Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – एक और मेहता

भारत में ख़ास तौर पर महाराष्ट्र में को-ऑपरेटिव बैंकों के घोटाले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के नाम भी इसी तरह के घोटाले से जुड़े हैं। मगर वे बड़े लोग हैं, घोटाले उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते है। एक कहावत है ना – “रिश्वत लेते पकड़े गये तो रिश्वत दे के छूट भी जाओ!”

महसूस होता है कि आज के दिन भारत की सबसे बड़ी ख़बर, सबसे बड़ी समस्या है रणवीर इलाहाबादिया! उसने कुछ ऐसा कर दिया है कि भारत की जड़ें हिल गई हैं। इससे भारत और विश्व के रिश्तों में ख़तरे पैदा हो गये हैं और इसी वजह से देश में जीडीपी की दर कम हो गई है और नौकरियां ग़ायब हो गई हैं। प्रत्येक न्यूज़ चैनल पर रणवीर इलाहाबादिया जैसे हीरो बन गया है।
हमारा भारत वो महान देश है जहां भगवान राम को काल्पनिक कहा जाता है – केवल चुनावी रैलियों में नहीं, बल्कि अदालतों में एफ़िडेविट जमा करवा कर। सांप्रदायिक टिप्पणियां और निजी गाली-गलौच तो जैसे राजनीतिज्ञों का प्रिय खेल बन गया है। विपक्ष की चिंता है कि महाकुंभ में कितने श्रद्धालु पहुंचे! क्या सच में 500 करोड़ थे या पांच करोड़ थे। यह हमारे सांसदों की मुख्य चिंता का विषय है। हमारे देश में धर्म और मज़हब को लेकर जितने दंगे हुए हैं उससे कहीं अधिक ख़तरनाक टिप्पणी है जो रणवीर इलाहाबादिया और उसके गैंग ने की है।
भारत में वैब-सीरीज़, सोशल मीडिया को लेकर कोई भी नीति तय नहीं की गई है। जिस प्रकार नेटफ़्लिक्स और अन्य प्लैटफ़ार्मों पर अश्लील और भद्दी फ़िल्में या सीरीज़ दिखाई जाती हैं उसके मुकाबले तो रणवीर इलाहाबादिया की शाब्दिक हिंसा प्राइमरी कक्षा की किताब लगती है। यदि पहले से ऐसी नीति बना ली जाती तो रणवीर इलाहाबादिया और समय रैना अपनी बेहूदगी आम जनता तक फैलाने की शुरूआत ही नहीं कर सकते थे।
रणवीर इलाहाबादिया की बेहूदगी तो समाज में गंदगी फैलाने का ज़रिया हो सकता है मगर इस बीच एक ऐसी घटना घट गई जिससे लाखों लोगों के जीवन पर गहरा असर पड़ने वाला है। उन लाखों लोगों में मेरी बेटी भी शामिल है। ये ख़बर अचानक सामने आई कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक की 28 शाखाओं पर ताला लगाने की घोषणा कर दी है। इनमें से अधिकांश शाखाएं मुंबई में हैं।
अब बैंक के ग्राहक न तो पैसे निकाल सकते हैं और न ही कोई लेन-देन कर सकते हैं। बैंक में भारी अनियमितताओं की वजह से यह कदम उठाया गया, लेकिन इसका खामियाजा उन ग्राहकों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी जिंदगी भर की कमाई बैंक में फंसी रह गई है।
रिज़र्व बैंक ने इस बैंक पर नए लोन देने, पैसा जमा करने, एफडीआर आदि पर भी रोक लगा दी है। रिजर्व बैंक का कहना है कि बैंक की स्थिति सुधरने तक ये प्रतिबंध लागू रहेंगे। रिजर्व बैंक के इस आदेश के बाद शुक्रवार को न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक की ब्रांचों के बाहर ग्राहकों की भीड़ जमा हो गई।
ग्राहकों की बदहाली के बारे में सोच कर सिहरन हो उठती है। यदि किसी व्यक्ति ने घर के लिये लोन ले रखा है और उसका डायरेक्ट डेबिट अपने बैंक से तय कर रखा है तो उसकी पेमेंट का क्या होगा। क्या एचडीएफ़सी या अन्य एजेंसी 6 महीने तक इंतज़ार करेगी… क्या वो घर पर दावा नहीं ठोक देगी।
भारत में ख़ास तौर पर महाराष्ट्र में को-ऑपरेटिव बैंकों के घोटाले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के नाम भी इसी तरह के घोटाले से जुड़े हैं। मगर वे बड़े लोग हैं, घोटाले उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते है। एक कहावत है ना – “रिश्वत लेते पकड़े गये तो रिश्वत दे के छूट भी जाओ!”
रिज़र्व बैंक ने आदेश दिया है  कि 13 फरवरी 2025 से न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक कोई भी नया लोन नहीं दे पाएगा। पुराने लोन को भी रिन्यू नहीं कर पाएगा। नए निवेश या नई जमा राशि भी स्वीकार नहीं करेगा। किसी भी तरह का पेमेंट भी नहीं कर पाएगा। यहां तक कि अपनी कोई भी संपत्ति भी नहीं बेच पाएगा। यह पाबंदी 13 फरवरी 2025 से शुरू होकर अगले छह महीने तक लागू रहेगी।
ज़ाहिर है सबके मुंह पर एक ही सवाल था कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो बैंक पर ताला लगाने की नौबत आ गई। तो पता चला कि रिज़र्व बैंक के इस आदेश के पीछे भी किसी मेहता का ही हाथ है। मुजे एकदम 1992 के हर्षद मेहता घोटाले की याद आ गई। उस समय यह घोटाला करीब 4000 करोड़ रुपए का था जिसे आज के संदर्भ में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का माना जा सकता है।
वर्तमान केस में शक की सुई पूर्व जनरल मैनेजर हितेश प्रवीनचंद मेहता पर जा कर रुकती दिखाई दे रही है। मेहता पर दादर और गोरेगांव शाखाओं से बैंक के कोष से 122 करोड़ रुपये निकालने का आरोप है। घोटाले के समय वे इन शाखाओं के प्रभारी थे। ये घोटाले 2020 और 2025 के बीच हुए बताए जा रहे हैं।
रिजर्व बैंक को जब इस बैंक में हो रही गड़बड़ियों के बारे में पता चला, तो केंद्रीय बैंक ने तुरंत यह कदम उठाया। मार्च 2024 के आखिर तक इस बैंक में कुल 2436 करोड़ रुपये जमा थे। जिन लोगों का पैसा इस बैंक में जमा है, उन्हें डिपॉजिट इंश्योरेंस स्कीम के तहत 5 लाख रुपये तक का बीमा मिलेगा। मतलब, अगर बैंक डूब भी जाता है तो भी खाताधारकों को 5 लाख रुपये तक की धनराशि वापस मिल जाएगी।
जब रिज़र्व बैंक को पता चला है कि इस बैंक की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है तो ज़ाहिर है कि चिंता अवश्य हुई होगी। बैंक के पास पर्याप्त पैसा है या नहीं, इसको लेकर आरबीआई के मन में सवाल उठा। इसलिए लोगों को अपने सेविंग अकाउंट, करंट अकाउंट या किसी भी दूसरे खाते से पैसे निकालने से रोका गया। रिजर्व बैंक ने कहा है कि ये पाबंदियां ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए लगाई गई हैं।
रिजर्व बैंक ने अपने ताज़ा निर्णय के अनुसार न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, मुंबई के निदेशक मंडल को 12 महीने के लिए भंग कर दिया है। बैंक के संचालन के लिए नया प्रशासन नियुक्त किया गया है। बैंक की सबसे अधिक शाखाएं मुंबई और ठाणे में स्थित हैं और बैंक के कुल जमाकर्ताओं की संख्या 3 लाख से अधिक हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने इस अवधि के दौरान बैंक के कामकाज का प्रबंधन करने के लिए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के पूर्व मुख्य महाप्रबंधक श्रीकांत को ‘प्रशासक’ नियुक्त किया है। रिजर्व बैंक ने प्रशासक को उसके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता के लिए ‘सलाहकारों की एक समिति’ भी नियुक्त की है। सलाहकार समिति में रवींद्र सपरा (पूर्व महाप्रबंधक, एसबीआई) और अभिजीत देशमुख (चार्टर्ड अकाउंटेंट)  को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। बैंक में देखे गए खराब प्रशासनिक गड़बड़ियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
अमर उजाला समाचारपत्र में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, भारतीय बैंक एसोसिएशन के सदस्य कहते हैं कि देश में 20 साल में  450 सहकारी बैंकों को बंद किया जा चुका है। जिसमें ग्रामीण सहकारी बैंक और शहरी सहकारी बैंक शामिल हैं। जुलाई 2024 में आरबीआई ने बनारस मर्केटाइल को-ऑपरेटिव बैंक की बिगड़ती वित्तीय स्थिति की वजह से उसका लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके अलावा जून में आरबीआई ने अपर्याप्त पूंजी और कमाई की वजह से मुंबई के को-ऑपरेटिव बैंक और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में पूर्वांचल को-ऑपरेटिव बैंक के लाइसेंस रद्द कर दिए थे।
आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2023 में 17 बैंकों ने अपने कारोबार को बंद कर दिया। जिसमें आधा दर्जन बैंक शहरी सहकारी बैंक (यूसीबी) थे। 2014 के बाद कुल 60 सहकारी बैंक जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों की शामिल हैं उनको बंद कर दिया गया। 2022 में कुल 12 सहकारी बैंकों को बंद किया जा चुका है। वहीं महाराष्ट्र इस कैटेगरी में सबसे आगे है जहां 2014 से अब तक 36 सहकारी बैंकों को बंद किया जा चुका है। साल 2023 में पंजाब और महराष्ट्र सहकारी बैंक के फेल होने के बाद 2020 से 5 लाख रुपये का जमा राशि का बीमा किया जाता है। यानी यदि कोई बैंक बंद हो जाती है या डूब जाती है, तो जमाकर्ता को 5 लाख रुपये दिए जाएंगे।
स्थिति चिंताजनक है। एक खाताधारी ने तो उसी दिन अपने खाते में 50 लाख रुपये जमा करवाए थे जिस दिन बैंक पर ताला लगने का समाचार आया। अब यदि उसे केवल पाँच लाख रुपये ही वापिस मिलते हैं तो वो बेचारा तो लुट जाएगा।
मैं जब एअर इंडिया में कार्यरत था तो मुंबई के अंधेरी वर्सोवा इलाके के यारी रोड क्षेत्र में रहता था। वहां के न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक में मैंने भी खाता खोला था जो आज मेरी बेटी चला रही थी। वह बेचारी तो पूरी तरह से शॉक में है कि यह घर बैठे क्या बला टूटी है हम पर। चालीस साल से अधिक समय से उस बैंक में हमारा खाता रहा है।
वोटों के पीछे भागते राजनीतिज्ञ इस घटना से निरपेक्ष, हिन्दू-मुस्लिम, राम जन्मभूमी, वक़्फ़ बोर्ड, महामंडलेश्वर ममता कुलकर्णी, मोनालिसा, महाकुंभ में हो रही अनियमतताएं, फ़्रांस के राष्ट्रपति द्वारा नरेन्द्र मोदी से हाथ ना मिलाना… जैसे महान मुद्दों पर अटके हुए हैं। कोई सांसद इस बात की माँग नहीं करेगा कि हमारे बैंकों में ऐसे घोटाले ना होने पाएं ऐसे कोई नियम कायदे बनाए जाएं। उन्हें तो संसद में वॉक-आउट करने से ही फुरसत नहीं है। ऐसे मुद्दे में भला उन्हें क्या रुचि हो सकती है! भारत सरकार को इस मामले पर गंभीरता से कदम उठाने होंगे।
और हाँ… मीडिया को भी समझना होगा कि यह घटना किसी भी रणवीर इलाहाबादिया वाले समाचार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और इस पर अधिक बातचीत होनी चाहिये।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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40 टिप्पणी

  1. बैंकर रह चुका हूँ इसलिए अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि बैंकिंग में चेक और कंट्रोल की बहुत बड़ी भूमिका है , सारे कोआपरेटिव बैंक के प्रबंधन पर राजनीतिज्ञ हावी हैं इसलिए चेक और कंट्रोल कुछ नहीं है, यही नहीं नियामक रिज़र्व बैंक के निरीक्षणों में भी ढील लगती है नहीं तो एक के बाद एक कोआपरेटिव बैंकों में घोटाले जारी हैं और अंतोगत्वा हमारे आपके जैसे लोग आधा पर सेंट ज़्यादा ब्याज के चक्कर में कोआपरेटिव बैंकों में खाते रखते हैं , मुझे याद है लोखंडवाला के मेरे एक अभिन्न मित्र के पूरे परिवार की ज़िंदगी भर की कमाई पंजाब महाराष्ट्र बैंक के घोटाले में फँस गई थी . सच तो यह है कि कहीं न कहीं नियामक संस्थाएं भी बराबर की दोषी हैं . मीडिया से तो अब कोई उम्मीद करना बेकार है वो तो चरण चुम्बन में व्यस्त रहता है

    • प्रदीप भाई, एक पुराने बैंकर होने के नाते आप हालात से अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं। सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  2. हल्की सी कहीं क्लिप सुनी थी लेकिन इतना सुंदर और विस्तृत संपादकीय पढ़कर मामला गया हुआ सर। हमेश की तरह बढ़िया संपादकीय।

  3. आपका पूरा संपादकीय पढ़ गया भाई तेजेंद्र जी। बहुत महत्वपूर्ण और जबरदस्त संपादकीय है यह, हमेशा की तरह, और आपने बड़ी हिम्मत और बेबाकी से हमारे देश की राजनीति और मीडिया के असली चरित्र को उजागर कर दिया है।

    हमारे देश में हमेशा से ही जनता की गाढ़े पसीने की कमाई पर नजर गड़ाए फलां मेहता और ढिकां मेहता टाइप गिद्ध लूट-खसोट के लिए टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। और फिर एक दिन कामयाब भी हो जाते हैं। लेकिन खाली वोट की राजनीति करने वाले मोटी खाल के नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

    जनता बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगाए रोती-कलपती रहती है, पर न सरकार को कोई फर्क पड़ता है, न विपक्षी नेताओं को, और न इतनी बड़ी रकम डकारने और घोटाले करने वालों को।

    आपकी बेटी की जमा-पूंजी भी इस बैंक में जमा थी। यह जानकर तकलीफ और ज्यादा बढ़ गई। ऐसे कितने ही बेटे-बेटियां और असहाय बूढ़े होंगे, जो आज बुरी तरह कलप रहे होंगे, और उनकी मर्म पुकार सुनने वाला कोई नहीं। जैसे इस देश में सरकार नामक कोई चीज ही नहीं। जो चाहे जितना लूट ले। जनता तो बस, रोने-कलपने के लिए ही बनी है।

    कहीं न कहीं भाई तेजेंद्र जी, यह सरकार की ही नाकामी है, जो या तो जान-बूझकर कड़े नियम-कायदे नहीं बनाती, या फिर जो नियम हैं, उन पर अमल नहीं होता, और सरकार तब जागती है, जब जनता लुट चुकी होती है।

    आपने इस चेतावनी भरे संपादकीय के जरिए खतरे की घंटी बजा दी है। काश, सरकार अब भी जाग जाए, ताकि आगे ऐसे शर्मनाक घोटाले न हों।

    एक वैतालिक की तरह बार-बार अपने संपादकीयों से चेताने के लिए भाई तेजेंद्र जी, आपका फिर-फिर साधुवाद!

    मेरा बहुत-बहुत स्नेह,
    प्रकाश मनु

    • स्थिति सच में दुखद है सर। भारत सरकार को तुरन्त कुछ कठोर कदम उठाने होंगे। आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

  4. इस देश में आम आदमी के हित अहित से जुड़ा मुद्दा कभी भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा.. आर्या बिटिया भी इस वित्तीय हादसे का शिकार हो गईं ये बेहद बुरा है, प्रार्थना है कि छः महीने का बैन हटने के बाद सभी को उसका पैसा मिल जाए

  5. संपादकीय एक और मेहता,,,
    भ्रष्टाचार , पद के दुरुपयोग, सियासत और उच्च विभिन्न पदों पर बैठे लोगों के लालच भरे भ्रष्टाचारित चेहरे!
    हमारा भारत वर्ष पैसे को बचाकर रखने में विश्व की कई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यहां संचय यानी पैसे की बचत की आदत एक परंपरा है। बुरे दिनों का सामना करने हेतु,यह मौद्रिक समीकरण विशेष रूप से निम्न और मध्य वर्ग में आज भी प्रचलित है ।और यही निम्न और मध्यवर्ग हमारे जनसंख्या बहुल का कम से कम दो तिहाई तो है ही।
    सरकारी योजनाओं, प्रचार प्रसार के कारण लोगों में पैसे को घर में अनुउत्पादित रखने की सोच से,,, बैंकों में बचत या गाढ़ी कमाई को रखने की प्रवृत्ति ,पूर्णतया जब इस समाज में आ गई तब राजनीति भ्रष्टाचार ने अपना इतना बड़ा पेट खोल दिया कि उसमें कितने ही मेहता समा गए आज तक पता ही नहीं चला।
    हमारे जन मानस में बचत की बात और बैंकों में पैसा रखने को रवायत तो आ गई ।तिस पर भी वित्तीय समझ या पैसे को और बढ़ाने या उनका पैसा कैसे उचित रूप से निवेशित होकर बढ़ता रहे यह समझ ना तो जनमानस में आई और ना ही हमारे राजनैतिक और वित्तीय संस्थागत ढ़ांचे में समाई।
    आई बी सी कोड एक्ट बना और बदला और बना ही रह गया?जी हां ,,,लोगों की बचत को बड़े बड़े जालसाजों द्वारा हड़प लिए जाने से बचाने को यह कानून लाया गया और इसमें संशोधन भी किए गए।यह कानून बड़े धनकुबेरों द्वारा पब्लिक पैसे को खा जाना और फिर बेशर्मी से स्वयं को दिवालिया घोषित कर ,ठेंगा दिखाते हुए नई नई संस्था खोल लेने पर कानूनी शिकंजा कसने की मुहिम थी जो सही अर्थों में सन 2014के बाद प्रभावी रूप से शुरू हुई थी पर आज तक आम जन मानस इसे जानता ही नहीं कि यह कौन सी चिड़िया है????!!!
    पक्ष और विपक्ष किसी ने भी वित्तीय समझ को बढ़ाने समझाने और प्रचारित करने पर कोई खास काम नहीं किए और
    परिणाम स्वरूप एक और बैंक फेल एक और सार्वजनिक रुदन और एक और मेहता का रक्तबीज अवतार जो पुरवाई पत्रिका समूह के संपादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने लिखा है और इस पूरे प्रकरण में उनके भी वित्तीय हाथ झुलसे हैं ।
    एक खाता जो पचास बरस से संचालित किया जा रहा था वो बेमौत मारा गया ,,,ऐसे कितने ही तेजेंद्र शर्मा सरीखे बैंक खाते हमारे और आपके होंगे,,,, जरा सोचिए तो सही।
    चुनाव हुए और होते रहेंगे कोई प्रदूषण,वित्तीय समझ,स्वास्थ्य,आधी आबादी का भला,रोजगार ,,,जैसे जरूरी मुद्दे किसी भी पार्टी के घोषणा या एक्शन प्लान में होते ही नहीं हैं।
    एक जनहित का मुद्दा प्रभावी ढंग से उठाता संपादकीय।
    सूर्यकांत शर्मा

    • भाई सूर्यकान्त जी, स्थिति बहुत विकट है। भारत सरकार को नियम कठोर बनाने होंगे। वर्तमान स्थिति में फंसे नागरिकों के हित को ध्यान में रखना होगा।

  6. आपका संपादकीय पढ़ा और यह जानकर दुख हुआ कि न्यू इंडिया कोआपरेटिव बैंक घोटाले में आर्या का भी पैसा फँस गया।
    भ्रष्टाचार और घोटाले इस देश में सामान्य बात है या यों कहें सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है। इसलिए जब कोई घोटाला उजागर होता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होता और इस वजह से इस पर ना तो मीडिया में ना ही आम जीवन में इसकी चर्चा होती है। ऐसी खबरों की उम्र अधिक से अधिक एक या दो दिन की होती है। रणवीर इलाहाबादिया की चर्चा इसलिए सब जगह है क्योंकि उसने सनातन मान्यताओं की चूलें हिला दी है।रही बात विपक्ष या राजनीतिज्ञों की तो उनसे ऐसे मामलों को उठाने के लिए गुहार लगाना अरण्यरोदन है।
    बस प्रार्थना कीजिए कि आरबीआई इस मामले में हस्तक्षेप करे और खाताधारकों को उनके पैसे वापस मिलें।

    • तरुण भाई, सुखद स्थिति यही हो सकती है कि इस बैंक का विलय किसी बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक के साथ कर दिया जाए। इसीसे खाताधारियों का पैसा बचाया जा सकता है।

  7. एक और मेहता के माध्यम से आपने अपने संपादकीय में निरंतर घोटालों के कारण बंद होते को-ऑपरेटिव बैंकों के साथ हाल में ही अनियमितताओं के कारण न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक से पैसों की निकासी पर रोक,आम जनता के लिए अत्यंत दुखदाई है। न जाने कब इन घोटालों से जनता को मुक्ति मिलेगी।? क्या कोई आर्या जैसे अनेकों भुक्तभोगियों का दर्द समझ पायेगा?
    विपक्षी पार्टियों तथा मिडिया द्वारा इस बात को हल्के से लेना निःसंदेह दुःखद है। इस सन्दर्भ में आपका यह कहना उचित ही है कि मीडिया को भी समझना होगा कि यह घटना किसी भी रणवीर इलाहाबादिया वाले समाचार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और इस पर अधिक बातचीत होनी चाहिये।

    • टिप्पणी के लिये आभार सुधा जी। समस्या यह है कि मीडिया और राजनीतिज्ञों के लिये यह कोई मुद्दा ही नहीं है।

  8. सर, आपकी चिंता जायज है। भारत में को ऑपरेटिव बैंक के काम काज को लेकर हमेशा संदेह की स्थिति रहती है।ये खुल तो जाते हैं, फिर इनके नियमन में ऐसा लचरता क्यों दिखाई देती हैं,पता नहीं। हालांकि अब तो किसी भी बैंक में ग्राहकों के लिए सुविधा कम, मुश्किलें ज्यादा होने की शिकायतें आम है।आर्थिक सुरक्षा के लिए मध्य वर्ग के लिए एकमात्र भरोसे की जगह, बैंक, से विश्वास डगमगा रहा है। सच है, इस पर त्वरित और कड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
    और रणवीर अलहबादिया वाले किस्से ने फिर एक बार भारतीय मीडिया का मूर्खतापूर्ण, सतही और सनसनी पैदा करने वाले गैर जिम्मेदार रवैये को ही दर्शाया है। पूरा मीडिया ऐसे उस मुद्दे के पीछे पड़ा है, जैसे हमारे जीवन मरण का प्रश्न हो। जो हुआ, निश्चित ही घटिया था, पर उस तूल देकर महत्व देने का जो काम मीडिया ने किया, वह और भी नित्कृष्ट था।

  9. पुरवाई के इस अंक में को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले पर संपादकीय लिखी गई है। भारत में घोटालों की परंपरा पुरानी है। जैसा कि आपने संपादकीय में सन् 1992 में हुए बैंक घोटाले का जिक्र किया है। आज महाराष्ट्र के को-ऑपरेटिव बैंक इसकी जद में आ चुके हैं। घोटालों के कारण रिजर्व बैंक ने इसको लेन-देन पर रोक लगा दी है। अब जनता भटक रही है।
    न्यूज़ में इसके लिए जगह नहीं है। न्यूज़ चैनल गर्मागर्म खबरों में मस्त हैं। विपक्ष ज्यादा नहीं बोल रहा है। जनता सड़कों पर आने से रही।
    मुझे लगता है कि जनता इस पर ध्यान इसलिए नहीं दे रही है कि इससे होना हवाना कुछ नहीं है। कई साल तो ये पता लगाने में लग जाएगा कि घोटालेबाज कौन है। नेता शामिल हुआ तो फाइल बंद। विपक्ष बोलेगा तो सत्ता पक्ष के लोग कहेंगे कि आपके शासन में भी तो ऐसा हुआ है तब आपने क्या किया था। इसके लिए एक बुंदेली कहावत है -” तू न कह मेरी दांत निपोरी। मैं न कहूं तेरी मांड़ की बोरी।।” चलने दो जो चल रहा है।
    तेजेन्द्र सर जी, आपने इसे अपनी संपादकीय का विषय बनाकर पुरवाई के पाठकों को इससे अवगत करा दिया है। कम से कम पुरवाई के पाठक तो जान ही गए हैं। नहीं तो मुझे भी पता नहीं था कि ऐसा कुछ हुआ है। बढ़िया संपादकीय सर। इस जानकारी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखनलाल पाल जी सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद। 1992 में बैंक घोटाला नहीं हुआ था, वो भारत का सबसे बड़ा शेयर बाज़ार का घोटाला था – हर्षद मेहता वाला।

  10. ओह! दुखद व चिंतनीय!
    आम आदमी की ही स्थिति ख़राब होती है।न ऐसे
    मेहताओं को फ़र्क पड़ता न, सरकार को और मीडिया को तो क्या ही फ़र्क पड़ेगा। ईश्वर करें आर्या बिटिया को व अन्य सभी को उनके श्रम का पैसा वापिस मिल जाए।

  11. कितना भयंकर स्थिति है सर… पढ़कर डर लगा कि सचमें हमारे देश में हो क्या रहा है…? यह तो डकैती है.. और हम कुछ नहीं कर पाते…
    इसका समाधान अति शीघ्र होना चाहिए

    आपके संपादकीय से… आशा करती हूँ पाठकों को ज्ञान प्राप्त हुआ होगा…

    • अनिमा जी, स्थिति सच में डरावनी है। सोचिये कि इतनी बड़ी घटना और कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही।

  12. सहकारी बैंक कभी विश्वसनीय नहीं रहे। भ्रष्ट नेताओं का बोलबाला इनमें हमेशा रहा है।

  13. सदैव की भांति एक सनसनीखेज़, संपादकीय, कुछ चौंकाता कुछ बताता। आपके और बिटिया जैसे हजारों लोगों के निजी नुक्सान को जानकर दुःख हुआ। ईश्वर और बैकिंग सिस्टम आप सभी की मदद करे।
    उत्तर प्रदेश में तो सहकारी बैंकों की स्थिति और छवि बहुत पहले काफ़ी ख़राब और बदनाम है। जाने कितने बन्द हो चुके कुछ बंद होने की कगार में हैं, लेकिन महाराष्ट्र में इनकी स्थिति जानकर हैरानी हुई।
    वैसे एक पुरानी कहावत है “Never put all your eggs in one basket”।
    धन्यवाद।

    • शैली जी, स्थिति विकट है। भारत सरकार से अपेक्षा करते हैं कि कुछ ठोस कदम उठाए जाएं। संपादकीय में आंकड़े दिये हैं कि किस प्रकार कोऑपरेटिव बैंक बंद हुए हैं। आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

  14. यथार्थवादी अपेक्षाएं रखता आपका संपादकीय तथ्यों का उचित मूल्यांकन और विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
    साक्ष्य और घटनाओं के संतुलन से परिपूर्ण आपका यह संपादकीय अत्यधिक चिंतनीय है.. ईश्वर करे आर्या जी के साथ-साथ इस बैंक से जुड़े सभी जनों की इस समस्या का समाधान शीघ्र ही संभव हो। गहन अनुभूति जागृत करता आपका यह संपादकीय जन-जन के लिए विचारणीय है, जिस पर त्वरित कार्रवाई करना अनिवार्य है क्योंकि बैंक से जुड़े अनेक निर्णय उस बैंक से जुड़े व्यक्ति की जीवन दिशा ही बदल सकते हैं।
    साधुवाद।

    • ऋतु जी, आपकी चिंता सराहनीय है। भारत में कोआपरेटिव बैंक लगातार फ़ेल होते आ रहे हैं। भारत सरकार चुप बैठ तमाशा नहीं देख सकती। कुछ करना होगा।

  15. तेजेन्द्र जी!
    हमें यह खबर आपके संपादकीय के माध्यम से लगी। काफी पहले इस तरह के को ऑपरेटिव व सहकारी बैंकों के घोटाले काण्ड हुए पर हम उस समय यह सब उतने अच्छे तरीके से नहीं समझते थे। हालांकि दुख तो तब भी होता था कि लोगों का किस तरह नैतिक पतन हो रहा है। किंतु तथ्य,साक्ष्य और उदाहरणों के माध्यम से आप जो रिपोर्ट संपादकीय के माध्यम से पेश करते हैं वह निश्चित ही ज्ञानवर्धक रहती है और घटना-क्रम को समझने में मददगार सिद्ध होती है।
    पर अफसोस होता है। भ्रष्टाचार सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता ही जा रहा है।
    122 करोड़ बड़ी रकम होती है। जिनका गया है वे जानते होंगे कि वह कितनी परेशानी में हैं।अपन महसूस कर सकते हैं बस। वाकई एक और मेहता। बड़े भाई के नक्शे कदम पर।
    सरकार कुंभकर्ण की नींद सोती है। बड़ी मुश्किल से जागने पर जागती है। थोड़ी बहुत हलचल करके फिर सो जाती है।कुर्सी मुर्गी के अंडे की तरह है और नेतागण उसको सेते हैं क्योंकि वह तो सोने का अंडा देने वाली है! बाकी संसार का क्या हो रहा है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं।
    जागरूक करने वाले संपादकीय के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार तो बनता है।

  16. किसी भी देश का चरित्र बनाने में उसके शासकों का बहुत बड़ा योगदान होता है। शासक यदि स्वयं ईमान्दार हों और देश की कानून व्यवस्था ऐसी हो कि अप्राधियों को उनके अप्राध के अनुसार दण्ड मिले तो शायद न्यू इण्डिया कोऔप्रेटिव बैंक वाली घटना घटती ही नहीं। मौजूदा सरकार के आने से पहले जो “रिश्वत लेते पकड़े गये तो रिश्वत दे के छूट भी जाओ” वाली कोढ़ की बीमारी सत्तर साल में इतनौ बढ़ गई थी कि लोगौ के हॉसले बहुत बुलन्द हो गये थे। यह उसी बुलन्दी का नतीजा है कि १२२ करोड़ के घोटले में बैंक के पूर्व जनरल मैनेजर हितेश प्रवीनचंद मेहता, जिन पर यह सब काञ्ड करने के आरोप लगे हैं, ने रिश्वत दे दिला के अब तक अपने चारौ ओर एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खेंच ली होगी जिसका आजकी कानून प्रणाली में तोड़ मुश्किल हो।
    रिज़र्व बैंक के एक्षन के बाद अब मारी गई बेकसूर जंता, जिसका कोई दोष नहीं। अभी भी पुराने कोढ़ की आग में हाथ सेंकने वाले बहुत से घाघ बैठे हैं और यही सोचकर कर कि “भारत को बना दो कंगाल” का नारा लगाकर अपनी राजनीतियों की रोटियां सेक रहे हैं। समय आ गया है कि मेहता जैसे घोटालेबाजों और उसके चाहने वालों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिये।

  17. Your Editorial of this week is very distressing.
    Feeling very upset about our own dear Arya’s Co – operative Bank along with other such banks have been asked not to undertake any transaction nor issue any money against a depositor’s cheque for the next 6 months.
    This poses a very big difficulty for all those who gave put their money in such banks.
    We hope this ban will be removed after 6 months as has been claimed.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  18. समसामयिक मुद्दों पर आपकी बेबाक़ टिप्पणी सोचने को विवश करती है। इसलिए आपके संपादकीय की मुझे प्रतीक्षा रहती है।
    हर सप्ताह नियमित रूप से लिखना आपकी बौद्धिक सक्रियता ही नहीं, सामाजिक ज़िम्मेदारी का भावाबोधक भी है।

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