Sunday, July 21, 2024
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डॉ. मनोज मोक्षेंद्र की कलम से – शैलजा सक्सेना की कहानियां एक प्रयोगशाला हैं

समीक्षित पुस्तक : ‘लेबनॉन की वो रात’; विधा : कहानी-संग्रह; कहानीकार : शैलजा सक्सेना; शृंखला-संपादक : तेजेन्द्र शर्मा; प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड; प्रकाशन-वर्ष : २०२२
हिंदी साहित्य में प्रवासी लेखन अपनी उपस्थिति शिद्दत से दर्ज करवा रहा है। उसमें भी कहानी लेखन अपनी पहचान अलग से बना रहा है। प्रवासी कहानी लेखन की इस दौड़ में पुरुष कथाकार महिला कथाकारों की अपेक्षा कम दिखाई दे रहे हैं।  आज की तारीख में ऐसा लगता है कि भारत का मूल हिंदी साहित्य, विशेषतः कहानी-लेखन में, उतना उर्वर नहीं है जितना कि प्रवासी हिंदी कथा साहित्य… जो प्रभावशाली भी है – भाव और कला दोनों पक्षों के संबंध में।
दिव्या माथुर, अनिल प्रभा कुमार, इला प्रसाद, उषा प्रियंवदा, सुधा ओम ढींगरा, सुषमा वेदी आदि जैसी वरिष्ठ महिला कथाकारों के साथ-साथ  सोमा वीरा, पुष्पा सक्सेना, प्रतिभा सक्सेना, नीलम जैन, अमिता तिवारी, रचना श्रीवास्तव, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, रेखा राजवंशी, दीपिका जोशी जैसी महिला कहानीकारों की फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है। और अब एक और महत्वपूर्ण नाम डॉ. शैलजा सक्सेना का, प्रवासी महिला कहानीकारों की सूची में  शामिल हो चुका है।
शैलजा सक्सेना की कहानियों में कहानी कहने का जो उतावलापन नजर आ रहा है और सम्प्रेषण की जो धमक सुनाई दे रही है, वह पाठक का ध्यान अपनी तरफ बरबस ही खींच रही है। कहानियां लिखते हुए उनका अभी पहला संग्रह ही पाठकों के हाथ आया है; शीर्षक है ‘लेबनॉन की वो रात’। वैसे तो, उनका यह कहानी-संग्रह हिंदी साहित्य में नव-प्रवेशी है तथापि कहानी कहने का उनका अंदाज़ अत्यंत परिपक्व है जहाँ वह अपनी अद्भुत कहन-शैली से  पाठकीय जिज्ञासा को तब तक जोर से पकड़ कर चलती हैं, जब तक कि वह कहानी के आखिरी छोर तक नहीं पहुँच जाती हैं।
वे ज्यादातर अपनी कहानियां वहाँ से शुरू करती हैं जहाँ से हमारी समस्याएं जन्म लेकर वयस्क होती हैं और रूढ़ होकर जिद्दी बन  जाती हैं। बेशक, घर-परिवार ही तो इन समस्याओं का उद्गम-स्थल है और शैलजा की कहानियां यहीं से आरंभ होती हैं; हाँ, यहीं से जहाँ से ये समस्याएं और विकराल तथा असमाधेय रूप धारण कर लेती हैं जिनसे हम जूझना और निपटना तो चाहते हैं; किन्तु उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए अनसुलझी ही छोड़ जाते हैं।
यह बात पहले भी स्थापित तौर पर उद्घाटित की जा चुकी है कि महिला कहानीकार आसानी से अपनी कहानियों में घर-परिवार में हो रही हलचलों तथा उत्थापनों को बारीकी और मार्मिकता से वर्णित कर पाती हैं। शैलजा की कहानियां भी ऐसी ही हैं जहाँ वह विशेषतः पारिवारिक जटिलताओं, नोक-झोंक और लटकों-झटकों का अथक ब्यौरा देते हुए उनकी नुक़्ताचीनी करती हैं तथा अपनी इस भूमिका में मानवीय संवेदनाओं के प्रस्फुटीकरण में बहुत आगे निकल जाती हैं। अपने प्रखर स्वर में वह हर स्त्री की पीड़ा और संघर्ष को मुक्त स्वर प्रदान करती हैं तथा उसके साथ एक मज़बूत लाठी  का सहारा बनकर खड़ी होती हैं। ‘लेबनान की वो रात’ की कहानियों में हर वय की स्त्री, कथानक के केंद्र में खड़ी नज़र आती है।
इस संग्रह की प्रतिनिधि कहानी के रूप में ‘नीला की डायरी’ की चर्चा सर्वप्रथम की जानी चाहिए जिसमें केंद्रीय चरित्र नीला भारतीय नारी का एक जीवंत प्रतिरूप है। कहानी में नीला विवाहोपरांत मिशिगन में अपने दो बच्चों समेत स्थायी रूप से प्रवास करती है। कथाकार, नीला की भूमिका  में एक ऐसे चरित्र को आरेखित करती हैं जो अपने भारतीय संस्कारों को अक्षुण्ण रखते हुए पश्चिम के प्रवास में जीवन को संतुलित बनाए रखने के जद्दोज़हद में अपनी नारी-सुलभ अस्मिता को दांव पर लगा देती है। घर-बाहर की दोहरी भूमिकाओं के निर्वाह में वह पारिवारिक जीवन की पृष्ठभूमि में भारतीय तो है ही, बाह्य जीवन में भी मुखर होते हुए वह आर्थिक समेत अनेक मामलों में अपने परिवार की एक सशक्त आलम्ब बनती है। शैलजा की स्त्री पात्र, परंपरा और आधुनिकता के मध्य दोलन करते हुए पर्याप्त संतुलन बनाए रखने में सक्षम है। एक स्त्री कितनी भूमिकाओं में हमारे सामने रूपायित हो सकती है, ऐसा शैलजा बड़े दमखम के साथ करती हैं तथा ऐसा परिलक्षित होता है कि बहुत कम महिला कथाकार, स्त्री की इतनी अधिक भूमिकाओं का वर्णन-विवेचन एक ही जगह कर पाती हैं।
नीला– माँ, पत्नी, दाई, धोबन, नौकरानी, कामवाली बाई, बच्चों की शिक्षिका और उनके मनोरंजन का मुख्य स्रोत तथा क्या-क्या नहीं बनती है। वह अपने पति के काम के समय में  और उसके बेकारी के दिनों में एक सत्यनिष्ठ सहचरी है जो उसे कभी कमजोर होकर थकने नहीं देती है। लिहाजा, वह एक कैलिडोस्कोप की तरह सुस्ताते-भागते अमरीका की हर गतिविधि पर दृष्टि जमाए रहती है तथा ऐसा सचमुच लगता है कि यह नीला नहीं, स्वयं शैलजा हैं जो बहुरुपिए ज़िन्दगियों का जमकर जायज़ा लेती हैं। इस तरह, प्रवासी जीवन की बहु-आयामी कमेंटरी वह 15 वर्षों की अवधि में परिसीमित करते हुए देती हैं।
अपनी कहानियों में पारिवारिक द्वंद्वों का चुटीला चित्रण करते हुए शैलजा के शब्द कभी नहीं थकते तथा वहाँ वह जिन द्वेषपूर्ण झगड़ातुर घटनाओं का स्वाभाविक विवरण प्रस्तुत करती हैं, उनमें सांकेतिकताओं को इतनी जगह दी गई होती है कि पाठक यह सहज अनुमान लगा लेता है कि वास्तव में जिसका ब्यौरा कथाकार ने भी नहीं दिया है, आखिर उसके आगे क्या हुआ होगा। ‘आग’ शैलजा की ऐसी ही कहानी है जिसमें वकालत जैसे पेशे के तिकड़मों और बिजनेस की जटिलताओं के अतिरिक्त विलासितापूर्ण साधनों की अति सुलभताओं के साथ ऊटपटांग, सादगी-भरे जीवन को चलचित्रित किया गया है। परिवार में बंटवारे के जटिल मसलों के साथ-साथ बहू-बेटों के वैवाहिक जीवन में टूटन को कथानक का आधार बनाया गया है जिसका पारिवारिक जीवन पर दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ता है तथा जो बेहद दिलचस्प भी है। ग्रामीण जीवन के प्रति आकर्षण और शहरी जीवन के प्रति विकर्षण के कचोटने वाले विवरण इस कहानी को गंभीर बनाते हैं। शैलजा की कहानियों की ख़ास बात यह है कि वह घटनाओं का विस्तार तो कथात्मक शैली में करती ही हैं, साथ में सटीक संवादों के माध्यम से कथ्य को और अधिक अभिव्यंजक बना देती हैं। भाषा में दर्जी की कैंची की तरह पैनापन है जिससे वह कुतरती नहीं हैं, बल्कि कहानी को सौष्ठवपूर्ण आकार-प्रकार प्रदान करती हैं। लचीले और आम बोलचाल के शब्द-संयोजन से भाषा में कहीं भी कोई रिक्तता नहीं छोड़ती हैं जिससे उनका कथ्य अत्यंत ठोस बन पड़ता है।
शैलजा अपनी कहानियों में स्त्री मनोविज्ञान को शिद्दत से निखारने की कोशिश करती हैं तथा इसमें उन्हें अभीष्टतम सफलता भी मिलती है। वह ‘उसका जाना’ कहानी में विदेश जा रही अल्हड़ माँ और बेटी के भावनात्मक स्वरूपों को उकेरती हैं। ननिहाल के रिश्तों पर कौतुहलपूर्ण अंदाज़ में बतियाती हैं और पात्रों के संवादों में लोकजीवन को बिंबित करती हैं। नाना-नानी, मामा-मामी तथा उनके बाद पैदा हुए रिश्तों पर बड़ी मार्मिकता से बात का बतंगड़ बनाती हैं जिसमें ग्रामीणता और जटिल लोकजीवन का चित्रोपम विवरण मिलता है। ज़्यादातर प्रवासी महिला कथाकारों की कहानियों में पात्रों के विदेश पलायन के पश्चात्, उनमें वापस भारत आने के उतावलेपन को प्रदर्शित किया जाता है। ऐसा लगता है कि यह उतावलापन स्वयं शैलजा का है जिसे उन्होंने अपने पात्रों में प्रक्षेपित किया है। शुरू-शुरू में यह तो एक पाखंड जैसा लगता है; किन्तु वास्तव में यह विदेशों में बस चुके भारतीयों के दर्द  को मूर्त रूप प्रदान करता है। विदेशी जीवन के बरक्स गंवई लोकजीवन का चित्रण उस दर्द का यथार्थ रूप है क्योंकि उस उतावलेपन को और तीक्ष्ण बनाया जाता है–बाक़ायदा अपनत्व से सराबोर ग्रामीण जीवन में रिश्तों को व्याख्यायित करके।
लेकिन, शैलजा विषयांतर से भी कहानी लिखना पसंद करती हैं। जब वह पारिवारिक कहानियाँ लिख रही होती हैं तो बहुधा ऐसा लगता है कि उनकी बहुत-सारी पारिवारिक कहानियां किसी एक कहानी का विस्तार हैं तथा यही कथा-विस्तार उनकी कहानियों में  जिज्ञासा घोलती है। ऐसे में, पाठक भी हतप्रभ रहता है। अस्तु, ‘एक था जॉन स्मिथ’ ऐसी कहानी है जिसमें स्त्री कहीं भी मुख्य भूमिका में नहीं आती है।  यह कॉलेज के दिनों के दो ज़िगरी दोस्तों–महेश और जॉन स्मिथ की कहानी है। कहानी में कौतुहल असीम है। जॉन ताउम्र महेश का मित्र होते हुए भी बहुत सारी बातें, यहाँ तक की अपनी रहस्यमयी बीमारी भी, उससे छिपाए रखता है तथा अपनी मौत के बाद किसी मि. स्मिथ के माध्यम से महेश को प्रेषित पत्र में अपनी अंतिम इच्छा का खुलासा करता है और मृत्योपरांत अपने शव को दफनाने के बजाय, हिन्दू रीति से जलाए जाने की इच्छा प्रकट करता है। कहानी आद्योपांत महेश की स्मृतियों में जीवित जॉन के साथ उसके संबंधों पर एक जीवंत रिपोर्ताज़ है। शैलजा की यह कहानी बिल्कुल अलग-सी है जिसमें कथानक का विस्तार संवाद शैली में न करके कथात्मक  शैली में किया गया है। कथाकार ने इसमें कहानीपन को सुदृढ़ता से बनाए रखा है।
कहा ना, शैलजा अलग-अलग मुद्दों पर भी लिखना पसंद करती हैं। अब ‘चाह’ कहानी में ही देखिए – युवावस्था में स्त्री-पुरुष संबंधों को मुक्त स्वर देने और उनके जज़्बातों को मुखर करने की कोशिश में अनजाने ही उनके मनोविज्ञान को समझती हैं, समझाती हैं और बड़े सलीके से पेश करती हैं। पर, स्त्री पात्र अपने वाक् चातुर्य में  पुरुष पात्र पर कहीं अधिक भारी पड़ती है। गीता और राज के बीच संवाद में कल्पना की उड़ान है जबकि परिवार के बंधन से बाहर निकलकर वे जितनी स्वच्छंदता से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, वह उनके संवाद को दार्शनिक ऊंचाइयों से भर देता है। गीता और राज के बीच यह संवाद तो देखते ही बनता है :-
“तुम लहर नहीं, पानी नहीं, फिर क्यों तुम्हें छुऊँ?”
“तो क्या तुम हवा हो।”
उसने आँखें बंद कर लीं, “हाँ, शायद! देखो, बाँस के झुरमुट में सुनों…. मेरी सर–सर करती आवाज़….। देखो मैंने तितलियों के पर दुलरा दिए…मैंने बादल के गोलों को कितना ऊपर उछाल दिया…”
कहानी में स्त्री-पुरुष के बीच तुनक-झनक और गिले-शिकवे को लेकर बतंगड़ीपन, बतरस को जीवंत बनता है और संबंध में गरमाहट पैदा करता है। स्त्री पात्र जहाँ अपनी झुंझलाहट के बारंबार प्रदर्शन से पुरुष पात्र पर हावी होना चाहती है, पुरुष पात्र स्त्री-मन की गहराइयों में डुबकी लगाने लगता है। कहानी में गीता जहाँ प्रेम और रोमांस में पहल करने का दमखम रखती है, वहीँ वह गृह-स्वामिनी की भूमिका में भी राज को अपने प्रभाव में लेती है। कहानी मज़ेदार है क्योंकि उसमें नाटकीयता का समावेश है। पर, इस तरह दोनों प्रेम-गंगा में भरपूर डुबकी लगाकर अपने मन को प्रेम-लायक बनाने के जुगत में आखिर तक लगे रहते हैं। गीता तो प्रेम से पूरी तरह स्नात है :-
“मैं कतरा–कतरा मुहब्बत बन कर तुम्हारी बाँहों में पिघलना चाहती थी . . .” उसका स्वर पनीला हो गया, “बह जाना चाहती थी, सब बहा देना चाहती थी। अपने भीतर का और तुम्हारे भीतर का।”
‘दाल और पास्ता’ कहानी में शादी जैसे आयोजन और बच्चों के रंग-ढंग तथा उनकी विभिन्न आदतों के पश्चिमीकरण के संबंध में भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों के मेल-मिलाप में आ रहे परिवर्तनों का तुलनात्मक विवेचन है। मुख्य पात्र भारती ऐसे परिवर्तनों का जमकर जायज़ा लेती है।  संभवत: ये परिवर्तन कथाकार को पतझड़ में आ रहे प्रकृति के परिवर्तनों  जैसे लगते हैं जिनके ब्योरे देते हुए वह कहानी का आगाज़ करती है। कनाडा में पले-बढ़े बच्चों में शादी के मसले पर कटाक्ष मार्मिक है जबकि वे इसे निहायत मामूली रस्म मानते हैं। शैलजा वैवाहिक संबंध को लेकर भारतीय और पश्चिमी रीतियों के खिल्थ-मिल्थ होने पर नाखुश हैं। भारत में वैवाहिक संबंध जहाँ दंपती के इहलौकिक-भौतिक से पारलौकिक जीवन की गूढ़ता को बिंबित करता है, वहीं पाश्चात्य व्यवस्था में यह संबंध अत्यंत लिजलिज़ा होता है। कहानी में बच्चों को ‘इंडिपेंडेंट’ बनाने  के बारे में पच्छिम के लोगों के पाखंड, उनके बच्चों की दिन-प्रतिदिन की आदतों, भारतीय संस्कृति को विदेश में बनाए रखने आदि के बारे में जो विवरण इस कहानी में दिए गए हैं, वे पठनीयता में दिलचस्प तो हैं ही, कहानीकार की उस हठधर्मिता को भी रेखांकित करते हैं, जिससे उसकी मूल विरासत सुदूर भविष्य में भी प्रक्षेपित होती रहे। कुल मिलाकर यह कहानी दो संस्कृतियों के टकराव से उत्पन्न प्रतिध्वनियों को कोने-कोने तक विस्तारित करती है। शैलजा ने अनजाने में या जानबूझ कर प्रतीकात्मक रूप में जो कहानी के आख़िर में कह डाला, वह भारत से गए प्रवासियों के लिए एक चेतावनी की भांति है
 “हमेशा की तरह आज फिर भारती को याद आया। माँ-पापा हमेशा कहते थे–दिन भर जहाँ कहीं भी रहो पर अँधेरे से पहले घर लौट आना चाहिये।”
शैलजा की कहानियों में प्राय: ऐसा लगता है कि कहीं वे आत्मकथात्मक तो नहीं हैं। जब वह घरेलू लफड़ों और मसलों का ब्यौरा देने लगती हैं तो सब कुछ उनका झेला हुआ, अनुभवजन्य-सा लगता है। ‘दो बिस्तर अस्पताल में’ ऐसी ही कहानी है। वह मानवीय संवेदना के क्षितिज तक पहुँच जाना चाहती हैं : कहानी सुनाने वाली सफ़ीना मुमताज़ आलम को जी रही शैलजा, भावना की तेज धार में बहती ही जाती हैं, “मैं अस्पताल के इस बिस्तर पर भी हूँ और साथ ही टंगे पर्दे के पार, उस बिस्तर पर लेटी बूढ़ी औरत की कराह में भी हूँ जो रात भर अपनी टूटती आवाज़ में दर्द से रह-रह कर रोती रही है।”
पर, उस बूढ़ी स्त्री के प्रति उसके बेटों की निर्मम उपेक्षा संवेदनाशून्यता की पराकाष्ठा को छूती है तथा इस उपेक्षा में अस्पताल की नर्सें भी शामिल हैं। अस्पताल के वातावरण का इतना जीवंत चित्रण शायद ही किसी कथाकार ने दिया हो। नर्सों और डॉक्टरों की औपचारिक तीमारदारी उनकी हृदयविहीनता को दर्शाती है। वह जवान औरत सफ़ीना से निराशा में डूबी बूढ़ी औरत की मन:स्थिति से तुलना करती हुई सोचती है कि उम्र के उस पड़ाव पर, जहाँ पर बूढ़ी औरत है, वह भी ऐसी ही बदहाली का शिकार हो जाएगी। लेकिन, यह तो तब की बात होगी; अभी तो वह अपने शौहर की देख-रेख में है। चुनांचे, जब शौहर-सलीम आकर उसे तलाक का फरमान जारी करता है तो वह तो उस बूढ़ी औरत से भी ज़्यादा हताश-निस्सहाय अनुभव करती है। कहानी का यह कथानक सचमुच ह्रदय-द्रावक है जो कथाकार की इस टिप्पणी से और भी मूर्त हो जाता है – ‘जब हर तरफ़ अँधेरा हो तो मौत रौशनी सी दिखाई देती।’
शैलजा भारतीय संस्कृतियों में घुसपैठ कर रही पाश्चात्य जीवन शैली को हमेशा आड़े हाथों लेती हैं। ‘निर्णय’ कहानी इसका जीता-जागता मिसाल है जिसकी शुरुआत में ही ‘डाइवोर्स’ की परंपरा के भारत में व्यवहार्य होने पर वह तंज कसती हैं जबकि राकेश ‘भारत भी तरक्की पर है’ कहते हुए नेहा को सबक देता है। पच्छिम की बयार में आपत्तिजनक बदलावों को तरक्की की संज्ञा देने वालों की सोच पर यह करारा व्यंग्य है। तलाकशुदा माला की दोबारा शादी और उसके बाद पैदा हुई संतान से प्राप्त ख़ुशी पर भी कथाकार का कटाक्ष स्पष्ट है। कहानी औरत की उन पारिवारिक व्यस्तताओं को खूब उजागर करती है जिनमें पुरुष बहुत पीछे रह जाता है। अगली कहानी ‘पहचान : एक शाम की’ ‘भीतर की माँ और निजी अस्तित्व में द्वंद्व’ को मानस-सतह पर लाने का एक सफल प्रयास है। घर की चिंतनीय तथा चिंताजनक व्यस्तताओं में अपनी अस्मिता को तलाशती विनीता की पति-राकेश पर निर्भरता आधी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या है जिसका निदान पुरुष-प्रधान समाज में असंभव-सा लगता है। कहानी इसी मुद्दे पर आद्योपांत बात करती है। विनीता किसी म्यूजिक प्रोग्राम में जाने के लिए अपने पति की अनुमति हेतु वाक युद्ध में लिप्त होती है और येन-केन-प्रकारेण प्रोग्राम में सम्मिलित होकर अपनी वास्तविक अस्मिता से रू-ब-रू हो पाती है और वास्तव में पहली बार स्वयं से साक्षात्कार कर पाती है। दूसरों की सेवा-सुश्रुषा में स्वयं से दूर हो चुकी, स्वयं से अपरिचित, विनीता खुद को पहचानने की ख़ुशी की अनुभूति पहली बार करती है।
संग्रह की शीर्षक-कथा ‘लेबनॉन की वो रात…’ में कहानी कहने का शिल्प सुगठित रूप से  निखर कर पाठकों के सामने आया है। इस कहानी में मानवीय संवेदना चरम पर पहुंचकर मन को उद्वेलित-आंदोलित करती है। स्त्री-मन की गहराई में पैठकर यहूदी लड़की-अलुश्का द्वारा वर्णित अपनी और अपने परिवारजनों की व्यथा को लेखिका ने अपने भीतर मर्मस्थल तक एहसास किया है तथा ऐसा करके उन्होंने एक श्रेष्ठ कहानीकार की वास्तविक भूमिका का निर्वहन किया है। तभी तो अलुश्का के भीतर की स्त्री उसके बाह्य चरित्र से अधिक मुखर हुई है। चाहे अलुश्का हो या मि.बेन-अब्राहम, दोनों स्त्री पात्रों को एक विशिष्ट कथानक के कैनवास पर ज़ितनी सुघड़ता से चित्रित किया गया है, वह श्लाघ्य होने साथ-साथ, कहानियों में स्त्री पात्र को गढ़ने के लिए,लेखकों के लिए एक नज़ीर की भांति है। गृहयुद्ध की वर्णित विभीषका रोम-रोम को सहमा देती है। यातना और पीड़ा का जो मंज़र इस कहानी में चहुंओर विस्तारित है, वह दृश्य-पटल पर पत्थर की लकीर की तरह अंकित हो जाती है। उस हालत में, शैलजा की अपनी अनुभूति सर्वजनीन हो जाती है; देखिए : ‘हर कोई असुरक्षित है और हर असुरक्षित व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से डरता है और यह डर हमें सच नहीं देखने देता, आशंकाओं भरी कल्पनाओं में उलझाता है।’ कहानी स्त्री-अस्मिता की तलाश को भी  अंजाम तक पहुँचाने का माद्दा रखती है। कहानीकार के ही शब्दों में :
“औरतों की एक ही जात होती है, औरत!! आदमी का नाम, जाति, काम और धर्म होते हैं, औरत का एक ही धर्म है, औरत होना और सारी साँस्कृतिक अपेक्षाओं को पूरी करना! आदमी लड़ता है और जीती जाती है औरत!  आदमी योजनायें बनाता है और उन योजनाओं के पहियों का तेल बनती है औरत, आदमी मरता है और उजड़ती है औरत! औरत जब प्रश्न करती है तो झिड़कियाँ खाती है, सलाह देती है तो बेवकूफ कहलाती है!”
शैलजा की संवेदनशीलता भी माशाल्लाह कमाल की है : ‘सन्नाटे कई बार बहुत डरावने होते हैं। उनमें अनेक घटनाओं की बू होती है। इंसान अपने मन के हिसाब से कोई एक बू उस सन्नाटे से चुन लेता है और आशंकाओं और डर के ताने-बाने बुन कर उसमें घुटने लगता है।’
शैलजा चाहे विभिन्न सुख-दुःख, भूख-प्यास, कुंठा-संत्रास, भय-आतंक, जय-पराजय के विभिन्न मनोभावों को व्यक्त कर रही हों या इनके सामानांतर परिवेश को बुन रही हों, उनका लहज़ा अभिव्यंजनात्मक (expressionistic) होता है। वह परिवेश और आसपास की प्रकृति को मनोभावों के अनुकूल ढाल देती हैं। यह काम एक मंझे हुए शब्द-शिल्पी का ही होता है। कहानी ‘वह तैयार है’ में ऐसा साफ़ परिलक्षित होता है। जीवन को वह इस शैली में बेहतर ढंग से परिभाषित कर लेती हैं : ‘पेड़ों की शाखों पर सुर्ख लाल-पीले पत्ते अपने जीवन के आखिरी दिनों में पूरे सौन्दर्य और गरिमा के साथ लोगों को मोह रहे थे, साथ ही बहुत से पत्ते झड़ कर सड़क पर आ पडे थे और धूल और पानी के असर से काले हो गये थे। जीवन बस आगे-पीछे चलने की ही कहानी है, कोई अभी शाख पर है तो कोई ज़मीन पर!’ कब जीवन की सक्रियता और इसके चलते रहने का आधार धड़ाम से गिरकर निष्क्रिय हो जाएगा – इसकी भविष्यवाणी कभी नहीं की जा सकती है। कहानी आर्थिक व्यवस्था की विफलता से पड़ने वाले दुष्प्रभाव को केन्द्र में रखती है। शैलजा इस कहानी में, समाज की ढहती अर्थव्यवस्था और इसके दुष्परिणामस्वरूप ढहती ज़िन्दगी का जायज़ा बखूबी लेती हैं तथा उस क्रूर व्यवस्था पर जोरदार तमाचा जड़ती हैं जिसका मानवीयता और मानवता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। कहानी रोचक है और समकालीन समाज का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करती है।
शैलजा विभिन्न पृष्ठभूमियों में देशकाल को ध्यान में रखते हुए कथानक बुनने का हौसला रखती हैं। घर-परिवार, अस्पताल, कोई भी सार्वजनिक स्थल, गाँव, शहर आदि-आदि जगहों का बखूबी निरीक्षण करते हुए वहां अपने विभिन्न वर्गों के पात्रों को भेजती हैं और उन्हें अपना माउथपीस बनाती  हैं। उन्हें भलीभांति पता होता है कि जो कथा-संसार वह रच रही हैं, उसका उद्देश्य क्या है। मजे की बात यह है कि उनके पास जीवन-संघर्षों को रूपायित करने के लिए तथ्यों की प्रचुरता है। बातें कड़ीबद्ध होती हैं तथा उनमें कहीं भी कोई अनपेक्षित दरार नहीं पड़ी होती है। कथोपकथन के जरिए घटना का विस्तार तथा प्रसंग-विशेष पर अपनी टिप्पणियां करते समय एक अनुभवी कथाकार के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। ‘शार्त्र’ कहानी में कार्यालय की पृष्ठभूमि में साक्षात्कारकर्ता और नौकरी हेतु अभ्यर्थी के बीच का संवाद रोचक है जिसमें दुनियाभर के पचड़ों और व्यक्तिगत आपबीतियों का मार्मिक वर्णन है जबकि इनके साथ-साथ नौकरी पाने की विवशता का ब्यौरा अज़ीब-सा लगता है। शैलजा दो वर्गों की स्त्रियों की जाती ज़िन्दगियों का जायज़ा उनके समुदाय के मानदंडों के अनुरूप लेती हैं। फिर, अपना मंतव्य भी नि:संकोच देती हैं – ‘सोपान ऊँचा हो या नीचा, आदमी को केवल खड़े रहने की जगह चाहिये ताकि वह दुनिया के धक्कों से गिर न पड़े।’ बहरहाल, नौकरी के लिए ‘इंटरव्यू’ लेने और देने के लिए जो संवाद-विस्तार है, उसमें गुण-कसौटी परखने वाली बात तो बिलकुल नहीं है; लेकिन, शैलजा ने अपनी इस कहानी के लिए कथानक का चयन  नए ढंग से किया है क्योंकि उन्हें तो इंसानी परिस्थितियों और दशाओं को व्याख्यायित करना है– सो,वह इस कहानी में दक्षतापूर्वक करती हैं।
कहानी ‘अदर मदर’ में भी जिन परिस्थितियों का ब्यौरा है, उनमें भावनाओं का एक बहाव-सा है जिस बहाव में दो अलग-अलग देशों की दो सहेलियां, एक त्रिनिदाद की तो दूसरी भारत की-एक क्रिश्चियन तो दूसरी हिन्दू, डूबती-उतराती जाती हैं। शैलजा फिर स्त्री-मन के सामुद्रिक भंवर में उलझती हैं और औरत के रिश्तों को समझने-सुलझाने की कोशिश करती हैं। ऐना (त्रिनिदाद) और शैली (भारत) एक-मन, दो-शरीर हैं जिन्हें मतलब है तो मानवीय संवेदनाओं से जबकि शैली, ऐना की मरणासन्न माँ में अपनी माँ की छवि देखती हैं जिन्हें कभी परस्पर लड़ना-झगड़ना रास नहीं आया। शैलजा की यह टिप्पणी हमें गंभीर मंथन करने पर विवश करती है कि हम मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव को इतनी तूल क्यों देते हैं –‘दुनिया भले लड़ती रहे अपने-अपने धर्मों के लिये पर मौत से कोई नहीं लड पाता। वो हरेक के साथ एक सा व्यवहार करती है, उन्हें एक ही तरीके से अपने साथ ले जाती है, बच जाता है निष्प्राण शरीर… फिर दुनिया उसे अपने-अपने धर्म की टिकटी पर टाँग कर चल पड़ती है, कभी दफनाने ….तो कभी जलाने…!’
अपने सृजन-सामर्थ्य को सार्थक करते हुए, शैलजा सिर्फ कहानी ही नहीं गढ़ती हैं, बल्कि प्रत्येक कहानी में अपनी दार्शनिक विचारधारा को व्यावहारिक जीवन में आरोपित करने के लिए व्यक्ति, समाज और स्वयं से संघर्ष करती हैं। उनकी प्रत्येक कहानी एक प्रयोगशाला है जिसमें वह विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य और उसके व्यवहार को साथ-साथ रखती हैं तथा यह परखने की चेष्टा करती हैं कि कब और कैसे मनुष्य अपने रूप और व्यवहार को बदल लेता है। उनकी कहानियां हमें हमेशा गहन सोच में डुबोकर भावनाओं के सकारात्मक उद्वेग में बहा ले जाती हैं। भविष्य में भी उनकी कहानियां पढ़ते हुए हम इसी भावनात्मक उद्वेग में बहना चाहेंगे। बेशक,  शैलजा पाठकों की इस उम्मीद पर खरी उतरेंगी ही।

 

डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
डॉ मनोज मोक्षेन्द्र मूलतः वाराणसी से हैं. वर्तमान में, भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं. कविता, कहानी, व्यंग्य, नाटक, उपन्यास आदि विधाओं में इनकी अबतक कई पुस्तकें प्रकाशित. कई पत्रिकाओं एवं वेबसाइटों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हैं. एकाधिक पुस्तकों का संपादन. संपर्क - 9910360249; ई-मेल: [email protected]
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