सवाल यह उठता है कि यदि ये दो विद्यार्थी ऐसा ऐप बना सकते हैं जो कि ‘रे-बैन’ स्मार्ट चश्मे से फ़ोटो लेकर उसकी पूरी जानकारी हासिल कर सकता है, तो क्या जो पूरी दुनिया के प्रोफ़ेशनल हैकर हैं वो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? क्या यह समाचार उन सब तक नहीं पहुंचा होगा? और हो सकता है कि इन दो विद्यार्थियों ने तो केवल शौकिया तौर पर यह ऐप बनाया हो; मगर जो हार्ड कोर प्रोफ़ेशनल कंप्यूटर एक्सपर्ट हैं, वो तो ख़तरनाक किस्म का ऐप बनाने में सक्षम होंगे।
1963 में आशा पारेख और जॉय मुखर्जी की एक फ़िल्म आई थी ‘फिर वही दिल लाया हूं ’। उस फ़िल्म में मजरूह सुल्तानपुरी ने गीत लिखे थे और संगीत दिया था ओ.पी. नैय्यर ने। एक गीत जिसे आशा भोंसले ने गाया था और आशा पारेख पर फ़िल्माया गया था उसके बोल थे – “आँखों से जो उतरी है दिल में / तस्वीर है इक अन्जाने की / ख़ुद ढूंढ रही है शम्मा जिसे / क्या बात है उस परवाने की”।
किसे पता था कि वर्ष 2024 में चश्मे बनाने वाली कंपनी ‘रे-बैन’ एक ऐसा चश्मा बनाएगी जिसमें सचुमच का कैमरा लगा होगा और उस कैमरे से तस्वीर उतारी जा सकेगी। अब वो तस्वीर कुदरत के नज़ारों की भी हो सकती है; चान्द सितारों की भी हो सकती है और किसी शम्मा या परवाने की भी। इन चश्मों को रे-बैन मेटा चश्मा कहा जाता है। स्मार्ट फ़ोन की तर्ज़ पर इन चश्मों को भी स्मार्ट चश्मा कहा जाता है। इनकी कीमत भारतीय रुपयों में तीस से चालीस हज़ार रुपयों के बीच होती है।
अग्रेज़ी में एक कहावत है – “Today’s poetic imagination is tomorrow’s scientific truth! ” यानी कि आज के कवि की कल्पना की उड़ान कल का वैज्ञानिक सच हो सकता है। कवि कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए सदियों पहले चांद पर पहुंच गया था। मगर वैज्ञानिक को समय लगा और नील एल्डन आर्मस्ट्रांग जुलाई 1969 में ही चांद पर कदम रखने वाला पहला व्यक्ति बन पाया।
ऐसे ही हिन्दी फ़िल्म ‘मिस्टर एक्स’ में किशोर कुमार और ‘मिस्टर इंडिया’ में अनिल कपूर के पास एक ऐसा फ़ार्मूला होता था जिससे वे ग़ायब हो सकते थे। सिने-दर्शकों का इससे ख़ासा बढ़िया मनोरंजन हुआ और वैज्ञानिकों को एक चुनौती मिल गई कि कैसे वे ऐसा कोई यंत्र बना सकते हैं जिसे पहन कर इन्सान ग़ायब हो सकता है।


बहुत चिंताजनक है ये विषय। आपने इस विषय पर गहराई से शोध किया है। यूँ भी सभी राम भरोसे ही जीते हैं, अब इस AI की दुनिया में सब ऊपर वाले की मेहरबानी…
अच्छा और चेतावनी देता संपादकीय, आभार।
आपने ठीक कहा शैली जी, स्थिति चिंताजनक है।
यह तो सच में बहुत चिंताजनक स्थिति है। अगर यह बाज़ार में आ गया तो इसका दुरूपयोग तो निश्चित है। आज के समय में विज्ञान मानव की जितनी सहायता कर सकता है उतनी ही ज्यादा मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है, यदि उस पर निगरानी न रखी गई।
बहुत अच्छा संपादकीय,,,,,
आशमा जी कृत्रिम चीज़ें सेहत के लिये हानिकारक होती हैं…
जानकारीपूर्ण
आभार आपका।
सूक्ष्म आकलन। आपका विषय पर चिंतन मौलिक और पूर्वापेक्षी होता है। अतीत पर दृष्टि डाले हुए वर्तमान पर गंभीर चिंतन करते हैं। संपादकीय पठनीय और जिज्ञासापूर्ण होता है।
मनोज भाई स्थिति चिंतनीय है। संपादकीयों पर स्नेह के लिये हार्दिक आभार।
आप ही ने लिखा है कि आज कवि की कल्पना कल का विज्ञान। चिंता अपनी जगह है किन्तु न ही कवि कल्पना करना बंद करेगा और न ही विज्ञान उस कल्पना को एक धरातल देने को अपनी कोशिशों को अंजाम तक पहुँचाना किन्तु धन्यवाद कि आपके सम्पादकीय से इस नई खोज का पता चला ।
आलोक इस सार्थक टिप्पणी के लिये स्नेहाशीष।
इस संपादकीय ने व्यक्तिगत रूप से तो इतना नहीं डराया है पर जब देश दुनिया के बारे में सोचा तो मुझे छात्रों का यह आविष्कार खतरनाक और भयावह लगा। देशों की खुफिया जानकारियां पल भर में बाहर आ जाएंगी। विश्व का अर्थतंत्र गड़बड़ा जाएगा, सामाजिक ढांचा बुरी तरह से क्षत-विक्षत होगा। राजनीति और राजनेताओं यह बुरा प्रभाव डालेगा।
इस संपादकीय को पढ़कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि आपका विजन बहुत ही मानवीय है। आपको सामाजिक जीवनमूल्यों की चिंता है। देश-दुनिया को इन चश्मों से न देखकर आप मानव हित से जुड़े चश्मे से देखने के आदी हैं। और यह सभ्य संसार के लिए जरूरी ही नहीं अनिवार्य भी है। संपादकीय के माध्यम से जो जानकारी दी गई है यह महत्वपूर्ण तो है ही साथ में ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी है। क्योंकि इसे जानकर हम सावधान तो हो ही सकते हैं। बधाई आपको
भाई लखनलाल, आपका स्नेह दिल को हमेशा छू जाता है। पुरवाई का प्रयास रहता है कि अपने परिवार को नई से नई जानकारी उपलब्ध करवाए।
अद्भुत जानकारी के साथ यह एक अतिचिंतित होने वाला विषय है। आम जनता इतनी अधिक तकनीकी जानकारी से अनजान रहती है। आपका संपादकीय कई उपयोगी जानकारी से अवगत कराता है। विज्ञान की ये अत्याधुनिक तकनीकें विकास के साथ भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा रही हैं।
तुमने ठीक कहा सुधा। ख़तरे की घंटी साफ़ सुनाई दे रही है।
बेहतरीन अभिव्यक्ति
शोध परक आविष्कार
सोचनीय स्थिति
हार्दिक आभार भावना।
संपादकीय – आँखों से जो उतरी है दिल में…!!
विज्ञान और तकनीक संचारकों से अक्सर कहा जाता है कि वे इन विषयों को लोगों में और विशेष रूप से आम जन में पहुंचाने हेतु सरल रोचक अंदाज़ में लिखें या बोलें ।और बाद में यही अवधारणा लोकप्रिय विज्ञान यानी पॉपुलर साइंस के रूप में अब सबके सामने है।इसी विज्ञान के रूप को हमारे संविधान के अनुच्छेद 51 में शामिल करके हमारे देश के नागरिकों को विज्ञान एवं तकनीक savvy बनाने का लक्ष्य है।
उपरोक्त वर्णित तथ्य पुरवाई के इस संपादकीय को रेखांकित करते हैं।विज्ञान और तकनीक भस्मासुर भी कैसे और कहां साबित हो सकती है। इस मानव थाती को कितना प्रयोग में लाना है ।यह भी इस नवाचार उत्पाद यानी जादुई चश्में के माध्यम से बताया गया है।रोचकता वही है जो रोचक विषयों के बीच में से अपनी बात को प्रस्तुत करे और भारतीय फिल्मों के गीतों में से हमारे संपादक ने लोकप्रिय विज्ञान संचारक की भूमिका निभा कर एक शानदार नज़ीर प्रस्तुत कर दी है।
बस यही संपादकीय से अपेक्षा रहती है जो साठ के दशक से 80के दशक तक रही और बाद में विशेषज्ञता के नाम पर कुर्बान कर दी गई।उसी को पुनः जागते देख यहां पर बहुत अच्छा लगा।
पुरवाई पत्रिका परिवार और संपादक महोदय को हृदय से बधाई।
भाई सूर्यकांत जी, आपकी टिप्पणी बहुत सारगर्भित और अर्थपूर्ण है। हार्दिक आभार।
भयानक.. बुद्धि। इंसान कभी उपयोगी बुद्धि का प्रयोग किया है? जब किया गया.. उसका लाभ उठाया गया नकारात्मक सोच से।
यह भी एक नकारात्मक सोच ही है। अब इसकी जितनी भी सफाई दी जाए..मनसा तो बिल्कुल सही नहीं है। विज्ञान का यह कैसा समय है? प्रकृति से छेड़छाड़ तो कभी स्वयं के विनाश में लिप्त।
आपका संपादकीय सदैव एक चुनौतीपूर्ण विषय पर होता है और हमें नई जानकारी भी प्राप्त होती है। आपकी लेखनी सदा मार्गदर्शन करती रहे।
स्थिति सच में चिंताजनक है।
Your Editorial of today informs us about the app that those two Ivy League students have prepared with the help of AI and which when used with smart Rayban goggles can pierce into any other object n make pictures.
It is an absolutely new and unknown world for us who belong to the 40s generation.
But of course it is very interesting n makes us marvel at the curiosity n inventive power of the modern youth.
Thanks for enlightening us about this innovative project of these two young students.
Warm regards
Deepak Sharma
Deepak ji, more than curiosity, it is the dangers of artificial intelligence that make us shudder as to where are we heading !!
सच्चाई यह है अगर इस क़िस्म की हैकिंग से बचना है तो आमेजन के जंगल में रहना होगा, कोई मोबाइल या फिर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस साथ में नहीं रखनी होगी तभी हैकिंग से बचा जा सकता है
लेकिन मित्र इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए हृदय तल से आभार
सर जी, फिर privacy का रोना क्यों रोना?
ओह! अत्यंत चिंताजनक। संपादक जी आपने वैश्विक चुनौतियों और उनकी गंभीरता पर सवाल उठाए हैं।एकदम नयी जानकारी चौंकाती है,हम किस दुनिया में रहते हैं,और आप एक अनोखी मे ले जाते हैं। फोटो से चेहरों के पीछे का सच जानने की एक कला भारतीय ज्योतिष की भी धरोहर है। अभी भी कुछ ज्योतिष चेहरा पढ़कर भूत, वर्तमान और भविष्य बताने में माहिर हैं।हमें अपने साथ हुआ वाक्या याद आ रहा है।एक बार हमारा स्थानान्तरण झाबुआ हो गया।हम जाना नहीं चाहते थे किन्तु स्थानान्तरण रुकने में लंबा समय लग रहा था विवश होकर हमें झाबुआ जाना पड़ा।हमें लगभग दो महीने वहां रहना पड़ा।इस दौरान हमारी प्राध्यापक मित्र के घर एक पहुंचे हुए ज्योतिष/संत आए। उन्होंने हमें बताया कि आपका यहां आना ईश्वरीय शक्ति के अधीन आपके परिवार के हित के लिए हुआ है। आपके ग्रह आपके पति के लिए अभी अनुकूल नहीं है। फिर उन्होंने हमारे अगूंठे पर एक दृश्य दिखाया,वह अभी भी हमारे मानस पटल पर अंकित है। उसमें हमारे इंदौर के घर के खाने के कमरे का दृश्य दिखाया गया था। इसमें हमारा परिवार जोशी साहब, बेटी,बेटा, भानजी भोजन के लिए बैठे थे, कुछ चर्चाएं हो रही थीं ,टी वी यद्यपि बंद था फिर भी कोई छाया उसके आसपास थी। ज्योतिष जी ने कहा यही सत्य इसे ही घर से निकालना है,अगर आप वहां होती तो यह आपके साथ होती, फिर पति पर भारी पड़ती। अभी इसकी नकारात्मक ऊर्जा आपके साथ है।आप अभी एक महीना यहीं रहेंगी,तब तक आप एक तुलसी के गमले में धनिया बो दीजिए। थोड़ा कष्ट देकर बाधा हट जाएगी। एक माह बाद आप इंदौर होंगी।यह बात सन 2003 की है। सचमुच मई 2003 में जोशी साहब का हार्निया का आपरेशन हुआ। जून 2003में हम इंदौर आ गए। केवल हमारे चेहरे को पढ़कर इतना सटीक बताकर, वर्तमान को अंगूठे पर दिखाकर, भविष्य को राह देने का काम कोई विरला ही कर सकता है। किन्तु अपने अंगूठे पर अंकित दृश्य हमें आज भी रोमांचित कर देता है।उस समय हमने अपने घर लौटने की खुशी में सब बिसराए दिया था, बाद में हमने उन संत ज्योतिष का बहुत पता लगाया किन्तु नतीजा सिफर रहा।अब यदि एआई की मदद से,दो छात्रों ने चेहरे से सब कुछ जानने की कला ढूंढ निकाली है, तो इसका सदुपयोग होगा तो मानवता विकसित होगी। बहरहाल आपकी लेखनी का कमाल है कि कहां-कहां से अनूठा खोज लाती है।आपकी लेखनी जिज्ञासाएं भर्ती रहे और हम उसमें से कुछ जुटा सकें इसी के साथ दीपपर्व की ढेर सारी शुभकामनाएं
कला जी, जो ज्योतिषी आपको मिले, उन्होंने अपनी विद्या का सदुपयोग किया जबकि Artificial intelligence का दुरुपयोग किया जा रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सफर आज यहाँ तक पहुँच गया, इस नये शोध का आगे क्या श्याम पक्ष होगा ? ये प्रगति का एक कदम विकृत मानसिकता वालों के लेिए एक नया आयाम देने वाला है।
आपकी संपादकीय ने ज्वलंत विषय को छुआ है। आपकी कलम को नमन।
रेखा जी यह हम सब की साझी समस्या है। इससे निपटने के उपाय खोजने होंगे।
हम सब जानते हैं , ईश्वर ने मनुष्य और प्रकृति को बनाया है ! सारे जीव-जंतु भी ईश्वर की रचनाएँ हैं। पर भौतिक ज्ञान मनुष्य निर्मित है। हां ! ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है !! मनुष्य , ज्ञान द्वारा ही जीवन की समस्याओं का समाधान करता है। कुछ नए जीव भी अब मनुष्य बना चुका है। क्लोनिंग होती रही है। नई भेड़ बनाई गई थी। हमारी समस्याएं सुलझानेवाला ज्ञान ही, अब हमारे लिए समस्याएं पैदा कर रहा है। ज्ञान का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। यह संपूर्ण मानवता के लिए अति घातक बनता जा रहा है। आपका यह संपादकीय भी पाठकों का लिए बहुत उपयोगी है। हार्दिक धन्यवाद !!
ज्ञान के दुरुपयोग की अब कोई सीमा नहीं है। अब ‘दुर्ज्ञान’ जैसा शब्द भी गढ़ना पड़ेगा।
विज्ञान के द्वारा मनुष्य ने मनुष्य के विकास के लिए अनेकों अविष्कार किये जिससे कि उनका जीवन स्तर उठे, यह हुआ भी किन्तु कुछ अविष्कार ऐसे हुए जिनसे इंसान का विनाश ही हुआ। रे बैन स्मार्ट चश्मा उनमें से ही एक है। भले ही इसको बनाने वाले छात्र या दावा कर रहे हों कि वे अपने इस अविष्कार को सार्वजनिक नहीं करेंगे लेकिन यह सार्वजनिक तो हो ही गया।
इसका फायदा हैकर न उठायें ऐसा हो ही नहीं सकता। यह लोगों के निजी जीवन में सेंध लगाने का अनुचित साधन सिद्ध होगा। इससे बचने के उपाय भी खोजने होंगे। आपका संपादकीय इस शोध की जानकारी के साथ लोगों को जागरूक करते हुए चेतावनी भी दे रहा है।
साधुवाद आपको।
सुधा जी आपकी सार्थक और अर्थपूर्ण टिप्पणी संपादकीय समझने में सहायक सिद्ध होगी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस बार का संपादकीय तो बिल्कुल अकल्पनीय है किंतु सर्वप्रथम इस बात की तारीफ करनी होगी कि खेल गाँव की व्यस्तता में भी आपने संपादकीय के लिए इतना महत्वपूर्ण विषय ढूँढ लिया। यह सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक है। आपकी आँखों में भी वह लैंस है जो चारों तरफ घूमता रहता है और पूरी दुनिया की घटनाओं पर अपनी नजर रखता है साथ तथ्यात्मक खोज करने वाला सुपर पावर दिमाग!!!!!आप सचमुच कमाल हैं! अब बात संपादकीय पर-विज्ञान ने विकास के क्षेत्र में संसार को जितनी उत्कृष्टता प्रदान की है और उसके जितने लाभ हुए हैं, उससे कम उसके नुकसान नहीं है ।एक अच्छी सोच जिस उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ती है, एक अपराधी प्रवृत्ति वाली नीची और दुष्ट सोच उससे चार कदम आगे जाकर उसका तोड़ निकाल लेती हैं। जैसे सरकार नियम बनाती है, कानून बनाती है और तोड़ पहले निकल आते हैं।
बहुत चिंतित करने वाला है यह संपादकीय। शैतान अपने हर रोम में आँखें रखता है ।
आपकी यह सोच जायज है कि यदि ये दो विद्यार्थी ऐसा ऐप बना सकते हैं जो कि ‘रे-बैन’ स्मार्ट चश्मे से फ़ोटो लेकर उसकी पूरी जानकारी हासिल कर सकता है, तो जो पूरी दुनिया के प्रोफ़ेशनल हैकर हैं वो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे?” अब तक तो यह समाचार उन सब तक पहुँच ही गया होगा। भले ही इन दो विद्यार्थियों ने केवल शौकिया तौर पर यह ऐप बनाया है मगर जो हार्ड कोर प्रोफ़ेशनल कंप्यूटर एक्सपर्ट हैं, वो तो ख़तरनाक किस्म का ऐप बनाने में जुट ही गये होंगे।
आपके संपादकीय के शीर्षक में गाने की पंक्ति पढ़कर विश्वास नहीं हो रहा था कि अंदर का मटेरियल इतना ज्यादा खतरनाक होगा लेकिन आपने संदर्भ बहुत अच्छा दिया इसमें कोई दो मत नहीं।
इस संपादकीय ने वाकई एक नई चिंता संसार को दी है और वह चिंता भी सामान्य नहीं।
इस डरावने लेकिन सत्य संपादकीय के लिए आपका प्रयास काबिले तारीफ है और प्रशंसनीय भी।
बहुत-बहुत बधाइयाँ एवं शुभ यात्रा।
पुरवाई का तहे दिल से शुक्रिया।
नीलिमा जी, आपकी टिप्पणी टैक्सी में ही पढ़ रहा हूं। दरअसल जब से मुझे इस चिंताजनक आविष्कार का ज्ञान हुआ, मैंने तय कर लिया कि इसे पुरवाई के पाठकों के साथ साझा करना है। विज्ञान का दुरुपयोग एक लंबे अरसे से होता आ रहा है। मगर कृत्रिम बौद्धिकता का कोई अंत दिखाई नहीं देता।
आपकी चिंता में सारे विश्व की चिंता समय हुई है तेजेन्द्र जी!यह छोटी बात नहीं!
जी आपने सही कहा।
एक नए विषय पर संपादकीय पुनः। यह चश्मा किन्हीं अपराधियों के विषय में तो ठीक है परंतु आम आदमी हर दिन एक नए खतरे की जद में आता चला जा रहा है। नए आविष्कार काफी खतरनाक साबित हो सकते हैं मानव सभ्यता के लिए परंतु अब मानव रुकने वाला कहां अब तो उसे हर रोज एक नया अविष्कार चाहिए।
न जाने मनुष्य कहां जाकर रुकेगा। उसकी इस उड़ान के कितने खतरों में वह खुद भी फंसेगा, आने वाला कल ही बता पाएगा
निर्देश जी, सच में वैश्विक स्तर की चिंता का विषय है।
आ0तेजेन्द्र जी! बहुत ही हैरान करने वाला आविष्कार है यह । सचमुच अब विज्ञान बंदर के हाथ का उस्तरा बनता जा रहा है जिससे वो अपना ही गला काटने पर अमादा है। वैसे तो अब भी जैसे ही हम किसी दर्द, बीमारी या परिधान की बात आपस में करते हैं तो वैसे ही विज्ञापन या रोल्स फ़ेसबुक पर आने लगती हैं। और व्यक्तिगत जानकारियाँ तो हमारी होती ही है सोशल मीडिया पर क्यूँकि हर सरकारी ,बैंक, फॉर्म , या एप आपसे पहले आपकी जानकारी मांगता है।
मैने बहुत पहले कभी रीडर्स डाइजेस्ट में एक व्यक्ति(अब नाम याद नहीं ) पढ़ा था कि वो दीवार के पार अपनी नंगी आँखों से देखने की क्षमता रखता था।
ख़ैर ये बहुत ही ख़तरनाक है जैसा कि सब कह रहे हैं।और यह हो ही नहीं सकता कि इसका दुरुपयोग न हो।
मैं भी एक गाने से समापन करती हूँ
” तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाह में है।”
—–ज्योत्स्ना सिंंह
ज्योत्सना जी विषय तो सच में चिन्ता वाला है। वैसे भी एक बिग बॉस सब पर निगाह रखे है… ऊपर से कृत्रिम बौद्धिकता… मामला बहुत नाज़ुक है।
सजग करता संपादकीय। थोड़ा डराता हुआ सा भी। स्पष्ट है AI की दुनिया में हम कितने असुरक्षित हैं। गोपनीयता या प्राइवेसी की बात तो अब बीते समय की बात लगती है। AI कहीं हमारे लिए भस्मासुर न सिद्ध हो।
नीलम, आपकी चिंता वाजिब है!!!
अभी पढ़ पाई आपका संपादकीय…. पढ़ती सदैव हूं सर आपके लेखन के विषय अद्भुत होते हैं,समाज के लिए अति आवश्यक भी….किन्तु आपके लेखों पर टिप्पणी कर सकूं इतनी क्षमता मुझमें कभी नहीं आ पाएगी…बस हर बार पढ़कर यही सोचती हूं कि आप इतने कठिन विषय पर इतनी सरलता से कैसे लिख लेते हैं ।
आज का मुद्दा भी बेहद संवेदनशील है….ये दिनों दिन AI में होती उन्नति प्रगति आपस में अविश्वास को जन्म दे रही है…ऐसे लगता है कि कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं…..
आपकी छुटकी
शिवानी विनय सिंह
प्रिय शिवानी, आपकी टिप्पणी सार्थक है। बेझिझक अपनी टिप्पणी लिखा करें। मैं तो युवा पीढ़ी से कुछ ना कुछ सीखना पसन्द करता हूं।
AI का अविष्कार मानव के विनाश के लिए हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं। जिन दो छात्रों ने जो कुछ नया परोसा है, उसे विनाशकारी तत्त्व लेकर अब तक उड़ भी गये होंगे। आख़िर ऐसे ही तो कलियुग की विनाशलीला सक्रिय हो-हो कर एक दिन सृष्टि का अन्त करेगी।
आदरणीय ! आपने जो निराला विषय सम्पादकीय के लिए लिया है, वह पाठकों पर उपकार ही तो है। आपकी लेखनी को जितना प्रणाम किया जाए, कम है।
आदरणीय शशि मैम, आपका स्नेह हमारे लिये महत्वपूर्ण है। आपकी चिन्ता हम सब की चिन्ता है।
इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या – आगे आगे देखिए होता है क्या
जनाब-ए-आला, अभी तो यह सब AI टैकनॉलोजी का आगाज़ है, इसका अंजाम क्या होगा उसका कोई अंदाज़ा नहीं। नेकदिल साइंसदानों और शोधकर्ताओं की फित्रित तो इंसान और इंसानियत के भले के लिए होती है लेकिन इस दुनिया में सिर फिरे और शैतान भी बसते हैं और यही लोग दूसरों की तकलीफ़ में मज़ा लेने वाले होते हैं। हार्वर्ड के इन दो छात्रों ने जो नई ईजाद की है, ऊपर वाले से यही दुआ है कि इसका कोई नाजाइज़ फ़ायदा न उठाये।
जितेन्द्र भाई,आपके इस सम्पादकीय से एक बहुत बड़ी चेतावनी उन लोगों के लिए भी है जो फ़ेसबुक, Instagram और दूसरे माध्यमों पर अपने बारे में सब कुछ लिखते हैं। यह चशमा सब से पहले तो उनको पकड़ेगा। आपके इस सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। एक बिल्कुल नई जानकारी मिली।
विजय भाई आप हर संपादकीय को बहुत गंभीरता से पढ़ते हैं और अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। आपकी हर टिप्पणी मुझे कुछ ना कुछ नया सीखने को प्रेरित करती है ताकि अगला संपादकीय और बेहतर हो सके।
सर, तकनीक के हमेशा से दो पहलू रहे हैं, एक से लाभ तो दूसरे से नुकसान, लेकिन अब हम जिस पड़ाव पर है, A I की यह भयभीत करने वाली तस्वीर है। जिस रफ्तार से यह आगे बढ़ रहा है, वह अनियंत्रित गति और भी खतरनाक साबित हो सकती है। आपको इस विषय पर बढ़िया संपादकीय के लिए आभार।
शैली जी, जब-जब विज्ञान बेलगाम हुआ है, विश्व का नुकसान हुआ है। हाल ही में कोलकात से मित्र सुरेश चौधरी जी ने मेरी कविता पतझड़ को कृत्रिम बौद्धिकता से संगीतबद्ध करवा कर गवाया है। मैं स्वयं हैरान हूं।
ज्ञान के दुरुपयोग की अब कोई सीमा नहीं है असीमित! हम डर कर कहां जाएं!
सही कहा भाग्यम जी।