विश्व भर में करोड़ों यौन-कर्मी सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। बेल्जियम के अलावा और भी कई देश हैं जिन्होंने यौन-कर्म को मान्यता दे रखी है। मगर बेल्जियम पहला ऐसा देश है जिसने किसी भी अन्य रोज़गार की तरह यौन-कर्मियों के लिये भी तमाम सुविधाएं मुहैया करवाने का कानून पास किया है। इस कानून के लागू हो जाने के पश्चात वहां के लगभग 30,000 यौन-कर्मियों को रोज़गार के बुनियादी हक़ प्राप्त होने लगेंगे।
यौनकर्म विश्व के सबसे पुराने पेशों में से एक है। भारत, चीन, युनान, रोम, मिस्त्र – सभी सभ्यताओं में इनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। जहां यह एक ठोस सच्चाई है वहीं भारत में अभी भी इसे एक सामाजिक बुराई की तरह देखा जाता है और अपराध भी माना जाता है। गणिकाओं और देवदासियों के देश में जीवन यापन की यह वृत्ति सामाजिक कलंक है।
वेश्यावृत्ति या यौनकर्म एक ऐसी संभोग प्रक्रिया है जो पैसे या अन्य किसी लाभ के लिये की जाती है। इसमें भावनाओं की अनुपस्थिति रहती है जो कि इस सुख का अनिवार्य हिस्सा मानी जाती हैं। मैं स्वयं जब एअर इंडिया में फ्लाइट परसर के पद पर कार्यरत था तो पहली बार जब फ़्रैंकफ़र्ट की उड़ान पर गया, तो वहां ईरोस लव सेंटर देखे। ग्रीक सभ्यता में ईरोस को प्रेम का देवता माना जाता है जिसे एक हाड़ मांस की नारी साइकी (आत्मा) से प्यार हो जाता है।
ये ईरोस सेंटर दरअसल यौनकर्मियों की कर्मस्थली होते हैं। बिल्डिंग की हर मंज़िल पर अलग-अलग कमरे बने हुए हैं जिनमें बड़े शीशे की खिड़की लगी रहती है और उस खिड़की के पार हल्की लाल रौशनी में बैठी होती है एक युवती केवल ब्रा और पैंटी पहने हुए। आप लड़की चुन लें और अपना सुख भोग लें। रेट पहले से तयशुदा होता है उस पर कोई झिकझिक नहीं। क्योंकि सब कुछ शहर के बीचों-बीच साफ़ सुथरे ढंग से होता है इसलिये इसे सामाजिक कलंक के तौर पर नहीं देखा जाता।
लगभग इसी तरह एमस्टर्डम, पेरिस, लन्दन, रोम, स्टॉकहोम, ब्रसेल्स आदि शहरों में रेड लाइट एरिया कुछ इसी तरह से व्यवस्थित ढंग से चलता है। मगर हर जगह के अपने-अपने नियम कायदे होते हैं। इन पर कोई सरकारी नियम लागू नहीं होते।
बेल्जियम से इस विषय पर जो समाचार मिला है उसे सही मायने में क्रांतिकारी कहा जा सकता है। बेल्जियम विश्व का पहला ऐसा देश बन गया है जिस में सेक्स वर्कर्स (यौनकर्मियों) को मैटर्निटी लीव, पेंशन, हेल्थ इंश्योरेंस और सिक लीव समेत कई अधिकार देने की घोषणा की गई है। इस कानून के तहत सेक्स वर्कर्स को दूसरे कर्मचारियों के जैसे ही रोज़गार और सिक्योरिटी देने की कोशिश की गई है। यह नया कानून 1 दिसम्बर 2024 से लागू किया गया है।
इससे पहले भी वर्ष 2022 में बेल्जियम में यौनकर्म को अपराधमुक्त घोषित कर दिया गया था। इसके बाद से ही देश में सेक्स वर्करों के लिए सुरक्षा, रोज़गार, हेल्थ समेत कई अधिकार देने की मांग उठने लगी थी। नए कानून के अंतर्गत, सेक्स वर्कर्स को रोज़गार का कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा। इसके अलावा काम के घंटों और कार्य स्थल की सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। हर कमरा जहां यौन कार्य होगा, वो साफ़-सुथरा होना चाहिए। इसके अलावा वहां एक अलार्म लगाना होगा जो वर्कर के रेफरेंस पर्सन से जुड़ा होगा।
इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ सेक्स वर्कर्स के अनुसार दुनिया भर में करीब पांच करोड़ बीस लाख सेक्स वर्कर हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिसर्चर एरिन किलब्राइड के अनुसार “यह अब तक का सबसे अच्छा कदम है। हर देश को इस दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यक्ता है।”


वास्तव में यह कटु सत्य है ।नए कदम का नया मुद्दा हमेशा विवादों से गिरा रहेगा और हमारे इस भारत देश में इसे कभी भी स्वीकृति नहीं दी जाएगी।
संपादकीय से काफी जानकारी प्राप्त हुई।
आभार भावना। पुरवाई पत्रिका का प्रयास रहता है कि हम समाज से जुड़े हर मुद्दे को पाठकों के सामने प्रस्तुत करें।
हमेशा की तरह mind tickling विषय ।
जब लिव इन की अवधारणा आई तो काफ़ी समय तक
चिंता जगाती रही।LGBTQabc ने इसे पीछे छोड़ दिया।अब
यह नया सिक्का चित्त गिरे या पट्ट परिणाम समाज पर आना है।दूरदर्शी सरकारें शायद parallel रोज़गारों का सोच रही हैं।जब हज़ारों घर टूटेंगें,तन और मन आहत होंगे तब
हज़ारों चिकित्सकों की,मनोवैज्ञानिकों की माँग भी बढ़ेगी ।अन्य
लुभावने माध्यम उपस्थित होंगें,विज्ञापन की दुनिया चमकेगी ।पर सरकारें भूल जाती हैं कि इस रोज़गार में कितने शरीरों का लगातार दोहन होगा,जितनी तनख़्वाह उतना काम उतना दोहन ।उफ़ सोच के घबराहट होती है ,ये कहाँ आ गये हम …………
नीहार जी, आपने समस्या को एक अलग दृष्टिकोण से देखा है। मगर यह भी सच है कि यह कानून लागू होने से पहले भी यौनकर्म चल रहा था और इसके बाद भी चलेगा। विश्व के किसी अन्य देश में यह कानून नहीं लागू है। उन सभी देशों में वेश्यावृत्ति पूरे रूप से चल रही है। कानून को सकारात्मक कदम मानना बेहतर होगा।
जब सरकारें नशे के व्यवसायों यथा – भाँग, शराब आदि को नियमित व क़ानून सम्मत बना रही है तो यौन कर्मियों के काम को नियमित किये जाने में यौनकर्मी शोषण से मुक्त हो पाएँगे। लेकिन साथ ही यह पेशा सामाजिक मान्यता भी पाने लगेगा, “चरित्र” शब्द किसी नयी परिभाषा का मोहताज होगा। क़ानूनी मान्यता के साथ, परदे सब हट जाएँगे। बाढ़ का पानी समाज को भिगोता हुआ घरों और परिवारों में घुसने लगेगा और परिवार व्यवस्था जो समाज की नींव है बिखरने लगेगी। ऐसी स्थिति में समाज कौनसा रूप धारण करेगा, कहना बड़ा मुश्किल होगा। बिखरे समाज का व्यक्ति भी पहले भीतर से, फिर बाहर से भी बिखरने लगेगा। पारिवारिक –सामाजिक व्यवस्था व विचारधारा विद्रूप होने लगेगी … यह प्रश्न बड़ा ही गंभीर है।
शायर ताहिर अज़ीम का शे’र है : –
मुझ को भी हक़ है ज़िंदगानी का
मैं भी किरदार हूं कहानी का।
उपरोक्त शे’र यौनकर्मियों के जीवन पर सटीक बैठता है। सार्थक संपादकीय हेतु शुभकामनाएं!
हार्दिक आभार सुमित।
महत्वपूर्ण लेख
हार्दिक आभार रूप भाई।
आदरणीय इस संपादकीय के द्वारा आपने पाठकों के समक्ष यौन व्यापार या यौन कर्मियों के विषय में नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है । क्योंकि भारत में इन्हें बहुत अलग रूप में देखा जाता है । जबकि भारत में यही काम करने वाली विदेशी महिलाओं या लड़कियों को इज़्ज़त मिलती है । वैसे देखा जाए तो काम काम ही होता है फिर वो कोई भी काम हो । जिसके लिए आप पैसे लेते हैं और सरकार को अन्य लोगों की तरह टैक्स देते हैं तो वह काम किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है ।यही मानसिकता मुझे इस लेख को पढ़कर लगी ।
यूरोप के कई देशों में यौन कार्य को सरकारी मान्यता मिली हुई है । क्योंकि इस काम को भी अन्य वैतनिक कार्यों की तरह देखा जाता है। शायद इसीलिए यहाँ ब्लात्कार की प्रतिशत भारत की या अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम है। नीदरलैंड में बहुत पहले ही इसे वैतनिक कार्य का दर्जा प्राप्त हो गया था । जिसके अनुसार हर यौन कर्मी को प्रतिदिन आठ घंटे काम करने की अनुमति दी गई। उन्हें अपनी आय का 40% सरकार के टैक्स के रूप में देना होता है । जिसके बदले सरकार उनको स्वास्थ्य, घर व अन्य सुविधा उपलब्ध कराती है । किन्तु कुछ वर्षों से विशेष रूप से नीदरलैंड और बेल्जियम में इन यौन कर्मियों के साथ उनके ग्राहकों द्वारा बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया । पिछले साल नीदरलैंड में एक 18 साल की लड़की यहाँ पढ़ने आई पथी ऐर उसने अपनी अतिरिक्त आय के लिए यह काम चुना । उसके ग्राहक ने उसके साथ निर्भया जैसा व्यवहार किया। पिछले माह उसे बीस वर्ष की सजा हो गई । बेल्जियम का यह एक सराहनीय कदम है। अब यौन कर्मी किसी दूसरे के लिए नहीं स्वयं अपने काम को व्यवसाय की रूप दे सकते हैं ।पर यहाँ भी इस नियम का उपयोग और दुरुपयोग दोनों ही किया जा सकता है। क्योंकि बेल्जियम , मोरक्को , रोमानिया और यूक्रेन में बड़ी संख्या में बालिक और नाबालिग लड़कियों के ज़बरदस्ती इस पेशे में धकेला जाता है । फिर से एक नये विषय पर संपादकीय लिखने के लिए बहुत बहुत साधुवाद
ऋतु आपने संपादकीय को सही परिप्रेक्ष्य में समझा है और यूरोपीय देशों की स्थिति को पुरवाई के पाठकों के समक्ष रखा है। आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं। इस सबके लिये आपको हार्दिक धन्यवाद।
तेजेन्द्र जी!
फिलहाल तो हम स्तब्ध हैं और दिमाग कुंद हो गया है।समझ ही नहीं आ रहा है कि इस पर क्या कहना चाहिए। फिलहाल तो हम यही कहेंगे कि “यहाँ मैं अजनबी हूँ। मैं जो हूँ बस यही हूँ।”ढेर सारे प्रश्नों का एक तूफ़ान सा दिमाग में उठ रहा है। फिलहाल तो नि:शब्द हैं।
लेकिन फिर भी बेल्जियम की सरकार ने जो किया वह काबिले तारीफ है। फिलहाल तो इतना ही कह सकते हैं।
आदरणीय नीलिमा जी, समस्या से कतरा कर निकल जाने से समस्या हल नहीं होती। फिर भी आपका हार्दिक धन्यवाद कि आपको बेल्जियम सरकार का कदम सही लगा।
आप हर बार कुछ ऐसे विषय चुनते हैं जो कुछ सोचने पर विवश करते हैं . भारत और यूरोप की तुलना इन मामले में नहीं हो सकती है न ही सेक्स वर्करों को वहाँ जैसे अधिकार मिल पायेंगे क्योंकि हमारा समाज दोहरे मापदंडों के बीच जीता है .
बरहाल यह कुछ कुछ आइना दिखाने जैसी स्वागत योग्य कवायद है
भाई प्रदीप जी आपको पुरवाई के संपादकीयों के विषय पसंद आते हैं और कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं। यह जान कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। जब हम अंग्रेज़ी फ़िल्मों और टीवी कार्यक्रमों से भारत में कुछ सीख सकते हैं तो भला सरकार दूसरी सरकार से कुछ क्यों ना सीखे।
जानकारी अच्छी लगी, कानून भी स्त्रियों के लिए राहत लेकर आया है। जिन्हें अपने जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मजबूरी वश इस पेशे में उतरना पड़ता है, शारीरिक व मानसिक आघात सहने पड़ते हैं।
पर क्यों? पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की शारीरिक आवश्यकताओं रूपी भूख को शांत करने के लिए।
शील जी, कुछ मुद्दे इतने कठोर होते हैं कि उनकी ओर स्थितियों के अनुसार कुछ सोचना आवश्यक हो जाता है। पूरे विश्व में इस पेशे से जुड़ी महिलाओं का शोषण हो रहा है। नये नियमों का स्वागत करना चाहिये।
पुरवाई पत्रिका के समूह संपादक आदरणीय श्री तेजेंद्र शर्मा जी का संपादकीय आज मन की संवेदनाओं को कहीं ना कहीं झकझोर कर चला गया। साहिर लुधियाना साहब के अशआर याद आ रहे हैं
जिन्हें नाज़ था हिंद पर
वो कहां हैं,,, यह गाना महिलाओं और वेश्यावृत्ति को देखकर के लिखा गया था है।
ईश्वर की कृपा से फ्रैंकफर्ट या विश्व के अन्य देशों में जाने का मौका मिला और पत्रिका के आदरणीय संपादक द्वारा लिखा गया आलेख केवल सत्यता के पास मजबूती से खड़ा हुआ है। विश्व के गिने-चुने देशों में जिसमें जर्मनी का फ्रैंकफर्ट शहर भी आता है। यहां पर यौन कर्मियों को अलग और हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता है ।उन्हें अन्य कामगारों की मानिंद सारे अधिकार दिए गए हैं और सामान्य नागरिकों की भांति यह भी देय टैक्स का भुगतान करते हैं। बेल्जियम सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम निश्चित रूप से प्रशंसनीय और उल्लेखनीय है।
भारत जैसे देश में जहां मुक्त काम सामाजिक व्यवस्था ही आधार थी। यही कारण था कि हमारी संस्कृति और सभ्यता विश्व के सर्वोपरि देशों में से एक थी । मुगलों तथा अंग्रेजों ने हमारे देश की इस अतुलनीय अद्वितीय सभ्यता को नष्ट भ्रष्ट कर दिया और हमें एक संकीर्ण मानसिकता और सपेरो के देश में बदल कर रख दिया ।आज भी भारतीय समाज में चोरी-छिपे यह सब कार्य होते हैं और यहां पर विशेष रूप से कहना और नितांत आवश्यक है कि अधिकतर आधी आबादी के बंदे देह व्यापार में धकेल दिए जाते हैं या फिर परिस्थितियां ऐसी बना दी जाती है कि उनके पास कोई और चारा नहीं रहता परंतु इसके साथ-साथ एक और भयावह स्थिति है और वह स्थिति है कि चोरी छिपे यह कार्य पैसों हेतु दशकों दर दशकों यह कार्य निम्न एवं मध्यवर्गीय महिलाओं के द्वारा आर्थिक स्वावलंबन,या परिवार को सपोर्ट करने की दृष्टि से भी किया जाता रहा है ।यदि भारत सरकार भी इस और कुछ सोच तो फिर क्या बात है।
फिलहाल इतना बोल्ड विभाग संपादकीय लिखने के लिए संपादक जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
सूर्य कांत शर्मा
भाई सूर्य कांत जी क्योंकि आप फ़्रैंकफ़र्ट जा चुके हैं तो आपने वहां ईरोस सेंटर और डॉ. मुलर सेक्स शॉप अवश्य देखे होंगे। इस लिहाज़ से आपकी टिप्पणी और भी भारी भरकम बन जाती है। संपादकीय के लिये मुद्दों की तलाश मेरे लिये फ़ुल टाइम जॉब है। आपकी सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
एक आई ओपनर सम्पादकीय। मुझे लगता है कि इस सराहनीय कदम पर अन्य देश भी चलेंगे निकट भविष्य में।
रिंकु जी, समर्थन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
बहुत गंभीर विषय पर आपका इतना शोध पर आधारित लेख अत्यधिक महत्वपूर्ण है। बधाई आपको।
हर बार की तरह एक नया अछूता, विशिष्ट विषय लेकर शोधित संपादकीय!!
उर्वशी, मेनका, विषकन्याओं,देवदासियों का इतिहास रखने वाले हमारे इस देश में, इस सर्वाधिक प्राचीन कर्म को शायद जीविकोपार्जन का जरिया मानने में कठिनाइयां हो , इसीलिए इसे सामान्य आजीविका मानना भी कठिन है। अतः उन्हें एक साधारण कामगार की तरह सुरक्षा देने का विचार भारत के लिए सचमुच अजूबा हो सकता है। मुश्किल यह है कि आज के युग में इस व्यवसाय में आदर- सम्मान, दया आदि कोमल भावनाओं के बदले अपराध ,काला धन ,नशे का व्यापार आदि इस बुरी तरह हावी हो चुके हैं कि सामान्य जनता को एक व्यवसाय की तरह इसकी छूट देने में सामाजिक अपराध बढ़ने की ही संभावना है।
बढ़िया संपादकीय के लिए बधाइयां
One more feather in your cap
सरोजिनी जी, इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। पुरवाई एक वैश्विक पत्रिका है और हमारा प्रयास रहता है कि वैश्विक गाँव से जुड़े तमाम मुद्दों पर कलम चलाई जानी चाहिये। भारत के पाठकों को भी जानकारी मिलनी चाहिये कि विश्व में क्या कुछ नया हो रहा है।
यह यौन कर्मियों वाली ऐसी सामाजिक बुराई है जो अभी के हालात में कोढ में खाज का काम करेगी
बेल्ज़िएम की व्यवस्था सुधार करने की बजाय कुछ न कुछ बिगाड़ ही करेगी |
भारत में इसकी वकालत न ही करे तो बेहतर है |
माना कि. यह एक शारीरिक इच्छा है लेकिन क्या इच्छाओं को सीमित कर संयम का पाठ पढ़ाने वाले कोर्स नहीं चलाने चाहिए?
क्यों भोग भोग भोग पर संसार ज़ोर दे रहा है |
देश व विश्व ला भला करना है तो पतंजलि योग सूत्र को पढ़ाई का हिस्सा बनाइये जिससे ऐसे तुच्छ काम किसी को करने कि जरूरत ही न पड़े |
गणिकये व देवदासिया वाला देश कह कर तरफदारी न की जाये,
वह भी मठाधीशो द्वारा शुरू की गई एक सामाजिक बुराई थी |
ऐसे कानून की तरफदारी करके देश व विश्व सभ्यता को नीचे गिराने की कोशिश न की जाकर कोई सही पहल करनी उचित रहेगी जहाँ एक कर्मठ व संयमी पीढ़ी का विकास हो |
पुरवाई के संपादकीय का विषय ‘बेल्जियम में यौनकर्मियों को मिला कामगार का दर्जा ‘ है। आज पूरा विश्व ग्लोबल गांव बन चुका है। किसी भी क्षेत्र की घटना अपनी सी लगती है। तेजेन्द्र सर तो साहित्य के विश्व मानव बन चुके हैं। तो उनके लिए, उनकी संपादकीय में हर क्षेत्र की घटना का आना लाजमी है।
इस पहल का संपादकीय में आना मात्र संपादकीय धर्म का पालन करना नहीं है। इसमें मानव हित भी छिपा है। प्राकृतिक रूप से विपरीत लिंग के प्रति सभी जीवधारी आकर्षित होते ही हैं। नर, मादा की अपेक्षा अधिक आक्रामक होता है। पशुओं में तो इसी बात पर नर आपस में लड़कर मर मरा जाते हैं। फिर मनुष्य की बात अलग कैसे हो सकती है। जबकि हम सब एक गोला के वासी हैं। यह स्वाभाविक भी है।
इस मामले में मेरा ध्यान सृष्टि के आदिकाल पर केंद्रित हो जाता है। जब कोई नियम कानून नहीं थे। मादा को पाने के लिए नरों में कितनी लड़ाईयां हुई होंगी। कितने नर बचे होंगे। मतलब जो ताकतवर होगा वही बचे होंगे। कमजोर या तो मारा गया होगा या फिर किसी खोह के एक कोने में छिप गया होगा। कालान्तर में मानव विकास की स्थिति में इस पर नियम बनाए गए होंगे। वैवाहिक परंपरा का सूत्रपात किया गया होगा। पुरुष को एक नहीं और भी से गणिका प्रथा का आरंभ किया होगा। आदि काल में इनका क्या नाम दिया होगा इसकी जानकारी न होने से गणिका शब्द का प्रयोग कर रहा हूं। इससे समाज की व्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगी होगी।
मैं इसे गलत नहीं मानता हूं। गलत वह होगा जब किसी को जबरदस्ती ऐसा करने के लिए बाध्य किया जाए। 90 के दशक के पहले यहां भी ये सब चलता था। एड्स की वजह से इसे बंद कर दिया गया। इसके बाद देश में कितने रेप मर्डर हुए हैं यह विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है।
सोचने वाली बात है कि कड़े नियम कानूनों के बावजूद लोग इतने वहशी और आक्रामक क्यों हो जाते हैं? क्या वे नहीं जानते हैं कि ऐसा करने से हमें फांसी हो सकती है, हमें आजीवन जेल में रहना पड़ेगा। क्षणिक सुख के लिए बदनामी तो होगी ही आजीवन जेल में सड़ना पड़ेगा। लेकिन यह आदिम प्रवृत्ति नर के डीएनए में है ही। समझ के विकसित होने पर वह इसको कम कर देता है। लेकिन मानसिक प्रवृत्ति में तो यह अब भी मौजूद है। किसी भी स्त्री के प्रति आकर्षित होना उसका स्वभाव है। मानसिक रूप से तो वह स्वभाव से बलात्कारी ही है। मनोविज्ञान इसे स्वाभाविक प्रक्रिया मानता है।
यही सब सोचकर वहां की सरकार ने यह निर्णय लिया होगा। ताकि समाज में अराजकता न फैले। किसी मासूम के साथ गलत न हो।
आज मैं इस विषय पर इतने खुले तौर पर लिख रहा हूं तो जानते हो सर किस कारण से? इस कारण से कि मैं पुरुष हूं। आप पुरुष है। अगर मैं महिला होता (होती) और ऐसा लिख दिया होता तो लोगों की भौंहें तन गई होती। मुझे बिगडै़ल घोषित कर दिया गया होता। खैर मैं कहां से ये बातें बीच में ले आया। आपके संपादकीय पर बात करनी चाहिए। अरे मैं भी! भूल जाता हूं। आपकी संपादकीय ने ही तो मेरे मन के गवाक्ष खोले हैं। इस नए विषय के लिए आपको बधाई तो बनती है। मेरी बधाई स्वीकारें
भाई लखनलाल जी, आदरणीय मृदुला गर्ग जी ने दशकों पहले सेक्स से जुड़े विषयों पर उपन्यास एवं कहानियां लिखीं। वर्तमान में तमाम महिला कथाकार बहुत बोल्ड ढंग से सेक्स से जुड़े थीम उठा कर सृजन कर रही हैं। अब यह बात पुरानी हो गई कि महिलाएं केवल किसी ख़ास तरह का लेखन करें और पुरुष कुछ अलग ढंग का। आपकी टिप्पणी में बहुत से महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गये हैं। हमेशा की तरह आप संपादकीय पर त्वरित टिप्पणी लिखते हैं जो सही मायने में सार्थक और सारगर्भित होती है।
सादर नमस्कार सर आजका विषय तो नवीन नहीं था किंतु नवीनता यह है कि बेलजियम का नया कानून और पूरे विषय पर आपके विचार। आपकी लेखनी कदाचित समाज, समय एवं समस्या की ऐसी कोई दिशा नहीं है जिसे स्पर्श न किया हो। पाठकों के मन की बात लिखते तो हैं ही… पाठकों को सबके मन की बात से भी जोड़ते हैं। आज का संपादकीय अनकहा सत्य को आकार और संवेदनशीलता दी है। जो भी नया कानून बना है, अन्य देशों में भी ऐसा कानून बनाया जाए ताकि, उम्र बढ़ने के बाद उन्हें किसी अभाव में जीना न पड़े।
बारंबार आपको साधुवाद सर।
अनिमा जी, विषय केवल 9 दिन पुराना है। इसलिये इसे नवीन तो मानना होगा क्योंकि केवल पहली दिसंबर को यह कानून लागू किया गया और आपकी पत्रिका पुरवाई उस पर बात कर रही है। हाँ आपसे सहमत हूं कि संपादकीय को पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखने का प्रयास किया है। आपने संपादकीय के लिये साधुवाद कहा है – आपका हार्दिक धन्यवाद।
ग्रीक सभ्यता में ईरोस को प्रेम का देवता माना जाता है जिसे एक हाड़ मांस की नारी साइकी (आत्मा) से प्यार हो जाता है। यह तो अच्छी बात है लेकिन इसी नाम से नारी के शोषण हेतु खुला ये ईरोस सेंटर जो यौनकर्मियों की कर्मस्थली है, आश्चर्य है इस सोच पर।
अन्य देशों की तरह भारत में देवदासियों की प्रथा तो थी ही, कलकत्ता रेड लाइट एरिया सोनागांझी तथा हाल में ही OTT पर इसी पर आधारित रिलीज हीरामंडी सीरीज भी काफ़ी लोकप्रिय हुई है। यथार्थ तो यह है कि पुरुष सत्तात्मक समाज में ये एरिया स्त्रियों के शोषण के लिए ही निर्मित हुए हैं।
बेल्जियम में इस व्यवसाय को कानूनी अधिकार मिलना पुरुषों की इस दूषित सोच का ही परिणाम है। समझ में नहीं आता कि वैसे तो हम स्त्री पुरुष की समानता की बातें करते हैं फिर यह दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों?
यह क़ानून स्त्रियों के जीवन को सुरक्षा देगा या उनका और भी शोषण करेगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि इसको वैधानिकता प्रदान कर क्या हम अन्य स्त्रियों को इस पेशे में ढकेलने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे।
ज्यादा कुछ न लिखकर सिर्फ यही कहूँगी कि ऐसे अस्पृश्य विषय पर आपका आलेख सभ्य मानव समझ पर चांटे के सदृश्य है। साधुवाद आपको।
आदरणीय सुधा जी, आपकी नाराज़गी से लैस टिप्पणी का स्वागत है। आप ही की तरह यूरोप में भी कुछ हल्कों से कानून के विरोध में स्वर उठे हैं। और अधिकांश ने आपके जैसे सवाल उठाए हैं। लोकतंत्र के मूल में विचारों का आदान-प्रदान और बहस करने का अधिकार शामिल हैं। आपके विचारों का स्वागत है।
बेल्जियम सरकार के इस निर्णय कि वहाँ सैक्स कर्मियों की अन्य वर्करों की तरह सभी सुविधाएं ..सभी हक़ समान रूप से मिलेंगे, अपने आप में एक ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्णय है जिससे इन्सान को इन्सान के रूप में बिना किस भेदभाव के एक जैसी पहचान मिलेगी। हालांकि भारत जैसे देश में ऐसा हो पाना आने वाले वर्षों में तो कतई संभव नहीं लगता मगर फ़िर भी ऐसे निर्णयों के दिल खोल कर स्वागत किया जाना चाहिए।
पुरवाई का यह महत्त्वपूर्ण संपादकीय बेल्जियम सरकार के निर्णय की विस्तारपूर्वक पड़ताल करने के साथ-साथ अपने आप में ज्ञानपरक एवं महत्त्वपूर्ण है।
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श्री तेजेंद्र शर्मा जी,
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आपने तार्किक भाषा-शैली में संपादकीय लिखा है ।यौन शोषण और अधिकार के कई पहलू वैश्विक परिवेश की विविधता पर निर्भर करते हैं ।वेल्जियम में यौन कर्मियों के लिए पारित क़ानून के सकारात्मक पक्ष वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार हो सकता है किन्तु जहाँ भावनात्मक संबंधों को सांस्कृतिक गौरव से जोड़ कर मर्यादा और अस्तित्व के रूप में देखा जाता है वहाँ के लिये यह चिन्तनीय है ।
आपने एक ऐतिहासिक विडंबना को आधुनिक वैश्विक संस्कृति के फलक पर नकारात्मक -सकारात्मक दोनों दृष्टि से उजागर किया है ।
संपादकीय पढ़कर इन तथ्यों से दिमाग़ को तुरंत अन्य दिशाओं की ओर ले जाना संभव नहीं हो सका।यह विषय वस्तु भारत तथा अन्य कुछ देशों के लिए असंभव प्रतीत होते हुए भी यौन अपराधों के नियंत्रण की दिशा में वैकल्पिक मार्ग का संकेत अवश्य करता है,जैसे कि आपने प्राचीन काल और मुगलकालीन परिवेश का उल्लेख किया है ।
अभी इतना ही।
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मीनकेतन प्रधान
7/12/24
श्री तेजेंद्र शर्मा जी,
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आपने तार्किक भाषा-शैली में संपादकीय लिखा है ।यौन शोषण और अधिकार के कई पहलू वैश्विक परिवेश की विविधता पर निर्भर करते हैं ।वेल्जियम में यौन कर्मियों के लिए पारित क़ानून के सकारात्मक पक्ष वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार हो सकता है किन्तु जहाँ भावनात्मक संबंधों को सांस्कृतिक गौरव से जोड़ कर मर्यादा और अस्तित्व के रूप में देखा जाता है वहाँ के लिये यह चिन्तनीय है ।
आपने एक ऐतिहासिक विडंबना को आधुनिक वैश्विक संस्कृति के फलक पर नकारात्मक -सकारात्मक दोनों दृष्टि से उजागर किया है ।
संपादकीय पढ़कर इन तथ्यों से दिमाग़ को तुरंत अन्य दिशाओं की ओर ले जाना संभव नहीं हो सका।यह विषय वस्तु भारत तथा अन्य कुछ देशों के लिए असंभव प्रतीत होते हुए भी यौन अपराधों के नियंत्रण की दिशा में वैकल्पिक मार्ग का संकेत अवश्य करता है,जैसे कि आपने प्राचीन काल और मुगलकालीन परिवेश का उल्लेख किया है ।
अभी इतना ही।
—
मीनकेतन प्रधान ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
7/12/24
संवेदनात्मक सम्पादकीय
साधुवाद
Dr Prabha mishra
आभार प्रभा जी।
आपका संपादकीय हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक और नवाचारी रहता है।यौनकर्मी या सेक्स वर्कर ‘शब्दावली’ तक के लिए भी महिला संगठनों को संघर्ष करना पड़ा है। आपका पूरा संपादकीय यौन कर्मियों के अधिकारों पर केंद्रित है, जो सराहनीय है, जिसके लिए आपने भारतीय इतिहास को भी खंगाला है, जो अपनी बात को पुष्ट करने के लिए अनिवार्य भी था। ये तो बेल्जियम सरकार ने यौनकर्मियों के साथ साथ समाज में भी जागरूकता बढ़ाने का काम किया है। मैं नहीं जानती कि इन सुविधाओं के एवज में वे सरकार को कुछ टैक्स दे रही है क्या? संभवतः टैक्स देने का अर्थ है कि एक तो उनके पेशे को पहचान मिल रही है दूसरे उन्हें यौनकर्मी के रूप में उन्हें पहचाना जाएगा, जो शायद सभी पसंद न भी करें खासकर वे जो इस कार्य से कुछ अतिरिक्त कमाई के लालच में आती है और नहीं चाहती किसी को मालूम पड़े।
और जो सचमुच इस काम के अतिरिक्त कुछ नहीं करती उन्हें इसका लाभ कितना मिल पाएगा यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
पर समस्या हमेशा वहीं आ जाती है जब किसी भी यौनकर्मी किसी विवशता में इस पेशे में आना पड़ता है,जिस तरह समाज में बेरोज़गारी बढ़ रही है आज लड़के भी इस पेशे की ओर रुख कर रहे हैं तो आजकल की लड़कियाँ इसे पार्ट टाइम बिजनेस के रूप में भी तो कर रही हैं, तो इस पर नियमित कानून बना देना आसान लेकिन उसे लागू करना कठिन काम है, लेकिन हर नए काम में कठिनाइयां तो आती ही हैं।
रक्षा, आपने इस कानून के कुछ पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि बेल्जियम सरकार के सामने वहां के नेताओं और संस्थाओं ने भी अवश्य कुछ मुद्दे उठाए होंगे। कानून को सही रूप से लागू करने का बेल्जियम सरकार अवश्य प्रयास करेगी।
बहुत ही विवादस्पद विषय है। इस तरह की धारणा को इंडिया में लागू करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि यहाँ तो ख़ुद सेक्स वर्कर इस दलदल से निकलने को प्रयासरत हैं। क्योंकि उन्हें सामाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। कोशिश तो यह होनी चाहिए की समाज में इनको भी सम्मान से जीने का हक़ हो। इनके बच्चों को भी वही सामाजिक बुनियादी सुविधाएँ दी जाएँ जो अन्य भारतीय लोगों को प्राप्त हैं।
तबस्सुम बेटा, यदि सेक्स वर्कर अपना काम छोड़ कर किसी और काम में जगह पा सकते तो यह समस्या ही समाप्त हो जाती। बेल्जियम में इस कानून के बनने से पहले भी विश्व में यौनकर्म होता था और इसके बाद भी होता रहेगा। भारतवासियों से यही उम्मीद है कि वे इस समस्या का हल ढूंढने का प्रयास करें। हम मुद्दों पर चादर डाल कर आँखें मूंद लेते हैं और समस्या उस चादर के नीचे बू मारती रहती है। यह एक गंभीर समस्या है और इसका हल भी गंभीरता से ही सोचना होगा।
जितेन्द्र भाई: बहुत अच्छा विषय चुना है आप ने इस बार। चाहे अपनी रज़ामन्दी से या फिर हालात की मजबूरी से, जब सैक्ष वर्कर्स ने इस काम को अपना पेशा बना ही लिया है तो सरकार का भी फ़र्ज बनता है कि उन से उनकी आमदनी पर टैक्स वसूल करे और वो सब सुविधाएं दे जो एक आम नौकरी पेशा या बिज़नेस वाले को मिलती हैं। जैसा कि आप ने लिखा है बैल्जियम ने तो इस श्रेणी को डिफ़ाइन भी कर दिया है। बैल्जियम के इलावा और देशों में लोगों की नज़रों में क्या यह acceptable profession है या नहीं यह तो हर देश को अपने अपने हिसाब से सोचना है। इस में कोई दो मत नहीं हैं कि यह दुनिया के सब से पुराने पेशों में से एक है। और देशों की तरह भारत में भी सैक्ष वर्कर्स की कमी तो नहीं है लेकिन वहाँ इन के लिए social acceptance नहीं है। अब सब से पहला सवाल तो यह उठता है कि इस पेशे को अपनाने में वहाँ काम करने वालों की क्या मजबूरी थी जो इस पचड़े में फंस गई। जैसा कि ख़बरों से पता चलता है, कुछ लडक़ियों को तो बचपन में ही उठा कर कोठे पर बेच दिया जाता हैं। वहाँ उनकी पर्वरिश उसी माहॉल के हिसाब से होती है। उमरावजान मूवी में यह बख़ूबी दिखाया गया है। कई बार फ़िल्मों में काम दिलाने के सुनहरे ख़्वाब दिखाकर भी बहलाया फुसलाया जाता है। ऐसा भी पढ़ने को मिला है कि ऐसी ही काम करने वाली मैडम अपने गाँव में जाकर ग़रीब लोगों को झाँसा देकर उन्हें अपनी नादान बेटियों को साथ भेजने पर मना लेते हैं। बाद में इन्हीं बच्चियों से क्या क्या कराया जाता है वो साफ़ ज़ाहिर है। इसके इलावा और भी बहुत बहुत हथकण्डे हैं जो अपनाए जाते हैं।
अब बात आती है भारत में इन काम करने वालों को इनके अधिकार देने की। ऐस हुसैण ज़ैदी की पुसत्क ‘Mafial Queens of Mumbai’ में कमाठीपुरा की Matriarch (कुलमाता) वेश्या गंगूबाई का ज़िकर आता है कि कैसे उसको उसके प्रेमी रमनीक ने उसे फ़िल्म स्टार बनाने के लालच में बम्बई के एक कोठे पर कुछ हज़ार रुपयों में बेच दिया। बदनामी के डर से वो घर वापस जा नहीं सकती थी सो उसने बहुत जल्दी अपने आप को इस धन्धे को समर्पित कर दिया। बाद में यह बहुत मशहूर हुई और सैक्ष वर्कर्स के लिये कुछ सुधार भी करने चाहे। शायद गंगूबाई को इस मसले में कुछ कामयाबी भी मिली हो। इसी गंगूबाई को लेकर आलिया भट्ट की एक हिन्दी मूवी ‘गंगूबाई काठियावाड़ी भी बनी थी और उस में भी यह दिखाया था कि इस पेशे में काम करने वालों को उनके अधिकार मिलने चाहिएं। आगे जाकर बैल्जियम का मॉडल भारत अपनाएगा यह तो समय ही बताएगा।
भाई विजय जी,हमेशा की तरह आपने संपादकीय की तह में पहुंच कर अपनी बात को स्पष्ट और सरल भाषा में पुरवाई के पाठकों के सामने लिखा है। हार्दिक आभार।
मानवाधिकार के तहत सेक्स वर्कर्स के लिए बेल्जियम सरकार का यह एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम है। सच में यह उनके लिए इन्सान के रूप में अस्तित्व में रहने का एक अवसर है। यह कदम LGBTQIA के तर्ज पर यौन-कर्मियों पर साहित्यिक तथा आलोचनात्मक विमर्श के लिए मार्ग प्रसस्त करेगा। अगले कुछ वर्षों में भारत में भी यह क़ानून आयेगा, ऐसा मुझे विश्वास है, क्योंकि उन्हें भी जीने का हक़ है। सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं, इसके लिए मानसिकता में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। क़ानून के साथ इससे संबंधित तस्करी, शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने के लिए भी शख्त क़ानून की आवश्यकता है।
एक नए सामाजिक मुद्दे (चाहे विश्व के किसी भी कोने में क्यों न हो) को लेकर इस बार का संपादकीय सही में इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है जिससे भारत में इस दिशा सरकारी/सामाजिक स्टार पर कुछ तो प्रतिक्रियाएं होगीं। धन्यवाद
बेल्जियम को बहुत-बहुत बधाई इसलिए क्योंकि अपना पेशा स्वीकार करने के बाद भी जो सुविधा नहीं थी वह मिल रही है भले ही समझ में बहुत बड़ी इज्जत नहीं हो परंतु सुविधा तो मिल रही है ना। यह भी बहुत बड़ी बात है। ऐसी बातें बताने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
भाग्यम जी आपको संपादकीय पसंद आया इसके लिये बहुत आभार आपका।
If sex or sex workers are encouraged so much, then one day young boys and girls will be more attracted to this profession than to studies and this will create a new problem for the parents. And then this freedom will also affect the relationship of married couples. Tejendra ji, your editorials are undoubtedly excellent (ये क्या हो गया मैने तो
हिंदी में लिखा था)मगर लोग-बाग को
ये नहीं समझना चाहिए कि आप इस काम के Favour में हैं या support कर रहे हैं।
क्योंकि हम लोग आपके सम्पादकीय से
बहुत कुछ नई नई बातें सीखते हैं।
मैं हैरान हूं कि मैने तो हिंदी में लिखा
था ये अपने आप ही अंग्रेज़ी में अनुवाद
हो गया।
आदरणीय ज़किया जी, ग़लती से ट्रांस्लेट वाला बटन क्लिक हो गया होगा। मगर आपने टिप्पणी लिखी यह देख कर बहुत अच्छा लगा।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
कहाँ-कहाँ से आप संपादकीय तलाश कर लाते हैं! एकदम एटम बम जैसी स्थिति बन जाती है भई। हैट्स ऑफ आपको।
आपने जो लिखा है कि “वेश्यावृत्ति या यौन कर्म एक ऐसी संभोग प्रक्रिया है जो पैसे या किसी अन्य लाभ के लिए की जाती है।” इसमें हम इतना और जोड़ना चाहते हैं ,”की जाती है या कराई भी जाती है।” और अब तो यह बेल्जियम में सरकार द्वारा स्वीकृत हो गया कामगार के रूप में।इस पर हमने बहुत विचार किया।सकारात्मक रूप में देखते हैं तो इसकी कुछ दुश्वारियाँ हमारे सामने खड़ी नजर आती हैं। पता नहीं कितना सही कितना गलत! पर यह भी लगता है कि कई बार जरूरत इंसान को मजबूर कर देती है, वह भी करने के लिए जो वह करना नहीं चाहते। वाकई वक्त बहुत कठोर होता है।बहुत सारे प्रश्न हमारे दिमाग में घूम रहे हैं ।आप अपनी बात को बहुत स्पष्टता के साथ और ईमानदारी से कहते हैं यह आपकी खूबी है।
इस संपादकीय को पढ़कर महसूस हुआ कि अगर यह वर्तमान की जरूरत है तो शायद एक व्यवस्थित व्यवस्था एवं सुरक्षा के तहत ठीक है। बेल्जियम सरकार की पहल का स्वागत है। नियम न्याय की दिशा में सुरक्षित हल देते हैं,पर फिर भी हर काम के फायदे की तुलनात्मकता में नुकसान पर ध्यान देना भी जरूरी है। हमें लगता है कि जो स्वेच्छा से करते हैं उसमें आपत्ति नहीं होना चाहिये बशर्ते उसकी आड़ में कुछ गलत काम न हो।
तेजेन्द्र जी!पहले हमने बहुत से ऐतिहासिक उपन्यास भी पढ़े हैं। हमने आचार्य चतुरसेन को बहुत पढ़ा है। आपके संपादकीय के गणिका और देवदासी शब्दों ने हमें उपन्यास, वैशाली की नगर वधू” की याद दिलाई। हमने इस उपन्यास को पढ़ा है ।इस पर आम्रपाली नाम से पिक्चर भी बनी थी । हमने पिक्चर भी देखी थी।यह आम्रपाली(अंबपाली) के जीवन पर आधारित है, जो (वर्तमान बिहार में) वैशाली की नगरवधू थी, जो 500 ईसा पूर्व के आसपास प्राचीन भारत में लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी, और अजातशत्रु , मगध साम्राज्य के हर्यंक सम्राट,उससे प्रेम करने लगते हैं। क्रांति पिक्चर उपन्यास के मामले में कमजोर लगी थी। यह एकमात्र पिक्चर ऐसी थी जो पूरी देखे बिना टॉकीज से बाहर आ गए थे हम।
वास्तव में देवदासियों व गणिकाओं का समय आज से भिन्न था और उसका स्वरूप भी बिल्कुल अलग था। विकृत मानसिकता धीरे-धीरे अपने पैर फैलाती है। उस समय वेश्या के दो रूप बताए गये। एक तो ऐसी स्त्री जो संभोग की इच्छा से अनेक व्यक्तियों के प्रति अनुरक्त होती है। दूसरी वह जो सजधजकर युवकों को वशीभूत तो करती है किन्तु हृदय में संभोग की इच्छा नहीं रखती और धन प्राप्त होने पर ही संभोग के लिये तत्पर होती है। ऐसी स्त्री को ‘गणिका’ कहा है। वस्तुतः ऐसी स्त्री वेश्या कही जाती थी, गणिका नहीं। वेश्या केवल रूपाजीवा और अंधक नायक को भी तन विक्रय करनेवाली थी। उसकी गणना नायिका में नहीं की गई है। गणिका, श्रेष्ठ समझी जाती थी।
वस्तुतः कलावती (कला-रूप-गुण संपन्न) स्त्री को गणिका कहते थे। वह प्राचीन काल में राज दरबार में नृत्य गायन करती थीं और उसे इस कार्य के लिये हजार पण वेतन प्राप्त होता था। वह राजा के सिंहासनासीन रहने पर अथवा पालकी में बैठने के समय उस पर पंखा झलती थी। इस प्रकार से गणिका राजसेविका थी। उसे राज दरबार में सम्मान प्राप्त था, ऐसा नाट्यशास्त्र के प्रचुर उल्लेखों से प्रकट होता है। भरत ने उसके गुणों का इस प्रकार उल्लेख किया है-
प्रियवादी प्रियकथा स्फुटा दक्षा जिनश्रमा।
एभिर्गुर्णस्तु संयुक्ता गणिका परिकीर्तिता॥
ललितविस्तर में एक राजकुमारी को गणिका के समान शास्त्रज्ञ कहा गया है। इससे पता चलता है कि गणिका काव्य-कला-शास्त्र की ज्ञाता होती थीं। गणिकापुत्री को नागरपुत्रों के साथ बैठकर विद्याध्ययन करने का अधिकार प्राप्त था।
गणराज्यों में गणिका समस्त राष्ट्र या गण की सम्पत्ति मानी जाती थी। बौद्ध साहित्य में उसका यही रूप प्राप्त होता है। संस्कृत नाटकों में उसे ‘नगरश्री’ कहा गया है। मृच्छकटिक(यह नाटक हमने बी ए में संस्कृत में पढ़ा था) की नायिका वसन्तसेना गणिका थी। उसमें उसके प्रति आदर व्यक्त किया गया है। वैशाली की अम्बपालि, वसन्तसेना की तरह ही नगर के अभिमान की वस्तु थी। गणराज्य का ह्रास होने पर साम्राज्य के प्रभाव विस्तार से गणिका और वारंगना (वेश्या) का भेद जाता रहा। गणिका को वारांगना से हेय माना जाने लगा। मनु ने उसका अन्न खाने का निषेध किया।वे अपना विरोध दर्ज कराते रहे। सामान्य सामाजिक अवधारणा में पहले देवदासी ऐसी स्त्रियों को कहते थे, जिनका विवाह मंदिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता था। उनका काम मंदिरों की देखभाल तथा नृत्य तथा संगीत सीखना होता था। पहले समाज में इन्हें उच्च स्थान प्राप्त था,वे समाज में पूजनीय होती थीं।बाद में हालात बदतर हो गये। इन्हें मनोरंजन की एक वस्तु समझा जाने लगा। देवदासियाँ परंपरागत रूप से तो ब्रह्मचारी होती थीं, पर बाद में उन्हें पुरुषों से संभोग का अधिकार भी रहा। यह एक अनुचित और गलत सामाजिक प्रथा है। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था। बीसवीं सदी में देवदासियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। अँगरेजों ने तथा समाज सुधारकों ने देवदासी प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की तो लोगों ने इसका विरोध किया। इसीलिए शायद आर्य भूमि भारत में हुए अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी जातिवाद के कट्टर विरोधी रहे है जिनमे स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय ,डॉ आंबेडकर जैसे महान समाजवादी भी शामिल हैं। यह सब हमने उपन्यासों के माध्यम से ही जाना था। और काफी पहले पढ़ा था।
यह बात सही है कि व्यवस्थाएँ बनाई तो अच्छी जाती हैं लेकिन बाद में उसके दुरुपयोग शुरू हो जाते हैं। और उसके पीछे मुख्य कारण मानव प्रवृत्ति है। और इस मानव प्रवृत्ति को प्रभावित करने वाली बहुत सारी चीज रहती हैं खुद ब्लड का असर, परिवार का असर, परिवेश जहाँ वह रहता है, शिक्षा, सोहबत और इन सबसे ऊपर स्थितियाँ और परिस्थितियाँ। पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक।
अगर दूरदर्शिता से इस पर विचार किया जाए तो इससे युवा वर्ग भटक सकता है,जो अभी-अभी किशोर उम्र से गुजर रहा है। गलत आदत जल्दी सीखते हैं लेकिन संभालने में बहुत वक्त लगता है। दूसरी समस्या- विवाह एक संस्कार है। और इससे पारिवारिक जीवन प्रभावित होगा। परिवार के बिखरने और टूटने की संभावनाए बढ़ जाएँगी। वैसे ही परिवारों से संवेदनाएं समाप्त हो रही है रिश्ते बिखर रहे हैं और यह उसमें आग में घी की तरह काम करेगा। कम से कम भारत के लिए तो हम यही सोचते हैं। शुक्रिया आपका तेजेन्द्र जी!इस नई खबर के लिए।
आदरणीय नीलिमा जी, हमेशा की तरह आपने संपादकीय पर एक अलग आलेख लिख डाला है। आप आचार्य चतुरसेन वाले पैराग्राफ़ के बाद की सामग्री को एक स्वतंत्र लेख की तरह डेवेलप कर सकती हैं। किसी भी पत्रिका प्रकाशित हो जाएगा। आपसे आग्रह है कि किसी एक संपादकीय पर केवल ऐसी टिप्पणी लिखें जो केवल संपादकीय पर केन्द्रित हो।
देश दुनिया में बहुत कुछ बदल रहा है। बदलते हुए परिवेश पर आपका यथार्थ लेख अति विचारणीय है…
संवेदनशील विषय पर विचारोत्तेजक संपादकीय।विश्व पटल पर हो रही घटनाओं पर पैनी नजर के साथ आपके विश्लेषणत्मक दृष्टिकोण को नमन। हमेशा की तरह तेजस्वी लेखन के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद।