पुरवाई के पाठकों के सामने एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारा उद्देश्य आपको चौंकाना नहीं होता। हमारा उद्देश्य होता है आपको जीवन के उन अनसुने, अनछुए पहलुओं से परिचित करवाना जिनके बारे में आपको कम या नगण्य जानकारी है। हो सकता है कि आप में से कुछ पाठकों ने इन स्थितियों के बारे में कुछ सुन रखा हो या पढ़ रखा हो, मगर हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि आपको इन मुद्दों की याद दिलाते चलें।
एक ज़माना था कि अख़बारों में एक कॉलम आया करता था ‘विचित्र किन्तु सत्य‘! फ़िल्म ‘अमर प्रेम’ में किशोर कुमार का गाया एक गीत है जिसमें आनन्द बख़्शी सवाल पूछते हैं – “पानी जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाए?”
ज़ाहिर है कि आपका सवाल होगा कि संपादक महोदय ये आज कैसी पहेलियां बुझा रहे हैं? बात पहेलियों की नहीं लेकिन हैरान करने वाली बात तो है। इन्सान को खाने पीने वाली वस्तुओं से एलर्जी हो सकती है; कभी कुछ पहनने वाली चीज़ों से भी हो सकती है और तो और किसी जानवर के संपर्क से भी एलर्जी हो सकती है – और मुझे तो बीयर से एलर्जी है। बीयर पीते ही मेरे बदन पर लाल-लाल चकत्ते उभर आते हैं। मगर ब्रिटेन में एक लड़की है जिसे पानी से एलर्जी है!… पानी से एलर्जी! हो गये ना हैरान आप?
मुझे हिन्दी में एलर्जी के लिये कोई शब्द नहीं मिला। या तो हम भारतीयों को एल्रर्जी होती नहीं थी और केवल अंग्रेज़ों के भारत में आने के बाद शुरू हुई, या फिर हम इतने जागरूक नहीं थे कि एलर्जी के बारे में कुछ जान पाते। हालांक उर्दू या हिंदुस्तानी में हम कहते तो हैं कि फलां चीज़ हमें माफ़िक नहीं आती।… या फिर फलां चीज़ खाने से गला ख़राब हो जाता है। मगर एलर्जी पर गंभीरता से बात नहीं होती।
पिछले सप्ताह जब मैंने लंदन के एक अख़बार में पढ़ा कि एक लड़की को पानी से एलर्जी है तो मैं तो सन्नाटे में रह गया। कहा जाता है कि हमारे शरीर का 60% तो पानी ही है। और उसमें भी मस्तिष्क और दिल 73% पानी हैं तो फेफड़े 83% पानी हैं। और तो और माँस पेशियां और गुर्दे भी 79% पानी हैं। यदि ऐसे में किसी इन्सान को पानी से एलर्जी हो जाए तो वो बेचारा जीवित कैसे रहेगा। यहां आपको यह सूचना देना आवश्यक है कि पूरी दुनिया में करीब 100 लोग ऐसे हैं जिन्हें पानी से एलर्जी है और इसे अंग्रेज़ी में कहते हैं – Aquagenic Urticaria.


वाकई ये जानना बेहद चौंकाता है और साथ ही साथ डराता भी है ।
हार्दिक धन्यवाद आलोक भाई।
Amazing भ्राता श्री
अच्छी जानकारी और बढ़िया लिखा है। साधुवाद!
धन्यवाद मनोज भाई।
धन्यवाद कपिल।
रौंगटे खड़े हो गए : मुझे जरा सा धूल, ठंड, गन्ध से एलर्जी होती है तो परेशान होती हूँ : यह तो कल्पना से परे स्थिति है…
विभा जी हार्दिक आभार।
रोचक एवं ज्ञानबर्धक लेख….
भय भी लगा…..
साधुवाद
धन्यवाद अनिमा जी।
गजब गजब बीमारियां और उनसब से बढ़कर आपकी गजब खोज।
सही कहा आपने सर।
किन किन अद्भुत तकलीफों से आदमी गुज़रता है। बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने।पर अपने यहां (अंग्रेजों के आने के पहले और शायद बाद मे भी) alergi या ऐसी ही बिरले होने वाली बीमारियों का dignose, भूत प्रेत चुड़ैल का प्रभाव या साया मान कर उनका इलाज बाबाओं और ओझाओं को सौंप दिया जाता था। और मरीज़ कभी ठीक नहीं हो पाता था
सीमा जी, आपने भूत प्रेत और चुड़ैल वाली बात सही कही।
बहुत ही विचित्र, पहली बार सुना। इस विषय पर आपके द्वारा दी गई जानकारी को साझा कर रही हूँ
आभार रिंकु जी।
सच में पहली बार यह जानकारी मिली, हैरानी हुई, दुख भी हुआ कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों का जीवन कितना कठिन होगा! अद्भुत तथ्यों से भरी संपादकीय को सलाम
हार्दिक आभार नूतन।
ये विचित्र है । महत्त्वपूर्ण संपादकीय के लिए आभार ।
हार्दिक धन्यवाद राजविंदर जी।
पु lरवाई के संपादकीय, लगभग हर विषय पर केंद्रित होकर उसके पाठकों को सदैव नई जानकारी से और संभावित समाधानों से लैस भी करते हैं।
इस बार का संपादकीय न केवल लोकप्रिय विज्ञान या सही अर्थों में कहीं तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता हुआ है ।और यह भी एक अजीबोगरीब स्थिति है कि पानी से एलर्जी!? इस पर विस्तृत अनुसंधानित चर्चा इस संपादकीय में की गई है । ईमानदारी से जहां इस अनुसंधानित संपादकीय में कहीं कोई ऐसे मोड़ आते हैं जहां पर आगे बताना संभव नहीं है तो यह भी लिख दिया गया है कि इस पर रिसर्च हो रही है या आगे होगी।
यह चौंकाने वाली बात है कि पानी से एलर्जी के जितने भी कैसे दिखाई दिए हैं उनमें से अधिकतर महिलाएं हैं ।पुरुषों पर अलग से रिसर्च चल रही है। तिस यह भी एक त्रासदी विडंबना या कोई भी और शब्द, नहीं ,,,
पानी जैसी जीवनदायनी शक्ति कुछ चंद लोगों के लिए एलर्जी का कारण है और भयावह परिणाम देती है।
पुरवाई संपादकीय को इतना बेहतर वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण बनाने और औचित्य पूर्ण बनाने के लिए आदरणीय अग्रज श्री तेजेंद्र शर्मा जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
इस सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार भाई सूर्य कांत शर्मा जी।
सर यह सच में चौंकाने वाली बात लिखी है आपने…९
स्नेहाशीष अपूर्वा।
एक अद्भुत बीमारी का ज्ञान हुआ
एलर्जी का हिंदी शब्द ” प्रत्यऊर्जता “है
(आयुर्वेद में )
स्त्रियों को जो बीमारियां होती हैं और पुरुषों को नहीं होतीं उसका कारण एक ये भी है कि वे प्रकृति की सृजनकर्ता हैं अंकुरण धरा से ही
प्रस्फुटित होता है । जिसके पास बहुतकुछ होता है उसी के पास कुछ होता है ।
क्षमा सहित
Dr Prabha mishra
प्रभा जी, मैंने सोचा कि मैं इसे ‘जल-पित्ती’ कहूं। मगर अब ‘एलर्जी’ इतना जाना पहचाना शब्द बन चुका है कि विचार त्याग दिया। आपकी टिप्पणी हमेशा की तरह सराहनीय है।
सचमुच आपकी संपादकीय के माध्यम से दी गई जानकारियां संवेदनशील और महत्वपूर्ण होती हैं।यह तो अनसुना सा लगता है.कि जहां अनेक बीमारियों का इलाज पानी से है वहीं पानी ही किसी के लिए एलर्जिक और जानलेवा बन जाता है।ऐसा ही एक संक्रमण यहां यूपी बिहार में देखा जाता है जो पानी से ही होता है,उसमें.भी त्वचा का लाल होकर चाहते पड जाते हैं,तेज खुजली और जलन होती है,।इसे स्थानीय भाषा में जुलपित्ती* कहते हैं।और इसका इलाज शायद सिंदूर तेल लगाकर गर्म कंबल ओंढाकर तीन चार दिन में ठीक हो जाता है।पर यह बेहद मामूली माना जाता है ।पर आपने जो जानकारी दी वह चौंकाती तो है ही डराती भी है।पानी तो जीवन का अमृत है भला वह विष कैसे हो गया? यह मेडिकल साइंस के लिए भी एक चुनौती है।बहुत बहुत आभार भाई आपने इतनी महत्वपूर्ण बीमारी की जानकारी दी।अशेष धन्यवाद, साधुवाद। सादर प्रणाम भाई।……..पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा आप पुरवाई का हर संपादकीय पढ़ती हैं और उस पर सार्थक टिप्पणी करती हैं। आपने ‘जुल-पित्ती’ का रेफ़रेंस दे कर संपादकीय को और स्पष्ट किया है। आभार।
गजब सुनकर ही आश्चर्य हुआ।
जी भाग्यम जी। हम भी हैरान हुए।
एक नया विषय ! एक नई जानकारी !! संपादक महोदय ! मैं अपने विद्यार्थियों से इस विशेष संपादकीय के प्रति बताऊंगा। यह पाठक को चौंकाता भी है और ज्ञानवर्धन भी करता है। आपका आभार !!
सर जी बहुत बहुत शुक्रिया।
आदरणीय तेजेंद्र सर का संपादकीय हमेशा नवीन जानकारी से पूर्ण होता है। यह विवरण पानी की एलर्जी, उसकी रासायनिक प्रक्रिया और वैज्ञानिकों को एक चुनौती पूर्ण विषय देने की अहम भूमिका प्रदान करता है। सही कहा कि गनीमत है कि पानी पीने पर कोई दिक्कत नहीं होती अन्यथा जीवन और मुश्किल हो जाता।
बहुत धन्यवाद
प्रिय पद्मा आपका स्नेह महत्वपूर्ण है। आपकी टिप्पणी हमेशा सारगर्भित होती है।
वास्तव में विचित्र किन्तु सत्य… चकित करती जानकारी। ईश्वर उनके लिए किसी चिकित्सा की खोज को सम्भव बनाए। नए आयाम दिखाते, भरपूर जानकारी देते संपादकीय के लिए बधाई और धन्यवाद।
शैली जी, बहुत शुक्रिया। इस अंक में आपका बेहतरीन लेख भी प्रकाशित हुआ है। वरिष्ठ नागरिकों के बारे में जो आपने लिखा है, सबको पढ़ना चाहिए।
हार्दिक आभार sir, आपका उत्तर महत्वपूर्ण है।
आपने मेरे लेख को स्थान दिया और उसका पुनः उल्लेख किया, विशेष धन्यवाद।
अभी तक बहुत सी प्रतिक्रिया आईं लेकिन जाने क्यों लिखने वाले, पत्रिका पटल पर कम और निजी संदेश अधिक भेज रहे हैं। संभवतः प्रतिक्रिया में भी taboo अपना काम कर रहा है। परन्तु मुझे आशा है कि इस विषय पर कुछ विचार विमर्श आरम्भ होगा। पुनः धन्यवाद।
शैली जी अब इस विषय पर खुल कर बात होने लगी है। मगर मैं और अधिक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
इन्हें आकर एक डुबकी महाकुंभ में लगा लेनी थी।
मैने सही में कभी पानी से एलर्जी के बारे में नहीं सुना था। जानकारीपरक लेख । एलर्जी की हिन्दी है तो – मगर सुगम्य नहीं। एलर्जी ही हिन्दी में भी ठीक है। वैसे आम लोग यह कहते हैं कि फलां फलां चीज हमें सूट नहीं करती। अब यहां भी सूट शब्द अंग्रेजी है। एलर्जी ही ठीक है।
अरविंद भाई आप तो जानते हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं। हर रोज़ कोई नई जानकारी हासिल होती है। और मेरा काम है कि जो भी नई जानकारी हासिल हो, आप सब तक पहुंचा दूं।
ये हैरान करने वाली जानकारी है, साथ ही चिंता भी बढ़ाती है। सामान्य तौर पर प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। पहले बच्चे धूल मिट्टी में खूब खेलते थे फिर भी स्वस्थ रहते थे। आज जरा सी धूल हो, अधिकांश को छींके आने लगती है। अब ये पानी से एलर्जी, पहली बार सुना। उनके प्रति संवेदना।
जी शैली जी, लगभग डराने वाली जानकारी है कि पानी से भी एलर्जी हो जाती है।
पहली बार पता चला कि ऐसा भी कुछ होता है कि पानी से एलर्जी हो। आपकी खोजी सम्पादकीय काबिले तारीफ है।
हार्दिक आभार रेखा जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
आपके संपादकीय का उद्देश्य चौंकाना नहीं होता है पर विषय चौंका ही देता है। आज के संपादकीय ने तो पता नहीं कितने वॉट का झटका दिया।
सबसे पहले आपकी तारीफ शीर्षक के लिये – *पानी जो अगन लगाए*
एलर्जी तो हमने कई प्रकार की सुनी है हमारी खुद की बहू को डस्ट एलर्जी है। बेचारी छींकती रहती है जरा भी धूल का काम हो तो। पर उसका ट्रीटमेंट है आजकल एलर्जी की जाँच हो जाती है और पता चल जाता है हमने सुना है।
पर 15 साल की छोटी सी बच्ची को इतनी कम उम्र में पानी की इस भयंकर प्रॉब्लम से जूझते हुए देखकर बहुत तकलीफ हुई। एकदम अकल्पनीय सा किन्तु सत्य है यह।
बीमारी को लेकर आपने जो वैज्ञानिक जानकारी जुटाई है वह काबिले तारीफ है।
आयुर्वेद में कहा जाता है कि जितनी भी बीमारियाँ हैं उसके मूल में तीन चीजें हैं कफ़,वात और पित्त।
एलर्जी के कारण जो रिएक्शन होते हैं लाल लाल चिट्ठे पड़ जाना फूल जाना, खुजाल मचना तो उसके लिए कहा जाता है कि पित्त हो गया या पित्ती हो गई। घरेलू उपचार में उसे पानी से भी बचाया जाता था, ठंडी चीजों से भी और कंबल उढ़ा कर रखा जाता था। गेरू के भजिए बनाकर भी खिलाने से भी आराम लगता है। बेसन के जो भजिये बनाते हैं उसमें गेरू मिल लेते हैं थोड़ा सा। यह इलाज तो हमने हमारे घर में हमारे जेठ को करते हुए देखा है और इससे उन्हें आराम भी लगता था।
आपके आज के संपादकीय ने हमें हमारी एक सीनियर की याद दिला दी। वह दसवीं में नई -नई आई थी। पहली बार हमने एलर्जी शब्द तब सुना था। उसके बदन का कोई भी हिस्सा जरा सा भी दब जाता था तो उतनी जगह फूल जाती थी अगर वह पेंसिल से हल्के से भी अपने हाथ पर अपना नाम लिख ले तो उसका नाम उछल जाता था। कहीं खुजाल मचे तो खुजा सकती ही नहीं थी उतनी जगह फूल जाती थी। बहुत कम नहाती थी ,जरा से पानी से।
उस समय हम लोग सीनियर लोगों से ज्यादा बात नहीं करते थे।
पर पानी से थोड़ी बहुत प्रॉब्लम उसे भी थी हम लोगों ने उसे इतना सीरियसली कभी नहीं लिया क्योंकि टाइम टेबल इतना टाइट रहता था कि कहीं और देखना संभव ही नहीं था।
आज हमें याद आ रहा है उसका नाम नीना बलेचा था। बहुत गोरी और सुंदर सी लड़की थीं नीना जी! जब 11th में थी तो उसे हम लोगों ने टाइटल दिया था-
वह दिल्ली की थीं। आज आपके संपादकीय ने उसकी तकलीफों की गंभीरता से परिचय कराया।
हम सोच रहे हैं कि अपन कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान ने अपने को स्वस्थ शरीर दिया है। बाकी छोटी-मोटी परेशानी और तकलीफें, बीमारियाँ तो आती रहती हैं। ईश्वर अगर मनुष्य का जीवन देता है तो अच्छा दे वरना ना दे तो ही बेहतर।
वैसे सिर्फ जलन की अगर बात है आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक में जलन को रोकने के लिये काफी अच्छी दवाइयाँ है।पर भरोसा होना चाहिये। हो सकता है एलोपैथी में भी हो लेकिन हम नहीं जानते।
आज आपके संपादकीय ने हमें बहुत शॉक्ड किया।
ईश्वर सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।
उम्मीद करते हैं कि वैज्ञानिक जल्द ही इस समस्या का समाधान ढूंँढ निकालेंगे।
संपादकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय पर जानकारी देने के लिए तेजेन्द्र जी का तहेदिल से शुक्रिया।
पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
आदरणीय नीलिमा जी, पुरवाई का प्रयास रहता है कि हर सप्ताह कुछ नई जानकारी अपने पाठकों के साथ साझा की जाए। आपने अपनी यादें साझा करके संपादकीय में कुछ नये आयाम जोड़े हैं। हार्दिक आभार।
शुक्रिया आपका
धन्यवाद आदरणीय
जितेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय ने तो दिमाग की सारी जड़ें हिला दीं। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी को पानी से भी एलर्जी हो सकती है। वो पानी जो जिस्म के हर हिस्से में बहुत बड़ी मात्रा में है उसी को छूने या पीने से एलर्जी; बौखलाने वाली बात है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस बीमारी का शीघ्र ही कोई तोड़ अवश्य निकलेगा और जो लोग इस पीड़ा से पीड़ित हैं उन्हें जल्दी छुटकारा मिलेगा। इस सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद जितेन्द्र भाई।
विजय भाई जीवन के बारे कितना कुछ और है जानने के लिए। हम कितना कम जानते हैं!
भाईसाहब आप हमेशा ही गहन चिंतन और नवीन विषय पर संपादकीय लाते हैं। पत्रिका पढ़ना ज्ञान वर्धक हो जाता है। बहुत ही शानदार संवेदनशील होता है आपका लेखन।आप सदैव सक्रिय रहे नये विषय पाठकों के सामने रखते रहे। ऐसी शुभकामनाएं । वैसे हम पत्रिका का में स्थान नहीं पा सके। मगर आपका पुरवाई पत्रिका का संसार ऐसे ही प्रगति करता है ऐसी कामना करते हैं। अगले अंक की प्रतीक्षा में…..
मंजू किशोर’रश्मि’ कोटा राजस्थान
मंजू जी इस सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आप अपनी रचना इस पते पर भेजें – [email protected]
‘पानी में अगन लगाए’ संपादकीय में तेजेन्द्र शर्मा जी ने मानव की एक नई बीमारी के बारे में जानकारी दी है। ऐसी बीमारियों को पढ़ सुनकर मन अजीब सा हो जाता है। बाद में सोचता हूं कि बीमारी है, उसका क्या? कभी भी, किसी को भी हो सकती है। देह है तो बीमारी भी होगी। आंखें बन्द करने से तो समस्या का हल नहीं है न।
ये संपादकीय ऐसा है कि भुलाए न भूलेगा। छोटी सी बच्ची को पानी से अलर्जी? मानव को क्या-क्या देखना पड़ता है कुछ कहा नहीं जा सकता है। मानवीय जीवन से संबंधित आप जो विषय उठाते हैं वे सचेत तो करते ही हैं, नई जानकारी भी कराते हैं। अच्छा लिखा है आपने।
इस संवेदनशील, जनहितकारी संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई
भाई लखनलाल पाल जी, मैं भारतीय ज्ञान परंपरा से थोड़ा अलग सोचता हूं। मेरा मानना है कि सुपात्र और कुपात्र की चिंता में समय ख़राब ना किया जाए। जो नई जानकारी मुझे मिले अपने तमाम पाठकों के संग साझा करूं…
हम एक रहस्यमय सृष्टि में रहते हैं जहां बहुत कुछ अनछुआ, अनकहा, अनदेखा है। आप नए-नए विषय पर अपने विचार रखते हैं, जागरुक करते हैं, बहुत अच्छी बात है। शुभकामनाएं
संगीता जी आप जैसे जागरूक पाठक संपादकीय पढ़ते हैं और उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, यह हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। धन्यवाद।
आपके संपादकीय से नई-नई जानकारी प्राप्त होती है। यह एक अद्भुत तथ्य है कि कुछ लोगों को पानी से एलर्जी है। हम गर्म देश में रहने वाले लोग हैं हमें तो गर्मी में दो बार नहाने की और बार-बार पैर होने की आदत है। ऐसे लोगों को कितनी परेशानी होती होगी सोच कर हैरान हूं।आपने सच कहा कि हम अपनी छोटी-छोटी परेशानियों से विचलित हो जाते हैं किंतु ऐसे लोग भी हैं जिनके कासन कि हम कल्पना नहीं कर सकते। ऐसी घटनाएं हमारे अपने कष्ट को कम करके आंने का संदेश दे जाती हैं। उपयोगी संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।