Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – आतंकवाद ऑस्ट्रेलिया पहुँचा…!

ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच पर हुए आतंकी हमले से पहले 22 अप्रैल को भारत के पहलगाम में भी एक आतंकी हमला हुआ था, लेकिन विदेशी मीडिया ने उसे अलग तरीके से पेश किया। इस तरह पश्चिमी देशों के मीडिया ने अपने दोहरे मानदंडों को पूरी तरह उजागर कर दिया। पहलगाम के आतंकी हमले को द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘कट्टरपंथी हमला’ कहा, द गार्जियन ने ‘संदिग्ध कट्टरपंथी’ लिखा, बीबीसी ने ‘बंदूकधारी’ कहा, जबकि ब्लूमबर्ग ने ‘कट्टरपंथी’ शब्द का प्रयोग किया। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में हुए हमले को इन्हीं मीडिया संस्थानों द्वारा ‘आतंकवादी हमला’ कहा जा रहा है। यह दर्शाता है कि भारत में हुई आतंकी घटनाओं को अक्सर आंतरिक समस्या के रूप में देखा जाता है, जबकि विकसित देशों में ऐसी घटनाओं को स्पष्ट रूप से आतंकवाद माना जाता है।

जब मैं एअर इंडिया में फ़्लाइट परसर की नौकरी किया करता था, उन दिनों हमारी पोस्टिंग ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर बसे शहर पर्थ में हुआ करती थी। हम पर्थ से सिडनी और मेलबर्न की उड़ानें भरा करते थे। मुझे निजी तौर पर पर्थ बहुत ही सुंदर और सुकूनदेह शहर लगता था, जिसमें गाँव और शहर, दोनों की अच्छाइयाँ मौजूद थीं। महानगरीय बुराइयाँ तब तक वहाँ नहीं पहुँची थीं।इसीलिए जब ऑस्ट्रेलिया में इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा यहूदियों को गोलियों से भून दिए जाने का समाचार मिला, तो मैं सचमुच दहल गया।
सिडनी के बॉन्डी बीच पर 14 दिसंबर की शाम यहूदी अपना पवित्र त्यौहार ‘हनुक्का’ मना रहे थे। ऐसे में दो इस्लामिक आतंकवादी-पचास वर्षीय साजिद अकरम और उसका चौबीस वर्षीय बेटा नवीद अकरम वहाँ सेमी-ऑटोमैटिक राइफ़लें लेकर पहुँच गए, और वहाँ मौजूद लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाने लगे। देखने में साजिद और नवीद भारतीय उपमहाद्वीप के लोग लग रहे थे। पहले यह शोर मच गया कि इन दोनों आतंकवादियों का रिश्ता पाकिस्तान से है, मगर बाद में जानकारी मिली कि साजिद भारतवंशी है और करीब सत्ताईस साल पहले हैदराबाद से ऑस्ट्रेलिया जाकर बस गया था।
बताया जा रहा है कि साजिद ने एक यूरोपीय लड़की वीनस ग्रोसो से ऑस्ट्रेलिया में 1999 में विवाह कर लिया था। फिर वर्ष 2000 में दोनों हैदराबाद (भारत) आए और साजिद के माता-पिता की उपस्थिति में इस्लामिक ढंग से निकाह भी किया। 12 अगस्त 2001 को उसके यहाँ नवीद अकरम का जन्म हुआ। जब नवीद 15 वर्ष का था, तो परिवार हैदराबाद के अल-हसन क्षेत्र के टोलीचौक में अपने रिश्तेदारों से मिलने आए थे।
मार्च 2024 तक साजिद अकरम यह तय कर चुका था कि वह कोई गंभीर कुकर्म करने वाला है। इसी कारण उसने अपनी तमाम संपत्ति अपनी पत्नी के नाम हस्तांतरित कर दी थी। अब यदि साजिद के कुकृत्य के लिए उसकी संपत्ति से किसी प्रकार का मुआवज़ा निकालने की बात की जाएगी, तो यह संभव नहीं हो पाएगा, क्योंकि उसने पहले ही सारी संपत्ति अपनी पत्नी के नाम कर दी थी।
2019 में साजिद अकरम के पुत्र नवीद ने सिडनी के ‘अल-मुराद इंस्टीट्यूट’ में दाख़िला ले लिया। माना जा रहा है कि यहीं वह आई.एस.आई.एस. की ओर आकर्षित हुआ। पुलिस का मानना है कि पिता-पुत्र दोनों ने फ़िलिपींस के मिंडानाओ द्वीप में आई.एस.आई.एस. के एक कैंप में कुछ महीनों का प्रशिक्षण लिया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में एक इस्लामिक सेंटर के सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि नवीद ने 2022 में मज़हबी पढ़ाई पूरी की थी, जिससे देश में संभावित कट्टरपंथी और चरमपंथी नेटवर्क को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अल-मुराद इस्लामिक इंस्टीट्यूट के प्रमुख एडम इस्माइल ने द टेलीग्राफ के सवालों पर जवाब देने से इनकार कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नवीद एक बिल्डर के यहाँ ईंट-पत्थर का काम किया करता था। जब उसकी कंपनी दिवालिया हो गई, तो उसे काम से निकाल दिया गया और वह पिछले कुछ समय से काम ढूँढ़ रहा था।
जिस बेदर्दी से पिता और पुत्र दोनों निहत्थे बेगुनाहों पर गोलियाँ बरसा रहे थे, उससे साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि उन्हें क्रूरता की विशेष ट्रेनिंग दी गई थी। अब सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से पिता-पुत्र द्वारा आतंकी हमले की पूरी तैयारी सबके सामने खुल चुकी है। इस आतंकी हमले के तीन दिन बाद ही सिडनी पुलिस ने एक कार से सात इस्लामिक आतंकवादियों को हथियारों के साथ गिरफ़्तार कर लिया। वे एक बड़े हमले की तैयारी में थे।
ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच पर हुए आतंकी हमले से पहले 22 अप्रैल को भारत के पहलगाम में भी एक आतंकी हमला हुआ था, लेकिन विदेशी मीडिया ने उसे अलग तरीके से पेश किया। इस तरह पश्चिमी देशों के मीडिया ने अपने दोहरे मानदंडों को पूरी तरह उजागर कर दिया।
पहलगाम के आतंकी हमले को द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘कट्टरपंथी हमला’ कहा, द गार्जियन ने ‘संदिग्ध कट्टरपंथी’ लिखा, बीबीसी ने ‘बंदूकधारी’ कहा, जबकि ब्लूमबर्ग ने ‘कट्टरपंथी’ शब्द का प्रयोग किया। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में हुए हमले को इन्हीं मीडिया संस्थानों द्वारा ‘आतंकवादी हमला’ कहा जा रहा है। यह दर्शाता है कि भारत में हुई आतंकी घटनाओं को अक्सर आंतरिक समस्या के रूप में देखा जाता है, जबकि विकसित देशों में ऐसी घटनाओं को स्पष्ट रूप से आतंकवाद माना जाता है।
पश्चिमी देशों के मीडिया के दोहरे मानक हमेशा उभर कर सामने आते हैं। ऑस्ट्रेलिया के समाचार पत्रों ने अपने देश के आतंकवादियों के लिए पहले पृष्ठ पर लिखा- ‘बास्टरर्ड्स!’ मगर ऐसी तीखी प्रतिक्रिया कभी भारत में आतंकवादी हमले से मरने वालों के बाद नहीं की गई। यहाँ तक कि ‘पहलगाम’ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तो पाकिस्तान के फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अपनी गोद में बैठा लिया। 
फ़्रांस की एक संस्था Fondation pour l’innovation politique (जिसे ‘फ़ाँडापोल’ भी कहा जाता है) ने अक्तूबर 2024 में एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसके अनुसार 1979 से 2024 के बीच 66,872 इस्लामिक आतंकवादी हमले हुए, जिनमें 2,49,941 लोगों की जानें गईं। ध्यान देने लायक बात यह है कि यह संख्या निरंतर बढ़ती ही गई।
1979-2000 के बीच 194 हमले हुए और 6,817 मौतें हुईं। 2001 से 2012 के बीच 82,665 हमले हुए और 38,187 मौतें हुईं। फिर 2013 से अप्रैल 2024 के बीच 56,413 हमले हुए, जिनमें 2,04,937 लोगों की जानें गईं।
रिपोर्ट के अनुसार कुल आतंकवादी हमलों में दक्षिण एशिया में 31.2% हमले और 33.7% मौतें; खाड़ी देशों और उत्तरी अफ़्रीका में 30.4% हमले और 33% मौतें, उत्तरी अमेरिका में 0.1% हमले और 1.3% मौतें; यूरोप एवं रूस में 0.4% हमले और 0.7 प्रतिशत मौतें और दक्षिण पूर्व एशिया में 2.6% हमले और 1.1% मौतें दर्ज की गई हैं। यूरोपियन यूनियन में किए गए इस्लामी आतंकवादी घटनाओं का जायज़ा लिया जाए तो वहाँ सबसे अधिक हमले फ़्रांस में हुए जहाँ 85 हमलों में 334 लोगों की मृत्यु हुई। 
इस्लामी आतंकवाद से सबसे ज़्यादा प्रभावित देश हैं- अफ़गानिस्तान (17,075 हमले), सोमालिया (10,768 हमले), इराक (8,209 हमले), नाइजीरिया (3,950 हमले), सीरिया (3,421), पाकिस्तान (2,635), माली (2,289 हमले), इज़राइल (1,748 हमले), यमन (1,657 हमले), अल्जीरिया (1,387 हमले), मिस्र (1,367 हमले), मोज़ाम्बिक (1,302 हमले) और कैमरून (1,230 हमले)। इन तेरह देशों में इस्लामी आतंकवादी हमलों के कारण 2,18,734 मौतें हुईं, जो दुनिया भर में हुई कुल मौतों का 87.5% है।
विश्व के सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों की यदि सूची बनानी हो, तो इनमें तालिबान (71,965 मौतें), इस्लामिक स्टेट ग्रुप (69,641 मौतें), बोको हराम (26,081 मौतें), अल शबाब (21,784 मौतें), और अल कायदा (14,856 मौतें) का नाम आता है। ये पाँच आतंकवादी ग्रुप 1979 और अप्रैल 2024 के बीच इस्लामी आतंकवादी हमलों के तीन-चौथाई (81.8%) से ज़्यादा पीड़ितों के लिए ज़िम्मेदार थे।
पाकिस्तान एक विचित्र देश है, जहाँ भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए अलग संगठन हैं और पाकिस्तान में आतंक फैलाने वाले कुछ और। एक तरफ़ लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-झांगवी, हक्कानी नेटवर्क जैसे संगठन हैं, जो भारत में सक्रिय रहते हैं। वहीं तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान और बलोच लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन पाकिस्तान में आतंकवादी वारदातों के लिए ज़िम्मेदार हैं।
मैंने आतंकवाद की परिभाषा ऑनलाइन ढूँढ़ने का प्रयास किया, तो मुझे यह परिभाषा अपनी सोच के करीब लगी- “आतंकवाद वह हिंसक कृत्य है जो व्यक्तियों, समूहों या संगठनों द्वारा राजनीतिक, धार्मिक, वैचारिक या सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसमें आम नागरिकों, सरकारी संस्थानों या बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाकर भय, अस्थिरता और दहशत फैलाने का इरादा होता है। आतंकवादी गतिविधियों में बम विस्फोट, अपहरण, हत्या, साइबर हमले आदि शामिल हो सकते हैं। यह आमतौर पर ग़ैर-कानूनी और अमानवीय माना जाता है, क्योंकि यह निर्दोष लोगों की जान जोखिम में डालता है।”
इस्लामिक आतंकवाद ने 85 देशों में अपना कहर ढाया है। न्यूज़ 18 के एक कार्यक्रम में यह दावा किया गया कि संयुक्त राष्ट्र ने 726 आतंकवादियों की सूची जारी की है, जिसमें 700 आतंकवादी मुसलमान हैं। ‘पुरवाई’ के पास इस दावे की पुष्टि करने के लिए कोई स्त्रोत नहीं है। भारत में प्रमुख आतंकवादी घटनाएँ कुछ इस प्रकार हुई हैं- जम्मू-कश्मीर (768), दिल्ली (33), महाराष्ट्र (26), गुजरात (20), बिहार (18)। 
इस्लामिक आतंकवाद के चलते फ़्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया ने नववर्ष के उपलक्ष्य में होने वाले उत्सव रद्द कर दिए हैं। साथ ही साथ यूरोप के दस देशों ने अपनी प्रवासन नीति में बदलाव करने का निर्णय लिया है। याद रहे कि ‘इस्लामोफ़ोबिक’ शब्द की उत्पत्ति  अमेरिका और इंग्लैंड में ही हुई। मगर आज ये ही देश इस आतंक का शिकार भी हो रहे हैं। ऐसा देखा जा रहा है कि यूरोप के दस देशों- फ्रांस, ग्रीस, जर्मनी, बेल्जियम, फिनलैंड, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, डेनमार्क, पुर्तगाल और ब्रिटेन ने अपने प्रवासन नियमों में कठोर परिवर्तन किए हैं। 
किसी भी समस्या या बीमारी का हल ढूँढ़ने के लिए आवश्यक है कि हम इस बात को स्वीकार करें कि- समस्या है क्या? जब हम समस्या को स्वीकार कर लेते हैं, तो हल ढूँढ़ना आसान हो जाता है। यदि बीमारी मलेरिया हो तो टाइफ़ाइड की दवा से ठीक नहीं हो सकती। बीमारी की जड़ को पकड़ने के बाद ही सही इलाज संभव है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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28 टिप्पणी

  1. संपादकीय समीचीन मुद्दों को पेश करने वाले पहरुए होते हैं।वे समाज की नब्ज़ को पकड़ने का हुनर भी जानते हैं।एक और बात ,वे दुखती रग को भी पकड़ना जानते हैं।!?!?
    पाठक सोच रहे होंगे कि भाई आख़िर इशारा क्या है? इस बार का संपादकीय है ही ऐसा जो उपरोक्त सिद्धांतों को जनहित में पूरा करता है।
    दोहरे मापदंड वाले पश्चिमी मीडिया के सामने आईना रखता है।प्रवासी भारतीय संपादक द्वारा लिखा गया ,यह संपादकीय भारत में हुए पहलगाम आतंकी हमले को भी पीड़ा परन्तु पत्रकारिता की ऊर्जस्विता से केंद्र में ले कर आता है ।
    पड़ोस में पाकिस्तान की कलई खोल कर रख दी गई है।अब निहत्थे यहूदियों जोकि अपना पवित्र पर्व हन्नुक्का मना रहे थे उन पर गोलियां चलाना क्रूरता की हद से भी पार का शैतानी कर्म है । उसके लिए या ऐसे घृणित कार्यों में पाकिस्तान के नागरिक अक्सर सबूत सहित साबित होते हैं पर कोई भी महाशक्ति इन पर वैश्विक मंचों पर सवाल नहीं उठाती।
    इस बार इस हमले पर मीडिया की प्रतिक्रिया पर एक कहावत याद आती है,अपने पे आई तो रोए दूसरों पर आई तो हँसे,,,
    काश समूचा विश्व अब पाकिस्तान को समझ ले और उसे जकड़ ले तो आतंकवाद की कमर टूट जाए ।
    बेबाक संपादकीय हेतु बधाई और साधुवाद दोनों।

    • भाई सूर्य कांत जी आपने तो तुरत फुरत में संपादकीय पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया भी पोस्ट कर दी। आपकी टिप्पणी संपादकीय के साथ पूरा न्याय करती है।

  2. ‘पुरवाई’ के हालिया अंक में सिडनी आतंकी हमले पर आप द्वारा लिखा गया सम्पादकीय पढ़ा। यह आलेख न केवल सामयिक है, बल्कि वैश्विक आतंकवाद की उन गहरी और डरावनी परतों को उघाड़ता है जिनसे आज पूरी मानवता जूझ रही है। आपने जिस स्पष्टता और साहस के साथ कट्टरपंथ के खतरों को रेखांकित किया है, वह आज के दौर में अत्यन्त आवश्यक है। यह लेख हमें याद दिलाता है कि आतंक का कोई भूगोल नहीं होता और यह कहीं भी, किसी भी शान्त समाज की नींव हिलाने की कोशिश कर सकता है।
    सम्पादकीय में व्यक्त यह विचार अत्यन्त प्रभावशाली है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे उदार और बहुसांस्कृतिक समाज पर हमला दरअसल मानवीय मूल्यों पर हमला है। आपने सही पहचान की है कि ऐसे कृत्यों का मुख्य उद्देश्य केवल हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास और नफरत का बीज बोना होता है। आपकी यह चिन्ता जायज है कि यदि हम इस वैचारिक युद्ध में एकजुट नहीं हुए तो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित संसार का सपना अधूरा रह जायेगा।
    आपने जिस संवेदनशीलता के साथ बन्धकों की पीड़ा और उनके परिवारों के दुख को शब्दों में पिरोया है, वह हृदय को झकझोर देता है। निर्दोष लोगों की जान जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। यह आलेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर कब तक धर्म या विचारधारा के नाम पर निर्दोषों का रक्त बहाया जाता रहेगा। आपका विश्लेषण इस बात की ओर इशारा करता है कि आतंकवाद का मुकाबला केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि एक मजबूत और एकजुट सामाजिक चेतना से ही सम्भव है।
    इस सम्पादकीय की सबसे बड़ी शक्ति इसकी बेबाकी है। आपने किसी भी प्रकार के राजनीतिक संकोच के बिना यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में कोई ‘किन्तु-परन्तु’ नहीं होना चाहिए। शान्तिप्रिय समाज को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी और ऐसी हिंसक प्रवृत्तियों का सामूहिक विरोध करना होगा। ‘पुरवाई’ के माध्यम से दिया गया यह सन्देश न केवल सिडनी की घटना के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए एक चेतावनी है जो शान्ति और सह-अस्तित्व में विश्वास रखता है।
    निश्चित रूप से, आपका यह लेखन हमें एक बेहतर और घृणा-मुक्त समाज बनाने की दिशा में प्रेरित करता है। यह सम्पादकीय यह सन्देश देने में सफल रहा है कि नफरत की जीत तभी होती है जब हम डर जाते हैं और मानवता की जीत तब होती है जब हम हर डर से ऊपर उठकर एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। ऐसे विचारोत्तेजक और मार्गदर्शक आलेख को साझा करने के लिए आपकी पत्रिका और आप, दोनों ही प्रशंसा के पात्र हैं।
    सधन्यवाद।

  3. पुरवाई पत्रिका का संपादकीय – ‘आतंकवाद आस्ट्रेलिया पहुंचा…!’ में वैश्विक समस्या बन चुके आतंकवाद को उठाया गया है। अभी आस्ट्रेलिया में हुई एक घटना ने आस्ट्रेलिया समेत पश्चिमी देशों को हिला दिया है।
    ये घटनाएं नियोजित होती हैं। जैसा कि विभिन्न आतंकवादी संगठनों से इसके तार जुड़े मिल जाते हैं।
    विकसित देश पहले कोई न कोई समस्याएं पैदा करके अपना हित साधते हैं। वे नहीं चाहते हैं कि कोई विकासशील देश उनसे आगे बढ़ जाए, इसलिए उनको इसी तरह से उलझाए रहते हैं। यही कारण है कि उनके यहां ऐसी वारदातें कम ही सुनने को मिलती हैं। अगर हो भी जाती हैं तो वे उनको आतंकवादी घटना मानकर भरपूर जवाब देते हैं। मतलब विकसित देशों के इंसान ही विशिष्ट है। उनकी हत्या मानवता की हत्या है। विकासशील देशों के लोग इस हिंसा के शिकार होते हैं तो उसे धरती का बोझ मानकर सामान्य घटना के रूप में दिखा दिया जाता हैं। वहां के समाचार पत्रों से इसकी पुष्टि भी होती है।
    लेकिन जब भारत जैसे विकासशील देश आतंकवाद पर करारा प्रहार करके अपने लोगों को सुरक्षित करते हैं तो इनके पेट में शूल उठने लगते हैं। आपरेशन सिंदूर इसका ताजा उदाहरण है।
    पश्चिमी देशों की यह दोहरी नीति आज वैश्विक उथल-पुथल का कारण बनती जा रही है। इसी को मद्देनजर रखते हुए ब्रिक्स अंगड़ाई लेने लगा है। चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था डालर आधारित है । यही कारण है कि यह संस्था अभी फड़फड़ा तो रही है पर अपने मंसूबों में कामयाब होती नहीं दिख रही है।
    यदि पश्चिमी देशों की वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व-शैली इसी तरह वैश्विक वर्चस्व को प्राथमिकता देती रही, तो संभव है कि वैकल्पिक वैश्विक आर्थिक मंच भविष्य में अधिक प्रभावी हो जाए। कुछ भी कहा जा सकता है।
    हम तो यह मानकर चलते हैं कि मानव हिंसा सबसे घृणित कार्य है। यह नहीं होना चाहिए। मरने वाला इंसान किसी भी देश का हो, किसी भी धर्म का हो उसे जीने का हक है। धर्म के आधार पर किसी को समूल नष्ट नहीं कर सकते हैं।
    आतंकवाद का एक ही उद्देश्य है कि सिर्फ वे ही रहें और कोई नहीं। यह कितनी हास्यास्पद बात है कि पशुओं में कोई जीव विलुप्त की कगार पर हो तो उसका संरक्षण किया जाता है लेकिन मानव में ऐसी स्थिति आती है तो उसका संरक्षण न करके उसे मिटा ही दिया जाता है। मानवता के झंडाबरदार इस मामले में चुप्पी साधे रहते हैं। इस दोगलेपन को क्या कहा जाए?
    फिलहाल आपने इनकी दोहरी मानसिकता पर तीखा संपादकीय लिखा है। आंकड़ों के साथ विश्वव्यापी घटनाओं की जानकारी इसमें दी गई है। इन घटनाओं में विकासशील देशों का आंकड़ा (प्रतिशत में) सबसे अधिक है। यही आंकड़े सिद्ध करते हैं कि विकासशील देश खासकर दक्षिण एशियाई देश और खाड़ी के देश सबसे ज्यादा पीड़ित हैं।
    वैश्विक राजनीति में संवेदना का कोई स्थान नहीं होता है। जो राजनीति संवेदना दिखाती है उसका परिणाम उसे छल के रूप में प्राप्त हो जाता है।
    फिलहाल तो हर विकासशील देश को अपने को बचाने का प्रयास करना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट नीति अपनाई जानी चाहिए ताकि देश में ऐसी घटनाएं कम हो। विकसित देशों में जब ये घटनाएं होती हैं तो वे उन्हें समूल नष्ट कर देते हैं या उनको बहुत कमजोर कर देते हैं।
    विदप्रूफ संपादकीय विश्वसनीयता की गारंटी होती है। इसकी यही खासियत इसे विशेष बना रही है।
    इस संपादकीय के लिए आपको बधाई सर

    • “वैश्विक राजनीति में संवेदना का कोई स्थान नहीं होता” – आपने सही कहा है भाई लखन लाल पाल जी। आप इतनी व्यस्तता के बावजूद हर सप्ताह संपादकीय पढ़ते भी हैं और विस्तार से टिप्पणी भी भेजते हैं। हम आपके दिल से शुक्रगुज़ार हैं।

  4. सादर नमस्कार सर…
    हमेशा आपके संपादकीय का मुझे इंतजार रहता है… जब भी पढ़ती हूँ कई प्रश्न.. कई मानसिक दुःख से भी घिर जाती हूँ… आपका लेखन इतना प्रभावी होता है। आज देश-विदेश की स्थिति के बारे में साधारण जन समूह से लेकर उच्च पदवी में आसीन लोगों को , राजनीतिक नेताओं को आदि सभी को पता है.. पर ये लोग अपना स्वार्थ ही देखेंगे..। अगर ऐसा नहीं होता… तो ये सब भी नहीं फैलता…। मेरे लिए संपादकीय का सार यही है…कि जीवन में और भी बहुत कुछ देखना बाकी है… जिन्दा रहें तो….

    साधुवाद…

    • आदरणीय अनिमा जी, आप संपादकीय की हर सप्ताह प्रतीक्षा करती हैं और उसे पढ़ कर सार्थक टिप्पणी भी करती हैं… आपको हार्दिक धन्यवाद।

  5. आपने सही कहा कि यदि मर्ज का सही उपचार नहीं किया गया तो वह उत्तरोत्तर गंभीर होता जायेगा। मर्ज कुछ और, और दवा कुछ और तो यह कहां कारगर होगा। आतंकवादी घटनाओं को लेकर दुहरे मानदंड भी खेदजनक हैं। आतंकवाद को समूल नाश करने के लिये अत्यंत कड़ी कार्रवाई ही अपेक्षित है। अन्यथा यह रक्तबीजी दैत्य सारे धरा को अपने चपेट मे लेता जायेगा। बांग्लादेश में जिस तरह हिन्दू जीनोसाइड का कुचक्र चल रहा है और विकसित देश उससे तटस्थता बनाये हुये हैं बहुत दुखद है।

  6. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार के संपादकीय का विषय बेहद गंभीर और चिंतनीय है।

    वैसे ऑस्ट्रेलिया ऐसा देश है जो हमारे परिचय में इस दृष्टि से रहा, क्योंकि वहाँ की दो लड़कियाँ वनस्थली में हमारे साथ फर्स्ट इयर में थीं। कुछ ही समय का साथ रहा, लेकिन रूस के साथ ऑस्ट्रेलिया भी दोस्त रूप में ही रहा।
    ऑस्ट्रेलिया की खबर पर हमारी नजर ठहर गई।
    सच कहें तो आतंकवादी घटनाओं की स्थिति जिंदगी में रोजमर्रा की तरह शामिल हो गई हैं।
    दिल अगर दहलता है तो बस इस आशंका से कि अबकी बार कहाँ और कौन?
    पाकिस्तान और बाँगलादेश भारत से विभाजित ,भारत के लिये तो नासूर की तरह हैं ही ;पूरे विश्व के लिये भी संकट की तरह ही हैं।
    पेड़ पौधों को उखाड़ भी दो,तब भी कुछ जड़ें उनकी ,जमीन में रह ही जाती हैं जो दोबारा से पल्लवित होती हैं सावधानी तो जरूरी होती ही है।
    ये बाप बेटे उन्हीं भारतवंशिंयों से हैं।

    सच कहें तो इन्हें अमीबा की तरह माना जा सकता है।
    जिसकी कोई निश्चित आकृति नहीं होती। बस अमीबा अलैंगिक प्रजनन से बढ़ता है, और ये कई शादी और कई बच्चों के माध्यम से अमर बेल की फैलते हैं।
    न स्वयं चैन से रहते ना किसी को रहने देते।
    समाज में ये जोंक की तरह,जिन्हें इंसान का सिर्फ खून पीना ही पसंद है।

    धीरे-धीरे त्योहारों में उत्सव के आनंद की जगह दहशत का साया ही नजर आएगा।
    बेहतर हुआ कि कोई बड़ा हमला होने से रह गया।
    जिस तरह से इस घटना का प्रचार-प्रसार हुआ पश्चिमी देशों के मीडिया की अपने दोहरे मापदंड की नीति उजागर हुई।
    आतंकवादी घटना चाहे जिस भी देश में हो लेकिन वह आतंकवादी ही कहलाएगी। किसी के लिए आतंकवादी और किसी के लिये आंतरिक का भेद क्यों व कैसे हो सकता है?
    मीडिया के लिए तो सब बराबर होना चाहिये।

    देश की आजादी के बाद से ही बच्चा-बच्चा यह जानता था कि अमेरिका हमेशा से ही पाकिस्तान के साथ है
    किसी किसी ने भूलने की कोशिश भी की इस भेद को किंतु ट्रंप तो वैसे ही निर्बुद्धि है। जिसे अपना ही होश नहीं वह और क्या ही सोचेगा।

    जिस तरह आतंकवादी समूहों के नाम, काम और उनके द्वारा की गई मृत्यु के आंकड़ों को आपने प्रस्तुत किया है-उसके लिए तो आपको हैट्स ऑफ है।
    देश दुनिया की खबर से रूबरू करवाने के लिए तहे दिल से आपका शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपने एकदम सही कहा है कि “त्यौहारों में आनंद की जगह दहशत का साया ही नज़र आएगा।” विश्व में शायद ही कोई समुदाय खुल कर अपने त्यौहार मना पाएगा क्योंकि आतंक की तलवार सबके सिर पर टंगी रहेगी। आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  7. आज की वैश्विक ज्वलंत समस्या आतंकवाद पर लिखा सम्पादकीय अत्यंत प्रभावशाली है। आपने पूरे डाटा के साथ प्रस्तुत किया है। साधुवाद ।
    विकसित देशों में जब ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं तो वे गंभीरता से लेकर कड़े कदम उठाते हैं। लेकिन विकासशील देशों में जब ऐसी अमानवीय घटनाएँ होती हैं तो वे नज़रअंदाज़ कर देते हँ॥ प्रत्येक देश को अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है। भारत ने आपरेशन सिंदूर से सिद्ध कर दिया है कि वह भी चुप नहीं बैठेगा। कोई साथ दे या न दे।

    • आपने एकदम सही कहा है सुदर्शन जी कि अपनी लड़ाई हर देश को स्वयं ही लड़नी होगी। आप किसी के भरोसे बैठ कर आतंक का सामना नहीं कर सकते।

  8. बहुत बढ़िया बधाई। मैं 15 दिन आईसीयू में लेकर आई अभी मैं ठीक नहीं हूं परंतु मैं आपका संपादकीय पढ़ लिया। आप लिखते रहिए हम पढ़ते रहेंगे। इस बार मेरी तबीयत इतनी खराब हुई बचने की कोई उम्मीद नहीं थी पर फिर भी बच गई।

    • भाग्यम जी किसी भी संपादक या पत्रिका के लिये इससे बड़ा इनाम कोई नहीं होगा कि उनका पाठक 15 दिन आईसीयू में बितान के बाद घर आए और संपादकीय पढ़ने की अपनी इच्छा को रोक ना पाए। प्रभु से प्रार्थना है कि आपको सेहत बख़्शें।

  9. जितेन्द्र भाई: अपने इस सम्पादकीय में जो आप ने आँकड़े दिए उस के लिए बहुतबहुत साधुवाद। आपने इस लेखन में जो पश्चिमी देशों के दोगलेपन का पर्दा फ़ाश किया है वो बहुत सराहनीय है। पहलगाम और दूसरे आतंकी हमले जब भारत पर हुए तो पश्चिमी देशों का जो ‘अपनी लगी तो लगी सूझती है – हमारी लगी दिललगी सूझती है’ वाला रवैया था उस की पोल भी आप ने ख़ूब खोल दी है। आदरणीय मोदी जी ने तो खुलेआम आतंकवाद के ख़िलाफ़ जो बीड़ा उठाया है उसकी गंभीरता को लोग जब ही समझते हैं जब इन के अपने पेट पर लात लगती है। फ़्रांस की फ़ाँडापोल और अन्य संस्थाओं से जो आतंक के आंकड़े सामने आए हैं उन सब में इस्लामिक आतंकवादियों का ही नाम आया है। इस सब के बावजूद भी अपनी सियासी रोटी सेकने के लिए अपने ही देश में ऐसे देशद्रोही भी मिल जाएंगे जो यह सब जानते हुए भी इन इस्लामिक आतंकवादियों का साथ देने में कोई शरम महसूस नहीं करेंगे। शायद उन्हें इस बात का एहसास न हो फिर भी हिलरी क्लिण्टन के यह शव्द कानों में सदा गूँजते रहते हैं।
    “You can’t keep snakes in your backyard and expect them only to bite your neighbors. You know, eventually those snakes are going to turn on whoever has them in the backyard.”

    • विजय भाई, आपने सटीक शब्दों में पश्चिमी देशों को बेनकाब किया है। हिलेरी क्लिंटन के शब्दों का उद्धरण दे कर आपने स्थिति को और भी स्पष्ट कर दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

  10. आपने पहलगाम के आतंकी हमले तथा सिडनी में हुए आतंकी हमले की तुलना करते हुए न्यूयॉर्क टाइम, द गार्जियन तथा ब्लूमर्ग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ठीक ही कहा है कि आतंकवाद के ऊपर पश्चिमी मिडिया का दोहरा मापदंड हैं तभी भारत में हुई आतंकी घटनाओं को अक्सर आंतरिक समस्या के रूप में देखा जाता है, जबकि विकसित देशों में ऐसी घटनाओं को स्पष्ट रूप से आतंकवाद माना जाता है।
    आतंकवाद पर आपने फ़्रांस की एक संस्था ‘फ़ाँडापोल’ का आंकड़ा भी प्रस्तुत किया है जो डराता ही नहीं निःशब्द कर देता है। आखिर यह कैसी महजबी शिक्षा है जो इंसान को इंसान ही नहीं रहने देती। भारत में भी दिल्ली ब्लास्ट तथा लखनऊ के KGMC मेडिकल कॉलेज की घटनाएं भी यही सिद्ध करती हैं।

    अब पूरे विश्व को इन आतंकी घटनाओं पर पक्षपाती रवैया छोड़कर आतंकवाद को आतंकवाद ही मानना होगा, तभी समस्या का कोई हल निकल सकता है वरना आतंकवाद सिर्फ ऑस्ट्रेलिया तक ही सीमित नहीं रहेगा।

    सामयिक आलेख के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी, आपने सही कहा है कि, “अब पूरे विश्व को इन आतंकी घटनाओं पर पक्षपाती रवैया छोड़कर आतंकवाद को आतंकवाद ही मानना होगा, तभी समस्या का कोई हल निकल सकता है वरना आतंकवाद सिर्फ ऑस्ट्रेलिया तक ही सीमित नहीं रहेगा।” आपके निरंतर समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  11. मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध है आतंकवाद
    ———————
    अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई के संपादक भाई तेजेंद्र शर्मा का संपादकीय ‘आतंकवाद आस्ट्रेलिया पहुँचा’ पढ़कर निर्दोष लोगों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार नृशंस हत्यारे आतंकवादी पिता पुत्र साजिद अकरम -नवीद अकरम के प्रति हृदय पूरी तरह से घृणा आ और आक्रोश से भर गया है।
    सिडनी के बॉन्डी बीच पर 14 दिसंबर की शाम पवित्र त्यौहार हनुक्का मनाते यहूदियों लोगों पर आटोमेटिक गन से अंधाधुंध गोलियों चलाकर निरपराध लोगों की हत्या से आस्ट्रेलिया दहल उठा है। दुनियाभर में इस कायरना आतंकी हमले की निंदा होना स्वभाविक है। भाई तेजेंद्र शर्मा ने इस आतंकी हमले को वैश्विक स्तर पर फैले आतंकवाद के आँकड़ों के साथ ही भारत में पहलगाम में हुए आतंकी हमले को ‘कट्टरपंथी हमला’ संदिग्ध कट्टरपंथी, बंदूकधारी आदि कहकर प्रचारित करने के लिए विदेशी मीडिया के दोहरे मानदंडों को बखूबी उजागर किया है। जो उनकी साहसिक लेखनी की धार को दर्शाता है।
    भाई तेजेंद्र की संपादकीय दृष्टि कभी-कभी मुझे चौंकाती है तो कभी-कभी उद्वेलित भी करती है। एक प्रवासी भारतीय की अपने भारत देश की माटी के प्रति समर्पण, यहाँ की षट्ऋतुओं वाली खुशबू से बौराया मन, प्रकृति, मनुष्यता, परंपरा और संस्कार उनके सांसों के साथ-साथ साँसें लेते हैं। फिर दूसरी बात यह भी समझ में आएगी एक संपादक के नाते उनके पास कितना विशद अध्ययन है वे जिस विषय को अपने संपादकीय में उठाते हैं वह सतही तौर पर प्रतिक्रियात्मक नहीं होता बल्कि समग्र विश्लेषण को समेटे तथ्यात्मक दस्तावेज की तरह उपस्थित होता है। उनके संपादकीय का भाषाई अंदाज अक्सर अनूठा देखने को मिलता है।

    रामशंकर भारती
    झाँसी (भारत)

    • भाई रामशंकर भारती जी, आप जिस तरह पुरवाई के संपादकीय की अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ में व्याख्या करते हैं, वो हमारी मेहनत के लिये किसी भी पुरस्कार से कम नहीं है। इस बार तो आपने संपादक की भी दिल खोल कर तारीफ़ कर डाली है। आपका हृदयतल से शुक्रिया।

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