- सवाल उठता है कि इन युद्धों से आख़िर हासिल क्या हुआ? इससे एक बात तो ज़ाहिर हो गई, कि अब भविष्य के युद्धों में सैनिक नहीं मरा करेंगे। सैनिक तो आराम से घर में बैठे रहेंगे, अधिक से अधिक बंकरों में जाकर छिप जाएंगे, मरेंगे तो आम नागरिक ही। वे नागरिक फ़िलिस्तीन के हो सकते हैं, ईरान के, इज़राइल के, यूक्रेन या फिर भारत के। वो ज़माने अब लद गए, जब कुरुक्षेत्र, पानीपत या प्लासी के मैदानों में युद्ध हुआ करते थे। अब आबादी वाले क्षेत्रों में बमबारी सामान्य सी बात हो जाएगी। हम सबको युद्ध में मरने की इतनी आदत हो जाएगी, कि इस पर आपत्ति जताना भी बंद हो जाएगा। युद्ध की स्थितियाँ पैदा करेंगे–राजनीतिक नेता… मिसाइल और बमबारी करेंगे सैनिक, और मरेंगे आम नागरिक, जिनमें बच्चे, औरतें और बूढ़े सभी शामिल होंगे।
पिछले दो सालों से जो भी युद्ध हो रहे हैं, उसमें दोनों पक्ष युद्ध के दौरान… संघर्ष विराम होने के समय या फिर युद्ध की समाप्ति पर, अपनी-अपनी जीत के दावे पेश करने लगते हैं। यह एक ऐसा काल है, जहाँ कोई भी हारता नहीं, सभी पक्ष जीतते हैं। यह स्थिति तो नूरा-कुश्ती से भी अधिक विकट है। ऐसा महसूस होता है कि युद्ध भी मिली-भगत से लड़े जा रहे हैं।
हमास ने इज़राइल पर 07 अक्तूबर 2023 को पहला हमला बोला, जिसमें करीब 1200 इज़राइली नागरिक मारे गए थे, और करीब 250 लोगों को बंधक बना लिया गया था। इज़राइल अभी तक गाज़ा में हमास पर हमले कर रहा है, मगर एक साल नौ महीने बीतने के बाद भी कोई युद्ध जीत नहीं पाया है।
ठीक इसी तरह फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला बोला था। इस आक्रमण के पीछे बहुत से कारण दिए जा रहे थे, और दिए जा रहे हैं। सब को यही उम्मीद थी, कि रूस सप्ताह भर में यूक्रेन के घुटने टिकवा लेगा… मगर आज जुलाई 2025 तक युद्ध जारी है… दोनों पक्षों का दावा है कि युद्ध में उन्हीं का पक्ष जीत रहा है।
पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने धर्म के नाम पर 26 हिन्दू सैलानियों की हत्या कर दी। उसके जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान पर हमला कर दिया। हालाँकि शुरूआत में भारत के निशाने पर आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्र थे, मगर बाद में पाकिस्तान के हवाई अड्डों और सैनिक ठिकानों पर मिसाइलों से हमला किया गया। जवाब में पाकिस्तान ने भी मिसाइलों से भारतीय क्षेत्रों पर धावा बोला। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। फ़िलहाल यहाँ संघर्ष विराम चल रहा है। ध्यान देने लायक बात यह भी है कि पाकिस्तान ने तो 1965 और 1971 में भी जीत का दावा किया था, हालांकि 1971 में बांग्लादेश का जन्म हो गया था।
इज़राइल ने 13 जून को ईरान पर बड़ा हमला किया था, और दावा किया था कि वहाँ अयातुल्ला अली ख़ामेनेई के शासन का अंत कर देंगे। ईरान ने इसके जवाब में ख़तरनाक मिसाइलों से इज़राइल के रिहायशी इलाकों पर मिसाइलें दाग़ीं, और 12 दिनों तक युद्ध चला। इस बीच अमेरिका ने भी अपने बी-2 बम-वर्षक विमानों से ईरान के परमाणु केन्द्रों पर बमबारी की। ईरान ने कतर स्थित अमेरिकी अड्डों पर मिसाइलों से हमला किया। एअर-स्पेस बंद कर दिए गए। यात्री विमानों की उड़ानें रद्द कर दी गईं। मेरी अपनी बेटी आर्या के लंदन से मुंबई की उड़ान इसी कारण रद्द हो गई थी।
यानि कि चार-चार युद्ध और हारा कोई भी नहीं। इन चार सैनिक संघर्षों में पाँच घोषित परमाणु शक्तियाँ लड़ाई कर रहीं थीं – रूस, अमेरिका, इज़राईल, भारत और पाकिस्तान, तो एक शक्ति ईरान शक़ के दायरे में हैं कि वह या तो परमाणु हथियार बना चुका है, या फिर बनाने की ओर अग्रसर है। मगर किसी भी युद्ध से कोई मसला हल नहीं हुआ। इज़राइल की जासूसी संस्था मोसाद और लगभग श्रेष्ठतम सेना के बावजूद, न तो हमास ने घुटने टेके और न ही ईरान ने हार मानी। जबकि ईरान को तमाम इस्लामिक देशों ने लगभग दग़ा देते हुए अकेले मार खाने के लिए छोड़ दिया।
एक ख़ास बात ध्यान देने लायक यह है कि रूस और यूक्रेन युद्ध को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकी युद्धों में थल सेना का कम-से-कम इस्तेमाल हुआ। सारा खेल एअर-फ़ोर्स और मिसाइलों का रहा। टैंक और बख़्तरबंद गाड़ियाँ तो जैसे केवल सजावट के सामान की तरह घरों की शोभा बढ़ा रही थीं। एक मज़ेदार स्थिति यह भी थी, कि पाकिस्तान में सभी सेनाओं के मुखिया के तौर पर जनरल आसिम मुनीर ही काम कर रहे थे। शायद इसीलिए सीज़फ़ायर के घोषणा होते ही उन्होंने अपने आप को पाकिस्तान का फ़ील्ड मार्शल घोषित कर दिया। सेना फ़ील्ड में उतरी नहीं, और सेना का जरनल फ़ील्ड मार्शल बन गया। यदि किसी को कुछ बनना था, तो एअर मार्शल साहब को कुछ बनना चाहिए था।
सवाल उठता है कि इन युद्धों से आख़िर हासिल क्या हुआ? इससे एक बात तो ज़ाहिर हो गई, कि अब भविष्य के युद्धों में सैनिक नहीं मरा करेंगे। सैनिक तो आराम से घर में बैठे रहेंगे, अधिक से अधिक बंकरों में जाकर छिप जाएंगे, मरेंगे तो आम नागरिक ही। वे नागरिक फ़िलिस्तीन के हो सकते हैं, ईरान के, इज़राइल के, यूक्रेन या फिर भारत के। वो ज़माने अब लद गए, जब कुरुक्षेत्र, पानीपत या प्लासी के मैदानों में युद्ध हुआ करते थे। अब आबादी वाले क्षेत्रों में बमबारी सामान्य-सी बात हो जाएगी। हम सबको युद्ध में मरने की इतनी आदत हो जाएगी, कि इस पर आपत्ति जताना भी बंद हो जाएगा। युद्ध की स्थितियाँ पैदा करेंगे-राजनीतिक नेता… मिसाइल और बमबारी करेंगे सैनिक, और मरेंगे आम नागरिक, जिनमें बच्चे, औरतें और बूढ़े सभी शामिल होंगे।
यह सवाल तो दिमाग़ में उठेगा ही कि आख़िर इन तमाम युद्धों से किसको क्या हासिल हुआ? हम फ़िल्मी गीतों की तरह यह नहीं कह सकते कि – “अब किसको क्या मिला, ये मुकद्दर की बात है!” हम यह जानना चाहेंगे, कि क्या ये युद्ध किसी मसले का हल ढूँढ़ने के लिए किए गए या फिर हथियारों के प्रदर्शन के लिए?
अमेरिका ने अपने बी-2 बाँबर विमानों का पहली बार प्रदर्शन करते हुए यह दिखाया, कि किस तरह उनके ये दैत्य विमान अमेरिका से ईरान तक 37 घंटे की यात्रा बिना रुके कर सकते हैं… रास्ते में हवा में ही उनमें ईंधन भरा जा सकता है और उनके बंक-बस्टर बम अपने टारगेट पर सफलतापूर्वक निशाना साध कर धरती में 60 मीटर नीचे या फिर 200 फ़ुट कंक्रीट के नीचे तक सब कुछ तहस-नहस कर सकते हैं। यह सब करके वे सफलता से वापस अपने एअरबेस तक पहुँच भी जाते हैं।


आदरणीय तेजेंद्र जी आपका संपादकीय हर बार की तरह इस बार भी धमाकेदार विषय लेकर आया है सर्वप्रथम हमारी कहानी शूल शैय्या पुरवाई अंक में लगाने के लिए बहुत-बहुत आभार धन्यवाद आदरणीय तेजेंद्र जी हर बार की तरह इस बार भी आपका संपादकीय है जितना धमाकेदार आपका विषय है उतना ही ज्यादा आपने विषय के मुताबिक बहुत ही परिपक्व इसमें लेखन किया है ।हर तरफ युद्ध के माहौल का बयान किया है लेख पढ़ कर बहुत ज्ञान में वृद्धि हुई पूरी दुनिया मिसाइल मिसाइल खेल रही है और आम इंसान कहीं भुखमरी कहीं लाचारी गरीबी न जाने कितनी समस्याओं से जूझ रहा है पर परवाह किसे है चलिए जो भी हो रहा है देखते जाना है। बहुत-बहुत आभार धन्यवाद
इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार डॉ प्रियंका।
सिर्फ़ एक व्यक्ति की हत्या की सजा फाँसी है . लेकिन राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं , सनक, धार्मिक , आर्थिक दादागिरी के चलते हज़ारों लोग मर जाते हैं , उनकी बस्तियाँ तबाह हो जाती हैं उसके लिए कोई सजा नहीं , शर्मिंदगी नहीं . युद्धरत देशों के एन एस ओ, डी जी एम ओ , सेना प्रमुख , राष्ट्राध्यक्ष खाते पीते संवाद करते हैं ऐसे कि जैसे कुछ भी नहीं हुआ .यही नहीं इन देशों के बीच ऐसी नफ़रत बो दी जाती है कि उनके बीच सांस्कृतिक , साहित्यिक संवाद , खेलकूद का सिलसिला बंद हो जाता है . युद्धों की यही त्रासदी है .
आपने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है . तेजेन्द्र भाई बधाई.
प्रदीप भाई, आपने समस्या की जड़ को पकड़ा है। धन्यवाद।
अब विश्व के पटलं पर प्रभुत्व बनाये रखने के लिए कहीं भी भिड़ने लिए कमर कसे है न। संयुक्त राष्ट्र की सभी शाखायें विफल हो चुकी हैं। बढ़ते शोधों ने सारी तकनीकों को पीछे धकेल दिया। है। सब स्वयंभू राष्ट्र है तो सब कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैंं। बेचारी तो देश की निर्दोष आबादी है, जो परिणामों को झेलने के लिए मजबूर हैं।
खुद तो जीते हैं संगीनों के सारे में,
वह क्या करें जो आसमान तले हैं।
रेखा जी यह समस्या अब विकराल हो चली है। धन्यवाद।
बिल्कुल सही लिखा आपने सच में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है क्या लड़ाई है सब झूठ बोलते हैं। जनता पीसती है। बहुत बढ़िया आपने नक्शा खींचा।
धन्यवाद भाग्यम जी।
युद्ध में शामिल सभी देश अपने को विजयी मानते हैं हारा हुआ नहीं,सच बात है , परंतु बात केवल हार जीत की नहीं बल्कि जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कैसे की जाए ? यह चिंतनीय विषय है।
डॉ• क्षमा पांडेय
आपने सही कहा क्षमा जी।
पूरी दक्षता से युद्ध की पृष्ठभूमि, सिलसिलेवार क्रमिक स्थिति,वर्तमान परिदृश्य में हुए युद्ध यथा रूस यूक्रेन,इजरायल हमास, भारत पाकिस्तान, इजरायल ईरान!!!इन सब से लिप्त राजनीति, सत्ता लोलुपता और मरण आम जन का।
सटीक और सार्थक और खरेपन की डोज के साथ,,,बधाई हो,पुरवाई पत्रिका परिवार और संपादक महोदय।
आप सब इस खरेपन का हिस्सा हैं भाई सूर्यकांत जी।
आज का युद्ध अब विकराल रूप ले चुका है, राजाओं के युद्ध में नैतिकता थी, वो युद्धरत रहते हुए भी मनुष्यता नहीं भूले। सर युद्ध के सम्बन्ध में यह संपादकीय टिप्पणी एक लेखक की संवेदनशीलता के साथ–साथ चेतना और सामाजिक जागरूकता को भी दर्शाता है।
वर्तमान स्थिति का सदैव कि भांति, सटीक, सारगर्भित, विश्लेषणत्मक आलेख। आपके सम्पादकीय से सदैव ही ज्ञानवर्धन होता है।
धन्यवाद उषा जी।
मैंने आपका यह लेख पढ़ा और सच कहूँ तो अत्यंत प्रभावित हुआ। आपने जिस स्पष्टता, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ वर्तमान वैश्विक युद्ध‑परिस्थिति का विश्लेषण किया है, वह निःसंदेह प्रशंसनीय है। आपका लेख केवल सूचनाओं की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि उसमें एक गहरी मानवीय दृष्टि और चिंतन की परिपक्वता दिखाई देती है। आपने जिस तरह युद्ध के मानवीय, राजनीतिक और रणनीतिक पहलुओं को जोड़ा है, वह पाठकों को केवल तथ्य नहीं, बल्कि उनसे उत्पन्न पीड़ा और दायित्व का बोध कराता है। आपकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और बौद्धिक रूप से समृद्ध है, जो पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यह लेख केवल एक संपादकीय नहीं, बल्कि एक चेतावनी, एक आग्रह और एक गम्भीर विचार है—जिसे हर सजग नागरिक को अवश्य पढ़ना चाहिए। आपकी दृष्टि और लेखनी को नमन। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको शतायु करें और स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन प्रदान करें।
हालांकि विश्व के विभिन्न देशों के बीच युद्ध की स्थिति न उत्पन्न होना ही श्रेष्ठ है। लेकिन कई बार स्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं कि हिंसा आवश्यक लगती है। प्रो सारस्वत मोहन मनीषी जी की एक कविता की पंक्तियाँ हैं – माना अहिंसा सदा सर्वोत्तम कस्तूरी है, पर दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरूरी है।
भाई शैलेश जी, आपकी सार्थक टिप्पणी संपादकीय की आत्मा को समझने में सहायक सिद्ध होगी। हार्दिक धन्यवाद।
सर, बहुत सटीक विश्लेषण के बाद बहुत सार्थक सवाल आपने उठाये हैं..आपकी संपादकीय हमेशा ही ज्वलंत मुद्दों को लेकर आती है और पाठकों की ज्ञानवृद्धि करती है…
मनीष आप सबका निरंतर समर्थन हमें और बेहतरी की ओर प्रेरित करता है। स्नेहाशीष।
पहला ही पैराग्राफ शानदार है कि पूरा फटाफट पढ़ गया। बेहद संतुलित संपादकीय। ब्रह्मोस मिसाइल के ऑर्डर की आप बात सही कह रहे हो क्योंकि मैं शेयर बाजार करता हूं तो मुझे इसके बारे में सब जानकारी रहती है। बाकी किसी को कुछ मिले या ना मिले हम लोग को शेयर बाजार से अच्छा मुनाफा मिल जाता है और मेरे व्हाट्स एप ग्रुप में जुड़ें हुए 45,50 लोगों को भी फायदा हो गया इन युद्ध से। साथ में अब ये संपादकीय पढ़कर बौद्धिक मुनाफा भी हो गया। तीसरा मुनाफा ये की मेरी हर भविष्यवाणी सही साबित हो रही है तो लोगों का विश्वास जमकर बढ़ रहा है अब जाकर मानने लगे हैं वे लोग।
कुलमिलाकर शानदार संपादकीय सर बधाई इसके लिए
तेजस तुम्हारा दृष्टिकोण एकदम अलग ही है… युद्ध का बाज़ारवाद पर चर्चा ज़रूरी हो गई है।
निःसंदेह आपके द्वारा लिखा गया संपादकीय ज्ञानवर्धक और विश्वसनीय जानकारी देने वाला होता है. वैश्विक पटल की समूची गतिविधियों की जानकारी सरल और स्पष्ट रूप से आप प्रस्तुत करते हैं…मैं आपके संपादकीय की नियमित पाठक बन गयी हूँ.
हमेशा की तरह सामयिक एवं महत्वपूर्ण संपादकीय
हार्दिक धन्यवाद सुषमा जी।
इस बार का संपादकीय -‘ जीत गए हम…!!’ अभी कुछ दिन पहले हुए या हो रहे युद्धों के संदर्भ में है। यह प्रश्न सभी के ज़ेहन में तैर रहा है कि इन युद्धों में कौन जीता? सबके अपने-अपने दावे, अपने-अपने नजरिए। या यूं कहें कि सभी पक्ष युद्ध के बाद उन्माद से भरे अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। जनता भी कम उन्मादिनी नहीं है। युद्ध को वह क्रिकेट मैच की तरह ले रही है। जनता को समझना चाहिए कि युद्ध क्रिकेट नहीं है।
ईरान इजरायल युद्ध में सबसे ज्यादा फजीहत इजरायल की हुई है। इजरायल एकतरफा जीत के लिए जाना जाता है।
डोनाल्ड ट्रम्प इस युद्ध में इजरायल के सामने राहु की तरह खड़े हो गए। ( ऐसा इजरायल सोच रहा होगा। मेरे हिसाब से तो सीजफायर बहुत ठीक रहा)
मैंने एक समाचार में पढ़ा था कि अमेरिका ने जब ईरान पर बी-२ बाॅम्बर का प्रहार किया था तो इसके अगले दिन ईरान ने कहा था कि हम कतर के एअर बेस पर हमला करेंगे आप अपने विमान हटा लीजिए। जब ईरान अमेरिका को ऐसा कह सकता है तो क्या अमेरिका ने ईरान से नहीं कहा होगा कि आप अपने न्यूक्लियर साजो सामान हटा लीजिए हम वहां बाॅम्ब मारेंगे। ये युद्ध था या तमाशा। ट्रंप साहब ने दोनों को बहला दिया। अमेरिका ने इजरायल को खूब उल्लू बनाया।
भारत पाक युद्ध की क्या चर्चा करना। उस पर कोई असर पड़ता ही नहीं है। उसे बस डालर चाहिए, जीत-हार से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हां भारत ने इस बार अन्य युद्धों से बेहतर परफॉर्मेंस दिया। इस युद्ध में पाक के साथ चीन और तुर्किए भी लड़ रहा था। हमारी एअर फोर्स ने सभी को सबक सिखा दिया। चूंकि मैं भारतीय हूं तो अपने देश की तारीफ करूंगा ही, ऐसा कहा जा सकता है। इस युद्ध के बाद अनेक देशों में भारतीय हथियारों की जो डिमांड बढ़ रही है वह युद्ध के परिणाम को स्पष्ट कर देता है। मेरे द्वारा अपनी सेना की तारीफ करना सिर्फ भावनात्मक नहीं है। वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर कह रहा हूं।
तेजेन्द्र सर जी, आपने उन्मादी युद्धों की हकीकत बयां कर दी है। इस पर सभी को सोचना चाहिए कि युद्ध मानवता के हित में नहीं है। इनसे जितना दूर रहा जाए उतना ही बेहतर है।
विगत युद्धों के सीजफायर से यह बात क्लीयर हो चुकी है कि ट्रंप महोदय प्रशंसा के बहुत भूखे हैं। अगर वे इससे मुक्त हो जाएं तो दुनिया को बेहतर भविष्य दे सकते हैं।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।
भाई लखनलाल पाल जी आपने तो संपादकीय का इतनी गहराई से विष्लेषण किया है कि पाठकों को हर कोण पूरी तरह से स्पष्ट हो जाएगा।
वाह वाह- बहुत ख़ूब तेजेन्द्र जी दुआ है आपका क़लम हमेशा ऐसे ही सच बोलता रहे।
अरे आप की टिप्पणी तो हम सबके लिये सबसे बड़ा आशीर्वाद है।
आदरणीय संपादक जी,
आपने तो अपनी संपादकीय में ही स्पष्ट कर दिया कि किसको क्या मिला आजकल के युद्ध में विकसित और विजेता दोनों ही देश ‘वाॅर माॅगर’ की श्रेणी में आते है किसी देश के बने हथियार बिकते हैं,उसे धन मिलता है, किसी को वोट मिलते हैं और सत्ता, दोनों पक्षों की सामान्य जनता को मिलती है गरीबी, असुरक्षा, मंहगाई, अकाल काल- कवलित हुए परिजनों की मृत्यु और भविष्य के लेखकों को युद्ध की
विभीषिका पर साहित्य लिखने का मसाला,।
सरोजिनी जी आपने खुल कर अपनी बात कही है। बहुत शुक्रिया।
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय
न तुम हारे, न हम हारे- शैलेन्द्र
आदर्श स्थिति है! अच्छा है, हारने वाले का दिल नहीं टूटता, सभी अपनी विजय का जश्न मनाते हैं।
वैश्विक गांव बने विश्व में अब कमज़ोर देश (पाकिस्तान, यूक्रेन आदि) को डॉलर और हथियार दे दिए जाते हैं। ताकि भविष्य में वह अमुक देश के हथियारों का ग्राहक बन सके।
बिक्री करने वाले देश की आर्थिक स्थिति मज़बूत होती है और खरीदने वाला अपने कीमती डॉलर गंवाता है। यानी ‘निन्नानवे का चक्कर’ में फंसता है।
युद्ध अब हथियारों की प्रदर्शनी है, जिसमें ‘लाइव शो’ होता है। विश्व भर देखता है और अपनी पसन्द का हथियार चुन कर सौदा करता है।
जब बड़े लक्ष्य पर दृष्टि हो तो, छोटे-मोटे नुक्सान होते ही हैं। जनता मरती है तो क्या हुआ? देश विकसित होते हैं। आर्थिक उन्नति करते हैं, बचे हुए नागरिक सुखी रहते हैं। गेहूं के साथ घुन तो पिसते ही हैं, शाश्वत नियम है।
लेकिन कुल मिलकर विश्व-परिदृश्य ठीक है। अगर दिल में दुश्मनी नहीं, चेतावनी दे कर हमले किए जा रहे हैं तो इससे बेहतर क्या हो सकता है? दुश्मन दुनिया के लिए आपस में दोस्ती, ऐसा भाईचारा फूले फले… आमीन
गहरे विश्लेषण को सरस और संक्षिप्त रूप से लिखने के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद। संपादकीय का छोटा सा ज्ञान कैप्सूल आसानी से दिमाग़ में पच जाता है।
शैली जी, आपकी टिप्पणी मजे़दार भी है और गहरी भी। शैलेन्द्र के गीत का उदाहरण सटीक है।
मिसाइल तो आप भी दाग रहे सर अपने संपादकीय से। काश इस मिसाइल का असर पूरे विश्व पर पड़े।
युद्ध नियमों पर लड़ा जाता है , पर आज के परिदृश्य में युद्ध का बस एक नियम है प्रभुत्व और ढोंग। आम नागरिक मरता हैं तो मरे। स्वयं को जेड सिक्योरिटी में रख कर शांति स्थापना की बात, वो भी मिसाइल हमलों के माध्यम से ,ऐसा ट्रंप कार्ड सिर्फ ट्रंप ही खेल सकते। ये विश्व प्ले ग्राउंड है उनके लिए जो समप्रभु बन चुके है। अपने इतनी स्पष्टता से सारे तथ्य रख दिए है कि कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
ट्रंप को नोबेल दिला दीजिए, कुछ देशों या क्या पता कुछ आम नागरिकों की जान बच जाए
प्रिय शिप्रा, जब तुम जैसे युवा पुरवाई के संपादकीय का समर्थन करते हैं तो इस बात की संतुष्टि हो जाती है कि हम सही राह पर चल रहे हैं। युवाओं का पत्रिका से जुड़ना बहुत ज़रूरी है।
लगभग नूरा कुश्ती या युद्ध टूर्नामेंट का नीर क्षीर विवेचन।
महत्वपूर्ण और संग्रहणीय संदर्भ और जानकारी से समृद्ध करता संपादकीय।
सेना फील्ड में उतरी नहीं कि जनरल फील्ड मार्शल बन गए। शानदार।
भाई पिलकेन्द्र जी इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
‘जीत गये हम’ संपादकीय का प्रतिनिधि पैरा आज हो रहे युद्धों का निचोड़ है। वैसे भी इन युद्धों से हासिल क्या होता है, सिर्फ और सिर्फ बर्बादी। जश्न आम लोग नहीं वरन राजनेता मनाते हैं क्योंकि हारते जीतते भी वही है। यह हम रूस उक्रेन तथा इजराइल हमास या ईरान युद्ध में देख चुके हैं। इन युद्धों में न जाने कितने मारे गये, कितने बेघर हुए इनकी कोई गिनती नहीं है। अगर भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित न किया होता तो यह भी रूस और उक्रेन की तरह खिंचता, लोग तो मरते ही, अर्थव्यवस्था भी तबाह होती।
ये युद्ध स्वयंभू घोषित महाशक्तियों का बाल प्रदर्शन तो है ही, अपने हथियारों को प्रदर्शन कर उन्हें बेचने का तरीका भी। जहाँ तक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का प्रश्न है लगता है वह समूचे विश्व को अपनी अंगुलियों पर नाचना चाहते हैं तभी पहले भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम कि घोषणा करते हैं, फिर इजराइल और ईरान में। पहलगाम हमले का मास्टर माइंड असीम मुनीर (पाकिस्तानी सेना ही आतंकियों को पनाह देती है ) की खातिरदारी कर वह दुनिया को क्या सन्देश देना चाहते हैं? काश उन्हें पता नहीं कि सांप पालोगे तो वह डसेगा ही।
सदा की तरह ज्ञान चक्षुओं को खोलने वाला संपादकीय।
सुधा जी आप प्रत्येक संपादकीय को गहराई से पढ़ कर गंभीर टिप्पणी करती हैं। हार्दिक धन्यवाद।
आज का संपादकीय विभिन्न देशों द्वारा लिए गये पुद्धों का बेबाक सटीक और यथार्थ आकलन प्रस्तुत करता.है।वैसे भी युद्ध कभी मानवता के उत्थान के लिए नहीं लिए नहीं लडे जाते। जैसा कि दिनकर जी ने कहा था*युद्ध सोचता नहीं कौन किसका द्रोही है,
उसका केवल ध्येय ध्वंस हो मानवता का
मनुज जहां भी हो,यम का आहार हो।
कभी ये युद्ध सत्ता परिवर्तन, तोकभी साम्राज्य विस्तार और अब तो धर्म के आधार पर भी लिए जाने लगे हैं।अब आधुनिक हथियारों मिसालइलों का प्रयोग अधिक विनाश कर रहे.हैं।युद्ध नीतियां रोज बदली जाती हैं।और दो देशोः के बीच बंदरबांट की तरह कोई तीसरा अमेरिका जैसा सामने आता है और भयंकर जन धन हानि के बाद युद्ध विराम की घोषणा कर उसका श्रेय खुद लेता है और लडाई बंद हो जाती है।बहुत ही सरल और सहज ढंग से आपने इन युद्धों के.बीच आपसी ताकत दिखाने और हथियारों को खरीदने की की होड की ओर इशारा किया है-*सुना है कि भारत की ब्रह्मोस मिसाइल ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बहुत से देशों को प्रभावित किया है। करीब 17 देशों ने इस प्रक्षेपास्त्र को ख़रीदने में रुचि दिखाई है। फ़िलिपींस, वियतनाम और ब्राज़ील के साथ तो बात बहुत आगे तक बढ़ गई है। यानि कि ऑपरेशन सिंदूर भारत के लिए भी ब्रह्मोस मिसाइल का शोकेस साबित हुआ है। *क्या यह.युद्ध केवल युद्ध के लिए लिए जाते हैं? मानवीयता सच्ची राष्ट्रीय भावनायें कहां खो जाती हैं। मै जितना समझ.पायी,आपकी.हर बात बिल्कुल सत्य की ओर इशारा करती.है।
पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
प्रिय पद्मा, आपने संपादकीय की गहरी विवेचना की है। हर मुद्दे को रेखांकित किया है। स्नेहाशीष।
वास्तविक महान आत्मा भगवान गौतम बुद्ध जी ने शांति का संदेश दिया है। आज हमें सचमुच युद्ध की नहीं भगवान बुद्ध की विचारों की जरूरत है। कोई भी देश हरे या जीते जीतने के बाद में हर आदमी ही वाला है क्योंकि इंसानियत की हार होती है। हम सब मनुष्य है तो हर प्रश्न का उत्तर अकड़ से नहीं मेंटालिटी से छुड़वाना चाहिए। यथार्थ का सामना करना चाहिए। भोगवादी, विस्तारवादी, साम्राज्यवादी दृष्टि कुछ ही देशों नें रखी है इसका विपरीत परिणाम संसार के लोगों को भोगना पड़ रहा है। आज ग्लोबल दुनिया में कोई भी देश युद्ध करता है तो परिणाम सारे संसार को भुगतने पड़ते हैं। करने वाले सामान्य जन और जवान होते हैं। भगवान करे ऐसे लोगों को ईश्वर शब्द दीजिए कि कभी युद्ध ना करें। वसुधैव कुटुंबकम। आचरण में उतारें।
आदरणीय परम प्रिय संपादक महोदय ने गंभीर, वास्तविक यथार्थ और प्रासंगिक विषय को संसार के सामने लाया हैं । मैं उन्हें तहे दिल से धन्यवाद देता हूं और बधाई भी।
प्रोफ़ेसर साहब आपकी सार्थक सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: आजकल के हालात को देखते हुए आपका इस बार का सम्पादकीय बहुत ही महत्वपूरण और शिक्षाप्रद है और इसके लिए बहुत बहुत साधुवाद। आपके कथन: “युद्ध की स्थितियाँ पैदा करेंगे राजनैतिक नेता; मिसाइल और बमबारी करेंगे सैनिक और मरेंगे आम नागरिक, जिस में बच्चे, औरतें और बूढ़े सभी शामिल होंगे” ने सारे सम्पादकीय का निचोड़ ब्यान कर दिया है।
जैसी आप ने मिसालें दी हैं; चाहे कोई हार रहा हो या जीत रहा हो, हर कोई अपनी जीत का डँका बजा रहे हैं। क्या किसी ने कभी सोचा है कि आम जन्ता जो इन बमों का शिकार हो रही है उस पर क्या बीत रही होगी। शाम को डिनर टाइम पर जब टीवी पर इन बच्चे, बूढ़े, जवान और औरतों को दिखाया जाता है कि किस तरह पेट भरने के लिये इन सब को धक्के खाने पड़ रहे हैं उसे देखकर देखने वाले के मन पर क्या गुज़रती होगी, बताने की ज़रूरत नहीं। यही नहीं, घर से बेघर, हस्पताल की तबाही, दवा दारू की कमी तो अब जीवन का हिस्सा बन गई है। ज़रा सोचो उन बच्चों के बारे में जिन के दोनों माँ बाप मकान की छत गिरने से या किसी और कारण से मर गए हों; अब उन मासूम और यतीम बच्चों का क्या होगा?
लड़ाई किसी भी झगड़े का समाधान नहीं है। इस से चारों ओर सिवाय तबाही के कुछ हासिल नहीं होता। बड़े बड़े नेता और मिलट्री के जनरल जो अपनी जीत की ख़ुशियों का डँका बजा रहे हैं उन्होंने तो अपना परिवार किसी सुरक्षित जगह भेज दिया है और मारी जा रही है बेचारी आम जन्ता। क्या कसूर है इनका?!!!!!!!!!!!!
विजय भाई, आपनी संपादकीय का निचोड़ तमाम पाठकों के सामने रख दिया है। जब विश्व युद्ध समाधान नहीं बन पाए, ऐसे युद्ध भला कैसे समाधान बन पाएंगे।
व्यस्तता की वजह से पत्रिका नहीं पढ़ पाती। आज इधर आई और संपादकीय पर नज़र गई। विषय समसामयिक था, शैली दिलचस्प थी, पूरा आलेख पढ़ने से खुद को रोक नहीं पाई। सर, आपने सही लिखा भविष्य का युद्ध ऐसा ही होगा, जिसमें आम लोगों का नुकसान ज्यादा होगा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने एक और बात देखी, एक लड़ाई (आतंकी ठिकानों पर आक्रमण) बॉर्डर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में लड़ी जा रही थी तो दूसरी लड़ाई डिजिटली लड़ी जा रही थी। फेक न्यूज का अंबार लगा था। आम लोगों के लिए यह तय कर पाना बहुत मुश्किल हो गया था कि क्या सच है और क्या झूठ। सोशल मीडिया पर झूठी खबरें वायरल हो रहीं थीं, जिन्हें सच मान कर लोग आपस में ही भिड़े पड़े थे। भविष्य के युद्ध का एक सच यह भी है। सोशल मीडिया की पहुंच आज हर घर में है, ऐसे में झूठी खबरें, अफवाहों को फैलाना कोई मुश्किल नहीं। खैर, ये तो अलग विषय है, आपका आलेख बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद।
इस सप्ताहांत का आप का संपादकीय अंतरराष्ट्रीय युद्धों की प्रकृति के विषय में बात करते हुए एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने लाता है जहां रूस और यूक्रेन को छोड़ कर बाकी सभी युद्ध ड्रोन और मिसाइल के माध्यम से कराए गए।
यह गहरी चिंता पैदा करता है।
सैनिकों की अपेक्षा अब नागरिकों को उन के घेरों में आने की अधिक गुंजाइश है।
एक अतिगंभीर विषय पर हमें सोचने पर मजबूर करता है।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी, आपकी टिप्पणी हम सबके लिए महत्वपूर्ण होती है। हार्दिक धन्यवाद।
युद्ध मात्र अपने विचार, अपना मत, अपनी शक्ति, अपना प्रभुत्व की हाथापाई जैसा हो गया है। इंसान इतना तटस्थ हो गया है कि उसे मृतकों की संख्या अब चौंकाती नहीं है। बर्बादी का मंजर उसे द्रवित व भावुक करने की हिमाकत नहीं कर पा रहा। मशीनों से घिरा हुआ मानव मशीनी हुआ जा रहा है।
इन युद्धों की क्या परिणति होगी जिसमें कोई हारने को तैयार नहीं हैं। लंबे खिंच रहे इन युद्धों की खबरें दिनचर्या का अंग बन रही है। सुरक्षात्मक रवैया व विध्वंसक रवैये का फर्क समझना आवश्यक है। आपके संपादकीय झिंझोड देते हैं।
सुधा जी, आपकी टिप्पणी सटीक है कि – मशीनों से घिर हुआ मानव मशीनी हुआ जा रहा है। हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय आपका संपादकीय व्यस्तता के कारण थोड़ी देर से पड़ा। हमेशा की तरह पाठकों में जागरूकता पैदा करने वाला विषय है । पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बाद का विभत्स इतिहास विस्थापन की त्रासदी, अपनों को अपनी आँखों के सामने मौत का ग्रास बनते देखने के बाद भी आज के बुद्धिजीवी व तथाकथित सभ्य व प्रगतिशील देशों में रहने वाले इतने वर्षों में यह भूल गए की युद्ध से कभी किसी का भला नहीं होता। भला होता है तो केवल सियासतदानों का । नीदरलैंड का ही उदाहरण ले दूसरे विश्वयुद्ध के समय जैसे ही जर्मन सेना ने नीदरलैंड पर हमसा किया , नीदरलैंड का पूरा राज परिवार इंग्लैंड चला गया। सेना में भी आम जनता मरी और देश में भी आम जनता । आज भी यही है किसी राज नेता का कोई बेटा सेना में नहीं है । पिछले सप्ताह नीदरलैंड में फिर से 18 साल के युवाओं को मिलिटरी ट्रेनिंग के लिए कॉल आ गया है । आधुनिक तकनीक हो या पुरानी मरना हर हाल में जनता को ही है । मगर एक सवाल मेरे ज़हन में आता है
तुम जीत भी जाओगे , तो क्या पाओगे ?
इन कब्रिस्तानों पर , किनके महल बनाओगे?
इन बिखरी लाशों पर तुम कितने दीए जलाओगे?
बहुत बढ़िया संपादकीय । बहुत बहुत शुभकामनाएँ
बेहतरीन टिप्पणी ऋतु… सही कहा है कि तकनीक चाहे पुरानी या फिर आधुनिक… मरना हर हाल में जनता को ही है।
https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-the-current-war-situation-of-world/
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
*श्री कृष्ण कहते हैं कि किसी भी परिस्थिति को बदलने के लिए युद्ध कभी भी पहला विकल्प नहीं हो सकता, क्योंकि युद्ध से सृजन से पहले विनाश होता है। किसी भी परिस्थिति को पहले अहिंसापूर्वक सुलझाने का ही प्रयास करना चाहिए। इसलिये उसे टालने में ही भलाई है।*
*रामचरितमानस में श्री राम ने भी युद्ध को धर्म और न्याय की रक्षा के लिए तो आवश्यक तो माना है लेकिन उन्होंने भी इसे अंतिम उपाय के रूप में ही अपनाने की सलाह दी है।*
संपादकीय को पढ़कर युद्ध से हासिल क्या हुआ यह तो प्रश्न उठता है ;लेकिन इससे पहले यह प्रश्न उठता है कि *कार्य-कारण-उद्देश्य* के तहत इन युद्धों की जरूरत क्या थी? क्या कारण महत्वपूर्ण था या इसके पीछे का उद्देश्य मानवता के हित में बहुत अधिक महान और महत्वपूर्ण था?
सारा खेल वर्चस्व की लड़ाई का है। *हम* के *अहम्* का है। आम इंसान की जिंदगी जैसे कीड़े मकोड़ों जैसी हो गई है।
समझ नहीं पा रहे कि मानवता और नैतिकता की उठती हुई अर्थी के लिये आँसू बहाएँ, या फिर राष्ट्राध्यक्षों की उच्च महत्वाकांक्षाओं के तहत उनकी दमन नीति की आग में झुलसते आमजन की मौत का मातम मनाया जाए या फिर –
राष्ट्रपति ट्रंप के अविवेक और बड़बोलेपन से उत्पन्न मूर्खतापूर्ण कथ्यों,पर हँसा जाए।
इस तरह अनिश्चय की स्थिति कभी नहीं रही।
युद्ध हास्य-व्यंग्य बन कर रह गए जिसके पीछे गुजरने वाले लोगों और उनके परिवार जनों का कभी समाप्त न होने होने वाला दुख, विलाप और बद्दुआ रह गई।
युद्ध दो पक्षों के तने हुए गुमान का परिणाम है। विध्वंस की धुंध में मानवीय चीखें, विलाप करती स्त्रियाँ,अनाथ होते बच्चों का दर्द ज्वालामुखी के लावे सा पिघल कर बहता है।
जीत और हार के बीच में सिर्फ अभिमान होता है।
इस पूरे संपादकीय की महत्वपूर्ण पंक्ति इसकी आखिरी पंक्ति है जीत तो हम सब गए; मगर हारा कौन?
वास्तव में जीत तो सब गए पर इंसानियत ही हार गई।
ताकत में बुद्धि का इस्तेमाल करने वाले इन बुद्धिमानों को अपनी ताकतों का प्रदर्शन करते हुए, किसी को भी पर्यावरण की चिंता ना हुई।
सबसे अधिक नुकसान प्रकृति का होता है।
वास्तव में यह संपादकीय विमर्श का विषय है, चिंता का विषय है,कि किस और कैसे अंधेर के साये तले विश्व साँसें ले रहा है।
जीवन-जगत की वैश्विक समस्याओं से रूबरू कराते, व सचेत कराते संपादकीय के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया तेजेन्द्र जी!
पुरवाई का आभार!
इतिहास और मिथकों से समृद्ध इस टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद आदरणीय नीलिमा जी।