रमेश वशिष्ठ का आलेख - बिताया हुआ समय 3
  • रमेश वशिष्ठ

समय याद बनकर कब फुर्र हो जाता है, पता नहीं चलता। हर इंसान जीवन में कुछ छुपे हुए सच और छुपे हुए झूठ के साथ जीता है और जी रहा है। जिसके पीछे है एक अकिंचन इच्छा! किसी को पाने की, या किसी का हो जाने की, या किसी को अपने अंदर उतार लेने की, या किसी के भीतर समा जाने की। बमुश्किल किसी ऐसे अपने के साथ कुछ पल बिताने का मौका हमें मिल पाता है, जिसे हम खुद से चिपका कर रखना चाहते हैं, वो पल जीवन की अमूल्य निधि बनकर हमारे भीतर हमेशा के लिए समा जाते हैं।
लेकिन जो बात मैं कहने की कोशिश कर रहा हूँ वो ये कि अब हम समय को सिर्फ बिताने की दिशा में अग्रसर हैं। समय को जीने की कला ना जाने कहाँ खो गयी है। हमारे पास जो भी सहेजने लायक बचा है वो पुराना ही है, नया कुछ अर्जित नहीं कर पा रहे।
चाचा नेहरू कहा करते थे “आराम हराम है”। लेकिन आज के दौर में काम जीवन की सबसे बड़ी समस्या बन गया है। या यूं कहिए कि काम का दबाव हमें सुकून से बैठने, खाने, सोने नहीं देता। बचपन इच्छाओं को जन्म देता है, सपने देखने की कला सिखाता है, आसमान की तरफ देखकर उसे जकड़ लेने की ललक पैदा करता है, दुनिया को मुट्ठी में करने का दम भरने लायक बनाता है, लेकिन युवा अवस्था तक आते-आते सपने धराशायी होने लगते हैं, नजरें जमीन से उठ ही नहीं पाती की आसमान की ओर देखा जाए। स्कूली शिक्षा पूरी कर महाविद्यालय में जो आजादी का भाव युवा पीढ़ी के अंदर पैदा होना चाहिए या होता था, वो अब मरता जा रहा है। पढ़ाई-लिखाई मन को संतोष नहीं देती, जीवन में तनाव और कुंठा को भीतर तक भर देती है, इस प्रकरण में अपने ऐसे पल जिन्हें याद कर सुख की अनुभूति हो, कम होते चले जा रहे हैं, हम बैल बनते जा रहे हैं, जिन्हें ये तो पता है कि सुबह घर से इतने बजे निकलना है, लेकिन वापस आने का कोई ठिकाना नहीं।
काम का दबाव हमारे सपनों को कुचल रहा है, और तनाव हमें अंदर से लगातार मार रहा है। भविष्य को लेकर इच्छाएं मरती जा रही हैं। ना नींद आती है, न जगा जाता है। दफ्तर अब निर्माण की जगह नहीं रहे, भट्टी बन चुके हैं, जिनमें हमारे सपने धीरे-धीरे झुलस कर राख हो रहे हैं।
ले-दे कर सप्ताह का एक रविवार अपना है, जिसमें अपने इंसान होने का एहसास कुछ लोगों को हो पाता है। उसमें भी कोई मजदूर हुआ तो उसके पास ये हक़ भी नहीं। रोज खाना, रोज कमाना।
व्यवस्थाऐं हमसे इंसान होने का भ्रम लगातार छीन रही हैं। ना हम मशीन ही बन पाए और न इंसान ही रह पा रहे हैं। जल्दी ही हमें एक नतीजे पर पहुंचना होगा। अन्यथा, जीवन किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़ेगा और सब बिखर जायेगा हमारे हाथ में कुछ नहीं बचेगा। अलगाव आज की सबसे बड़ी और कड़बी सच्चाई है, रिश्ते जितनी तेजी से बन रहे हैं कहीं ज्यादा तेजी से टूट भी रहे हैं, ऊपर से माँ-पिता का सहारा भी अब उस रूप में नहीं रहा, जिस तरह होना चाहिए। आज़ादी के पीछे भागते भागते हम उस आज़ादी के गुलाम हो गए हमें पता ही नहीं चला। विकसित होने से ज्यादा हमने विकसित हो सकने का भ्रम पाल लिया है। जिसने हमारी नींव हमसे छीन लेने की पूरी कोशिश की है।
गंभीरता इस कदर हमारे ऊपर हावी है कि अब कुछ भी सामान्य नहीं रहा, बीमारी लाइलाज होती जा रही हैं, जिनके कभी नाम भी नहीं सुने ऐसे रोगों से जीवन ग्रस्त हो चुका है। और असल में ऐसी कोई बीमारी होती ही नहीं। लेकिन हमारा अतिग्रसित ज्ञान हमें पंगु बना रहा है, सही इलाज न करके बस महंगे इलाज में लगे हुए हैं, जबकि सबसे सस्ता इलाज हम नजरअंदाज करते चले जा रहे हैं। इस विषादपूर्ण जीवन में अगर हमें कोई खुश रख सकता है, हमें खुश होने का एहसास दिला सकता है, फिरसे जीवंत कर सकता है तो वो सिर्फ हमारे अपने और हमारे रिश्ते हैं। जिन्हें हमने लगभग-लगभग दफ़न कर दिया है। करियर, आज़ादी, सेल्फडीपेंडेड बनने के चक्कर में, जीवन असल मतलब हमारे ज़ेहन से मार दिया है। पूंजीवाद ने मानव के जीवन को एक अच्छी दिशा दी थी, लेकिन हमने खुद को उसके ऊपर लाद दिया। और इतिहास गवाह है, ज्यादा देर तक गधा भी वजन नहीं लादता। फिर व्यवस्था कैसे हमें ढो सकती है।
हमारी अनंत इच्छाओं ने जीवन के रंगों को फीका कर दिया है। परिवार के साथ खाना-पीना, रहना-सोना, घूमना फिरना, वेवजह लड़ना, इनसे रिश्ते में मजबूती आती है परंतु ये सब हमें बोझ लगता था इसलिए निकल फेका, और अब उसी एक पल के लिए हम अपना सब कुछ दाब पर लगाने को तैयार बैठे हैं। हिन्दुस्तान सौहार्द का देश रहा है, शायद बहुत हद तक आज भी है। यहां सबको प्यार मिलता है बस अपने माँ-बाप को छोड़ कर। हमें चकित करेगा, लेकिन देश में स्कूलों और हॉस्पिटल से ज्यादा अनाथालय और वृद्धाआश्रम हैं। वहां हमारे ही माँ-बाप और बच्चे पाए जाते हैं और कोई हमारे जैसे ही उनका सहारा भी बनता है और हमारे जैसे ही लोग उनका भी सौदा कर देते हैं। ऐसी घटनाओं को गिनाने की जरूरत नहीं है।
पेड़ पुराना हो जाये तो भले फल न दे छांव जरूर देता है। परिवार और उसमें साथ मिलकर रहने वाले लोग भी ऐसे ही होते हैं। हम बड़े जरूर हो सकते हैं। लेकिन माता-पिता की कमी को पूरा नहीं कर सकते।
राम और कृष्ण को किसी ने नहीं देखा मैंने भी नहीं देखा। लेकिन अमिताभ बच्चन, सलमान खान, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हम सभी देख रहे हैं। ये सभी इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि आप कितने भी बड़े हो जाओ, लेकिन माता-पिता और घर के बड़ों का साया साथ हो तो हर तक़लीफ़ छोटी लगती है।
आज हम सभी बढ़ते तापमान का रोना रोते रहते हैं लेकिन एक -एक घर में 6-6 ऐसी भी हमने ही लगा रखे हैं। मतलब साफ है, जहां जरूरत है वहां एडजस्ट करने को हम तैयार नहीं है। बस सब हो जाये और कोई तक़लीफ़ भी न हो। धूप में चलते हुए पेड़ सबको चाहिए लेकिन लगाने किसी को नहीं हैं। हम उतने दुख में नहीं है जितनी हमारी औलादे होंगी। क्या हम उन्हें वो समय सहेजकर देना चाहते हैं जो हमने अपने बचपन में बिताया था। हँसते-खेलते, खिलखिलाते, स्वस्थ शरारती जीवन। अगर हाँ तो तय करना होगा कि सुनहरे कल के लिए “क्या करना है और क्या नहीं।”
क्या हम अपने बिताए हुए कल को सिर्फ याद कर के दुखी होते रहेंगे या उसे फिरसे जीना चाहेंगे, अपने परिवार, खेत-खलिहान, हँसी-खुशी और पेड़-पौधों के साथ। अपनों के साथ उनके बीच बिताया गया समय ही जीवन है ये समझते-समझते काफी देर न हो जाये इसलिए अपने परिवार और प्रकृति को संभाल कर, सहेज कर रखने की जरूरत है। क्योंकि लाइलाज और विखंडन के दौर में कोई आपका साथ दूर तक नहीं देता। सिवाय परिवार और नेचर के।

4 टिप्पणी

  1. “वास्तिवकता से अनभिज्ञता” ही सभी दुःखों का कारण है और यही हमें “आजादी का गुलाम” बनाये हुए है ।

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