Friday, June 21, 2024
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फ़ेसबुक से : मुहम्मद इक़बाल पर श्रीकांत सक्सेना की पोस्ट

मशहूर शायर मुहम्मद इक़बाल के जन्मदिन पर
21 अप्रैल को श्रीकांत सक्सेना की फ़ेसबुक पोस्ट
उनकी सहमति से पुरवाई के पाठकों के लिये
(इस पोस्ट में विचार लेखक श्रीकांत सक्सेना के ही है)
आज इक्कीस अप्रैल है। दक्षिण एशिया के मशहूर कवि इकबाल ने साल 1938 में इसी दिन इस दुनिया से कूच किया था और इस बात की कोई इत्तिला नहीं मिली कि बाद में बैरिस्टर इकबाल की ख़ुदा से बहस का क्या नतीज़ा निकला। वैसे इकबाल जब तक ज़िंदा रहे तो बृहस्पति, से लेकर शनि तक सभी ग्रहों का दौरा करके अपना यात्रा वृतांत क़लमबद्ध करवाते रहे। कृष्ण से लेकर शिव तक तक़रीबन सभी देवताओं के साथ लंबी-लंबी बहसें करते रहे और उन बहसों का निचोड़ भी मंज़र-ए-आम तक लाते रहे ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आए। इक़बाल बेहद ज़हीन और कम-से-कम शुरुआती दौर में एक हद तक राष्ट्रवादी भी रहे। उन्होंने भारतीय और पश्चिमी दर्शन का अच्छा अध्ययन-पारायण किया था। ये उनकी में भी भरपूर झलकता है। 
हालांकि बाद में उन्होंने अपने आपको इस्लामिक दृष्टिकोण तक सीमित कर लिया। शायद ये स्वतंत्रता संग्राम के समय कांग्रेस-मुस्लिमलीग-दलित, चल रही आपसी जद्दोजहद का नतीज़ा रहा हो। बहरहाल इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि आज के दिन महापंडित (अल्लामा) इक़बाल यानि शायर-ए-मशरिक़ मतलब पुरबिया कवि, की ज़िंदगी पर नज़र-ए-सानी मौजूं तो है ही। ग़ालिब समेत उर्दू के बहुत से शायरों की तरह इक़बाल को भी फ़ारसी का शायर कहलाने में ही फ़ख़्र का अहसास होता था। सो उनका अधिक काम तो फ़ारसी में ही है। 
लेकिन ख़ासकर हिंदुस्तान में उनकी पहचान दो तरह से है – एक शायर की हैसियत से, दूसरी सियासतदाँ की हैसियत से। पाकिस्तान में उन्हें क़ौमी शायर यानि राष्ट्रकवि का दर्जा दिया गया, उन्हें मुफक्किर-ए-पाकिस्तान यानि पाकिस्तान का विचारक और हकीम-उल-उम्मत यानि उम्मा का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कहा गया। भारत में भी उनकी लिखी दो नज़्में आज भी बेहद मशहूर हैं – बच्चों की प्रार्थना ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी…’  आज भी कितने ही स्कूलों और शायद मदरसों में भी सुबह की प्रार्थना के रूप में ज़िंदा है। कहा जाता है कि जिस खूबसूरती के साथ इसमें एक बच्चे की भावनाओं और दुआओं को शब्दबद्ध किया गया है, उतनी खूबसूरत प्रार्थना किसी भी स्कूल या पाठशाला में हो ही नहीं सकती। सो इस महत्कार्य के लिए इक़बाल को सलाम, हालांकि यह नज़्म अंग्रेज़ी की कवयित्री मैटिल्डा बैथम एडवर्स की कविता का स्वतंत्र अनुवाद है, जिसे इक़बाल के हयात रहते ही पकड़ लिया गया और इसे साहित्यिक चोरी (Plagiarised) कहा गया। 
लेकिन उस वक़्त, आज की तरह आईपीआर का मसअला नहीं था। वैसे भी मैटिल्डा ने अपनी कविता इक़बाल से चालीस साल पहले लिखी थी। वैसे अंग्रेज़ हमारे मुल्क़ से जितनी चोरी करके ले गए, उसके मुक़ाबले में हमारे एक बैरिस्टर ने अगर ज़रा सी चोरी कर भी ली तो क्या जुर्म कर दिया? वैसे इस बात के लिए अंग्रेज़ों को इक़बाल का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उन्हें मुँह छुपाने के लिए ही सही, यह कहने का मौक़ा तो दे ही दिया कि हम ही अकेले चोर नहीं हैं। हिसाब-किताब बराबर। 
अब जब बात चल ही निकली है तो लगे हाथ ये भी बता दें कि इक़बाल के वालिद, नूर मुहम्मद भी कोई मामूली आदमी न थे। गोकि वे लाहौर के मशहूर दर्जी थे; लेकिन देसी-विदेशी कपड़ों पर ऐसे बेहतरीन अंग्रेज़ी टाँके लगाया करते थे कि बड़े-बड़े साहब अंग्रेज बहादुर भी उनके फ़न का लोहा मानते थे। उस ज़माने में भी औलाद को इंग्लैंड में तालीम दिलाना बहुत आसान न था। अपुन को पक्का यक़ीन है कि अगर नूर मुहम्मद आज ज़िंदा होते तो हमारे प्राईम मिनिस्टर मोदी को कभी अपने लिए सूट सिलवाने लंदन न जाना पड़ता।
वैसे इकबाल और टैगोर दोनों को ही जागरणकाल का महाकवि कहा जाता है। इक़बाल पर अगर मैटिल्डा की कविता चोरी का इल्ज़ाम है तो टैगोर पर अपनी गीतांजलि में हाफ़िज़ की नकल करने की तोहमत लगाई जाती है। बहरहाल हम हिंदुस्तानियों ने तो दोनों को ही सर-आँखों पर लिया। एक को महापंडित (अल्लामा) कहा तो दूसरे को गुरुदेव । हालाँकि जब टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला तो इक़बाल इस हद तक ख़फ़ा हो गए कि दुनिया भर के देशों में यह यक़ीन दिलाने के लिए घूमे कि, दरअसल वे, यानि इक़बाल, टैगोर से ज़्यादा मज़बूत पाए के शायर है। बैरिस्टर इक़बाल की बहुत सी दलीलों में से एक ख़ास दलील ये भी होती थी कि टैगोर काले हैं और वे उनके मुक़ाबले बहुत गोरे, इसलिए भी अंग्रेजों के ज़माने में नोबेल पुरस्कार पर उनका ही हक़ बनता है। 
नोबेल पुरस्कार समिति की ये नीति रही है कि वे इस पुरस्कार के लिए उसी व्यक्ति के नाम पर विचार करते हैं जो जीवित हो और जिसके नाम की सिफारिश किसी न किसी सरकार ने की हो। इस नीति के चक्कर में श्रीअरबिंदो के नाम पर विचार नहीं किया जा सकता था। हालांकि ‘सावित्री’ जैसे श्रेष्ठ महाकाव्य की रचना करके, वे ये साबित कर चुके थे कि उनकी काव्य साधना अद्वितीय है और वे सार्वकालिक रूप से श्रेष्ठतम कवियों की पंक्ति में हैं। लेकिन अंग्रेज उनके नाम की सिफारिश भला क्यों करते। गाँधी जी के नाम पर विचार इसलिए नहीं हो सकता था कि, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज उनका नाम क्यों भेजते और स्वतंत्रता हासिल होने के तुरंत बाद ही उनकी हत्या हो गई। सो अपने नाम की सिफारिश के लिए इक़बाल ने पर्सिया यानि आज के ईरान का रुख़ किया। ईरान की भाषा फ़ारसी है और इक़बाल फारसी के शायर के रूप में भी ईरान में बहुत लोकप्रिय थे। 
ईरान में उन्हें इक़बाल-ए-लाहौरी के नाम से पहचाना जाता था। उन्होंने ईरान के शाह को तरह-तरह की दलीलें देकर, उनका समर्थन हासिल करने की भरपूर कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। उनकी इच्छा थी कि ईरान सरकार नोबेल पुरस्कार के लिए उनके नाम की सिफारिश नोबेल समिति से करे। लेकिन इक़बाल को निराशा ही हाथ लगी।
इक़बाल ने दोनों बार राउंड टेबल कांफ्रेंस में मुस्लिम प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया। बाद में दुनिया तो इक़बाल की इस बात को भूल गई। लेकिन बंगालियों ने इसे कभी नहीं भुलाया और बांग्लादेश बनाकर पाकिस्तानी इक़बाल से अपना हिसाब चुकता किया। यूँ टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिलाकर अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान के दो बड़े शायरों के बीच फूट तो क़ामयाबी से डाल ही दी थी। शायद जार्ज पंचम, इस खेल के बड़े खिलाड़ी थे। 
ये बात तो दुनिया जानती है कि जार्ज पंचम अपनी स्तुति में लिखे गए टैगौर के गीत ‘जन-गण-मन अधिनायक…’ पर इतने फ़िदा थे कि, इस बात पर नोबेल कमेटी से ही भिड़ गए कि, टैगोर को इसी गीत के लिए नोबेल पुरस्कार दो। बड़ी मुश्किल से पुरस्कार कमेटी उन्हें इस बात के लिए राज़ी कर पाई कि नोबेल पुरस्कार किसी एक गीत के लिए नहीं बल्कि एक संग्रह के लिए दिया जाता है। कहा जाता है इसी के बाद टैगोर ने गीतांजलि की रचना की। चूंकि गीतांजलि बंगला भाषा में थी, जिसे नोबेल कमेटी में कोई नहीं जानता था तो इसके अंग्रेजी अनुवाद की दरकार की गई। टैगोर ने इसके अनुवाद के लिए अपने समय के मशहूर साहित्यकारों से संपर्क भी किया लेकिन इतनी जल्दी किसी ने अनुवाद के लिए हामी नहीं भरी। हार कर टैगोर ने ख़ुद ही इस काम को अंजाम दिया हालांकि उनकी अंग्रेजी यीट्स जैसे
विद्वानों जैसी तो नहीं थी पर –
“आपादकाले मर्यादा न आस्ति” 
सो गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद भी टैगोर ने ही कर दिया और आख़िरकार जार्ज पंचम की ज़िद पूरी हुई। उस वक़्त भारतीय उपमहाद्वीप में दो ही बड़े शायर माने जाते थे- टैगोर और इक़बाल ।
नोबेल पुरस्कार से जुड़े विवाद को ख़त्म करने के लिए ये दलील दी गई कि टैगोर की रचनाएं सार्वभौमिक हैं, उनकी दृष्टि वैश्विक है जबकि इक़बाल की रचनाओं में इस्लाम और मुसलमानों को श्रेष्ठ मानने की क्षुद्रता है। बहरहाल अंग्रेज़ों ने टैगोर को नोबेल पुरस्कार ही नहीं दिलवाया बल्कि उन्हें नाईटहुड का सम्मान देकर उन्हें ‘सर रबींद्रनाथ टैगोर’ भी बना दिया। लोग कहते हैं कि इस बात से इक़बाल को इतनी मिर्चें लगीं कि शायद इसके बाद ही ‘इकबाल मिर्ची’ नामक संज्ञा, अस्तित्व में आई। जिसका दशकों बाद तक इस्तेमाल होता रहा। 
शायरों की दुनिया भी अजीब होती है। ये लोग भावनाओं में इस क़दर बहते रहते हैं कि अक्सर जिंदगी की सच्चाइयों को अनदेखा कर देते हैं। टैगोर के तो संपूर्ण साहित्य में भावनाओं की सांद्रता कुछ ऐसी है कि उन्हें सघन भावों का कवि कहा गया। वैसे भी बंगाली लोग सामान्य भारतीयों से अधिक भावुक होते हैं। यही बात थी कि जब 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर ने सैकड़ों निर्दोष हिंदुस्तानियों का सामूहिक संहार कर दिया तो, इस अमानवीय कृत्य से बहुत मज़बूत कलेजे भी हिल गए। शायद ही कोई हिंदुस्तानी हो जिसकी आँखें न भीगी हों। और तो और इंग्लैण्ड में भी जलियाँवाला बाग़ के संहार के विरोध में ज़बरदस्त प्रदर्शन हुए। इस भयंकर कृत्य को अंजाम देने वाले अंग्रेज़ अफसरों पर मुकदमा चलाकर उन्हें सजाएं दी गईं। 
लिहाजा भावुक टैगोर का भी दिल टूट गया। उन्होंने अंग्रेज़ों द्वारा दी गई नाईटहुड अंग्रेजों को वापस लौटा दी। ‘सर टैगोर’ कहलाए जाने को अपमानजनक संबोधन बताने लगे। हालाँकि यह रहस्य आज भी बना हुआ है कि शायर-ए-मशरिक़ कहलाने वाले इक़बाल ने अपने ही मुल्क में हुई इतनी वीभत्स घटना पर पूरी तरह चुप्पी क्यों साध ली और वे इसके ख़िलाफ़ एक शब्द भी क्यों नहीं बोले। यही नहीं अंग्रेज़ों की दी गई जिस नाईटहुड को टैगोर ने ठोकर मार दी उसे इक़बाल ने आगे बढ़कर अपने सिर पर रख लिया। उसी जार्ज पंचम ने अब नाईटहुड उठाकर इक़बाल को उनकी किताब असरार-ए-ख़ुदी के लिए दे दी। इक़बाल ‘सर इकबाल’ हो गए।
अब लिखना तो यह सोचकर शुरु किया था कि इक़बाल के यौमे वफ़ात के मौके पर उस बड़े शायर को याद कर लें, जिसने हिंदुस्तान को क़ौमी तराना दिया। पर आप जानते हैं बात में से बात में से बात निकलती जा रही है। तो बतकही के इस हिंदुस्तानी क़ौमी खेल को हम भी बीच में कैसे छोड़ दें। 
चलते-चलते आपको इक़बाल के बहुत से योगदानों में से एक-आध के बारे में और बताते चलें, ‘मज़हब नहीं सिखाता…’  लिखने वाले सर इक़बाल ने ही मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में ‘टू नेशन थ्योरी’ भी तजबीज़ की और ‘पाकिस्तान’ नामक शब्द भी ईज़ाद किया। हालांकि, चौधरी रहमत अली और सर सैय्यद अहमद ने भी इस विचार को ख़ुराक दी। ये अलग बात है कि इक़बाल की इस ईज़ाद का फ़ायदा जिन्ना ने नौ-दस साल बाद उठाया। तब तक इक़बाल, अल्लाह को प्यारे हो चुके थे। जिसका ‘शिकवा’ ख़ुदी के शायर इक़बाल ने ख़ुदा से ज़रूर किया होगा। 
एक और बात यह कि इक़बाल ने संस्कृति को धर्म का पर्याय बनाने का भी नायाब तजुर्बा कर डाला। दुनिया में कहीं भी इक़बाल से पहले, इक़बाल की हयात में और इक़बाल की मौत के बाद भी इस नायाब ख़्याल को कभी तस्लीम नहीं किया और एक बार फिर से इक़बाल की प्रतिभा का मज़ाक़ बना । ये बात और है कि इक़बाल ने ही पाकिस्तानियों को पाकिस्तान के नाम का एक मुल्क दिया पर पाकिस्तानियों की नई नस्ल इतनी नाशुकरी निकली कि आज बेशतर पाकिस्तानी ‘टू नेशन थ्योरी’ और पाकिस्तान बनाने को ही तारीख़ की सबसे नामाकूल हरक़त मानते हैं। वैसे सोचते तो बेशतर हिंदुस्तानी मुसलमान भी कुछ कुछ ऐसा ही हैं। 
चलते-चलते एक बात, जर्मन शैतान नीत्शे के बारे में भी, वही नीत्शे जिसने ख़ुदा की मौत का ऐलान किया था। इसी नामुराद दार्शनिक ने दुनिया भर के स्टूडेंट दार्शनिकों को ‘सुपरमैन’ का आइडिया दे दिया, जिसे विशेषकर हिंदुस्तानी दार्शनिकों ने लपक लिया। अरबिंदो ने इसे चैत्य का पाजामा पहनाकर इसे ‘सुप्रामेंटल’ कह दिया तो इक़बाल भी पीछे क्यों रहते उन्होंने भी नीत्शे के सुपरमैन को इस्लाम की टोपी पहनाकर उसे ‘नायब-ए-इलाही’ और ‘मर्द-ए-मोमिन’ बना डाला। 
1917 में हुई रूसी क्रांति ने दुनियाभर के नौजवानों के दिमाग़ फेर दिए थे तो हर कोई समाजवादी बनना चाहता था। इक़बाल भी तब नौजवान ही थे, उन्होंने ‘बाले जिबरील’ में लिखा- “यदि मैं कभी मुस्लिम राज्य का डिक्टेटर होता तो, सबसे पहला काम ये करता कि, उसे समाजवादी राज्य बना डालता।” उन्होंने तो शुरू में लेनिन के मुँह से ख़ुदा को बोलते हुए भी सुन लिया था । हालांकि बाद में जब इस्लाम ने उनसे उनके ज़ेहन की बेशतर सलाहियात छीन लीं तो इक़बाल ने ही ‘पयामे मशरिक़’ में लेनिन को दोज़ख़ की आग में भी झोंकने से परहेज़ नहीं किया। इक़बाल का सुपरमैन बिल्कुल नीत्शे के सुपरमैन के जैसा नहीं है। नीत्शे के सुपरमैन में ख़ुदा के लिए कोई जगह ही नहीं है जबकि इक़बाल का सुपरमैन पाँचों वक़्त का नमाज़ी है।
इक़बाल ने हिंदुस्तान को क़ौमी तराना दिया। ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा…’, हालांकि अपनी मौत से क़ब्ल वो दिन-रात ख़ुद को ही इस तराने को लिखने के लिए कोसते रहे; और इसके उलट ‘मिल्ली तराना’ लिखकर ग़म ग़लत करने की कोशिश भी करते रहे। लेकिन वही पुरानी हिंदुस्तानी कहावत ‘फिर पछताए होत क्या जब चिड़ियां चुग गईं खेत।’ शायद इक़बाल को चिढ़ाने के लिए ही हिंदुस्तान के हर गांव, शहर और स्कूल में ये तराना गाया जाने लगा। इसे हिंदुस्तान का क़ौमी तराना घोषित कर दिया गया।
इक़बाल को गए हुए ज़माना हो गया लेकिन हिंदुस्तान में आज भी यह तराना हर रोज़ जगह-जगह गाया जाता है। मतलब ये हिंदुस्तानी क़ब्र में भी तिलमिलाते इक़बाल को करवटें बदलते ही देखना चाहते हैं। किसी शायर की इससे बड़ी तकलीफ़ और बेइज़्ज़ती क्या और कैसे होगी, जब उसकी सबसे अप्रिय रचना को कोई उसे सुबह-शाम ज़ोर-ज़ोर से गाए। इस अज़ीयत से गुज़रना ही दरअसल इकबाल होना है। अपुन तो सच्चे दिल से दुआ करते हैं कि अल्लाह उन्हें मुआफ़ करे और कम से कम अब उन्हें सुकून दे दे। वैसे हमें मालूम है इक़बाल के अल्लाह से शिकवे अभी ख़त्म नहीं हुए होंगे। आख़िर इक़बाल अंग्रेज़ों के ज़माने के बैरिस्टर हैं।

श्रीकांत सक्सेना
मोबाइल न. +91 70428 82066
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2 टिप्पणी

  1. श्रीकांत जी को हम पढ़ते रहे हैं। एक समूह में हम साथ हैं। इस लेख के लिए तो निश्चित ही उन्हें बधाइयाँ देना बनता है। इसलिए कि इसको पढ़ने के बाद हमें पता चला कि एक प्रार्थना जो हमारी बहुत ही अधिक प्रिय है “लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी”वह इकबाल की लिखी हुई है। इसके लिए तो उनकी तारीफ बनती है लेकिन जब आगे पढ़ा तो पता चला यह नज़्म अंग्रेज़ी की कवयित्री मैटिल्डा बैथम एडवर्स की कविता का स्वतंत्र अनुवाद है, जिसे इक़बाल के हयात रहते ही पकड़ लिया गया और इसे साहित्यिक चोरी (Plagiarised) कहा गया तो भौंचक्के रह गए।
    एक बात और कि वे टैगोर के बराबरी के कवि थे ।लेकिन यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि टैगोर पर भी अपनी गीतांजलि में हाफ़िज़ की नकल करने की तोहमत लगाई गई। आश्चर्य की दिग्गज लोग भी ऐसा कुछ कर सकते हैं। क्या पता कितनी सच्चाई है यह तो भगवान जाने। पर श्रीकांत जी ने लिखा है तो कुछ सोच समझ कर , तथ्य तलाश करके ही लिखा होगा।
    श्रीकांत जी को पढ़कर यह भी आश्चर्य हुआ कि जब रविंद्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला तो इक़बाल इस हद तक ख़फ़ा हो गए कि दुनिया भर के देशों में यह यक़ीन दिलाने के लिए घूमे कि इक़बाल, टैगोर से ज़्यादा मज़बूत शायर है और उनकी एक ख़ास दलील ये होती थी कि टैगोर काले हैं और वे उनके मुक़ाबले बहुत गोरे, इसलिए भी अंग्रेजों के ज़माने में नोबेल पुरस्कार पर उनका ही हक़ बनता है।
    कितने आश्चर्य की बात है कि दलील मैं भी गोरे काले का हिसाब।
    यह भी पहली बार पता चला कि नोबेल पुरस्कार समिति की ये नीति रही है कि वे इस पुरस्कार के लिए उसी व्यक्ति के नाम पर विचार करते हैं जो जीवित हो और जिसके नाम की सिफारिश किसी न किसी सरकार ने की हो।
    जॉर्ज पंचम के स्वागत में रविंद्र नाथ टैगोर के लिखे हुए जन गण मन के बारे में तो खैर हमें पता ही था।
    बहरहाल अंग्रेज़ों ने टैगोर को नोबेल पुरस्कार ही नहीं दिलवाया बल्कि उन्हें नाईटहुड का सम्मान देकर उन्हें ‘सर रबींद्रनाथ टैगोर’ भी बना दिया किंतु जलियांवाला हत्याकांड से दुखी होकर उन्होंने यह उपाधि वापस लौटा दी थी यह तो हमें पता था।
    अब तो इकबाल हैं नहीं लेकिन एक बार फिर “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा” के लिए उन्हें शुक्रिया कहना होगा। भले ही उन्हें बाद में इसके लिए बहुत अधिक दुख हुआ होगा।
    श्रीकांत जी ने बहुत अच्छा लिखा इसके लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई तो बनती है।
    तेजेंद्र जी का शुक्रिया कि उन्होंने इसे पढ़कर इसका चयन किया।

  2. श्रीकांत जी ! पहली बार आपको पढ़ा बहुत ही ज्ञानवर्धक और सुरुचिपूर्ण आलेख। इकबाल के बारे में कुछ कुछ जानती थी पर आपके द्वारा दी गई जानकारी मनोरंजक भी थी और मेरे लिये नई भी ( इक़बाल और टैगोर की प्रतिद्वंदता) नोबेल पुरूस्कार की अनुशंसा की कैसे होती है
    और इक़बाल के किरदार में वैचारिक बदलाव इसके बारे में भी जाना।
    बहुत ही बढ़िया आलेख के लिये बधाई आपको।

    —ज्योत्स्ना सिंंह

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