स्वीकार करने जैसा है। आपका यह संतुलित दृष्टिकोण संपादकीय की विश्वसनीयता को कई गुना बढ़ा देता है।
    संपादकीय का वह हिस्सा विशेष रूप से मर्मस्पर्शी और तार्किक है, जहाँ चिकित्सा जगत् और निजी क्षेत्र में जाति को घसीटने की आलोचना की गई है। अपोलो जैसे संस्थानों या निजी कंपनियों में आरक्षण की बात करना और दूसरी ओर इलाज के लिए विदेशों का रुख करना, एक ऐसा अंतर्विरोध है जिसे आपने बहुत ही तीखेपन से पकड़ा है। यह हिस्सा स्पष्ट करता है कि प्रतिभा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को राजनीति की भेंट चढ़ाना समाज के लिए कितना घातक हो सकता है। आपका यह कहना कि राहुल गांधी को पहले अपने करीबियों के संस्थानों में दलितों और पिछड़ों को शीर्ष पदों पर बिठाकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए, आपके तर्क को एक नैतिक पूर्णता प्रदान करता है।
    यह संपादकीय केवल एक व्यक्ति की आलोचना नहीं है, बल्कि यह उस ‘गांधीवादी दर्शन’ की पुनर्स्थापना की मांग करता है, जहाँ सत्य और आचरण सर्वोपरि थे। आपने अपनी प्रभावी भाषा और स्पष्ट सोच के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि नाम उधार लेने से कोई महान नहीं बनता। महानता के लिए महात्मा गांधी जैसा त्याग और अपने वचनों के प्रति ईमानदारी अनिवार्य है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह संपादकीय वर्तमान समय में बौद्धिक विमर्श का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो पाठकों को सत्ता और विपक्ष दोनों के दोहरे मापदंडों को समझने की नई दृष्टि प्रदान करता है।

    • भाई चंद्रशेखर जी, आपकी विस्तृत टिप्पणियां हमारे लिये पौष्टिक ख़ुराक का काम करती हैं। आपने कहा है कि – “संपादकीय का वह हिस्सा विशेष रूप से मर्मस्पर्शी और तार्किक है, जहाँ चिकित्सा जगत् और निजी क्षेत्र में जाति को घसीटने की आलोचना की गई है। अपोलो जैसे संस्थानों या निजी कंपनियों में आरक्षण की बात करना और दूसरी ओर इलाज के लिए विदेशों का रुख करना, एक ऐसा अंतर्विरोध है जिसे आपने बहुत ही तीखेपन से पकड़ा है।”… हार्दिक आभार।

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