पद्मा मिश्रा का आलेख - पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार 1
  • पद्मा मिश्रा

समाज के विस्तृत फलक पर दिन प्रतिदिन चित्रित होती हुई जीवन की विविध अभिव्यक्तियों एवं आस पास की घटनाओं पर एक शोध परक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हुई एक मुखर आवाज है –पत्रकारिता ‘वस्तुतः पत्रकारिता जन -भावनाओं एवं यथार्थ की सहज अभिव्यक्ति का माध्यम तो है ही, वह सामाजिक मुद्दों पर यथार्थवादी व् सजीव चित्रण भी कर पाने में मुखर होती है. पत्रकारिता समाज का दर्पण भी है, जिसमे प्रतिबिंबित होते व् बदलते सामाजिक मूल्यों ,घटनाओं, एवं सामाजिक सरोकारों का सही सही मूल्यांकन संभव हो पता है. …पत्रकारिता एक दायित्व भी है, जिसकी पूर्ति समाज में ही हो सकती है. यह समाज से विमुख रह कर केवल काल्पनिक सच्चाईयों एवं नकली बाजारवाद के बाल पर कभी पनप नहीं सकती. मेरे विचार से वह सच्ची पत्रकारिता भी नहीं है, जो केवल उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देती हो. हाँ, समाज के बदलते स्वरूप से उसे प्रभावित होना ही पड़ता है, यह मै मानती हूँ. भारत एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र है, और लोकतंत्र का सही अर्थ महज सम्पूर्ण आजादी से नहीं लिया जाता. क्योंकि बिना सूचना क्रांति के लोकतंत्र बेमानी है. दिन-प्रतिदिन बदलते विकास के स्वरूपों  परिवर्त्तनों ने पत्रकारिता को कई अनचाहे और नये दौर भी दिखाए हैं,-जैसे तकनीकी विकास, उद्देश्य,उत्तरदायित्व ,और आदर्शों का नया पाठ भी सिखाया ,,,,हमारे देश में पत्रकारिता का प्रारम्भ तब हुआ जब  विदेशों में पत्रकारिता जनता के लिए मुख्य और प्रभावशाली हथियार बन चुकी ,थी सर्वप्रथम 1780 में जेम्स हिकी ने कोलकाता से ”बंगाल-गजट का प्रकाशन शुरू किया,जिसे सिल्क बकिंघम ने महतवपूर्ण योगदान दिया,और एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए और अच्छी प्रशासनिक व्यस्था के लिए स्वस्थ और निर्भीक पत्रकारिता की शुरुआत की,,,, यह पहला अवसर था, जब सामाजिक समस्याओं ,मुद्दों एवं उनके समाधान के साथ  साथ ”प्रेस की स्वतंत्रता की भी बात की गई, सिल्क के प्रयासों को अपना पूर्ण समर्थन देकर राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता को नई दिशा और दशा प्रदान की  उनके प्रयासों से तत्कालीन  परिवेश में सुधार आया और वहीं से समाज के उत्थान और विकास के लिए सुधारवादी आंदोलनो की बाढ़ सी आई और सामाजिक उत्थान के नये रास्ते मिले तथा सच्ची पत्रकारिता जो दायित्वों को निभाना जानती हो ”,,की शुरुआत भी हुई,अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जनता की आवाज से आवाज मिलाकर एक निर्भीक और स्वच्छ पत्रकारिता ने देश की सामाजिक ,राजनीतिक आर्थिक मुद्दों के समाधान के लिए एक क्रन्तिकारी कदम उठा लिया था,–उस समय – परिस्थितियां ऐसी निर्मित हुईं कि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब कहे जाने के  कारण पत्रकारिता का भी अपना  विशिष्ट  स्थान  था, कई राष्ट्रिय कवि ,साहित्य्कार पत्रकार भी रहे और अपनी क्रांतिपूर्ण रचना धर्मिता तथा सामाजिक प्रबद्धता के दम पर कुशल पत्रकार भी कहलाये –महाप्राण”निराला’के पत्र  ”मतवाला” का नाम प्रमुख है,वे सवयम कवि थे अतः आम-जन के प्रति अपनी संवेदना का भरपूर निर्वहन किया ,उनके संघर्षों के प्रति लिखते रहे —”वह आता -दोटूक कलेजे के करता -पछताता पथ पर आता ”की भावना उनके पत्रकार- मन की पीड़ा थी जो निर्भय  हो उनके ”मतवाला”में अभिव्यक्त होती रही   मतवाला की  सामाजिक दृष्टि प्रगतिशील थी,कुसंस्कार,रूढ़ियों,और अंधविश्वासों पर उनका व्यंग्य करारा ,रहता था,सामाजिक कलुष और बुराइयों के विरुद्ध मतवाला की कलम सदैव आग उगलती रही —इसके बाद महावीर प्रसाद द्वेदी , प्रेमचंद,सितारेहिंद,अज्ञेय,गणेश शंकर विद्यार्थी ,महात्मा गांधी जैसे कई नाम थे  जिन्होंने  राजनीतिक  उद्देश्यों के साथ  साथ  सामाजिक  मुद्दों पर भी   बड़े जोर शोर से अपनी कलम चलाई और एक स्वतन्त्र स्वच्छ अभिव्यक्ति दी,’
 हंस’ के संपादन काल में प्रेमचंद का यह मानना था क़ि –” पत्रकारिता एक मिशन की  तरह होनी चाहिए,जो अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह पूरी निष्ठा से कर सके. सन्दर्भ में कलम कीशक्ति अपना चमत्कार दिखती है, जिसमें, पत्रकारिता,साहित्य सृजन कलात्मक अभिव्यक्ति जैसे माध्यमों का सक्रिय  योगदान रहता है. हम जानते हैं की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में इसी कलम की ताकत ने जन भावनाओं और जन समस्याओं को समाज के जिज्ञासु ,जागरूक व् प्रबुद्ध लोगों तक पहुंचा कर अपनी सशक्त भूमिका निभाई थी. सोये भारत की आत्मा को जगाने का पुनीत कार्य किया था. आजादी पूर्व की भारतीय पत्रकारिता को  अपनी जिस ऊंचाई को पाने  में डेढ़ सौ वर्ष लगे ,उसे हमने आजादी के बाद मात्र पैंसठ वर्षों में गंवा दिया है आज फिर उसी सामाजिक प्रतिबद्धता और नैतिक मूल्यों वाली पत्रकारिता की जरूरत है जो हमे गौरवान्वित कर सकें —-
ये अक्षर बोलते हैं, तब कोइ इतिहास बनता है,
अधूरी सभ्यताओं पर कोइ विश्वास पलता है,
कलम ही जिन्दगी के मर्म को पढ़ना सिखाती है,
निरर्थक सोच और अन्याय से लड़ना सिखाती है”
 गांधी जी के अनुसार ..”समाचारों  में अभ्व्यक्त विचार जबरदस्त शक्ति की तरह होते हैं, जो एक सुसंगठित समाज का नव निर्माण कर सकते हैं. पर जैसे निरंकुश पानी का बहाव गाँव के गाँव डूबा देता है, फसलें नष्ट कर देता है, उसी प्रकार कलम का निरंकुश प्रवाह नाश करता है..मानवता का, करुना का, इन पर भीतरी अंकुश होना चाहिए”.
अर्थात निरंकुश ,असत्य, अविवेकपूर्ण भावनाओं का दूषित प्रवाह जब अपनी अभिव्यक्ति की मर्यादा के बांध तोड़ देता है, इसका दंड पूरे समाज को भोगना पड़ताहै ”
सृजन से जुड़े  होने के नाते अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार व् कर्तव्य के साथ आह्वान करती हूँ कलम के उन सिपाहियों का,कि वे अपनी कलम को इतना सशक्त बनाएं ताकि पत्रकारिता समाज का वह रूप दिखा सके जिसमें सच्चाई  हो. और ऐसी स्वच्छ  निर्मल, छविउभर कर आये जो सदियों से उत्पीडित मानवता को सही मार्ग दिखा सके. यह एक चुनौती है, आतंकवाद,सम्प्रदायवाद,सामाजिक बुराईयों के खिलाफ ..क्योंकि किसी सार्थक अभिव्यक्ति की मार इतनी गहरी होती है,की मानव वेदना से पीड़ित कलम समाज की व्यथा को एक ‘आह के रूप में प्रस्तुत करती है—
जो कलम सरीखे टूट गए पर झुके नहीं
उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है,
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहींगयी
वह तो मशाल की तरह जलाई जाती है.
वस्तुतः पत्रकारिता, निर्भीक ,निडर,व् निष्पक्ष होनी चाहिए. घटनाओं को उनके सही सही विवेचन निष्कर्ष के साथ प्रस्तुत कर समाज को एक सन्देश देना भी पत्रकारिता का प्रधान नियम है.
यह नीड़ मनोहर कृतियों  का,
यह विश्व बना रंगस्थल है,.
 है परंपरा लग रही यहाँ ,
ठहरा जिसमे जितना बल है”–प्रसाद
 पर सच्ची पत्रकारिता इस होड़ में न उलझ कर समाज के प्रति निहित कर्तव्यों का निर्वहन कर सके तभी उसका महत्त्व है, अन्यथा नहीं. हमारे सामने गणेश शंकर शुक्ल, लाला लाजपत राय,तिलक,शिवप्रसाद गुप्त,विष्णु पराड़कर जैसे उदाहरण हैं जिन्होंनेपत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान कर ज्वलंत क्रांति व् चेतना का सूत्रधार बनाया था. और अंग्रेजी प्रशासन की हिला दी थी, दबे कुचले मानसिकता को पाले भारतीयों की धारा ही बदल दी थी.हमारे समाजमे व्याप्त दहेज़ हत्याओं,कन्या भ्रूण हत्याओं , नारी उत्पीडन के खिलाफ चल रहे आन्दोलनों को मीडिया की शक्ति ने ही सफलता के शीर्ष पर ले जाने का कार्य किया है,आज ये ज्वलंत मुद्दे पत्रकारिता की मदद से ही जन समर्थन और चर्चा का विषय बने हैं. पत्रकारिता भी कई मुद्दों पर भारतीय महिलाओं और सामाजिक संगठनों के साथ कदमताल कर रही है.संघर्ष की राह में हम अकेले नहीं है यह भी उन्होंने सिद्ध किया है. परन्तु ऊल्लेखनीय  बात यह है क़ि केवल फैशन,ग्लेमर ,या बाजारवाद से उपजी उपभोक्ता संस्कृति को पर आधारित खबरों को ही हम सच्ची पत्रकारिता नहीं कह सकते. बल्कि अपनी सच्ची ख़बरों ,सही आकलनों, खोज और निष्कर्षों के आधार पर जनता की आवाज बनना ही सच्ची पत्रकारिता है. चाहे वह नीतीश कटारा कांड हो या हेतल धनञ्जय काण्ड,राज्जिव गांधी की हत्या से उपजे मर्मान्तक सवाल हों या चौरासी के दंगों से लेकर पाकिस्तान में सरबजीत की फांसी का मामला हो, पत्रकारों ने अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह भी किया है.
अभी हाल ही में घटित आरुषि हत्याकांड के परिप्रेक्ष्य में यह भूमिका शायद सही ढंग से नहीं निभाई गयी वह पुलिस ,प्रशासन,व् सामाजिक दबाव का शिकार होकर रह जाती यदि पत्रकारों ने स्वयं आगे आकर,एक अभियान के तहत  सही रास्ता नहीं दिखाया होता ,यहाँ इसका सार्थक पहलू यह रहा क़ि इस काण्ड से जुड़े सभी तथ्यों गवाहों और परिस्थितियों से पूरा देश अवगत हो सका. —
”दो राह समय के रथ का घर घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,”–दिनकर
 ”समय सचमुच तेजी से बदल रहा है, जन-मन की क़तर पुकार, उनकी समस्याओं सामाजिक मुद्दों से जुड़े सवाल, आतंक,अनाचार, गरीबी, दहेज़ जैसी बुराईयों के खिलाफ भी पत्रकारिता की आवाज उठी है, जिससे आज जनता की आवाज को दबा पाने का साहस किसी में नहीं रह गया है. ..पत्रकारिता ज्वलंत सामाजिक न्याय और उनके संघर्षों एवं हक के लिए उठी एक सशक्त और मुखर आवाज है,अभी हाल ही में अयाचित महिला विमर्शों के दरदनाक पहलुओं पर पत्रकारिता के निडर कदमों ने अपनी अस्मिता और न्यायायिक जद्दोजहद से जूझती देश की  महिलाओं को एक संबल भी प्रदान किया है,,,आज महिलाएं न केवल स्वयं पत्रकार बन एक आंधी की तरह अनेक बाधाओं को पार करना जानती हैं ,बल्कि अपने अधिकारों के लिए सजग भीं,देश आगे बढ़ रहा है क्योंकि संविधान का चौथा स्तम्भ सजग है –प्रहरी है राष्ट्र का —
दिल्ली के आम चुनाव में ”आप पार्टी ‘का चुना जाना ,वर्षों से कार्यरत पूर्व मुख्यमंत्री का कहीं परिदृश्य में भी नजर न आना -सब देश की कुशल पत्रकारिता के चलते सम्भव हो पाया ,,जन-नेताओं को अपने पत्र में यथोचित  जगह देकर ,तीखे सवाल-जवाबों से उनके  उद्देशों एवं नीयत की तह तक पहुंचना और फिर देश की सामाजिक समस्याओं के लिए जूझना –ये सब पूरे देश ने देखा,—बिजली-पानी के लिए पीड़ित दिल्ली की आवाज बनकर जन लोक पाल के लिए आम आदमी की कराहें और चीखों को पूरे देश ने सुना,,,वस्तुतः पत्रकारिता जन-सरोकारों सेकभी अलग हो ही नहीं सकती किसी कवि ने कहा है –”न तीर निकालो,न तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल ही,अख़बार निकालो,”
प्रसिद्ध पत्रकार -साहित्यकार जेम्स मैक डोनाल्ड ने लिखा है–”पत्रकारिता को मैं रणभूमि से भी बड़ी चीज समझता हूँ -यह  पेश नहीं बल्कि पेशे से भी कोई ऊंची चीज है ,-यह एक जीवन है जिसे मैंने अपने को स्वेच्छा पूर्वक समर्पित किया ”
पत्रकारिता का सीधा संबंध समाज-सेवा और विश्व बंधुत्व के उदात्त भाव की स्थापना से है,-आम जन को शिक्षा -सूचना  और स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना ही पत्रकारिता का सरोकार है,स्पष्टतः पत्रकारिता आम-जन के प्रति सामाजिक सरोकारों के  उत्तरदायित्व पूर्ण  निर्वहन का व्यवहारिक सत्कर्म है,,,
परन्तु जैसे बदलाव समाज में हो रहे हैं ,,मूल्यों का ह्रास ,नैतिकता का पतन,,,मानवता का लोप -उनका प्रभाव  पत्रकारिता पर भी पड़ा है,, आज कहीं न  कहीं पत्रकारिता ने आंशिक ही सही नैतिक मूल्यों को  खो दिया है,आज की पत्रकारिता संवेदना  विहीन और मनोरंजक हो रही है, -आम आदमी की पीड़ा में भी उसे कोई चटखारेदार खबर  चाहिए–क्योंकि आज के पत्रकार ”प्रोफेशनल्स ”कहलाना पसंद  करने लगे हैं , उनमे अब मिशन या क्रांति जैसे बात बहुत कम नजर आती है,,,गाँवों की समस्याओं से विमुखता ,और तथाकथित ब्रेक न्यूज,-स्टिंग पत्रकारिता ”-से प्राप्त प्रसिद्धि और पैसा उन्हें भी भ्रमित करता है ,,,आज पत्रकारिता बाजारवाद से अत्यधिक प्रभावित दिखाई देती है,कि वह चाहते हुए भी उससे मुक्त नहीं हो सकती ,आज हर पत्र परोक्ष रूप से सही किसी न किसी दल से जुड़ा नजर आता है  जिनकी दृष्टि में समाज को नापने-परखने का पैमाना दूसरा होता है, कभी सत्ता पक्ष का स्तुति-गान,तो कभी विपक्ष को लज्जित करना ही उनका उद्देश्य होता है,–डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र लिखते हैं –”प्रजातान्त्रिक समाज के विकास में  यहएक  बड़ा अवरोध है कि पत्रों का सञ्चालन बड़े बड़े उद्योगपति कर रहे हैं -जिनकी आर्थिक शक्ति  अनेक स्वतन्त्र  पक्षों का गला घोंट देती है -उनके पत्र देश-सेवा के लिए नहीं,  साधना के लिए हैं  ,इसलिए वे   चाहकर भी  सत्य का समर्थन और  अनौचित्य  का विरोध नहीं कर सकते –सामाजिक उत्थान के लिए अपनी आवाज उठाना  वे अपना कर्तव्य तो मानते हैं पर  वर्त्तमान पत्रकारिता का सबसे  बड़ा व् दुखद पहलू यह भी है –”बाजार की अनदेखी जब पत्रकार करता है तो भूखों मरता है ,और उसके अनुसार चले तो उसकी समाजिक प्रतिबद्धता और  नैतिकता  पर सवाल उठते हैं ”   जो पत्रकारिता लोकतंत्र का आधार थी ,,आज लोक और तंत्र के बीच कड़ी पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों को भूल स्वयं सवालों के घेरे में है ,आज पत्रकार की भूमिका समाज में पहले की अपेक्षा बड़ी और महत्त्व पूर्ण हो गई है ,-यह सहज ही देखा जा सकता है,कि पत्रकारिता धीरे धीरे समाज ही नहीं देश को भी संचालित कर रही है समाज की बुराईयों को सामने लाने में वह सराहनीय कार्य अवश्य कर रहा है,परन्तु जहाँ उनका दायित्व विहीन व्यवहार कष्ट देता है वहीँ आशा की एक किरण भी जन्म लेती है,—समय के साथ पत्रकारिता में भी कई बदलाव आये ,जब उन्होंने अपने कर्त्तव्य का सुन्दर निर्वहन भी किया –कारगिल का युद्ध हो या आंतरिक गृह कलह सबमे उत्कृष्ट प्रदर्शन भी हुआ, जब जब देश पर बहरी संकट आया ,आक्रमण हुए ,या संसद पर आतंकी हमला ,ताज-त्रासदी का प्रसंग हो मिडिया और पत्रकारिता ने देश का मान बढ़ाया है ,सही रिपोर्टिँग ,उचित तर्कों के आधार पर समाज को न्याय भी दिलाया है ,बात चाहे ”निर्भय’ या ‘दामिनी’ प्रसंग की हो लगातार सही मुद्दों पर अपनी बहस जारी रखते हुए ,सही तर्कशक्ति से पत्रकारिता ने साथ दिया है,,,,दहेज़ हत्या या कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में तो निसंदेह एक मिशन के तौर पर काम करते हुए पत्रकारिता ने पूरे समाज में जागरूकता फैलाने का स्तुत्य कार्य किया है,अपराधियों क सजा दिलवाई है इसलिए उनसे उम्मीदें ज्यादा बढ़ गई हैं ,उनके सामाजिक सरोकारों का दायरा विस्तारित हुआ है,,,उनके दायित्व बढे हैं ,अतः चुनौतियां भी बढ़ी हैं इसमें संदेह नहीं ,लेकिन उनके कदम भटके नहीं –सब कुछ पत्रकारिता और मीडिया पर ही छोड़ देना उचित नहीं ,प्रशासन और जनता को अपने अधिकारों -कर्तव्यों के प्रति सजग रहना होगा ,अपने कर्तव्यों का कुशल निर्वहन करना होगा —
पत्रकारिता कहती है
पकड़ो मेरा दामन तो करो वंचितों
शोषितों का सम्मान
जो लड़ सकते हो –
सिर्फ शब्द के सहारे ,
तो थामो कलम की कमान ”
 आज की कर्मठ पीढी भी समाज के विकास का आधार भी पत्रकारिता को ही मानती है. –युवा शक्ति की पहचान बनकर उभरी पत्रकारिता ने उनके विकास,उनके लक्ष्य प्राप्ति के लिए नई राह भी निकाली है,आज उनकी आवाज  सुनी जाती है —उनके  विमर्शों और तर्कों के आधार पर पूरा देश आंदोलित हो सकता है,क्रांति की एक मशाल हमारे पत्रकारों के हाथ में भी है,सामाजिक न्याय की लड़ाई में उनका सबल साथ मिले तो देश तमाम आसन्न आपदाओं से सहज ही मुक्ति पा सकता है,विकास के रास्तों पर आगे बढ़ सकता है –जय-हिन्द !
मैं एक आवाज हूँ,
आने वाले ‘कल की ,
समय के पृष्ठों पर अंकित ,
पढो मेरी कहानी ”-

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