इस पंद्रह अगस्त को हिंदी के बड़े कद के बड़े साहित्यकार रामदरश मिश्र जी की सौवीं वर्षगाँठ है। उनका 101वाँ जन्मदिन। इस अवस्था में भी वे खूब सक्रिय, स्वस्थ हैं। लिखते-पढ़ते हैं, पाठकों और साहित्यिकों से निरंतर संवाद भी बनाए रखते हैं। अभी हाल में उन्हें मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग का राष्ट्रीय कबीर सम्मान मिला है। इससे कुछ अरसा पहले ही हिंदी का अत्यंत प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान उन्हें मिल चुका है, और यह उनसे ज्यादा पूरे हिंदी जगत का सम्मान था। इसलिए कि अरसे बाद किसी हिंदी साहित्यकार को यह सम्मान मिला था। उनसे पहले हिंदी के लेखकों में केवल हरिवंशराय बच्चन और गोविंद मिश्र को ही यह सम्मान प्राप्त हुआ है।
रामदरश जी मेरे गुरु हैं। उनसे बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया है। बरसों से उनका आत्मीय स्नेह और सान्निध्य मुझे मिलता रहा है। भला मेरे लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं, पर उन्होंने कुछ ऐसा किया कि जीवन निखर गया। बहुत से भटकावों से उन्होंने बचाया और मुझे राह मिल गई।
और मैं कोई अकेला नहीं। ऐसे असंख्य लोग हैं, जिन्होने रामदरश जी के नजदीक जाकर साहित्य के मायने सीखे, जीने के मायने सीखे। लिखने के मायने सीखे। एक सरल सादगी के साथ खुद्दारी से जीना सीखा। और जो लिखा, उसके शब्द-शब्द में खुद को पिरोना सीखा।…अपने सारे सुख-दुख, तकलीफों और छोटी-बड़ी लड़ाइयों से गुजरते हुए भी, स्वाभिमान से सिर उठाकर जीना क्या होता है, यह हमने रामदरश जी से सीखा। और उनसे थोड़ी रोशनी लेकर अपने जीवन को भी थोड़ा उजला कर लेने की कोशिश हमारी पूरी पीढ़ी ने की। बल्कि लेखकों की कई पीढ़ियों ने की।
रामदरश जी अपने जीवन में, लेखन में, विचारों में सही मायने में आधुनिक हैं। सही मायने में प्रगतिशील भी हैं। पर इसके साथ ही वे एक बड़ी गौरवशाली और सतत प्रवहमान परंपरा के मूर्तिमान प्रतीक भी हैं, जिनके निकट आकर सुख मिलता है। उनके निकट होना एक व्यक्ति के निकट होना नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की सैकड़ों बरसों से चली आती एक महाधारा के निकट होना है, जिसकी छुअन भी हमें शीतल करती है। जिसका स्पर्श हमारे भीतर कोई एक विराट अहसास जगा देता है। इसलिए उनका होना ही हम सबके लिए एक उत्सव है। और उनका अपने जीवन के सौवें बरस में होना तो एक महोत्सव ही कहा जाएगा। पिछले दिनों साहित्य अकादेमी द्वारा उनकी शताब्दी मनाने के इस सुंदर आयोजन हुआ। उसमें हिंदी साहित्य जगत की तीन पीढ़ियों की सहभागिता अपने आप में बहुत कुछ कह जाती है।
आज उन पर लिखने बैठा हूँ तो यादों का पूरा एक कारवाँ चल पड़ा है और सर्दियों का वह धूप भरा दिन मेरी स्मृतियों में दस्तक देने लगा है, जब मैं एक भीतरी उमंग से भरकर यों ही रामदरश जी के यहाँ पहुँच गया था बातचीत करने के लिए। उस दिन रामदरश जी के जीवन के तमाम पन्ने खुले और खुलते ही चले गए। मैं लगभग पूरे दिन उनकी बातों और उनके अनुभवों की आँच में सीझा उनके पास बैठा रहा। उनकी जिंदगी और लेखन-यात्रा तथा संघर्षों के बहुत-से मर्म-बिंदु जानता था, लेकिन उनकी आधार-पीठिका पहली बार खुली। और उस खुली बातचीत में रामदरश जी को ज्यादा खुलेपन से और कहीं ज्यादा करीब से जाना।


परम आदरणीय प्रकाश मनु जी !
हम जब से साहित्य जगत से जुड़े हैं, अपने गुरु के प्रति इतना अधिक समर्पित कोई भी व्यक्ति नहीं देखा।
परम पूज्य आदरणीय मिश्र जी के लिए 10 भागों में लिखा इतना लंबा लेख!!!! हमने लगभग तीन या चार किश्तों में इसे पढ़ा।मानो आपने इस लेख में उनकी पूरी जीवनी, उनका पूरा चरित्र, उनका स्वभाव, उनके क्रियाकलापों से झलकते उनके एक-एक गुण; कुछ भी नहीं छोड़ा। आपके इस लेख को पढ़ने के बाद उनके बारे में कुछ भी जानना शायद शेष नहीं रह जाता।
आपने जितनी भी कविताएँ इसमें दी हैं, आपकी स्वयं की भी, सभी बहुत अच्छी हैं।
उनके प्रति आपका यह समर्पण देखकर मन गद्गद् हो गया।
आपने साबित किया कि श्रेष्ठ साहित्यकार कैसे होते हैं, एक इंसान कितना अच्छा हो सकता है!
यहाँ पर उदारता, सरलता, अपनत्व और वास्तविक प्रेम की हद भी नजर नहीं आती चाहे कितनी ही दूर तक चले जाओ।
इस पर लिखने के लिए यहाँ हमारे पास बहुत कुछ था, लेकिन हमारे शब्दों के खजाने में से हम ऐसे शब्द ढूँढ नहीं पा रहे हैं, इसलिए थोड़े लिखे को अधिक समझिएगा।यह गुजारिश है हमारी।
इसे पढ़ते हुए एक बात हमने और महसूस की कि आपका बस चलता तो आप इस लेख को खत्म ही ना करते, आपके सारे शब्द चुक जाते तब भी शायद आपका लेखन तृप्त न होता। उनके प्रति आपके प्रेम और श्रद्धा की यह पराकाष्ठा है।
साहित्यकारों के प्रति हमारे मन में बहुत सम्मान है और अपने उस पूरे सम्मान के साथ हम आप दोनों को ही सादर प्रणाम करते हैं!
एक बात आपने बिल्कुल सही कही
*”जो सहृदय पाठक केवल शब्दों को ही कविता नहीं मानते, बल्कि शब्द और शब्द तथा पंक्ति और पंक्ति के बीच के खाली स्थान को भी पढ़ना जानते हैं, उनके लिए यह बात अबूझ न होगी कि रामदरश जी की इस निस्पृहता के भीतर बहुत गहरी रागात्मकता की एक नदी बह रही है। वे कितना भी चाहें, उससे मुक्त हो ही नहीं सकते।”*
आपको पढ़कर यहाँ हमने भी महसूस किया।
आप दोनों को ही एक बार फिर से हमारा सादर चरण स्पर्श है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आप दोनों को ही सदा स्वस्थ और दीर्घायु रखें।
इस लेख की प्रस्तुति के लिए दिल की गहराइयों से तेजेन्द्र जी का शुक्रिया। हमारे जुड़ने के बाद की यह पुरवाई की श्रेष्ठतम रचना है।
और पुरवाई का इसके लिए विशेष शुक्रिया।