हमारी हिंदी फ़िल्मों में नमक का बहुत महत्वपूर्ण किरदार है। ‘ओंकारा’ फ़िल्म में फ़िल्म की हिरोइन बिपाशा बसु के लिए गुलज़ार साहब ने भी लिख डाला, “जबां पे लागा, लागा रे, नमक इश्क का, नमक इश्क का!” और फिर गाने में आगे वह अपने बलम से उसके होठों का नमक भी माँगती है। उस बेचारी को भी नहीं मालूम कि उसका नमक और बलम का नमक मिल कर बहुत अधिक नमक हो जाएगा, जो कि दोनों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है।
बिना नमक के जीवन से स्वाद ग़ायब हो जाता है। मगर उच्च रक्तचाप वाले मरीज़ों के लिए तो नमक ज़हर है। फिर भला वे नमक खाएं, तो कितना और कौन-सा?
फ़िल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह ने अपने दल के डाकुओं से कह रखा था, कि नमक कम खाएँ । अगर डाकुओं की सेहत अच्छी नहीं होगी और ब्लड प्रेशर हाई होगा, तो वे घोड़े पर बैठ कर डाका डालने कैसे जापाएंगे। अब कालिया से रहा नहीं गया, उसने ताला खोल करगब्बर का नमक खा लिया, इस पर गब्बर को चढ़ा ग़ुस्सा। उसने अपने ही अंदाज़ में पूछा – “अब तेरा क्या होगा कालिया?”
कालिया ने घबराते हुए मान लिया, कि उसी ने गब्बर का नमक चुरा कर खा लिया है। उसने लगभग घिघियाते हुए कहा- “सरदार, मैंने आपका नमक खाया है !”
भला ये गब्बर कैसे बर्दाश्त करे, कि कोई चुपके से उसका नमक खा जाए और गिरोह का नियम-कानून तोड़ दे। गब्बर अपनी डरावनी हँसी बिखेरता हुआ कहता है- “तो ले, अब गोली खा!” बेचारा बी.पी. का मरीज़ भी गोली खाने को मजबूर है। नमक खाने की तो उसको भी अनुमति नहीं है।
हमारी हिंदी फ़िल्मों में नमक का बहुत महत्वपूर्ण किरदार है। ‘ओंकारा’ फ़िल्म में फ़िल्म की हिरोइन बिपाशा बसु के लिए गुलज़ार साहब ने भी लिख डाला, “जबां पे लागा, लागा रे, नमक इश्क का, नमक इश्क का!” और फिर गाने में आगे वह अपने बलम से उसके होठों का नमक भी माँगती है। उस बेचारी को भी नहीं मालूम कि उसका नमक और बलम का नमक मिल कर बहुत अधिक नमक हो जाएगा, जो कि दोनों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है।
नमक को लेकर हिंदी में दो महत्वपूर्ण फ़िल्में बनी हैं – ‘नमक-हराम’ और ‘नमक-हलाल’। पहली फ़िल्म में सुपर-स्टार थे राजेश खन्ना और उनका साथ दे रहे थे अमिताभ बच्चन। और दूसरी फ़िल्म में सुपर-स्टार थे अमिताभ बच्चन और उनका साथ दे रहे थे शशि कपूर।
अब आते हैं हम सही मुद्दे पर। हिंदी फ़िल्मों में… ‘नमक’ शब्द फ़ारसी का और ‘हराम’ एवं ‘हलाल’ शब्द हैं अरबी के हैं । कितना ज़बरदस्त मिश्रण है। फ़ारसी और अरबी के मिश्रण से बने शब्दों को हम हिंदी के शब्द समझते रहें। हमने तो कभी सोचा ही नहीं, कि जिस एक चीज़ के बिना हमारे भोजन में स्वाद आ ही नहीं सकता, उस ‘नमक’ शब्द को फ़ारसी शब्दावली से लिया गया है। सवाल यह उठता है कि जब तक फ़ारसी का नमक भारत नहीं पहुँचा था, तब तक नमक को भारत में क्या कहा जाता रहा होगा ?.. .
एक किंवदंती यह भी है कि ‘हिमालयन पिंक सॉल्ट’ हानिकारक नहीं होता। आम आदमी प्रायः दूसरों को उपदेशदेता हुआ कहता है – “अरे, यह जो सफ़ेद नमक होता है न, यह तो ज़हर के समान होता है। हमारे ख़ानदान में तो हमेशा से सेंधा नमक ही खाया जाता है। यह नमक प्राकृतिक खनिज होता है। नेचुरल चीज़ों का तो ज़माना ही नहीं रहा। आजकल न जाने कौन सी आयोडीन डाल-डाल कर नमक बनाया जा रहा है!”
याद रखने लायक बात यह भी है कि हर प्रकार के नमक में ‘सोडियम क्लोराइड’ होता है, जिसे बहुत सतर्कतापूर्वक प्रयोग में लाना चाहिए । सीमित मात्रा में नमक हमारे शरीर के लिए जरूरी है, क्योंकि यह फ्लूड बैलेंस, नर्व्स फंक्शन को बनाए रखने में मदद करता है। मगर एक निश्चित मात्रा से अधिक नमक इस्तेमाल करने से बल्ड प्रेशर बढ़ता है, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का डर भी बढ़ जाता है।
आयुर्वेद में भी अधिक नमक खाने पर चेतावनी देते हुए बताया गया है कि ज़्यादा नमक खाने से शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यह शरीर के मेटाबोलिक प्रोसेस और खासकर अग्नि से संबंधित होता है। डॉ. अन्नू प्रसाद का कहना है कि नमक की प्रकृति गर्म होती है, अगर ज्यादा मात्रा में इसका सेवन रोज किया जाए, तो यह पित्त दोष बढ़ा सकता है। यह हाइपरटेंशन होने या ब्लड प्रेशर बढ़ने का कारण बन सकता है।
नमक शरीर में पानी को रोके रखता है। इसलिए जिस दिन आप अधिक नमक खाते हैं, आप पेशाब करने के लिए कम जाते हैं। लेकिन नमक का कम प्रयोग करने पर आपको बार-बार जाने की जरूरत पड़ती है। नमकशरीर में तरल पदार्थों के संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे जल-प्रतिधारण (वाटर-रिटेंशन) हो सकता है। यह जमा हुआ तरल पदार्थ रक्त की मात्रा को बढ़ाता है, जिसके कारण ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।
अधिक नमक के सेवन से न केवल उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) होता है, बल्कि शिराएं भी सख्त होने और सिकुड़ने लगतीहैं। इसके कारण शरीर के प्रमुख अंगों में रक्त और ऑक्सीजन का प्रवाह कम होने लगता है। ऐसी स्थिति में हृदय को पूरे शरीर में रक्त प्रवाहके लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, इसके कारण ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है।
हम हिमालयन पिंक सॉल्ट और सेंधा नमक के बारे में तो ऊपर बात कर चुके हैं मगर फिर भी लोगों के मन में यह धारणा है कि काला नमक ब्लड प्रेशर के लिए अच्छा होता है। नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ़ हेल्थ के अनुसार ‘नमक चाहें कोई भी हो, सोडियम सभी में होता है… बस किसी में कम और किसी में अधिक मात्रा में सोडियम पाया जाता है। काले नमक का सेवन ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए सामान्य तौर पर सुरक्षित माना जाता है… लेकिन इसे भी सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए।
विश्व के पाँच देश जो कि नमक का सर्वाधिक निर्यात करते हैं, उसमें भारत का तीसरा स्थान है। पहले पाँच देशों के नाम हैं – नीदरलैंड्स, जर्मनी, भारत, अमेरिका और चिली। भारत में सबसे अधिक नमक गुजरात में पैदा किया जाता है। गुजरात का नाम याद आते ही अंग्रेज़ी शासन का वह ज़माना याद आता है- जब यह कानून था कि नमक केवल सरकार बना सकती है। भारत में जन-सामान्य द्वारा घरेलू उपयोग हेतु नमक का उत्पादन सदियों से स्थानीय स्तर पर ही किया जाता रहा, परंतु जब ब्रिटिश सरकार ने नमक कानून द्वारा इस पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके अनुसार ब्रिटिश सरकार के अलावा न तो कोई नमक का उत्पादन कर सकता था और न ही उसका विक्रय। तब जनता को मजबूरन ऊँचे मूल्य (लगभग 14 गुना) पर नमक को खरीदना पड़ता था। इसका लाभ ब्रिटेन की कंपनियों को मिलने लगा। क्योंकि अब आम आदमी नमक नहीं बना सकता था।
वैसे तो मुग़लों के ज़माने से नमक बनाने पर टैक्स था, लेकिन अंग्रेज़ों ने तो सारी हदें पार कर दी थीं। ऐसे में गुजरात से महात्मा गाँधी ने 12 मार्च 1930 को अपने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से समुद्रीय तट दांडी तक पैदल यात्रा करते हुए नमक बना कर अंग्रेज़ों के बनाए क़ानून को तोड़ा था। उनके साथ उस दिन उनके 78 अनुयायी भी थे, जिन्होंने गाँधीजी के साथ मिलकर समुद्र तट पर नमक बनाते हुए शांतिप्रिय ढंग से अंग्रेज़ी वर्चस्व को चुनौती दी थी ।
अब यह बताना भी ज़रूरी है कि विश्व भर में 76 देश भारत का नमक खाते हैं। मगर उन्होंने नमक-हराम या नमक-हलाल जैसे शब्द शायद नहीं सुने होंगे। भारत में लोग बातें चाहे कितनी भी मीठी करें, मगरनमक खाने में दुनिया के अन्य देशों से कहीं आगे हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक आम इंसान को दिन में पाँच ग्राम नमक खाना चाहिए । जबकि एक आम भारतीय एक दिन में आठ ग्राम तक नमक खा लेता है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार, सामाजिक-जनसांख्यिकीय वर्गों के सभी वयस्कों में अधिक मात्रा में नमक का सेवन देखा गया। थोड़ी हैरानी की बात यह रही कि पुरुषों का औसत सेवन (7.9 ग्राम प्रतिदिन) महिलाओं (8.9 ग्राम प्रतिदिन) की तुलना से अधिक था।
नौकरीपेशा लोगों में नमक का सेवन (8.6 ग्राम) बेरोजगारों की तुलना में अधिक पाया गया। वहीं, तंबाकू का सेवन करने वालों (8.3 ग्राम), मोटापे से ग्रस्त लोगों (9.2 ग्राम) और उच्च रक्तचाप पीड़ित व्यक्तियों (8.5 ग्राम) में, क्रमशः गैर-तंबाकू सेवन करने वालों, सामान्य वजन वाले और सामान्य रक्तचाप वाले व्यक्तियों की तुलना में अधिक नमक का सेवन देखा गया |
तो आइए, आज ही ये संकल्प लेते हैं कि अपने जीवन से सफ़ेद चीज़ों को आहिस्ता-आहिस्ता कम करते चले जाएंगे। इन सफ़ेद चीज़ों में शामिल हैं – चीनी, नमक, बासमती चावल, और गेहूँ का आटा। पुरवाई का कहा मानिए और सेहतमंद बने रहिए ।
एक प्रासंगिक विषय पर चुटिला सा संपादकीय जो आपके चेहरे पर स्मित लाकर आपको सफेद जिंसों यथा नमक,चीनी,बासमती चावल के अंधाधुंध दुरुपयोग से उपजी स्वास्थ्य समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझाता है। साथ ही साथ खाद्य मिथकों की सच्चाई से रु ब रु कराता है।
नमक के इतिहास और गांधीजी तथा उनके मुट्ठी भर अनुयायियों के साहस की गाथा यथा दांडी मार्च को याद दिलाता है।
कितना नमक प्रतिदिन खाना चाहिए और कितना खाया जाता है,वैज्ञानिक पुट देता एक ऐसा संपादकीय जो पाठकों को सचेत करता है।
यूं भी प्रधान मंत्री जी तेल को अपने खाने में से दस प्रतिशत की कटौती करने की सलाह दे चुके हैं।यह संपादकीय उसी दिशाएं एक सजग और सशक्त कदम है।
हार्दिक शुभकामनाएं।
नमक तो जीवन के हर क्षेत्र में और हर व्यंजन में मिलता ही है। फिर भारत जैसे विभिन्न व्यंजन और सहायक सुस्वादु बनाने वाले व्यंजन अचार, मुरब्बा, चटनी बगैर नमक और शक्कर के संभव ही नहीं है। जो खाने में जाता है वह तो होता ही है, इन स्वाद बढ़ाने के सहायक खाद्य पदार्थों में भी जाता है।
जहां चावल मुख्य भोजन है, वे बासमती चावल नहीं खाते बल्कि मोटा चावल खाते हैं। मिठाई के बिना तो दावत ही अधूरी नहीं रहती बल्कि जबान भी स्वाद लेने को लालायित रहती है।
लगातार नहीं बल्कि कभी कभी कोई भी चीज लेना खतरनाक नहीं बनती। शारीरिक स्थिति के अनुसार सभी चीजैं सीमित मात्रा में लें। शरीर आपका है और इसको संभालकर आप ही रख सकते हैं।
बहुत सुंदर ढंग से लिखा गया संपादकीय सर्वप्रथम आपको बधाई।
नामक हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है,एक राजा थे उसकी तीन बेटियां थी, राजा ने अपनी तीनों बेटियों को बुलाया और पूछा कि आप मुझे कितना प्यार करती हो,
पहली बेटी ने बोला सोने जितना।
दूसरी बेटी ने बोला चांदी जितना।
तीसरी ने बोला नमक जितना।
इस पर राजा क्रोधित हुआ और उसने बेटी को महल से निकाल दिया।
बाद में राजा को एहसास हुआ नमक कितना जरूरी है।
नमक का दरोगा में सिख बीवी पाकिस्तान से नमक मंगवाती है। और नमक हमारे लिए कितना जरूरी है और नमक से ही बीपी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं,
आप ने सिनेमा से भी जोड़ा,
कुल मिलाकर बड़ा धमाका।
इस बार पुरवाई का संपादकीय -‘ जबां पे लागा, लागा रे… नमक!’ मौजूं तो है ही उपयोगी भी है। सेहत से संबंधित बातें उतनी ही ठीक लगती हैं जितने में हमारा काम चल जाए। इससे संबंधित ज्यादा बातें उबाऊ हो जाती हैं। पर आपने इस विषय को रोचक बनाकर पेश किया है। खासकर शोले फिल्म का वह अंश बड़े ही मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पढ़ते-पढ़ते लगा कि अरे! इसे ऐसे भी।
विपाशा बसु के होंठों के नमक से लेकर नमक शब्द के भारत में आगमन की कथा दिलचस्प है। प्रति व्यक्ति नमक की खुराक, नमक के प्रकार के साथ गांधी जी की दांडी यात्रा का जिक्र करके विषय को समग्रता में समेट लिया है। नमक से होने वाले हानि और लाभ के साथ सफेद चीजों की अति सेहत के लिए नुकसानदायक है। आज के समय में इसका प्रयोग सेहत के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यह संपादकीय का सशक्त पक्ष है।
हिन्दी में नमक को लवण कहा जाता है। यह भ्रंश होकर आज के नोन में परिवर्तित हो गया है। लवण< लवन< लोन<नोन। तुलसीदास जी ने इसका प्रयोग भोज्य पदार्थों में अति महत्वपूर्ण माना है –
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
यह संपादकीय कई अर्थों में महत्वपूर्ण बन गया है। काला नमक हानिकारक नहीं है से पर्दा उठाना, उच्च रक्तचाप पर चिकित्सीय संदर्भ को लेकर बात कहना तथा नमक के उत्पादन में भारत का कौन सा स्थान है, आंकड़ों के साथ स्पष्ट करना आदि के डेटा कलेक्ट करना श्रमसाध्य था।
इस संपादकीय को जो भी पढ़ेगा वह नमक के बारे में एक बार सोचेगा जरूर कि हमें दैनिक जीवन में इसका कितना प्रयोग करना है। अगर ऐसा होता है तो यह संपादकीय की सफलता मानी जाएगी।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
वाह आप अद्वितीय हैं। पूरी की पूरी नमक पुराण लिख डाली, नमक को संस्कृत या शुद्ध हिंदी में लवण कहते हैं वैसे समुद्र के नमक को शाब्दिक रूप से लवण कहा जाता है, पुराणों की बात करें तो प्रसिद्ध दैत्य हुआ था लवणासुर जिसका उल्लेख रामायण में और भागवत में मिलता है, लवणासुर के आतंक से जब सब परेशान थे तब रामचन्द्र जी ने अनुज शत्रुघ्न कोउसक वध करने भेजा था, लबणासुर नाम लवण की तीव्रता या समुद्र के खतेपन वाले स्वभाव के कारण पड़ा था, वैसे लवण के कई औषधि के गुण हैं और रसायन शास्त्र में लवण के प्रकार के होते हैं। चलिए आपसे प्रेरित होकर मैन भी लवण पुराण लिख डाली।
आदरणीय तेजेंद्र जी
चलिए मान लिया कि आप अच्छे संपादक के साथ-साथ एक अच्छे चिकित्सक हैं क्योंकि आपने तो इस बार के संपादकीय में नमक की पूरी उपापचय क्रिया ही समझा दी है। बहुत बधाई।
आपका पिछला संपादकीय भाषा से संबंधित था इस बार भी आपने नमक शब्द की उत्पत्ति का उल्लेख किया है। संस्कृत में नमक के लिए ‘लवण:शब्द का प्रयोग होता है।नमक मनुष्य के लिए कितना प्रिय और आवश्यक है वह इस बात से समझा जा सकता है कि ‘लावण्य’ ,लुनाई,लोनी लोनी, आदि जिन शब्दों का अर्थ सुंदरता है ,वह संस्कृत के लवण का ही एक रूप है।
नमक के स्वाद का महत्व दिखलाने के लिए अनेक देशों में लोक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें नमक के बिना भोजन का अधूरा स्वाद रहता है। आखिर ऐसा होगी क्यों ना क्योंकि सागर के लवणीय जल से ही तो सृष्टि उपजी है।
रक्तचाप, हृदय रोग के भय से लोगों ने नमक का प्रयोग इतना कम कर दिया कि ,मैं तो अक्सर सुनती रहती हूं कि शरीर में सोडियम कम हो जाने पर लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। यदि शरीर में सोडियम की मात्रा कम हो जाए तो ‘मति भ्रम ‘उत्पन्न होता है, मांसपेशियां अकड़ती रहती हैं।
इस साल के फूल के रोचक संपादकीय के लिए बधाइयां।
सरोजिनी जी, मैं कुछ भी नहीं हूं… बस पुरवाई के पाठकों का सीधा सा सेवक हूं। उनके लिये विषय ढूंढता हूं, शोध करता हूं और उन तक अपनी बात पहुंचाता हूं। आप जैसा ज्ञानी नहीं हूं ना ही मुझे ऐसा कोई ग़ुमान है। आप सच में ज्ञान का स्त्रोत हैं, प्रेरणा स्त्रोत हैं। आपका मुकाबला करने की कोई सोच भी नहीं सकता।
“नमक” शब्द हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, चाहे वह प्रेमचंद की कहानी “नमक का दरोगा” हो या अनामिका की कविता “नमक”। यह शब्द ईमानदारी, भ्रष्टाचार, दुख, और स्वाद जैसे विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है।
अनामिका जी की भाषा में –
कमज़ोर है दिल नमक का,
कितनी जल्दी पसीज जाता है!
गड़ जाता है शर्म से
जब फेंकी जाती हैं थालियाँ
दाल में नमक कम या जरा तेज़ होने पर!
वो जो खड़े हैं न—
सरकारी दफ़्तर—
शाही नमकदान हैं।
बड़ी नफ़ासत से छिड़क देते हैं हरदम
हमारे जले पर नमक!
जिनके चेहरे पर नमक है—
पूछिए उन औरतों से—
कितना भारी पड़ता है उनको
उनके चेहरे का नमक!
इस अंक का सम्पादकीय नए नदाज से लिखा गया है. ‘नमक’ – एक सामान्य शब्द का सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक महत्व बड़े रोचक धंद से प्रस्तुत किया गया है. अंक की अन्य विधाएं भी उच्चकोटि की हैं. बहुत बहुत धन्यवाद .
भाई जयंत कर शर्मा जी मैं प्रेमचन्द जी और अनामिका जी के सामने तो सच में कुछ भी नहीं हूं… बस अपने पाठकों के लिये एक विषय उठाता हूं,उस पर शोध करता हूं और अपनी बात कह लेता हूं। ये दोनों नाम तो श्रद्धेय हैं।
साधारण जैसा दिखाई पड़ने वाला दैनिक दिनचर्या में उपयोगी नमक , महत्वपूर्ण है। तभी तो सेहत के साथ-साथ नमक पर आंदोलन से लेकर फिल्म तक बनी है। खानपान में नमक के उपयोग का बैलेंस बहुत आवश्यक तो है जिसे कोई भी तब तक गंभीरतापूर्वक नहीं ले पाता जब तक बीपी उसे प्रभावित नहीं करती। इस सत्य को हर उम्र वर्ग का व्यक्ति भली-भांति जानता तो है पर फोलो कर पाने में असफल है। संपादकीय के माध्यम से नमक के सदुपयोग को बड़ी बारीकी से स्पष्ट करने कि बात कही गई है। इसलिए आज यह कहना सटीक है कि आपकी संपादकीय नमकीन है। धन्यवाद
आजकल तीन सफेद चीजों को छोड़ने की बात लोग कहते रहते हैं। हम पढ़ते रहते हैं और आज आपने वही टॉपिक ले लिया। कहां से शुरू किया कहां पहुंच गए यह आपकी खूबी है जो बहुत अच्छा लगता है। बहुत बढ़िया धन्यवाद बधाइयां आपको।
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का पुरवाई का इस सप्ताह का संपादकीय एक अत्यन्त रोचक विषय पर आधारित है और वह है नमक, जिसमें स्वास्थ्य और सिनेमा का बेहतरीन तड़का लगाया गया है। निस्संदेह नमक नामक खाद्य पदार्थ बहुत कम मात्रा में हमारे शरीर के लिए आवश्यक है लेकिन उस सीमा से अधिक लेने पर सभी को रक्त चाप नियंत्रित करने के लिए गब्बर सिंह रूपी डॉक्टर की सुझाई गोली खाने की ज़रूरत पड़ सकती है। आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने एक प्रश्न पूछा है कि नमक को भारत में किस नाम से जाना जाता था तो मेरा विनम्र मत है कि लवण शब्द इसके लिए प्रचलित था। मनुस्मृति के दसवें अध्याय के 86वें श्लोक में आया है-
सर्वान् रसानपोहेत् कृतान्नं च तिलैः सह।
अश्मनो लवणं चैव पश्वो ये च मनुषाः॥
अर्थात तिल, पत्थर, नमक, इन्हें मनुष्य द्वारा विक्रय नहीं किया जाना चाहिए।
स्पष्ट है कि बिकेगा नहीं तो मेहनत से इन्हें प्राप्त करना होगा और इनका सेवन कम किया जाएगा।
जहां तक सफेद वस्तुओं के कम इस्तेमाल के आग्रह की बात है तो आपकी यह सलाह सार्वभौमिक सत्य है कि इनका प्रयोग कम करना ही श्रेयस्कर है। एक नवोन्मेषी संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय अग्रज बधाई के पात्र हैं। https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-salt/
नमक पर बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक विश्लेषण। अति हर चीज की बुरी होती है। अधिकतर लोग इन बातों को जानते हैं किन्तु जिह्वा पर कंट्रोल नहीं ऱख पाते हैं। नमक, चीनी, गेंहू का आटा, बांसपती चावल सब जहर है। पहले घरों में मिस्सी रोटी, मक्के, ज्वार बाजरा की रोटी बनती थीं, सब चाव से खाते थे। मिठाई में भी गुड़िया या दही बूरा चलता था लेकिन सोशल मिडिया ने इंसान को इन सबको गरीबों का भोजन बता कर अधिकांश को इनसे दूर कर दिया।
अब फिर पुरानी चीजें लौटकर आ रही हैं। रिफाइंड आयल की जगह सरसों के तेल ने ले ली है।
नमक फ़ारसी भाषा का शब्द है। मुगलों के आने के पश्चात् यह शब्द प्रयोग में आया वरना इसके पहले लवण का प्रयोग होता था। आयुर्वेद का लवणभास्कर चूर्ण जो पेट की बीमारियों अपच और कब्ज में उपयोग में लाया जाता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे नोन या नून भी बोला जाता है।
आदरणीय तेजेंद्र जी,
‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना से ओतप्रोत संपादकीय के लिए हार्दिक शुभकामनायें. आपने भारतीय मानस को नमक की संतुलित मात्रा के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया
नमक की लंबी यात्रा करा दी आपने
सिनेमा, गीत संगीत से होता हुआ राजनीति में प्रवेश कर गया और फिर शरीर विज्ञान और स्वास्थ्य -सेहत पर आकर ठहर गया ।
नमक का प्रवाह और ठहराव ही सम्पादकीय का विचार है ।
Dr Prabha mishra
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादक भाई तेजेंद्र शर्मा जी ने अनेक नेक हिदायतों के साथ इस बार नमकीन संपादकीय परोसा है।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा की अपनी संपादकीय दृष्टि है और उसकी अपनी जो सृष्टि है, वह अत्यंत अर्थपूर्ण होती है।
फिल्म व स्वास्थ्य को केंद्रित करके लिखे इस संपादकीय में सामाजिकता का पहलू भी उजागर हुआ है।
नमक को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक भ्रांतियाँ व मिथक प्रचलित हैं। जैसे- रात्रि में नमक नहीं खरीदना चाहिए। आटा, दाल, तेल, अनाज, सब्जियाँ आदि तो पड़ोसी से माँग लिये जाते हैं, लेकिन नमक माँगना वर्जित है। नमक को धरती फेंकने की भी मनाही है। क्योंकि ऐसा करनेवाला कर्जदार बन जाता है। आदि- आदि। इसी तरह
विवाह के समय वर तथा वधु अरौनौ भोजन (बिना नमक का) खिलाये जाने की भी परंपरा है।
हो सकता है इन बातों में कोई लोक विज्ञान समाहित हो।
स्वास्थ्य की दृष्टि से नमक का कम से कम प्रयोग करना लाभदायक माना जाता है। यह बात बिल्कुल सवा सोलह आने सच है। सैंधव नमक,काला नमक, लाहौरी नमक आदि का उपयोग आमतौर पर परिवारो में खानपान में कम होता है। जबकि ये नमक भोजन में प्रयोग किये जानेवाले सफेद नमक की तुलना में ज्यादा फायदेमंद हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत शोधपूर्ण संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा को अनेक बधाइयाँ।
आपके नमक के सम्पादकीय में अधिक नमक खाने से जो सेहत को जो नुकसान पहुंचता है इस चेतावनी की ओर हम सब को ध्यान देना चाहिए। अपना या जिस किसी का भी नमक खाओ, ज़रूर खाओ लेकिन मिकदार के अन्दर।
आज के संपादकीय ने बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को बहुत ही रोचक ढंग से उठाया है।
वास्तव में जीवन में नमक का बहुत महत्व है। लोग अधिकतर नमकीन व चटपटा अधिक पसंद करते हैं ,इस तरह देखें तो खाने में नमक का बहुत महत्व है।
अगर यह ज्यादा भी हो जाए तो भी नुकसानदायक, खाने का मजा खत्म कर देता है और कम रहे तब भी खाने में मजा नहीं आता। आज का संपादकीय यही बता रहा है कि नमक का संतुलन बनाए रखना बहुत अधिक जरूरी है।
‘नमक हलाल’ व ‘नमक हराम’ तो मुहावरों में प्रयुक्त होता है इन दोनों पर पिक्चर भी बनी है जैसा कि आपने बताया ही है, जो उसके वास्तविक अर्थ को सार्थक करती है,लेकिन इसके अतिरिक्त भी अनेक मुहावरे ऐसे हैं जो नमक से जुड़े हुए हैं। परिश्रम का पसीना नमक के रूप में ही शरीर से बहकर बाहर निकलता है।
हलाल, हराम और नमक शब्द भले ही अरबी और फारसी के हों, लेकिन अब देश में काफी प्रचलित हैं। इसके पहले नमक को संस्कृत में लवण और देशज बोली में लोन, नोन,नून इत्यादि नामों से जाना करते थे ,नोन और नून का प्रयोग हमने भी बचपन में दादी वगैरह के मुँह से सुना। किंतु आगे जाकर प्रचलन में नमक ही चला।
इस तरफ सेंधा नमक पाकिस्तान से आता था अब नहीं पता।
संपादकीय की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नमक के विषय में जो तथ्यपूर्ण जानकारियाँ आपने दी हैं,सभी काबिले गौर हैं और ध्यान रखने योग्य भी। जिस तरह आजकल बीपी हाई और लो हो रहा है उसमें नमक का बड़ा योगदान है।हाई में कम कर दो, लो मैं चटा दो।
किंतु आपने इस बार नमक की जो महत्वपूर्ण जानकारी दी हैं,जो लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरुक हैं उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात हमारे लिए यह रही कि हमें नमक की प्रकृति गर्म है यह नहीं पता था।
जबकि हम पित्त रोग के लक्षण के बारे में बराबर जानते हैं, पर यह नहीं पता था कि ज्यादा नमक खाने से पित्त बढ़ता है।
दांडी यात्रा का जिक्र भी कमाल का रहा।
आपने जिन सफेद चीजों पर कंट्रोल करने के लिए कहा है वह ध्यान में रहेंगी,किंतु इन सबसे अलग एक बात और है -भगवद्गीता का श्लोक तो पुनीत जी ने भी बताया है किंतु शास्त्रों में भी नमक का बहुत महत्व है ,खासकर वास्तु शास्त्र और ज्योतिष में। इसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने का एक शक्तिशाली साधन भी माना जाता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को सोखता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करता है।
ज्योतिष के अनुसार नमक के कुछ विशेष उपाय घर में सुख समृद्धि और शांति लाते हैं।
वास्तु दोष को दूर करने के लिए भी नमक का प्रयोग बताया जाता है।
अगर ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो नमक चंद्र और शुक्र का प्रतीक है। ज्योतिषाचार्य धन प्राप्ति और आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए नमक के प्रयोग बताते हैं।
माताएँ बच्चों की नजर उतारने के लिये भी नमक का प्रयोग करती हैं।
नमक कभी किसी को भी हाथ में नहीं दिया जाता कहते हैं कि झगड़ा होता है।
ऐसी भी किंवदंती है कि नमक को कभी फेंकना नहीं चाहिए और जमीन पर अगर गिर जाए तो उसे उठा लेना चाहिये या फिर उसमें पानी डाल देना चाहिये।
वैसे तो हर संपादकीय महत्वपूर्ण ही होता है किंतु निश्चित तौर पर इस बार का संपादकीय बहुत अधिक महत्वपूर्ण लगा। वह इसलिए कि वह स्वास्थ्य के प्रति सतर्क कर रहा है ,सचेत कर रहा है और नमक के प्रयोग के हानि और लाभ बता रहा है, जिसे सामान्य रूप से सभी नहीं जानते।
इस संपादकीय के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया।
गाने में आगे वह अपने बलम से उसके होठों का नमक भी माँगती है। उस बेचारी को भी नहीं मालूम कि उसका नमक और बलम का नमक मिल कर बहुत अधिक नमक हो जाएगा, जो कि दोनों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। लाइन अच्छी है संपादकीय की। लेकिन इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए सिनेमा से भाषा पर आए आप उसके बाद असल मुद्दे की बात हुई। ये सामादकीय का अलग ढंग नजर आ रहा है। और हां नमक को मै भी हिंदी का ही समझा था। शुक्रिया आपका आज पता चला
एक प्रासंगिक विषय पर चुटिला सा संपादकीय जो आपके चेहरे पर स्मित लाकर आपको सफेद जिंसों यथा नमक,चीनी,बासमती चावल के अंधाधुंध दुरुपयोग से उपजी स्वास्थ्य समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझाता है। साथ ही साथ खाद्य मिथकों की सच्चाई से रु ब रु कराता है।
नमक के इतिहास और गांधीजी तथा उनके मुट्ठी भर अनुयायियों के साहस की गाथा यथा दांडी मार्च को याद दिलाता है।
कितना नमक प्रतिदिन खाना चाहिए और कितना खाया जाता है,वैज्ञानिक पुट देता एक ऐसा संपादकीय जो पाठकों को सचेत करता है।
यूं भी प्रधान मंत्री जी तेल को अपने खाने में से दस प्रतिशत की कटौती करने की सलाह दे चुके हैं।यह संपादकीय उसी दिशाएं एक सजग और सशक्त कदम है।
हार्दिक शुभकामनाएं।
भाई सूर्य कांत जी, आपने जयपुर में परिवार के साथ रहते हुए ना केवल संपादकीय पढ़ा, बल्कि इतनी प्यारी टिप्पणी भी कर डाली। आप धन्य हैं!
नमक तो जीवन के हर क्षेत्र में और हर व्यंजन में मिलता ही है। फिर भारत जैसे विभिन्न व्यंजन और सहायक सुस्वादु बनाने वाले व्यंजन अचार, मुरब्बा, चटनी बगैर नमक और शक्कर के संभव ही नहीं है। जो खाने में जाता है वह तो होता ही है, इन स्वाद बढ़ाने के सहायक खाद्य पदार्थों में भी जाता है।
जहां चावल मुख्य भोजन है, वे बासमती चावल नहीं खाते बल्कि मोटा चावल खाते हैं। मिठाई के बिना तो दावत ही अधूरी नहीं रहती बल्कि जबान भी स्वाद लेने को लालायित रहती है।
लगातार नहीं बल्कि कभी कभी कोई भी चीज लेना खतरनाक नहीं बनती। शारीरिक स्थिति के अनुसार सभी चीजैं सीमित मात्रा में लें। शरीर आपका है और इसको संभालकर आप ही रख सकते हैं।
रेखा जी – दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है!
बहुत बढ़िया किन्तु सवाल ये कि नमक फारसी शब्द है तो उसके पहले भारत में क्या बोला जाता है, इसका जवाब नहीं मिला सर
नमक को लवण कहते थे।
सैधव भी कहते थे
जी।
अच्छी जानकारी। नमक नमकीन शब्द सौंदर्य के लिये इस्तेमाल होते हैं। लावण्यमयी शब्द की भी इंगिति भी यही है।
हार्दिक धन्यवाद अरविंद भाई।
महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत कराता उपयोगी ज्ञानवर्धक सम्पादकीय। साधुवाद
धन्यवाद सुदर्शन जी।
बहुत सुंदर ढंग से लिखा गया संपादकीय सर्वप्रथम आपको बधाई।
नामक हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है,एक राजा थे उसकी तीन बेटियां थी, राजा ने अपनी तीनों बेटियों को बुलाया और पूछा कि आप मुझे कितना प्यार करती हो,
पहली बेटी ने बोला सोने जितना।
दूसरी बेटी ने बोला चांदी जितना।
तीसरी ने बोला नमक जितना।
इस पर राजा क्रोधित हुआ और उसने बेटी को महल से निकाल दिया।
बाद में राजा को एहसास हुआ नमक कितना जरूरी है।
नमक का दरोगा में सिख बीवी पाकिस्तान से नमक मंगवाती है। और नमक हमारे लिए कितना जरूरी है और नमक से ही बीपी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं,
आप ने सिनेमा से भी जोड़ा,
कुल मिलाकर बड़ा धमाका।
धन्यवाद
मुक्ति जी, आपने अपनी टिप्पणी को भी साहित्यिक बना दिया है। हार्दिक आभार।
इस बार पुरवाई का संपादकीय -‘ जबां पे लागा, लागा रे… नमक!’ मौजूं तो है ही उपयोगी भी है। सेहत से संबंधित बातें उतनी ही ठीक लगती हैं जितने में हमारा काम चल जाए। इससे संबंधित ज्यादा बातें उबाऊ हो जाती हैं। पर आपने इस विषय को रोचक बनाकर पेश किया है। खासकर शोले फिल्म का वह अंश बड़े ही मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पढ़ते-पढ़ते लगा कि अरे! इसे ऐसे भी।
विपाशा बसु के होंठों के नमक से लेकर नमक शब्द के भारत में आगमन की कथा दिलचस्प है। प्रति व्यक्ति नमक की खुराक, नमक के प्रकार के साथ गांधी जी की दांडी यात्रा का जिक्र करके विषय को समग्रता में समेट लिया है। नमक से होने वाले हानि और लाभ के साथ सफेद चीजों की अति सेहत के लिए नुकसानदायक है। आज के समय में इसका प्रयोग सेहत के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यह संपादकीय का सशक्त पक्ष है।
हिन्दी में नमक को लवण कहा जाता है। यह भ्रंश होकर आज के नोन में परिवर्तित हो गया है। लवण< लवन< लोन<नोन। तुलसीदास जी ने इसका प्रयोग भोज्य पदार्थों में अति महत्वपूर्ण माना है –
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
यह संपादकीय कई अर्थों में महत्वपूर्ण बन गया है। काला नमक हानिकारक नहीं है से पर्दा उठाना, उच्च रक्तचाप पर चिकित्सीय संदर्भ को लेकर बात कहना तथा नमक के उत्पादन में भारत का कौन सा स्थान है, आंकड़ों के साथ स्पष्ट करना आदि के डेटा कलेक्ट करना श्रमसाध्य था।
इस संपादकीय को जो भी पढ़ेगा वह नमक के बारे में एक बार सोचेगा जरूर कि हमें दैनिक जीवन में इसका कितना प्रयोग करना है। अगर ऐसा होता है तो यह संपादकीय की सफलता मानी जाएगी।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी आप हमेशा हर संपादकीय को हर कोण से खंगालते हैं। आपकी टिप्पणी की तमाम पाठक प्रतीक्षा करते हैं। हार्दिक आभार।
वाह आप अद्वितीय हैं। पूरी की पूरी नमक पुराण लिख डाली, नमक को संस्कृत या शुद्ध हिंदी में लवण कहते हैं वैसे समुद्र के नमक को शाब्दिक रूप से लवण कहा जाता है, पुराणों की बात करें तो प्रसिद्ध दैत्य हुआ था लवणासुर जिसका उल्लेख रामायण में और भागवत में मिलता है, लवणासुर के आतंक से जब सब परेशान थे तब रामचन्द्र जी ने अनुज शत्रुघ्न कोउसक वध करने भेजा था, लबणासुर नाम लवण की तीव्रता या समुद्र के खतेपन वाले स्वभाव के कारण पड़ा था, वैसे लवण के कई औषधि के गुण हैं और रसायन शास्त्र में लवण के प्रकार के होते हैं। चलिए आपसे प्रेरित होकर मैन भी लवण पुराण लिख डाली।
सर आपने भारतीय संस्कृति और ग्रंथों के उल्लेख से संपादकीय को गरिमा प्रदान की है। हार्दिक आभार।
सर ,आपने नमक का बहुत अच्छे से अर्थ विस्तार किया है । एक शब्द के बारे में इतना सोचना काबिले तारीफ है । अत्यंत ज्ञानवर्धक और लाभकारी ।
बहुत शुक्रिया आपका हरदीप।
आदरणीय तेजेंद्र जी
चलिए मान लिया कि आप अच्छे संपादक के साथ-साथ एक अच्छे चिकित्सक हैं क्योंकि आपने तो इस बार के संपादकीय में नमक की पूरी उपापचय क्रिया ही समझा दी है। बहुत बधाई।
आपका पिछला संपादकीय भाषा से संबंधित था इस बार भी आपने नमक शब्द की उत्पत्ति का उल्लेख किया है। संस्कृत में नमक के लिए ‘लवण:शब्द का प्रयोग होता है।नमक मनुष्य के लिए कितना प्रिय और आवश्यक है वह इस बात से समझा जा सकता है कि ‘लावण्य’ ,लुनाई,लोनी लोनी, आदि जिन शब्दों का अर्थ सुंदरता है ,वह संस्कृत के लवण का ही एक रूप है।
नमक के स्वाद का महत्व दिखलाने के लिए अनेक देशों में लोक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें नमक के बिना भोजन का अधूरा स्वाद रहता है। आखिर ऐसा होगी क्यों ना क्योंकि सागर के लवणीय जल से ही तो सृष्टि उपजी है।
रक्तचाप, हृदय रोग के भय से लोगों ने नमक का प्रयोग इतना कम कर दिया कि ,मैं तो अक्सर सुनती रहती हूं कि शरीर में सोडियम कम हो जाने पर लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। यदि शरीर में सोडियम की मात्रा कम हो जाए तो ‘मति भ्रम ‘उत्पन्न होता है, मांसपेशियां अकड़ती रहती हैं।
इस साल के फूल के रोचक संपादकीय के लिए बधाइयां।
सरोजिनी जी, मैं कुछ भी नहीं हूं… बस पुरवाई के पाठकों का सीधा सा सेवक हूं। उनके लिये विषय ढूंढता हूं, शोध करता हूं और उन तक अपनी बात पहुंचाता हूं। आप जैसा ज्ञानी नहीं हूं ना ही मुझे ऐसा कोई ग़ुमान है। आप सच में ज्ञान का स्त्रोत हैं, प्रेरणा स्त्रोत हैं। आपका मुकाबला करने की कोई सोच भी नहीं सकता।
“नमक” शब्द हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, चाहे वह प्रेमचंद की कहानी “नमक का दरोगा” हो या अनामिका की कविता “नमक”। यह शब्द ईमानदारी, भ्रष्टाचार, दुख, और स्वाद जैसे विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है।
अनामिका जी की भाषा में –
कमज़ोर है दिल नमक का,
कितनी जल्दी पसीज जाता है!
गड़ जाता है शर्म से
जब फेंकी जाती हैं थालियाँ
दाल में नमक कम या जरा तेज़ होने पर!
वो जो खड़े हैं न—
सरकारी दफ़्तर—
शाही नमकदान हैं।
बड़ी नफ़ासत से छिड़क देते हैं हरदम
हमारे जले पर नमक!
जिनके चेहरे पर नमक है—
पूछिए उन औरतों से—
कितना भारी पड़ता है उनको
उनके चेहरे का नमक!
इस अंक का सम्पादकीय नए नदाज से लिखा गया है. ‘नमक’ – एक सामान्य शब्द का सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक महत्व बड़े रोचक धंद से प्रस्तुत किया गया है. अंक की अन्य विधाएं भी उच्चकोटि की हैं. बहुत बहुत धन्यवाद .
भाई जयंत कर शर्मा जी मैं प्रेमचन्द जी और अनामिका जी के सामने तो सच में कुछ भी नहीं हूं… बस अपने पाठकों के लिये एक विषय उठाता हूं,उस पर शोध करता हूं और अपनी बात कह लेता हूं। ये दोनों नाम तो श्रद्धेय हैं।
साधारण जैसा दिखाई पड़ने वाला दैनिक दिनचर्या में उपयोगी नमक , महत्वपूर्ण है। तभी तो सेहत के साथ-साथ नमक पर आंदोलन से लेकर फिल्म तक बनी है। खानपान में नमक के उपयोग का बैलेंस बहुत आवश्यक तो है जिसे कोई भी तब तक गंभीरतापूर्वक नहीं ले पाता जब तक बीपी उसे प्रभावित नहीं करती। इस सत्य को हर उम्र वर्ग का व्यक्ति भली-भांति जानता तो है पर फोलो कर पाने में असफल है। संपादकीय के माध्यम से नमक के सदुपयोग को बड़ी बारीकी से स्पष्ट करने कि बात कही गई है। इसलिए आज यह कहना सटीक है कि आपकी संपादकीय नमकीन है। धन्यवाद
प्रिय शुभम, आपकी टिप्पणी ने हमारे संपादकीय का समर्थन किया है। इससे साधारण पाठक भी कुछ नया सीख पाएंगे। आपका हार्दिक आभार।
नमक पर संपादकीय! बहुत अच्छी तरह से और पूरी मस्ती के साथ लिखा।
आजकल तीन सफेद चीजों को छोड़ने की बात लोग कहते रहते हैं। हम पढ़ते रहते हैं और आज आपने वही टॉपिक ले लिया। कहां से शुरू किया कहां पहुंच गए यह आपकी खूबी है जो बहुत अच्छा लगता है। बहुत बढ़िया धन्यवाद बधाइयां आपको।
भाग्यम जी, इस समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी का पुरवाई का इस सप्ताह का संपादकीय एक अत्यन्त रोचक विषय पर आधारित है और वह है नमक, जिसमें स्वास्थ्य और सिनेमा का बेहतरीन तड़का लगाया गया है। निस्संदेह नमक नामक खाद्य पदार्थ बहुत कम मात्रा में हमारे शरीर के लिए आवश्यक है लेकिन उस सीमा से अधिक लेने पर सभी को रक्त चाप नियंत्रित करने के लिए गब्बर सिंह रूपी डॉक्टर की सुझाई गोली खाने की ज़रूरत पड़ सकती है। आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने एक प्रश्न पूछा है कि नमक को भारत में किस नाम से जाना जाता था तो मेरा विनम्र मत है कि लवण शब्द इसके लिए प्रचलित था। मनुस्मृति के दसवें अध्याय के 86वें श्लोक में आया है-
सर्वान् रसानपोहेत् कृतान्नं च तिलैः सह।
अश्मनो लवणं चैव पश्वो ये च मनुषाः॥
अर्थात तिल, पत्थर, नमक, इन्हें मनुष्य द्वारा विक्रय नहीं किया जाना चाहिए।
स्पष्ट है कि बिकेगा नहीं तो मेहनत से इन्हें प्राप्त करना होगा और इनका सेवन कम किया जाएगा।
जहां तक सफेद वस्तुओं के कम इस्तेमाल के आग्रह की बात है तो आपकी यह सलाह सार्वभौमिक सत्य है कि इनका प्रयोग कम करना ही श्रेयस्कर है। एक नवोन्मेषी संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय अग्रज बधाई के पात्र हैं।
https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-salt/
भाई पुनीत जी, आपने मनुस्मृति के दसवें अध्याय के 86वें श्लोक के साथ पुरवाई संपादकीय को जोड़कर इसे महत्वपूर्ण बना दिया है। हार्दिक आभार।
वाह भ्राता श्री नमक का पूरा नमक निकाल दिया वो भी बड़े आदर के साथ,
साधुवाद आपको एक अलग विषय पर सम्पूर्ण
जानकारी के साथ लेख
कपिल भाई नमक का हमारे साथ जीवन भर का नाता रहता है… शोध तो करना ही था और अंदाज़-ए-बयां भी पैदा करना था।
नमक पर बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक विश्लेषण। अति हर चीज की बुरी होती है। अधिकतर लोग इन बातों को जानते हैं किन्तु जिह्वा पर कंट्रोल नहीं ऱख पाते हैं। नमक, चीनी, गेंहू का आटा, बांसपती चावल सब जहर है। पहले घरों में मिस्सी रोटी, मक्के, ज्वार बाजरा की रोटी बनती थीं, सब चाव से खाते थे। मिठाई में भी गुड़िया या दही बूरा चलता था लेकिन सोशल मिडिया ने इंसान को इन सबको गरीबों का भोजन बता कर अधिकांश को इनसे दूर कर दिया।
अब फिर पुरानी चीजें लौटकर आ रही हैं। रिफाइंड आयल की जगह सरसों के तेल ने ले ली है।
नमक फ़ारसी भाषा का शब्द है। मुगलों के आने के पश्चात् यह शब्द प्रयोग में आया वरना इसके पहले लवण का प्रयोग होता था। आयुर्वेद का लवणभास्कर चूर्ण जो पेट की बीमारियों अपच और कब्ज में उपयोग में लाया जाता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे नोन या नून भी बोला जाता है।
सुधा जी आप पुरवाई संपादकीय की स्थाई पाठक एवं टिप्पणीकार है। आपने नमक के साथ बहुत सी चीज़ों को जोड़ा है। धन्यवादम…
बहुत महत्वपूर्ण संपादकीय
सब स्वीकार, पर गेहूं के आटे की रोटी नहीं खाना
मुश्किल है।
बस मोटा आटा खाइये… अंग्रेज़ों जैसे सफ़ेद नहीं।
आदरणीय तेजेंद्र जी,
‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना से ओतप्रोत संपादकीय के लिए हार्दिक शुभकामनायें. आपने भारतीय मानस को नमक की संतुलित मात्रा के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया
दीपक भाई, बहुत बहुत शुक्रिया।
बेहद रोचक। आपकी रचनाएँ आज के साहित्यिक परिपेक्ष्य में लवण की भांति हैं। अहा! स्वाद आ गया!
नमक की लंबी यात्रा करा दी आपने
सिनेमा, गीत संगीत से होता हुआ राजनीति में प्रवेश कर गया और फिर शरीर विज्ञान और स्वास्थ्य -सेहत पर आकर ठहर गया ।
नमक का प्रवाह और ठहराव ही सम्पादकीय का विचार है ।
Dr Prabha mishra
यात्रा में रस बन रहे प्रभा जी, तो सफ़र आसानी से कट जाता है।
मालिक! आपका नमक खाया है
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादक भाई तेजेंद्र शर्मा जी ने अनेक नेक हिदायतों के साथ इस बार नमकीन संपादकीय परोसा है।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा की अपनी संपादकीय दृष्टि है और उसकी अपनी जो सृष्टि है, वह अत्यंत अर्थपूर्ण होती है।
फिल्म व स्वास्थ्य को केंद्रित करके लिखे इस संपादकीय में सामाजिकता का पहलू भी उजागर हुआ है।
नमक को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक भ्रांतियाँ व मिथक प्रचलित हैं। जैसे- रात्रि में नमक नहीं खरीदना चाहिए। आटा, दाल, तेल, अनाज, सब्जियाँ आदि तो पड़ोसी से माँग लिये जाते हैं, लेकिन नमक माँगना वर्जित है। नमक को धरती फेंकने की भी मनाही है। क्योंकि ऐसा करनेवाला कर्जदार बन जाता है। आदि- आदि। इसी तरह
विवाह के समय वर तथा वधु अरौनौ भोजन (बिना नमक का) खिलाये जाने की भी परंपरा है।
हो सकता है इन बातों में कोई लोक विज्ञान समाहित हो।
स्वास्थ्य की दृष्टि से नमक का कम से कम प्रयोग करना लाभदायक माना जाता है। यह बात बिल्कुल सवा सोलह आने सच है। सैंधव नमक,काला नमक, लाहौरी नमक आदि का उपयोग आमतौर पर परिवारो में खानपान में कम होता है। जबकि ये नमक भोजन में प्रयोग किये जानेवाले सफेद नमक की तुलना में ज्यादा फायदेमंद हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत शोधपूर्ण संपादकीय लिखने के लिए आदरणीय तेजेंद्र शर्मा को अनेक बधाइयाँ।
डॉ० रामशंकर भारती
दीनदयाल नगर, झाँसी (भारत)
आपकी टिप्पणी मज़ेदारम है भाई रामशंकर भारती जी। आपने नमक से जुड़ी बहुत सी भ्रांतियों का भी ज़िक्र किया है। हार्दिक धन्यवाद।
उपयोगी, महत्वपूर्ण, विस्तृत जानकारियाँ देता ज्ञानवर्धक सम्पादकीय। हार्दिक बधाई ।
धन्यवाद सुदर्शन जी।
आपके नमक के सम्पादकीय में अधिक नमक खाने से जो सेहत को जो नुकसान पहुंचता है इस चेतावनी की ओर हम सब को ध्यान देना चाहिए। अपना या जिस किसी का भी नमक खाओ, ज़रूर खाओ लेकिन मिकदार के अन्दर।
विजय जी आपकी सलाह पर पुरवाई के पाठक अवश्य ध्यान देंगे।
हमने पुरवाई का कहना माना पूर्ण विश्वास है कि सेहतमंद रहेंगे सफेद चीजों से परहेज करेंगे बढ़िया लेख हार्दिक शुभकामनाएं
हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी
आज के संपादकीय ने बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को बहुत ही रोचक ढंग से उठाया है।
वास्तव में जीवन में नमक का बहुत महत्व है। लोग अधिकतर नमकीन व चटपटा अधिक पसंद करते हैं ,इस तरह देखें तो खाने में नमक का बहुत महत्व है।
अगर यह ज्यादा भी हो जाए तो भी नुकसानदायक, खाने का मजा खत्म कर देता है और कम रहे तब भी खाने में मजा नहीं आता। आज का संपादकीय यही बता रहा है कि नमक का संतुलन बनाए रखना बहुत अधिक जरूरी है।
‘नमक हलाल’ व ‘नमक हराम’ तो मुहावरों में प्रयुक्त होता है इन दोनों पर पिक्चर भी बनी है जैसा कि आपने बताया ही है, जो उसके वास्तविक अर्थ को सार्थक करती है,लेकिन इसके अतिरिक्त भी अनेक मुहावरे ऐसे हैं जो नमक से जुड़े हुए हैं। परिश्रम का पसीना नमक के रूप में ही शरीर से बहकर बाहर निकलता है।
हलाल, हराम और नमक शब्द भले ही अरबी और फारसी के हों, लेकिन अब देश में काफी प्रचलित हैं। इसके पहले नमक को संस्कृत में लवण और देशज बोली में लोन, नोन,नून इत्यादि नामों से जाना करते थे ,नोन और नून का प्रयोग हमने भी बचपन में दादी वगैरह के मुँह से सुना। किंतु आगे जाकर प्रचलन में नमक ही चला।
इस तरफ सेंधा नमक पाकिस्तान से आता था अब नहीं पता।
संपादकीय की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नमक के विषय में जो तथ्यपूर्ण जानकारियाँ आपने दी हैं,सभी काबिले गौर हैं और ध्यान रखने योग्य भी। जिस तरह आजकल बीपी हाई और लो हो रहा है उसमें नमक का बड़ा योगदान है।हाई में कम कर दो, लो मैं चटा दो।
किंतु आपने इस बार नमक की जो महत्वपूर्ण जानकारी दी हैं,जो लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरुक हैं उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात हमारे लिए यह रही कि हमें नमक की प्रकृति गर्म है यह नहीं पता था।
जबकि हम पित्त रोग के लक्षण के बारे में बराबर जानते हैं, पर यह नहीं पता था कि ज्यादा नमक खाने से पित्त बढ़ता है।
दांडी यात्रा का जिक्र भी कमाल का रहा।
आपने जिन सफेद चीजों पर कंट्रोल करने के लिए कहा है वह ध्यान में रहेंगी,किंतु इन सबसे अलग एक बात और है -भगवद्गीता का श्लोक तो पुनीत जी ने भी बताया है किंतु शास्त्रों में भी नमक का बहुत महत्व है ,खासकर वास्तु शास्त्र और ज्योतिष में। इसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने का एक शक्तिशाली साधन भी माना जाता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को सोखता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करता है।
ज्योतिष के अनुसार नमक के कुछ विशेष उपाय घर में सुख समृद्धि और शांति लाते हैं।
वास्तु दोष को दूर करने के लिए भी नमक का प्रयोग बताया जाता है।
अगर ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो नमक चंद्र और शुक्र का प्रतीक है। ज्योतिषाचार्य धन प्राप्ति और आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए नमक के प्रयोग बताते हैं।
माताएँ बच्चों की नजर उतारने के लिये भी नमक का प्रयोग करती हैं।
नमक कभी किसी को भी हाथ में नहीं दिया जाता कहते हैं कि झगड़ा होता है।
ऐसी भी किंवदंती है कि नमक को कभी फेंकना नहीं चाहिए और जमीन पर अगर गिर जाए तो उसे उठा लेना चाहिये या फिर उसमें पानी डाल देना चाहिये।
वैसे तो हर संपादकीय महत्वपूर्ण ही होता है किंतु निश्चित तौर पर इस बार का संपादकीय बहुत अधिक महत्वपूर्ण लगा। वह इसलिए कि वह स्वास्थ्य के प्रति सतर्क कर रहा है ,सचेत कर रहा है और नमक के प्रयोग के हानि और लाभ बता रहा है, जिसे सामान्य रूप से सभी नहीं जानते।
इस संपादकीय के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया।
आदरणीय नीलिमा जी, इस सार्थक, विस्तृत एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिया हार्दिक धन्यवाद।
गाने में आगे वह अपने बलम से उसके होठों का नमक भी माँगती है। उस बेचारी को भी नहीं मालूम कि उसका नमक और बलम का नमक मिल कर बहुत अधिक नमक हो जाएगा, जो कि दोनों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। लाइन अच्छी है संपादकीय की। लेकिन इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए सिनेमा से भाषा पर आए आप उसके बाद असल मुद्दे की बात हुई। ये सामादकीय का अलग ढंग नजर आ रहा है। और हां नमक को मै भी हिंदी का ही समझा था। शुक्रिया आपका आज पता चला