Wednesday, February 11, 2026
होमपुस्तकदीपक गिरकर की कलम से - प्रेम की सफलता-असफलता, पीड़ा, वियोग और...

दीपक गिरकर की कलम से – प्रेम की सफलता-असफलता, पीड़ा, वियोग और जीवन की अनिश्चितताओं से भरी कहानियाँ

पुस्तक  : पच्चीसवां प्रेम पत्र (कहानी संग्रह)
लेखिका  : आभा श्रीवास्तव 
प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-155, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली- 110012   
आईएसबीएन नंबर : 978-93-6407-800-9
मूल्य   : 250/- रूपए
“पच्चीसवां प्रेम पत्र” आभा श्रीवास्तव का तीसरा कहानी संग्रह है। इनकी रचनाएँ निरंतर देश की लगभग सभी पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इस संग्रह में प्रेम के सूत्र में बंधी और प्रेम रस में घुली 20 कहानियाँ संग्रहीत हैं। आभा श्रीवास्तव ने स्त्री विमर्श के विविध आयामों को “काली बकसिया” तथा “दिसम्बर संजोग” संग्रहों की कहानियों के माध्यम से सफलतापूर्वक हमारे सामने प्रस्तुत किया था। आभा श्रीवास्तव का तीसरा कहानी-संग्रह “पच्चीसवां प्रेम पत्र” स्त्री जीवन, प्रेम और सामाजिक यथार्थ का संवेदनशील चित्रण प्रस्तुत करता है। कहानियाँ प्रेम की सफलता-असफलता, पीड़ा, वियोग और जीवन की अनिश्चितताओं से भरी हैं। 
संग्रह की पहली कहानी “दोहरा पाप”  एक रहस्य और संवेदना से भरी एक ऐसी कहानी है जो पाठक को अपने भीतर कहीं गहरे तक ले जाती है। यह एक ऐसे लोक की यात्रा है जहां दृश्य और अदृश्य शक्तियाँ एक साथ सांस लेती हैं। तीन सहेलियाँ बत्तीस वर्षों बाद अपने आप से मिलने, अपने जीवन की परतों को समझने और कुछ खोए हुए हिस्सों को फिर से छूने की चाह में नौगढ़ की यात्रा करती हैं। बिहार और नेपाल की सीमा पर बसे एक पुराने डाकबंगले में वे ठहरती हैं, जहाँ रात के सन्नाटे को चीरती बिरहा की आवाजें, चांदनी रात में गूंजती बाँसुरी की धुनें और कमरे में तैरती इत्र की रहस्यमयी खुशबू,  उन्हें किसी और ही दुनिया में ले जाती हैं। इस गहन वातावरण में भाग्यश्री अपने खोए हुए प्रेम सोहम की स्मृतियों में डूबती जाती है। उसे उसका आभास होने लगता है मानो वह कहीं आस-पास ही हो। पर क्या यह केवल उसकी कल्पना है? या कुछ ऐसा जो वास्तविकता की सीमाओं से परे है? यही द्वंद्व, यथार्थ और अलौकिक के बीच की झिलमिलाती रेखा इस कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है। यह कहानी कहीं-कहीं अविश्वसनीय सी लगती है, पर जिस विश्वास, खूबसूरती और संवेदनशीलता से इसे रचा गया है,  वह पाठक को किसी हिमाच्छादित बादलों में बनती आकृतियों की तरह सम्मोहित कर लेता है। यह कहानी आपको लौकिक और पारलौकिक की लहरों में डोलने को मजबूर करती है।
“सॉरी अलेक्जेंडर” कहानी अलेक्जेंडर (अलका) और कथानायक के बीच बीते प्रेम और अधूरी भावनाओं की स्मृतियों को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। वर्षों बाद हुई अप्रत्याशित मुलाक़ात बीते समय की तपिश और वर्तमान के एकाकीपन को जीवंत कर देती है। कथाकार आभा श्रीवास्तव  ने छोटी-छोटी विवरणात्मक बातों,  जैसे होली की सांझ, हरसिंगार बिखरना, मंदिर की घंटियाँ, अलका की आँखों की तरलता  के माध्यम से अतीत की भावनात्मक गहराई को उकेरा है। भाषा सरल, चित्रात्मक और भावनात्मक है; पात्रों की चुप्पी और दृष्टि संवादों से अधिक प्रभावी प्रतीत होती है। कथा का स्वर नॉस्टैल्जिक और आत्ममंथनपूर्ण है, जो पाठक के भीतर बीते प्रेम की पुलक और वर्तमान की पीड़ा दोनों को जगा देता है। संक्षेप में, यह रचना स्मृति, समय और संबंधों के अधूरेपन का एक सजीव और मार्मिक चित्रण है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक गूंज छोड़ जाती है।
“शी इज़ नॉट माई टाइप”  कहानी एक साधारण मगर गहरी भावनात्मक लघुकथा है, जो जीवन, समय और दृष्टिकोण के बदलने की सच्चाई को बहुत सहज ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी की नायिका तनुजा सादगी और आत्मसम्मान की प्रतीक है, जबकि विवेक आधुनिकता के भ्रम में उलझा वह व्यक्ति है, जो बाहरी चमक-दमक को स्मार्टनेस  समझ बैठता है। कहानी के शुरुआती हिस्से में विवेक का शी इज़ नॉट माई टाइप  कहना, उसके अहंकार और अपरिपक्व सोच को उजागर करता है। वहीं, पंद्रह साल बाद जब परिस्थितियाँ पलट जाती हैं, तो वही वाक्य उसके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना बन जाता है। कथाकार ने यहाँ समय के प्रतिशोध को बड़ी सूक्ष्मता से दिखाया है,  न कोई नाटकीय मोड़, न आक्रोश,  बस एक शांत, गहरी पीड़ा जो तनुजा के उत्तर में झलकती है: “मुझे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं।” यह वाक्य कहानी को एक पूर्ण और परिपक्व अंत देता है, जहाँ क्षमा, आत्मसम्मान और संतोष एक साथ घुल जाते हैं। कहानी यह सिखाती है कि बाहरी आकर्षण क्षणिक होता है, जबकि सादगी, स्थिरता और आत्मसम्मान ही जीवन की असली सुंदरता हैं। “शी इज़ नॉट माई टाइप” एक संवेदनशील और यथार्थपरक कहानी है, जो पाठक को भीतर तक छू जाती है,  बिना किसी शोर या अतिशयोक्ति के।
कहानी “मी टाइम  एक विवाहित स्त्री वंशिका के आत्म-बोध और भावनात्मक स्वतंत्रता की कथा है। पति के बाहर रहने पर उसे दो दिन का “स्वयं के लिए समय” मिलता है, जिसमें वह अपने मन का करती है, किताबें पढ़ती है, कैफ़े जाती है, और वहीं एक संवेदनशील व्यक्ति जॉन से मिलती है। दोनों के बीच सहज जुड़ाव बनता है, पर अंत में वंशिका अपने वैवाहिक दायित्व को समझते हुए यह संबंध आगे नहीं बढ़ाती। यह कहानी आधुनिक स्त्री की आंतरिक भावनाओं और व्यक्तिगत आज़ादी की चाह को बड़ी संवेदनशीलता से व्यक्त करती है। भाषा सरल है और घटनाएँ यथार्थ से जुड़ी हैं। वंशिका का चरित्र संतुलित है, वह अपने मन की बात समझती है, पर मर्यादा भी निभाती है। कहानी का मुख्य संदेश यह है कि हर व्यक्ति, विशेषकर स्त्री, को अपने लिए “मी टाइम यानी आत्म-संपर्क का समय चाहिए, ताकि वह खुद को फिर से महसूस कर सके।
“दो चेहरे – दो आँखें  एक अत्यंत भावनात्मक और प्रतीकात्मक कथा है, जो प्रेम, वियोग और जीवन के चक्र को बड़े सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत करती है। कहानी अधूरे प्रेम की पूर्णता का भावनात्मक चित्रण है। कहानी का केंद्र दो पीढ़ियों,  मोहित और मिस्टर माथुर के संवाद पर टिका है। मोहित का प्रेम संकट मिस्टर माथुर को अपने अधूरे प्रेम की याद दिलाता है। मिस्टर माथुर का जीवन शुभ्रा की स्मृतियों से भरा है। वह हर स्त्री में शुभ्रा का चेहरा ढूंढते रहे, पर कभी विवाह नहीं किया। शुभ्रा की मृत्यु के बाद उनका प्रेम अधूरा रह गया। कहानी का अंत बेहद मार्मिक है। जब सिल्विया (जो मोहित का प्रेम है) मिस्टर माथुर के कॉटेज में आती है और मोहित की माँ उसे अपनाती है, तब मिस्टर माथुर को आकाश में शुभ्रा की दो आँखें मुस्कुराती नज़र आती हैं। यह दृश्य प्रतीक है कि शुभ्रा का अधूरा प्रेम किसी रूप में सिल्विया के माध्यम से पूर्णता पा गया – “दो चेहरे, दो आँखें –  अब एक हो गईं।”
कहानी “चैताली”  समाज में स्त्री के बाह्य रूप और उसकी प्रतिभा के बीच होने वाले भेदभाव को उजागर करती है। चैताली का गायन नायक को मंत्रमुग्ध कर देता है, पर जब उसकी कल्पना यथार्थ से टकराती है, यानी जब वह उसके रूप से परिचित होता है,  तो उसका आकर्षण टूट जाता है। यह टूटन सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का प्रतीक है जो स्त्री के सौंदर्य को उसके व्यक्तित्व से ऊपर रखता है। कहानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या स्त्री की पहचान केवल उसके रूप में सीमित है? क्या उसकी कला, संवेदना और आत्मा का कोई मूल्य नहीं?
कहानी “ओ बिदेसिया” सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं है, यह स्वीकृति, आत्मसम्मान, सामाजिक पूर्वग्रह और अधूरे प्रेम की बेहद मार्मिक दास्तान है। यह कहानी भीतर तक झकझोर देती है। श्यामली का जीवन एक काली, उपेक्षित बेटी से लेकर एक आत्मनिर्भर और प्रतिभाशाली युवती तक का सफर समाज के उस क्रूर चेहरे को उजागर करता है, जो रंग, रूप और लिंग के आधार पर प्रेम और सम्मान बाँटता है। और जब अंत में रॉबिन आता है, एक ऐसा व्यक्ति जो बाहरी दुनिया से है पर भीतर से स्वच्छ, तब जाकर पहली बार श्यामली को निःस्वार्थ प्रेम मिलता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। रॉबिन  “विदेस” चला जाना और फिर कभी न लौट पाना, एक गहरे प्रतीकात्मक स्तर पर भी काम करता है, जैसे श्यामली के जीवन से प्रेम ही हमेशा के लिए विदा हो गया हो। और जो कुछ अनकहा रह गया, वही उसकी आत्मा को जीवनभर सालता रहा।
कहानी “कहाँ हो नीलकंठ…”  में नायक और नायिका का पहला प्रेम जीवन में गहरी छाप छोड़ता है। भले ही समय बीत जाए, परिस्थितियाँ बदल जाएँ और जीवन में अन्य रिश्ते आएँ, प्रथम प्यार की स्मृतियाँ, भावनाएँ और अनुभव मन में हमेशा जीवित रहते हैं।
“पच्चीसवां प्रेम पत्र” ऐसी ही एक कहानी है जो प्रेम, विरह और स्मृति के धागों से बुनी गई है। मीना की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर जब वह अपने लॉकर में एक हार ढूंढ रही होती है, तभी अतीत की परतें खुलने लगती हैं। वहाँ, सबसे पीछे छुपा हुआ, एक माउथ ऑर्गन हाथ लगता है, राहुल की दी हुई निशानी। राहुल उसका पहला प्यार। जिसके चौबीस प्रेम पत्र माँ ने एक दिन निर्दयता से जला दिए थे। लेकिन नियति के पास शायद एक और पन्ना बचा थामाउथ ऑर्गन में लिपटा पच्चीसवां प्रेम पत्र। यह कहानी सिर्फ मीना की नहीं है। यह उस पूरी पीढ़ी की है, जिनके पहले प्रेम को सामाजिक बंदिशों, पारिवारिक फैसलों और समय की आंधियों ने पीछे छोड़ दिया। गुलाबी रंग के इत्र-सुगंधित खत, जिन्हें कांपते हाथों से पढ़ा जाता था, और आंखों में सुनहरे सपने पलते थे, वे खत अब स्मृति बन चुके हैं, लेकिन असर आज भी वैसा ही है। कहानी की भाषा बहुत सहज और सरस है, लेकिन उसकी गहराई चुपचाप पाठक को भीतर तक भिगो देती है। यह सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं है, यह उस प्रेम की कथा है जो पूरा न हो सका, पर कभी समाप्त भी नहीं हुआ।
“मन अतरंगी सतरंगी” कहानी अतीत और वर्तमान के प्रेम का सूक्ष्म चित्रण है, जो पाठक के हृदय को गहराई से छूती है। कहानी गहन भावनात्मक अनुभव और प्रेम की जटिलताओं को संवेदनशील रूप में प्रस्तुत करती है। लेखिका ने साहसपूर्वक जीवन की सत्यता और भावनाओं की जटिलता को उद्घाटित किया “वो अपना सा” कहानी में सारा खेल संयोगों और परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। “जिन्दगी जब करवट लेती है तब कुछ बातें अनचाहे ही हो जाती हैं।”  यह दर्शाता है कि जीवन में अनपेक्षित घटनाएँ और नजदीकियाँ अक्सर हमारी दिशा बदल देती हैं। आभा श्रीवास्तव की नायिकाएँ, चाहे उजले रूप वाली हो या साँवली छवि वाली, प्रेम में असफलताओं और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करती हैं। लेकिन उनका दुःख स्थायी नहीं रहता;  वे उठ खड़ी होती हैं और उपलब्ध अच्छे संयोगों को अपनाती हैं। लेखिका की कहानियाँ जीवन की अनिश्चितताओं में भी साहस और संवेदनशीलता की प्रेरणा देती हैं।
नीली रात” नाम जितना रहस्यमय और खूबसूरत है, कहानी उतनी ही भावनात्मक, ज्वलंत और संतोषजनक बदले की प्रतीक लगती है। केतकी का यह रूपांतरण एक संकोची, छुईमुई सी लड़की से आत्मविश्वासी, भावनात्मक रूप से मज़बूत स्त्री बनने तक का, अपने आप में सशक्त नारी लेखन का प्रमाण है। वह सिर्फ तुषार से बदला नहीं लेती, बल्कि अपनी आत्मा को भी मुक्त करती है उस पुराने दर्द से, जो कभी उसकी पहचान का हिस्सा बन चुका था। नीली रात सिर्फ एक शारीरिक क्षण नहीं, बल्कि तुषार के लिए मोह और भ्रम का चरम बिंदु था, उसे लगा कि वह फिर से वही प्रेम पा लेगा जिसे उसने कभी ठुकराया था। पर केतकी जानती थी कि यह वापसी उसके लिए नहीं है। यह सिर्फ एक न्याय है, एक आत्म-प्रशांत ‌अधूरी पीड़ा का अंतिम समाधान। जब केतकी मुड़कर उपेक्षा से देखती है, और उसकी नज़रों में कोई पहचान नहीं होती, वह पल तुषार के लिए सबसे बड़ा दंड बन जाता है। “मेरे कलेजे में ठंडक पड़ गयी” इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह बदला नफरत से नहीं, आत्म-सम्मान से लिया गया था।
राम मिलाई जोड़ी”, “सोलह दूनी तैंतीस”, “कहो तो कहानी कहूँ”, “जवा”, “जेते जेते पाथे”, तुमसे मिलकर”, लेडीज छाता”, “आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे” इत्यादि कहानियाँ प्रेम की सफलता-असफलता, पीड़ा, दुख व त्रासदी के संयोगों से भरी हुई हैं। कथाकार ने जीवन के संयोगों और परिस्थितियों के माध्यम से यह दिखाया है कि प्रेम केवल रोमांस नहीं, बल्कि भावनात्मक संघर्ष और संवेदनाओं का जटिल मिश्रण है। पात्रों की अनुभूतियाँ पाठक के मन को छूती हैं और यह अनुभव कराती हैं कि जीवन में प्रेम का मार्ग हमेशा सरल और सीधा नहीं होता।
आभा श्रीवास्तव की कहानियाँ नारी जीवन के विविध पहलुओं और यथार्थताओं को अपनी संवेदनशील दृष्टि से उजागर करती हैं। उनके पात्र और परिवेश हमारे आस-पास की दुनिया से बहुत सजीव और परिचित प्रतीत होते हैं। लेखिका अपने समाज और समय की सच्चाइयों को निष्पक्ष और वास्तविक रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिससे कथ्य और अभिव्यक्ति दोनों में गहराई आती है। कहानियाँ घटना प्रधान हैं, पात्र अपनी अनुभूतियों को सहजता से व्यक्त करते हैं और संवाद सरल एवं स्पष्ट हैं। पात्र आंतरिक संघर्ष, आत्म-सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। लेखिका की सरल, स्पष्ट और संवादप्रधान भाषा घटनाओं और पात्रों को जीवंत बनाती है। यह संग्रह न केवल प्रेम और वियोग की मार्मिक दास्तान है, बल्कि स्त्री की अस्मिता, संवेदनशीलता और संघर्ष की कहानियाँ भी पेश करता है। आभा श्रीवास्तव ने जीवन के सभी रंग और भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से कथानक में पिरोया है। इस संग्रह की कहानियों में पारिवारिक और सामाजिक परतों का अनावरण होता है, जिससे स्त्री के अनुभव, पीड़ा, भावनात्मक संघर्ष और संवेदनाओं के जटिल मिश्रण का अनुभव होता है। आभा श्रीवास्तव एक सशक्त और रोचक कहानी संग्रह रचने के लिए बधाई की पात्र हैं। आशा है इस कहानी संग्रह का साहित्य जगत में स्वागत होगा।   
दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर– 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected] 


RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest