Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – पानी जो अगन लगाए…!

पुरवाई के पाठकों के सामने एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारा उद्देश्य आपको चौंकाना नहीं होता। हमारा उद्देश्य होता है आपको जीवन के उन अनसुने, अनछुए पहलुओं से परिचित करवाना जिनके बारे में आपको कम या नगण्य जानकारी है। हो सकता है कि आप में से कुछ पाठकों ने इन स्थितियों के बारे में कुछ सुन रखा हो या पढ़ रखा हो, मगर हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि आपको इन मुद्दों की याद दिलाते चलें।

एक ज़माना था कि अख़बारों में एक कॉलम आया करता था ‘विचित्र किन्तु सत्य‘! फ़िल्म ‘अमर प्रेम’ में किशोर कुमार का गाया एक गीत है जिसमें आनन्द बख़्शी सवाल पूछते हैं – “पानी जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाए?”  
ज़ाहिर है कि आपका सवाल होगा कि संपादक महोदय ये आज कैसी पहेलियां बुझा रहे हैं? बात पहेलियों की नहीं लेकिन हैरान करने वाली बात तो है। इन्सान को खाने पीने वाली वस्तुओं से एलर्जी हो सकती है; कभी कुछ पहनने वाली चीज़ों से भी हो सकती है और तो और किसी जानवर के संपर्क से भी एलर्जी हो सकती है – और मुझे तो बीयर से एलर्जी है। बीयर पीते ही मेरे बदन पर लाल-लाल चकत्ते उभर आते हैं। मगर ब्रिटेन में एक लड़की है जिसे पानी से एलर्जी है!… पानी से एलर्जी! हो गये ना हैरान आप?
मुझे हिन्दी में एलर्जी के लिये कोई शब्द नहीं मिला। या तो हम भारतीयों को एल्रर्जी होती नहीं थी और केवल अंग्रेज़ों के भारत में आने के बाद शुरू हुई, या फिर हम इतने जागरूक नहीं थे कि एलर्जी के बारे में कुछ जान पाते। हालांक उर्दू या हिंदुस्तानी में हम कहते तो हैं कि फलां चीज़ हमें माफ़िक नहीं आती।… या फिर फलां चीज़ खाने से गला ख़राब हो जाता है। मगर एलर्जी पर गंभीरता से बात नहीं होती। 
पिछले सप्ताह जब मैंने लंदन के एक अख़बार में पढ़ा कि एक लड़की को पानी से एलर्जी है तो मैं तो सन्नाटे में रह गया। कहा जाता है कि हमारे शरीर का 60% तो पानी ही है। और उसमें भी मस्तिष्क और दिल 73% पानी हैं तो फेफड़े 83% पानी हैं। और तो और माँस पेशियां और गुर्दे भी 79% पानी हैं। यदि ऐसे में किसी इन्सान को पानी से एलर्जी हो जाए तो वो बेचारा जीवित कैसे रहेगा। यहां आपको यह सूचना देना आवश्यक है कि पूरी दुनिया में करीब 100 लोग ऐसे हैं जिन्हें पानी से एलर्जी है और इसे अंग्रेज़ी में कहते हैं – Aquagenic Urticaria. 

सर्रे इंग्लैण्ड की 19 वर्षीय क्लो रामसे को करीब चालीस चीज़ों से एलर्जी है – फल, मिठाइयों से तो एलर्जी है ही, उसे पानी से भी एलर्जी है। उसे बचपन में केले और आलू जैसी चीज़ें खाने पर तो उसे एनाफाइलैक्टिक शॉक आ जाता था। हर दूसरे दिन हस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। 
डरहैम की 25 वर्षीय केंडल ब्राइस को पानी से ज़बरदस्त एलर्जी है। पानी इस लड़की के लिए जैसे तेज़ाब बन गया है। पानी छूते ही उसे फफोले निकल आते हैं और पीते ही गला जलने लगता है! केंडल ने बताया कि जब वह शावर लेती हैं या अचानक बारिश में फंस जाती हैं, तो उनके शरीर पर जलन और सूजन हो जाती है, जो आग से जलने जैसी महसूस होती है। 
इस विरली बीमारी के कारण उसे ना केवल शारीरिक कष्ट भोगने पड़ते हैं बल्कि मानसिक तनाव से भी गुज़रना पड़ता है। वह नहा नहीं सकती क्योंकि नहाने का अर्थ है शरीर पर जलने जैसे घाव पैदा हो जाना। इन ‘साइड इफ़ेक्ट्स’ के चलते उसे रोज़ाना स्नान वाली सफ़ाई से वंचित रह जाना पड़ता है। मगर फिर भी वह सप्ताह में एक या दो बार कम-से-काम पानी से शरीर को साफ़ करती है। एंटी-एलर्जी की गोलियां पहले खा लेती है।
यह अच्छा है कि इस बीमारी से पीड़ित कुछ लोग पानी पी सकते हैं, यदि वे पानी को अपनी त्वचा से दूर रखें। मगर याद रहे कि कभी भी अधिक गंभीर एलर्जी विकसित हो सकती है जिससे होंठ सूज सकते हैं और मुंह और गले के अंदर जलन हो सकती है। अत्यंत विकट मामलों में – एनाफ़िलेक्सिस – जैसी प्रतिक्रया भी पानी पीने सो हो सकती है जो कि जीवन के लिये ख़तरा साबित हो सकती है। 
एक्वाजेनिक अर्टिकेरिया जिसे वाटर एलर्जी भी कहा जाता है, एक दुर्लभ प्रकार की एलर्जी है। इसमें व्यक्ति के शरीर पर पानी के संपर्क में आते ही दर्दनाक चकत्ते उभर आते हैं। ये चकत्ते त्वचा पर लाल या त्वचा के रंग जैसे दिखाई दे सकते हैं। यह एलर्जी ज्यादातर किशोरावस्था के बाद पैदा होती है। इसके लक्ष्णों में त्वचा का लाल होना, जलन होना या चुभन जैसा कुछ महसूस होता है। त्वचा में सूजन हो जाती हौ और खुजली वाले चकत्ते पैदा हो जाते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ मामलों में तो जलन और साँस लेने में भी कठिनाई होने लगती है। 
एक बच्ची की माँ, केंडल का कहना है कि शुरुआत में उन्हें केवल त्वचा पर तीखे दर्द जैसा कि कांटे चुभने का अहसास होता था। मगर समय के साथ-साथ यह दर्द बढ़ता गया और अब तो पानी के संपर्क में आने पर लगता है जैसे किसी ने सिगरेट लाइटर से उनके शरीर को जला दिया हो। इस एलर्जी के कारण वह अपनी एक साल की बच्ची को नहला तक नहीं सकती। इसके लिये उसे अपनी माँ की सहायता लेनी पड़ती है। 
वैज्ञानिक परेशान हो सकते हैं; समस्याओं से जूझ सकते हैं… मगर आसानी से हार नहीं मानते। फ़िलहाल वे भी परेशान हैं और अभी तक इस बीमारी का सही कारण खोज नहीं पाए हैं। मगर वैज्ञानिक इसे भगवान का प्रकोप कह कर बच नहीं सकते। उनका तो काम है हर बीमारी के कारण खोजना और फिर उसके लिये इलाज तैयार करना। हालांकि यह बीमारी करोड़ों में किसी एक को होती है, मगर वैज्ञानिकों के लिये चुनौती तो खड़ी करती ही है। 
ऐसा माना जा रहा है कि जब हम पानी को संपर्क में आते हैं तो शरीर से हिस्टामिन रिलीज़ होते हैं। और यही एलर्जी का कारण भी बनते हैं। हिस्टामिन एक रसायन है जो शरीर में एलर्जी की प्रतिक्रिय़ा स्वरूप पैदा होता है। यद्यपि यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पानी के संपर्क में आने से यह हिस्टामिन रिलीज़ कैसे और क्यों होता है। 
फ़िलहाल इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं ईजाद हो पाया है, लेकिन डॉक्टर कुछ उपचारों का सुझाव देते हैं जो लक्षणों को राहत देने में मदद कर सकते हैं। यानी कि उपचार नहीं… केवल राहत! सबसे आम उपचारों में एंटी-हिस्टामिन दवाइयां शामिल हैं, जो खुजली और सूजन को कम करने में सहायता करती हैं। साथ ही, फ्लेयर-अप्स के दौरान फोटोथेरेपी का भी उपयोग किया जा सकता है, जो त्वचा की ऊपरी परत को मोटा करता है और पानी को त्वचा में घुसने से रोकता है। अगर सांस लेने में कठिनाई होती है तो एपीपेन का इस्तेमाल भी किया जा सकता है, जो एड्रेनालाईन का एक ऑटो-इंजेक्टर होता है। मगर यह सब किसी एक्सपर्ट डॉक्टर की देख-रेख में ही किया जा सकता है। 
बचपन से एक किस्सा सुनते आए थे। अंग्रेज़ी में बताया जाता था। हिन्दी में कुछ यूं कहा जा सकता है – “मैं अपने पास जूते ना होने के लिये परेशान था, मगर मैंने एक इन्सान देखा जिसके पैर ही नहीं थे!” हम अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों से इतने परेशान हो जाते हैं कि यह सोच ही नहीं पाते कि कुदरत की सबसे बड़ी नियामत – पानी – भी किसी के लिये अभिशाप हो सकती है।
एरिज़ोना, अमरीका की 15 साल की एबीगैल बेक (Abigail Beck) की स्थिति बहुत ही विकट है। नहाना तो दूर, वह बेचारी तो पानी पी भी नहीं सकती। और तो और उसे रोने की भी अनुमति नहीं है क्योंकि वह अपने आंसुओं से भी एलर्जिक है। 
बेक का कहना है कि अगर वो बारिश में भीगती है या नहाती है तो ऐसा लगता है मानो किसी ने एसिड डाल दिया हो… उसका ये भी कहना है कि उसने एक साल से पानी का एक ग्लास तक नहीं पिया। पानी के बजाए वो एनर्जी ड्रिंक्स पीती है, अनार का जूस पीती है। उसे रीहाइड्रेशन टेबलेट दी जाती है और स्थिति अधिक विकट हो जाए तो उसे ग्लुकोस की तरह तरल पेय चढ़ाए जाते हैं। 
अपने इस संपादकीय के लिये शोध करते हुए एक हैरान करने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि जितने मामले मुझे पानी से एलर्जी के दिखाई दिये, वे तमाम औरतों को लेकर ही हैं। शायद इस बात पर अलग से शोध करना होगा कि क्या यह बीमारी केवल महिलाओं को होती है… क्या पुरुषों का डीएनए कुछ अलग किस्म का होता है जिस कारण उन्हें इस समस्या का सामना नहीं करना पड़ता। 
पुरवाई के पाठकों के सामने एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारा उद्देश्य आपको चौंकाना नहीं होता। हमारा उद्देश्य होता है कि आपको जीवन के उन अनसुने, अनछुए पहलुओं से परिचित करवाना जिनके बारे में आपको कम या नगण्य जानकारी है। हो सकता है कि आप में से कुछ पाठकों ने इन स्थितियों के बारे में कुछ सुन रखा हो या पढ़ रखा हो, मगर हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि आपको इन मुद्दों की याद दिलाते चलें। अब अगले सप्ताह तक पुरवाई का संपादकीय और रचनाएं पढ़ते रहें और अपनी प्रतिक्रिया लिखते रहें।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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57 टिप्पणी

  1. रौंगटे खड़े हो गए : मुझे जरा सा धूल, ठंड, गन्ध से एलर्जी होती है तो परेशान होती हूँ : यह तो कल्पना से परे स्थिति है…

  2. किन किन अद्भुत तकलीफों से आदमी गुज़रता है। बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने।पर अपने यहां (अंग्रेजों के आने के पहले और शायद बाद मे भी) alergi या ऐसी ही बिरले होने वाली बीमारियों का dignose, भूत प्रेत चुड़ैल का प्रभाव या साया मान कर उनका इलाज बाबाओं और ओझाओं को सौंप दिया जाता था। और मरीज़ कभी ठीक नहीं हो पाता था

  3. बहुत ही विचित्र, पहली बार सुना। इस विषय पर आपके द्वारा दी गई जानकारी को साझा कर रही हूँ

  4. सच में पहली बार यह जानकारी मिली, हैरानी हुई, दुख भी हुआ कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों का जीवन कितना कठिन होगा! अद्भुत तथ्यों से भरी संपादकीय को सलाम

  5. पु lरवाई के संपादकीय, लगभग हर विषय पर केंद्रित होकर उसके पाठकों को सदैव नई जानकारी से और संभावित समाधानों से लैस भी करते हैं।
    इस बार का संपादकीय न केवल लोकप्रिय विज्ञान या सही अर्थों में कहीं तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता हुआ है ।और यह भी एक अजीबोगरीब स्थिति है कि पानी से एलर्जी!? इस पर विस्तृत अनुसंधानित चर्चा इस संपादकीय में की गई है । ईमानदारी से जहां इस अनुसंधानित संपादकीय में कहीं कोई ऐसे मोड़ आते हैं जहां पर आगे बताना संभव नहीं है तो यह भी लिख दिया गया है कि इस पर रिसर्च हो रही है या आगे होगी।
    यह चौंकाने वाली बात है कि पानी से एलर्जी के जितने भी कैसे दिखाई दिए हैं उनमें से अधिकतर महिलाएं हैं ।पुरुषों पर अलग से रिसर्च चल रही है। तिस यह भी एक त्रासदी विडंबना या कोई भी और शब्द, नहीं ,,,
    पानी जैसी जीवनदायनी शक्ति कुछ चंद लोगों के लिए एलर्जी का कारण है और भयावह परिणाम देती है।
    पुरवाई संपादकीय को इतना बेहतर वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण बनाने और औचित्य पूर्ण बनाने के लिए आदरणीय अग्रज श्री तेजेंद्र शर्मा जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं

  6. एक अद्भुत बीमारी का ज्ञान हुआ
    एलर्जी का हिंदी शब्द ” प्रत्यऊर्जता “है
    (आयुर्वेद में )
    स्त्रियों को जो बीमारियां होती हैं और पुरुषों को नहीं होतीं उसका कारण एक ये भी है कि वे प्रकृति की सृजनकर्ता हैं अंकुरण धरा से ही
    प्रस्फुटित होता है । जिसके पास बहुतकुछ होता है उसी के पास कुछ होता है ।
    क्षमा सहित
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी, मैंने सोचा कि मैं इसे ‘जल-पित्ती’ कहूं। मगर अब ‘एलर्जी’ इतना जाना पहचाना शब्द बन चुका है कि विचार त्याग दिया। आपकी टिप्पणी हमेशा की तरह सराहनीय है।

  7. सचमुच आपकी संपादकीय के माध्यम से दी गई जानकारियां संवेदनशील और महत्वपूर्ण होती हैं।यह तो अनसुना सा लगता है.कि जहां अनेक बीमारियों का इलाज पानी से है वहीं पानी ही किसी के लिए एलर्जिक और जानलेवा बन जाता है।ऐसा ही एक संक्रमण यहां यूपी बिहार में देखा जाता है जो पानी से ही होता है,उसमें.भी त्वचा का लाल होकर चाहते पड जाते हैं,तेज खुजली और जलन होती है,।इसे स्थानीय भाषा में जुलपित्ती* कहते हैं।और इसका इलाज शायद सिंदूर तेल लगाकर गर्म कंबल ओंढाकर तीन चार दिन में ठीक हो जाता है।पर यह बेहद मामूली माना जाता है ।पर आपने जो जानकारी दी वह चौंकाती तो है ही डराती भी है।पानी तो जीवन का अमृत है भला वह विष कैसे हो गया? यह मेडिकल साइंस के लिए भी एक चुनौती है।बहुत बहुत आभार भाई आपने इतनी महत्वपूर्ण बीमारी की जानकारी दी।अशेष धन्यवाद, साधुवाद। सादर प्रणाम भाई।……..पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • पद्मा आप पुरवाई का हर संपादकीय पढ़ती हैं और उस पर सार्थक टिप्पणी करती हैं। आपने ‘जुल-पित्ती’ का रेफ़रेंस दे कर संपादकीय को और स्पष्ट किया है। आभार।

  8. एक नया विषय ! एक नई जानकारी !! संपादक महोदय ! मैं अपने विद्यार्थियों से इस विशेष संपादकीय के प्रति बताऊंगा। यह पाठक को चौंकाता भी है और ज्ञानवर्धन भी करता है। आपका आभार !!

  9. आदरणीय तेजेंद्र सर का संपादकीय हमेशा नवीन जानकारी से पूर्ण होता है। यह विवरण पानी की एलर्जी, उसकी रासायनिक प्रक्रिया और वैज्ञानिकों को एक चुनौती पूर्ण विषय देने की अहम भूमिका प्रदान करता है। सही कहा कि गनीमत है कि पानी पीने पर कोई दिक्कत नहीं होती अन्यथा जीवन और मुश्किल हो जाता।
    बहुत धन्यवाद

    • प्रिय पद्मा आपका स्नेह महत्वपूर्ण है। आपकी टिप्पणी हमेशा सारगर्भित होती है।

  10. वास्तव में विचित्र किन्तु सत्य… चकित करती जानकारी। ईश्वर उनके लिए किसी चिकित्सा की खोज को सम्भव बनाए। नए आयाम दिखाते, भरपूर जानकारी देते संपादकीय के लिए बधाई और धन्यवाद।

    • शैली जी, बहुत शुक्रिया। इस अंक में आपका बेहतरीन लेख भी प्रकाशित हुआ है। वरिष्ठ नागरिकों के बारे में जो आपने लिखा है, सबको पढ़ना चाहिए।

      • हार्दिक आभार sir, आपका उत्तर महत्वपूर्ण है।

        आपने मेरे लेख को स्थान दिया और उसका पुनः उल्लेख किया, विशेष धन्यवाद।
        अभी तक बहुत सी प्रतिक्रिया आईं लेकिन जाने क्यों लिखने वाले, पत्रिका पटल पर कम और निजी संदेश अधिक भेज रहे हैं। संभवतः प्रतिक्रिया में भी taboo अपना काम कर रहा है। परन्तु मुझे आशा है कि इस विषय पर कुछ विचार विमर्श आरम्भ होगा। पुनः धन्यवाद।

        • शैली जी अब इस विषय पर खुल कर बात होने लगी है। मगर मैं और अधिक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

  11. इन्हें आकर एक डुबकी महाकुंभ में लगा लेनी थी।

    मैने सही में कभी पानी से एलर्जी के बारे में नहीं सुना था। जानकारीपरक लेख । एलर्जी की हिन्दी है तो – मगर सुगम्य नहीं। एलर्जी ही हिन्दी में भी ठीक है। वैसे आम लोग यह कहते हैं कि फलां फलां चीज हमें सूट नहीं करती। अब यहां भी सूट शब्द अंग्रेजी है। एलर्जी ही ठीक है।

    • अरविंद भाई आप तो जानते हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं। हर रोज़ कोई नई जानकारी हासिल होती है। और मेरा काम है कि जो भी नई जानकारी हासिल हो, आप सब तक पहुंचा दूं।

  12. ये हैरान करने वाली जानकारी है, साथ ही चिंता भी बढ़ाती है। सामान्य तौर पर प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। पहले बच्चे धूल मिट्टी में खूब खेलते थे फिर भी स्वस्थ रहते थे। आज जरा सी धूल हो, अधिकांश को छींके आने लगती है। अब ये पानी से एलर्जी, पहली बार सुना। उनके प्रति संवेदना।

  13. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    आपके संपादकीय का उद्देश्य चौंकाना नहीं होता है पर विषय चौंका ही देता है। आज के संपादकीय ने तो पता नहीं कितने वॉट का झटका दिया।
    सबसे पहले आपकी तारीफ शीर्षक के लिये – *पानी जो अगन लगाए*
    एलर्जी तो हमने कई प्रकार की सुनी है हमारी खुद की बहू को डस्ट एलर्जी है। बेचारी छींकती रहती है जरा भी धूल का काम हो तो। पर उसका ट्रीटमेंट है आजकल एलर्जी की जाँच हो जाती है और पता चल जाता है हमने सुना है।
    पर 15 साल की छोटी सी बच्ची को इतनी कम उम्र में पानी की इस भयंकर प्रॉब्लम से जूझते हुए देखकर बहुत तकलीफ हुई। एकदम अकल्पनीय सा किन्तु सत्य है यह।

    बीमारी को लेकर आपने जो वैज्ञानिक जानकारी जुटाई है वह काबिले तारीफ है।
    आयुर्वेद में कहा जाता है कि जितनी भी बीमारियाँ हैं उसके मूल में तीन चीजें हैं कफ़,वात और पित्त।
    एलर्जी के कारण जो रिएक्शन होते हैं लाल लाल चिट्ठे पड़ जाना फूल जाना, खुजाल मचना तो उसके लिए कहा जाता है कि पित्त हो गया या पित्ती हो गई। घरेलू उपचार में उसे पानी से भी बचाया जाता था, ठंडी चीजों से भी और कंबल उढ़ा कर रखा जाता था। गेरू के भजिए बनाकर भी खिलाने से भी आराम लगता है। बेसन के जो भजिये बनाते हैं उसमें गेरू मिल लेते हैं थोड़ा सा। यह इलाज तो हमने हमारे घर में हमारे जेठ को करते हुए देखा है और इससे उन्हें आराम भी लगता था।
    आपके आज के संपादकीय ने हमें हमारी एक सीनियर की याद दिला दी। वह दसवीं में नई -नई आई थी। पहली बार हमने एलर्जी शब्द तब सुना था। उसके बदन का कोई भी हिस्सा जरा सा भी दब जाता था तो उतनी जगह फूल जाती थी अगर वह पेंसिल से हल्के से भी अपने हाथ पर अपना नाम लिख ले तो उसका नाम उछल जाता था। कहीं खुजाल मचे तो खुजा सकती ही नहीं थी उतनी जगह फूल जाती थी। बहुत कम नहाती थी ,जरा से पानी से।
    उस समय हम लोग सीनियर लोगों से ज्यादा बात नहीं करते थे।
    पर पानी से थोड़ी बहुत प्रॉब्लम उसे भी थी हम लोगों ने उसे इतना सीरियसली कभी नहीं लिया क्योंकि टाइम टेबल इतना टाइट रहता था कि कहीं और देखना संभव ही नहीं था।
    आज हमें याद आ रहा है उसका नाम नीना बलेचा था। बहुत गोरी और सुंदर सी लड़की थीं नीना जी! जब 11th में थी तो उसे हम लोगों ने टाइटल दिया था-
    वह दिल्ली की थीं। आज आपके संपादकीय ने उसकी तकलीफों की गंभीरता से परिचय कराया।
    हम सोच रहे हैं कि अपन कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान ने अपने को स्वस्थ शरीर दिया है। बाकी छोटी-मोटी परेशानी और तकलीफें, बीमारियाँ तो आती रहती हैं। ईश्वर अगर मनुष्य का जीवन देता है तो अच्छा दे वरना ना दे तो ही बेहतर।
    वैसे सिर्फ जलन की अगर बात है आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक में जलन को रोकने के लिये काफी अच्छी दवाइयाँ है।पर भरोसा होना चाहिये। हो सकता है एलोपैथी में भी हो लेकिन हम नहीं जानते।
    आज आपके संपादकीय ने हमें बहुत शॉक्ड किया।
    ईश्वर सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।
    उम्मीद करते हैं कि वैज्ञानिक जल्द ही इस समस्या का समाधान ढूंँढ निकालेंगे।
    संपादकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय पर जानकारी देने के लिए तेजेन्द्र जी का तहेदिल से शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार तो बनता ही है।

  14. जितेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय ने तो दिमाग की सारी जड़ें हिला दीं। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी को पानी से भी एलर्जी हो सकती है। वो पानी जो जिस्म के हर हिस्से में बहुत बड़ी मात्रा में है उसी को छूने या पीने से एलर्जी; बौखलाने वाली बात है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस बीमारी का शीघ्र ही कोई तोड़ अवश्य निकलेगा और जो लोग इस पीड़ा से पीड़ित हैं उन्हें जल्दी छुटकारा मिलेगा। इस सम्पादकीय के लिये बहुत बहुत साधुवाद जितेन्द्र भाई।

  15. भाईसाहब आप हमेशा ही गहन चिंतन और नवीन विषय पर संपादकीय लाते हैं। पत्रिका पढ़ना ज्ञान वर्धक हो जाता है। बहुत ही शानदार संवेदनशील होता है आपका लेखन।आप सदैव सक्रिय रहे नये विषय पाठकों के सामने रखते रहे। ऐसी शुभकामनाएं । वैसे हम पत्रिका का में स्थान नहीं पा सके। मगर आपका पुरवाई पत्रिका का संसार ऐसे ही प्रगति करता है ऐसी कामना करते हैं। अगले अंक की प्रतीक्षा में…..
    मंजू किशोर’रश्मि’ कोटा राजस्थान

  16. ‘पानी में अगन लगाए’ संपादकीय में तेजेन्द्र शर्मा जी ने मानव की एक नई बीमारी के बारे में जानकारी दी है। ऐसी बीमारियों को पढ़ सुनकर मन अजीब सा हो जाता है। बाद में सोचता हूं कि बीमारी है, उसका क्या? कभी भी, किसी को भी हो सकती है। देह है तो बीमारी भी होगी। आंखें बन्द करने से तो समस्या का हल नहीं है न।
    ये संपादकीय ऐसा है कि भुलाए न भूलेगा। छोटी सी बच्ची को पानी से अलर्जी? मानव को क्या-क्या देखना पड़ता है कुछ कहा नहीं जा सकता है। मानवीय जीवन से संबंधित आप जो विषय उठाते हैं वे सचेत तो करते ही हैं, नई जानकारी भी कराते हैं। अच्छा लिखा है आपने।
    इस संवेदनशील, जनहितकारी संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

  17. भाई लखनलाल पाल जी, मैं भारतीय ज्ञान परंपरा से थोड़ा अलग सोचता हूं। मेरा मानना है कि सुपात्र और कुपात्र की चिंता में समय ख़राब ना किया जाए। जो नई जानकारी मुझे मिले अपने तमाम पाठकों के संग साझा करूं…

  18. हम एक रहस्यमय सृष्टि में रहते हैं जहां बहुत कुछ अनछुआ, अनकहा, अनदेखा है। आप नए-नए विषय पर अपने विचार रखते हैं, जागरुक करते हैं, बहुत अच्छी बात है। शुभकामनाएं

    • संगीता जी आप जैसे जागरूक पाठक संपादकीय पढ़ते हैं और उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, यह हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है। धन्यवाद।

  19. आपके संपादकीय से नई-नई जानकारी प्राप्त होती है। यह एक अद्भुत तथ्य है कि कुछ लोगों को पानी से एलर्जी है। हम गर्म देश में रहने वाले लोग हैं हमें तो गर्मी में दो बार नहाने की और बार-बार पैर होने की आदत है। ऐसे लोगों को कितनी परेशानी होती होगी ‌सोच कर हैरान हूं।आपने सच कहा कि हम अपनी छोटी-छोटी परेशानियों से विचलित हो जाते हैं किंतु ऐसे लोग भी हैं जिनके कासन कि हम कल्पना नहीं कर सकते। ‌ऐसी घटनाएं हमारे अपने कष्ट को कम करके आंने का संदेश दे जाती हैं। उपयोगी संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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