ऐसा कभी–कभी ही होता है कि किसी पुस्तक का शीर्षक इस कदर आकर्षित करे कि उसे पढ़ने को जी ललचा जाए। हिंदी साहित्य जगत की सुप्रसिद्ध व लोकप्रिय लेखिका सुधा जुगरान जी द्वारा रचित उपन्यास ‘मन के चौहट्टे पर बोनसाई’ ऐसी ही एक कृति है जिसका शीर्षक तो आकर्षक है ही साथ ही कथानक व प्रस्तुति भी अत्यन्त प्रभावपूर्ण है।
सुधा जुगरान जी पाठकों के हृदय में अपनी विभिन्न रचनाओं, कहानी संग्रहों व उपन्यास द्वारा विशेष स्थान बना चुकी हैं। इस श्रृंखला की नवीनतम कड़ी उनका प्रस्तुत उपन्यास है, जिसे शिवना प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इससे पहले उनके नाम आठ कहानी संग्रह, एक उपन्यास, पांच साझा संकलन व एक समीक्षाओं की पुस्तक है। इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्रिकाओं में वे लगातार प्रकाशित होती हैं।
वर्तमान पीढ़ी द्वारा स्वतंत्रता व अपने सपनों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया जा रहा है। इस कारण पारिवारिक रिश्ते व उनसे उपजता अपनापन बौना हो रहा है। जहां कभी स्नेह व लगाव दिलों पर बरगद के वृक्ष सा फैलकर अपनी जड़ें जमा लेता था, वहां आज ये भावनाएं गमलों में लगे उन पेड़ों की तरह हो गईं हैं जिनकी बोनसाई कर दी जाती है। काट–छांटकर उनको कमरे के द्वार पर सजा दिया जाता है। मन के चौहट्टे पर उसी तरह रखे रह जाते हैं अब रिश्ते!
उपन्यास के मुख्य पात्र सुनंदा व समर हैं, किंतु अन्य तीन जोड़े मेहुल व रिजुल, रोमिल व सोमी तथा अनुपम व रियाना की ज़िंदगी भी साथ–साथ चलती हैं। ये सभी पात्र आज की उस युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके पास नौकरी, रुपया–पैसा, स्वतंत्रता, दोस्त और उनकी सुनने वाले अभिभावक हैं। वे जीवन को भरपूर जीना चाहते हैं। घूमते–फिरते, मौज–मस्ती करते विवाह के स्थान पर वे लिवइन का रास्ता चुनना चाहते हैं। संतुष्टि वहां भी नहीं मिलती क्योंकि बात जब जिम्मेदारियों की आती है तो उनमें से अधिकतर मुंह मोड़ लेते हैं या अनमने मन से निभाते हैं।
सुनंदा में वे सभी गुण हैं जो आजकल के लड़कों को आकर्षित करते हैं, समर के साथ प्रेम सम्बन्ध बन जाता है। सुनंदा को लिवइन स्वीकार है किंतु विवाह नहीं। समर के ज़ोर देने पर वह शादी के लिए तैयार तो हो जाती है क्योंकि अपने प्यार से दूर भी नहीं होना उसे, लेकिन दोनों इस सम्बन्ध को निभा नहीं पाते। समर को प्रेमी का चोला उतारकर पति बनते देर नहीं लगती, नतीजा दोनों के बीच मनमुटाव फिर तलाक का निर्णय। उपन्यास में ऐसे फैसलों का संतान पर प्रभाव पुत्र ‘कियान’ के माध्यम से दिखाया है। तलाक अभी हुआ नहीं इसलिए आठ वर्षीय कियान सुनंदा के पास रह रहा है, लेकिन भावनात्मक स्तर पर बहुत दूर है उससे। ऐसे बच्चों के भविष्य का अनुमान उपन्यास पढ़कर आसानी से लगाया जा सकता है।
उपन्यास का एक अन्य जोड़ा रोमिल व सोमी विवाहित जीवन जी रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिवेश में विवाह का अर्थ किसी फिल्म का सुखद अंत नहीं होता। लेखिका के शब्दों में, “वर्तमान समय में लड़कियां इस मानसिक स्थिति से दो–चार हो रही हैं कि नौकरी भी नहीं छोड़ना चाहतीं, जीवन में बदलाव व जिम्मेदारियां भी नहीं चाहतीं। ऐसे में बच्चा कहां से होगा?”
उन दोनों को भी यह अहसास सोमी के ‘हारमोनल इंबैंलेंसमेंट’ के बाद होता है।
समाज में बदलाव आ रहे हैं लेकिन कुछ विचारधाराएं अब भी जस की तस हैं, तभी तो पारिवारिक स्तरों में अंतर के कारण रिजुल और मेहुल विवाह बंधन में नहीं बंध पाते।
अनुपम और रियाना उन जोड़ों का प्रतीक हैं, जो लिवइन में रहकर जीवन बद से बदतर बना लेते हैं। दोनों विवाह बंधन में बंधते तो शायद रियाना को तीन बार अबॉर्शन नहीं करवाना पड़ता।
उपन्यास यद्यपि नई पीढ़ी को लेकर लिखा गया है, किंतु उनके माता–पिता की मानसिक उलझनों को भी लेखिका ने उजागर किया है। वे लिखती हैं, “पेरेंट्स पर संतान का एक अघोषित अधिकार है। उनकी समस्त इंद्रियां जब भी हरकत में आएं तो उसमें सिर्फ़ संतान की ही चिंता हो लेकिन संतान की वरीयता सूची में वे नहीं होते।”
लेखिका किसी भी पीढ़ी विशेष की पक्षधर न होकर दोनों में सकारात्मक ढूंढ रही हैं। जहां नई पीढ़ी द्वारा समाज की सड़ी–गली मान्यताओं व जीर्ण–शीर्ण ढांचे को दरकिनार कर देने को वे अनुचित नहीं मानतीं, वहीं पिछली पीढ़ी की रिश्तों और संस्कारों को लेकर मानसिकता व समझ को भी वे उचित ठहराती हैं। युवा पीढ़ी की रियाना द्वारा लिवइन के समर्थन में कहे हुए शब्द कि “”तलाक के पहले का शारीरिक रिश्ता समाज को मान्य है, लेकिन प्रेम के वशीभूत हो साथ में रहने पर हमारा रिश्ता अमान्य हो जाएगा?” ”इसका उदाहरण है। पुरानी पीढ़ी द्वारा रिश्तों की समझ का उदाहरण मेहुल व रजनी के मातापिता हैं, जिनका आत्मीयतापूर्ण संवाद बच्चों के विवाह की मज़बूत नींव रखता है।
उपन्यास की भाषा परिष्कृत लेकिन सहज व स्पष्ट है। भाषा में लचीलापन होने के साथ ही प्रवाह भी ही। इस प्रकार की भाषा प्रत्येक वर्ग के पाठक को रास आती है। जहां आवश्यकता है वहां शब्दों का चयन इस प्रकार किया है कि उठाए गए मुद्दे बुद्धिजीवी वर्ग के लिए प्रश्न बनकर सामने आयें। एक बानगी, “स्त्री की आत्मनिर्भरता विवाह व प्रजनन के विरुद्ध ढपली बजा रही है तो क्या आर्थिक आत्मनिर्भरताछोड़ दे? अबला के खोल से बमुश्किल बाहर निकली नारी वापस उसी खोल में सिमट जाए? यह एक यक्ष प्रश्न है।”
संवादों के माध्यम से अपने विचार पाठकों तक पहुंचाना लेखिका की विशेषता है। उपन्यास के पात्रों मेहुल व रिजुल के बीच का यह संवाद उत्तरदायित्वों से घिरे व्यक्ति की सटीक व्याख्या कर रहा है….
“कुछ बातें इंसान के हाथ में नहीं होतीं। कभी वह दिल के हाथों मजबूर होता है, कभी दिमाग के। कभी परिवार उसे मोहरा बनाता है और कभी समाज…। कोई भी खुद अकेला सिर्फ अपना कब रह पाया है?” रिजुल की आवाज भर्रा गई।
“तुम बहुत समझदार हो गई हो रिजुल… ठहरी हुई नदी जैसी…” मेहुल उसके और करीब आ गया, “कितनी सही बात कही, इंसान सच ही तो कभी सिर्फ अकेला खुद का कहां होता है? वह सबका होता है पर अपना नहीं हो पाता। आज भी तुम अपनी बेटी और पिता की हो। यहां तक कि समन्वय के माता-पिता की भी हो। मैं भी तमाम रेशमी धागों से बंधा हूं” मेहुल का स्वर लाचार था।
“जानती हूं…” रिजुल अपनी आंखों को नैपकिन से सुखाते हुए बोली, “ये रेशमी धागे अवरोध भी हैं और साधन भी…। वरना तो इंसान के जीवन में इतने चौराहे हैं कि वह अकेला हो तो पता नहीं किस शून्य में भटक जाए।
जहां विषय के अच्छे, बुरे पहलुओं को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित न हो, वहां वे पात्रों के माध्यम से पक्ष, विपक्ष की बात सामने रखने का प्रयास करती हैं। लिवइन और विवाह को लेकर इस वार्तालाप द्वारा लेखिका ऐसा ही प्रयास कर रही हैं….
“प्रेम बिना विवाह भले ही होता हो लेकिन निभता सामाजिक व पारिवारिक दबाव व डर से है” सोमी गंभीरता से बोली।
“मैं शादी जैसी बेहूदी हरकत कभी नहीं करूंगी” रियाना के स्वर में एक ज़िद्द थी।
“अगर लिव-इन पार्टनर ताउम्र एक रह गया तो तुम्हारी यह ज़िद्द बनी रहेगी और यदि अनुपम ने कभी पासा पलट दिया तो?” सोमी ने सीधा प्रश्न किया, “क्या किसी दूसरे पार्टनर से भी इसी शिद्दत से जुड़ पाएगी?”
“लेकिन ऐसा होगा ही क्यों? और यह तो फिर रोमिल भी कर सकता है”
“हां कर सकता है पर यहां पर मात्र रोमिल या मैं ही नहीं हूं। रोमिल की पूरी फ़ैमली और मेरी पूरी फ़ैमली भी साथ है। विवाह की शुरुवात मतलब, एक परिवार की शुरुवात…। विवाह एक शारीरिक मिलन से बढ़कर एक आध्यात्मिक, भावनात्मक व पारिवारिक मिलन है”
“विवाह में कभी-कभी प्यार के लिए जगह नहीं होती। यह मात्र कर्तव्यों का समुद्र बन कर रह जाता है” रियाना कुछ रोष में आ गई।
“विवाह बिना शर्त प्यार को प्रतिबिंबिंत करने के लिए बनायी गई संस्था है। चाहे कर्तव्यों के समुद्र में बहुत कुछ होम कर देना पड़ता है। यह ऐसा प्यार है जो हमेशा रहेगा और हमें आसानी से नहीं छोड़ेगा या हम इसे आसानी से नहीं छोड़ेंगे” सोमी बहुत धैर्य से बोली।
“ठीक है, तुम भी मानती हो और हम सब मानते हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच मुख्य तत्व प्रेम ही है। जब एक पुरुष व महिला एक-दूसरे से बिना शर्त प्यार करते हैं तो संतुष्टि और खुशी मिलती है, चाहे फिर उनके बीच सप्तपदी का बंधन हो या न हो तो इस अपरिहार्य भाव पर सप्तपदी जैसे भारी-भरकम रिवाजों का बोझ रखने की आवश्यकता क्या है?”
लेखिका पात्रों की पृष्ठभूमि व उपन्यास के कालखंड अनुसार शब्दों का चयन करती हैं। उत्तराखंड के बौराड़ी गांव में रहने वाली मेहुल की चाची गढ़वाली भाषा में पूछती हैं, “चाय प्येला कि सिद्धा खाणु खाणा है?” जब वे पत्यूड़ लेकर आती हैं तो आधुनिक जीवन शैली का मेहुल अपने युवा साथियों को बताता है, “इसे अरबी के पत्तों पर मसालों का पेस्ट लगाकर स्टीम किया जाता है।”
बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी के शब्द उपन्यास में ताज़गी भर देते हैं। रियाना का अनुपम को मैसेज कर पार्टी की सूचना देना युवा वर्ग के साधारण मैसेज सा दिख रहा है, “अनुपम इस महीने के लास्ट सैटरडे को सब दोस्तों ने रीयूनियन पार्टी प्लान की है, हमारे लिव-इन-रिलेशन के ऑफिशियली 5 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में सभी दोस्त इक्कठे हो रहें हैं।”
लेखिका की भाषा शैली घटनाओं व पात्रों की मनोस्थिति अनुसार भी ढल जाती है। भ्रमण पर निकले दोस्तों को पहाड़ों पर मिलने वाले सुकून की तुलना वे ‘कठोर शैल के अंदर समाए मोती’ से करती हैं, जबकि समन्वय की मृत्यु का समाचार पाकर परिवार में पसरे मातम को वे यूं बयां करती हैं, “इस भीषण दुर्घटना के बारे में सुन कमरे की दीवारें अभी तक कांप रही थीं। हवा थम कर कोने में खामोश खड़ी उनका दुख साझा कर रही थी। संध्या घबराकर खिड़की से बाहर कूद गई थी। वक्त की नजाकत देख अंधेरा धीरे से भीतर सरक आया।”
प्रकृति का वर्णन करते हुए उनकी लेखनी की कुशलता चित्रात्मक शैली के रूप में भी दिखाई देती ही। रात में पहाड़ी स्थल की सुंदरता को वे इन शब्दों में लिखती हैं, “सामने की पहाड़ियों पर खूब बसावट थी इसलिए पूरी पहाड़ी पर जुगनू चमक रहे थे। ऊपर तारों भरा आकाश और बहती ठंडी हवा।”
उपन्यास की रचना इतनी रोचकता पूर्वक की गई है कि अंत तक उत्सुकता बनी रहती है। पाठक मंत्रमुग्ध सा पृष्ठ पलटता जाता है, चलचित्र के बदलते दृश्यों से उपन्यास के पृष्ठ कभी जिज्ञासा शान्त करते हैं तो कभी जिज्ञासा बढ़ा देते हैं।
इतने संजीदा मुद्दों पर लिखते हुए भी पाठकों के मनोरंजन का पूरा ध्यान रखा गया है। रोमिल को होटल के कमरे के बाहर अटैची के साथ देख अनुपम का वीडियो बनाना और उसे सभी दोस्तों को भेज देने का वृतांत पढ़ कोई भी हंसे बिना नहीं रह सकता।
इसे सोने पर सुहागा ही कहा जाएगा कि पाठकों के सामान्य ज्ञान का स्तर भी उपन्यास पढ़कर निश्चित रूप से बढ़ेगा।उत्तराखंड की ऐतिहासिक, भौगोलिक व पर्यटन सम्बन्धी जानकारी पात्रों के माध्यम से लेखिका देती हैं। वहां के कुछ शहरों जैसे देहरादून व नई टिहरी तथा गांवों जैसे बौराड़ी साथ ही कौसानी, जिसे महात्मा गांधी ने भारत का स्विट्जरलैंड कहा था, के विषय में घूमने आए मित्रों के बहाने बहुत कुछ पढ़ने को मिल जाता है। उत्तराखंड के पर्यटक स्थलों के विषय में बात करते हुए लेखिका प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के ‘घाम तापो’ पर्यटन का ज़िक्र भी कर देती हैं। मुंबई व गुलाबी नगरी जयपुर आदि के विषय में भी जानकारी दी है।
कोई कृति मनोरंजन के साथ मन–मस्तिष्क को झकझोरने वाले प्रश्न सामने रख पाए तो यह उसकी विशेषता होगी। उपन्यास सभी सुख—सुविधाओं से लैस युवा पीढ़ी की असंतुष्टि, उनके भटकाव, स्वतंत्र निर्णयों, लिवइन या विवाह संस्था, विवाह विच्छेद, पीढ़ीगत अंतर व स्त्री स्वतंत्रता आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोचने को विवश करता है। सामाजिक समस्याओं के साथ ही लेखिका ने पात्रों के माध्यम से कुछ अन्य संकटों पर भी चिंता व्यक्त की है। इनमें मुख्य हैं पहाड़ों के जंगलों में लगने वाली आग, उन इलाकों में खेती–बाड़ी में आने वाली समस्याएं, उत्तराखंड से युवाओं का पलायन तथा वहां बेहतर शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता।
उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट है। नई पीढ़ी नए रास्ते ढूंढे लेकिन क़दम बढ़ाने से पहले अपने निर्णयों पर खुलकर विचार करे, अन्यथा पछतावे के सिवाय कुछ हाथ नहीं आएगा। उपन्यास की एक पात्र रियाना लिवइन और विवाह को लेकर रिजुल से कहती है, “शादी कितना बड़ा बंधन लगता है न हमें? जब तक उस ख़ूबसूरत बंधन में बंधने की उम्र होती है और हम आज़ादी को चुन लेते हैं, लेकिन एक उम्र के बाद हर स्त्री पुरुष उसमें बंधने को छटपटाने क्यों लगता है? कौन सी व्यवस्था सही है?”
आज को सुधार कर ही नए आत्मविश्वास से भरा कल प्राप्त होगा, उपन्यास के अंत में यही सार्थक संदेश देना चाहती हैं लेखिका।
समाज के वर्तमान व भविष्य को लेकर सजग करते इस उपन्यास के लिए मैं सुधा जुगरान जी व शिवना प्रकाशन को हृदय से बधाई देती हूं।
मधु शर्मा कटिहा बी-406 रॉयल सहकारी आवास सैक्टर 61 नोएडा उत्तर प्रदेश- 201301 मो- 9910173216