Wednesday, February 11, 2026
होमपुस्तकडॉ. नितिन सेठी की कलम से पुस्तक समीक्षा - चिड़िया चली चाँद...

डॉ. नितिन सेठी की कलम से पुस्तक समीक्षा – चिड़िया चली चाँद के देशः मनमोहक बाल कविताएँ

पुस्तक: चिड़िया चली चाँद के देश 
कवि: चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ 
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा 
मूल्य: ₹ 250 
पृष्ठ: 112
            कानपुर में जन्मे स्मृतिशेष चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ जी अपने दौर के सर्वाधिक प्रसिद्ध बाल साहित्यकार रहे। वर्ष 2025 उनका जन्म शताब्दी वर्ष भी है। इस सुन्दर अवसर पर प्रसिद्ध बाल साहित्यकार कामना सिंह के संपादन में ‘मयंक’ जी की कविताओं का एक संग्रह ‘चिड़िया चली चाँद के देश’ श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा से प्रकाशित हुआ है। कुल छिहत्तर कविताओं को समेटे हुए यह संग्रह बच्चों की अनेक प्रकार की गतिविधियों को शब्दायित करता है। ‘मयंक’ जी की लेखनी की सक्रियता वर्ष 1950 से (उनके अवसान वर्ष) 2000 तक अनवरत रूप से रही। इतने वर्षों में उन्होंने बाल साहित्य की सभी विधाओं का भंडार भरा। उनके सर्जन का मूल उत्स यदि कहा जाए तो वह था बच्चों को सुन्दर संस्कार देना। इसी तथ्य को सामने रखकर उन्होंने अपना सृजन संसार बसाया। मयंक जी ने सदैव एक संस्कारवान पीढ़ी का सपना देखा। इसीलिए पारिवारिक मूल्य, सामाजिक मूल्य और देशप्रेम– ये सब उनकी दृष्टि में आधारभूत नैतिक मूल्य हैं। बौद्धिक विकास के साथ-साथ आत्मिक विकास का उद्देश्य मयंक जी  के बाल साहित्य का आधार कहा जा सकता है। इसीलिए इन बाल कविताओं में मनोरंजन है, जिज्ञासा है, प्रेरणा है, देशप्रेम है, साथ-साथ चलने और आगे बढ़ते जाने की भावना है। और इन सबको रोचकता व काल्पनिकता के साथ बड़ी ही सार्थकता से छंदोबद्ध किया गया है।
‘नन्हे पंख’ कविता की छोटी सी चिड़िया अपने नन्हे-नन्हे पंखों के हौसले के सहारे चाँद के देश तक जाने को आतुर है- 
चिड़िया चली चाँद के देश नन्हे-नन्हे पंख पसारे 
साथ न कोई संगी-साथी निपट अकेली बिना सहारे 
चिड़िया पर एक और बाल भाव ‘चिड़िया’ कविता में देखिए-
आँगन में आ जाती चिड़िया मीठा गाना गाती चिड़िया 
आँगन में बिखरे दानों को फुदक-फुदककर खाती चिड़िया 
देखा, कैसे फुदक रही है नन्ही-नन्ही प्यारी चिड़िया 
संग्रह में अनेक कविताएँ पद्यकथा के रूप में लिखी गई हैं। ‘परियों का नाच’, ‘पूसी दाई की दूकान’, ‘चूहों की बारात’ इसी प्रकार की कविताएँ हैं। ‘परियों का नाच’ एक सुंदर-सी कहानी है जिसमें रात का होना, परियों का जगत् पर अपनी मोहिनी बिखेरना, परियों का नाच-गाना, पूरी प्रकृति का प्रसन्नचित होना और सुबह परियों का वापस लौट जाना-सब मिलकर बच्चों पर एक अलग ही जादू-सा प्रभाव डालते हैं- 
आसमान में लगता है फिर एक बड़ा सुंदर दरबार 
परियों की रानी आती है उड़ती अपने पंख पसार 
उस अवसर पर जग में लगती है रस की धारा बहने 
परियाँ औ’ रानी रहती हैं फूलों के गहने पहने 
बाल साहित्य में उपदेशपरकता इसका आधारभूत अवयव है। संग्रह में अनेक कविताएँ उपदेशात्मक भी हैं, जिनमें बच्चों को अपने कर्त्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा दी गई है। ‘पढ़ने में मन खूब लगाओ’ में इसी प्रकार का भाव भावी पीढ़ी को दिशा दिखाता है-
पढ़ने से तुम जी न चुराओ पढ़ने में मन खूब लगाओ 
जो बच्चे लिखते-पढ़ते हैं सभी प्यार उनको करते हैं 
वे ही बच्चे आगे चलकर उन्नति-पथ पर पग धरते हैं 
इसी प्रकार ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ कविता भी है- 
ऊँचा उठने की सीढ़ी है सादा जीवन उच्च विचार 
इसको अपना कर बच्चो तुम लोगे जीवन शीघ्र सुधार 
ऊँचा लक्ष्य बनाते हैं जो वे ही उठ पाते ऊपर 
हीन भावना वाले ऊँचे उठते कभी न जीवन भर     
‘सुनहले काम’ कविता में भी यही भाव है जिसमें राम, कृष्ण, मीराबाई, लक्ष्मीबाई, ध्रुव, प्रह्लाद, वीर कुणाल के चरित्रों के माध्यम से बच्चों को शिक्षा दी गई है- 
वैसे तो दुनिया में सब ही रहते, भोजन करते हैं 
अपना-अपना समय बिताकर अंतकाल में मरते हैं 
पर जो अपने जीवन में हैं काम सुनहले कर जाते
दुनिया वाले आदर से हैं उन्हें याद करते जाते       
‘पढ़ना है जी पढ़ना है’, ‘साथी बढ़ते जाना’ जैसी कविताएँ प्रेरणादायक और बालकों को जीवन में आगे बढ़ाने की सीख प्रदान करती हैं। ‘पूसी दाई की दूकान’ भी एक मनमोहक पद्यकथा है जिसमें लालच का फल बुरा दर्शाया गया है। लालची चूहा दूध-मलाई के चक्कर में अपने प्राण ही गवां बैठता है। कवि का संदेशपरक निष्कर्ष है- 
उसे स्वर्ग की राह दिखाई पूसी दाई, पूसी दाई 
बच्चो! बात बड़ों की मानो कभी नहीं अपनी जिद ठानो 
दोस्त और दुश्मन पहिचानो लालच बुरी बला है, जानो                 
‘चूहों की बारात’ भी एक चटपटी कथा है जिसमें चूहे की बारात में अन्य चूहे बाराती बनकर आते हैं, खूब मौज-मस्ती करते हैं, चुहिया दुल्हन भी आ जाती है लेकिन तभी रंग में भंग पड़ जाता है क्योंकि पूसी रानी को इन चूहों की खुशबू आ जाती है। कविता का अंत बहुत ही मनमोहक और मनोरंजक बन गया है- 
पूसी को जो देखा तो चूहों ने साहस त्यागे 
शादी-वादी छोड़-छाड़कर जान बचाकर भागे 
चूहों की बारात हो गई तितर-बितर पल भर में 
केवल पूसी रानी ही रह गईं अकेली घर में                
संग्रह में होली पर्व पर अनेक कविताएँ दी गई हैं। कहीं होली पर प्रेम का संदेश है तो कहीं होली की मस्ती है। बच्चों का प्रिय त्योहार होली कितना प्यारा त्योहार बन गया है। ‘देखो आई होली’ कविता प्रेम का संदेश देती है- 
प्रेम-रंग सब पर बरसाओ द्वेष-अनीति मिटाओ 
त्यागो निज मन का छोटापन सबको गले लगाओ       
इसी क्रम में ‘होली आई मस्ती छाई’ कविता में होली का आनंद है- 
होली के मौके पर मौसम होता बड़ा सलोना है 
तीन-तीन ऋतुओं का जग पर चलता जादू टोना है 
कुछ-कुछ मधुर गुलाबी जाड़ा कुछ मौजों वाली गरमी 
मस्ती है कुछ-कुछ वसन्त की तीनों की है सरगरमी 
तन में लगती चन्दन जैसी बहती सुखद बयार है 
होली आई, मस्ती लाई छाई अजब बहार है           
इसी प्रकार बच्चों का एक प्रिय पर्व दीपावली भी है। संग्रह में दीपावली पर्व पर भी अनेक सुंदर कविताएँ हैं। बच्चों की कल्पनाशीलता इतनी अधिक होती है कि वे सीधे चाँद पर जाकर दीपावली मनाना चाहते हैं। ‘इस बार चाँद पर जाकर के’ में यही सलोना भाव है। ‘खिल-खिल’ एक सुंदर कविता है जिसमें दीपावली की चमक-दमक का मनमोहक वर्णन है 
जगमग-जगमग झिलमिल-झिलमिल 
दीपक जलते खिल-खिल, खिल-खिल! 
आई है हर ओर दीवाली 
छाई है हर ओर दीवाली         
यहाँ त्योहारों की खुशियाँ तो हैं ही, साथ ही साथ अपने परिवारीजनों और अपनी मित्र मंडली के साथ त्योहार मनाने का आनंद भी है। आजकल के बदलते दौर में बच्चों के खेलों में पतंगबाजी, कंचेबाजी जैसे खेल अब शामिल नहीं रहते। लेकिन एक समय था जब पतंगबाजी बच्चों का प्रिय शगल था। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते बच्चे अपने मोहल्ले में लंगड़वाला, लंगरबाज आदि नाम से प्रसिद्ध हो जाते थे। ‘लंगड़-पेंच’ एक रोचक कविता है जिसमें इसकी पूरी प्रक्रिया भी कवि द्वारा दर्शाई गई है- 
पहले मैं अपने लंगड़ से भैया! पेंच फँसाता 
फिर मैं अपने दाँव-घात की अगली चाल दिखाता 
देता थोड़ी ढील, मगर फिर कसता एक सपाटा 
सभी देखते रह जाते हैं यह काटा, वह काटा             
मिठाइयाँ बच्चों को स्वाभाविक रूप से प्रिय होती हैं। मिठाई के नाम पर ही बच्चों के मुँह में पानी आ जाता है। मिठाई के लिए बच्चों के मचलते मन को ‘काले जामुन’ कविता में कवि इस प्रकार अभिव्यक्त करता है- 
इनमें गुठली नाम-नाम की यह रबड़ी है बिना दाम की 
भूल जाएगी याद आम की सुधि न रहेगी काम-धाम की 
बिल्कुल सस्ता किया भाव है दो आने में एक पाव है 
सस्ता करके कर दी हलचल बच्चे आते हैं दल के दल        
         इस कविता में एक बात और उल्लेखनीय है। उस समय दुकानदार भी बच्चों की खुशी पर खुशी-खुशी न्योछावर हो जाते थे। यदि पैसे बच्चों की जेब में नहीं भी होते थे, तो कोई खास चिन्ता की बात नहीं थी। सहृदयी दुकानदार के शब्द देखें- 
क्या कहते हैं पास न पैसे! तभी खड़े हो चुप-चुप ऐसे 
अजी फिकर क्या, हाथ बढ़ाओ ले लो दोना-जामुन खाओ 
पापा से जब पैसे पाना आकर तब मुझको दे जाना 
वाह-वाह, मतवाले जामुन मेरे काले-काले जामुन             
ऑनलाइन शॉपिंग के इस युग में ऐसे मधुर भाव आज मिलना मुश्किल ही है। ‘तारे’ कविता भी बच्चों की कल्पनाशीलता पर आधारित है- 
झिलमिल झिलमिल करते तारे आहा! लगते कितने प्यारे 
मानो बिखर गए हैं मोती जिनकी आभा झल-झल होती 
आसमान पर मैं जा पाता तो इनको बटोर कर लाता 
सभी साथियों को मैं देता अपना भी डिब्बा भर लेता          
‘बादल’ कविता में बच्चा बादलों के आने पर कितना प्रसन्न हो रहा है, ये भाव भी उल्लेखनीय हैं- 
अम्मा, हैं घिर आए बादल देखो, कैसे छाए बादल 
हवा चल रही है मतवाली झूम रही है डाली-डाली 
सचमुच बादल बिना दाम के ये साथी हैं बड़े काम के 
मुझको लगते प्यारे बादल आसमान के सारे बादल           
नया वर्ष सभी के जीवन में नव उल्लास और नव संकल्प की नींव रखता है। संग्रह में ‘नया वर्ष आया’ प्रेरणाप्रद कविता है और बच्चों में नव संकल्प का भाव दर्शाती है- 
अगर गिर गए तुम गये साल में न बैठे रहो यों बुरे हाल में 
उठो, झट कमर कसकर तुम जुट पड़ो सफलता मिलेगी नए साल में      
इसी प्रकार ‘नवीन वर्ष’ कविता नवीन भावों का संचयन है जिसमें नवीन भावना और नवीन योजना का आह्वान किया गया है-
नवीन भावना लिए नवीन वर्ष आ गया 
नवीन कामना लिए नवीन वर्ष आ गया 
नवीन कल्पना लिए नवीन वर्ष आ गया 
नवीन योजना लिए नवीन वर्ष आ गया     
‘नया साल है!’ कविता में मुहावरेदार भाषा के प्रयोग से बच्चों के नव संकल्प को पूरी दुनिया के सामने लाने का भाव है-
दुनिया वाले लोहा मानें हम भी हैं कुछ हमको जानें 
निकल पड़े लोगों के मुँह से ‘वाह वाह! कैसा कमाल है 
नया सवेरा नया साल है          
बच्चों को गर्मी की छुट्टियाँ बहुत प्यारी लगती हैं। भारी-भरकम पढ़ाई के बोझ से बचकर अब कुछ दिन मस्ती के आ जाते हैं। गर्मी की छुट्टी का आनंद देखिए- 
अब तक इम्तहान के दिन थे करते हम हर समय पढ़ाई 
खेल-कूद सब भूल गए थे हमने घोटमघोट लगाई 
इम्तिहान से ताल ठोंककर कुश्ती लड़े, नहीं हम हारे 
गर्मी की छुट्टी है आयी भैया! अब हैं ठाठ हमारे       
संग्रह में देश प्रेम पर आधारित अनेक कविताएँ हैं। इन सभी कविताओं में बच्चों को याद दिलाया गया है कि उन्हें देश को सदैव आगे ले जाना है। ‘देश हमारा’ में देश के प्रति प्रेम, एकता और अखण्डता की उदात्त भावनाओं का चित्रण मनमोहक है- 
इसका मान बढ़ाएँगे हम सुख की धार बहाएँगे हम 
रहे न नंगा-भूखा कोई तब होवे प्रण पूर्ण हमारा 
देश हमारा भारत प्यारा दुनिया के देशों से न्यारा 
देश रक्षा का प्रण याद दिलाती ‘हम देश की मुस्कान हैं’ कविता में बच्चों को आत्माभिमानी, उत्साही और वीर बलिदानी बनने की प्रेरणा दी गई है- 
पर मान प्यारा है हमें सम्मान प्यारा है हमें 
हैं वीर बलिदानी बड़े! हैं आत्म-अभिमानी बड़े 
पर जो लड़ाई ठानता जो बैर हमसे मानता 
उसको चखा देते मजा हैं दुष्ट को देते सजा 
हम सिंह की सन्तान हैं! हम देश की मुस्कान हैं!
उत्साह बल की खान हैं! हम देश की मुस्कान हैं!          
‘एक डाल के फूल’ कविता भी राष्ट्रीय एकता और भाईचारे की बात करती है- 
यहाँ न कोई हिन्दू-मुस्लिम यहाँ न कोई ईसाई 
सभी निवासी भारतवासी आपस में भाई-भाई 
भारत माता सबकी माता माता सबको प्यारी है 
भारत माँ का बच्चा-बच्चा माता पर बलिहारी है                
‘भारत देश हमारा’ में भी देश के प्रति प्रेम का भाव द्रष्टव्य है- 
सब भारतवासी हैं भाई-भाई भारत माँ सबकी माता है 
सुख-दुःख में जीने मरने में इससे हम सबका नाता है          
‘भारतमाता! तुझे नमन’ कविता में देश के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की गई है-
माता! खाकर अन्न तुम्हारा पीकर अमृत जैसा जल 
हम सब पले-बढ़े दिन-दिन है शरीर में संचित बल
हम पर है अधिकार तुम्हारा न्योछावर है तन-मन-धन 
स्वर्ग सरीखी भारत माता हम सब करते तुझे नमन              
बच्चों को जादूगर और उसके जादू के खेल बहुत आकर्षित करते हैं। जादू के खेल उनकी उत्सुकता-कल्पनाशीलता के साथ उनके आश्चर्य को भी आलोड़ित करते हैं। ‘जादूगर’ कविता में जादूगर और सब करतबों के साथ यह करतब भी करता है- 
साहस, फुर्ती, मेहनत, हिम्मत, दृढ़ निश्चय का देकर मंतर 
सोने का मैं तुम्हें बना दूँ ऐसा हूँ अद्भुत जादूगर             
नानी का घर सब बच्चों को प्यारा होता है। पूरी आज़ादी से बच्चे अपनी मौज-मस्ती में वहाँ प्रसन्न रहते हैं। बच्चों के मन की मुराद जैसे नानी के घर का नाम आते ही पूरी हो जाती है। ‘नानी का घर’ कविता में बालसुलभ प्रतीक्षा उल्लेखनीय है-
कितना प्यारा नानी का घर हमको रहती मौज वहाँ पर 
मम्मी नहीं डांटने पाती हम सब की चाँदी हो जाती 
पैसे खूब वहाँ पर पाते चाट-पकौड़ी जी भर खाते।         
संग्रह में अनेक कविताएँ प्रकृतिपरक हैं। प्रकृति की सुरम्य गोद में रहकर, प्रकृति के संरक्षण में और प्रकृति के अवलोकन के माध्यम से प्रकृति की मनमोहक छवियों से बच्चों का जुड़ाव संभव हो सकता है। ऐसी कविताओं में ‘झरना’, ‘रेशम-सी वासन्ती हवा’, ‘फूल हँसे’ आदि उल्लेखनीय हैं। ‘झरना’ कविता में एक सहज-सा प्रवाह है- 
ऊँचे पर्वत पर से गिरकर झरना झरता रहता झर-झर 
पैदा करता ‘हर-हर’ का स्वर है श्वेत-श्वेत निर्मल-निर्मल 
मोती के-से रंग का यह जल पर्वत के हिम का स्नेह सरल      
‘रेशम-सी वासन्ती हवा’ का अपना ही निराला अंदाज़ है जो बच्चों के आलस्य को दूर भगाती है और उनमें नई प्राण ऊर्जा का संचार भी करती है-
रेशम-सी वासन्ती हवा लगी डोलने 
बच्चों से उन्नति का भेद लगी खोलने 
जाड़ा ना गर्मी है, मौसम सलोना 
फूलों की खुशबू है, बरस रहा सोना              
इसी प्रकार ‘फूल हँसे’ कविता मानो फूलों जैसे हँसते हुए बच्चों की ही बात कर रही है- 
आई ऋतु बसंत की प्यारी खिल-खिल करती क्यारी-क्यारी 
फूल हँसे कलियाँ मुस्काईं पक्षी गाते मधुर बधाई 
बगिया के पेड़ों ने पहने आज नए पत्तों के गहने              
‘बरसात सुहानी’ में प्रकृति का मानवीकरण कर बरसात को बच्चों के ही कोमल मन के भावों से संयोजित किया गया है- 
आई है बरसात सुहानी जमकर बरस रहा है पानी 
पानी में है हम नाव बहाएँ नाव बहे तो शोर मचाएँ 
आहा! नाव बही जाती है यह नानी के घर जाती है           
इसी प्रकार ‘जादूगर बरसात’, ‘पानी-पानी-पानी’, ‘वर्षा लौट गई घर अपने’ आदि कविताएँ भी बरसात के सुहाने मौसम पर आधारित हैं। ‘मौसम के बच्चे’ कल्पनाप्रवण कविता है जिसमें मौसम के तीन बच्चों- एक लड़का जाड़ा और दो लड़कियों गर्मी और वर्षा की कल्पना की गई है। ‘वर्षा लौट गई घर अपने’ में वर्षा ऋतु के बाद शरद् ऋतु का शुभ आगमन दर्शाया गया है। प्रकृति के सुरम्य अंचल की शाश्वत सुषमा यहाँ द्रष्टव्य है- 
वर्षा लौट गई घर अपने अब प्यारी ऋतु आई 
आसमान पर मुस्काती है मनहर शरद जुन्हाई 
रात हँस पड़ी, बरसी चंदा से अमृत की धारा 
नयी जुन्हाई-अमृत से है नहा उठा जग सारा!           
यहाँ आजकल कम प्रचलित शब्द ‘जुन्हाई’ भी उल्लेखनीय है जिसका अर्थ है चाँदनी। 
मसूरी के सौन्दर्य को दर्शाती कविता ‘मसूरी’ मनमोहक है। यह कविता थोड़े बड़े बच्चों के लिए लिखी गई है। इसके तथ्य और भावों में भी अपेक्षित प्रौढ़ता है। ‘निकले करने सैर’ बन्दर के ठाट-बाट दिखलाती है- 
मिस्टर बन्दर सूट पहनकर निकले करने सैर 
ऐंठ दिखाते शान जमाते बाँधा सबसे बैर
चाट उड़ाई, केला खाया इसको-उसको मुँह बिचकाया 
नन्हे बच्चों को जब देखा दाँत दिखाकर उन्हें डराया          
             इसी प्रकार ‘चिड़िया’, ‘चींटी’, ‘मच्छर’ पर आधारित कविताएँ भी प्रभावित करती हैं। बच्चों के मन की ही शैतानियाँ करते ये पशु-पक्षी कविताओं में घुल-मिलकर बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र हो जाते हैं। ‘अगड़म-बगड़म की होली’ भी कथात्मक कविता है जिसमें बच्चों को शैतानी की सजा मिलती दिखाई गई है। जादूगर के खेल एक लंबी कविता है जिसमें जादूगर द्वारा किए गए विभिन्न अचरज भरे करतबों को लिपिबद्ध किया गया है। कवि की संग्रहण शक्ति, कल्पना शक्ति और अभिव्यक्ति शैली- तीनों ही यहाँ उल्लेखनीय हैं। एक पद्यकथा के रूप में ऐसी अनेक कविताएँ मयंक जी की लेखनी की विशेषता कही जा सकती हैं। ‘वंशी के स्वर’ भी प्रेरणादायक कविता है। सोते हुए, आलस्य से भरे, अकर्मण्य लोगों के कानों में बच्चा वंशी के स्वर फूँककर उन्हें जगाने के प्रयत्न कर रहा है। ‘नर हो न निराश करो मन को’ जैसे सार्थक भाव यह कविता भी रखती है-
वंशी के स्वर फूँक रहा मैं आओ तुम भी तान मिलाओ 
मेरे इन मीठे गीतों में तुम अपनी मुस्कान मिलाओ 
नयी शक्ति के स्रोत! धरा को मिल-जुलकर तुम स्वर्ग बनाओ        
शहीदों के प्रति सम्मान का भाव ‘शहीद की समाधि’ कविता में है- 
शहीद की समाधि है यहाँ सुमन बिखेर दो 
कदम इधर को मोड़ दो नयन इधर को फेर दो        
संग्रह के अंत में शीर्षक कविता ‘चिड़िया चली चाँद के देश’ नये और बदले हुए भावों के साथ रखी गई है- 
चिड़िया चली चाँद के देश नन्हे-नन्हे पंख पसारे 
साथ न कोई संगी-साथी निपट अकेली, बिना सहारे 
जो अपने नन्हें पैरों से अपने पथ पर बढ़ते जाते 
वही एक दिन इस दुनिया में उन्नति की चोटी चढ़ जाते                    
            यह भी उल्लेखनीय है कि इन बाल कविताओं का रचनाकाल बीसवीं सदी का है। यहाँ हमें स्वाभाविक रूप से आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिकता से परिपूर्ण पंक्तियाँ नहीं ही प्राप्त होतीं। ‘मयंक’ जी बाल साहित्य के आरंभिक काल से ही रचनाकर्म में प्रवृत्त हो चुके थे। यह वह समय था जब बाल साहित्य अपने निर्माण काल से गुजर रहा था। इसी के साथ ही बाल साहित्य के स्वर्णकाल के तो ‘मयंक’ जी स्वयं भी एक मजबूत स्तम्भ रहे। तत्कालीन कालखंड में बाल साहित्य का सामान्य उद्देश्य भी बच्चों का मनोरंजन और उनमें अच्छे संस्कारों का जगाना ही माना जाता था। प्रस्तुत संग्रह इन सभी तथ्यों को सहेजता हुआ अपने प्रस्तुतीकरण और अपने कहन में आज के बच्चों का मनोरंजन करने में और उन्हें अपनी शरारत भरी बाल कविताओं से जोड़ने में पूर्ण रूप से सक्षम है। परम्परागत विषयों पर आधारित ये कविताएँ बाल मन की गहराइयों में सहजता और सरलता से उतर जाती हैं। स्मृतिशेष चन्द्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ जी के सर्जनकर्म के प्रति यह कृति उनकी जन्मशती के सुअवसर पर एक शाब्दिक श्रद्धांजलि भी है। यह कृति इस तथ्य को भी उजागर करती है कि आज भी ‘मयंक’ जी का रचनाकर्म बाल साहित्य के आकाश में द्युतिमान है।
डॉ. नितिन सेठी
सी-231, शाहदाना कॉलोनी
बरेली (243005)
मो- 9027422306
[email protected]
डॉ नितिन सेठी
डॉ नितिन सेठी
डॉ. नितिन सेठी सी 231,शाहदाना कॉलोनी बरेली (243005) मो. 9027422306 [email protected]
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest