बाएं से दाएं, भारतीय पक्ष की टीम के सदस्य मनु खजूरिया, पंडित सतीश के. शर्मा, साई दीपक जे, ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष मूसा हर्राज (पाकिस्तानी मंत्री के पुत्र), पाकिस्तानी टीम के सदस्य जनरल (सेवानिवृत्त) ज़ुबैर महमूद हयात, हिना रब्बानी खार (पूर्व विदेश मंत्री) और मोहम्मद फ़ैसल (ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त)। – Photo Courtesy OpIndia.
जिन्हें इसकी जानकारी नहीं है, उन्हें बता दें कि ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन ऑक्सफ़ोर्ड में स्थित एक छात्र समिति है जो वाद–विवाद के कार्यक्रम आयोजित करती है। इस संस्था का ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है, न ही यह विश्वविद्यालय के सभी छात्रों का प्रतिनिधित्व करती है।
पुरवाई के वरिष्ठ पाठकों को शायद वो ज़माना याद होगा जब 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय रेडियो पर एक समाचारों का कार्यक्रम प्रसारित हुआ करता था – रेडियो झूठिस्तान। इस कार्यक्रम में समाचार वाचक हुआ करते थे उस ज़माने की महान रेडियो हस्तियों में से एक माननीय दीनानाथ जी। (मुझे भी उनके निर्देशन में एक रेडियो नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला था। इस नाटक जेबकतरा के लेखक थे सआदत हसन मंटो और इसकी मुख्य भूमिकाओं में सुधा शिवपुरी जी ने अभिनय किया था) ।
दीनानाथ जी इस कार्यक्रम में पाकिस्तान के एक उर्दू समाचारवाचक की आवाज़ की नकल उतार कर पाकिस्तान के पक्ष में झूठी ख़बरें सुनाया करते थे। समाचार की पहली पंक्ति हुआ करती थी – “ये रेडियो झूठिस्तान है। अब आप मियां ढिंढोरची से ख़बरें सुनिये।…” और उसके बाद जो झूठी ख़बरें सुनाई जाती थीं उनका एक नमूना हमें हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी टीवी चैनलों की ख़बरों से मिल ही गया था।
पाकिस्तान हमेशा भारत पर जीत का दावा करने के मौके ढूँढ़ ही लेता है, भले ही कोई भी अवसर क्यों न हो। कभी वो मैच हारने के बाद क्रिकेट टूर्नामेंट की ट्रॉफ़ी चुरा लेता है, तो कभी सैन्य जीत का दावा करने के लिए वीडियो गेम फुटेज और छेड़छाड़ की गई तस्वीरों का इस्तेमाल करता है। इस बार, पाकिस्तान सरकार ने ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय की ऑक्सफ़र्ड यूनियन बिल्डिंग में आयोजित होने वाली बहस में जीत का दावा किया है, और कारण यह दिया गया है कि भारतीय पक्ष बहस में शामिल नहीं हुआ। जबकि सच यह है कि भारतीय पक्ष को यह बताया गया कि पाकिस्तानी पक्ष के ना पहुंच पाने के कारण कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है।
ऑक्सफ़र्ड यूनियन के साथ थोड़ा सा निजी रिश्ता पुरवाई पत्रिका का भी है क्योंकि 29 जुलाई 2025 को आपकी अपनी पुरवाई के संपादक को वहां सम्मानित किया गया था। ज़ाहिर है कि ऑक्सफ़र्ड यूनियन से जुड़ी किसी भी ख़बर में हमारी रुचि होगी और ख़ास तौर पर जब उसमें भारत और पाकिस्तान भी दो पक्षों के रूप में जुड़े हों।
मूसा हर्राज (पाकिस्तानी मंत्री के पुत्र) ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष हैं। ऑक्सफ़र्ड यूनियन ने हाल ही में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को ध्यान में रखते हुए एक डिबेट आयोजित करने की घोषणा की। डिबेट का विषय था – यह सदन मानता है कि , ‘भारत की पाकिस्तान पर बनाई गई नीतियां जनता की भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षा की जरूरत बताया जाता है।’ (“This House Believes That India’s Policy Towards Pakistan Is a Populist Strategy Sold as Security Policy.”) ज़ाहिर है कि डिबेट अंग्रेज़ी में ही होनी थी।
घोषणा के अनुसार, 27 नवंबर को आयोजित किये गये इस कार्यक्रम में पाकिस्तान की ओर से जनरल (सेवानिवृत्त) ज़ुबैर महमूद हयात, पूर्व अध्यक्ष ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी, पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और यूनाइटेड किंगडम में पाकिस्तान के उच्चायुक्त मोहम्मद फैसल शामिल थे। ये नाम तो बिल्कुल सही थे।
भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के नाम दिये गये थे जनरल एम. एम. नरवणे, पूर्व सेनाध्यक्ष, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और सचिन पायलट। जनरल नरवणे और स्वामी के व्यस्त होने पर ऑक्सफोर्ड यूनियन ने सुहेल सेठ और प्रियंका चतुर्वेदी को कन्फर्म किया, लेकिन इतनी अल्प अवधि सूचना के कारण वे भी नहीं आ सके। इसके बाद इस डिबेट में भारतीय पक्ष की ओर से पैरवी करने वाले थे – जे साई दीपक (वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील), पंडित सतीश के. शर्मा (वर्तमान निदेशक ग्लोबल हिंदू फेडरेशन) और जम्मु की मनु खजूरिया।
पाकिस्तानी पक्ष को जब पता चला कि पूर्व-निर्धारित भारतीय पक्ष के नेता बहस के लिये नहीं आ रहे हैं, उन्होंने बहस में शामिल ना होने का निर्णय ले लिया। हालांकि वे उस समय ऑक्सफ़ोर्ड के एक होटल में मौजूद थे, यूनियन के अध्यक्ष ने साई दीपक और अन्य भारतीय वक्ताओं को कहा कि पाकिस्तानी वक्ताओं के ना पहुंच पाने के कारण कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है। यदि भारतीय प्रतिनिधि मंडल वहां के विद्यार्थियों से बातचीत करना चाहें तो उनका स्वागत है। इस पर भारतीय प्रतिनिधि मंडल ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में ना जाने का निर्णय लिया।
साई दीपक ने मूसा हर्राज पर ऑक्सफोर्ड यूनियन जैसे प्रतिष्ठित मंच को पाकिस्तान का मुखपत्र बनाने का आरोप लगाया। साई दीपक ने लिखा, “पाकिस्तान ने हमेशा झूठ का सहारा लिया है और ऑक्सफोर्ड जैसी सम्मानित संस्थाओं को सुअरबाड़ा बनाने की यह रणनीति उसकी पुरानी आदत है।”
सबसे पहले तो पुरवाई पत्रिका अपने उन पाठकों को सूचना देना चाहेगी जिन्हें इस संस्था के बारे में जानकारी नहीं है। दरअसल ‘ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन’ ऑक्सफ़ोर्ड में स्थित एक छात्र समिति है जो वाद-विवाद के कार्यक्रम आयोजित करती है। इस संस्था का ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है, न ही यह विश्वविद्यालय के सभी छात्रों का प्रतिनिधित्व करती है।
इसका मुख्य उद्देश्य बहसों का आयोजन करना और विविध विचारों के लिए एक मंच प्रदान करना है। यह संस्था “स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अंतिम गढ़” होने का दावा करती है। इसी भावना से, ऐतिहासिक रूप से और हाल ही में भी, इसने ऐसी बहसें आयोजित की हैं जिन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन की सीमाओं से परे जाकर विचारों को आकार दिया है।
हाल के दिनों में ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन ख़ासी विवादों के घेरे में घिरी दिखाई देती है। भारत-पाकिस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के बाद के हालात पर होने वाली बहस को जिस तरह रद्द कर दिया गया उससे बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं। जिस आयोजन से एक जटिल द्विपक्षीय मुद्दे पर स्पष्टता मिलनी चाहिए थी, उसमें गहरी दरारें उजागर कर दीं।
भारत और पाकिस्तान के वक्ताओं में होने वाली बहस के मामले में यूनियन की असलियत की पोल बुरी तरह से खुल गई। संघ ने ख़ुद को एक बार फिर एक ऐसे नाटक के केंद्र में पाया, जो प्रस्तावित मुद्दे पर बहस से कहीं ज़्यादा संस्थागत पतन और भू-राजनीतिक दिखावे की ओर इंगित करता है।
यूनियन के पतन के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, जिसमें विवाद भी शामिल हैं, जैसे कि हाल ही में चार्ली कर्क से जुड़ा मामला हो या फिर विभिन्न कारणों से यूनियन की कमज़ोर होती वित्तीय स्थिति। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में लगातार देखा गया है कि यूनियन में गंभीर नेतृत्व का अभाव रहा है जो उच्च-गुणवत्ता वाली बहस को प्राथमिकता देता हो। आंतरिक राजनीति और राजनीतिक चालों पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित होता दिखाई देता है। इन तमाम गतिविधियों में ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन के अध्यक्ष भी शामिल हैं, जिनकी नज़र अपने घरेलू दर्शकों और अपने भविष्य के लक्ष्यों पर है।
हाल के वर्षों में, पाकिस्तानी मूल के अध्यक्षों ने संघ का स्पष्ट रूप से इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोग किया है। भारत-पाकिस्तान विवाद का हालिया किया गया नाटक संघ के इस दुरुपयोग का एक और उदाहरण है। बात यदि ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन और प्रतिनिधि मंडलों तक रहती तो किसी को आपत्ति नहीं होती। मगर यहां तो पाकिस्तान का उच्चायोग भी इस मामले में सक्रिय हो उठा और अपनी जीत के दावे प्रस्तुत करने लगा।
इस पर विवाद तब बढ़ गया जब पाकिस्तानी हाई कमीशन ने गुरुवार को ‘X’ पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि भारत बहस से पीछे हट गया है, जिसके कारण पाकिस्तान बहस जीत गया है।
पाकिस्तानी हाई कमीशन ने दावा किया कि भारत की ओर से आए वक्ता जनरल नरवणे, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, सचिन पायलट अंतिम समय में वापस चले गए। जिससे कार्यक्रम में विरोधी पैनल नहीं बचा।
इसमें आगे आरोप लगाया गया कि भारत ने बाद में कम-प्रोफाइल वाले वक्ताओं का प्रस्ताव रखा जो पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के स्तर से मेल नहीं खाता था। सवाल यह उठता है जब इस कार्यक्रम की मेज़बान ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन थी तो इसमें पाकिस्तान के उच्चायोग को दख़ल देने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी। दीनानाथ जी ठीक ही कहा करते थे… “ये रेडियो झूठिस्तान है!”
झूठ ही बोलना था तो कह यह भी सकते थे कि वाकओवर मिल गया मगर पाकिस्तान जीत गया यह कहना तो सचमुच झूठिस्तान पर ही मुहर लगाता है।
संपादकीय पर आपकी टिप्पणी पहली है जो पोस्ट हो पाई है। इसका अर्थ है कि टिप्पणी पोस्ट करने की समस्या हल हो चुकी है। आभार आपका।
सादर प्रणाम भाई,
इस बार का संपादकीय बहुत ही रोचक और नयी जानकारियों से पूर्ण लगा।विशेष रुप से.संपादकीय का शीर्षक जिज्ञासा उत्पन्न करता है।*यह रेडियो झूठिस्तान है*।इसमें आक्सफोर्ड यूनियन नामक जिस संस्था का उल्लेख है मुझे जानकारी नहीं थी।शायद तब मैं बहुत छोटी रही हूं परंतु कभी कभी यह नाम सुनाई पड ही जाता था।भारत और पाकिस्तान से संबंधित मुद्दे चाहे किसी भी विषय पर हों हमेशा विवाद का कारण रहे हैं ।यह आक्सफोर्ड यूनियन ऐसे हीवाद विवाद के कार्यक्रम आयोजित करती है।जैसा कि पुरवाई के संपादकीय. में लिखा गया है**पाकिस्तान हमेशा भारत पर जीत का दावा करने के मौके ढूँढ़ ही लेता है, भले ही कोई भी अवसर क्यों न हो। कभी वो मैच हारने के बाद क्रिकेट टूर्नामेंट की ट्रॉफ़ी चुरा लेता है, तो कभी सैन्य जीत का दावा करने के लिए वीडियो गेम फुटेज और छेड़छाड़ की गई तस्वीरों का इस्तेमाल करता है।*
हार्दिक धन्यवाद भाई, ऐसे.महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए। धन्यवाद पुरवाई।
प्रिय पद्मा, टिप्पणी पोस्ट करने में कितनी कठिनाई हो रही है, इससे हम सब परिचित हैं। फिर भी इतनी ख़ूबसूरत टिप्पणी ना केवल लिखी बल्कि पोस्ट करने में भी सफलता पाई… इसके लिये डबल बधाई।
इस बार का संपादकीय जीवन की भूतकाल में मिली नसीहतों और घटित घटनाओं को दोहरा गया। जिस देश की नींव में ही खून खराबा,बदनीयती,बेइमानी,शैतानी रवायतों की कॉकटेल हो उस से कोई उम्मीद रखना बेमानी ही नहीं वरन दीवार से अपना सर फोड़ना है।
हमारे पहले हुक्मरान अपने को महान दिखाने हेतु सेकुलर शब्द की आड़ में इन्हें वोट बैंक बना कर पालते रहे और मौका पड़ते ही इन्हें इनकी आबादी की बहुलता से देश का हिस्सा दे दिया कि चलो आराम से रहा जाय। पर ऐसा हुआ ही नहीं। आदरणीय संपादक जी ने रेडियो झूठिस्तान की खूब याद दिलाई और उन अनाउंसर साहब की भी,,,यह प्रोग्राम खूब सुना जाता था,कम से कम दिल वालों की दिल्ली में तो जरूर !
माहौल बदला निज़ाम बदला पर नहीं बदला रेडियो झूठिस्तान के ना पाकिस्तान मुल्क का रवैया,,,और सियासत इसे बदलने भी नहीं देगी और अब तो गौरांग प्रभु इसे रेयर अर्थ मिनरल,तेल, क्रिप्टो करेंसी का स्वर्ग और नोबेल का कल्पतरु बनाने पर तुले हैं।
अतः अब ऐसे देश से कोई बाद विवाद जैसी स्वस्थ परंपरा की उम्मीद कैसे कर सकता है।
यही इस बात कर संपादक भारत और पूरे देश को समझा रहा है ।
और चलते,चलते,अक्षय कुमार का वो शनील में लपेट कर जूता मारने वाला अमोघ डायलॉग्
मैं तो सच कहता हूँ,अब किसी को बुरा लग जाय तो मैं क्या करूं।
बढ़िया साफ सुथरा संपादकीय।
सूर्यकांत शर्मा
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टिप्पणी कमेंट सेक्शन में पोस्ट नहीं हो पा रही है
भाई सूर्यकान्त जी, आप की टिप्पणी तो हमेशा हमारा हौसला बढ़ाती ही है। आप तो जानते ही हैं कि पुरवाई हमेशा सच ही कहती है – अब अगर किसी को बुरा लग भी जाए तो हम क्या कर सकते हैं।
आपके संपादकीय सदैव किसी नए विषय को, उसके पूरे विवरण के साथ प्रस्तुत करते हैं। ‘यह रेडियो झूठिस्तान है’ शीर्षक रोचक है ।ऑक्सफोर्ड यूनियन की गिरती साख के बारे में अच्छी जानकारी मिली। इसके पूर्व मुझे इस संस्था की बिल्कुल जानकारी नहीं थी । पाकिस्तानी उच्चायोग की मंशा भी संदेह से परे नहीं है, यह बात चिंतनीय है। वस्तुत: भारत और पाकिस्तान से जुड़ी हर बात विवादों के घेरे में आ जाती है। देश दुनिया की नई जानकारी से आप हमें अवगत कराते हैं,बहुत धन्यवाद।
विद्या जी, आपकी टिप्पणी हमारे प्रयास की सफलता का ऐलान है। इस सार्थक टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
आदरणीय सर,
सादर अभिवादन।
‘पुरवाई’ का यह सम्पादकीय बहुत ही सटीक और समसामयिक है। जिस तरह से आपने पूरी घटना को परत-दर-परत खोला है और उसे 1965-71 के ‘रेडियो झूठिस्तान’ के हास्य-व्यंग्य से जोड़ा है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। यह घटना केवल एक वाद-विवाद का रद्द होना नहीं है, अपितु यह भी दिखाता है कि प्रोपेगैंडा और वास्तविकता के बीच खाई कितनी गहरी है।
यहाँ मेरी ओर से कुछ विस्तृत प्रतिक्रियाएँ हैं, जो मेरे निजी विचार को दर्शाती हैं-
1- ऑक्सफोर्ड यूनियन : वाद-विवाद का पतन और ‘रेडियो झूठिस्तान’ की वापसी- सम्पादकीय को पढ़ने के बाद मेरे मन में जो पहली बात आयी, वह दीनानाथ जी की याद और आपके द्वारा दिया गया ‘रेडियो झूठिस्तान’ का ज़िक्र था। यह उपमा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी दशकों पहले थी। पाकिस्तान का हर मंच पर, हर स्थिति में जीत का दावा करना— चाहे वह सैन्य संघर्ष हो, क्रिकेट का मैदान हो या अब एक छात्र-समिति द्वारा आयोजित बहस— उनकी हताशा और आत्म-प्रशंसा की पुरानी आदत को ही दर्शाता है।
ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में जो कुछ हुआ, उसे केवल एक ‘रद्द कार्यक्रम’ कहकर टालना आसान है, लेकिन यह संस्थागत पतन और भू-राजनीतिक छल का एक बड़ा उदाहरण है।
2- जीतने का दावा : डर या फरेब?- पाकिस्तानी पक्ष का यह दावा कि ‘भारत बहस से पीछे हट गया इसलिए हम जीत गये।’ पूरी तरह से बेतुका है। बहस से पीछे हटने वाले तो वे थे, जब उन्हें पता चला कि भारत की ओर से जे. साई दीपक, पण्डित सतीश के. शर्मा और मनु खजूरिया जैसे जुझारू और तथ्य-आधारित वक्ता आ रहे हैं। उच्च प्रोफ़ाइल वाले (पर शायद कम तैयारी वाले) वक्ताओं के उपलब्ध न होने पर भी, भारत ने एक मज़बूत, ज़मीन से जुड़े पैनल को तुरन्त तैयार किया। सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमण्डल— जिसमें पूर्व विदेश मंत्री और पूर्व जनरल शामिल थे— एक मज़बूत, तथ्यात्मक और क़ानूनी रूप से तर्कसंगत बहस का सामना करने से डर गया। उन्होंने बहस न करके, यूनियन के अध्यक्ष के साथ मिलकर, कार्यक्रम को रद्द कराने का ‘मास्टरस्ट्रोक’ चला और फिर उसे अपनी जीत के रूप में प्रचारित किया। यह जीत नहीं, बल्कि डर से उपजी एक चाल है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई खिलाड़ी मैदान पर आने से डर जाए और बाद में ख़ुद को विजेता घोषित कर दे।
3- ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन की भूमिका पर सवाल- सबसे निराशाजनक पहलू ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन, ख़ासतौर पर उसके अध्यक्ष मूसा हर्राज की भूमिका है। यह संस्था ख़ुद को ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अन्तिम गढ़’ बताती है, लेकिन इस मामले में यह स्पष्ट रूप से एक पक्ष का मुँहपत्र बन गयी।
एक संस्था जो बहस के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करती है, वह केवल एक पक्ष के राजनीतिक ड्रामे के कारण कार्यक्रम रद्द कर देती है और फिर भारतीय पक्ष को यह कहकर टालती है कि वे सिर्फ़ ‘छात्रों से बातचीत’ कर सकते हैं। यह न केवल भारतीय वक्ताओं का अपमान था, बल्कि यह उस संस्था के मूल सिद्धान्तों का भी उल्लंघन था। साई दीपक ने मूसा हर्राज पर यूनियन जैसे प्रतिष्ठित मंच को ‘सुअरबाड़ा’ बनाने का जो आरोप लगाया है, वह भले ही कठोर हो, लेकिन यह वहाँ व्याप्त आन्तरिक राजनीति और नेतृत्व के अभाव को उजागर करता है। जब किसी संस्था का नेतृत्व निजी या घरेलू राजनीतिक हितों से निर्देशित होता है, तो उसका पतन निश्चित है।
4- भारतीय पक्ष का सिद्धान्त- मुझे भारतीय प्रतिनिधिमण्डल के निर्णय की सराहना करनी चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तानी वक्ताओं के ‘न पहुंचने’ की झूठी सूचना के बाद भी, वहाँ जाकर सिर्फ़ छात्रों से बातचीत करने के बजाय, यूनियन में प्रवेश न करने का निर्णय लिया। उनका यह निर्णय सिद्धान्तों पर आधारित था। वे वहाँ मज़ाक बनने या एक सुनियोजित राजनीतिक नाटक का हिस्सा बनने नहीं गये थे। उनका पीछे हटना हार नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की जीत थी।
निष्कर्ष- यह घटना हमें यही सिखाती है कि प्रचारतंत्र किसी भी मंच को हाईजैक कर सकता है। मगर जैसा कि इतिहास गवाह है, झूठ की उम्र लम्बी नहीं होती। ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन को अपनी प्रतिष्ठा बहाल करने के लिए आत्मनिरीक्षण करना होगा और पाकिस्तान के उच्चायोग को यह याद दिलाना ज़रूरी है कि प्रोपेगैंडा फैलाना अलग बात है एवं एक स्थापित लोकतंत्र के ख़िलाफ़ तथ्यात्मक बहस से भागना दूसरी। ‘रेडियो झूठिस्तान’ का दौर ख़त्म हो चुका है; अब दुनिया को सच और झूठ का फ़र्क अब साफ़ दिखायी देने लगा है।
-डॉ० चन्द्रशेखर तिवारी
सोनभद्र, उ०प्र० (भारत)
बेहतरीन संपादकीय