विष्णु खरे विलक्षण कवि थे, विलक्षण चिंतक-आलोचक, विलक्षण फिल्म समीक्षक, विलक्षण वक्ता और एक खरे—बहुत खरे इनसान भी। हिंदी पत्रकारिता जगत के बड़े संपादक और विश्व साहित्य के अधिकारी विद्वान तथा एक बड़े अनवादक तो वे थे ही। उनके बारे में जब-जब सोचता हूँ, बस एक ही बात मन में आती है—उन जैसा कोई नहीं। उन जैसा शायद कोई और हो ही नहीं सकता था। इसलिए कि विष्णु खरे जो कहते थे, जो करते थे, जी-जान से कहते थे और करते भी थे। उसके पीछे उनकी आत्मा का समूचा बल होता था और ऐसा अद्भुत दुस्साहस, जो विष्णु खरे को हर तरह से हिंदी का दुर्जेय कवि साबित करता था। न उन जैसा तब कोई था और न अब, उनके जाने के कोई छह बरस बाद।
विष्णु खरे के जाने से हिंदी समाज और साहित्य जगत में बहुत कुछ रिक्त हुआ है, पर वह हमेशा रिक्त ही रहेगा। क्योंकि उसको भरने वाला कोई दूसरा विष्णु खरे दूर-दूर तक नहीं है। हो ही नहीं सकता। विष्णु खरे किस कदर दुस्साहसी थे, और कैसे सच्चे, ईमानदार और हर तरह के खतरे उठाने वाले जुझारू कवि, इसे उनके निकट के लोग कहीं बेहतर जानते हैं। और मैंने उन्हें किस कदर भीषण द्वंद्व के क्षणों में भी अंगद की तरह पाँव गड़ाए अडिग खड़ा देखा है, और कभी-कभी अपने इर्द-गिर्द के लोगों और समाज के वंचित तबके के दुख-दर्द और आत्मिक व्यथाओं से बुरी तरह विह्वल—बताने लगूँ तो शायद एक अलग संस्मरण बन जाएगा। या फिर एकदम अलहदा किस्म की पुस्तक ही।

उनके साथ होना बहुत कुछ का साक्षी होना था और कई बार तमाम विस्थितियों और विरूपताओं से टकराने का उनका अपार साहस रोमांचित करता था। युद्धभूमि में खड़े कर्ण सरीखे किसी महारथी के पराक्रम सरीखा। ऐसे क्षणों में किसी बड़े से बड़े अलमबरदार की उन्हें परवाह न होती थी, और जो कहना होता था, कहे बगैर वे रह ही नहीं सकते थे। संयोग से मैं ऐसे दो-चार नहीं, दर्जनों ऐतिहासिक पलों का साक्षी हूँ, और विष्णु जी के लिए मेरा सम्मान ऐसे भावनात्मक क्षणों में, जाहिर है, कुछ और बढ़ जाता था और अपने प्रिय नायक की जो प्रतिमा कोई चार दशकों से मेरे मन में थी, वह कुछ और बड़ी और महाकार हो जाती थी।
आज हिसाब लगाने बैठा तो पता चला, विष्णु खरे जो एक दुर्जेय मेधा के रूप में मेरे मन, मस्तिष्क और भाव-जगत पर पिछले चालीस बरसों से छाए हुए थे, उन्हें गुजरे कोई साढ़े पाँच बरस हो गए। पर वे विष्णु खरे जो एक लड़ाका कवि के रूप में मुझे युवाकाल से ही मोहते रहे हैं, वे अब सचमुच नहीं हैं, यह यकीन तो मैं आज तक नहीं कर पाया।
जब वे थे या उनकी दैहिक उपस्थिति थी, तब उनसे अकसर मुलाकातें होती थीं, पर आज तो वे हर क्षण मेरे साथ ही रहते हैं। जब-जब मैं उनकी कविताओं से गुजर रहा होता हूँ, उनकी लिखी गरमजोशी भरी चिट्ठियाँ पढ़ रहा होता हूँ, उनसे हुई बातचीत के विचारोत्तेजक क्षणों को याद कर रहा होता हूँ, या उनसे जुड़ी भावोष्ण स्मृतियों में आवाजाही कर रहा होता हूँ, तो एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाता हूँ, जहाँ बाकायदे विष्णु खरे से मेरी अंतहीन बतकही चल पड़ती है। तभी एकाएक किसी चमत्कार की तरह उनकी कविताओं के छिपे हुए अर्थ खुलने लगते है, और वहाँ से जीवन की नई-नई राहें निकलने लगती हैं। कई उलझे हुए प्रश्न सुलझने लगते हैं। साथ ही आगे काम करने की नई शक्ति और ऊर्जा भी मिलती है। और क्या मैं बताऊँ कि एक बार उस सम्मोहक दुनिया में पहुँचने के बाद देर-देर तक वापस लौटने का मन नहीं होता। इसलिए कि वहाँ मैं और विष्णु खरे, विष्णु खरे और मैं एक गहन संवाद की स्थिति में होते हैं।
और ऐसा तो बहुत होता है कि मैं उनके साथ गुजरे पलों के बारे में सोच रहा होता हूँ, तभी एकाएक उनकी चिरपरिचित भंगिमाओं तथा मुसकान के साथ ही एकदम अलग पहचानी जाने वाली आवाज सुनाई देती है, प्रकाश जी, आप कैसे हैं…?’
जब वे थे तो महीने में कोई चार-पाँचेक फोन तो उनके जरूर आते थे, और हर बार शुरुआत यहाँ से होती थी, प्रकाश जी, आप कैसे हैं…?’ और फिर देखते ही देखते उसमें साहित्य जगत ही नहीं, पूरे जमाने के हाल-चाल, सुख-दुख और विडंबनाएँ शामिल हो जाती थीं। अपने प्रिय और सुपरिचित लेखकों के बारे में जरूरी सूचनाएँ भी, जिनकी बराबर टोह लेना विष्णु खरे को प्रिय था, और लेखक होने का दायित्व भी लगता था। इसके साथ ही, जो उनके भीतर-बाहर चल रहा होता, वह सब कुछ तो इस लंबी और विस्तृत बातचीत में आता ही था। वे जर्मनी या किसी और देश के लंबे प्रवास पर हों, तब भी उनके फोन जरूर आते थे, और वे अपने काम-काज, मनःस्थिति और अपने भीतर आकार ले रहे बहुत तरह के अनुभवों और विचारों से अवगत जरूर कराते थे। 

 

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि वे न जाने क्यों, मुझे हर चीज में साझीदार बनाना चाहते थे। शायद उन्हें लगता था कि जो कुछ वे मुझे बताएँगे, वह पूरी तरह महफूज रहेगा, और मेरे दिल की डायरी में दर्ज होकर कभी न कभी किसी न किसी रूप में दर्ज होगा। महाभारत में संजय के वृत्तांत की तरह। संजय बेशक महाभारत का कोई महत्त्वपूर्ण पात्र नहीं, पर पूरी महाभारत तो आखिर वही सुनाता है।
वाणी प्रकाशन से सन् 2004 में विष्णु जी पर मेरा बृहत् ग्रंथ प्रकाशित हुआ था, एक दुर्जेय मेधा विष्णु खरे। मजे की बात यह कि विष्णु जी को कतई पता न था कि उन पर कोई पुस्तक आ रही है। पर पुस्तक उन्होंने देखी तो अवाक रह गए थे। उन्हें यह बृहत् ग्रंथ इस बात की मिसाल लगता था कि बिल्कुल चुपचाप रहते हुए, कितने समर्पण और गहराई के साथ काम किया जा सकता है। विष्णु खरे की विलक्षण शख्सियत के साथ-साथ एक बड़े चिंतक, आलोचक और नवभारत टाइम्स सरीखे पत्र के संपादक के रूप में उनका काम, उनकी कविताओं, अनुवाद-कार्य पर विस्तृत लेख, सब कुछ इस पुस्तक में था। 
मेरे ये लेख प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में बड़ी धज से छपे थे। पुस्तक में वे पहली बार एक साथ सामने आ रहे थे। साथ ही उनसे अलग-अलग समय पर लिए गए मेरे तीन बड़े ही विचारोत्तेजक इंटरव्यू भी, जिनमें एक तो पहल में छपकर बेहद चर्चित हुआ था। हालत यह थी कि जिन लोगों के पास पहल का वह अंक नहीं पहुँचा, उन्होंने फोटोस्टेट करवाके उसे पढा था, और उस दौर के प्रायः सभी चर्चित लेखकों, पाठकों की लिखी ऐसी चिट्ठियों की तो भरमार थी, कि मनु जी, ऐसा इंटरव्यू हमने आज तक नहीं पढ़ा! अब मैं उन्हें क्या बताता कि इंटरव्यू तो मैंने बहुत लिए हैं, और ज्यादातर हिंदी के शिखर साहित्यकारों के ही इंटरव्यू हैं, पर विष्णु खरे से लिया गया इंटरव्यू उनमें सबसे अलहदा इसलिए है कि विष्णु खरे जब भी बोलते हैं, अपने पूरे आत्मिक बल और तेजस्विता के साथ बोलते हैं, और अंदर तक पूरी तरह कन्सर्न्ड होकर बोलते हैं। 
अलबता एक दुर्जेय मेधा विष्णु खरे पुस्तक की एक खास बात यह थी कि वह उनके चौंसठवें जन्मदिन पर आई थी और पुस्तक के आने से पहले उन्हें आभास तक न था कि ऐसा कुछ किया जा रहा है। मैंने जब वाणी प्रकाशन के भाई अरुण माहेश्वरी से इस पुस्तक के बारे में बात की तो उन्होंने मुसकराते हुए कहा, पुस्तक हम जरूर प्रकाशित करेंगे प्रकाश जी, पर आप विष्णु जी से इस बात की चर्चा न करें कि उन पर यह पुस्तक आ रही है। हम उन्हें सरप्राइज देंगे!” 
यह बात मुझे भी दिलचस्प लगी थी। मैंने कहा, ठीक है, अरुण भाई, मंजूर!” और फिर किताब आई और इतनी सुंदर धज के साथ आई कि पूरे हिंदी साहित्य जगत में इसका नोटिस लिया गया। मंगलेश डबराल और चंद्रकांत देवताले सरीखे हिंदी के बड़े कवियों ने पुस्तक पर बधाई देते हुए कहा कि विष्णु खरे पर यह निराली पुस्तक है, जैसे विष्णु खरे स्वयं हैं!” 
बहुतों ने आश्चर्य जताया कि विष्णु खरे से संबंधित कितना कुछ एक साथ इस पुस्तक में आ गया। उनके जीवन, साहित्य और शख्सियत का कोई पहलू छूटा नहीं। भला ऐसा मेरे लिए कैसे संभव हुआ होगा? ऐसे सवालों पर, जाहिर है, सिर्फ मुसकराकर रह जाना ही काफी था।
सच तो यह है कि मैं एक बार विष्णु खरे के सम्मोहन की लपेट में आया तो फिर कभी नहीं निकल पाया। वे ऐसे ही थे। उनका प्रभाव विकट था। ऊपर से बहुत खुरदरे लगते हुए भी वे भीतर से कितने कोमल, संवेदनशील और भावार्द्र थे, उन्हें कोई बहुत निकट का आदमी ही जान सकता था।…और मैंने उनकी आँखों में आँसू देखे हैं। मैंने उन्हें चुपचाप आँसू पोंछते और रोते देखा है।
ऐसे क्षण जब शब्द साथ छोड़ देते हैं, और देर तक बस चुप्पी से ही आप संवाद करते हैं।
भला कौन यकीन करेगा कि ऊपर से बड़ा कठिन-कठोर और चटियल सा नजर आने वाला यह हिमालय पिघलता था, तो किस कदर पानी-पानी हो जाता है।
आज जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ, सब कुछ एक साथ याद आ रहा है, और मेरी आँखें नम हैं।
यादों की एक पूरी फिल्म है। अंतहीन। जिसमें कहीं द ऐंड नहीं।
पिछले दो दशकों से तो हालत यह थी कि वे देश में हों या विदेश में, कोई हफ्ते या पंद्रह-बीस दिनों में उनका फोन जरूर आ जाता था। बड़े भाई सरीखी करुणा और पारिवारिक भावना के साथ वे मेरा हालचाल पता करते थे और जिस मनःस्थिति में वे जी रहे होते थे, उसे भी कुछ-कुछ बयाँ कर जाते थे। या फिर मेल से पत्राचार करके वे इस दूरी को पाटते थे।…और मझे इंतजार रहता था, अब विष्णु जी का फोन आएगा, या मेल से कोई संदेश। और वह आता था। 
यों विष्णु खरे केवल कवि नहीं थे। कवि होने के साथ-साथ वे सुविख्यात आलोचक, अनुवादक और बड़े ही मौलिक किस्म के चिंतक भी थे। आप कह सकते हैं, एक भीषण दुःसाहसी चिंतक, जो हर तरह का खतरा उठाकर भी अपनी बात कहते थे। और जैसे कहनी होती थी, जिस जोर और बलाघात के साथ, वैसे वे कहते थे। और इससे दूर-दूर तक एक गूँज पैदा होती थी। बहुत से लोग बिदकते थे। कई बार तो बिल्कुल उनके आजू-बाजू के लोग भी नाराज हो जाते थे। निकटतम मित्र भी। 
कबीर को लेकर उनसे एक लंबा इंटरव्यू मैंने किया। कोई साठ-सत्तर पन्ने का वह नदी की तरंगों की तरह बहता हुआ बहु-आयामी, व्यापक इंटरव्यू है। उसमें कबीर के बहाने जो खरी और बेलौस बातें उन्होंने कहीं, वे ऐसी ही थीं, जो मौजूदा दौर के बहुत से अवसरवादी साहित्यिकों पर मर्म प्रहार करती थीं। एकदम तिलमिला देने वाली। कबीर पर बोलते हुए वे सचमुच आज के कबीर लग रहे थे, और उनसे बातचीत करते हुए, मैं भीतर एक थरथराहट सी महसूस कर रहा था।
चित्रकार हुसैन के मामले में लिखी गई उनकी बेबाक टिप्पणी पर भी ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने हुसैन के रामायण शृंखला के चित्रों को अश्लील और आपत्तिजनक बताया तो अच्छे-अच्छे खाँ सनाका खा गए। खासकर रावण द्वारा सीता का हरण करके ले जाने वाले प्रसंग को तो हुसैन ने बहुत खराब ढंग से दर्शाया था, जिसमें सीता जी की मर्यादा और करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं का जरा भी खयाल नहीं रखा गया था। विष्णु जी की सबसे ज्यादा आपत्ति इसी चित्र को लेकर थी, जबकि उनके अनुसार, इस शृंखला के ज्यादातर चित्र कला की स्वच्छंदता के नाम पर मर्यादाहीनता की मिसाल थे। ऐसे में विष्णु जी का सवाल था कि हुसैन को हिंदू देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का इस कदर निर्लज्जता से मखौल उड़ाने का क्या हक है? क्या वे ऐसी छूट अन्य धर्मों—मसलन, मुसलिम या ईसाई धर्म की आस्था, धार्मिक प्रतीकों और उनके सम्मान्य धार्मिक पात्रों के साथ भी ले सकते हैं? तो क्या हिंदू धर्म की आस्था और धार्मिक प्रतीकों के साथ कला के नाम पर कुछ भी छेड़छाड़ करने का अधिकार उन्हें सिर्फ इसलिए मिल जाता है कि हिंदू उदार होते हैं, और शांत रहकर बहुत कुछ सह लेते हैं! पर यह तो हिंदुओं की उदारता और सहनशीलता का मजाक उड़ाना ही है कहा जाएगा!
आम जनता तो हुसैन के इन चित्रों का तीखा विरोध कर ही रही थी, पर भला विष्णु खरे सरीखा कला मर्मज्ञ भी उनका विरोध करेगा? बहुतों को यह पच नहीं रहा था। यहाँ तक कि बड़े लज्जास्पद ढंग से उन्हें छद्म हिंदूवादी कहकर लांछित करने की भी कोशिश की गई। जिन्हें प्रगतिशीलता का क, ख, ग भी नहीं पता, वे विष्णु खरे की प्रगतिशीलता पर शंका करने लगे। पर उन्हें परवाह न थी। सच के आगे वे किसी की परवाह नहीं करते थे, और जो कहना होता था, हर तरह का खतरा उठाकर भी कहते थे। डंके की चोट कहते थे। और असल में तो जिस सच के लिए खतरा न उठाना पड़े, उसे वे सच ही नहीं मानते थे। सत्य पर लिखी गई अपनी एक बहुचर्चित कविता में उन्होंने बड़े बेलौस ढंग से यह बात कही भी है। 
और इसके साथ ही, विष्णु खरे पत्रकारिता जगत के एक गौरवशाली स्तंभ थे। एक बड़े और सतेज संपादक। सही मायने में एक तेजस्वी संपादक, जो जब चाहे वक्त में टंकार पैदा कर देते थे। नवभारत टाइम्स में उनके दौर की पत्रकारिता पर चर्चा के बगैर समकालीन पत्रकारिता पर बात की ही नहीं जा सकती।…हालाँकि सच तो यह है कि उनके इन सभी रूपों पर उनके कुछ-कुछ खुरदरे और जुझारू कवि-व्यक्तित्व की छाया थी। मानो ये सभी उनके विलक्षण कवि-व्यक्तित्व के ही आनुषांगिक रूप हों।
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विष्णु खरे से मेरी पहली मुलाकात कोई निसफ सदी पुरानी है। हालाँकि यह मुलाकात उनकी कविताओं के जरिए हुई थी।…याद है कि सन् 1975 में, जब कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में मैं शोध कर रहा था, तब अपने एक अनन्य मित्र ब्रजेश भाई से लेकर उनका पहला कविता-संग्रह पढ़ा था। अशोक वाजपेयी के द्वारा संपादित पहचान सीरीज की कुल सोलह पृष्ठों की एक छोटी सी पुस्तिका, विष्णु खरे की कविताएँ। और वे कविताएँ पढ़ते हुए मैं अंदर-बाहर से बदल गया था। ताज्जुब हुआ था कि अरे, कविताएँ इतनी खुली, इतनी बेबाक और मर्मभेदी भी हो सकती हैं, जो आपको भीतर तक थरथरा दें…और आपको नए सिरे से सोचने ही नहीं, नए सिरे से जीने की भी चुनौती दें। ऐसी कविताएँ मैंने पहले कभी पढ़ी न थीं। कविताएँ ऐसी हो भी सकती हैं, सच पूछिए तो मैंने कभी इससे पहले कल्पना ही न की थी। वह मेरा, एक अर्थ में, पुनर्जन्म था। एक लेखक, एक कवि, एक साहित्यिक और एक मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म। विष्णु खरे को पढ़ने के बाद मैं वह नहीं रहा था, जो पहले था।…
मुझे अब भी याद है, ब्रजेश भाई ने उसी छोटी सी पुस्तिका से विष्णु खरे की कविता दोस्त पढ़कर सुनाई थी, जो एक पुलिस अधिकारी पर लिखी गई थी। ब्रजेश भाई की सुती हुई आवाज के साथ ही कविता की लगभग गद्य सरीखी लंबी सतरें हॉस्टल के उस कमरे में मानो हवा और दीवारों पर भी दर्ज होती जा रही थीं। एक अजब सी लय के साथ। 
ब्रजेश भाई की आवाज में एक टंकार है, पर उस कविता में क्या कम टंकार थी, जिसे सुनते हुए मैं एक और ही दुनिया में पहुँच गया था। कविता की वह ऐसी दुनिया थी, जिसमें शब्द वक्त की छाती पर दर्ज होकर अपनी बात कहते हैं, और यथार्थ में अंदर तक धँसकर जीवन की किसी विरल सच्चाई को ठीक हमारी आँखों के आगे लाकर रख देते हैं।…
याद आता है, नवें दशक में जब मैं हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रिका नंदन में आया, तो नवभारत टाइम्स में विष्णु जी से मिलने गया। और जब मैंने पहचान सीरीज की उनकी कविताओं और मन पर पड़े प्रभाव की चर्चा की, तो वे किंचित अवाक् और विस्मित से हुए थे। बहुत देर तक बात चली, कोई डेढ़-दो घंटे। ऐसी तन्मयतापूर्ण बातचीत, जिसमें आपको समय का कुछ होश नहीं रहता। और फिर उन्होंने बड़ी सहृदयता से एस.पी. सिंह, मधुसूदन आनंद समेत अपने कई संपादकीय सहकर्मियों से मुझे मिलवाया था।
वह एक विरल और हमेशा याद रहने वाली आत्मीय मुलाकात थी। मैं उन्हें सत्यार्थी जी पर एक संस्मरणात्मक लेख देकर आया था, जिसे उन्होंने नवभारत टाइम्स में बड़े प्रमुख रूप में छापा था। फिर ऐसी ही तीन-चार और खुली, अंतरंग मुलाकातें, जिनकी सुवास अब भी मन में है।
कुछ समय बाद विष्णु खरे नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक नियुक्त हुए और उन्होंने अखबार को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप साहसी कलेवर और एक नई चमक दी। इस दौर में उनसे मिलना तो नहीं हुआ पर मैं बड़ी रुचि से अखबार देखता था, जिसके हर पन्ने पर विष्णु जी के सुरुचिपूर्ण संपादन की छाप थी और यह मुझे अच्छा लगता था। 
फिर विद्यानिवास मिश्र नवभारत टाइम्स के संपादक नियुक्त हुए, तो बहुत कुछ एक साथ बदला। पता चला, विष्णु खरे नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण के स्थानीय संपादक होकर, वहाँ चले गए हैं। फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि परिस्थितियाँ इतनी जटिल होती गईं कि अपने वैचारिक मतभेदों के चलते विष्णु जी को नवभारत टाइम्स छोड़कर बाहर आना पड़ा। हा, हंत…! मेरे मुँह से निकला। एक कराह की तरह।

उन्हीं दिनों पत्रकारिता की दुनिया पर लिखा गया मेरा उपन्यास यह जो दिल्ली है आया था, जिसका नायक सत्यकाम तमाम उम्र लड़ाइयाँ ही लड़ता रहा। इससे, उससे और किस-किस से नहीं। वह टूट भले ही गया हो, पर झुका नहीं। विष्णु जी के बारे में पढ़ा, सुना तो लगा, वे भी तो एक सत्यकाम ही हैं। मैं उन्हें यह जो दिल्ली है उपन्यास भेंट करने पहुँचा और उनसे देर तक मैं पत्रकारिता जगत की उन विस्थितियों की कथा सुनता रहा, जो विष्णु खरे सरीखे बड़े लेखक, कवि, चिंतक और संपादक को भी बर्दाश्त नहीं कर पाती। 
विष्णु जी ने यह जो दिल्ली है पढ़ा और फिर उनका बेहद उत्साह भरा फोन आया कि पत्रकारिता जगत की तकलीफों और अंदरूनी हालात पर लिखा गया ऐसा कोई दूसरा उपन्यास उन्होंने पढ़ा नहीं है। आगे मुझे एकदम रोमांचित सा करते हुए उन्होंने कहा, प्रकाश जी, आपके उपन्यास ने मेरे भीतर यह इच्छा जगा दी है कि मैं भी पत्रकारिता जगत के अपने अनुभवों को उपन्यास की शक्ल में सामने लाऊँ।…वह कब हो पाता है, कह नहीं सकता!”
कहना न होगा कि यह जो दिल्ली है की साहित्य जगत में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी। उस पर दर्जनों समीक्षात्मक लेख लिखे गए। बड़े से बड़े साहित्यकारों ने  उसे सराहा, और पाठकों की अनवरत प्रतिक्रियाएँ तो थमने का नाम नहीं लेती थीं। और ऐसे पत्रकारों की संख्या भी कम न थी, जिनके लिए यह जो दिल्ली है उपन्यास कम, पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए किसी लाइट हाउस की तरह था, या फिर अ हैंडबुक ऑफ जर्नलिज्म।…
पर वे सब एक तरफ, और विष्णु खरे की वह उत्साह से छल-छल करती हुई प्रतिक्रिया दूसरी तरफ। मेरे लिए पलड़ा विष्णु खरे की प्रतिक्रिया का ही भारी था। यानी उन्होंने पास कर दिया तो पास। मेरे वे आदर्श नायक जो ठहरे। उन्होंने अगर सिर्फ एक शब्द कहा होता, तो भी मैं अपने हृदय के सबसे पवित्र कोठार में उसे रखकर, जिदगी भर के लिए सहेज लेता। क्योंकि मैं जानता था, मेरे लिए इससे बड़ा प्राप्य इस जीवन में कुछ और नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे विष्णु खरे से बड़ा नायक मेरी दुनिया में कोई और न था।
अलबत्ता, उसी दिन विष्णु खरे से एक लंबी और खुली बातचीत का खयाल मन में आया, जिसमें उनके जीवन के संघर्षों और उनकी विकट चुनौतियों से भरी रचना-यात्रा दोनों को एक साथ रखकर मैं बात करना चाहता था। विष्णु जी से मैंने कहा, तो उन्होंने सहज स्वीकृति दे दी। उन्होंने कविता संग्रह खुद अपनी आँख सेतथा आलोचनात्मक लेखों की पुस्तकआलोचना की पहली किताब समेत अपनी कुछ पुस्तकें मुझे भेंट कीं। यह चाकू समय (अत्तिला योझेफ) और हम सपने देखते हैं (मिक्लोश राद्नोती) सरीखे अनुवाद भी। 
मेरे लिए ये पुस्तकें किसी दुर्लभ उपहार से कम न थीं, और विष्णु जी को फिर से और नए सिरे से जानने की उत्सुकता मन में जाग गई थी।
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मैं उन दिनों साहित्य की दुनिया के भीतरी चक्रव्यूहों और एक सच्चे लेखक की टूटन और द्वंद्व पर एक अलग शिल्प का उपन्यास कथा सर्कस लिखने में जुटा था। उपन्यास पूरा होते ही विष्णु खरे को समग्रता से पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। और कुछ रोज बाद मैंने उन्हें फोन किया कि मैं बातचीत के लिए आना चाहता हूँ। विष्णु जी खुशी-खुशी तैयार हो गए।
फिर उनसे एक लंबा इंटरव्यू, जो सुबह नौ बजे से शाम को साढ़े सात बजे तक अविरल चलता रहा। एक खुला इंटरव्यू, जिसमें कोई सवाल-जवाब नहीं थे। एकदम खुली बातचीत, जिसमें उनके जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव थे, अंतहीन लड़ाइयाँ थीं, उनकी कविता, उनकी आलोचना, उनकी पत्रकारिता…उनके तमाम मूड्स, उनकी चिंताएँ, भीतरी व्याकुलता और आगे भी बहुत कुछ कर गुजरने का संकल्प—सब कुछ  समाता चला जा रहा था।
शाम को करीब चार बजे विष्णु जी विष्णु जी जिस तख्त पर बैठे मेरे सवालों के जवाब दे रहे थे, उस पर सीधे लेट गए। मैंने कहा, विष्णु जी, आप थक गए हैं। मैं बातचीत यहीं रोक देता हूँ। 
इस पर उनका क्षीण सा स्वर—आपके सवाल खत्म हो गए…?” 
मैंने कहा—नहीं विष्णु जी, सवाल तो अभी हैं।
तो फिर पूछिए…!”—वही क्षीण सी आवाज। 
कोई साढ़े सात बजे तक चला इंटरव्यू…और फिर कोई महीने, डेढ़ महीने में वह लिखा गया। भाई ज्ञानरंजन जी ने पहल में उसे अविकल रूप में छापा, तो मेरे पास उन पर आने वाली चिट्ठियों और प्रतिक्रियाओं का अंबार लग गया। वही हालत विष्णु जी की थी। कई नामचीन साहित्यकारों ने पत्र लिखकर या फिर फोन पर मुझे बधाई दी कि मनु जी, ऐसा इंटरव्यू हमने तो अपने जीवन में पहले कभी पढ़ा नहीं! ऐसे ही फोन और पत्र विष्णु जी के पास भी आ रहे थे, बल्कि बरस रहे थे। बहुत से लेखकों ने उन्हें बताया कि पहल वाला इंटरव्यू उन्होंने फोटोस्टेट करवा के अपने कई दूर-दराज के मित्रों को दिया, क्योंकि वे हर हाल में यह इंटरव्यू पढ़ना चाहते थे। खुद विष्णु जी कुछ अभिभूत से थे। एक दिन विनोद में बोले—प्रकाश जी, इतनी प्रतिक्रियाएँ तो मेरी रचनाओं पर भी नहीं आतीं। मैं तो सोचता हूँ, सब कुछ छोड़कर बस इंटरव्यू देना शुरू कर दूँ।….
[4]
फिर तो मुलाकातें, मुलाकातें और निरंतर मुलाकातें। हर मुलाकात एक नई, अद्भुत और यादगार मुलाकात।जब-जब उनसे मिलकर आता, मैं घर आकर चुपके से उसके बारे में लिख डालता। ये सब मेरे लिए बेशकीमती दस्तावेज थे। उनकी कविताओं पर भी लंबा लेख लिखा गया। उनके द्वारा अनूदित बृहत् फिनी राष्ट्रकाव्य कालेवाला पर भी। इन सबको समाहित करती हुई वाणी प्रकाशन से मेरी पुस्तक आई—एक दुर्जेय मेधा : विष्णु खरे। एक बृहत् पुस्तक, जिस पर खूब सराहना मुझे मिली। 
हाँ, किताब पढ़कर परेशान होने वाले लोग भी कम न थे। इसलिए कि विष्णु जी अपनी बात बेबाकी से कहते थे, और इस पुस्तक में उनसे लिए गए चार इंटरव्यू शामिल थे। इनमें कबीर पर लिया गया एक लंबा इंटरव्यू भी है, जो कबीर से शुरू होकर आज के समाज के भीतरी द्वंद्वों, विकट समस्याओं और लड़ाइयों तक चला आता है। इसलिए कि मेरा एक सवाल यह भी था कि कबीर आज होते, तो कैसी परिस्थितियाँ उनके सामने होतीं और किस तरह की लड़ाइयाँ उन्हें लड़नी पड़तीं। सवाल विष्णु जी को अच्छा लगा, और उसका जवाब देते हुए चर्चा का फलक विस्तृत होता चला गया, और काफी विस्तार उसने ले लिया।   
फिर विष्णु जी दिल्ली से चले गए तो भीतर बहुत कुछ टूटता सा लगा। पर मुंबई से भी वे बराबर खबर लेते। कैसे हैं प्रकाश जी…?” हमेशा यहीं से बात शुरू होती…और फिर वह कहाँ जाएगी, किस-किस प्रसंग को खुद में लपेटती हुई सी कितनी देर तक चलेगी, कुछ पता नहीं चलता था। समय जैसे थम जाता था।…
अभी पीछे शायद तीन-चारेक महीने पहले फोन आया था, प्रकाश जी, आपकी वह पुस्तक कई लोगों ने पढ़ी है। पढ़कर सब हैरान हैं। उनके फोन कई बार आ जाते हैं कि विष्णु जी, ऐसी पुस्तक तो हिंदी में कोई और है नहीं।…सच तो यह है प्रकाश जी, कि अगर कोई मुझ पर काम करना चाहता है, तो अकेली आपकी यह पुस्तक ही है, जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता। इसे तो उसे पढ़ना ही होगा।…
मैं क्या कहता? सिर्फ इतना कहा, विष्णु जी, लिखी तो वह किताब पूरे मन से थी। अपनी समूची शक्तियों के साथ।…जब लिखी गई तो लोगों ने उसका महत्त्व नहीं समझा। अब लोग समझ रहे हैं। मेरा सौभाग्य…!”
फिर विष्णु जी हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष बनकर दिल्ली आए, तब भी फोन—निरंतर फोन उनके आते रहे। आखिरी फोन 11 सितंबर को रात दस बजे आया, कैसे हैं प्रकाश जी?”
मैंने उन्हें बताया कि त्रिवेणी सभागार वाली काव्य-गोष्ठी में मैं गया था। मेरे जीवन का बड़ा अद्भुत…बड़ा आश्चर्यजनक अनुभव था वह। पूरा त्रिवेणी सभागार भरा हुआ था। उसमें ज्यादातर नौजवान पीढ़ी के लोग थे, और वे इतनी तल्लीनता से कविताएँ सुन और सराह रहे थे कि मैं सचमुच अचरज में पड़ गया कि वे कौन लोग हैं, जो कहते हैं कि आज की कविता संप्रेषित नहीं होती! मैंने तीस या चालीस लोगों की गोष्ठी में तो देखा है कि कोई कविता पढ़  रहा है और सब उसी लय में बह रहे हैं। एक वातावरण सा निर्मित हो रहा है।…पर इतने बड़े सभागार में कविता का ऐसा कार्यक्रम…! मेरे जीवन का यह एक विरल और यादगार अनुभव है। 
इस पर विष्णु जी प्रसन्न होकर बोले, हाँ प्रकाश जी, एकदम पिन ड्रॉप साइलेंस था।…
फिर विष्णु खरे द्वारा इंद्रप्रस्थ भारती के कहानी विशेषांक की चर्चा चली। मैंने कहा, विष्णु जी, इसमें कछ कहानियाँ तो जबरदस्त हैं। फिर एक ताजगी, एक नयापन तो है ही इसमें। बार-बार सुने हुए जो नाम हैं, उनसे अलग नाम हैं। कई तो एकदम अनसुने से।…पर कहानियाँ इतनी जबरदस्त कि एक बार पढ़ने के बाद आप उन्हें भूल ही नहीं सकते।…मैं इस विशेषांक पर एक लंबा पत्र लिखूँगा आपको।
उन्होंने उत्साहित स्वर में कहा, हाँ लिखिएगा प्रकाश जी।…”
बस, यही आखिरी संवाद…और फिर सारे तार झनझनाकर टूट गए…!
रात करीब दस बजे उनका फोन आया था, जो शायद सवा दस बजे तक चला। और फिर उसी रात कुछ ही घंटों बाद दुख की वह काली घटा छा गई, जो धीरे-धीरे उन्हें अपने भीतर समेटती गई।…विष्णु जी को मस्तिष्काघात!!
उन्हें चाहने वाले बहुत थे। सबके वे अपने थे। उन सबके साथ-साथ मैं भी प्रार्थना करता रहा…प्रार्थना। निरंतर प्रार्थना।….पर हा हंत, वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पूरे हिंदी जगत को शोकमग्न करके विष्णु खरे चले गए।
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हालाँकि विष्णु खऱे अपने पूरे जोम पर थे, जब गए। कविता और साहित्य के लिए दीवानगी, जो उनके रोम-राम में समाई हुई थी। आखिरी दिनों में वे उसके और भी निकट आ गए। 
रघुवीर सहाय जी ने कवि के जीवन और आदर्श के लिए एक ऐसी बात कही थी, जिसे मैं आजीवन नहीं भूल सकता। उनका कहना था कि एक व्यक्ति के रूप में मैं कई मोरचों पर लड़ना चाहूँगा। पर अंततः लड़ते-लड़ते मरूँगा तो अपनी कविता के मोरचे पर ही। 
शब्द हो सकता है, कुछ अलग हों, पर भाव यही।…जब विष्णु जी के बारे में मैं सोचता हूँ तो लगता है कि उनकी मृत्यु भी तो आखिरकार कविता के मोरचे पर ही हुई। वे पत्रकारिता में बड़े पदों पर रहे। फिल्मों पर बहुत विपुल और उत्कृष्ट लेखन उन्होंने किया। पर आखिरी दिनों में वे कविता और साहित्य के कुछ और पास आ गए थे। वही उनका ओढ़ना, वही बिछौना था। कविता उनकी साँस-साँस में बसी थी। और जितने विलक्षण कवि वे थे, उतने ही बारीक निगहबानी वाले अच्छे और गंभीर कविता-प्रेमी भी, जिन्हें अपने मन की कविताएँ पढ़ने को मिल जातीं तो उनकी प्रसन्नता और उल्लास का ठिकाना न रहता।
समकालीन कविता में विष्णु खरे की कविता का मिजाज सबसे जुदा था। मुक्तिबोध की तरह ही उनकी कविताओं की बिल्कुल अलग काट है। सच पूछिए तो विष्णु खरे की लगभग सारी कविताएँ कविता को नेगेट करके ही कविता बनती हैं…या कि कविता बनना चाहती हैं। वे कविताई के ढंग पर चलकर कविता नहीं होना चाहतीं। बल्कि उनकी जिद हैबड़ी सख्त और अपूर्व जिद कि वे कविता के अभी तक बने-बनाए रास्ते के एकदम उलट चलकर ही खुद को कविता साबित करेंगी। आप अंदाजा लगा सकते हैंयह कितनी कठिन और खतरनाक जिद है?
शायद इसीलिए विष्णु खरे की कविताओं से जो आपको मिलता है, उसे कविताई का आनंद नहीं कह सकते, यह अकविताई का आनंद है। यह कितना पीड़ामिश्रित, कितना उदात्त है…और कविता के सामान्य आनंद से कितना ऊपर उठा हुआ आनंद है, हम केवल उसका अनुमान भर लगा सकते हैं या उसके थोड़े आस-पास ही जा सकते हैं। उसे ठीक-ठीक पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह तो केवल विष्णु खरे के हिस्से की ही चीज है।…यानी कि विष्णु खरे और उनकी कविताओं को सराहने के लिए भी आपको एक और विष्णु खरे होना पड़ता है।
तो क्या इसी तर्ज पर विष्णु खरे की कविता को एंटी-पोएट्री कहेंयानी अकविता? यह तो सच में बड़ा अजीब लगेगा। इसलिए कि हिंदी में अकविता के जो तमाम आंदोलन चले, उनसे विष्णु खरे की कविता एकदम अलग है। बल्कि कहें कि दूसरे छोर पर है। दूर-दूर तक उनसे विष्णु खरे का कोई रिश्ता नहीं बनता। यों भी एक राजकमल चौधरी को छोड़ दें तो अकविता में सचमुच खतरे उठाने वाले कितने थे, जबकि विष्णु खरे इस मानी में भी मुझे एंटी-पोएट या अकवि लगते हैं कि वे बड़ी से बड़ी सत्ता या राजनीतिक, सांप्रदायिक, फासिस्ट ताकतों के खिलाफ खतरनाक ढंग से कविताएँ लिखने वाले खतरनाक कवि हैं।
अकवि का अर्थ मेरी निगाह में यही हैयानी रूखा और बीहड़ कवि। अपने सौंदर्य-बोध के भीतर बहुत-सी अरूपताओं का आनंद लिए हुए एक बड़ा और कुछ-कुछ बेडौल कवि। बड़ी से बड़ी ताकतों को चुनौती देता हुआ शक्तिशाली और बेखौफ कवि। कुल मिलाकर रूखा, ऊबड़-खाबड़ और बीहड़ होते हुए भी बड़ा कवि, जिसकी कविताओं के शब्दों में और पंक्तियों के बीच कुछ-कुछ चट्टानी-सा कवि-व्यक्तित्व झाँक जाता है। इस लिहाज से मुझे लगता है, अकविता की अगर सही और व्यापक परिभाषा की जाए तो हिंदी में विष्णु खरे और मुक्तिबोध दो ही ऐसे कवि हैं जो सचमुच अकवि कहलाने के हकदार हैं। असंख्य कविनुमा कवियों की मुलायम, कटी-तराशी कविताओं के बरक्स एक तरह की रुक्ष और चटियल कविता। ऊपर से बहुत सख्त, लेकिन भीतर से बहुत-बहुत आर्द्र और संवेदना से लबालब। विष्णु खरे हों या मुक्तिबोध, कुल मिलाकर दोनों की कविताओं की तासीर यही है। 
मुक्तिबोध और विष्णु खरे दोनों ही कवियों की एक खासियत यह है कि उनके यहाँ बीहड़ता या रुक्षता का सौंदर्य है। हालाँकि इस बीहड़ता या रुक्षता के भीतर बहुत गौर से देखें तो बहुत कोमलता भी छिपी नजर आ सकती है। मुक्तिबोध की कविताओं में प्रेम और सौंदर्य का बहुत खुला वर्णन नहीं है। लेकिन जहाँ-जहाँ भी वह आया है, भले ही सांकेतिक रूप में, दो-चार पंक्तियों में, तो उससे पूरी कविता मानो प्रकाशमान हो उठती है। मसलन याद करें, उनकी वह कविता जिसमें बहसों और वैचारिक लड़ाइयों में खोया कवि जब देर रात को घर लौटता है, तो दरवाजा खटखटाने पर भीतर से आई…की आवाज सुनाई देती है और इसी से गृहस्थी के सौंदर्य का मानो एक आलोकित चित्र आँखों के खिंच जाता है। 
इसी तरह विष्णु खरे की कई कविताओं में पत्नी और गृहस्थी के सौंदर्य की छवियाँ हैं। हमारी पत्नियाँजैसी उनकी कविताएँ तो बेजोड़ हैं। काल और अवधि के दरमियानसंग्रह में भी अनकहाशीर्षक से पत्नी के लिए एक सुंदर कविता है। हालाँकि यहाँ प्रेम और सुंदरता का बहुत खुला चित्रण नहीं है, पर संकेतों में…कहना चाहिए कि कुछ लकीरों में ही एक बड़ी बात कह दी गई है।
आश्चर्य की बात यह है कि जो प्रेम और ऐंद्रिक अनुभवों में ही खोए रहने वाले कवि हैं, उनकी कविताओं में प्रेम बासी और पिटा हुआ लगता है, जबकि मुक्तिबोध या विष्णु खरे सरीखे रूखे समझे जाने वाले कवियों की कविताओं में जीवन-समर के बीच प्रेम और सुंदरता की ये जो सादा छवियाँ हैं, वे कभी नहीं भूलतीं और मन पर उनका कहीं ज्यादा गहरा असर पड़ता है। 
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विष्णु खरे का व्यक्तित्व और उनकी कविता कुछ ऐसे समझ ली गई हैऔर सच मानिए तो वह ऊपर से कुछ-कुछ ऐसी दिखती भी हैकि वह भावुकता से बहुत दूर निकल आई है…या कि वह और चाहे कुछ भी हो, पर भावुक तो हो ही नहीं सकती। पर मेरा यह कहना शायद बहुतों को बड़ा अजीब लगेगा कि विष्णु खरे के व्यक्तित्व को अगर आप नजदीक से जानें-परखें, तो पता चलेगा कि वे खासे भावुक व्यक्ति थे। और उनकी कविता को नजदीक से देखें तो उसकी भावुकता से रू-ब-रू हुए बगैर हम नहीं रह पाते। बल्कि लगता है, बाकी कवि जीवन के जिन दृश्यों और स्थितियों को रूटीन मानकर नजरंदाज करने के आदी हैं, विष्णु खरे उनकी अंतर्हित करुणा तक जा पहुँचते हैं, और हम पाते हैं कि वे जाने-अनजाने हमारे भाव-संसार और संवेदना का विस्तार कर रहे हैं।
मुझे याद है, विष्णु जी से हुई एक लंबी अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने रघुवीर सहाय और राजेंद्र माथुर का इतने भावुक होकर जिक्र किया था कि मैं प्रश्न पूछना भूलकर अवाक् उन्हें देखता रह गया था। राजेंद्र माथुर के अंतिम दिनों का स्मरण करते हुए उनकी आँखें आर्द्र और स्वर गीला-गीला-सा हो आया था। इसी तरह रघुवीर सहाय के एक प्रसंग का वे जिक्र करते हैं। 
हुआ यह था कि विष्णु जी ने रघुवीर सहाय की कविताओं का एक संग्रह लिखते समय कहीं यह टिप्पणी की कि ये कविताएँ सौ में से पंचानबे अंकों की हकदार हैं। बाद में रघुवीर सहाय विष्णु जी से साहित्य अकादेमी में मिले तो उन्होंने पूछाआपने मेरे पाँच अंक क्यों काट लिए…
विष्णु जी इस प्रसंग का जिक्र कर रहे थे तो उनकी आँखें आँसुओं से लबालब थीं और उनके लिए आगे बोल पाना मुश्किल हो गया था।
जैसे विष्णु खरे के व्यक्तित्व में, वैसे ही उनकी कविता में भी ये बेहद भावुक, आर्द्र क्षण आते हैं और बीच-बीच में हमें भिगो जाते हैं। हाँ, उसकी ऊपरी रुक्षता के भीतर संवेदना के इन आर्द्र क्षणों को डिस्कवर करना पड़ता है। इसलिए कि विष्णु जी की तरह ही उनकी कविता भी भावुक जरूर है, पर उस भावुकता का प्रदर्शन करना भद्दी चीज मानती है और खुद को सायास उससे दूर रखती है।
विष्णु जी के शुरुआती संग्रह खुद अपनी आँख सेकी कई कविताएँ ऐसी हैं जिनमें कवि की रुक्षता के भीतर छिपी बेतरह भावुकता से मिलने के मौके आते हैं। विष्णु जी की ऐसी कविताओं में अकेला आदमीतो ऐसी कविता है जिसे कभी भूला ही नहीं जा सकता। ऊपर से खासे खुरदरे दिखाई देने वाले इस आदमी की अकेली और वीरान-सी जिंदगी के भीतर एक अंतर्धारा भी हैप्रेम और भावुकता की अंतर्धारा, जो इन रूखे, रसहीन दिनों में भी उसे जिलाए रखती हैं। यहाँ पत्नी और नन्ही बेटी की यादें हैं। पत्नी के पुराने खत और फोटो हैं और एक सपना है कि वह उन्हें अपने साथ रेलगाड़ी में बिठाकर वापस आ रहा है। इससे वर्तमान का उजाड़ थोड़ा कम रूखा और सहनीय हो जाता है। इसमें पत्नी और बेटी की यादों और इस खुरदरे आदमी के स्नेह से डब-डब करते जो अक्स हैं, उन्हें आप चाहेंगे भी तो भूल नहीं पाएँगे।
इसी तरह सबकी आवाज के पर्दे मेंसंग्रह की चौथे भाई के बारे में’, ‘दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है’, ‘लालटेन जलाना’, ‘बेटी’, ‘मिट्टी, ‘जो टेंपो में घर बदलते हैंकविताएँ ऐसी हैं जो मानवीय और पारिवारिक रिश्तों की ऊष्मा में सीझी हुई हैं। चौथे भाई के बारे में कविता का जिक्र आने पर तो विष्णु जी ने एक दफा खुद बताया था कि इस कविता को वे पिछले कोई बीस सालों से लिखना चाह रहे थे। वह उनके भीतर ही अटकी हुई थी, पर बन नहीं पा रही थी। कोई बीस साल बाद उसने ठीक-ठीक वही शक्ल ली, जिस रूप में विष्णु खरे इसे लिखना चाहते थे, तो वह उनके संग्रह में आ सकी। और यह कविता सचमुच गुजरे चौथे भाई की स्मृतियों से डब-डब करती कविता है। 
ऐसे ही दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता हैकविता में घोर आर्थिक तकलीफों में घर-परिवार के जो लोग गुजर गए, उन्हें स्मृतियों के साथ-साथ एक छोटे-से फ्लैट में बसाने की बड़ी मार्मिक कोशिश है। इधर की कविताओं में पारिवारिकता की इतनी विकल कर देने वाली उपस्थिति आपको और कहाँ मिलेगी? बेटीकविता में दफ्तर में नौकरी पाने के लिए आई महानगर की एक गरीब लड़की की पीड़ा है। मिट्टीमें छिंदवाड़ा की मिट्टी और चीजों की चप्पे-चप्पे में बसी यादें हैं…बल्कि कहना चाहिए कि यादों की ऐसी बारिश है कि उससे न भीगना नामुमकिन है।
जो टेंपो में घर बदलते हैंकविता में बगैर किसी दिखावटी सहानुभूति के एक मध्यवर्गीय आदमी की डाँवाडोल जिंदगी की समूची तसवीर उकेर दी गई है। यह बगैर भावुक हुए संभव नहीं था। हालाँकि यह दीगर बात है कि कविता का उद्देश्य अनावश्यक रूप से भावुकता का प्रदर्शन किए बगैर, पाठक को कहीं अधिक सहानुभूतिशील इनसान बनाना है।
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विष्णु खरे शायद हिंदी के उन विरले कवियों में से हैं जिनकी कविताओं में सबसे ज्यादा आत्मकथा है। हो सकता है, कविता में इतनी आत्मकथा लिख पाने वाला कोई दूसरा कवि हमारे यहाँ हो ही नहीं। इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी लगा कि कहानी में आत्मकथा लिखना तो आसान है। इसकी तुलना में कविता में आत्मकथा लिखना कठिन हैएक बहुत दुष्कर काम। पर विष्णु खरे बगैर कोई दावा किएऔर यहाँ तक कि बगैर कोई दिखावा किए यह काम करते हैं।
याद कीजिए, विष्णु खरे के खुद अपनी आँख सेसंग्रह का वह बच्चा जो कई शील्ड लेकर निस्तब्ध रात के सन्नाटे में घर लौट रहा है और एक शील्ड के अचानक गिर जाने पर पैदा हुई आवाज और रात गश्त लगाते सिपाही के सवालों से वह किस कदर अचकचा गया था। फिर किस असामान्य आत्मविश्वास से वह सिपाही के सवालों का जवाब देने के बाद घर जाता है। इस संग्रह की अव्यक्त’, ‘गरमियों की शाम’, ‘प्रारंभऔर दोस्तजैसी कविताओं में विष्णु खरे के बचपन, किशोरावस्था और तरुणाई के कुछ न भूलने वाले अक्स हैं। यहाँ तक कि इन कविताओं को पढ़ना विष्णु जी के बचपन, किशोर काल और तरुणाई के चेहरे को देख लेने की मानिंद है।
ऐसे ही सबकी आवाज के पर्दे मेंसंग्रह की दिल्ली में अपना फ्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है’, ‘चौथे भाई के बारे में’, ‘अपने आप’, ‘मंसूबा’, ‘स्कोर बुक’, ‘खामख्यालसरीखी कविताएँ। यह कविताओं में लिखी गई सीधी-सीधी आत्मकथा है और इनके साथ जुड़े पारिवारिक प्रसंगों, पात्रों और घटनाओं का दर्द या विडंबना इतनी गहरी है कि वह कविताओं को भी कहीं अधिक मार्मिकता दे देती है। इसी तरह ऐसी बहुतेरी कविताएँ हें जिनमें विष्णु जी की माँ और पिता को लेकर स्मृतियों के कभी न भूलने वाले अक्स हैं। इनमें ‘1991 का एक दिनतो एकदम असाधारण कविता है। इसमें न सिर्फ माँ और पिता के गुजरने की तारीखें और ब्योरे हैं, बल्कि इस चीज को लेकर विष्णु जी का एक अजीब-सा अपराध-बोध सामने आता है कि उनकी उम्र माँ और पिता से अधिक हो गई है। यानी माँ जब गुजरी थीं, तब उनकी जो उम्र थी, उसे वे बरसों पीछे छोड़ आए हैं। इसी तरह पिता के गुजरने के समय उनकी जो उम्र थी, वह भी अब पीछे निकल गई है और कम से कम उम्र में वे अपने माँ और पिता से बड़े हैं।
पर क्या वे सचमुच माँ और पिता से बड़े हैं? यह सवाल आते ही विष्णु जी के भीतर जिस तरह का भावनात्मक उद्वेलन शुरू होता है और माँ, पिता की स्मृतियों का जैसा अंधड़ उठता है, वह विचलित कर देने वाला है। लगता है, माँ-पिता को याद करते ही, फिर से वे अपने बचपन और किशोरावस्था में लौट गए हैं और उनकी उम्र घटकर कोई चार-पाँच वर्ष के शिशु या फिर बारह वर्ष के किशोर की-सी हो गई है। 
इसी तरह एक कविता में विष्णु जी बचपन में ग्रामोफोन के अपने शौक का जिक्र करते हैं जिसमें रिकार्ड घूमने का रोमांच उन्हें मुग्ध करता था। विष्णु जी की कविताओं में इन प्रसंगों को पढ़ना मानो पाठक के लिए अपनी-अपनी आत्मकथाओं के बंद द्वार खोल देता है और उनका अपना बचपन या किशोरावस्था भी कहीं साथ ही साथ दस्तक देने लगती है। इसी से समझा जा सकता है कि विष्णु जी अपनी कोशिश में कितने सफल हुए हैं या कि कविता में आई उनके आत्म की अनुभूतियाँदूसरे शब्दों में आत्मकथा के ये पन्ने कितने मार्मिक हैं।
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कवियों के लिए कविताएँ लिखने वाले हिंदी में बहुतेरे कवि हैं, पर इनमें विष्णु खरे नहीं हैं। हाँ, पर इस ढंग की उनकी दो ऐसी कविताएँ हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता। एक तो वह कविता जिसमें उन्होंने खुद को निराला, मुक्तिबोध आदि कवियों के चरणों में बैठा कूकर बताया है। और दूसरी रघुवीर सहाय पर लिखी गई वही दुख से सीझी कविता है जिसके पीछे जिक्र हो चुका है। इस कविता में रघुवीर सहाय और अज्ञेय की एक मुलाकात का जिक्र है। अज्ञेय के बारे में रघुवीर सहाय की एक बातचीत विष्णु नागर द्वारा संपादित पुस्तक रघुवीर सहायमें है। इस कविता का संदर्भ वही है। दिनमानके संपादक पद से हटाए जाने या कहिए कि पदावनति के बाद नवभारत टाइम्स में भेजे जाने पर रघुवीर सहाय उद्विग्न हैं और अपना वही दुख अज्ञेय को बताने वे उनके निवास पर गए हैं।
विष्णु खरे ने इस कविता में रघुवीर सहाय की तब की मन:स्थिति का इतना सच्चा, इतना मार्मिक चित्र खींचा है, मानो वे खुद सूक्ष्म रूप में वहाँ मौजूद हों और सब कुछ देख-सुन रहे हों। अज्ञेय और रघुवीर सहाय के अलग-अलग व्यक्तित्व, मूड्स और स्थितियाँ यहाँ काबिलेगौर हैं तो रघुवीर सहाय की वह विवशता भी है, जो उन्हें अपने साथ हुए अपमान को खून के घूँट की तरह पी लेने को विवश करती है। और यह दुख, क्रोध और अपमान और बेबसी एक साथ उनके पूरे व्यक्तित्व में फैलकर छा जाती है।
कुल मिलाकर हमारे समाज में एक बड़े कवि की स्थिति या उसके साथ घटित हुई क्रूर विडंबना का भीतर तक स्तब्ध कर देने वाला चित्र इस कविता में है। एक बड़े सरोकारों से जुड़ा बड़ा कवि, जो सबके दुख सबके साथ ही हो रहे अत्याचारों पर लिखता है, खुद अपने दुख, निराशा में वह कितना अकेला हो जाता हैयह इस कविता को पढ़कर जाना जा सकता है।…
फिर एक और बात। मुझे जाने क्यों लगता है, इस कविता में रघुवीर सहाय के दुख और बेबसी के साथ-साथ कहीं न कहीं विष्णु खरे का अपना दुख भी शामिल है। या उसकी एक मद्धिम छाया जरूर है, जिसने इस कविता को इतना अधिक करुण और स्मरणीय बना दिया है। 
प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
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