भारतीय मनीषा सदा से ही समन्वयवादी रही है । कारण , उसने सनातन सत्ता को भी सभी आभासिक प्राचीन भारत में सौन्दर्य – बोध सृजन सम्मिलन से होता है , संघर्ष से नहीं । इसीलिए हमारे यहाँ कहा गया है – ‘ सत्यं , शिवं , सुन्दरम् ‘ । हम लोग ‘ सत्य और शिव ‘ के साथ – साथ सुन्दर ‘ के भी उपासक रहे हैं । तभी तो प्राचीन भारत में विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में आश्चर्यजनक उन्नति हुई थी , जिनमें सौन्दर्य की परमाभिव्यक्ति हुई है ।
आर्य धारणा के अनुसार , जीवन स्वयं प्रकृति की विराट व्यवस्था का एक विभाग है , विच्छेद नहीं । इस प्रकार प्रकृति संस्कृति की अनन्त संभावनाओं का स्रोत । लय विराट का विधान है । संगति और सन्तुलन विराट की लय गति में समाहित हैं । रूप और रचना लय में प्रकट होती है । यह प्राकट्य ( अभिव्यक्ति ) ही सर्जन । रूप में लय का साक्षात्कार ‘ सुन्दर ‘ है । चूँकि रूपायन और रचना सृष्टि की मौलिक प्रवृतियाँ हैं , अतः रूप और रचना का विधान , जो ‘ सुंदर ‘ का सर्वस्व है , मन एवं जीवन के विकास का भी विधान है ।
सौन्दर्य की अभिव्यक्ति विभिन्न कलाओं से होती है और सबसे बड़ा कलाकार परमेश्वर है। उसका आनन्द कला का रूप धारण करता है। विश्व उसकी प्रत्यक्ष कला है —
‘जगच्चित्र समालिख्य स्वात्मन्याम तुलिकया,
स्वयमेव तदालोक्य प्रीणाति परमेश्वरः ।’
अर्थात परमेश्वर स्वयं फलक है, स्वयं तूलिका है, स्वयं चित्रकार है। वह विश्व चित्र को चित्रित कर, स्वयं उसे देखकर प्रसन्न होता है। सम्पूर्ण प्रकृति उसका मनोरम चित्र है। मानव की प्रत्येक कला उस परम कलाकार की कृति की अनुकृति मात्र है।
हमारे पूर्वजों ने सौन्दर्य तत्व के मर्म को बहुत बारीकी से समझा और सृष्टि की सर्वोत्तम कृति नारी को सभी रूपों में दिव्यत्व प्रदान किया। किन्तु उनके हाथ वहीं नहीं थम गये। भाषा, साहित्य, वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, काव्यकला, नाट्य, संगीत, गायन, शिल्प, श्रृंगार, सज्जा अल्पना व चौक पूरना आदि सभी कलाओं के क्षेत्र में भी उन्होंने कमाल की कारीगरी दिखायी है, जो उस समय शेष विश्व के लोगों के लिए अकल्पनीय थी।
व्याकरण वेत्ताओं ने सुन्दर का निर्वचन इस प्रकार किया है — सु+उन्द+अर, अर्थात, सुष्ठु उनति आर्द्रयति चितम = जो चित्त को भली भांति आर्द्र बनाये। कोशकारों ने ‘ रुचिरम् चारु, मनोज्ञम, बल्गु बन्धुरम् रमणीयम ‘ को सुन्दर का पर्याय माना है। अमर कोश तक आते-आते ‘ सुन्दरी रमणी, रामा के प्रयोग होने लगे, जिसका अर्थ था — रुपलावण्य सम्पन्ना नारी, क्योंकि वह मन को  आर्द्र कर देती है।
भरतमुनि ने अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में नारी को अखिल सौन्दर्य और मुख का निधान बताया है। सच तो यह है कि भारतीय सौन्दर्य चिन्तन में नारी केन्द्र बिंदु है, जहाँ से रूप के समस्त लक्षणों-शोभा, कान्ति, लावण्य आदि की परिभाषाएँ और सौन्दर्य की व्याख्या आदि प्राप्त होती है। अतः सुन्दरी ही सौन्दर्य की परिभाषा, स्त्रोत और आधार है।
यद्यपि यह कहा गया है कि जो स्वयं सुन्दर है, उसे सौन्दर्य प्रसाधन की आवश्यकता नहीं है (किमिव हि मधुराणां मण्डनमाकृतीनाम (मधुर आकृति वालों के लिए मण्डन से क्या लाभ), प्राकृत शोभा से कहो क्या पा सका श्रृंगार, जरूरत क्या उसे गहनों की जिसे खूबी खुदा ने दी ; और Beauty requires no naments, तथापि सभी-सभी युगों में नारी के सौंदर्य में वृद्धि के लिए श्रृंगार, के विविध उपाय किये गये है। यहाँ प्राचीन भारत मे प्रचलित सौन्दर्य प्रसाधनों पर प्रकाश डाला जा रहा है
 अंगराग और सुगन्ध
भारत आरम्भ से ही धर्म प्रधान देश रहा है । अतः अंग राग और सुगन्ध की रचना और उपयोग को तामसिक वासनाओं का उत्तेजक न मानकर , समाज – कल्याण और धर्म प्रेरणा के साधन रूप में सौंदर्य प्रसाधन माना गया है । वैदिक साहित्य , महाभारत , बृहत्संहिता , निघंटु , सुश्रुत , अग्नि पुराण , मार्कण्डेय पुराण , शुक्रनीति कौटिल्यकृत ‘ ‘ अर्थशास्त्र ‘ , अमर कोश आदि में विविध अंगरागों और सुगन्धों का रचनात्मक और प्रयोगात्मक वर्णन पाया जाता है , जिसमें दर्पण निर्माण – कला , उद्वर्तन ( उबटन ) , विलेप , धूलन , चूर्ण , पराग , तेल , दीपवर्ति , गंधोदक , स्नानीय चूर्णवास , मुखवास आदि का विधान सम्मिलित है । शारंगधन ने त्वचा की रक्षा और सुन्दरता के लिये पारद ( पारा ) के धातव रसों जैसे कई प्रकार के मिश्रणों का वर्णन किया है ।
अंगरागों को तैयार करने के लिये राज – प्रासादों में प्रसाधक और प्रसाधिकाएँ नियुक्त होती थी । जब लिये विशेष अंगराग तैयार किया करती थी और उसका श्रृंगार कार्य भी करती थी । द्रौपदी को एक वर्ष का अज्ञातवास काटना पड़ा था तो वह रानी सुदेष्णा की दासी बनकर प्रतिदिन उसके लिये विशेष अंगराग तैयार करती थी और उसका श्रृंगार कार्य भी करती थी।
प्राचीनकाल भारत की महिलाएँ स्नान से पूर्व तेल-मर्दन (तेल मालिश) करवाती थी। त्वचा को स्निग्ध और कोमल रखने के लिये तरह – तरह के उबटनों का प्रयोग करती थी । यहाँ तक कि यौवन के प्रदर्शन के लिए सफेद बालों को काला रँगने की प्रथा भी प्रचलित थी। केश चमकाने के लिए सुगंधित तेल प्रयोग में लाये जाते थे। होठों को लाल और सुगन्धित बनाये  रखने के लिये अलक्तक रस (आलता), तम्बाकू (पान) और मुखवास का प्रयोग किया जाता था। शरीर को सुगठित, सुडौल और सुगन्धित बनाये रखने के लिये बादाम के तेल और बादाम की खली का सुगन्धित लेप बनाकर लगाया जाता था। त्वचा को कान्तियुक्त और कोमल बनाये रखने के लिये उत्तम आहार के प्रति भी विशेष ध्यान दिया जाता था।
मुख्य  प्रसाधन के लिये विलेपन और अनुलेपन, उद्वर्तन, रंजक चक्रिका, दीपवर्ति आदि , सिर के बालों के लिये विविध प्रकार के तेल, धूप और केश-पटवास आदि। आँखों के लिए काजल, सुरमा और प्रसाधन शलाका आदि, होंठों के लिये रंजक शलाकाएँ , हाथों और पाँवों के लिये मेंहदी और महावर ( आलता ) , शरीर के लिये चन्दन , देवदारू और अगरू आदि के विविध लेप तथा शरीर के अन्य अंगों के लिये सुगन्धित तेल और इत्र, दन्त प्रसाधन के लिये अनेक प्रकार के मंजनों का विधान था, जिसके लिये अनुभवी शास्त्रज्ञों द्वारा प्रसाधकों तथा प्रसाधिकाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाता था । 
केश
आकर्षक व्यक्तित्व और सौन्दर्य के प्रमुख चिन्हों में सिर के बालों का प्रमुख स्थान है । भारत और समीपवर्ती देशों में लम्बे , चमकीले , घने और स्वस्थ बाल महिलाओं के सौन्दर्य का सर्वोत्तम अंग माने जाते । स्त्रियों के केश विन्यास और श्रृंगार की कला तो भारत में चरम सीमा तक उन्नत हो चुकी है। सामान्यतया सम्पूर्ण भारतीय समाज में , विशेषतया महाराष्ट्र और दक्षिण के प्रदेशों में , फूलों की कलात्मक वेणियों ( चोटियों ) का गुन्थन और प्रयोग देखकर तो पाश्चात्यजन दाँतों तले अँगली दबा ले देखे गये हैं । वैसे केशों और रोमों का मुख्य प्रयोजन शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि करना ही नहीं , बल्कि शरीर को कुप्रभावों और कीटाणुओं से बचाते हुए शरीर के तापक्रम को आवश्यक रूप से नियमित करना भी है । 
नेत्र
मनुष्य के विविध अंगोपांगों में त्वचा और केशों के पश्चात नेत्र ही सबसे महत्वपूर्ण अंग माने जा सकते हैं । इसीलिए सुन्दर नयनों वाली महिला को मृगनयनी और कमलनयनी जैसे विशेषणों से विभूषित किया जाता है । अतः नेत्रों की रक्षा और सौंदर्य साधना अंगराग साधना में एक महत्वपूर्ण विषय नेत्रों की सौंदर्य साधना की दृष्टि से भारतीय महिलाएँ सुरमा और काजल का प्रयोग आदि काल से करती चली आ रही हैं । अनुसंधान के पश्चात यह पाया गया है कि प्राचीन काल में नयनों के सौंदर्य – संवर्धन के लिये नेत्र – छदों , भौंहों और बरौनियों आदि पर विविध प्रकार के अंग रागों का प्रयोग किया जाता था । लकड़ी अथवा हाथी दांत की सलाई ( शलका ) से अंगराग आँखों में लगाया जाता था।
 ओष्ठ (होंठ)
होठों के सौन्दर्य के लिये भारतीय अंगराग शास्त्र में ‘ पान चबाना ‘ और होंठ रंगने के लिये रंजक शलाकाओं का उपयोग होता आया हो । इस विधि से मोटे और भद्दे होंठों को भी पतला और सुन्दर दिखाया जा सकता है । होठों का सम्पर्क जीभ के साथ होने के कारण यह आवश्यक है कि इन शलाकाओं की रचना में कोई भी विषैला हानिकारक और स्वाद बिगाड़ने वाला तत्वाद्रव्य न रहे । रात को सोते समय हॉटों को गरम पानी से धोकर गुलाब जल से ग्लीसरीन का 5 प्रतिशत घोल बनाकर और थोड़े से नींबू रस के साथ मिलाकर अंगुलियों से हल्की – हल्की मालिश करने से होठ सदा कोमल और चिकने बने रहेंगे ।
कर्ण ( कान ) 
मनुष्य के कान भी सौंदर्य के अंग हैं । कानों की बनावट यदि ठीक न हो और उन पर अत्यधिक रोम ( बाल ) पाये जायें तो इस ओर बचपन में ही ध्यान दिया जाना चाहिये । हमारे प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख है कि अंगुलियों को ठीक तरह से उचित दिशाओं में घुमाकर कानों की नसों को व्यायाम कराने से कानों की बनावट ठीक हो सकती है । कानों पर आटा अथवा बेसन , एक प्रतिशत चूना , पानी और थोड़ा सा घी या तेल मिला कर धीरे – धीरे उबटन की तरह मलने से कानों के ऊपर के रोम कम किये जा सकते हैं । कानों के भीतर की सफाई और स्वास्थ्य के लिये सोते समय , सप्ताह में कम से कम एक बार , सरसों या तिल के तेल में थोड़ा सा कपूर गरम करके मिल जाने पर , कानों में गुनगुना ( कुनकुना ) छोड़ना चाहिए । पुष्पोवासित चमेली का तेल तो इसके लिये सर्वोत्तम माना गाया है । कान में दर्द होने पर सुदर्शन के पत्ते का अरिस कान में डालने पर लाभ होता है । तेल या अर्क डालकर कान में रुई का फाहा लगाकर सो जाना चाहिए । वैसे कान की सफाई के लिये हमारे देश में , विशेष रूप से छोटे – छोटे कस्बों और ग्रामों में नाई और कुशल विशेषज्ञ भी उपलब्ध रहते हैं । सो कभी – कभी इनकी सेवा से भी फायदा उठाया जा सकता है । 
दन्त (दाँत)
वैयक्तिक सौन्दर्य के लिये दाँतों का बहुत महत्व है । सुन्दर दाँतों को ईश्वर की विशेष देन समझना चाहिये । उनका सौंदर्य बनाये रखना हर मनुष्य का कर्तव्य है । मोतियों के समान सफेद , सुन्दर और चमकते – दमकते दाँतों की ओर आवश्यक ध्यान न देकर मनुष्य न केवल अपने सौंदर्य पर धब्बा लगा देता है बल्कि सदैव के लिये स्वास्थ्य भी खो बैठता है । नीम , खैर , कदम्ब , करंज , बड , इमली , आम , जामुन , बेल , गूलर , बेर , तेंदु – मौलिश्री , अशोक , बबूल आदि पेड़ों की दातौन के प्रयोग में दांतों की सफाई ही नहीं होती है बल्कि दातौन का ब्रुश बनाने में कुछ व्यायाम और लाला ( लार ) ग्रन्थियों में से अधिक स्राव भी होने लगता है । इसके अतिरिक्त , दातौन करने से जीभ से आगे गले तक से गन्दे रस बाहर आ जाते हैं और गले को शांति मिलती है । दातौन के अतिरिक्त , दंत – मंजन और दंत – लेपों का प्रयोग भी अत्यधिक लाभप्रद होता है । 
हस्त, बाहु और नख ( हाथ , बाहें और नाखून ) 
हमारे देश में विवाह योग्य कन्याओं के हाथों और उँगालियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है । सुन्दर , स्वच्छ और सुडौल हाथ , अंगलियाँ और बाहें किसी भी नारी के सौंदर्य को द्विगुणित कर देती हैं । दिनभर के विविध कार्यों के कारण हाथों में रूखा सूखापन आ सकता है जिसके कारण त्वचा फटने लगती है और कभी – कभी रक्त – स्राव होकर घाव भी हो जाते हैं । अच्छे तेल की मालिश द्वारा रक्त संचार भी सुचारू रूप से होता है । हाथों में लगे दाग – धब्बों को मिटाने के लिये नींबू मलना चाहिये । रात को सोते समय बादाम रोगन , मलाई में नींबू का रस और गुलाब जल मिलाकर मालिश करनी चाहिए । शरीर की सफाई के लिये रस और गुलाब जल मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
स्वस्थ नख सदा गुलाबी और चमकीले होते हैं । शारीरिक स्वास्थ्य के साथ – साथ नाखूनों की स्वस्थ्ता भी नारी के सौंदर्य में चार चाँद लगाती है । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि स्वस्थ व स्वस्थ नखों को ही श्रृंगार – प्रसाधन द्वारा अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है । नारी के नख – शिख सौंदर्य का भारतीय साहित्य रस और गुलाब जल मिलाकर मालिश करनी चाहिये । में बहुत ही सुन्दर वर्णन मिलता है । 
पाँव ( पैर ) 
पाँव का सौन्दर्य उसको ठीक – ठीक बनावट ( स्त्रियों के चपटे पैर अच्छे नहीं माने जाते हैं ) स्वच्छता और निर्गन्ध त्वचा पर निर्भर करता है । पर की अंगुलियों की सामने की आकृति खिले हुये फूल की पंखड़ियों के समान होनी चाहिए । ऐसे ही सुन्दर ‘ चरण कमल ‘ का गुणगान करते भारतीय साहित्य ने हमारी संस्कृति का अमरत्व प्रदान किया है । 
हमारे देश में गर्मी के दिनों में पाँव की तली में लौकी का गूदा मलकर और मेंहदी की पत्तियों को पीसकर उसका लेप लगाकर शरीर और विशेष रूप से मस्तिष्क में पहुँची गर्मी कम किये जाने का प्रचलन आदिकाल से ही चला आ रहा है । 
पाँवों को स्वच्छ , स्वस्थ और सुन्दर रखने के लिये दैनिक स्नान के पश्चात् और रात को सोते समय , उन्हें अच्छी तरह से धोकर किसी स्निग्ध अंगराग या सरसों के तेल में उनकी मालिश करनी चाहिए । कवि बाल्मीकि ने जगज्जननी सीता जी के चरण कमलों की प्रशंसा में लिखा है कि उनकी सुकोमलता , स्वच्छता और सौंदर्य के सामने संसार के सभी पुष्प संकोच से झुक जाने में अपना अहोभाग्य समझते थे । 
कन्याओं और महिलाओं के पाँवों की तलियों और अंगुलियों पर मेंहदी से चित्रांकन की कला तो भारत में चरम सीमा तक पहुँची हुई है । मेंहदी के शृंगार के बिना तो ‘ दुल्हन ‘ विवाह – मण्डप में पाँव नहीं धर सकती । ‘ आलता ‘ से चित्राकिंत पाँव का श्रृंगार तो कला का सजीव चित्रण कहा जा सकता है । 
अंत में कहा जा सकता है कि सौंदर्य मानव – जीवन को आकर्षक एवं रमणीय बनाता है । जिसके लिए मनुष्य को प्रत्येक अंग – प्रत्यंग की शोभा के परिरक्षण की आवश्यकता होती है । अंग – प्रत्यंग का सौंदर्य संपूर्ण सौंदर्य की अवधारणा को चरितार्थ करता है । निष्कर्षतः सौंदर्य को इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है :- 
 ” मन को आकृष्ट करने एवं लुब्ध करने की ‘ एकतान प्रभाव – क्षमता ‘ का नाम ही सौंदर्य है जो सम्पूर्णता में भास्वर होता है । “
डॉ माला मिश्रा
एसोशिएट प्रोफेसर, अदिति महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय.

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