सोचने की बात यह है कि बांग्लादेश तीन तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है और चौथी तरफ़ सागर है। खाद्य सामग्री, दवाइयां और बिजली के लिये बांग्लादेश पूरी तरह से भारत पर निर्भर करता है। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के गद्दी संभालने के बाद बांग्लादेश के हालात से निपटना आसान होगा। यह सोच कर हैरानी अवश्य होती है कि भारत एक महाशक्ति बनने की कगार पर है; विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है; दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है और बांग्लादेश के बनाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है – फिर भी इस मामले में भारत मजबूर सा क्यो महसूस कर रहा है। क्या बांग्लादेश भारत के लिये फ़्रेंकेंस्टाइन जैसा सिरदर्द साबित हो रहा है?
‘पुरवाई’ के पाठकों के मुझे निरंतर अनुरोध आ रहे थे कि ‘पुरवाई’ को बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों पर संपादकीय अवश्य लिखना चाहिये। ‘पुरवाई’ पत्रिका की सोच यह रही है कि जब तक मुद्दे का सही ढंग से आकलन ना हो जाए, तब तक उसे संपादकीय का विषय ना बनाया जाए। अब समय आ गया है कि कम से कम हम अपने पाठकों के सामने सच्चाई अवश्य रखें, चाहे वो प्रिय लगे या फिर अप्रिय। इसमें यह डर भी है कि ‘पुरवाई’ को यह कह कर निशाना बनाया जाने लगे कि हम केवल एक ख़ास सोच के तहत संपादकीय लिख रहे हैं।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बहुत से सवाल बड़ी संख्या में भारतीयों के दिमाग़ में उठने शुरू हो गये हैं। भारत के राजनीतिक दल तो इस मामले में भी राजनीति करने से बाज़ नहीं आ रहे। तमाम दल अपने-अपने वोट बैंक साधने के हिसाब से वक्तव्य जारी करते हैं। शेख़ हसीना के देश छोड़ कर भागने के बाद जिस तरह वहा हिन्दुओं पर अत्याचार किये जा रहे हैं और हिन्दू मंदिरों को तोड़ा जा रहा है, भारत से कम-से-कम यह अपेक्षा की जाती है कि सभी राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ त्याग कर एक सुर में वहां के हिन्दुओं पर हो रहे ज़ुल्मों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करें।
विश्व में 57 मुस्लिम बाहुल देश हैं तो 40 के करीब ईसाई बाहुल्य के। दुनिय़ा में एक भी हिन्दू देश नहीं है। नेपाल विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था मगर सेक्युलरिंज़म ने उस देश को भी निगल लिया।
जब भारत का बंटवारा हुआ था उस समय पाकिस्तान (पश्चिम एवं पूर्व) में मिलाकर कुल 23% हिन्दू थे जो अब घट कर सात से आठ प्रतिशत तक बचे हैं। यानी कि मुस्लिम बहुल देश में अल्पसंख्यकों की संख्या में कमी ही हो सकती है बढ़ोतरी नहीं। वहीं दावा किया जा रहा है कि 1947 में भारत में मुसलमानों की संख्या तीन प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर लगभग सात प्रतिशत हो चुकी है।
2015 में अमेरिकी रिसर्च फर्म Pew Research की एक रिपोर्ट सामने आई थी। इस स्टडी में अनुमान लगाया गया था कि 2050 तक दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी भारत में होगी। इस अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि 2050 तक भारत में हिंदू आबादी 1.3 अरब होगी, जबकि 31 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम आबादी होगी। यानी, दुनिया में उस समय तक जितनी मुस्लिम आबादी होगी, उसमें से 11% अकेले भारत में होगी।
हम बात कर रहे हैं बांग्लादेश में अगस्त में हुए तख़्ता-पलट की। उस समय शेख़ हसीना वहां की प्रधानमंत्री थीं और ख़ालिदा ज़िया 17 वर्षों से जेल में थीं। दावा किया जा रहा है कि अमरीका की ‘डीप स्टेट’ का दख़ल इस सत्ता-परिवर्तन में बाकायदा महसूस किया गया। दो वर्षों से विद्यार्थियों के आंदोलन शेख़ हसीना के विरुद्ध चल रहे थे। मसला नौकरियों का था। शेख़ हसीना को त्यागपत्र देने का समय भी नहीं मिला क्योंकि उनकी जान को ख़तरा था। वे किसी तरह जान बचाकर भागीं और भारत में शरण ली।
शेख़ हसीना के देश छोड़ते ही बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति मुहम्मद शहाबुद्दीन ने संसद भंग कर दी और ख़ालिदा ज़िया को जेल से छोड़ने के आदेश दे दिये। हालात बहुत तेज़ी से बदलते चले गये और यह स्पष्ट हो चला था कि बांग्लादेश में सत्ता की लगाम इस्लामवादियों के हाथ में जा रही है।
आमतौर पर हिन्दुओं को आवामी लीग के समर्थक के रूप में देखा जाता रहा है। इसलिये वे आसानी से चरमपंथी मुसलमानों के निशाने पर आ गये। सोशल मीडिया, टीवी चैनल और समाचारपत्रों में दिखाए गये चित्रों और समाचारों से उस पाशविक हिंसा के रूबरू होने का मौक़ा मिलता है जिस तरह हिन्दू मंदिरों को तोड़ा जा रहा है और हिन्दुओं की हत्या की जा रही है। हमें नहीं लगता कि कोई भी समझदार व्यक्ति ऐसी हिंसा का समर्थन कर सकता है।
हालांकि मुहम्मद यूनुस को ‘अमरीका मैन’ कहा जा रहा है, जिसे कि अमरीका ने बांग्लादेश पर थोप दिया है। मगर व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा संचार सलाहकार जॉन किर्बी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री के पद से हटने के बाद बांग्लादेश में सुरक्षा हालात जटिल बने हुए हैं। हम इस चुनौती से निपटने के लिए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि उनकी कानून एनफोर्समेंट और सुरक्षा सेवाओं की क्षमता बढ़ाई जा सके।
किर्बी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि हमारी बातचीत बांग्लादेश के तमाम नेताओं के साथ हो रही है। हमने स्पष्ट कहा है कि देश में सभी समुदाय के लोगों की सुरक्षा की जाए. चाहे वो अल्पसंख्यक हो या फिर कोई और, सरकार की जिम्मेदारी है कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
पाकिस्तान टीवी के एक चैनल पर वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने ख़ुशी जताते हुए कहा कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों में काफ़ी सुधार हुआ है और अब दोनों देशों के लीडर और जनता एक दूसरे को बेहतर समझ सकने की स्थिति में हैं। बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामिक मुसलमान 1971 के हालात को भूल चुके हैं। उन दिनों पाकिस्तान की फ़ौज द्वारा की गई ज़्यादतियों को नज़रअंदाज़ कर वे इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान की ओर प्रेम की पींगें बढ़ा रहे हैं।
जब हमने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों पर नज़र डाली तो पाया कि, पिछले चार सालों से बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति GDP भारत से ज्यादा है। प्रति व्यक्ति GDP से पता चलता है कि एक देश में रहने वाले हर व्यक्ति की औसत आय कितनी है। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति GDP 2,688 डॉलर है। इसके विपरीत भारत का 2,411 डॉलर है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश में लोगों की औसत उम्र 74 साल है जबकि भारत में यह 68 साल है। फिर सवाल यह उठता है कि जब बांग्लादेश के लोग भारत से ज्यादा तरक्कीशुदा हैं तो वहां के हालात ऐसे क्यों? क्या सिर्फ़ ग्रोथ और जीडीपी ही विकास का पैमाना है।
बांग्लादेश का आपसी मसला या सियासत कुछ भी हो, मगर उसका असर वहां कि हिन्दुओं पर क्यों पड़े – यह अवश्य शोध का विषय हो सकता है। हैरानी तो तब हुई जब इस्कॉन मंदिर के सचिव चिन्मय दास ब्रह्मचारी को गिरफ्तार कर लिया है। बताया जा रहा है कि उनके खिलाफ़ बांग्लादेश में हिंदुओं का नेतृत्व करने को लेकर गंभीर आरोप लगे थे।
20 अक्टूबर को चिटगांव जिले में चिन्मय दास समेत 19 अन्य हिंदू संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज हुआ था। इसमें चिन्मय प्रभु पर चिटगांव में आयोजित एक रैली के दौरान बांग्लादेश के राष्ट्रीय ध्वज की अवमानना की गई, जहां इस्कॉन का भगवा झंडा बांग्लादेश के झंडे के ऊपर फहराया गया था। यह संपादकीय लिखे जाने तक स्वामी चिन्मय दास को ज़मानत नहीं मिली है।
देश के प्रभावशाली अल्पसंख्यक समूह, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने कहा है कि 4 अगस्त से हिंदुओं पर 2,000 से अधिक हमले हुए हैं, क्योंकि अंतरिम सरकार व्यवस्था बहाल करने के लिए संघर्ष कर रही है। अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिंदुओं के ख़िलाफ बढ़ती हिंसा के आरोपों ने दोनों देशों के बीच के तनाव को और बढ़ा दिया है। हिंदू मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों पर, जिनमें ढाका स्थित भारतीय सरकार द्वारा संचालित इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र भी शामिल है, हमलों की खबरों ने नयी दिल्ली में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की।
इसी सिलसिले में भारत के विदेश सचिव श्री विक्रम मिस्त्री ने बांग्लादेश का दौरा किया और अपने बांग्लादेशी समकक्ष मोहम्मद जसीम उद्दीन, विदेशी मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन और अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की। इस मुलाक़ात में उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कल्याण को लेकर भारत की चिंताओं से अवगत कराया। उन्होंने इस्कॉन से जुड़े चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और उन पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा भी उठाया और चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी मामले को निष्पक्षता से देखे जाने की अपील भी बांग्लादेश से की।
अपने दौरे के अंत में विक्रम मिस्री ने पत्रकारों से कहा कि भारत ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ काम करने की इच्छा जतायी और साथ ही साथ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और हाल ही में हुए हमलों को लेकर भारत की चिंता से अवगत कराया। दोनों पक्षों ने बिम्सटेक फ्रेमवर्क के तहत क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की बात पर सहमति जतायी।
बांग्लादेश की सरकार ने माना कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध 88 मामले दर्ज किये गये हैं जिनमें से अधिकांश हिन्दुओं के विरुद्ध हुए हैं। इन मामलों में 70 लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है। हालात काफ़ी जटिल हैं। सोशल मीडिया के जोश और उत्साह वाले पोस्ट इसका हल नहीं निकाल सकते। मगर भारत को कुछ सख़्ती तो दिखानी ही होगी।
मुहम्मद यूनुस के बारे में भी अलग-अलग बातें उठ रही हैं। समझ नहीं आ रहा कि क्या वे चरमपंथियों के साथ हैं या पूरी तरह से अक्षम व्यक्ति हैं! ग्रामीण बैंकिंग और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ होना एक बात है मगर सेना और चरमपंथियों पर नियंत्रण करना बिल्कुल दूसरी। जो नोबल शांति पुरस्कार उन्हें ग्रामीण बैंकिंग के लिये दिया गया था, क्या अल्पसंख्यकों पर हुई हिंसा के कारण उनसे वापस ले लेना चाहिये ?
सोचने की बात यह है कि बांग्लादेश तीन तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है और चौथी तरफ़ सागर है। खाद्य सामग्री, दवाइयां और बिजली के लिये बांग्लादेश पूरी तरह से भारत पर निर्भर करता है। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के गद्दी संभालने के बाद बांग्लादेश के हालात से निपटना आसान होगा। यह सोच कर हैरानी अवश्य होती है कि भारत एक महाशक्ति बनने की कगार पर है; विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है; दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है और बांग्लादेश के बनाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है – फिर भी इस मामले में भारत मजबूर सा क्यो महसूस कर रहा है। क्या बांग्लादेश भारत के लिये फ़्रेंकेंस्टाइन जैसा सिरदर्द साबित हो रहा है?
बिल्कुल वापिस ले लेना चाहिए हालांकि अंत में जो सवाल आपने भारत की लाचारी का पूछा वो हर भारतीय का सवाल है और मै खुद भी इस सवाल का जवाब जानना चाहता हूं
जी आलोक भाई मैं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इस मजबूरी को समझने का प्रयास कर रहा हूं। आपकी टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
मैं स्तब्ध हूँ सर। हमारे देश में कई ऐसे लोग जो मौन समर्थक हैं.. उन्हें क्या कहा जाए। जो जिसका योग्य नहीं है…. उससे जरूर वह चीज वापिस ले जानी चाहिए। जो भी स्वार्थ इस हिंसा को न रोक पाने का कारण बना है…वही स्वार्थ एक दिन इन लोगों को भी निगल जाएगा। मैं अत्यंत दुखी हूँ… आपका संपादकीय ने मेरी अंतरात्मा को झिंझोडकर रख दिया।
ईश्वर आपकी लेखनी को कालजयी रखें
अनिमा जी, आपकी स्थिति को समझ सकता हूं। संपादकीय ने आपकी भावनाओं को छुआ यह इसकी सफलता माना जा सकता है। हार्दिक आभार।
हिंदुओं में सेकुलर होने की बीमारी है और उस पर साहित्यकारों को कड़वा सच बोलने से डर लगता है वे सच्चाई बोलकर कट्टर हिंदू बनने से हमेशा बचते हैं। पता नहीं तेजेन्द्र सर को कौन सा कीड़ा काट गया है जो इतना साफ बोलते है मतलब लिखते है। काश सभी बुद्धिजीवी ऐसे ही होते। मुहम्मद युनुस के कांपते हाथ और ढीली जीभ नोबेल पुरस्कार को कैसे संभाल पाएगी ?
ले लीजिए… हिंदुओं का खून सड़को पर पिघल रहा है
संगीता जी आपकी टिप्पणी में शामिल आक्रोश समझ आ रहा है। आपको संपादकीय पसंद आया और हमारी साफ़गोई भी… इसके लिये विशेष धन्यवाद।
सादर चरणस्पर्श
निश्चित तौर पर बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के पक्ष विशेष रूप से हिंदू धर्म के अल्पसंख्यक समुदाय को विशेष रूप से टारगेट किया जा रहा है, जबकि वह भूल रहे हैं या उनके देश के ही निवासी हैं जिन्होंने तन मन धन से बांग्लादेश को समृद्ध बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अब उनके साथ धार्मिक भेदभाव के साथ ही नरकीय बर्ताव किया जा रहा है , रोज हत्या अपहरण लूट डकैती जैसे अपराध विशेष रूप से हिंदुओं पर किए जा रहे हैं इस्लामी कट्टरपंथी सीधा मैसेज भारत को देना चाह रहे हैं। भारत को तत्काल रूप से राजनीतिक, डिप्लोमेटिक के बाद मिलिट्री कार्रवाई की चेतावनी भी देनी चाहिए। भारत की आंतरिक सुरक्षा पर भी खतरा बांग्लादेश की सीमा से सदैव रहा है। देश का दुर्भाग्य है बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं को मारा कांटा जा रहा है जो कि वहां के निवासी हैं और भारत के विभिन्न कोनों में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी मुसलमान को सरकारें पाल पोस रही है सालों से। अपने संपादकीय के माध्यम से यह प्रश्न बखूबी उठाया है कि जब हम महाशक्ति के रूप में अपने आप को देख रहे हैं तो ताकत भी दिखानी चाहिए जंगल में हाथी के पास जब ताकत रहती है और वह अकेला रहता है तो वह भी अपनी शक्ति से पेड़ पौधे उखाड़ कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। भारत की यह शांत और सेकुलर रवैया बड़ी आंतरिक सुरक्षा संकट को खड़ा कर देगा और मैं इसे खुफिया इंटेलिजेंस की कमी भी मानता हूं कि पड़ोस में इतना बड़ा षड्यंत्र लगभग दो साल से रचा बुना जा रहा था जिसकी पूर्ण आहुति इस तरह सत्ता हथियाना के साथ समाप्त हुई है। भारत ने अभी तक खुलकर किसी भी प्रकार का विरोध और स्पष्ट संदेश बांग्लादेश की सरकार को नहीं दिया है। संपादकीय में आपको सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा भारत बांग्लादेश सीमा पर आए दिन नई चुनौतियों का सामना करने कि गंभीर स्थिति को भी स्थान देना चाहिए । भारत में हिंदूवादी संगठनों को भी सिर्फ राम मंदिर से प्यार है, अफगानिस्तान पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में अल्पसंख्यक रूप में नरक भोगने वाले हिंदू समुदाय से कोई लगाव नहीं है, यहां होने वाले लिए स्पष्ट वार्ता कर चेतावनी जारी करनी चाहिए ।
शुभम आपने संपादकीय का गहराई से विश्लेषण किया है। भारत की इंटेलिजेंस सेवा पर सही सवाल उठाए हैं। भारत को कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जिसकी चुभन बांग्लादेश महसूस कर सके।
बांग्लादेश आज भारत के लिए भस्मासुर बन गया है। रही बात शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार की, तो ये बहुत हास्यास्पद है। मुहम्मद यूनुस कतई हकदार नहीं। उन्हें तो स्वयं ही आगे आकर इसे वापस लौटाना चाहिए।
रिंकु जी, आपने फ़्रेंकेंस्टाइन की तुलना भस्मासुर से बढ़िया की है। मुहम्मदन यूनुस जैसे लोग कभी पुरस्कार नहीं लौटाया करते।
बांग्लादेश में तख्ता पलट के पीछे सामाजिक, आर्थिक कारणों के साथ-साथ हसीना सरकार की ढेरों गलतियां शामिल हैं, लेकिन षड़यंत्र की थ्योरी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर अमेरिका के हस्तक्षेप की बात तो सामने आई ही थी। तो ट्रंप सरकार के आने न आने से कोई फरक नहीं पडेगा। अमेरिका के लिए बांग्लादेश तब तक अहम नहीं है, जब तक उस धरती पर आतंकवादी संगठन बड़े पैमाने पर पनाहगाह न बन जाए या फिर चीन अपना दखल बढ़ा रहा हो। ‘बड़े भाई’-‘छोटे भाई’ की रिश्तेदारी निभाने के बजाय भारत को बॉर्डर मैनेजमेंट की ऐसी तैयारी करना चाहिए अन्यथा हमें दोबारा पिछली सदी के आखिरी दशक की उस दौर से गुजरना पद सकता है, जिसमें बांग्लादेश को लांचिंग पैड बनाकर हमें अस्थिर बनाने की कोशिश की गई थी। हालात चाहे सामान्य हो या न हो तो भी किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। नौवें दशक में हुसैन मुहम्मद इरशाद के राष्ट्रपति रहने के दौरान या फिर 1991 से 1996 के बीच खालिदा जिया सरकार में आतंकी संगठनों ने बांग्लादेश में अपना बेस बना लिया था और बांग्लादेश ट्रांजिट रूट की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। जब किसी देश को भारत को अस्थिर करना होता तो वह पाकिस्तान का समर्थन करते और पाकिस्तान बांग्लादेश के जरिये हमारे लिए चुनौती पैदा करता रहता। आज पकिस्तान और बांग्लादेश की दोस्ती भी इसी ओर को संकेत करती है। ऐसे में भारत अभी ‘वेट एंड वाच’ की स्थिति में है, उम्मीद है, भारत सही समय पर सही कदम उठाएगा। ‘पुरवाई’ का संपादकीय अत्यंत विश्लेषणात्मक है तथा एक प्रासंगिक घटना को लेकर सुन्दर संपादकीय के लिए अभिनन्दन।
जयंत भाई, आपने तो बांग्लादेश की स्थिति पर बहुत से नये कोण जोड़ दिये। जिन स्थितियों की तरफ़ आपने इशारा किया है, वे महत्वपूर्ण हैं। भारत को आतंकवादी संगठनों की घुसपैठ पर भी नज़र रखनी होगी। चीन वाला कोण भी कम क्रिटिकल नहीं है।
बांग्लादेश की स्थिति पर पुरवाई के संपादकीय में गंभीरतापूर्वक जो विचार रखे हैं और भारत की मूक स्थिति पर औचित्यपरक प्रश्न भी उठाए हैं, वे एक सजग चिंतक के प्रश्न हैं सादर अभिवादन।
हार्दिक आभार डॉ अनिरुद्ध अवस्थी जी। आपकी टिप्पणी हमारे संपादकीय के लिए महत्वपूर्ण है।
पूंजीपति देशों की विदेश नीतियाँ अपने व्यापारिक हितों को लेकर संचालित होती हैं , इसलिए वहाँ सत्ता किसी भी दल के हाथ में रहे कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं होता है , इसलिए ट्रम्प से बहुत ज़्यादा उम्मीद करना बेकार है
आपका कहना एकदम सही है प्रदीप भाई।
हमेशा की तरह सशक्त और विचारणीय सम्पादकीय। इस विषय पर लगातार सोचती और पढ़ती रही हूँ। आपके सम्पादकीय ने बहुत गंभीर प्रश्नों के लिर सोच प्रदान की। भारत के विविध दल अगर राष्ट्रीय सवालों और भारत के बाहर हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर साथ खड़े होने का साहस कर सकें तो बहुत सी समस्याएँ सुलझ सकती हैं पर राजनैतिक दल आपसी लड़ाई और विचारधारा के नाम पर अक्सर साथ आने से परहेज़ करते नजर आते हैं, जो अत्यंत दुखद है। आपनेबिना झिझक के इस जरूरी मुद्दे को उठाया,इसके लिए आभार।
हर्षबाला जी पुरवाई का प्रयास रहता है कि राजनीति से ऊपर उठ कर मुद्दों पर बात की जाए। पाठकों के सामने किसी भी मुद्दे को पूरे परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना हमारा उद्देश्य है। टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
यह विषय विश्व के राजनीतिक हलकों के साथ भारत के लिए बेचैनी पैदा करने वाला रहा है और अब भी बना हुआ है। दरअसल वहां सत्ता परिवर्तन के साथ चरमपंथियों ने अल्पसंख्यकों पर हमले शुरू कर दिए थे। खासकर अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले ज्यादा हुए। उनके मंदिरों में तोड़-फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं। पड़ोसी देश के नाते भारत में भूचाल आना स्वाभाविक था। हिन्दुओं पर हो रहे हमलों पर सोशल मीडिया में लोगों की नाराजगी देखने को मिली।
भारत ने बांग्लादेश पर क्या उपकार किए हैं यह तो इतिहास में दर्ज है। बताने की आवश्यकता नहीं है। जन्म का इतिहास भूलने वाली चीज नहीं है।
एक देश की नाराजगी दूसरे देश से होने के कई कारण हो सकते हैं। ऐसा होता है और अक्सर होता रहता है। आपसी बातचीत से समस्या सुलझा ली जाती हैं।लेकिन पड़ोसी देश भारत से अत्यधिक नफ़रत के कारण अपने ही देश के अल्पसंख्यकों को मार रहा है उन्हें प्रताड़ित कर रहा है। इसे बहुत ही ओछी मानसिकता कही जाएगी। वह भी धर्म के आधार पर।इसकी गहराई में न जाकर यही कहा जा सकता है कि उन्मादी भीड़ के सामने ये सब मायने नहीं रखता है। चरमपंथियों से तो कोई आशा रखना बेमानी ही है।
मुहम्मद यूनुस से नोबल पुरस्कार वापस लेने से क्या होगा? कुछ नहीं। जो उन्होंने काम किया था उसके एवज में यह पुरस्कार मिला था। फिर नोबल पुरस्कार देने वाली संस्था ऐसा क्यों करेगी? बिलकुल न करेगी।
फिलहाल तो इस बारे में मैं इतना कहूंगा कि मौजूदा सरकार इसका हल खोज निकालेगी। वह भी अपने तरीके से। आप किसी देश पर हमला नहीं कर सकते हैं और न ही उसे जबरदस्ती कुछ करने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
भारत के आसपास मतलब पड़ोसी देशों में हलचल मची हुई है। हर देश में सत्ता परिवर्तन एक ही पैटर्न पर हुआ लग रहा है। इससे शक जाता है कि कोई तो है जो इन देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। अपने अनुकूल सत्ताएं ला रहा है। आगे जब इतिहास लिखा जाएगा तो महाशक्तियों की सारी चालें उजागर होंगी। किंतु अभी का क्या?
भारत को भी इसी पैटर्न पर लाने की कोशिश की जा रही है। भारत सतर्क न रहा तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है। अगर भारत पड़ोसी देश पर किसी तरह की कार्रवाई करता है तो भारत की हालत रूस जैसी हो सकती है। कहने का मतलब है कि कोई तो है जो भारत को उकसाकर किसी युद्ध में या गृहयुद्ध में धकेलना चाहता है ताकि उभरता हुआ भारत गर्त में चला जाए। चक्रव्यूह की रचना हो चुकी है। ऐसा चक्रव्यूह रचा जा चुका है जिसमें घुसा तो जा सकता है पर निकलना मुश्किल है। रूस इसका उदाहरण है।
मौजूदा सरकार से अन्य कई बातों से सहमत न होते हुए भी उच्च स्तर की विदेश नीति से सभी वाकिफ हैं । बांग्लादेश भारत की इस नीति से वाकिफ नहीं है शायद। वह महाशक्तियों के जाल में फंस ही चुका है। चरमपंथियों के उन्माद में तो पूरी तरह से जकड़ चुका है। बांग्लादेश की जनता को समझना चाहिए। जनता भी क्या करे, चरमपंथी इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उनके सामने वे कुछ कर भी नहीं सकते हैं। अगर जनता आगे आती है तो वे उन्हें भी मारने-काटने में पीछे न हटेंगे।
इस मामले में भारत की विदेश नीति जो भी करेगी वह भारत का भविष्य तय कर देगी। यह मामला भारत के लिए बहुत ही पेचीदा है। गुस्सा में या सैन्य ताकत के बल पर मामला बिगड़ जाएगा। भारत की जनता का गुस्सा जायज है पर सरकार जनता नहीं होती है। सरकार को उस जनता के हित के लिए सोचना पड़ता है। उसे अच्छा जीवन जीने के साधन मुहैया कराने होते है, जलती आग में नहीं झोंकना होता है।
आपने इस विषय को अपनी संपादकीय का विषय बनाकर स्वयं अपनी राय तो रखी ही है । इसके साथ ही हिन्दी साहित्य के पाठकों और लेखकों की राय को भी जानने का मंच मुहैया करा दिया है। आपको बहुत-बहुत बधाई
भाई लखनलाल जी आपकी टिप्पणी बहुत गहराई लिये है बांग्लादेश की समस्या को समझने में बहुत सहायक है। रूस का उदाहरण देकर आपने समस्या की जटिलता को सही मायने में प्रस्तुत किया है। हार्दिक आभार।
जो नोबल शांति पुरस्कार उन्हें ग्रामीण बैंकिंग के लिये दिया गया था, क्या अल्पसंख्यकों पर हुई हिंसा के कारण उनसे वापस ले लेना चाहिये ?
इस जटिल प्रश्न को सामने रखने के लिए साधुवाद आपको।
भले ही किसी भी क्षेत्र में मिला हो, पुरस्कार आपकी ज़िम्मेदारी और उम्मीद बढ़ाते हैं। उन्हें कसौटी पर खरा उतरना ही चाहिए। नहीं तो पुरस्कार का अपमान माना जाता है।
पुरस्कार में शांति शब्द जुड़ा है, और उनके नेतृत्व में हो रही है हिंसा!
मानवता को केंद्र में रखकर एक ऐसा विषय जिस पर कम से कम कमबख्त सियासत तो बात नहीं कर रही ।ऐसे में इस विषय में जहां हिंसा है अत्याचार है शैतानियत है वीभत्सता है धर्मांधता है कठमुल्ला पन है और जो न कहें सो कम है।मानवता शर्मसार है।शायद इस से घिनौना कार्य हो ही नहीं सकता।
एक शब्द में कहा जाए तो जी हां,,,हां ,,मुहम्मद युनुस से नोबेल पुरस्कार छीन लेना चाहिए।इन पर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार न्यायालय में मुकद्दमा चलना चाहिए और जब इन्हें पेश किया जाए तो हिटलर मुसोलिनी,अयूब खान याहिया खान परवेजमुशर्रफ इनके सहोदर बताए जाने चाहिए।
साथ ही साथ ,भारत के वे सारे के सारे सियासत के कद्दावर मौन नेताओं को भी इनके साथ कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
भारत जो विश्वगुरु की पदवी के लालायित है और संपादकीय के अंत में सही लिखा गया है कि तीन ओर से भारत से घिरा हुआ है।भारत के रहमो करम पर निर्भर है। जन्म से लेकर आज तक और फिर भी भारत मौन है।सेकुलर से इस्लामिक देश बनने तक ,देखा जाए तो भारत को तभी विरोध करना चाहिए था। और तो और हमारी राजनीति पड़ोसी देश चीन से ही कुछ सीख लेती जिसने हमारे चिर प्रतिद्वंदी को अपना कर्जदार बना कर ,,,अंगूठे के नीचे रखा है।
वहीं हमने इस बिच्छू को अज़गर बनने दिया है।
टैक्स देने वालों की गाढ़ी कमाई क्या ऐसे जन समूह वाले राष्ट्र पर लुटाई जाती है।इस से तो बेहतर हमारे यहां की रेवड़ियों पर ही लुटा देते।वोट बैंक पर लुटा देते।
खैर ,एक साहस पूर्ण संपादकीय जिसे आने वाला कल देखेगा कि सात समंदर पार से एक साहित्यकार ने कलम उठाई और पांचवीं अर्थव्यवस्था से सवाल किए।
आभारी हूं कि मुझे यह संपादकीय पढ़ने और एक सुसंकृत और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपने विचार प्रकट करने का मौका मिला।
भाई सूर्य कांत जी आपकी टिप्पणी में बांग्लादेश के प्रति आक्रोश साफ़ महसूस किया जा सकता है। चीन और पाकिस्तान का उदाहरण देकर आपने एक नया कोण प्रस्तुत किया है। हार्दिक धन्यवाद।
सम्पादकीय में प्रश्न है क्या मोहम्मद यूनिस सेनोबल पुरस्कार वापस लेना चाहिए?
नहीं लेना चाहिए क्योंकि वह पुरस्कार अर्थशास्त्र के विशिष्ठ विषय पर अध्ययन करने के लिए दिया गया था ,राजनीति शास्त्र पर नहीं। उन्हें सम्भवतः इसलिए सत्ता प्रमुख चुना गया होगा कि वे एक अंतराष्ट्रीय चेहरा हैं और बंग्लादेश में कोई व्यक्ति इस छवि वाला नहीं होगा । यह अवश्य कह सकते हैं कि उन्हें अपने इस पद से जरूर हट जाना चाहिए लेकिन फिर उन्हें भी बंग्लादेश छोड़ना पड़ेगा ,बाकी तो भारत सरकार जिस दिन सोच लेगी कि दख़ल देना है उसे24घँटे लगेंगे ।
वंदे मातरम
Dr Prabha mishra
आदरणीय प्रभा जी, आपकी टिप्पणी संपादकीय को समझने में सहायक सिद्ध होगी। हार्दिक धन्यवाद।
बहुत से ज्वलंत प्रश्न उठाता संपादकीय। नोबल पुरस्कार और मोहम्मद युनुस परस्पर संघर्ष करते प्रतीक होते हैं। लेकिन वापस लेने की बात पर भी सैकड़ों प्रश्न उठ खड़े होंगे। बंगलादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों ने प्रत्येक हिंदू का ह्रदय व्यथित किया है। आम जनता राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले राजनीतिक घालमेल व दांवपेंच से अधिक इत्तेफाक नहीं रखती, वह बस व्यथित होती है किसी भी जगह, किसी भी देश के धार्मिक खूनी संघर्षों से।
सुधा जी, आपको संपादकीय पसंद आया, हार्दिक धन्यवाद। आपने सही प्रश्न उठाए हैं।
आज का आपका संपादकीय विश्व पटल पर हो रही घटनाओं पर पैनी नजर के साथ आपके विश्लेषणत्मक दृष्टिकोण से भी परिचित कराता है। आपने ठीक लिखा है कि विश्व में 57 मुस्लिम बाहुल्य देश हैं तो 40 के करीब ईसाई बाहुल्य। दुनिय़ा में एक भी हिन्दू देश नहीं है। नेपाल विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था मगर सेक्युलरिज़म ने उस देश को भी निगल लिया।
हमारे राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए धर्मनिरपेक्षता को अपनाने के कारण भारत हिंदू बाहुल्य होते हुए भी हिंदू राष्ट्र नहीं बन पाया। शायद इसके मूल में हिन्दुओं की सब धर्मो के प्रति आदर तथा सहिष्णुता के निरंतर बोये गये बीज हैं।
‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात’ या गाँधीजी सिखाये रास्ते कि अगर कोई तुम्हें एक चाँटा मारे तो दूसरा आगे कर दो, के साथ गंगा जमुनी तहजीब को निभाते हुए हिंदू अपना आत्मसम्मान ही खो बैठे हैं। तभी विश्व के लगभग हर देश में हिन्दुओं के धर्मस्थलों को तोड़ने के साथ उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है किन्तु हिंदू तो हिंदू किसी अन्य धर्मो के व्यक्तियों के मुख से आह भी नहीं निकलती।
सच तो यह है कि इसी धर्मनिरपेक्षता ने भारत में विद्वेष की भावना को बढ़ाया है। जहाँ तक बांग्लादेश का प्रश्न है, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को हटाकर मोहम्मद यूनुस को बिठाकर कुछ पश्चिमी देश भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत सरकार को बांग्लादेश के हिन्दुओं को बचाने का प्रयत्न करना चाहिए पर कैसे? वे बांग्लादेश के नागरिक तो हैं नहीं। बल प्रयोग कर युद्ध को न्योता देकर सरकार देश का अहित नहीं करना चाहेगी। कूटनीतिक प्रयास तो चल ही रहे हैं तभी भारत के राजनायिक को वहां भेजा गया है।
जहाँ तक मोहम्मद यूनुस के नोबिल पुरस्कार लौटाने की बात है तो ज़ब वह इस पुरस्कार का सम्मान ही नहीं रखा पाये तो लौटाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
आदरणीय सुधा जी, आपने तो पूरे संपादकीय का गहराई से विश्लेषण किया है। पाठकों के लिये ये टिप्पणी एक गाइडलाइन तैयार करेगी।
आदरणीय संपादक महोदय,
शांति के नोबेल पुरस्कार का वापस लिया जाना इस बात को सिद्ध करेगा कि यूनुस जी के कार्य शांति और मानवता के विरुद्ध हैं, और फिर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं विवश हो जाएगीं कि उनके विरुद्ध वक्तव्य दिए जाएं और प्रतिक्रिया दिखाई जाए हस्तक्षेप किया जाए। इस समय के राजनैतिक परिपेक्ष में क्या यह संभव हो सकेगा?
चीन क्या ऐसा होने देगा?
जब भारत के ही तथाकथित धर्म निरपेक्ष लोग इस विषय पर मौन है तब किसी और को क्या कहें?
मेरा तो यह विचार है कि भारत की प्रगति से जले भुने बैठे देश इस षड्यंत्र में सम्मिलित हैं ।
ईश्वर भारतवर्ष सुरक्षित और समृद्ध रखें
सरोजिनी जी आपने संपादकीय के शीर्षक को समर्थन देकर उसे पूरी तरह से विश्लेषित भी किया है।
विश्व पटल पर भारत की स्थिति जिस प्रकार मजबूत हो रही है उससे भीतर बाहर बहुत लोगों के पेट में दर्द हो रहा है… हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार इस बात का सूचक है कि विश्व में हिंदू राष्ट्र कोई नहीं है
आपका यह लेख बहुत ही बढ़िया है
संगीता जी, आपको इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
अंग्रेज़ी में ungratefulness, हिन्दी में कृतघ्नता और उर्दू में एहसान फ़रामोशी की जीती जागती ज़िन्दा मिसाल अगर आपको देखनी है तो वो है बंगलादेश। शायद इसके कट्टरपंथी मुसलमानों को dementia हो गया है और वो यह भूल गए हैं कि 26 मार्च 1971 को जो इन्हें पाकिस्तान से निजात मिली थी उसको हासिल करने में भारत ने अरबों रुपये खर्च करने के साथ साथ अपने हज़ारों सैनिकों की बलिदानी भी दी थी। तब जाकर उन के लोग अपने आप को एक स्वतंत्र देश के नागरिक कहने के लायक हुए थे। वो शायद यह भी भूल गए हैं कि कैसे पाकिस्तान की फ़ॉज ने बंगलादेशीयों का कत्लेआम किया था और कैसे इनकी माँ बहनों की इज़्ज़त सरे आम लूटी गई थी। जो स्वयं कटोरा लेकर ख़ैरात की भीख मांगने पर आमादा हो गए हैं आज वो ही ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं कि आपसी हालात में बहुत सुधार हुआ है। हो सकता है कि इसके पीछे भी पाकिस्तान की कोई छुपी हुई चाल हो जिसका बंगलादेशीयों को एहसास नहीं है। हिन्दुओं की संख्या मुस्लिम देशों में कम होती जारही है, इसकॉन के सचिव चिन्मय दास ब्रह्मचारी को, क्योंकि वो हिन्दु हैं, गिरफ़्तार किया गया है; यह सब क्या और क्यों हो रहा है। शायद वहाँ रहने वाले कमज़ोर हिन्दुओं के मन्दिर नष्ट करने और उनपर ज़ोर-ज़ुलम करने में बंगलादेशियों के कट्टरपँथियों को sadistic मज़ा आता हो। आपके इस कथन से कि ‘इस मामले में भारत मजबूर सा क्यों महसूस कर रहा है। क्या बंगलादेश भारत के लिए फ़्रैकेंस्टाइन जैसा सिरद्रद साबित हो रहा है’ से पूरी तरह से सहमत हूँ।
कोई माने या न माने, भारत का विभाजन ‘टू नेशन थ्योरी’ को लेकर हुआ था। मुसलमानों को, क्योंकि वो मुसलमान थे, अपना अलग देश मिल गया और हिन्दुओं को अपना अलग देश मिला। पाकिस्तान में जो हिन्दु रह गए थे उन्हें वहाँ की सरकार ने उन्हें धीरे धीरे ख़त्म करना शुरू कर दिया। वो अब गिनती के कितने रह गए हैं सब को पता है। सैकुरिज़्म के नाम पर, भारत में जो मुसलमान रह गए थे वो सब नेहरू और गान्धी के दिमाग़ की उपज थी। एक बार पाकिस्तान के प्रवेज़ मुशर्रफ़ का ब्यान मैं ने कहीं पढ़ा था जिस में उस ने कहा था कि हिन्दुस्तान को जीतने के लिए हमें कुछ नहीं करना पड़ेगा। बस थोड़ा वक्त चाहिए जब हमारी आबादी हिन्दुओं से कहीं ज्यादा होगी और हिन्दु अप्लसंख्यक बन जाएंगे, फ़िर वो मुल्क हमारा होगा। सब से बड़ी शरमाक बात तो यह है कि कुछ हिन्दुस्तानी नेता मिलकर हिन्दुओं पर अत्याचार को एक आवाज़ में उठाएं, वो यहाँ पर भी राजनीति कर रहे हैं। बंगलादेश की भारत को सब से बड़ी देन या export कहिये; वो हैं घुसपैठिए, जिनकी ममता बैनर्जी और दूसरे नेता अपने अपने वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण कर रहे हैं।
भाई विजय विक्रांत जी आपने बांग्लादेश के माध्यम से 2-नेशन थियोरी और मुसलमानों की मानसिकता पर टिप्पणी की है। परवेज़ मुशर्रफ़ के बयान का भी आपने हवाला दिया है। आपकी टिप्पणी सभी पाठक पूरे चाव से पढ़ेंगे।
हमेशा की तरह सशक्त, विचारणीय और ज्वलंत प्रश्न उठाता सम्पादकीय।
हार्दिक आभार आशुतोष।
आपने लिखा कि भारत महाशक्ति बनने की कगार पर है, यही एक बड़ी वजह है| अंतर्राष्ट्रीय पटल पर जिस तरह से भारत की साख निरंतर बढ़ रही है और भारत में हिंदू समर्थक सोच का विस्तार हो रहा है, उससे बहुतों की नींद उड़ गई है| हैरानी की बात यह कि इनमें अपने देश के अवसरवादी सहित वे देश भी शामिल हैं, जो खुद इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में हैं| बांग्लादेश की स्थितियाँ बेहद चिंताजनक हैं और इस पर भारत की चुप्पी भी| वैसे मोदी और अमित शाह के कट्टर समर्थकों को पूरा भरोसा है कि ये ख़ामोशी ऊपरी है और ‘बिहाइंड द सीन’ कुछ बड़ा करने की योजना हो सकती है, जैसा कि ये जोड़ी हमेशा करती आई है| हालाँकि इसके कई कूटनीतिक एंगल होंगे| ये सब भविष्य बताएगा, पर तब तक, निश्चित ही हम आहत महसूस करते रहेंगे| रही बात नोबल पुरस्कार की, तो इसके प्रयोजन से लेकर चुनाव तक सवाल उठते रहे हैं, इसलिए मुहम्मद यूनुस से शांति पुरस्कार वापस लिया जा सकता है, इसकी संभवना कम ही नजर आती है| इस मुद्दे पर आपके विचारों की प्रतीक्षा थी| आभार आपका और पुरवाई का|
शैली जी, आपकी गंभीर और सार्थक टिप्पणी पुरवाई के लिये महत्वपूर्ण है। आपको संपादकीय पसंद आया, इसके लिये हार्दिक धन्यवाद।
विचारोत्तेजक संपादकीय जो पूरे परिप्रेक्ष्य में बंग्लादेश की समस्या को चित्रित करता है। युनूस पश्चिमी डीप स्टेट की कठपुतली है। नोबेल पुरस्कार लायक नहीं है। इसके कंधे पर बंदूक रखकर भारत को निशाना बनाया जा रहा है। भारतीयों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। भारत सरकार को कोई कठोर फैसला लेना ही होगा।
अरविंद जी, मुहम्मद यूनुस के बारे में जो आपके विचार हैं, वही बहुत से अन्य लोगों के भी हैं। भारत सरकार अवश्य ही कुछ ना कुछ सोच रही होगी।
प्रिय भाई तेजेंद्र जी,
आपका संपादकीय पढ़ गया। हमेशा की तरह एक तेजस्वी और ललकारता हुआ संपादकीय। चुनौती भरा। सच कहूं तो इस समय बांग्लादेश के हालात देखकर हर भारतीय खदबदा रहा है। सबके भीतर किसी अपने, बहुत अपने द्वारा धोखा दिए जाने जैसी पीड़ा और दंश है। और साथ ही, कभी न भरने वाला एक जख्म भी, उस देश द्वारा, जिसकी आजादी और स्वाभिमान की लड़ाई में साथ देने के लिए इस देश ने जी-जान से जूझते हुए, बड़ी कुरबानी दी है।
उस समय मुजीब के आह्वान पर बांग्लादेश के नव निर्माण के लिए, केवल भारतीय फौज ही नहीं, पूरा देश लड़ा था। पूरे देश का आत्मबल उसमें शामिल था।
और आज वहां के हालात! लगता है, उस आजादी का किसी ने अपहरण कर लिया, और उसे फिर से उन कट्टरपंथियों के हाथ में सौंप दिया, जिससे मुक्ति के लिए छटपटाकर, कभी उसने भारत को साथ देने का आह्वान किया था।
फिर इससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि यह सारा कुछ जिस नोबेल पुरस्कार धारी शख्स के नेतृत्व में हो रहा है, उसके लिए कल तक हममें से बहुतों के दिलों में बड़ा सम्मान था। उसे हम गरीब जनता का पक्षधर, एक उदारहृदय शख्स समझते थे। पर अफसोस, वह भीतर से क्या निकला? कट्टरपंथियों के हाथ में खेलने वाला एक अदना शख़्स, जिससे किसी भी तरह के न्याय की उम्मीद अब वृथा लगने लगी है।
बहुत दिनों से मै सोच रहा था कि क्या कोई इस मुद्दे पर कुछ ऐसा लिखेगा, जिसमें बुरी तरह छले गए हर हिंदुस्तानी हृदय की पीड़ा हो। मैंने बहुत पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय पढ़े। पर वे मानो खानापूर्ति करने के लिए लिखे गए थे। कुछ डरे-डरे से और दुविधाग्रस्त। बहुत निराश करने वाले।
आज आपका इतना खरा और निर्भीक संपादकीय पढ़ा भाई तेजेंद्र जी, सही जगह पर सही चोट करता हुआ, तो लगा कि आपने हर हिंदुस्तानी की पीड़ा को आवाज दे दी। एक ऐसा संपादकीय जिसमें आपने बगैर किसी किंतु-परंतु के वहां हो रहे हिंदुओं के दमन की सच्ची तस्वीर उकेर दी है।
भारत में बहुत से लोग और राजनीतिक दल बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर इसलिए नहीं बोलना चाहते, कि कहीं ऐसा करने पर वे सांप्रदायिक न समझ लिए जाएं। उम्मीद है, आपका निर्भीक संपादकीय ऐसे लोगों को राह दिखाने का काम करेगा।
मेरा स्नेह और साधुवाद,
प्रकाश मनु
सर, आपका आशीर्वाद हमारी शक्ति है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतने षड़यंत्र हो रहे हैं, जिन्हें समझ पाना आसान नहीं है। निर्भीकता किसी भी संपादक की विशेषताओं में शामिल होनी चाहिए। आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
आदरणीय तेजेंद्र जी! इस संपादकीय का लंबे समय से इंतजार था! लेकिन यह संपादकीय ऐसे समय पर आया जब निराशा से इसकी उम्मीद ही छोड़ दी थी! किंतु आप भी अपनी जगह इस दृष्टि से सही हैं कि जब तक घटना का तथ्यात्मक आँकलन न कर लिया जाए तब तक उसके बारे में न लिखा जाए! सर्वप्रथम इसके लिए शुक्रिया!
इस बीच में वहाँ के दुर्घटनाओं से संबंधित इतने सारे वीडियोज़ देखे कि ग्लानि और दुख से मन भर-भर जाता था।ऐसा लगता था कि क्या कर दिया जाए। ऐसा याद आ रहा है कि इसी संदर्भ में किसी रचनाकार की कोई कहानी या यात्रा वर्णन शायद पुरवाई में ही पढ़ा भी था।
16 दिसंबर1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से भारत ने इन्दिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में
मात्र 13 दिन में आजादी दिलवाई थी। यह हमें इसलिये याद है क्योंकि इस युद्ध में हमारे भी दो भाई सम्मिलित थे। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार और वहाँ की स्थितियों के बारे में जितना कुछ देखा व निरंतर देख और सुन रहे हैं ,सब कुछ बहुत त्रासद और बहुत ही अधिक तकलीफ देह है।
वास्तव में यह मुद्दा ऐसा था जिसमें भारत की हर राजनीतिक पार्टी को एक होकर निर्णय लेना चाहिए था पर अफसोस कि यहाँ पर भी राजनीति हो रही है। जहाँ तक नोबेल शांति पुरस्कार के वापसी का प्रश्न है पता नहीं यह संभव है या नहीं,लेकिन अगर असंभव है तब भी वापस माँग लेना चाहिए क्योंकि वह अब उसके हकदार नहीं।आपने भले ही इस विषय को संपादकीय में देर से उठाया लेकिन इस संपादकीय को पढ़कर अनेक ऐसे तथ्यों से अवगत हुए जिसके बारे में हमें तो कम से कम बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी और इसके लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया बनता है।
वैसे स्थितियाँ इतनी अधिक विकट ,विषम और दुर्भाग्य पूर्ण हैं ,जिस पर भारत को गंभीरता से विचार करके कुछ ठोस निर्णय लेना बहुत आवश्यक है।
बेहद निडरता से संपादकीय में इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने के लिए आपके साहस को सलाम।
पुरवाई का आभार।
आदरणीय नीलिमा जी, किसी भी साहित्यिक संपादक को ज़ल्दबाज़ी में कुछ नहीं लिखना चाहिए। बांग्लादेश की स्थिति पर बहुत से फ़ेंक वीडियो भी वायरल हो रहे थे/हैं। एक ज़िम्मेदार संपादक के तथ्यों की जांच अति आवश्यक है। जो जानकारी ऑथेंटिक लगी, वही संपादकीय में शामिल की गई है । आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।
सुलझा हुआ और तलस्पर्शी, संतुलित और स्पष्ट संपादकीय। आप जिस पर भी लिखते हैं, उसके पीछे एक मुकम्मल शोध होता है। ऐसे बढ़िया, संपादकीय के लिए बधाई और धन्यवाद।
हार्दिक आभार शैली जी। आपकी छोटी सी टिप्पणी सब कुछ कह रही है।