बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
डॉक्टर अमिता आकर गुड मॉर्निंग क़हती हैं और मेरा हाल पूछती है। मैं उन्हें देख कर चहक जाती हूँ वो थोड़ी सी जल्दी में लग रही थी। वो पर्दे खींचते हुए कहती हैं -‘मैं एक बार आपको चेक कर लूँ पारुल जी?’ मैं सहर्ष तैयार हो जाती हूँ।
‘आप सो पाईं रात में डॉक्टर?’
‘बिल्कुल, घर जाते ही सो गयी थी।‘
वो मेरे इंसिसन साइट और गरोइन को चेक करती हैं और फिर कहती हैं कि आज आपके टाँके हम इंसिसन के निकाल देते हैं पारुल जी। जब संगमा के साथ मिल कर उन्होंने ये प्रॉसेसेज़ किया तो बहुत ज़्यादा दर्द तो नहीं हुआ पर कम भी नहीं था। उन्होंने मुझे एक लम्बी साँस खींचने को कहा और वो कोई तार पेसिंग वाइअर था जो उन्होंने निकल दिया और संगमा के साथ मिल कर ड्रेसिंग भी कर दी। वो जल्दी से फिर चली गयीं।
हम लोगों का नाश्ता हो गया था। आज मेरे लिए कोई सूप आया था।
संगमा के अलावा सभी डे शिफ़्ट की नर्सेस आ गयी थीं। मैंने संगमा से पूछा कि वो क्यों नहीं गयी, तो उस ने बताया कि आज उसकी डबल शिफ़्ट है,कल रात के बाद अब वो आज दिन में भी यहीं रहेगी, वो शाम को जाएगी।
नींद नहीं आएगी क्या इसे, मैं सोच रही थी। सिस्टर मेरे बालों में आज सुबह रबड़ बैंड लगा गयी थी, बाल मुझे पीठ में चुभ रहे थे तो मैंने चोटी आगे कंधे पर घुमा ली थी। ऑक्सीजन ट्यूब तो नहीं पर अब हाथ में बँधा ऑटोमेटिक बी पी अप्रेटस परेशान कर रहा था। हर पंद्रह मिनट में ये ख़ुद ही घुन घूँ कर चालू हो कर रीडिंग लेता था जिस से अचानक मैं डर कर उछल पड़ती थी। कितना भी याद रखो, नींद आ जाए तो वो खुल जाती थी।
अब एक नर्स उस काम को कर रही थी जो वो ख़ुद को ज़्यादा स्मार्ट समझने वाला स्टाफ़ करता था उसकी शिफ़्ट ख़त्म हो चुकी थी। और ये नर्स बार–बार दरवाज़ा चेक कर आती थी। पर आज मेरे डॉक्टर का कहीं अता–पता नहीं था। इसी बीच री–सर्जरी वाले मरीज़ अपने आप साँस लेने की कोई कोशिश न करते हुए सोने की धृष्टता भी कर चुके थे। ये व्यवहार तो संगमा को बिल्कुल पसंद नहीं था। वो एक और नर्स के साथ चिल्लाती हुई उनके पास पहुँची। ‘आप से कहा है न, लम्बी साँस लीजिए, सोना नहीं है।‘ वो दोनों उस मरीज़ को देख ही रही थीं, कि आँधी तूफ़ान की तरह बहुत सारे डॉक्टर्स के साथ मेरे डॉक्टर दाखिल होते हैं वो सीधे बग़ैर इधर–उधर देखे उन्हीं मरीज़ के पास पहुँचते हैं। ख़ूब सारे निर्देश आदेश वो सब डॉक्टर्स को देते हैं, आज उनकी आवाज़ थोड़ी तीखी भी है तेज़ भी है।
वो आज जब मेरे पास आते हैं तो फिर वो ही ख़ूब सारे सैनेटाइज़र से हाथों को रगड़ कर धो डालते हैं। इस धोने में ग़ुस्सा है, तीव्रता है, जैसे कोई चिढ़ है, आज वो काफ़ी बहुत ज़्यादा गम्भीर नज़र आ रहे हैं और ‘गुड मॉर्निंग मिसेज़ सिंह‘ के साथ ‘हाउ आर यू‘ भी पूछा तो है पर उसके जवाब का इंतज़ार नहीं किया। सीधा दूसरा सवाल कर दिया।
“क्या मैं एक बार आपका इंसिसन साइट देख सकता हूँ मिसेज़ सिंह?”
“जी डॉक्टर।“
स्टाफ़ द्वारा पर्दे डाल दिए जाते हैं। संगमा डॉक्टर अमिता और मेरे डॉक्टर ही बस अंदर रहते हैं उन पर्दों के। वो संगमा की ओर देखते हैं संगमा और डॉक्टर अमिता आगे बढ़ कर मेरे घाव से कपड़े हटा कर ड्रेसिंग खोल देती हैं। वो चेक करते हैं फिर दोनों सिरों से दबा कर देखते हैं। पीछे हट जाते हैं। और पर्दे से बाहर निकल जाते हैं। संगमा मेरी ड्रेसिंग और कपड़े फिर से व्यवस्थित कर देती हैं।
“अब ठीक हैं पारुल जी, हम कर्टंज़ हटा दें ?” पूछ कर मेरे जवाब से आश्वस्त होने के बाद डॉक्टर अमिता पर्दा हटा देती हैं। मेरे डॉक्टर दूसरी ओर मुँह फेरे खड़े हैं। डॉक्टर अमिता उन्हें ‘सर‘ पुकारती हैं तो वो पलटते हैं।
“मिसेज़ सिंह आप अच्छा रिकवर कर रही है पर इसमें आपका कोई योगदान नहीं है। अभी तक आपकी ये आक्सीजन ट्यूब हट जानी चाहिए थी। अपने लंग्स के लिए आपको खुद मेहनत करनी होगी। आप लम्बी गहरी साँस लेती रहिए। आज़ से आपको स्पाइरोमीटर मिल जाएगा आपका लक्ष्य जल्द से जल्द उसकी तीनों बाल्स को उठाना होगा।” फिर वो फ़र्श को देखते हुए कुछ सोचते से नज़र आते हैं, जैसे कोई कहूँ न कहूँ, या कैसे कहूँ की कशमकश में होता है। और फिर वो कह देते हैं।
“और आप प्लीज़ कुछ टाइट टॉप पहनिए कोई टाइट टी शर्ट या ब्लाउस। So that the heaviness of your upper parts doesn’t cover the incision site and speeds up the healing प्लीज़ विअर सम टाइट क्लाथ्स सो दैट हैविनेस एंड सेगिनेस आफ ब्रेस्ट डजंट कवर दा इंसिसन साइट। यहाँ कोई और ड्रेस अलाउड नहीं होता पर हम आपको ये इजाज़त दे रहे हैं।“
“डॉक्टर अमिता“
अब वो डॉक्टर अमिता की ओर मुख़ातिब होते हैं
“येस सर।“
“इनके अटेंडेंट को समझा दीजिए, वो इनके लिए कपड़े ले आएँगे।“
“जी सर, मैं अभी करती हूँ।“
डॉक्टर अमिता की बात पूरी होने से बहुत पहले मेरे डॉक्टर कमरे के दरवाज़े से तेज़ी से बाहर निकल चुके थे। डॉक्टर अमिता और बाक़ी सब डॉक्टर्स भी उनके पीछे पीछे चले गये।
मुझे आज किस बात के लिए ये रूखी–सूखी बातें सुनने को मिली थी मुझे नहीं समझ आ रहा था। संगमा और बाक़ी नर्सेस अपने काम में लग गयी थीं। मैं लेटे हुए सोच रही थी आज अचानक मेरे वुंड पर प्रेशर क्यों आ गया था। मैं लम्बी–गहरी साँस लेकर खुश्क हो गयी थी और ये मेरा कोई योगदान नहीं है रिकवेरी में, बता कर चले गये थे। हद है ऐसे कौन बात करता है। और तुम इनके लिए अपनी प्यारी पड़ोसन सुदेश जी से नाराज़ हो गयी थी पारुल ! पेशंट लॉयल्टी शिफ़्ट कर दूँ क्या?
मैं डॉक्टर अमिता का इंतज़ार करती रही पर वो नहीं आयीं। मेरा सर घूम रहा था। तभी एक डॉक्टर आकर अपना नाम बताते हैं और कहते हैं कि वो फ़ीज़ियोथेरेपिस्ट हैं, मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं आज से एक्सरसाइज़ शुरू करना चाहती हूँ। मैं अपनी सहमति देती हूँ। वो कहते हैं कि आज हम आपको बेड के साइड में खड़ा करेंगे। आप चाहेंगी तो एक कुर्सी पर बैठ भी सकती हैं थोड़ी देर के लिए। मैं हाँ कह देती हूँ, वो थोड़ी देर में आने का कह कर चले जाते हैं।
वो जल्द ही वापस आते हैं। अपने एक और सहयोगी के साथ मिल कर मुझे पहले पूरा प्रोसेस समझते हैं कि वो मुझे कैसे उठाएँगे और मुझे क्या ध्यान रखने हैं। मुझे अगर कहीं भी दर्द होने लगे तो तुरंत बताना है और रुक जाना है और जितना कर सकूँ उतना ही करना है। वो मेरी सभी तारें और ट्यूब्ज़ समेट कर बेड के दायीं ओर सेट कर लेते हैं और बहुत ही सहजता से मुझे बेड के सहारे खड़ा कर लेते हैं, पहले से ही चप्पल वहाँ रख दी गयी होती है। मैं खड़े होकर सामने देखती हूँ फिर डॉक्टर को देख कर मुस्कुराती हूँ। वो वेरी गुड मेम कहते हैं। मेरे पैर तनाव महसूस कर रहे हैं पर मैं ख़ुश हूँ। मेरे शरीर में खून इधर–उधर बुल्क–बुल्क दौड़ रहा है पर मैं ख़ुश हूँ। मुझे अपनी ही एक कविता याद आ जाती है।
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कैंटीन वाले हम लोगों का प्री लंच स्नेक्स लेकर आते हैं जिसमें आज मेरे लिए जूस है। इस जूस के लायक़ मेहनत तो मैंने की थी। इस लिए मैं जूस के साथ पूरा–पूरा न्याय करती हूँ। और फिर सो जाती हूँ। लंच में आज मेरे लिए दाल का पानी सूप और सूजी की खीर आती है।
संगमा री–सर्जरी वाले मरीज़ का मास्क हटा कर आक्सीजन ट्यूब लगाती है पर जल्दी ही फिर टुन टुन कर उसका मॉनिटर बज़ उठता है, बार–बार और वो फिर मास्क पर आ जाता है। जिसे वो बार–बार उखाड़ भी फेंकता है क्योंकि उसे सोने नहीं दिया जा रहा है। संगमा किसी काम से बाहर जाती है, तो इस बार मास्क उतरने पर वो नाज़ुक सी प्यारी सी नर्स उसके पास जाती है। मास्क वापस लगा कर कहती है।
‘आप इसे नहीं हटायिए बार–बार, ये आपके लिए ही तो लगाया गया है, वरना फिर साँस कैसे आएगी ? हुन्न… बोलो!!’
वो सज्जन मास्क लगे मुँह से ही सिस्टर को देखते रह जाते हैं।
“हुन्न… बोलो!!” सिस्टर ने फिर पूछा।
वो बेचारे क्या कहते, उनका हाल तो कुछ यूँ था कि …..
‘आप को देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया…..’
सिस्टर “हुन्न… बोलो।”
और फिर मास्क नहीं हटाते वो एक बार भी। एक–दो बार और वो नर्स उनके पास आकर जो भी कहती है वो मान लेते हैं। वो उन्हें लम्बी साँस लेने को कहती है, वो लेते हैं।
उस प्यारी सी नर्स के “हुन्न… बोलो” में वो जादू था जो आदिकाल से किसी भी स्त्री के समक्ष किसी भी पुरुष को बेचारा, निरुपाय बनाता आया है, वो जादू यहाँ चल गया था। पुरुष स्वभावत: स्त्री के किसी भी रूप के समक्ष आशा भरी निगाहों से ही देखता है। उसे लगता है उसी के पास हल है उसकी सारी समस्याओं का। भरण–पोषण की दुरूह कँटीली धूप सी ज़िम्मेदारियों से व्याकुल वो ठंडी नर्म छाँव सदा अपने जीवन की स्त्रियों में ही तलाशता व पाता है। पुरुष स्वभाव अपनी भावनाओं को प्रकट न कर पाने के लिए शापित है, और ऐसे में कोई स्त्री चाहे किसी भी रिश्ते में हो जब उसका अनकहा समझती है तो वो उसके समक्ष आँख मूँद आराम पाता है। समर्पण उसका स्वभाव नहीं पर ऐसी स्त्री के समक्ष वो अपने हथियार खूँटे पर टाँग रखता है। इसीलिए अपनी बेटियों और बहनों, माँओं और उस स्त्री के समक्ष पुरुष प्रायः समर्पण किए रहते हैं, चाहे वो उन से उमर में छोटी ही हों। और री–सर्जरी वाले मरीज़ तो हदपार बेचारगी से घिरे हुऐ थे। यहाँ किसी पर उसे विश्वास नहीं बन रहा था। विश्वास बनता भी कैसे, बेचारे की आँखें तक तो खुल नहीं पायी थीं, कि फिर री–सर्जरी हो गयी। पर अब उसने दर्द और अपनी असुविधाजनक स्थिति से परेशान होकर समर्पण का फ़ैसला कर लिया था। मिट्टी को ख़ुदा कहने से मिट्टी ख़ुदा नहीं बन जाती। पर उस विश्वास से मिली ताक़त से इंसान मुसीबतों से टकरा जाता है। री–सर्जरी वाले मरीज़ ने अपना धरती का ख़ुदा धार लिया था उस नन्हीं सी बच्ची को।
संगमा और उस नर्स को ये पैटर्न पकड़ने में ज़्यादा देर नहीं लगती कि भाई साहब इन नर्स के अलावा और किसी की बात नहीं मानते। नतीज़ा ये कि दो घंटों में ही वो नर्स उनके पास जाती है और कहती है– “डोरा सिंह जी अब मैं आपका मास्क हटा कर ये नली आपकी नाक में लगा दूँगी, आप लम्बी साँस लेते रहिएगा।“
री–सर्जरी वाले मरीज़ का नाम पता चल गया। उनका नाम डोरा सिंह है। डोरा सिंह जी का हाल तो ये के आप जो कहें वो सब मंज़ूर मोहतरमा।
डोरा सिंह जी को आक्सीजन ट्यूब लग गयी थी, और वो काफ़ी सीधे होकर बैठे थे अब अपने बेड पर। वो कमरे में इधर उधर देख कर पहली बार कमरे का मुआयना कर रहे थे। जिसके लिए वो गर्दन कम आँखों का इस्तेमाल ज़्यादा कर रहे थे। गर्दन का इस्तेमाल तो वो बस तब कर रहे थे जब वो नर्स कमरे में इधर उधर जाती थी, जिसकी बात वो सुनते थे। वो जैसे पूरी तरह से सम्मोहित थे उस नर्स से, जो उनका नया–नया ख़ुदा थी। उन्हें जैसे बस उसी पर विश्वास था। सारी नर्सेस मिल कर आपस में आज कुछ ख़ुसुर–पुसुर भी कर रही थीं। वो मुस्कुरा मुस्कुरा कर डोरा सिंह का नाम डोरिमोन रख चुकी थीं अपने आपस के कोड के लिए। डोरा सिंह जी न पानी माँग रहे थे मेरी तरह, न चाय। वो बस अभी ऐसे थे जैसे कोई सावधान की स्थिति में हो। वो सावधान की स्थिति में थे कि वो नर्स उन्हें कुछ कहे और वो वैसा ही कर दें। ये उनकी रिकवरी के लिए वरदान साबित होने वाला था। मैंने थोड़ी देर उन्हें ऑब्ज़र्व किया फिर आँखें बंद कर लीं। मेरे पेट में दर्द था। सर घूम रहा था। मैंने नर्स को बुला कर चेक करने को कहा और मेरा अनुमान सही था मुझे पीरियड शुरू हो गये थे। अभी दस दिन पहले ही पीरियड हुए थे इतनी जल्दी फिर से क्यों? मैंने सिस्टर से हेल्प माँगी पर मुझे पेड्स का अरेंजमेंट ख़ुद ही करना था, सो उन्होंने मेरे अटेंडेंट्स तक मेसेज पहुँचा दिया। बहुत लम्बे इंतज़ार के बाद विवेक आया और पैकेट दे गया नर्स को। मैंने जब उस से पूछा कि चाचा क्यों नहीं आए? तो उस ने बताया वो घर पर हैं कुछ काम है ऑफ़िस का, तो अभी मैं ही था नीचे।
“आप कैसी हैं चाची जी?”
“ठीक हूँ।“
“क्या आपको दर्द है?”
“नहीं।“
मैं झूठ बोल रही थी। पर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था। विवेक ने कुछ और भी बातें की फिर वो चला गया। मैं तो पर बस इस सोच में थी कि बी वी घर क्यों हैं। हालाकि मैं कल से उन्हें घर जाने को ख़ुद ही कह रही थी और अब वो चले गये हैं तो मुझे अच्छा क्यों नहीं लग रहा है? ऐसा लग रहा है बस हो गया!! मैं यहाँ हूँ और वो घर जाकर बैठ गये। हो सकता है ऐसा ही हो पर फ़िलहाल तो मैं इस उम्मीद में थी कि अभी वो आएँगे तो मैं उन्हें बता पाऊँगी कि मुझे मेरे डॉक्टर ने कहा है कि मेरा कोई योगदान नहीं है मेरी रिकवरी में। मैं उन्हें बताना चाह रही थी कि डॉक्टर ने मुझे कोई कसा हुआ टॉप पहनने के लिए कहा है। हालाँकि मैंने विवेक को कह दिया है कि कल वो मेरे लिए कुछ टी शर्ट्स ले आएँगे घर से।
अचानक दरवाज़े से डॉक्टर अमिता अंदर आती हैं। मेरे पास आकर मेरे हाथ पर हाथ रखती हैं।
“कैसी हैं आप पारुल जी?”
“आप का तो केस था न अभी डॉक्टर आप इस समय यहाँ कैसे?”
“हाँ पारुल जी केस चल रहा है सर हैं ओ टी में, मैं बस आपको देखने आ गयी। मुझे लगा आप परेशान होंगी।“
“मैंने क्या ग़लत किया डॉक्टर अमिता? जो डॉक्टर विकास सुबह ऐसे डाँट रहे थे, मैं पूरा समय मेहनत करती हूँ साँसें लेते रहने में।“
“आई नो पारुल जी। आप परेशान न हों वो असल में आपकी ब्रेस्ट काफ़ी हेवी हैं न और उसके एक दम नीचे क्रीज़ पर ही वूंड है सो सर कह रहे थे टाइट कपड़ों के लिए। पर मैं समझती हूँ अभी आप ब्रा भी नहीं पहन सकती हैं, वो वूंड पर ही आएगी।“
“मेरी ब्रेस्ट हेवी है तो इस में मैं कुछ नहीं कर सकती न डॉक्टर।“
“आई नो पारुल जी, फ़ैट लोगों की ये परेशानी कोई नहीं समझ सकता।“
मेरी आँखें भीग गयी थीं। डॉक्टर अमिता के हाथों की नरमी से पिघल कर वो सब आँखों से बहने को तैयार था, जो कह रहा था न मेरी ऑक्सीजन अभी हटी न मेरा वूंड सही हील कर रहा, न मेरे फेफड़े सही काम कर रहे क्योंकि मेरी ब्रेस्ट भारी हैं, सेगी हैं।
मेरा मन इस आख़िरी बात को सबसे बड़ा इशू बना रहा था। कोई औरत नहीं पसंद करती कि उसकी शारीरिक बनावट को किसी भी संदर्भ में जज किया जाए। हरगिज़ पसंद नहीं उसकी चर्चा हो, पर आज चर्चा हुई आस–पास खड़े डॉक्टर्स, स्टाफ़ सब समझ ही रहे होंगे कि मेरे शरीर के किस हिस्से के बारे में बात की जा रही है।
ये कैसा समय है, ये कैसा शरीर है जिस में अभी मैं हूँ। ये न सही से काम कर रहा है, न इसका आकार सही है। एक सर्जरी नहीं झेल पा रहा, फिर से खड़ा नहीं हो पा रहा। बूढ़ा हो गया है, बदसूरत और है ऊपर से। मेरे फेफड़े ख़ुद से साँस नहीं ले पाए तो मेरी क़िस्मत में और साँसें लिखी भी हों तो उन्हें कैसे लूँगी बग़ैर किसी मशीन के सहारे !
मुझे अचानक मनोज याद आ गया। ये जाते सत्तर और आते अस्सी के दशक की बात रही होगी। हम दोनों के परिवार एक ही मकान के दो हिस्सों में रहते थे उन दिनो। मेरे पापा डॉक्टर हैं और उस क़स्बे में प्राइवट प्रैक्टिस करते थे। मनोज के पापा सरकारी अस्पताल में नौकरी करते थे। तब तक हमारा छोटा भाई पैदा नहीं हुआ था मैं और मेरी छोटी बहन ही थी। मनोज की एक बड़ी बहन और बड़ा भाई था। हमारे परिवार आपस में बहुत घुलमिल कर रहते थे और मनोज की मम्मी मेरी मम्मी को छोटी बहन की तरह मानती थी। यहाँ तक कि हम दोनों बहनें मनोज और उसके बड़े भाई को ही राखी बाँधते थे और मनोज हमारे भाई हैं ये ही जानते थे। उस समय उस क़स्बे में हमारे घर के अलावा एक और घर में टीवी था। इस लिए पूरा मोहल्ला क्या दूर–दूर से लोग हमारे घर टीवी देखने आते थे। हम इतवार को तो टी वी पर हिंदी फ़िल्म देखते ही थे। लगभग हर दूसरे तीसरे शुक्रवार भी मम्मी पापा के साथ मैं फ़िल्म देखने जाती थी। टीवी पर आने वाली फ़िल्मों का हम पर बहुत असर था हमें वो सब सच लगता था जो दिख रहा होता था। फ़िल्म देखने के बाद अगले दिन मैं और मनोज खेलते हुए भी फ़िल्म की बात करने लग जाते थे। हमारी नन्ही समझ की सबसे बड़ी परेशानी होती थी फ़िल्म के किसी द्रश्य ख़ासकर आख़िरी द्रश्य में जब कोई भी ऐक्टर मरते–मरते कुछ कहना चाहता था, तो या तो वो कह नहीं पाता था या रुक–रुक कर कहता था या कहने की कोशिश में साँसें रुक जाने पर कह नहीं पाता था।
मैं और मनोज उस समय बहुत विचलित हो जाते थे। और धीरे–धीरे हमें यक़ीन हो गया था कि मरते समय साँसें कम पड़ती ही पड़ती हैं। हर कोई ऐसे ही कुछ कहने की कोशिशों में मरता है। और कुछ कहने की इच्छा किए–किए मर जाता है। हम घंटों बैठ कर विचार किया करते थे। कभी सीढ़ियों पर पसरे रहते थे, तो कभी छत पर खड़ी चारपायी पर लटके हुए और कभी उसी चारपायी को घोड़ा समझ कर उस पर बैठे हुए। बहुत सोचने पर भी हम कोई हल खोज नहीं पाए थे कि मरते समय कम पड़ती साँसों को कम से कम उस समय तक कैसे रोका जा सकता है, जब तक ज़रूरी बात या राज़ मरने वाला न बता दे। हमें ये भी सबसे बड़ी फ़िक्र रहती थी कि जब हमारा मरने का वक़्त आएगा तब हम दोनों क्या करेंगे।
हम दोनो की मम्मियाँ जब तब घर के काम करते करते आपस में बातें किया करती थीं। एक दिन वो दोनों बैठ कर सर्दियों की धूप में छत पर स्वेटर बनाते–बनाते बातें कर रही थीं, मनोज और मैं पास में बैठे होम वर्क कर रहे थे। बातों–बातों में मनोज की मम्मी ने कहा कि बोबों साँसें तो सबको गिनी हुई मिलती हैं। न एक कम न एक ज़्यादा। ये सुन हम दोनों के कान खड़े हो गये। हमने एक–दूसरे की आँखों में देखा और अपना बस्ता समेटा। क्योंकि एक बहुत बड़ा ख़ुलासा हो गया था जिसकी वजह से हमारी सीक्रेट खोज़ पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला था। इस लिए आपातकालीन बैठक का बुलाया जाना अत्यन्त आवश्यक था। कहाँ तो हम मरते हुए व्यक्ति के साँसें बढ़ाने के तरीक़े की खोज़ कर रहे थे, कहाँ ये वज्रपात कि साँसें तो गिनी हुई मिलती हैं। हम दोनों ने जल्दी से अपने बस्ते अपने–अपने कमरों में पहुँचाए और पहुँच गये ऐसी बैठकों के लिए हमारी सबसे अच्छी जगह ऊपर वाली छत पर जाने वाली सीढ़ियों पर। हम दोनो ने बहुत सोच–विचार किया कि जब साँसें बढ़ा नहीं सकते तो क्या तरीक़ा अपनाया जाए कि साँसें कम न पड़ें मरते समय। मैंने मनोज से कहा यदि साँसें गिनी हुई मिलती हैं, तो हम थोड़ी थोड़ी देर साँस लेना बंद कर अपनी कुछ साँसे स्टोर कर सकते हैं। मनोज ने इसका विरोध किया। उसने कहा नहीं साँसें न लेने से तो हम अभी मर जाएँगे। ये भी सच था। ख़ैर बहुत सोच–विचार के बाद ये तय पाया गया कि साँस रोक कर देख लेते हैं। अब साँस कौन रोके, मरने का डर भी था और कुछ हो जाए तो घरवालों की डाँट का भी डर था। मनोज मुझ से बड़ा था सो थोड़ा समझदार भी ज़्यादा था, उस ने मुझे पहले साँसें रोकने के लिए मना लिया। अगले दिन स्कूल के बाद उन्ही सीढ़ियों पर साँस रोकने के काम को अंजाम दिया जाना था।
मनोज अपने बड़े भाई की बड़ी सी अलार्म घड़ी छुपा कर ले आया था जिस का चमकीला नीला डायल था और उसके दो पाँव भी थे, उसमें चाबी भर कर अलार्म लगा कर बड़े भैया पढ़ने के लिए उठते थे या कभी कभी सुबह खेतों में मेंढक पकड़ने जाते ज़ुलॉजी प्रेक्टिकल के लिए अपने स्कूल के अध्यापक के कहने पर। उन दिनों ये आम बात थी विज्ञान को बहुत संजीदगी से अध्यापक पढ़ाते थे। और स्कूल इतने मेंढक मुहैया नहीं करा पाता था। हालाँकि जब हम बड़े हुए तब तक हालात बदल गये थे उसी स्कूल में मैंने हफ़्ते के दो दिन के हिसाब से ख़ूब मेंढक काटे थे वो भी स्कूल के ख़र्चे पर। ख़ैर बातें साँसें रोकने की।
मैंने मनोज से पूछा ये घड़ी क्यों लाए हो, तो उसने कहा गिनूँगा तुम कितनी सेकेंड साँसें रोक सकती हो। ताकि पता चल जाए तुम्हें कितना समय मिलेगा मरते वक़्त अपनी बात कहने का।
मैंने साँसें रोकने से पहले मनोज से पूछा– मैं मर गयी तो?
मनोज ने कहा– नहीं मरेगी। मैंने रात को मम्मी के पास सोते हुए साँस रोक कर देख लिया था। साँस फिर से आ जाती है। तू रोक साँस मैं गिनूँगा। मनोज पूरे होम वर्क के साथ आया था मुझे पर आज़माने से पहले वो ख़ुद पर ये जोखिम उठा चुका था।
मुझे लगा मनोज कह रहा है नहीं मरूँगी तो पक्का नहीं मरूँगी। मैं उसे ख़ुद से बहुत समझदार समझती थी।
और मैंने साँस लेना रोक लिया मनोज ने सेकेंड की सुई की टिक–टिक गिननी शुरू की। एक दो तीन चार पाँच… मेरी पसलियों पर दबाव बढ़ता जा रहा था, फिर मेरे गले से लेकर छाती तक जैसे नलियाँ सी सिकुड़ रही थीं। मैं हिल रही थी, मेरा चेहरा गर्म हो रहा था, मनोज चिल्ला रहा था– छोड़ दे साँस, छोड़ दे साँस, पर मैं साँस लेने को तैयार न थी। मनोज ने घड़ी फेंकी और मेरी कमर में दो मुक्के जड़े ज़ोर से। मुझे साँस आ गयी। मनोज चिल्ला रहा था कि मैंने साँस क्यों नहीं छोड़ी और मैं हँस रही थी कि मैं एक पूरा मिनट गिनवाना चाहती थी तुमसे, कि मेरे पास स्टॉक में काफ़ी साँसें बच जाएँ।
वो मुझे ‘तू उल्ली है तू उल्ली है‘ कह रहा था।
अब ये हमारा रोज़ का काम हो गया था होम वर्क निपटाने के बाद हम सीढ़ियों पर बैठ कर साँस रोकते दोनों। और एक दूसरे की रोकी साँसें गिन कर एक कापी के पीछे के पन्ने पर लिखते जाते।
एक हफ़्ते में हमारे पास रोकी हुई साँसों के मिनटों की संख्या सम्माजनक स्थिति में पहुँच गयी थी।
इस पूरे हफ़्ते हम इस साँसें बचाओ अभियान के चलते नीचे बच्चों के साथ खेलने भी नहीं गये थे। मानवता के हित में इतिहास में दो नौनिहालों का इस से बड़ा क्या बलिदान होगा भला।
जब हमें लगा हमारी गिनती की मिली हुई साँसों में से मरने के समय के लिए वक़्त ज़रूरत काम पड़ने के लिए हमारे पास पर्याप्त मात्रा में साँसें एकत्र हो गयी हैं, तो हमने इस ज्ञान गंगा को औरों में फैलाने का विचार बनाया, आख़िरकार हर अविष्कार मानवता की भलाई के लिए ही होना चाहिए।
सीधे मम्मी पापा को इस अद्भुत अद्वितीय खोज़ को बताने जितना हौसला तो हम दोनों में ही नहीं था। तो हमने फिर से एक बैठक की जिस में हमने पाया कि बड़े भाई को बताने से भी डाँट पड़ेगी और मेरी छोटी बहन तो अभी हमारी बात समझने के लिए बहुत ही छोटी है, वो तो अभी बस बोलना चलना सीख रही है। तो बची पुष्पा दीदी, मनोज की बड़ी बहन। जो हम दोनों की हर बात मानती थीं कभी–कभी हमारे साथ खेलती भी थीं। और हमारी बातें सुन कर हँसती रहती थीं।
तो एक दिन उचित समय देख कर हम दोनों पुष्पा दीदी के पास जा बैठे, जब वो छत के एक कोने में बने चौके पर बैठ कर शाम की चाय के बर्तन साफ़ कर रही थीं, उन्होंने राख को जूने पर लपेट कर बर्तनों पर रगड़ते हुए ही हमें घूरा और गर्दन के इशारे से पूछा कि क्या चाहिए। मनोज ने पहले ही तय किया हुआ था मुझ से कि ये बात मैं दीदी से कहूँगी। मैं तो दीदी की साँसें बचाने के लिए पूरी उत्साहित थी और मैंने खट–खट अति उत्साह में उन्हें ये तरीक़ा बता दिया कि अपनी साँसें स्टॉक करने के लिए उन्हें कैसे कुछ समय के लिए साँसें रोकनी हैं। बाक़ी गिनती कर के कापी में साँसों की संख्या दर्ज करने का काम हमारा। उन्होंने बारी–बारी से हम दोनों को घूरकर देखा। फिर कहा अभी मम्मी को बताऊँगी तुम दोनों ये क्या कर रहे हो, मर जाते हैं ऐसे। हमने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की कि हम बहुत से प्रयोग कर चुके हैं दीदी नहीं मरते। पर उन्होंने हमारी एक न मानी और ज़ोर से मम्मी चिल्लाना शुरू किया। हमने उनकी ख़ुशामदें की कि प्लीज़ मम्मी को नहीं बताएँ। हमने माफ़ीनामे सहित ऐसा फिर कभी नहीं करने के वायदे के साथ अपनी जान छुड़ायी। मेरा चेहरा लाल पड़ गया था।
इस अपमानजनक हादसे से उबरने में मुझे कई दिन लगे। लेकिन मनोज को हमारी इस खोज में पूरा विश्वास था हमने नीचे खेलने जाने वाले एक दो दोस्तों से इस विषय पर बात की। जो कि सारे लड़के ही थे और मुख्यतः मनोज के ही दोस्त थे। मैं उन्हीं के साथ खेलती थी। एक तो लड़कियाँ उस समय अपने–अपने पिताओं या दादाओं की चाय लेकर उनकी दूकानों या व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भेज दी जाती थीं। जो खिलौने मेरे पापा मुझे लाकर देते थे उनमें उनकी कोई रुचि नहीं थी। उनकी गुड़ियों से खेलना मुझे नहीं आता था, हालाँकि मैं खेलना चाहती थी पर मुझे कभी गुड़िया लाकर नहीं दी गयी। गाँव में रहने वाली मेरी सख़्त मिज़ाज दादी का कहना था कि मैं गुड़िया से खेलूँगी तो अगला बच्चा भी लड़की ही होगा। हालाँकि मैं गुड़िया से नहीं खेली फिर भी मेरी बहन आ गयी मेरे बाद। मेरी बहन के पास एक गुड़िया थी जिसे मेरे भाई के आने के बाद एक दिन ये कह कर फेंक दिया गया था कि मेरी बहन का बुख़ार उस गुड़िया से ज़्यादा जुड़ाव के कारण नहीं उतर रहा। ख़ैर यहाँ ये साबित हुआ कि गुड़िया से खेलने न खेलने से मेरे बहन–भाई का जेंडर डिसाइड नहीं हुआ। इस कारण से हालाँकि मेरे पापा इतेफ़ाक नहीं रखते थे, पर मम्मी दादी को कुछ कहने नहीं देती थीं। वो दादी के हिसाब से चलती थीं। मुझे याद है दादी जब हमारे घर आती थीं तो रोटी बना कर मम्मी उस पर घी नहीं लगती थीं। न दूध उबालना, न दूध रात को सबको बाँटना, ये सब काम दादी करती थीं क्योंकि दूध–घी जिसके हाथ में हो उसका आधिपत्य घरों में माना जाता था और घर की सबसे बड़ी महिला को सम्मान देने के लिए भी ये किया जाता था। पुरुषों के हाथों से कारोबार और महिलाओं के हाथों से दूध–घी जब अगली पीढ़ी के क़ब्ज़े में चला जाता था तो मानों उनका दौर ख़त्म। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों की तो ये ही परम्परा थी जो अभी भी कहीं न कहीं जमी हुई है।
बात हमारे साँसों के खेल की हो रही थी। तो एक दिन तो हमारे सभी दोस्तों ने खेल–खेल में अपनी साँस रोक ली कि कौन कितनी देर रोकता है। पर फिर किसी ने भी इस खेल में रुचि नहीं दिखायी। उस उम्र में जब रोचक और कुछ नया खेल ही बच्चों के चंचल मन को बाँध पता है और वो रोज़ एक नया खेल एक दूसरे को सुझाते हैं। हमारा ये खेल सुपर फ़्लाप हो गया। मगर मनोज ने हिम्मत नहीं हारी उसे अपनी खोज पर पूरा विश्वास था। अब एक दिन सीढ़ियों पर बैठे–बैठे उसने तय किया कि मरने के समय काम आने वाली साँसें तो हमारे पास पूरी हो गयी हैं, पर अब हम अपनी उमर बढ़ाने के लिए साँसें रोकेंगे। वो कापी पेंसिल ले आया और मुझे साँस लेकर हर बार गिनती बोलते जाने को कहा, जितनी बार साँस लूँ। मैंने वैसा ही किया। उसने एक सेकेंड तक घड़ी में देख कर मुझे रोक दिया और कहा– देख एक मिनट की बाईस साँसें हुईं मान लो तो, एक मिनट में हो गये साठ सेकेंड और साठ मिनट का एक घंटा और एक दिन में होते हैं चौबीस घंटे तो एक घंटे में साठ मिनट तो चौबीस घंटे में साठ गुणा चौबीस बटे एक यानी चौदह सौ चालीस मिनट और चौदह सौ चालीस मिनट में सेकेंड हुए चौदह सौ चालीस गुणा साठ– छियासी हज़ार चार सौ सेकेंड। उस ने फिर अपनी कापी पर कुछ और गुणा भाग किया जो इस पहले वाले की ही तरह मुझे नहीं समझ आया पर मैं मुंडी बाक़ायदा हाँ में हिलाए जा रही थी जैसे दिखा रही थी कि मैं पूरी तरह से बराबर की भागीदार हूँ इस मिशन में। हालाँकि मैं थी नहीं अब ये प्रोजेक्ट पूरी तरह मनोज के हाथ में था और मैं बस गिनीपिग थी।
पर ये शायद मेरी बचपन की आदत है न समझ आने पर भी समझने के अभिनय में गर्दन हिलते जाना। न ही मुझे गणित की वो गणनाएँ वो किस आधार पर कर रहा है ये ही समझ आ रहा था। मेरा गणित तब भी अच्छा नहीं था बस नम्बर इस लिए अच्छे आ जाते थे, जो सवाल पापा जैसे पढ़ाते थे, मैं वैसे ही उन्हें अच्छे से करना सीख लेती थी। और दसवीं तक मैंने बहुत अच्छे मार्क्स के साथ गणित निभाया। पर जैसे मनोज इस समय गणित से खेल रहा था ये मेरे बस की बात नहीं थी। मुझे उस वक़्त भी इस बात के लिए मनोज से जलन थी अभी भी है। ये शायद उस प्रतिद्वंद्विता से शुरू हुआ था जो हम दोनों के घर वाले हमारे परीक्षा के मार्क्स की तुलना कर के पैदा कर रहे थे। ये प्रतिद्वंद्विता मुझ में आज भी है अपनी भरसक कोशिशों के बाद भी, और मनोज से ही नहीं हर किसी से हो जाती है, पर केवल पढ़ाई–लिखाई की बात के लिए। काश कुछ और बातों के लिए भी मैं इस प्रतिद्वंद्वी प्रकृति की होती, जैसे लेखन। मैं हमेशा कक्षा में नम्बर दो ही आती रही और मनोज नम्बर एक पर रहा। उसने मुझे कभी नम्बर एक का स्वाद नहीं चखने दिया पर मैंने भी कभी किसी और को नम्बर दो के आस–पास नहीं फटकने दिया पूरी क्लास हम दोनों से काफ़ी नीचे रहती थी। हालाँकि पाँचवी कक्षा के बाद मैं गर्ल्ज़ स्कूल में गयी, जहाँ मेरी ही क्लास की एकमात्र लड़की और मेरी दोस्त की मम्मी हम दोनों को टीचर के रूप में मिलीं। वहाँ चाहे एक नम्बर से ही सही पर मेरी उस दोस्त को क्लास में अव्वल रखा जाता, इस तरह बाक़ी अध्यापिकाएँ अपनी लॉयल्टी मेरी दोस्त की मम्मी के प्रति दिखाती हों, या मैं सच में ही हमेशा सेकेंड के लायक़ ही थी। मैं आज इस बात को क्यों मानूँगी अपने अतीत में हम सब ख़ुद को श्रेष्ठ और शोषित ही घोषित करते हैं। पर आप ही बताइए गणित के एक सवाल के पूरी तरह सही होने पर भी मेरे निन्यानवे और मेरी उस दोस्त के सौ नम्बर क्यों आए थे, फिर क्या गणित में भी राइटिंग के नम्बर काटते हैं जैसा कि मुझे हमेशा कहा जाता था।
हाँ एक बार गणित में मेरे मार्क्स पूरी क्लास में ज़्यादा आए थे, वो हुआ यँक कि लाभ हानि का एक सवाल मुझे जैसे पापा ने समझाया मैंने परीक्षा में वैसे ही किया और पूरी क्लास के साथ मनोज ने भी वैसे जैसे अद्यापक ने बताया था। जब पापा मुझे पढ़ा रहे थे तो मैंने पापा से कहा भी था कि पापा आचार्य जी ने तो ऐसे बताया है पर उन्होंने कहा कि नहीं ये ही सही तरीक़ा है। इत्तेफ़ाक़ से अगले दिन परीक्षा में वो ही सवाल आ गया। मैं तब भी अपने पापा की बात ही सारी दुनिया से सही मानती थी आज भी मानती हूँ। सो कापी की जाँच हुई तो मेरा उस सवाल में मार्क्स ज़ीरो और बाक़ी क्लास को पूरे मार्क्स। जब घर लाकर पापा को कापी दिखायी तो उन्होंने अगले दिन स्कूल जाकर टीचर से बात की और प्रिंसिपल के दख़ल पर टीचर ने अपनी ग़लती मानते हुए मुझे पूरे मार्क्स दिए। इस तरह पाँचवी क्लास का ये एक तमग़ा मेरे अँधेरों की उन सोचों का सहारा आज भी है, जब भी पढ़ाई–लिखाई में कोई मुझ से कैसे आगे निकल गया की सोचों में गुम हो जाती हूँ।
अब तक मनोज ने हिसाब लगा लिया था कि अगर हम रोज़ दो मिनट भी साँस रोक लें तो छियासी हज़ार चार सौ गुणा बाईस बटे साठ यानि इकत्तीस हज़ार छह सौ अस्सी। तो एक दिन की इन साँसों में से हम रोज़ अठासी साँसें भी रोकें तो हमारी ज़िंदगी रोज़ दो मिनट बढ़ जाएगी। अब रोज़ दो मिनट ज़िंदगी बढ़ाने के लिए हम रोज़ सीढ़ियों पर साँसें रोकते थे। इस में एक दूसरे से ज़्यादा देर तक साँस रोकने की प्रतिद्वंद्विता ने इस खेल को मज़ेदार बना दिया था। बस पुष्पा दीदी से बच कर हमें ये सब करना होता था। वो ही उम्र बढ़ाने के हमारे मिशन की सबसे बड़ी खलनायिका थीं।
साँसें रोकने की ये आदत अनजाने में ही पढ़ाई के आगे के सालों में मेरी तो चलती रही, मनोज का मुझे नहीं मालूम। फिर कुछ दिनों बाद ही हम दोनों किराये के उस घर से अपने–अपने नए बने घरों में रहने चले गये थे। इसीलिए शायद स्विमिंग करते हुए मैं पानी के अंदर देर तक रह लेती थी। पर आज आज यहाँ इस आई.सी.यू. में मैं मनोज से पूछना चाहती हूँ कि मेरी उमर कितनी बँधी थी? कितनी साँसें हैं मेरे पास और? और जो हैं उन्हें कैसे लूँ, मुझे तो साँस ही सही नहीं आ रही मनोज। क्या हो गया था मेरे फेफड़ों को जो अस्सी सेकेंड तक भी साँसें रोक लेते थे, आज उन्हें साँस के लाले पड़े थे।

