समीक्षा / पुस्तक चर्चा – डॉ. रमेश यादव, मुंबई
काव्य संग्रह – मेरा सरमाया
कवयित्री – कविता राजपूत
प्रकाशक – राइटर्स पॉकेट
मूल्य – रु. 250/- केवल
हिंदी के साथ मराठी में भी सृजन कर रही, चित्रकार, गायिका, कवयित्री अर्थात बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी, कविता राजपूत का नया काव्य संग्रह “मेरा सरमाया“ हाल ही में प्रकाशित हुआ। ‘मेरा सरमाया’ अर्थात मेरी सम्पत्ति। वाकई में हर सृजनकार के लिए उसका सृजन उसकी अनमोल सम्पत्ति होती है। प्रस्तुत कृति उनकी पांचवी काव्य कृति है। इसके पहले जज़्बात, काग़ज कलम स्याही और मैं’, रंग जीवनाचे (मराठी), प्रवाह (मराठी), सय (सीडी), पंच मंत्रांजली (सीडी) जैसी काव्य-गीत कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। सबसे पहले तो इस नए काव्य संग्रह के लिए तहे दिल से बधाई देता हूँ, अभिनंदन करता हूँ, इस उम्मीद और शुभकामनाओं के साथ कि उनकी लेखनी का यह कारवां इसी तरह अविरत चलता रहे और नई-नई कृतियों का सृजन होता रहे। प्रस्तुत काव्य संग्रह बेहद आकर्षक, संवेदनशील, पठनीय एवं आंतरिक ज़ज्बातों से ओत-प्रोत 83 कविताओं का वह गुलदस्ता है, जिसमें विविध रंगों एवं शैलियों के काव्य पुष्पों को सजाया गया है। अपनी प्रस्तावना में कवयित्री लिखती है – इस कृति के बहाने मेरी ख्वाहिश और फरमाइश पूरी होने जा रही है। मेरी कविताएं अपना नया घर पाकर बेहद खुश हैं और यकीनन मैं भी ….।
कवयित्री ने इस अनमोल एवं संवेदनशील कृति को अपने नन्हें से प्यारे राजकुमार किआन (पोता) को समर्पित किया है, इस आशीर्वाद के साथ कि भविष्य में जीवन की हर सफ़लता के साथ – साथ कला, साहित्य, संगीत, संस्कृति उसके विचारों और व्यक्तित्व में रच बस जाएं। विविध भाव-भावनाओं और रंगों में पगी इन कविताओं के माध्यम से कवयित्री ने अपने ज़ज्बातों को पाठकों तक पहुंचाने का सफल प्रयास किया है। मसलन – ‘गिरते गिरते संभलना आ ही गया/ रफ़्ता रफ़्ता अब जीना आ ही गया / अश्कों की ये जिद है बहेंगे मगर / रोते रोते भी हंसना आ ही गया / मोहताज नहीं झूठे रिश्तों के हम / आदमी को परखना आ ही गया।’ एक ओर जीवन संघर्ष और दूसरी ओर ऊबड़-खाबड़ कंटीले रास्तों से गुजरते हुए जीवन में फिर से खड़े होने का संदेश देती है। उसकी नायिका जब प्रेम रस में सराबोर होती है तो तब कवयित्री लिखती है- ‘मैं अब जाने कहाँ गुम हूँ / अब तो बस तुम ही तुम हो / मन की सारी गिरहें खुल गई हैं / जैसे बारिश के आने से धूल की परतें मिट जाती हैं।’ प्रेम के बारिश में भीगी नायिका उत्सव मनाती है, और अपने प्रियतम से मिलन के बाद गाती है – ‘तुझको पाया तो मुझको ऐसा लगा / जी ना पाऊँगी तुझसे होके जुदा / तेरे एहसास मुझे छू के चले जाते हैं / तू ही सरमाया मेरा, तू है मेरा खुदा।’ ‘मौन ने मृत्यु दी…’ इस कविता में वह व्यक्त होती है- ‘पता है, तुम मेरे लिए हमेशा / शब्दों के जादूगर रहे हो / तुम्हारे शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही / मेरी जिंदगी।’ ‘बरसात’ नामक कविता में नायिका प्रेम निवेदन करते हुए कहती है- दे दो न मुझको तुम वह / पहली सी बरसात / कुछ भीगे भीगे लम्हों की एक छोटी सी मुलाकात।’ ‘दस्तक’ कविता में बारिश प्रेम के प्रतीक के रूप में पेश किया गया है- ‘तेज धूप में भी / दिल में एक ठंडक है / महसूस करो जरा / उसके आने की आहट है।’
प्रस्तुत संग्रह में शृंगार रस की कविताएं प्रमुखता से अपने राग-विराग का आलाप करती नजर आती हैं, जो कि कवयित्री का मजबूत पक्ष है। सृजन जगत में शृंगार रस को ‘रसराज’ कहा जाता है। इसके दो प्रमुख पक्ष हैं – एक तो संयोग पक्ष, जहां नायक और नायिका के मिलन का भाव उभरकर सामने आता है और दूसरा वियोग पक्ष है, जिसमें बिछोह का स्वर गुंजायमान होता है। सृजन में प्रेम भावनाओं की अभिव्यक्ति हमेशा से अद्वितीय रही है। इस संग्रह में भी प्रेम की कोमलता, आकर्षण और मिलन का अत्यानंद व्यक्त हुआ है। साथ ही वियोग में बिछोह, पीड़ा और तनहाई का राग उजागर हुआ है। संयोग एवं वियोग की भाव-भावनाओं को इन कविताओं में सूक्ष्मता और उनके विविध रूपों के साथ प्रभावी ढंग से चित्रित किया गया है। विरह से निराश नायिका टूटकर बिखरने की बजाय नए सपनों के साथ जीना सीख लेती है और लिखती है – ‘बस इतना सा बदला है मौसम / दिल के घर में अब दर्द रहता है / इस दर्द ने ही सिखाया हमें / जिंदगी को कैसे जिया जाता है..।’
लौकिक दृष्टि से प्रेम केवल दो प्रेमियों के मिलन तथा नायिका के नखशिखांत सौंदर्य का वर्णन ही नहीं, बल्कि प्रकृति, पशु-पक्षी, माता-पिता, जीवन साथी, श्रद्धेय ईश्वर के प्रति भक्ति-प्रेम आदि का इजहार भी होता है, जो इस संग्रह में ‘लव यू जिंदगी, नदी के दो किनारे, चल पड़ी हूँ, हरसिंगार, एक चिट्ठी मां के नाम, मोगरे के फूल, क्या तुम ही थे मेरे कृष्ण?, मेरे सांई, मेरे गिरिधर जैसी कविताओं में व्यक्त हुआ है। मीरा और बिहारी ने श्रीकृष्ण को प्रेम का प्रतीक मानकर भक्ति रस में पगी शृंगारिक रचनाओं का सृजन किया है। इस संग्रह की नायिका भी वियोग में लिखती है- ‘तुमसे मिले दर्द का एक एक / कतरा सहेज कर रखा है मैंने / क्योंकि यह दर्द मेरे लिए बेशकीमती है…/ इसी ने सिखाया मुझको / गमों की तपिश को सहकर / गुलमोहर सा बनना / कांटों भरी राह पर / मुस्कुराते हुए चलना।’ वियोग के इन क्षणों मे भी नायिका उम्मीद की आस जगाए रखती है और लिखती है- ‘जानती हूँ / वो कभी लौटकर नहीं आएगा / फिर भी हर शाम द्वार की देहरी पर / मैं एक दीप जला देती हूँ।’ प्रेम कहीं बाहर नहीं बल्कि अपने भीतर ही होता है, उसे महसूस करते हुए कवयित्री लिखती है – ‘जो बीत गया, वो अनुभव बन गया / जो बिछुड़ गया, वो एक अध्याय बन गया /….जो कुछ टूटकर बिखर गया था / उसे समेटकर मैंने / जीवन का एक नया चित्र बनाया / उसे अनेक रंगों से सजाते हुए महसूस हुआ कि प्रेम बाहर नहीं / भीतर है…।’
संग्रह की कुछ सामाजिक रचनाएं बेजोड़ हैं इनमें – ‘किराएदार, स्त्री, पापा, विसर्जन, जिंदगी एक तोहफा, ठोकर एक सबक है’ आदि का जिक्र किया जा सकता है, जो विपरीत परिस्थतियों में सकारात्मकता के गीत गाती हैं। बानगी के तौर पर- ‘अकेले आए हैं अकेले है जाना / तो फिर काहे का रोना? / हर ठोकर एक सबक है/ हर सबक से है कुछ सीखना।’
कुछ वर्ष पहले कविता जी काव्य संग्रह ‘काग़ज कलम स्याही और मैं’ के लोकार्पण समारोह में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ था। “इस बार लोकार्पण समारोह का आयोजन नहीं कर पा रही हूँ।” कहते हुए वे कुछ भावुक हो रही थीं। वैसे कोरोना महामारी के बाद इस तरह की स्थिति से कई लेखकों को गुजरना पड़ रहा है, यह वास्तविकता है। इस संग्रहणीय काव्य संग्रह का साहित्य जगत में गर्मजोशी के साथ स्वागत किया जाएगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। शुभकमनाओं सहित।


प्रिय कविताआपको काव्य संग्रह मेरा सरमाया के लिए हार्दिक शुभकामनाएं बधाई
प्रिय में पूर्व में भी आपकी कविताओं को पढ़ चुकी हूं
मेने तुम्हारी कविताओं को पढ़कर लिखा था कविता तुम कविता लिखती हीनहीं हो बल्कि तुम स्वयं एक कविता हो।
कविताओं में तुम्हारी सरल भाषा शैली कम शब्दों में गागर में सागर भरती है।
भावनाएं कोमल हृदयस्पर्श होती हैं
आदरणीय रमेश यादव जी ने बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है उन्हें भी साधु बाद
प्रिय कविता आपकी कलम इसी तरह सुंदर कविताओं का सृजन करती रहे,आप यशस्वी हो।