Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – युद्ध का नया स्वरूप

तस्वीर साभार : India Today

इन धमाकों से भारत को भी एक चेतावनी अवश्य मिली है। चीन रिवर्स टेक्नॉलॉजी का मास्टर माना जाता है। चीन के विशेषज्ञ जुट गये होंगे यह जानने के लिये कि इन धमाकों को अन्जाम कैसे दिया गया होगा। भारत में चीनी मोबाइल फ़ोनों का निर्माण हो रहा है। उन मोबाइल फ़ोनों का डेटा चीन के लिये प्राप्त कर लेना कोई कठिन काम नहीं होगा। कहीं भविष्य में ऐसे धमाके चीन की ओर से भारत में ना होने लगें। भारत में आई.टी. विशेषज्ञों की कमी नहीं है। इसलिये बेहतर होगा कि ऐसी भयानक दुर्घटना होने से पहले ही कुछ ऐसे सुरक्षात्मक कदम उठा लिये जाएं ताकि भारत को किसी ऐसे ख़तरे का सामना ना करना पड़े।

जब से इन्सान बना है तब से ही विवाद, लड़ाई, झगड़ा, युद्ध, महायुद्ध होते आ रहे हैं। किसी ज़माने में निजी मल्लयुद्ध हुआ करते थे, फिर शस्त्रों का विकास हुआ तो अग्नि बाण और ब्रह्मास्त्र भी विकसित हुए। रामायण और महाभारत में तमाम तरह के अस्त्र-शस्त्रों को विवरण दिखाई देता है। उन युगों में भगवान शिव के पास सबसे अधिक अस्त्रों का भंडार था। जैसे आज अमरीका पूरे विश्व को हथियार सप्लाई करता है, ठीक वैसे ही उन युगों में हर देवता या दानव हथियारों के लिये भगवान शिव की ही आराधना करता था। चाहे राम हों या रावण – अस्त्र-शस्त्रों के लिये पूजा वे भगवान शिव की ही करते थे। 
वर्तमान काल में गोली बारूद के बाद बंदूकें, पिस्तौल, तोपें, बम, रॉकेट, मिसाइल, अणु बम, हाइड्रोजन बम, आदि आदि का आविष्कार हुआ। हाल के सालों में ड्रोन के आविष्कार ने युद्ध को नये आयाम प्रदान किये हैं। ड्रोन की सहायता से चोरी-चोरी, चुपके-चुपके दुश्मनों पर वार किया जा सकता है। मगर लेबनान और सीरिया में जिस तरह पेजर बमों का इस्तेमाल किया गया है, उससे यह ख़तरा और बढ़ गया है कि कल को किसी भी तरह की स्मार्ट मशीन में रिमोट बमों का प्रयोग किया जा सकता है।
भारत की युवा पीढ़ी को पेजर की शायद याद भी नहीं होगी। दरअसल करीब पच्चीस वर्ष पहले बहुत थोड़े काल के लिये पेजर तकनीक भारत में पहुंची थी। पेजर केवल ट्वीट की ही तरह बस कुछ सीमित शब्दों में संदेश पहुंचाने का काम करता था। अभी मोबाइल फ़ोन आम जनता तक नहीं पहुंचा था। इससे पहले कि पेजर लोकप्रिय हो पाता उसका निर्वाण भी हो गया। 
फिर सवाल यह उठता है कि इतने एडवांस स्मार्ट फ़ोन के ज़माने में पुरानी तकनीक के पेजर हिज़बुल्ला ने ख़रीदे क्यों और उनमें ब्लास्ट हुए कैसे। लेबनान में हुए पेजर ब्लास्ट में अब तक करीब बारह लोगों की मौत हो चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि इज़राइल ने हज़ारों पेजर्स में विस्फोटक लगाकर इस हमले को अंजाम दिया है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने पाँच हज़ार पेजर्स में विस्फोटक लगाए थे।  
विश्व के हालात देखकर केवल एक बात समझ में आती है कि विश्व में यदि कोई एक सुपर पॉवर है तो वो हैं – इज़राइल। इज़राइल जब चाहे, जहां चाहे किसी पर भी हमला कर सकता है। उसे किसी का डर नहीं और वो अरब देशों के साथ अपनी शर्तों पर व्यवहार करता है। हमास ने राकेट हमले करके सोते हुए शेर को जगाया तो उसका ख़मियाज़ा आज हिज़बुल्ला और ईरान भी भुगत रहे हैं। 
सच तो यह है कि हिज़बुल्ला के पास एक पूरी फ़ौज है। उसे ईरान से लगातार फ़ंडिंग मिलती है। उसके पास हथियारों का पूरा ज़खीरा है। फिर इतना विकसित संगठन भला पेजर जैसी पुरानी तकनीक के उपकरण का इस्तेमाल क्यों कर रहा था। इसका एक मुख्य कारण यह है कि पेजर की लोकेशन ट्रेस नहीं हो सकती है। मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल में यह डर बना रहता है कि लोकेशन ट्रेस हो जाएगी और धारक पर हमला हो सकता है। इसलिये हिज़बुल्लाह संगठन के सदस्य आपस में संपर्क के लिये पेजर जैसे पुरातन उपकरण का इस्तेमाल कर रहे थे। पेजर एक ऐसी डिवाइस है जिसके माध्यम से वॉयस और टेक्स्ट मैसेज भेजे जा सकते हैं। 
मंगलवार 17 सितंबर को लेबनान में एक साथ कई हज़ार पेजरों में विस्फोट हुआ। इन पेजर विस्फोटों में कम से काम बारह लोगों की मृत्यु हो गई और तीन हज़ार के करीब लोग घायल या फिर गंभीर रूप से घायल हो गये। हिज़बुल्लाह ने आरोप लगाया है कि इस पेजर आक्रमण के पीछे इज़राइल का हाथ है। मगर फ़िलहाल इज़राइली सेना या सरकार ने इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं की है। 
दावा किया जा रहा था कि हिज़बुल्लाह ने ताइवान की एक कंपनी गोल्ड अपोलो को इन पेजर के लिये ऑर्डर दिया था। मगर इनके लेबनान पहुंचने से पहले ही फ़ैक्टरी में इनमें कुछ छेड़छाड़ करके हर पेजर में करीब तीन ग्राम तीव्र विस्फोटक लीथियम बैटरी के एकदम साथ फ़िट कर दिया गया। हिज़बुल्लाह को इन पेजर की डिलीवरी अप्रैल और मई के महीने में की गई थी। 
यह भी कहा जा रहा है कि पेजरों से छेड़छाड़ इज़राइल के जासूसी संगठन मोसाद ने की है। एक अमरीकी वैबसाइट एक्सिओस के अनुसार तीन अमरीकी अधिकारियों ने जानकारी दी है कि इज़राइल को आभास हो चला था कि उनका प्लान लीक होने वाला है। यदि हिज़बुल्लाह को बैटरी के साथ लगाए गया विस्फोटों की जानकारी हो जाती, तो इज़राइल की सारी मेहनत पर पानी फिर जाता। यह जानकारी मिल रही थी कि हिज़बुल्लाह के दो लड़ाकों को विस्फोटक सामग्री के बारे में शक़ हो गया था।  हलांकि इज़राइल ने इन विस्फ़ोटों के लिये अभी कोई दिन तय नहीं किया था। मगर उन्हें  इसीलिये जल्दबाज़ी में यह निर्णय लेना पड़ा और आनन-फानन में विस्फोट करने पड़े। इससे इज़राइल को वो नतीजे तो नहीं मिले जिनकी उसे अपेक्षा थी, मगर हिजबुल्लाह संगठन में हफरातफरी और डर का माहौल अवश्य फैल गया। 
अमरीकी सरकार के विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यु मिलर के अनुसार इस पेजर ब्लास्ट से अमरीका का कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। मिलर ने आगे कहा कि वे इस मामले में जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया में हैं। फ़िलहाल हम नहीं जानते कि इस हमले के लिये ज़िम्मेदार कौन है। 
जानकारी यह मिल रही है कि भरी दोपहरी के समय जब कुछ लोग सड़क पर ख़रीददारी कर रहे थे और कुछ कैफ़े वगैरह में बैठ कर कॉफ़ी और नाश्ते का आनन्द उठा रहे थे और कुछ लोग अपनी मोटर साइकिल पर सवार थे; अचानक उनके जेब में रखे पेजर गर्म होने लगे और उनमें धमाका हो गया। घायलों और मृतकों में अधिकांश हिज़बुल्लाह के सदस्य थे। 
लेबनान के सुरक्षा अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि जिन इलाकों में पेजर धमाके हुए, उनमें हिज़बुल्लाह के सदस्यों की उपस्थिति बड़ी संख्या में थी। सूत्रों का कहना है कि पहले पेजर थोड़े गर्म होने शुरू हो गये। जब पेजर-धारियों ने पेजर जेब से निकाल कर चेहरे के सामने लाकर उसे देखना / पढ़ना चाहा, तभी उनमें विस्फोट हो गया। इस हमले में लेबनान में ईरान के राजदूत मोजतबा अमीनी भी घायल हुए हैं। ये विस्फोट केवल लेबनान तक सीमित नहीं थे। ऐसे बहुत से विस्फोट सीरिया में भी हुए बताए जाते हैं। 
हिज़बुल्लाह ने अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए अपने सदस्यों को स्मार्ट फ़ोन के स्थान पर पेजर बांटे थे, मगर उनकी बदकिस्मती कि पेजर कि शिपमेन्ट पहुंचने में तीन महीने लग गये और उस बीच अपना कारनामा दिखाने वाले उसमें विस्फोटक सामग्री फ़िक्स कर गये। ब्लास्ट से पहले सभी पेजर पर ‘Error’ का मैसेज आया, इस मैसेज के बाद वो वाइब्रेट करने लगा और फिर ब्लास्ट हो गया। 
अभी सीरियल पेजर ब्लास्ट से लेबनान जूझ ही रहा था कि फट पड़े वॉकी-टाकी, रेडियो सेट, और सोलर पैनल जिससे कई लोग घायल हो गये।  ये धमाके ‘वायरलेस कम्युनिकेशन डिवाइसेस’ में हुए हैं।  सुरक्षा सूत्रों के अनुसार ये वायरलेस रेडियों भी हिज़बुल्लाह ने पाँच महीने पहले ही ख़रीदे थे। शीर्ष हिजबुल्लाह अधिकारी हाशेम सफीददीन ने धमाकों को लेकर कहा कि संगठन बुरे समय का सामना कर रहा है, लेकिन इसका बदला लिया जाएगा। इन नये किस्म के धमाकों के बाद मृतकों की संख्या 37 तक पहुंच गई है। 
पूरा विश्व इन धमाकों से हतप्रभ सा रह गया है। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा कि आख़िर यह धमाके किसने किये और कैसे किये। कल तक जिन आतंकवादियों से पूरा विश्व घबराता था आज वही यह सोच कर आतंकित हो रहे हैं कि कहीं अगर उन्होंने टीवी चलाया तो टीवी ना फट जाए। कहीं फ़ोन उठाया तो फ़ोन ना फट जाए। किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के कभी भी फटने का डर सबके मन में बैठ गया है। शायद इसीलिये अभी तक किसी भी अन्य देश ने कोई विशेष टिप्पणी नहीं की। हालांकि इन धमाकों की निंदा अवश्य की है। मन ही मन सभी हिज़बुल्लाह की तरह ही हैरानी के आलम में हैं और स्थिति को समझने का प्रयास कर रहे हैं। क्या तीसरा विश्वयुद्ध तकनीक के सहारे लड़ा जाएगा?
इन धमाकों के बाद हिज़बुल्लाह ने इजरायल के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया है। हिज़बुल्लाह ने बुधवार (18 सितंबर) को इज़रायल की सीमा चौकियों पर ताबड़तोड़ रॉकेट दागे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक लेबनान पेजर ब्लास्ट के बाद हिजबुल्लाह ने इजरायल के ख़िलाफ़ पहली बार सीमा पार हमलों को अंजाम दिया है। मगर इज़राइल ने इसकी कोई परवाह नहीं की और जिस समय हिज़बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह भाषण दे रहे थे उसके दस मिनट के भीतर ही लेबनान पर बम्बारी कर दी। गुरुवार को अपने भाषण में नसरल्लाह ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमें एक बड़ा झटका लगा है। लेबनान के इतिहास में अभूतपूर्व है, और यह पूरे क्षेत्र में इजरायली दुश्मन के साथ संघर्ष के इतिहास में अभूतपूर्व हो सकता है।”
इन धमाकों से भारत को भी एक चेतावनी अवश्य मिली है। चीन रिवर्स टेक्नॉलॉजी का मास्टर माना जाता है। चीन के विशेषज्ञ जुट गये होंगे यह जानने के लिये कि इन धमाकों को अन्जाम कैसे दिया गया होगा। भारत में चीनी मोबाइल फ़ोनों का निर्माण हो रहा है। उन मोबाइल फ़ोनों का डेटा चीन के लिये प्राप्त कर लेना कोई कठिन काम नहीं होगा। कहीं भविष्य में ऐसे धमाके चीन की ओर से भारत में ना होने लगें। भारत में आई.टी. विशेषज्ञों की कमी नहीं है। इसलिये बेहतर होगा कि ऐसी भयानक दुर्घटना होने से पहले ही कुछ ऐसे सुरक्षात्मक कदम उठा लिये जाएं ताकि भारत को किसी ऐसे ख़तरे का सामना ना करना पड़े।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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42 टिप्पणी

  1. सादर नमस्कार आदरणीय सर जी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय। सम्पूर्ण तथ्य एवं सत्यता पर आधारित आपका संपादकीय केवल पुरवाई के पाठकों के लिए ही नहीं अपितु विश्वभर के पाठकों के लिए पूर्णरूपेण महत्वपूर्ण है। विकास का अर्थ यही था कि मनुष्यजाति सुरक्षित रहें। परंतु, वर्तमान मानव अमानवीयता को जीवन शैली मान चुका है। निःसंदेह, भारत भी आधुनिकीकरण में आगे बढ़ चुका है । कदाचित, ऐसा युद्ध यहाँ न हो..।

    पुनः आपकी लेखनी सम्पूर्ण पाठक वर्ग का मार्गदर्शन किया है। यूँ ही आपकी लेखनी सत्य के पथ पर रहते हुए…साहित्य एवं समाज की सेवा करती रहे… साधुवाद

    • हार्दिक आभार अनिमा जी। आतंकवाद एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। अब उससे निपटने के भी नये तरीके सोचे जा रहे हैं। मानव ही मानव का विनाश करेगा एक दिन।

  2. इस संपादकीय में अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है और सत्यता और प्रमाणिकता पर आधारित है।

  3. आपकी संपादकीय में जो चिंता जताई गई है वह वाजिब है। अब तो मोबाइल पर भी दग्धा लग रही है कि कहीं यह भी गरम न होने लगे। युद्ध मानव जाति के लिए सही नहीं है लेकिन फिर भी मानव को इससे दो-चार होना पड़ रहा है। कहा जाए तो हर जगह आग लगी हुई है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम।
    मानव ऐसा प्राणी है कि न तो स्वयं शांति से रहता है और न किसी दूसरे को रहने देना चाहता है। आजकल तकनीकी इतनी विकसित हो चुकी है कि कुछ भी कर सकता है मानव। आपने संपादकीय में लिखा है कि शायद तीसरा विश्व युद्ध ऐसी ही तकनीकि से हो सकता है। मैं चाहता हूं कि आपकी यह संभावना, संभावना ही रहे। अमल में न आए तो ही अच्छा है। दोनों पक्ष रुकेंगे तो नहीं फिर भी आशा करता हूं कि वे रुक जाएं। मानवता का विनाश धरती को खंडहर बनाए इससे पहले चेत जाना चाहिए।

    • Wordsworth ने अपनी एक कविता में लिखा है, “Have I not reason to lament / What man has made of man?” सोचिये तब से इन्सान क्या कुछ करता आ रहा है।

  4. समीचीन और अलग विषय पर जानदार संपादकीय।सटीक बात कही है।टेक्नोलॉजी ही श्रेष्ठता का आधार होगी ।
    संपादकीय में सही चिन्ता जाहिर की गई है।यह वही चीन है जो भारत को तंग करने ,पाकिस्तान के साथ आतंक युद्ध में सदैव खड़ा मिलता है।
    निश्चित रूप से यह संपादकीय चेता रहा है कि भारत को सावधान रहना ही होगा।
    शानदार संपादकीय हेतु बधाई हो।

    • जी भाई सूर्यकान्त जी। चीन ने कभी अंतर्राष्ट्रीय नियमों की परवाह नहीं की। भारत को अपनी सुरक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा।

  5. जिस तरह से देश के पड़ोसी देशों में भारत विरोधी वातावरण तेजी से पनप रहा है उस स्थिति में पके द्वारा भारत के विरुद्ध संभावित तकनीकी हमले की आशंका निराधार नहीं है।
    सामयिक एवं प्रासंगिक संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई आपको आदरणीय शर्मा जी

  6. जरुरी संपादकीय जरूरी चिताओं के साथ कुछ एक प्रुफ की कमियां है लेकिन फिर भी संपादकीय दुरुस्त है। समझ तो ये नहीं आता कि लोग ऐसा करते क्यों है। क्या किसी की जान लेना इतना आसान है? आपने संपादकीय के आरंभ में जिस तरह पौराणिक संदर्भ दिए और उन्हें वर्तमान से जोड़ते हुए भविष्य तक ले गए यह काबिले तारीफ है। और पेजर के बारे में सचमुच हम युवा पीढ़ी को नहीं मालूम कभी देखे भी नही। पर जरूरी सवाल फिर से यही की आखरी ऐसा क्यों होता है? इस पर रोक लगाई जा सकती है या नहीं? और अगर भारत में ऐसे हमले हुए तो क्या हम तैयार हैं इनसे निपटने के लिए?
    कुछ समझ नहीं आता सर कई बार। इसलिए बस अपने तक सीमित रह जाना, चाहे कहने को कुएं का मेंढक कहे दुनिया लेकिन कई बार लगता है बेहतर है कुएं का मेंढक बन जाना भी।

    • मैंने ऊपर एक टिप्पणी के जवाब में लिखा भी है तेजस – Wordsworth ने अपनी एक कविता में लिखा है, “Have I not reason to lament / What man has made of man?”… यही सोचना है कि क्या इस युक के नष्ट होने का समय निकट आता जा रहा है।

  7. गम्भीर जानकारी से युक्त आलेख।
    भूत के संदर्भ, वर्तमान के हालात और भविष्य की चिंता तथा चेतावनी
    सभी आपने इस संपादकीय के ज़रिए सामने रख दिया
    साधुवाद एवं आभार

  8. पौराणिक समय में अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से संबद्ध कुछ अनुकरणीय नियम भी हुआ करते थे । ब्रह्मास्त्र जैसे अचूक शक्तिशाली अस्त्र तो साधना के बाद ही एक्टिवेट होते थे और एक ही बार प्रयोग में आ सकते थे । आज के अस्त्रों के लिए नियम विधान बस यही है कि दुश्मन का संहार हो।
    इज़राइल के हिज्बुल्लाह पर अटैक तब तक चलते रहेंगे जब तक हिज्बुल्लाह जड़ से समाप्त नहीं हो जायेगा। हमारी समझ में सही भी है । एक आतंकवादी समूह धरती के किसी भी हिस्से के लिए किसी श्राप से कम नहीं है। जो देश उन्हें पाल-पोस रहे हैं ,वे और भी बड़े गुनहगार हैं। इज़राइल जब लेबनान पर अटैक कर रहा था तब निर्दोष लोगों की जानें भी जा रही थीं । इस बात के लिए विश्व भर से उस पर दबाव भी था। पेजर बम के ज़रिए उसने चुन चुनकर अपने दोषियों को टारगेट किया है।
    इज़राइल की इस जीवटता और दूरदर्शिता को कहीं न कहीं पसंद भी किया जा रहा है। हॉं सर, आपने जगह ध्यानाकर्षण किया है कि भारत के लिए भी अब इस तरह से भी सतर्क रहना आवश्यक है, उसके पढ़ौसी ख़ुराफ़ाती हैं और हम भारतीय विशेष रूप से सस्ता चीनी माल कुछ ज़्यादा ही खरीदते हैं।
    शानदार संपादकीय के लिए साधुवाद !

  9. Your Editorial of today is a timely warning to all countries including ours.
    Thanks very much for sharing your well researched information about these pagers n the wireless devices that Israel used against Lebanon.
    So very inhuman and horrific.

    Highly unfortunate also ,all the same, and we all share the distress suffered during this sad plight of the Lebanese people.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  10. आज के आपके संपादकीय ने ज्वलंत मुद्दे पर पूर्ण तथ्यों के साथ लोगों को बताती, चेताती आपकी लेखनी का एक बार लोहा मानने के लिए विवश कर दिया है। स्कूल के समय निबंध लिखवाया जाता था। विज्ञान अभिशाप या वरदान।
    विज्ञान ने जहाँ लोगों को सुविधाएं दी हैं, उससे भी अधिक लोगों की जिंदगी को अस्थिर किया है इसकी जीती जागती मिसाल है इजराइल का हिज़बुल्लाह जैसे आतंकी संगठन का पुरानी तकनीक के बने, ट्रेस न किये जा सकने वाले उपकरण पेजर में विस्फोटक लगाकर, आतंकियों का नाश करना… कहीं मैंने पढ़ा है कि यही कार्य मोबाइल और लैपटॉप जैसे आधुनिक उपकरणों में भी विस्फोटक लगाकर किया जा सकता है। न जाने कब इंसान की सुविधा के लिए बनाये गये उपकरण उसकी मौत का कारण बन जाये।

    यह सच है कि इजराइल से जैसे एक छोटे से देश ने अपने दुश्मनों को एक ऐसी तकनीक के जरिये धराशाह कर दिया जिससे पूरा विश्व हतप्रभ तो है ही, स्वयं की सुरक्षा के लिए भी चिंतित हो गया है जैसा कि आपने अपने लेख के जरिये भारत को चीन की तरफ से चेताते हुए पूरे विश्व को भी चेतावनी दी है।
    साधुवाद आपको।

    • सुधा जी, आपने तो अपने स्कूल के दिनों की यादों से जोड़ कर संपादकीय को नई दृष्टि प्रदान कर दी। हार्दिक आभार।

  11. बहुत महत्वपूर्ण विषय और जानकारी। आपकी आशंका निर्मूल नहीं है कि यदि चीन ने इस टेक्नोलॉजी की नकल कर ली तो भारत के लिये भारी मुश्किल हो जायेगी। भारत सरकार को इस दिशा में तत्काल तैयार होकर रणनीति तैयार करनी होगी।

  12. आ. संपादक श्री
    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी व चिंता को उजागर करता संपादकीय !
    जीवन पहले महत्वपूर्ण था,अब दिनोंदिन सस्ता और सस्ता होता जा रहा है |
    कुछ पता नहीं कहाँ,कब ,क्या हो जाए?
    सच तो यह है कि सब देखते रहना है और जो होता है ,उसे भुगतते जाना है |
    जिनके हाथों में कुछ है वे तो आस्तीन में साँप लिए बैठे रहते हैं |
    आपके संपादकीय से कम से कम आँखें तो खुलती हैं,काश! इंसान को सद्बुद्धि दे ईश्वर !
    सदा की भाँति साहसिक संपादकीय !
    साधुवाद आपको

  13. तेजेन्द्र भाई, इस सच्चाई में अब कोई शक नहीं कि इज़राइल यहूदियों का देश है और वो कहीं और जाने वाले नहीं हैं। चाहे बड़ी ताकतों के 1948 के फ़ैसले के तहत यहूदियों को बसने के लिए यह इलाका देना सही था या ग़ल्त, वो तो अब सारी एतहासिक बातें हैं। इसी बात को लेकर 1967 में भी अरब – इज़राइल युद्ध में अरब देशों ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी। समय के साथ साथ displaced अरब भी कहीं न कहीं settle होते चले गए लेकिन इन्हीं अरबों के कुछ नेता इज़राइल को ख़तम करने के चक्कर में ख़ुद तो ऐश की ज़िन्दगी गुज़ारते थे और आम अरब suffer करते थे। यह जानते हुए भी कि इज़राइल से पँगा लेना बहुत महँगा पड़ेगा, हमास ने क्यों राकेट हमले करके बैठे बिठाये अपने लिए एक मुसीबत खड़ी कर ली। इस में सब से अधिक नुक्सान तो आम जन्ता का हुआ। TV में गाज़ा पट्टी की तबाही की तसवीरें देख कर कितना मन ख़राब होता हैं। आख़िर यह सब लोग भी तो इंसान हैं। क्या कसूर है इनका जो यह दिन देखने पड़ गए। नेता लोग तो बँकर में परिवार सहित आराम से मज़े कर रहे हैं।

    ईरान के चढ़ावे में आकर हिज़बुल्लाह ने भी इज़राइल से पँगा लिया। देखलो बदले में दोनों को क्या मिला? अमरीका अपने आपको हर तरह से तीस मार ख़ान समझता है जब कि असलियत यह है कि सुपर पावर के मामले में वो इज़राइल से मात खा गया है। सदा से ही इज़राइल अपने शत्रुओं से साम, दाम, दञ्ड, भेद की नीति अपना के अपनी शर्तों पर व्यवहार करता है।

    अब बात चीन की आती है। इन्जिनियरिंग फ़ील्ड में रिवर्स टैकनॉलॉजी एक आम बात है। इसे हम बहुत positive काम के लिये हमेशा प्रयोग करते हैं। हालात को देखते हुए भारत को अब सावधान हो जाना चाहिए, अपने साइन्टिस्टों को इस काम पर लागा देना चाहिए और इस से पहले कि चीन कोई ग़ैरज़िम्मेवाराना हर्कत करे उसका तोड़ निकाल लेना चाहिए।

    • भाई विजय जी आपने विस्तार से संपादकीय के लगभग हर पहलू पर टिप्पणी की है। देखकर अच्छा लगता है कि आप पुरवाई के हर संपादकीय को अतिरिक्त गंभीरता से पढ़ते हैं। हार्दिक आभार।

  14. कहते हैं जंग और प्यार में सब जायज़ है लेकिन क्या इज़राइल की इस हरकत को सही कहा जा सकता है ? हर युद्ध का एक मानवीय पक्ष भी होता है । आपने रामायण और महाभारत का उल्लेख किया है । हम सभी जानते हैं कि रामायण और महाभारत काल में युद्ध के कुछ नियम होते थे। सूर्यास्त के साथ ही युद्ध विराम की घोषणा हो जाती थी । युद्ध सेनाएँ लड़ती थी । आम जन को यथासंभव नुक़सान ना हो इसका ध्यान रखा जाता था। यहाँ तो जानबूझकर आम नागरिकों को ही निशाना बनाया जा रहा है । हमास ने भी आरंभ में आम नागरिकों को ही निशाना बनाया था। आपने सही आशंका व्यक्त की है कि कल चीन भी भारत को आपूर्ति किए जानेवाले सभी मोबाईल्स में या अन्य उपकरणों में विस्फोटक लगा दे और उसमें विस्फोट करा दे तो क्या होगा। सवाल मुश्किल है लेकिन युद्ध के नियमों के बारे में पूरी दुनिया को सोचने की आवश्यकता है ।

    • तरुण भाई “Everything is fair in love and war!” अंग्रेज़ी का वाक्य है। “जंग और मुहब्बत में सब जायज़ है” – यह उर्दू का फ़िकरा है। जंग में नियमों का पालन भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। आज आतंकवादी आतंकित हैं!

  15. संपादकीय पढ़कर भयाक्रांत है मन , पेजर विस्फोट का समाचार देखा भर था पर इसकी पड़ताल आपके सम्पादकीय से ज्ञात हुई,…बहुत विकट स्थिति है।

  16. What man has made of man , ये अधूरा ही है,आदमी ने सिर्फ़ आदमी को ही बर्बाद नहीं किया है अपितु हर प्राणी और पूरे ब्रह्माण्ड के लिये ही विनाश कारी सिद्ध हो रहा है अगर आदमी को ईश्वर ने बनाया है तो वो भी अपना सिर धुन रहा होगा मुझे भी एक शेर याद आता है

    तख़्लीके कायनात के दिलचस्प जुर्म पर
    हँसता तो होगा आप भी यज़्दां कभी -कभी

    यानि भगवान भी सोचता होगा ये मैने क्या कर डाला
    ये दुनिया क्यूँ बना डाली।

    जाने क्यूँ ख़ून ख़राब, हिंसा पर उतारू हैं देश और लोग। आम आदमी और प्राणी इस सब से दहशत में है।
    सान दिन प्रतिदिन इंसानियत खो रहा है और हिंसक हो रहा।
    सब ये कह कर कि युद्ध बुरा , भयावह और विनाशकारी होता है फिर युद्ध की तैयारियों में जुट जाते हैं। हथियारों की होड़, भौगोलिक लिप्सा और राष्ट्र प्रमुखों अहं और अहंकार युद्ध को बढ़ावा दे रहा है। कोई रोको!
    —ज्योत्स्ना सिंह

    • आपका आक्रोश और frustration आपकी टिप्पणी से साफ़ ज़ाहिर हैं ज्योत्सना जी। टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  17. आदरणीय तेंजेन्द्र जी!
    इस संपादकीय को पढ़कर बहुत दुख हुआ लिखने का तो मन में इतना सारा है लेकिन ऐसा लग रहा है कि क्या लिखें?
    जब इसे पहली बार पढ़ा तब एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट हुई। किस युग में जी रहे हैं अपन। हर पल जिंदगी मौत के साए में जीवन की पनाह माँग रही है।
    रामायण और महाभारत काल का युद्ध न्याय और अन्याय का युद्ध था। अधर्म के विरुद्ध धर्म की लड़ाई थी।जो शस्त्र उस समय थे, वह सब आज भी हैं, बस उनका स्वरूप बदल गया है।
    रामायण और महाभारत के युद्ध से आज के युद्ध या आज की लड़ाई बिल्कुल अलग है। इन दोनों से भी अगर तुलनात्मकता में देखा जाए तो रामायण और महाभारत की लड़ाई में भी बहुत अंतर है। अस्त्र-शास्त्र की दृष्टि से नहीं सोच की दृष्टि से, कारण की दृष्टि से।आज की लड़ाई आतंकवाद के रूप में हो या राष्ट्रगत युद्ध के रूप में,अन्याय या अधर्म के विरुद्ध की लड़ाई नहीं है।यह वर्चस्व और बदले की लड़ाई है। कुछ लोगों की उच्चाकांक्षाओं के अहं की लड़ाई है।
    जब बात अन्याय के विरुद्ध न्याय या अधर्म के विरुद्ध धर्म की होती है तो उस लड़ाई में स्वार्थ नहीं होता है,क्रूरता या नफरत का भाव नहीं होता।पर आज की लड़ाई वर्चस्व ,नफरत और अधिकार की लड़ाई है। इस लड़ाई में अविवेक हावी है अपने वर्चस्व और बदले के लिये अपने क्रूरतम रूप में।

    हम तो पेजर बम से वाकिफ ही नहीं थे। आपके संपादकीय को पढ़कर काफी समृद्ध होते रहते हैं।
    लेबनान और सीरिया में पेजर बमों के इस्तेमाल से होने वाली जानकारी से आने वाले समय की खतरे का अंदाज लगाया जा सकता है।
    पूरी घटना का आपने जो ब्योरेवार वर्णन किया है वह दिल दहलाने वाला है। इन धमाकों से विश्व का स्तब्ध होना स्वाभाविक था। सिर्फ संपादकीय को पढ़कर अगर पाठक स्तब्ध हो सकता है ,संज्ञा शून्य महसूस कर सकता है कुछ पल के लिए ,तो विश्व का स्तब्ध होना तो स्वाभाविक है।
    संपादकीय का उद्देश्य सिर्फ सूचना देना नहीं है बल्कि इसके मूल में यह संदेश है कि सचेतनता और सावधानी में ही सुरक्षा है।
    रिवर्स टेक्नोलॉजी का मास्टरमाइंड चीन से सतर्क होने की आवश्यकता है भारत को!
    कुछ क्रूर लोगों के कारण मानव -जीवन और मानवता दोनों ही खतरे में है। समझ में ही नहीं आ रहा कि इंसान जिस रास्ते पर चल पड़ा है वहाँ से अगर वह लौटेगा भी तो कहाँ?
    अविनाश किसी भी समस्या का हल नहीं होता और नहीं युद्ध किसी समस्या का हाल होता है उपकार पिक्चर के गाने की एक लाइन याद आ रही है
    *लाशों को खरीदा करता है-*
    *वह कौन ऐसा व्यापारी है?*
    ईश्वर ने संतुलन स्थापित करने के लिए समुद्र को एक व्यवस्था दी की बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। जिसे मत्स्य न्याय कहा जाता है यू सामुद्रिक न्याय! यह तो मानव समाज में नजर ही आ रहा है। और अब इसका विस्तार जिन्न की तरह अपने स्वरूप को बढ़ा रहा है और वैश्विक स्तर पर फैल रहा है।
    काश! इंसान सिर्फ इंसान रह पाता! वह सब कुछ है लेकिन बस ! इंसान ही नहीं है!
    ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे।
    आपके द्वारा दिया गया वर्ड्सवर्थ का कोट पसंद आया।
    आज के संपादकीय के लिए तो आपको क्या ही कहें!लेकिन आपके संपादकीय के लिए जितनी भी तारीफ की जाए उतनी कम है इसमें कोई दो मत नहीं कि आप बहुत परिश्रम करते हैं।

    • नीलिमा जी, महाभारत और इज़राइल युद्ध की स्थिति में बहुत सी समानताएं हैं।

      दुर्योधन ने पांडवों को पांच ग्राम के बराबर ज़मीन देने से
      भी इन्कार कर दिया‌। वही तो यहां हो रहा है। इज़राइल के पांच ग्राम जितनी ज़मीन पर जीने पर आपत्ति की जा रही है।

      महाभारत में भी कर्ण को छल से मारा गया और धर्म-अधर्म का आडंबर रचा दिया गया। उस काल में भी कौरवों के साथ अधिक राजा थे, आज भी हमास और हिज्बुल्लाह के साथ 57 देश हैं। शकुनि और दु:शासन उस काल में भी थे; वो आज भी हैं।

      हॉं, यह सही है कि द्वापर और कलियुग में जो अंतर पहले से तय हैं वो तो होंगे ही। “Everything is fair in love and war!” यह अंग्रेज़ी में कहा जाता है। “जंग और मुहब्बत में सब जायज़ है”, यह उर्दू में कहा जाता है। हिन्दी में या संस्कृत में इसके उदाहरण देखने को नहीं मिलते मगर फिर भी बालि को छल से मारा जाता है – मर्यादा का ध्यान नहीं रखा जाता।

      आपको संपादकीय ने उद्वेलित किया, जान कर अच्छा लगा। हार्दिक बधाई।

  18. पुनश्च–
    इस स्तब्धता से बाहर निकल भारत सतर्कता और सावधानी से सुरक्षा उपायों पर ध्यान केंद्रित करें यह जरूरी है।
    और एक बात और -युद्ध का यह नया स्वरूप बेहद डरावना व भयावह है भई।

  19. पुनश्च:
    आपके संपादकीय को पढ़ने के बाद हम कई वीडियो देख चुके हैं इस युद्ध से संबंधित।
    हमने नेतन्याहू का‌ वह वीडियो भी देखा जिसमें वो बार-बार यह बात कह रहे हैं कि लेबनान के नागरिक वहाँ से निकल जाएँ क्योंकि उनका युद्ध उनके खिलाफ नहीं है। उनका युद्ध हिज्बुल्लाह खिलाफ है , उन लोगों ने घरों को ही अपने उपयोग में लिया है। वे सिर्फ आतंकियों के खिलाफ है। एक लंबे और घने जाम का वीडियो भी देखा।
    सारा विश्व आतंकवादियों से परेशान है स्वयं अमेरिका भी ,अगर सब मिलकर साथ दें तो आतंकियों का विनाश कोई मुश्किल नहीं लेकिन तकलीफ तो इसी बात की है कि अपने स्वार्थ के तहत लोग दुश्मनों से मिल जाते हैं आतंकी कभी किसी के नहीं होते यह बात लोगों को समझ में नहीं आती शायद ,अगर समझ में आई होती तो अन्य देश भी इजरायल के साथ होते हिजबुल्लाह के साथ नहीं।
    इजरायली नेता की नेकनियति समझ आ रही है।
    जहाँ तक हमारे देश के सावधान होने की बात है तो
    दिक्कत इस बात की है कि हमारे देश के नेता बड़ी दुर्घटनाओं का रास्ता देखते हैं फिर विचारों की अंगड़ाई लेते हुए आँखे खोलते हैं।जागने में वक्त लगता है।
    चीन हमेशा ऐसे ही भारत के लिए संकट रहा । मीठा बोल कम तौल।भाई बोल और पीठ में छुरा भोंक।
    वह ऐसा देश है जिससे हर वक्त ही सावधान रहने की आवश्यकता है लेकिन जहाँ किसी भी तरह के दुर्घटना की गुंजाइश दिखती है वहाँ तो अति सावधान होने की जरूरत पड़ती है।आपका संपादकीय इसके लिए सचेत करता है,यह बड़ी और प्रमुख बात है।
    वैसे आपके संपादकीय ने ही हमें वहाँ के समाचारों को सुनने और देखने के लिए प्रेरित किया।
    एक लंबे समय से दुनिया यूक्रेन और रूस की लड़ाइयों से परेशान रही।
    और इजराइल का दुख तो दीर्घकालिक है जो हर थोड़े अंतराल में उभरता है। आपके संपादकीय की विशेषता है कि –
    *संपादकीय का उद्देश्य सिर्फ सूचना देना नहीं है बल्कि इसके मूल में यह संदेश है कि सचेतनता और सावधानी में ही सुरक्षा है*
    यह कथन चीन के विरुद्ध अपने देश के प्रति है। देश के बाहर की दुनिया को आपके संपादकीय के माध्यम से ही हम ज्यादा देख पा रहे हैं। वरना तो हैडलाइन से ज्यादा हम पढ़ते ही नहीं थे न्यूज पेपर में अभी कुछ सालों से।
    कोरोना के समय से तो टीवी देखना लगभग बंद ही हो गया है। थोड़ा बहुत जो समय मिलता है वह मोबाइल पर ही पढ़ लिखकर व्यतीत होता है।
    एक बार पुनः शुक्रिया आपका। जय

    • आपकी विस्तृत टिप्पणी बहुत दिनों बाद पढ़ी है आदरणीय नीलिमा जी। बहुत बहुत धन्यवाद।

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