पुस्तक : सारांश
लेखिका : लता तेजेश्वर ‘रेणुका ‘
प्रकाशक : जिज्ञासा प्रकाशन, गाजियाबाद
पृष्ठ संख्या :115
मूल्य : रुपये 200/- केवल.
लता तेजेश्वर ‘ रेणुका ‘ हिंदी साहित्य जगत का एक उभरता हुआ नाम है. मूलतः उनकी शिक्षा ओडिशा में हुई और उनकी मातृभाषा तेलुगु है. बावजूद इसके वे हिंदी में सृजन करती हैं और विविध विधाओं में उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित हो चुकी हैं. मसलन तीन उपन्यास, चार काव्य संग्रह, एक क्षणिका संग्रह, एक लघु उपन्यास, एक लघुकथा संग्रह इत्यादि. कुछ पुस्तकों का उन्होंने संपादन भी किया है. पुस्तक लेखन की प्रेरणा उन्हें उन्हें अपने घर से ही मिली, जबकि उनके अनुसार उनके परिवार में दूर दूर तक कोई साहित्य से जुड़ा हुआ नहीं है. हिंदी साहित्य जगत के इस मुकाम तक पहुंचने में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, हिम्मत से खड़ा होना पड़ा. इस सफर में अपनी अशुद्ध हिंदी के लिए उन्हें कुछ साहित्यकारों की कड़ी आलोचना का शिकार भी होना पड़ा. मगर वे हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने हिंदी में लेखन जारी रखा. समय के साथ धीरे-धीरे वे परिपक्व हो रही हैं. उनका ये मिशन खुद तक सीमित न होकर उन्होंने “विविध भारतीय भाषा संगम मंच” भी बनाया और पिछले एक दशक से इस मंच के माध्यम से वे साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करती रहीं हैं. हिंदी सेवी के तौर पर उनका यह कार्य बहुत ही सराहनीय है. हम जैसे साहित्यकारों को उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए.
उनका यह कार्य बहुत ही हिम्मत और जिगर का काम है, ऐसा मेरा मानना है. ऐसे कई अहिंदी भाषियों के नाम गिनाए जा सकते हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य जगत में अपना नाम रोशन किया और हिंदी के ध्वज को शान से फहराए रखा है. हिंदी हमारे देश की धड़कन है, जो लोगों के दिलों में बसती है. इसलिए हिंदी में सृजन करना उनकी प्राथमिकता है. देश में हिंदी को समृद्ध बनाने में अहिंदी भाषियों के योगदान को सलाम किया जाना चाहिए. उनके द्वारा आयोजित कुछ कार्यक्रमों में शामिल होने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है इसलिए दावे के साथ मैं कह सकता हूं कि लता जैसे लोग जब हिंदी का ध्वज लेकर आगे बढ़ते हैं तब हिंदी और भी गौरवान्वित होती है. देश को ऐसे ही समर्पित साथियों की जरूरत है, जिनके बलबूते हिंदी कभी ना कभी देश की राष्ट्रभाषा बन पाएगी. अपने तमाम गुणों एवं योग्यता के बावजूद भी देश की आजादी के 75 सालों बाद भी हिंदी देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई, इसे इस देश के नागरिकों का और भारत जैसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करने के लिए एक जिगरबाज नेतृत्व की जरूरत आज भी महसूस हो रही है, सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिंदी देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन पा रही है. इससे बड़ा दुर्भाग्य भारत जैसे राष्ट्र के लिए और क्या हो सकता है? हम जैसे हिंदी प्रेमियों का अब एक ही सपना है कि जल्द से जल्द हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बने और देश को उसकी अधिकृत जुबान मिले. लता जी ने अपने एक लेख के माध्यम से इस ओर इशारा भी किया है. बहरहाल यह विषय काफी लंबा और पेचीदा है, इसलिए इसे यहीं पर विराम देते हुए हम लता रेणुका के नए आलेख संग्रह “सारांश“ की चर्चा करते हैं, जो हाल ही में प्रकाशित हुआ है.
प्रस्तुत आलेख संग्रह कई विषयों पर सार्थक भाष्य करता है. इन विषयों के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों पर लेखिका चर्चा करती हैं, और जनजागृति का बिगुल बजाती हैं. उनका मानना है कि सार्थक एवं सुसंस्कृत समाज के निर्माण में हम सभी को अपने अपने स्तर पर काम करने की जरूरत है. समाज में व्याप्त कुरीतियों, शोषण, अत्याचार को समाप्त करने में जब हम निडरता से प्रयास करेंगे तो एक सार्थक समाज का निर्माण होगा. इसीलिए लता जी की लेखनी को एक सलाम तो बनता है. अपनी लेखनी के माध्यम से वे अपने सामर्थ्य भर हिंदी को सशक्त बनाने का काम कर रही हैं. इस संग्रह के माध्यम से उन्होंने कई विषयों को निर्भीकता और ईमानदारी से पाठकों के समक्ष रखा है तथा सार्थक भाष्य भी किया है. अतः वे बधाई की पात्र हैं.
“वैश्विक विस्तार में हिंदी की भूमिका,’ स्त्री की आधी दुनिया का पूरा सच,’बुजुर्ग : बोझ या धरोहर,’ इंस्टेंट जिंदगी,’ दायरे,’ स्त्री का महत्व और घरेलु हिंसा,’ स्त्री स्वतंत्र क्यों नहीं?, ‘क्यों करते हैं बच्चे आत्महत्या?,’ आरक्षण,’ हिन्दीतर भाषी हिंदी लेखकों की मुश्किलें, ‘सत्य और धर्म के आधार पर समाज को साहित्य का अवदान,’ आदर्श जीवन के निर्माण में साहित्य की भूमिका,’ बहुभाषिकता और राष्ट्रीय एकता,’ हिंदू शादी और रीति रिवाज, ‘कन्या भ्रूणहत्या के रोकथाम जैसे ज्वलंत विषयों पर चर्चा करते हुए उन्होंने समाज को दिशा देने की सार्थक पहल की है. निश्चित रूप से इस संग्रह का हिंदी साहित्य जगत में गर्मजोशी से स्वागत किया जाना चाहिए.
बदलते दौर में उपरोक्त विषयों पर उन्होंने सूक्ष्म विवेचन करते हुए उसके निदान पर भी चर्चा की है. वैश्विक स्तर पर हिंदी की बदलती तस्वीर जोश बढ़ाने वाली है. भारतीय परिवेश में स्त्रियों की सद्य स्थिति, उनकी पीड़ाएं, उनकी स्वतंत्रता, घरेलु हिंसा, बच्चों द्वारा किए जा रहे आत्महत्या जैसे मुद्दों पर भी भाष्य किया है. बुजुर्गों को लेकर महानगरों में बढ़ रहे वृद्धाश्रमों को लेकर भी वे चिंता व्यक्त करती हैं. आदर्श जीवन के निर्माण में साहित्य की क्या भूमिका होनी चाहिए और हिन्दीतर भाषी हिंदी लेखकों की समस्याएं पर भी वे चिंतन के साथ व्यक्त होती हैं. उनके इस प्रयास के लिए हार्दिक साधुवाद तो बनता ही है. उनकी लेखनी इसी तरह अनवरत जारी रहे और हिंदी साहित्य जगत में अपना नाम रोशन करें ऐसी शुभकामनाएं हम व्यक्त करते हैं. धन्यवाद.
समीक्षक : डॉ. रमेश यादव, मुंबई