पुस्तक :- काँस के फूलों ने कहा जोहार!
लेखिका का नाम :- डॉ प्रज्ञा गुप्ता
प्रकाशक का नाम :- बोधि प्रकाशन
पुस्तक का मूल्य :- 249 रुपए
प्रकाशन वर्ष :- 2025
समीक्षक :- डॉ कुमारी उर्वशी
प्रज्ञा गुप्ता का कविता-संसार जितना भावनात्मक संवेदना का प्रदेश है, उतना ही वह चिंतन, इतिहास, स्मृति और सांस्कृतिक चेतना का प्रांगण भी है। उनकी कविताएँ किसी अकेले स्त्री-मन की धड़कनें भर नहीं, बल्कि सामूहिक स्त्री-अनुभवों की बहुरंगी प्रतिध्वनियाँ हैं—अक्सर धीमी, कभी अनसुनी, तो कभी प्रतिरोध के स्वर में थरथराती हुई। प्रज्ञा निजी जीवन के छोटे-छोटे स्पर्शों—बेटी के साथ बिताए क्षणों, घर-आंगन की पगडंडियों, श्रम से थकी देह की शांति, और प्रेम के अघोषित कंपन—को उठाकर सामाजिक संदर्भों की विशाल भूमि में रोप देती हैं।
उनकी कविताओं में स्त्री कोई एक रूप में स्थिर नहीं रहती; वह माँ भी है, बेटी भी; प्रेमिका भी है, श्रमशील देह भी; जिजीविषा का स्रोत भी और मौन में छुपा प्रतिरोध भी। वह स्मृतियों की पुरानी गठरी से उतरकर आती है और वर्तमान के कठिन भूगोल में अपने लिए एक नई जगह रचती है—एक ऐसी जगह, जहाँ से वह जीवन को पुनः परिभाषित कर सके।
यही कारण है कि प्रज्ञा की कविता को पढ़ना केवल भावनाओं को समझना नहीं, बल्कि एक पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल की पुनर्खोज है—वह भूगोल जिसमें स्त्री अपनी अस्मिता, अपनी इच्छाओं, अपने श्रम और अपने मौन को नए अर्थ देती हुई दिखाई देती है।
जब हम इन कविताओं को स्त्रीवाद, लोक-संस्कृति और सांस्कृतिक अध्ययन की रोशनी में देखते हैं, तो इनमें अनेक ऐसे अर्थ-स्तर प्रकट होते हैं, जो पहली दृष्टि में छुपे रहते हैं। स्त्रीवाद के धरातल पर ये कविताएँ स्त्री की आंतरिक agency—उसके निर्णय, उसके सपने, उसकी हार-जीत, उसके संघर्ष और उसके प्रेम—को पूरी गरिमा के साथ सामने लाती हैं। वे यह भी दिखाती हैं कि दैनंदिन जीवन में ढली हुई स्त्री-संवेदना भी एक गहरा राजनीतिक प्रतिरोध बन सकती है।
दूसरी ओर, लोक-संस्कृति का स्पर्श इन कविताओं को मिट्टी की उष्मा से भर देता है। खेतों की गंध, काँस के फूलों की चमक, देसी संबोधनों की आत्मीयता, उत्सवों की भीगी यादें, और स्थानीय शब्दों की लय—सब मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक संसार का निर्माण करते हैं, जो आधुनिकता की भीड़ में भी अपने लोक-स्वर को सुरक्षित रखता है।
सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से देखें, तो यह कविता-संसार सत्ता-संबंधों, भाषाई पहचान, श्रम-विभाजन और हाशिए पर मौजूद स्त्रियों—मजदूरों, किसानों, आदिवासी स्त्रियों, घरेलू श्रमिकों—सबको एक सम्मानजनक केंद्र में लाने का काम करता है। प्रज्ञा की कविता में संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं; वह गतिशील है—समय के साथ बदलती हुई, नए प्रतीकों को जन्म देती हुई।
प्रज्ञा गुप्ता का काव्य केवल भावनाओं की कोमल सतह पर नहीं टिका है; वह गहराई में उतरकर उन जड़ों को छूता है, जहाँ से स्त्री-जीवन की संपूर्ण यात्रा शुरू होती है—मिट्टी से मन तक, घर से दुनिया तक, स्मृति से भविष्य तक। उनकी कविता आधुनिक हिंदी कविता की परंपरा में स्त्री-अनुभव, लोक-संस्कृति और सांस्कृतिक प्रतिरोध का एक जीवंत और विशिष्ट दस्तावेज बनकर उभरती है।
स्त्रीवाद को यदि केवल शोषण के प्रतिरोध तक सीमित मान लिया जाए, तो उसकी आधी तस्वीर ही उभरती है; उसका वास्तविक स्वरूप आत्म-स्वीकृति, आत्म-निर्माण और अपनी स्वतंत्र सत्ता के उद्घोष में प्रकट होता है। प्रज्ञा गुप्ता की स्त्रियाँ इस व्यापक स्त्रीवादी चेतना की वाहक हैं—वे न करुणा की मूर्तियाँ मात्र हैं, न ही दुख की स्थायी छवियाँ। वे अपनी भाषा, अपने निर्णय और अपनी नैतिक स्वायत्तता के साथ खड़ी होती हैं। ‘लड़की की आँखों में’ जैसे कवितांश में यह स्वायत्त दृष्टि सबसे अधिक स्पष्ट होती है। लड़की की आँखों की चमक केवल प्रेम, खिलावट और सौंदर्य का रूपक नहीं बनती, बल्कि वह उन सामाजिक मानचित्रों को चुनौती देने की आकांक्षा भी समेटे है जो अब तक पुरुष-निर्मित रहे हैं। स्त्रीवादी आलोचना की दृष्टि से यह वही दबा हुआ, बार-बार खामोश कराया गया दृष्टिकोण है, जो प्रज्ञा की कविता में नए साहस के साथ उभरता है—एक ऐसी दृष्टि, जो प्रेम में भी प्रश्न कर सके, भय में भी अर्थ खोज सके और आश्चर्य के सरल क्षणों में भी अपने अस्तित्व की पूरी आभा के साथ खिल उठे। यहाँ प्रज्ञा गुप्ता की कविताएँ स्त्री को केवल दर्श्य नहीं, बल्कि द्रष्टा के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं—संवेदना से भरी, पर आत्मज्ञान और आत्मबल से दीप्त।
हिंदी स्त्रीवादी लेखन सदैव स्त्री देह के वस्तुकरण का विरोध करता आया है, और इसी परंपरा में प्रज्ञा गुप्ता की कविताएँ देह को मात्र जैविक सत्ता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, उपस्थिति और जीवंत ऊर्जा का रूप देती हैं। उनके यहाँ स्त्री देह उत्सव है—क्योंकि वह श्रम करती है, सृजन करती है, प्रेम करती है और अपने अस्तित्व की ध्वनि को दुनिया तक पहुँचाती है। ‘समय के साथ दौड़ती स्त्री’ स्त्री की इसी सक्रिय उपस्थिति का सशक्त रूपक बनकर उभरती है। यह स्त्री केवल समय के पीछे भागती हुई थकी हुई छाया नहीं है; वह समय को अपनी रीति से पुनर्गठित करने वाली एक सृजनशील शक्ति है। घर-परिवार, शिक्षा, करियर, बच्चों की देखभाल, भावनात्मक श्रम—इन सभी को वह केवल निभाती नहीं, बल्कि उनमें अर्थ और संतुलन रचती है। स्त्रीवादी विमर्श में इसे ‘दोहरे श्रम’ तथा ‘अनदेखे श्रम’ की श्रेणियों में रखा जाता है—ऐसा श्रम जो घर की सीमाओं में गुम हो जाता है, लेकिन वही समाज की सबसे मजबूत नींव भी है। प्रज्ञा इस श्रम को दृश्यमान बनाती हैं, उसे सम्मान देती हैं, और स्त्री देह को एक पूर्ण, जिजीविषामयी, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं।
‘मैं अपनी बेटी से ककहरा सीख रही हूँ’ और ‘मेरी बेटी इन दिनों मेरी दोस्त है’ जैसी कविताएँ भारतीय स्त्रीवाद में एक विलक्षण भावात्मक और दार्शनिक मोड़ को उजागर करती हैं, जहाँ माँ–बेटी संबंध केवल जैविक या पारिवारिक सूत्र नहीं रह जाता, बल्कि ज्ञान, संवेदना और मुक्ति का एक नया साझा क्षेत्र बन जाता है। इन कविताओं में माँ सिर्फ़ बेटी की गुरु नहीं है; बेटी भी माँ की गुरु, मार्गदर्शक और आलोचनात्मक चेतना का स्रोत बनकर उभरती है। यहाँ बेटी स्त्री के आने वाले समय का रूपक है—एक ऐसा भविष्य जो अपने अतीत पर रोशनी डालता है, उसके अंधेरों को समझता है, और उसे अधिक जागरूक, अधिक स्वतंत्र, अधिक साहसी बनाने के लिए नया ककहरा सिखाता है। यह संवाद परंपरागत पितृसत्तात्मक ज्ञान-व्यवस्था को निर्णायक रूप से चुनौती देता है, जिसमें हमेशा ज्ञान का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर—आदमी से औरत की ओर, बड़े से छोटे की ओर—निर्धारित रहा है। प्रज्ञा गुप्ता इस संबंध को एक समानांतर स्त्रीवादी पाठ में बदल देती हैं, जहाँ दो पीढ़ियों की स्त्रियाँ मिलकर एक-दूसरे को पढ़ती, समझती और पुनर्परिभाषित करती हैं। यह संबंध स्त्री के आत्मनिर्माण का वह क्षितिज है, जहाँ प्रेम, संवाद, प्रश्न और प्रतिरोध एक साथ फलते हैं।
प्रज्ञा गुप्ता का काव्य-संसार अपनी जड़ों से गहरे जुड़े उस लोक–संस्कृति की उष्मा से निर्मित है, जिसकी मिट्टी में इतिहास भी है, स्मृति भी, संघर्ष भी और सांस्कृतिक आत्मगौरव भी। उनकी कविताओं में लोक केवल परिवेश भर नहीं, बल्कि एक जीवंत आत्मा है—एक धड़कता हुआ सांस्कृतिक स्रोत, जहाँ से स्त्री का जीवन-बोध, संवेदना और आत्मबल उठता है। संग्रह का शीर्षक “काँस के फूलों ने कहा—जोहार!” ही इस लोक-सांस्कृतिक भावभूमि का सबसे सुंदर उद्घाटन है। काँस का फूल शरद-ऋतु का सौंदर्य भर नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी खड़े रहने की जिद, धीरज और जिजीविषा का प्रतीक है। वहीं “जोहार” झारखंडी और पूर्वांचली लोक-परंपरा में सिर्फ़ नमस्कार नहीं, आत्मसम्मान, परस्पर सम्मान और सांस्कृतिक आत्मीयता का विधान है—एक ऐसा अभिवादन जिसमें इतिहास की आवाज़ और मानवता की ऊष्मा साथ चलती है। प्रज्ञा इस लोक-अभिवादन को कविता के भीतर एक सांस्कृतिक पुनर्पाठ की तरह स्थापित करती हैं।
लोक-संस्कृति के इसी धरातल पर स्त्री की भूमिका भी नई ऊर्जा से उभरती है। ‘नइहर आई हुई लड़कियाँ’ में लोक का राग-रस, उसकी सुवास और उसकी स्मृतियाँ स्त्री के अनुभवों में गुँथ जाती हैं—नइहर का आँगन, पेड़ की फुनगियाँ, बचपन की कुलाँचें, खेत-खलिहान की मिट्टी, और घर लौटने की गहरी बेचैनी सब मिलकर एक ऐसे लोक-चित्र को रचते हैं, जहाँ स्त्री का हृदय अपनी जड़ों से पुनः संवाद करता है। यहाँ लोक उसके लिए मात्र भूगोल नहीं, बल्कि उसका पहला घर, पहला अनुभव, पहला गीत और पहला व्यक्तित्व है। प्रज्ञा की कविताएँ यह स्पष्ट करती हैं कि लोक-संस्कृति स्त्री के लिए दृश्य नहीं—अनुभव है; वस्तु नहीं—जीवन है; परंपरा नहीं—उसकी अपनी आत्मकथा का रंग है। गाँव की आवाज़ें, त्यौहारों की लय, मिट्टी की गंध, रिश्तों की सहजता और स्त्री-जीवन की अनकही थकान—all इस लोक-संस्कृति में एक साथ धड़कते हैं। इस प्रकार प्रज्ञा की कविता लोक को आधुनिक स्त्री-चेतना के साथ जोड़कर, उसकी आंतरिक शक्ति, श्रम और सौंदर्य को एक नई साहित्यिक गरिमा प्रदान करती है।
प्रज्ञा गुप्ता की कविताओं में आदिवासी सौंदर्यबोध केवल एक विषय की तरह नहीं आता, बल्कि वह कविता की साँस बनकर बहता है। उनकी कविताएँ बताते हैं कि आदिवासी संस्कृति को समझना, दरअसल, एक ऐसी संवेदनात्मक दुनिया में प्रवेश करना है जहाँ जीवन के अर्थ किसी धर्मग्रंथ या सिद्धांत से नहीं, बल्कि धरती, पेड़, पत्थर, नदी, हवा और उनके साथ रहने वाले श्रमशील मनुष्यों से निकलते हैं।
‘हे संगी’ और ‘काँस के फूल’ जैसी कविताएँ इस बात को और गहराई से समझने का अवसर देती हैं। ‘संगी’ का संबोधन केवल एक मित्रवत पुकार नहीं, बल्कि झारखंडी आदिवासी समाज में मानव–मानव के बीच संबंधों की ऊष्मा का प्रतीक है—एक ऐसी पुकार जिसमें बराबरी, अपनत्व, साझेदारी और संघर्ष की साझी स्मृतियाँ होती हैं। यहाँ ‘संगी’ सिर्फ व्यक्ति नहीं, बल्कि एक समुदाय है जो दुख में कंधा देता है और सुख में नृत्य करता है।
इन कविताओं में आदिवासी संस्कृति का सौंदर्यबोध किसी सजावटी ‘लोकचित्र’ की तरह नहीं आता— यह जीवन के गहरे अनुभवों से उपजा सौंदर्यबोध है, जहाँ प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई दीवार नहीं है।
नदी वहाँ ‘पूरा’ बनने के लिए मनुष्य की प्रतीक्षा नहीं करती;जंगल मनुष्य की अनुमति से साँस नहीं लेता;धरती किसी पूजा का इंतज़ार नहीं करती।बल्कि प्रकृति और मनुष्य एक-दूसरे के विस्तार हैं।वे एक-दूसरे में रहते हैं, एक-दूसरे को थामते हैं।
इसलिए प्रज्ञा की कविताओं में जब काँस का फूल बोलता है, तो वह सिर्फ फूल नहीं, बल्कि पूरा सभ्यतागत संवाद बन जाता है—एक ऐसा संवाद जिसमें प्रकृति मनुष्य को सम्बोधित करती है और मनुष्य प्रकृति को सुनता है।
आदिवासी जीवन में सौंदर्य का अर्थ कोई बाहरी सजावट नहीं, बल्कि संबंधों की सुंदरता है—धरती से संबंध,वन से संबंध,आकाश से संबंध,समुदाय से संबंध,और अपने इतिहास तथा मिथकों से संबंध।
इस दृष्टि से प्रज्ञा की कविता हमें यह अहसास कराती है कि आदिवासी संस्कृति में सौंदर्यबोध कोई उपभोग की वस्तु नहीं है—वह एक नैतिक और सांस्कृतिक अनुशासन है।इस अनुशासन में प्रकृति को संसाधन नहीं माना जाता;उसे रक्त–संबंध की तरह देखा जाता है,जैसे बहन, जैसे माँ, जैसे संगी।
यही कारण है कि उनकी कविताओं में जंगल जब हिलता है, तो मनुष्य का मन भी हिलता है;फूल जब खिलता है, तो भीतर का अंधेरा कुछ उजला हो जाता है;और जब धरती भीगती है, तो कवयित्री को लगता है कि किसी पुरखे की मुस्कान लौट आई हो।यह सौंदर्यबोध पूँजीवादी सभ्यता की उस दृष्टि का प्रतिरोध करता है जो प्रकृति को केवल खनन, लकड़ी, खदान और मुनाफे के रूप में देखती है।
प्रज्ञा की कविता एक राजनीतिक चेतना भी रचती है— कि आदिवासी समाजों का सौंदर्य, उनका संगीत, उनकी भाषा और उनके पर्व केवल संस्कृति नहीं हैं—वे एक सक्रिय प्रतिरोध हैं।इस दृष्टि से देखें तो प्रज्ञा की कविता भारतीय स्त्रीवादी विमर्श को भी समृद्ध करती है।
आदिवासी स्त्री—जो जंगल में लकड़ी चुनती है,धान रोपती है,नदी में उतरकर जीवन का भार संभालती है—वह प्रज्ञा की पंक्तियों में एक ऐसी सौंदर्य–छवि बन जाती है जो संघर्ष में सुंदर है, श्रम में चमकदार है और जीवन में मुक्त है।
प्रज्ञा की कविताएँ हमें यह विश्वास दिलाती हैं कि आदिवासी जीवन के भीतर एक मौलिक कविता पहले से मौजूद है—कवयित्री केवल उसे सुनती है, महसूस करती है और फिर भाषा में रूपांतरित कर देती है।
आदिवासी संस्कृति का यही सौंदर्यबोध— संबंध का सौंदर्यबोध,जो धरती को रोटी से,पेड़ों को सांसों से,और मनुष्यों को उनके सामूहिक इतिहास से जोड़ता है—प्रज्ञा की कविता को विशेष, विशिष्ट और अनिवार्य बनाता है।
सांस्कृतिक अध्ययन के दृष्टिकोण से प्रज्ञा गुप्ता का कविता-संसार न केवल भावनाओं और अनुभवों का क्षेत्र है, बल्कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं, शक्ति-संबंधों, भाषाई अस्मिता और प्रतिरोध की आवाज़ का भी सजीव दस्तावेज़ है। उनकी कविताओं में भोजपुरी, मगही, नागपुरी, खोरठा और झारखंडी लोक-शब्द केवल भाषाई तत्व नहीं हैं; वे स्थानीय अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान और वर्चस्व की राजनीति के खिलाफ प्रतिरोध की घोषणाएँ हैं। भाषा के इस प्रयोग से प्रज्ञा मुख्यधारा की भाषाई सत्ता को चुनौती देती हैं और लोक-संस्कृति को कविता में केंद्रीय स्थान प्रदान करती हैं। इसी सांस्कृतिक संदर्भ में उनकी ‘हॉकी खेलती लड़की’ कविता स्त्री के शरीर को एक नई मुक्ति की भाषा प्रदान करती है—स्त्री परंपरागत बंद कमरों और सामाजिक सीमाओं से निकलकर खुली हवा और मैदान में तेज़ी से दौड़ती है, अपने खेल, अपनी शक्ति और संघर्ष की नई सामाजिक पहचान बनाती है। इसके साथ ही ‘पिता’ कविता में पिता का चित्रण किसी दैविक या पारंपरिक अधिकार के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की खुरदरी जमीन पर खड़े, थके-मानसिक परन्तु अडिग मनुष्य के रूप में किया गया है। यह एक नई सांस्कृतिक छवि है, जिसमें पिता भावनाशून्य नहीं, बल्कि अनुभव, करुणा और जीवन की वास्तविकताओं का संवेदनशील स्रोत हैं। इस प्रकार प्रज्ञा गुप्ता की कविताएँ भाषा, खेल, देह, परिवार और स्मृति के माध्यम से पहचान, शक्ति और प्रतिरोध के जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को उजागर करती हैं और हमें यह दिखाती हैं कि कविता केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का सक्रिय उपकरण भी बन सकती है।
प्रज्ञा गुप्ता के काव्य-संग्रह में उपनिवेशोत्तर दृष्टि स्पष्ट रूप से झलकती है, क्योंकि यह कविताएँ उन्हीं आवाज़ों और अनुभवों को केंद्र में लाती हैं जिन्हें लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया। यह दृष्टि बार-बार यह स्मरण कराती है कि लोक और ग्रामीण अनुभव केवल किनारे के दृश्य नहीं, बल्कि असली सांस्कृतिक केंद्र हैं; यही उपनिवेशोत्तर प्रतिरोध की चेतना है—जहाँ मुख्यधारा की संस्कृति को एकमात्र मानने की परंपरा चुनौतीपूर्ण रूप से सवालों के घेरे में आती है। संग्रह की कविताओं में भाषा, लोक-शब्द, ताल और संबोधन इस हाशिये को आवाज़ देते हैं, जिससे पता चलता है कि सांस्कृतिक शक्ति का केंद्र हमेशा कहीं ऊपर या बाहर नहीं, बल्कि उसी मिट्टी, नदी, खेत, पत्ते, फूल और हवा में विद्यमान है, जिनसे जीवन और चेतना जुड़ी है। प्रकृति यहाँ केवल दृश्य या सजावट नहीं, बल्कि संवेदनाओं, श्रम और अस्तित्व के सांस्कृतिक पात्रों के रूप में उपस्थित है। उपनिवेशोत्तर सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से यह प्रतिरोध महत्वपूर्ण है—कविता इस तथ्य को उद्घाटित करती है कि प्रकृति को केवल उपभोग का साधन नहीं, बल्कि जीवन-सहचर, संस्कृति और पहचान का मूल स्तंभ मानना चाहिए। इस प्रकार, प्रज्ञा गुप्ता का काव्य-संसार हाशिये की आवाज़ को सजग, जीवंत और सम्मानजनक रूप में केंद्र में लाकर उपनिवेशोत्तर विमर्श की प्रासंगिकता को गहराई प्रदान करता है।
प्रज्ञा गुप्ता की स्त्री कविता में एक जटिल और समृद्ध तिहरी परत के रूप में उभरती है—डर, स्वप्न और प्रतिरोध। वह डरती भी है, क्योंकि समाज की बनाई गई सीमाएँ, पितृसत्तात्मक नियम और परंपरागत दमन उसकी चेतना में गहराई से अंकित हैं; वह सपना भी देखती है, क्योंकि उसकी आंतरिक दुनिया स्वतंत्रता, आकांक्षा और संभावनाओं से भरी है, और यही स्वप्न उसे अपनी सीमाओं को पहचानने और उन्हें चुनौती देने की क्षमता देता है। अंततः, वह प्रतिरोध करती है—न केवल बाहरी दमन और सामाजिक बंदिशों के खिलाफ, बल्कि अपने भीतर के भय और संकोच के विरुद्ध भी। यह प्रतिरोध उसकी आत्मा की पुकार है, उसका अस्तित्वात्मक और नैतिक अधिकार, जो कविता के माध्यम से सहज, गहन और जीवंत रूप में व्यक्त होता है। इस तिहरी परत में आधुनिक स्त्रीवाद की नई संवेदना समाहित है, जो स्त्री को केवल पीड़ित या विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि स्वप्न देखने, डरने और उसके बावजूद खड़े होने वाली पूर्ण, सक्रिय और सशक्त शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।
इस कविता-संग्रह की महत्ता कई स्तरों पर स्पष्ट होती है। यह स्त्री को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करता है—माँ, बेटी, प्रेमिका, खिलाड़ी, श्रमिक, स्वप्नद्रष्टा और विद्रोही के रूप में—जहाँ हर रूप उसकी जीवन-ऊर्जा, संवेदना और संघर्ष की विविधता को दर्शाता है। यह लोक-संस्कृति, क्षेत्रीय शब्दों और मिट्टी की सुगंध को केंद्र-बिंदु पर लाकर कविता को केवल भाषा और रूपक का माध्यम नहीं रहने देती, बल्कि उसे जीवन और अनुभव का जीवंत दस्तावेज़ बनाती है। सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से यह संग्रह हाशिये की संस्कृति, आदिवासी और ग्रामीण अनुभवों को नया मान-सम्मान प्रदान करता है, मुख्यधारा की एकमात्रता को चुनौती देता है और स्थानीय भाषाओं, लोक-गीतों, पर्वों और परंपराओं के महत्व को उजागर करता है। साथ ही, यह स्त्री की आंतरिक यात्रा—उसकी भय, स्वप्न और प्रतिरोध की तिहरी परत—के साथ उसके सामाजिक संघर्ष और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को भी उजागर करता है। यही कारण है कि यह संग्रह हिंदी कविता को एक नए लोक-स्त्रीवादी सौंदर्यशास्त्र से सम्पन्न करता है, जहाँ कविता केवल सौंदर्य और भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्त्रीवादी विमर्श का सक्रिय साधन भी बनती है।