Wednesday, February 11, 2026
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दीपक गिरकर की कलम से – पवन शर्मा की लघुकथाओं में घर-परिवार और मानवीय संवेदनाएँ

पुस्तक  : छाँव जैसी औरतें (लघुकथा संग्रह
लेखक   : पवन शर्मा
प्रकाशकबोधि प्रकाशन, 14, केसर नगर ए, केसर चौराहा, नवजीवन हॉस्पिटल के सामने, मुहाना मण्डी रोड, मानसरोवर विस्तार, जयपुर – 302020
आईएसबीएन नंबर : 978-93-7251-056-0
मूल्य   : 249/- रूपए 
“छाँव जैसी औरतें” वरिष्ठ लघुकथाकार पवन शर्मा का पांचवा लघुकथा संग्रह है।  देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पवन शर्मा की लघुकथाएँ, कहानियाँ,  कविताएँ निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। इस संग्रह की भूमिका वरिष्ठ लघुकथाकार  श्री बलराम अग्रवाल ने लिखी हैं। इस संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ लघुकथाकार श्री बलराम अग्रवाल ने लिखा हैं – नवें दशक के काल से ही पवन शर्मा पारिवारिक जीवन के उतार-चढ़ाव, पीड़ा-व्यथा आदि को लघुकथाओं में अंकित करने वाले सिद्धहस्त चितेरे रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ पढ़ते हुए हमेशा यह लगता रहा कि इस कथाकार ने निम्न मध्य आयवर्ग के त्रासों और टीसों को बहुत नजदीक से देखा और झेला है। 
पवन शर्मा का साहित्यिक स्थान आज भारतीय लघुकथा जगत में अत्यंत प्रतिष्ठित है और इसकी मुख्य वजह उनके कथानक का घर और परिवार की गहराईयों पर केंद्रित होना है। उनकी रचनाएँ केवल व्यक्तिगत अनुभवों का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि वे सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ के दर्पण के रूप में भी कार्य करती हैं। घर-परिवार से जुड़े उनके कथानक पाठक को ऐसा अनुभव कराते हैं कि घटनाएँ मानो उनकी आँखों के सामने घटित हो रही हों। यही जीवंतता उनकी साहित्यिक क्षमता का प्रमुख सूचक है। पवन शर्मा की लघुकथाओं की विशिष्टता इस तथ्य में निहित है कि वे रोजमर्रा की सामान्य घटनाओं और संबंधों को अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाएँ – स्नेह, अपनत्व, मोह, तिरस्कार, आशा और हताशा  समानांतर रूप से चलती हैं  और पाठक इन भावनाओं के बीच खुद को सहज रूप से पहचान लेता है। इस दृष्टि से, उनकी लघुकथाएँ केवल कथ्य का प्रदर्शन नहीं करतीं, बल्कि समाज में विद्यमान पारिवारिक और मानवीय संरचनाओं की जटिलताओं को भी उजागर करती हैं।
“छाँव जैसी औरतें” लघुकथा स्त्रियों की निस्वार्थ सेवा और धैर्य को उजागर करती है। धूप और छाँव का प्रतीकवाद यह दिखाता है कि महिलाएँ अक्सर अनदेखी रहते हुए परिवार और समाज में सहारा देती हैं। लघुकथा में आरव की दृष्टि और संवाद, पीढ़ियों के बदलते नजरिए का संकेत देते हैं, जहाँ महिलाएँ सिर्फ छाँव नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और पहचान के साथ स्वतंत्रता भी महसूस कर सकती हैं। सरल भाषा और संवेदनशील चित्रण इस लघुकथा को भावनात्मक और प्रभावशाली बनाते हैं। “गंगा बुआ” लघुकथा प्रकृति और मानवीय संबंध के भाव को सरल और मार्मिक रूप में प्रस्तुत करती है। गंगा बुआ और नदी का रिश्ता गहरे प्रतीकात्मक हैं, जैसे नदी के बिना उनका अस्तित्व अधूरा हो। नदी का सूख जाना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि अकेलेपन और जीवन के अंत का संकेत बन जाता है।
“झील के पार” लघुकथा मोहब्बत, यादें और भावनाओं की नाजुकता को बारीकी से चित्रित करती है। राबिया और हाशिम के बीच की अनकही और धीमी बढ़ती मोहब्बत शहर और प्रकृति के प्रतीक, भोपाल की झील और रमज़ान की खुशबू  के साथ खूबसूरती से बुनी गई है। “पनाह” साम्प्रदायिक उन्माद के बीच मानवीय संवेदना की ताक़त को उजागर करने वाली प्रभावशाली लघुकथा है। बच्चों के माध्यम से लेखक भय, नफ़रत और राजनीति के खोखलेपन को बेनक़ाब करता है। मौलाना का संवाद लघुकथा का नैतिक केंद्र है, जो धर्म से ऊपर इंसानियत और करुणा को स्थापित करता है। “रास्ता” लघुकथा साधारण संवादों के माध्यम से दांपत्य प्रेम, विश्वास और समझदारी की गहरी भावना को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। लक्ष्मी की सहज, लोकबोली वाली भाषा लघुकथा को यथार्थ और आत्मीय बनाती है। उसके और बानू के रिश्ते की सादगी, आपसी समर्पण और छोटे झगड़ों के बावजूद प्रेम से जीवन जीने का दृष्टिकोण पाठक को प्रभावित करता है। लघुकथा का अंत सार्थक है, जहाँ मेमसाब लक्ष्मी के अनुभव से अपने दांपत्य जीवन की जटिलताओं का समाधान खोजती हैं। 
लघुकथा “ऐसा नहीं देखना” समकालीन समाज में मोबाइल के बढ़ते प्रभाव से मूल्यविहीन होती युवा पीढ़ी और पुरातन संस्कारों के बीच गहराते द्वंद्व को उजागर करती है। लेखक ने मोबाइल को केवल एक उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विचलन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। लघुकथा में यह संकेत स्पष्ट है कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ यदि नैतिक और सांस्कृतिक चेतना का ह्रास होता है, तो सामाजिक संतुलन संकट में पड़ जाता है। “डूब की ज़मीन” लघुकथा में नायक का दुःख केवल व्यक्तिगत क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की क्रूरता और असमानता का प्रतीक बन जाता है। डूब क्षेत्र घोषित होने के कारण उसकी ज़मीन उससे बिना किसी प्रतिफल के छीन ली जाती है, जिससे वह आजीविका और पहचान—दोनों से वंचित हो जाता है। इससे भी अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि उसे मुआवज़ा तक नहीं दिया जाता, जो राज्य और प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर करता है।   “खोए हुए चेहरे” लघुकथा समकालीन समाज की एक गहरी चिंता को सामने लाती है, जहाँ सोशल मीडिया, चैटिंग और वर्चुअल कनेक्शन ही मानो वास्तविक दुनिया बनते जा रहे हैं। लोग शारीरिक रूप से एक-दूसरे के निकट होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इस संदर्भ में रचनाकार केवल समस्या का चित्रण ही नहीं करता, बल्कि उसके समाधान की दिशा भी संकेतित करता है। कॉफ़ी शॉप का दृश्य आधुनिक जीवन का प्रतीक है, जहाँ सभी लोग अपने-अपने मोबाइल में डूबे हुए हैं। ऐसे वातावरण में एक युवती का बुजुर्ग की मेज़ के पास जाकर बैठना और उनसे संवाद स्थापित करना मानवीय संवेदना और जीवंत संबंधों की पुनर्स्थापना का प्रतीक बन जाता है। 
“तलाश” लघुकथा सामाजिक यथार्थ और बेरोज़गारी की विडंबना को प्रभावी ढंग से उजागर करती है। एम.ए. पास ऑटो चालक और बेरोज़गार यात्री के माध्यम से लेखक शिक्षित युवाओं की असफलताओं, भ्रम और संघर्ष को सामने लाता है। कथा में अनुमान और वास्तविकता के बीच का अंतर पाठक को चौंकाता है और सोचने पर मजबूर करता है। सीमित पात्रों और सरल संवादों के बावजूद कथा गहरी संवेदना जगाती है। “किराया अभी बाकी है” लघुकथा महानगरीय जीवन की कठोर वास्तविकता दिखाती है, जहाँ आर्थिक असुरक्षा के साथ निजता और आत्मसम्मान पर भी दबाव रहता है। राधिका का चरित्र आत्मनिर्भर स्त्री की संघर्षपूर्ण स्थिति को उजागर करता है, जबकि मकान मालकिन की सख्त शर्तें अविश्वासपूर्ण सामाजिक ढांचे की ओर इशारा करती हैं। छोटा कमरा, रिसती दीवारें और निगरानी भरी नजरें न केवल भौतिक, बल्कि मानसिक घुटन का प्रतीक हैं। बिजली, रिचार्ज और किराए के बीच फँसी राधिका की स्थिति निम्न-मध्यम वर्गीय संघर्ष और सामाजिक असमानता को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करती है।
“वक़्त या ज़िंदगी” लघुकथा वक्त और ज़िंदगी के बीच के सूक्ष्म लेकिन गहरे अंतर को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। संवाद के माध्यम से कथा जीवन की भागदौड़ में खोए मानवीय रिश्तों और भावनाओं की याद दिलाती है। पिता का पात्र अनुभव और जीवन-दर्शन का प्रतीक बनकर उभरता है, जबकि अजय आधुनिक व्यक्ति की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है। कथा का अंत आत्मबोध और भावनात्मक परिवर्तन के साथ होता है, जो इसे मार्मिक और प्रेरक बनाता है।
दूसरा चेहरा” लघुकथा में संवेदना का भाव स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त हुआ हैं। “अंदर कोई रहता है”, “दूसरा कमरा”, “हँसते चेहरे”, “उजाला”, “अंतिम दृश्य”, “रूह की रौशनी” जैसी लघुकथाएँ लंबे अंतराल तक जेहन में प्रभाव छोड़ती हैं।           
शैलीगत दृष्टि से पवन शर्मा की लघुकथाएँ सरल भाषा और सटीक संवादों के माध्यम से गहन प्रभाव डालती हैं। वे किसी भी कथा को अतिशयोक्ति या भावनात्मक अधिभार के बिना प्रस्तुत करते हैं, जिससे पात्रों की मनोस्थिति, उनकी संवेदनाएँ और उनके रिश्तों की नाजुकता पूरी तरह पाठक के अनुभव का हिस्सा बन जाती है। यही कारण है कि उनके लेखन में सामान्य जीवन के संघर्ष—जैसे पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ, और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ—गहन और मार्मिक प्रतीत होती हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी पवन शर्मा की लघुकथाएँ महत्वपूर्ण हैं। वे आधुनिक परिवारों के संघर्ष, रिश्तों में संवादहीनता, पीढ़ियों के बीच की दूरी और मानवीय मूल्य की चिंता को सूक्ष्म दृष्टि से चित्रित करते हैं। उनके पात्र आम होते हुए भी विशिष्ट हैं, क्योंकि वे हर पाठक की स्वयं की जिंदगी से सीधे जुड़ते हैं। इस प्रकार, पवन शर्मा की लघुकथाएँ केवल साहित्यिक सौंदर्य का अनुभव नहीं करातीं, बल्कि पाठक को सामाजिक, नैतिक और मानवीय विमर्श में भी शामिल करती हैं।
संक्षेप में, पवन शर्मा की लघुकथाएँ घर-परिवार और मानवीय संवेदनाओं के उत्थान में विशिष्ट स्थान रखती हैं। उनका साहित्यिक योगदान इस तथ्य से भी मापा जा सकता है कि उन्होंने सामान्य जीवन की घटनाओं को न केवल कथा का आधार बनाया, बल्कि उन्हें मानवीय अनुभव, सामाजिक यथार्थ और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजती हैं और उन्हें सोचने, समझने और अनुभव करने पर विवश करती हैं।  कथ्य, भाषा और विषयवस्तु की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत सशक्त है, जो पाठकों के हृदय को छूता है और उन्हें सोचने को विवश करता है। पवन शर्मा की लेखनी साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है। पवन शर्मा की लघुकथाएँ समकालीन लघुकथा साहित्य में आक्रोश के शोर के बीच संवेदना की धीमी, लेकिन गहरी आवाज़ हैं। उनकी भिन्नता उनकी सादगी, मानवीय दृष्टि, पारिवारिक सरोकार और आत्मीय भाषा में निहित है। यही तत्व उन्हें अन्य समकालीन लघुकथाकारों से अलग और विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं। आशा है प्रबुद्ध पाठकों में इस लघुकथा संग्रह का स्वागत होगा।
दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected]  


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