Wednesday, February 11, 2026
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लाइव आयोजनों में वक्ताओं को सुनने वाले न के बराबर होते हैं – प्रगति गुप्ता

प्रगति गुप्ता

जोधपुर की प्रगति गुप्ता पुरवाई की प्रतिष्ठित लेखिका हैं। अब तक उनके 6 कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह एवं एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। चंडीगढ़ के समाचारपत्र ट्रिब्यून में साहित्यिक समीक्षाएं लिखती हैं। प्रगति गुप्ता को बहुत से सम्मानों एवं पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है। वे अब तक लगभग 2000 हज़ार कविताएँ, 70 कहानियाँ, 75 से अधिक लेख व संस्मरण और 1700 से अधिक हाइकू  लिख चुकी हैं। पुरवाई टीम ने प्रगति गुप्ता से उनके साहित्य और आजकल के साहित्यिक माहौल के बारे में  बातचीत की… प्रस्तुत है पुरवाई के पाठकों के लिये…

प्रश्न 1. प्रगति जी आप कविता विधा से एक लंबे अरसे से जुड़ी हैं। आप कविताओं को तीव्र भावनाओं का सहज प्रस्फुटन समझती हैं या अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को कोई संदेश देना चाहती हैं?
उत्तर: मेरे दृष्टिकोण में कविता भावनाओं की सरल सहज अभिव्यक्ति है जो अनायास ही उतरकर अपनी ही लय संग बहती है। जिसके प्रस्फुटन का कारण कोई घटना या भाव हो सकता है, जो इंसान के मन-मस्तिष्क पर हावी होकर लिखने पर मजबूर करता है। जब समाज,परिवार, देश से जुड़ी कोई घटना कारक बनती है, तब संभव है वह किसी संदेश को भी सहेजे या दर्शाये।  
प्रश्न 2. प्रगति गुप्ता एक डॉ. परिवार में रह रही हैं; स्वयं भी रोगियों के लिये सलाह देने वाली काउंसलर है जो कि मरीज़ों के दिलों की थाह पा कर उन्हें परामर्श देती हैं। फिर यह साहित्य की ओर रुझान कैसे हुआ?
उत्तर: एक प्रबुद्ध परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा साहित्य से जुड़ाव हमेशा रहा। घर में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबिनी जैसी पत्रिकाएं नियमित रूप से आती थी। साथ ही घर की छोटी-सी लाइब्रेरी में आचार्य चतुरसेन शास्त्री, शिवानी, ओशो, शरद चंद्र, विमल मित्र, मुंशी प्रेमचंद्र…. जैसे प्रतिष्ठित  साहित्यकारों की पुस्तकों की उपलब्धता थी। घर में साहित्यिक माहौल था। माँ-पापा भी लिखते थे। हम भाई-बहन जो भी लिखते थे, उसकी खुल कर चर्चा होती थी। यह भी कहा जा सकता है कि मुझे लेखन विरासत में मिला। सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र में कविता से मेरे लेखन की शुरुआत हुई। विवाह उपरांत मेरा कार्यक्षेत्र मरीजों के बीच रहा। इससे मेरे लेखन को विस्तार मिला। मुझे कभी भी कहानियों और कविताओं के विषय खोजने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
प्रश्न 3. आपका बचपन आगरा में बीता और विवाह जोधपुर में हुआ। इन ऐतिहासिक नगरियों का आपके व्यक्तित्व पर कुछ ख़ास असर महसूस होता है क्या?
उत्तर: जैसा कि हम जानते हैं बचपन में हमारी भावनाएं और संवेदनाएं आकार ले रही होती हैं। जिस घर, स्कूल या शहर की संस्कृति में हम पल-बढ़ रहे होते हैं, वहाँ का खाना-पीना, आचार-विचार स्वतः ही हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनते जाते हैं। जिनकी छाप आजीवन रहती है। 
जिस शहर में हमारा कार्यक्षेत्र होता है, वहाँ जरूरतें जीविका से जुड़ी होती हैं। ऐसे में हम अपने व्यक्तित्व को पल्लवित करने के लिए सायास कुछ जतन करते हैं और कुछ बातें अनायास ही हमारे जीवन का हिस्सा बनकर हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालती हैं। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ। बहुत कुछ लिखने के बाद भी पहले कभी प्रकाशन का मन नहीं बना मगर बाद में मेरे कार्यक्षेत्र ने लेखन को न सिर्फ़ विस्तार दिया बल्कि पुस्तकों के रूप में मूर्तता भी दी।
प्रश्न 4. आज जबकि होलसेल में वेबिनारों का ऑनलाइन आयोजन हो रहा है, उन्हें आप किस नज़रिये से देखती हैं? क्या यह सृजन के लिये बेहतर है या किसी प्रकार की रुकावट पैदा कर रहा है?
उत्तर: कोरोनाकाल इस सदी का विषम काल है। सारी अर्थव्यवस्था गडमड हो जाने के बाद, ऑनलाइन काम चलने से कुछ संबल मिला है। साहित्यिक, सार्वजनिक या व्यावसायिक क्षेत्रों में वेबिनारों के होने से हर क्षेत्र में कुछ न कुछ गतिविधियां बरकरार रही। काफ़ी लोगों ने महसूस किया उनकी अभिव्यक्ति को मंच मिला है। लेखक मन के दवंद-अंतरदवंदों, विचारों और अनुभवों को कहने-सुनने में आसानी हुई। साहित्य के क्षेत्र की बात करें तो जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं, कहीं आने-जाने में असमर्थ थे उन्हें कहने-सुनने का मौक़ा इसी माध्यम से हुआ। साथ ही इन वेबिनारों की अति ने उकताहट भी दी है। आज हर व्यक्ति सोशल साइट्स पर अपना चैनल या अपनी वॉल से लाइव होकर वह परोस रहा है जिसकी समाज,परिवार या व्यक्ति विशेष के लिए भी कोई सार्थकता नहीं है। सब होड़ में गोड़ तोड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। 
ऐसे लाइव आयोजनों में वक्ताओं को सुनने वाले न के बराबर होते हैं। या श्रोता वीडियो ऑफ करके ऑडियो निम्नतम आवाज़ में चला छोड़ देते हैं। ताकि जिसने उसे बुलावा भेजा है, उसे उसकी उपस्थिति दिखती रहे। ऐसे में सृजन की दशा और दुर्दशा का अंदाज़ लगाया जा सकता है। 
प्रश्न 5. आपका एक उपन्यास और एक कहानी संग्रह भी हाल ही में प्रकाशित हुए हैं। कविता से अचानक कथा साहित्य की ओर रुझान कैसे बना?
उत्तर: यह सच है कि सर्वप्रथम मैं काव्य विधा से जुड़ी। मगर कुछ समय बाद ही डायरी विधा से भी जुड़ गई थी क्योंकि माँ डायरी लिखा करती थी। जो मुझे आकर्षित करता था। बारहवीं में एक नाटक भी लिखा। जिसका मैंने स्कूल में मंचन भी करवाया। 
मेडिकल क्षेत्र में काउन्सलिग से जुड़ने के बाद लगा कि संस्मरण और कहानी विधा को समझना होगा। जब मरीजों की समस्याएं बहुत बेचैन करती थी तब इस विधा से जुड़ना मेरी ज़रूरत बन चुकी थी। किसी भी समस्या या घटना को विस्तृत रूप से लिखकर ही मेरा मन शांत हो सकता था। काव्य विधा मेरी इस मानसिक ज़रूरत को पूरा नहीं कर सकती थी। 
गद्य विधा से जुड़ने के बाद आज सोचूँ तो काफ़ी कथानक मेरे सामने हैं। जो भविष्य में निमित्त के अधीन प्रकाशित होकर पाठकों के सामने आएंगे।
प्रश्न 6. प्रगति जी, आप तुलनात्मक रूप से एक छोटे शहर में रह रही हैं। आज प्रकाशन एवं आलोचना का मुख्य केन्द्र दिल्ली है। क्या दिल्ली से दूर रहना आपके साहित्यिक सफ़र में किसी प्रकार का अवरोध पैदा करता है?
उत्तर: आपकी इस बात शोचनीय है। मुझे लगता है कि लेखन में अगर दम है, तो उसकी गूंज दिल्ली तक जरूर पहुंचेगी। मेरा विश्वास कहता है कि मेरे निमित्त की इबारतें जिसने लिखी हैं, उसने राहें भी बना रखी होगी। अभी तो सिर्फ अपने भीतर उठ रहे कथानकों को आकार देना चाहती हूँ। निरंतर लेखन में सुधार भी लाना चाहती हूँ ताकि सबसे पहले खुद की नज़रों में खरी उतरूँ। 
प्रश्न 7. आज प्रकाशित हो रही कविता और कहानी की तुलना में आप अपने लेखन को कैसे अलग तरह से पेश करने का प्रयास करती हैं ताकि पाठक कह सकें कि यह लेखन कुछ हट कर है?
उत्तर: जहां तक मेरे काव्य विधा में लेखन की बात है, मैं कभी भी यह सोचकर नहीं लिख सकती कि आज कविता लिखने का मन है तो इस विषय पर कविता लिखी जाए। मेरी कविता स्वतः ही उतरती है, मुझे शब्दों के जोड़-तोड़ बैठाकर कविता रचना उचित नहीं लगता। जहां तक कहानियों का सवाल है सभी लेखक परिवार,समाज और देश में होने वाले घटित पर पैनी दृष्टि जमाए हैं। लेखन के लिए विषयों का चयन करते समय, जिस लेखक के पास सूक्ष्म दृष्टि और सोचने –लिखने का तरीक़ा भिन्न होगा, वही पाठक को बांधने में सफ़ल होगा। हमारी सोच, परिपक्वता और गहनता लेखन को खास बनाती है। कहानी के लिए विषय मिलते ही मैं काफ़ी समय उन सूक्ष्म बिंदुओं पर विचार करने में लगाती हूँ ताकि कुछ भिन्न तरीक़े से उसे आकार दे पाऊँ।   
प्रश्न 8. साहित्य में पुरस्कारों और सम्मानों के बारे में आपकी क्या राय है ? यह इल्ज़ाम लगाये जाते हैं कि सभी सम्मान और पुरस्कार पूर्व-नियोजित होते हैं। क्या आपके लेखन को समय-समय पर रेखांकित किया जाता रहा है?
उत्तर: समय-समय पर सम्मानों और पुरस्कारों के लिए बहुत कुछ कहा जाता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है कि उसे अपना लिखा हुआ या किया हुआ ही श्रेष्ठ लगता है। पुरस्कारों के लिए निर्णायक टीम के लिए भी पूर्णतः तटस्थ होकर निर्णय लेना आसान नहीं होता, कहीं न कहीं उनके स्वार्थ भी टकराते हैं। आज के समय हिसाब-किताब का समय बनता जा रहा है। साथ ही यह बात पूर्णतः सच भी नहीं कही जा सकती है। जहां तक मेरे लेखन का सवाल है वह सालों से चल रहा है मगर प्रकाशन बाद में हुआ। इस क्षेत्र से जुड़ने के बाद मेरी हर पुस्तक को न सिर्फ़ पाठकों का भरपूर प्यार बल्कि कोई न कोई सम्मान या पुरस्कार भी मिला है। 
प्रश्न 9. नारी विमर्श एक लंबे समय से साहित्य में एक मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आया है। ऐसा भी महसूस किया जा रहा है कि नारी विमर्श का अर्थ पुरुष से नफ़रत होता जा रहा है। क्या आपको लगता है कि केवल तथाकथित बोल्ड लेखन नारी विमर्श का सही प्रतिनिधित्व कर रहा है?
उत्तर: जैसा कि मैंने पूर्व प्रश्न के उत्तर में कहा कि आज का समय हिसाब-किताब का समय हो गया है। ऐसा ही कुछ स्त्री-पुरुष के संबंधों में भी हो रहा है। सब हिसाब-किताब रखने में निपुण होते जा रहे हैं। होड़ की इस लड़ाई में विचलन का कोई भी रूप सामने आ सकता है।
लेखक स्त्री हो या पुरुष उसका माइन्ड सेट क्या है, उसका लेखन उससे दिशित हो सकता है। साथ ही बोल्ड लिखना किसी विमर्श का एक अंश हो सकता है मगर सिर्फ़ यही स्त्री-विमर्श का प्रतिनिधित्व करे, मुझे समझ नहीं आता। स्त्री विमर्श हो या अन्य कोई और विमर्श अगर हम किसी भी बात का सिर्फ़ एक छोर पकड़ कर अपनी ही अपनी बात कहेंगे तो समस्या ज्यों की त्यों रहेगी, कोई हल नहीं निकलेगा। सतही बातों को लेकर कितने भी विमर्श कर लीजिए कोई हल नहीं निकलेंगे।
मैं विभिन्न विषयों और समस्याओं पर होने वाले विमर्शों को जरूरी मानती हूँ क्योंकि जब तक विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं पर विचार-विमर्श नहीं होगा उनके हल सामने नहीं आएंगे। मगर किसी शीर्षक के तहत होने वाला विमर्श मेरी समझ से बाहर है। यही वज़ह है कि मैं स्त्री या पुरुष बनकर नहीं लिख सकती सिर्फ़ लेखक बनकर समाज को देखती और लिखती हूँ। 
प्रश्न 10. विचारधारा के दबाव में लिखे गये लेखन के बारे में आपकी क्या राय है। क्या लेखक को अपने साहित्य को किसी राजनीतिक विचारधारा का वाहक बना लेना सही कहा जा सकता है?
उत्तर: मेरे दृष्टिकोण में अच्छा लेखन किसी भी विचारधारा के तहत नहीं हो सकता। किन्हीं विचारों के दबाब में किया हुआ कोई भी कार्य लेखनी पर बोझ बनकर, तटस्थ भावों और संवेदनाओं के प्रवाह को रोक देगा। किसी भी विषय पर लेखनी निर्बाध चलने के लिए यह बोझ उसे सामान्य नहीं रहने देगा। मैं किसी भी विचारधारा या विमर्श के तहत के लेखन को बाड़ खींचकर लिखना मानती हूँ, जो साहित्य के लिए अच्छा नहीं है।
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