Wednesday, February 11, 2026
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दीपक गिरकर की कलम से – सपनों की कीमत और प्रवासी यथार्थ

पुस्तक  : इमिग्रेंट  (उपन्यास) 
लेखक  : धर्मपाल महेंद्र जैन  
प्रकाशक : आईसेक्ट पब्लिकेशन, ई-7/22, एस.बी.आई., अरेरा कॉलोनी, भोपाल – 462016  
आईएसबीएन नंबर : 978-93-88846-22-6
मूल्य   : 500/- रूपए 
प्रवासी साहित्यकार धर्मपाल महेंद्र जैन का आईसेक्ट पब्लिकेशन से इस वर्ष आया “इमिग्रेंट” उपन्यास आजकल चर्चा में है। विश्व साहित्य में कई पुरानी और प्रभावशाली कहानियाँ/उपन्यास प्रकाशित हुए हैं, जो “इमिग्रेंट” उपन्यास की तरह प्रवास, पहचान, शोषण, प्रेम, न्याय और नई ज़मीन पर जीवन के सवालों को साहित्यिक रूप से संबोधित करते हैं। डब्ल्यू. जी. सेबाल्ड द्वारा लिखित उपन्यास “द इमिग्रेंट्स” में यूरोप में निर्वासन, स्मृति और घर की परछाइयों से जुड़ी कथा है। यह उपन्यास प्रवासी लोगों के यादें, खोई पहचान और अनुभूतियाँ को गहराई से पकड़ता है। माइकल ओन्डात्जे द्वारा लिखित उपन्यास “इन द स्किन ऑफ़ ए लायन” टोरंटो के निर्माण में प्रवासी श्रमिकों की भूमिका और उनके सामाजिक व आर्थिक संघर्षों को उजागर करता है। स्थानीय इतिहास में प्रवासियों की अनदेखी भागीदारी को साहित्य की भाषा में पुनर्स्थापित किया है। समकालीन वैश्विक परिदृश्य में प्रवासन केवल भौगोलिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया व्यक्ति की पहचान, स्मृति, संबंधों और नैतिकता को पुनर्परिभाषित करती है। हिंदी साहित्य में प्रवासी अनुभवों को लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया, किंतु इक्कीसवीं सदी में यह विमर्श धीरे-धीरे केंद्र में आया है। इसी परंपरा में प्रवासी साहित्यकार धर्मपाल महेंद्र जैन का उपन्यास “इमिग्रेंट” एक सशक्त, साहसी और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कृति के रूप में सामने आता है।
“इमिग्रेंट” उपन्यास इस परंपरा से आगे जाकर वैश्विक पूँजीवाद, शिक्षा-व्यवस्था, आप्रवासन नीति और नस्लीय भेदभाव के गठजोड़ को उजागर करता है। यह उपन्यास केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का दस्तावेज़ है, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने देश, परिवार और स्वयं को दाँव पर लगा देती है।
उपन्यास का नायक अमित उज्जैन का रहने वाला एक साधारण भारतीय युवक है, जिसे उसके पिता ने कर्ज़ लेकर उच्च शिक्षा के लिए कनाडा भेजा। टोरंटो में वह एक उच्च संस्थान से एमबीए करता है। अमित टोरंटो में मैपल एक्सपो लिमिटेड में मुख्य प्रबंधक बनता है और आयात-निर्यात का कार्य संभालता है। कोलंबिया के बोगोटा स्थित कंपनी कार्यालय की जिम्मेदारी भी उसी के पास है। अमित का सपना बहुत बड़ा नहीं – कर्ज़ चुकाना, घर पैसे भेजना और सम्मानजनक जीवन जीना। किंतु कनाडा पहुँचते ही वह शिक्षा के बाज़ारीकरण, अंतरराष्ट्रीय छात्रों से भेदभाव और स्थायी निवासी (पीआर) बनने की अंधी दौड़ के जाल में फँस जाता है। उसकी मित्र रितु, जो एस्ट्रोफिजिक्स में पीएचडी कर रही है, बौद्धिक और भावनात्मक स्तर पर उसके जीवन का स्थायी सहारा है।
कथानक उस समय निर्णायक मोड़ लेता है जब बोगोटा से लौटते समय अमित को ड्रग तस्करी के झूठे आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। जेल में उसका सामना नस्लीय घृणा, अमानवीय व्यवहार और मानसिक यातनाओं से होता है। यहीं उपन्यास का सामाजिक यथार्थ सबसे तीखे रूप में उभरता है। लेखक कनाडा की जेल व्यवस्था और “व्हाइट–ब्लैक–ब्राउन”  जैसे नस्लीय वर्गीकरण को बिना किसी अलंकरण के सामने रखता है।
अमित का मित्र रथ शर्मा इस कथा का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। रथ का संघर्ष फर्जी कॉलेजों, स्टूडेंट वीज़ा घोटालों और निर्वासन की राजनीति को उजागर करता है। यह हिस्सा उपन्यास को एक व्यापक सामाजिक विमर्श में बदल देता है। लेखक स्पष्ट करता है कि किस तरह निजी शिक्षण संस्थान और सरकारी तंत्र मिलकर अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आर्थिक और मानसिक रूप से बंधक बना लेते हैं, जबकि सज़ा अंततः छात्रों को ही भुगतनी पड़ती है। 
रथ कोलंबिया पहुंचकर पूरी जाँच करना चाहता था। रितु के पापा की कोलंबिया में पहचान थी। उन्होंने अपने कुछ कॉन्टेक्ट्स रथ को दिए। रथ कोलंबिया में सहाय साहब के परिचितों से मिला और वह इस प्रकरण की तह तक पहुंचा। उसने पता लगा लिया कि यह स्मगलिंग का सारा खेल अमित का बॉस डेविड फर्नान्डो ही कर रहा है। और उसने बोगाटा में वहां के इंचार्ज एंटोनियो को भी इस खेल में शामिल कर रखा था।
चरित्र-चित्रण की दृष्टि से अमित एक ईमानदार, संघर्षशील और विवश पात्र है। उसका मौन प्रेम और नैतिक दृढ़ता पाठक को उससे जोड़ती है। रितु आधुनिक, आत्मनिर्भर और बौद्धिक स्त्री के रूप में उभरती है, जो केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि संघर्ष में सहभागी है। रथ मित्रता और जिजीविषा का प्रतीक है, जबकि डेविड फर्नान्डो जैसे पात्र पूँजीवादी लालच और कॉर्पोरेट अपराध का चेहरा बनते हैं। रथ शर्मा  मित्रता, जुझारूपन और प्रवासी जीवन की त्रासदी का प्रतीक है।
भाषा सरल, तथ्यपरक और संवादात्मक है। कहीं-कहीं पत्रकारिता-शैली का प्रभाव दिखता है, जिससे विवरण प्रामाणिक बनते हैं, हालाँकि कुछ स्थलों पर कथात्मक कसावट थोड़ी ढीली पड़ जाती है। फिर भी उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ईमानदार सामाजिक दृष्टि है। “इमिग्रेंट” उपन्यास मनोरंजन से अधिक चेतना का साहित्य है। यह पाठक को असहज करता है, प्रश्न उठाता है और उस चमकदार “कनाडियन ड्रीम” के पीछे छिपे अंधेरे को दिखाता है। प्रवासी अनुभव, शिक्षा-माफिया और वैश्विक असमानता पर लिखी जाने वाली हिंदी कृतियों में यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जाएगा।  ड्रग तस्करी की घटना उपन्यास को थ्रिलर का रूप देती है, जबकि शिक्षा और वीज़ा राजनीति का विवरण इसे सामाजिक यथार्थ के धरातल पर मजबूती से टिकाए रखता है।
उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति इसका सामाजिक यथार्थ है। नस्लीय वर्गीकरण, जेल में कैदियों के साथ व्यवहार, छात्रों का शोषण और बाद में उन्हीं को अपराधी ठहराना – ये सभी पहलू गहरी पीड़ा और आक्रोश के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। यह कृति प्रवासी साहित्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करती है। कथानक बहुस्तरीय और व्यापक है। उपन्यास में व्यक्तिगत संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक परतें जुड़ती जाती हैं। ड्रग तस्करी की घटना कथानक को थ्रिलर का रूप देती है, जबकि स्टूडेंट वीज़ा और फर्जी कॉलेजों का विवरण इसे सामाजिक यथार्थ के धरातल पर ले आता है।
“इमिग्रेंट” उपन्यास  का मूल विषय आधुनिक आप्रवासन का यथार्थ है। यह उपन्यास कनाडा जैसे विकसित देश की उस छवि को तोड़ता है, जिसे भारतीय मध्यमवर्ग स्वप्नलोक मानता है। शिक्षा का व्यवसायीकरण, वीज़ा राजनीति, नस्लीय भेदभाव और कॉर्पोरेट अपराध – ये सभी तत्व मिलकर उपन्यास को एक तीखा सामाजिक दस्तावेज़ बनाते हैं। लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट है। वह शोषित प्रवासियों के पक्ष में खड़ा है और राज्य, शिक्षा संस्थानों व कॉर्पोरेट सत्ता के गठजोड़ को बेनकाब करता है।
समग्रतः यह एक सशक्त, प्रासंगिक और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो विशेष रूप से प्रवासी अनुभवों और समकालीन शिक्षा-व्यवस्था की आलोचना में उल्लेखनीय स्थान रखता है। यह उपन्यास उन लाखों युवाओं की आवाज़ है, जिनके सपने विकसित देशों की नीतियों और बाज़ारू शिक्षा व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं। समकालीन हिंदी साहित्य में इसकी प्रासंगिकता निर्विवाद है। “इमिग्रेंट” उपन्यास  एक सशक्त, साहसी और प्रासंगिक कृति है। यह उपन्यास मनोरंजन से अधिक  चेतना  जगाने का कार्य करता है। इसकी कुछ शिल्पगत सीमाओं के बावजूद,  इसकी वैचारिक दृढ़ता और सामाजिक प्रासंगिकता इसे महत्त्वपूर्ण बनाती है।
दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर– 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. दीपक गिरकर जी !

    आपके द्वारा धर्मपाल महेंद्र जैन के द्वारा लिखे गए उपन्यास इमिग्रेंट उपन्यास की समीक्षा के बरक्स सपनों की कीमत और प्रवासी यथार्थ का यथार्थ जान पाए। उपन्यास का कथानक जानकर हम हत्प्रभ रह गए।

    ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि पहले कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि बाहर जाने वाले बच्चों को कितना परेशान होना पड़ा। लेकिन कभी-कभी हकीकत कुछ ज्यादा ही दर्दनाक हो जाती है।

    संपादकीय के माध्यम से कनाडा की राजनीति की स्थिति को समझ पाए थे। उस समय ऐसा लगा था कि वहाँ किसी भी भारतीय को नहीं जाना चाहिये। और हमें उनकी भी चिंता थी जो हमारे घर से गए थे। पर कोई किसी जाने वाले को रोक नहीं सकता। आजकल इंसान की फितरत है कि चोट खाने के बाद ही अकल आती है।

    आपने सही कहा कि यह उपन्यास उन लाखों युवाओं की आवाज़ है, जिनके सपने विकसित देशों की नीतियों और बाज़ारू शिक्षा व्यवस्था की भेंट चढ़ जाते हैं।

    “इमिग्रेंट” उपन्यास जितनी जानकारी आपने दी, वह निश्चित रूप से वैश्विक पूँजीवाद, शिक्षा- व्यवस्था, अप्रवासी नीति और नस्लीय भेदभाव के गठजोड़ को उजागर करती है।
    यह वास्तव में दस्तावेज की तरह है उन लोगों के लिये जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने देश और परिवार को छोड़कर बाहर जाते हैं, और अपने सपनों को ही नहीं,अपना भविष्य, अपना आत्मसम्मान, अपनी प्रतिष्ठा और कभी-कभी अपना प्राण भी दाँव पर लगा देते हैं।

    उपन्यास का केंद्रीय भाव वास्तव में दुखद है।

    आपकी समीक्षाएँ पढ़ते रहते हैं।
    बधाई आपको इस समीक्षा के लिये।

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