पुस्तक : अन्वीक्षण (लघुकथा संबंधी समीक्षाएँ, आलेख , पत्र)
लेखक : संतोषसुपेकर
प्रकाशक : अक्षरवार्ता पब्लिकेशन, उज्जैन
मूल्य : 300/- रुपए
संतोष सुपेकर लघुकथा के क्षेत्र में एक स्थापित हस्ताक्षर हैं। इनकी लघुकथाएँ महाराष्ट्र राज्य शिक्षा बोर्ड 10 वीं के पाठ्यक्रम में शामिल हो चुकी हैं। संतोष सुपेकर हिन्दी साहित्य के एक ऐसे कर्मयोगी हैं, जिन्होंने लघुकथा को न केवल रचनात्मकता का माध्यम बनाया, बल्कि उसके वैचारिक, सामाजिक, समीक्षात्मक एवं संस्थागत पक्षों को भी गंभीरता से संबोधित किया। वे वरिष्ठ लघुकथाकार, कवि, पत्रकार और संपादक होने के साथ-साथ मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। अब तक प्रकाशित उनकी 12 पुस्तकों में से 8 लघुकथा संग्रह इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने इस विधा को जीवन का ध्येय बना लिया है।
“अन्वीक्षण” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि लघुकथा साहित्य का एक दस्तावेज, एक आंदोलन, एक सशक्त आलोचनात्मक हस्तक्षेप है। यह पुस्तक उस गंभीर विमर्श का परिणाम है, जिसे संतोष सुपेकर वर्षों से गहन रूप से जीते आ रहे हैं। इस कृति में लघुकथा विधा से संबद्ध कुल छत्तीस विचारोत्तेजक लेख संकलित हैं। इनमें सुपेकर द्वारा विभिन्न लघुकथा-संग्रहों एवं संकलनों की गई सारगर्भित और सूक्ष्म समीक्षाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन समीक्षाओं के माध्यम से लघुकथा के स्वरूप, भाषा-शैली, विषय-वस्तु, शिल्प, आरंभ और अंत की तकनीकी बुनावट, रचना के सैद्धांतिक पक्ष तथा उसकी संवेदनात्मक प्रभावशीलता पर गंभीर और व्यापक चिंतन प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक न केवल लघुकथा की साहित्यिक परंपरा को समझने में सहायक है, बल्कि इस विधा के गहन अध्ययन और मूल्यांकन के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में भी प्रतिष्ठित होती है। इस पुस्तक में उन्होंने लघुकथा से संबंधित पत्राचार, समीक्षाएं, आलेख और सैद्धांतिक विश्लेषण को समावेशित किया है। संभवतः यह हिंदी साहित्य में लघुकथा पर केंद्रित अपनी तरह की पहली पुस्तक है, जिसमें विधा की गहराई, दिशा और दशा पर समग्र दृष्टि प्रस्तुत की गई है। यह पुस्तक लघुकथा को केवल रचना के स्तर पर ही नहीं देखती, बल्कि इसके शैक्षणिक, पत्रकारीय, मंचीय और सांस्कृतिक स्वीकार्यता के पक्ष को भी सामने लाती है। सुपेकर जी द्वारा विभिन्न शिक्षण संस्थानों, पत्रिकाओं और साहित्यिक संगठनों को भेजे गए पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि वे लघुकथा को केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि साहित्यिक अधिकार के रूप में स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने यह प्रयास किया कि लघुकथा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, उसे साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए और संपादकीय प्राथमिकता दी जाए। ये पत्र अब केवल एक व्यक्तिगत प्रयास नहीं रहे, बल्कि साहित्यिक दस्तावेज बन गए हैं।
लेखक ने लघुकथा विधा को समृद्ध बनाने वाले स्वर्गीय विक्रम सोनी, सुरेश शर्मा, रमेश बत्तरा एवं मधुदीप के अविस्मरणीय योगदान को ससम्मान और कृतज्ञता के साथ स्मरण किया है। पुस्तक में प्रमुख लघुकथाकारों एवं संपादकों की पुस्तकों पर की गई समीक्षाएँ लघुकथा साहित्य के वर्तमान स्वरूप, प्रवृत्तियों और चुनौतियों को उजागर करती हैं। इनमें शामिल कृतियाँ हैं : इस सदी की उम्र (विक्रम सोनी) – संपादक: डॉ. अशोक भाटिया, अंधे बहरे लोग – लेखक : सुरेश शर्मा, पड़ाव और पड़ताल (खंड 1 व 2) – संपादक: मधुदीप एवं डॉ. बलराम अग्रवाल, लघुकथा रचना पद्धति और समीक्षा सिद्धांत – डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, धारा (जल तत्व आधारित लघुकथा संग्रह) – डॉ. वसुधा गाडगिल, अंतरा करवड़े, इंजेक्शन – राम मूरत ‘राही’, हिन्दी लघुकथा के सिद्धांत – भगीरथ, जिंदा मैं – अशोक जैन, शिखर पर बैठकर – संपादक: सतीश राठी। इसके साथ डॉ. वसुधा गाडगिल की कृति ‘साझा मन’, सदाशिव कौतुक की किताब ‘संकल्प और सपने’ शामिल हैं। इन समीक्षाओं में संतोष सुपेकर का समीक्षक दृष्टिकोण संतुलित, विषय केंद्रित और आलोचनात्मक गहराई से युक्त है। वे किसी भी लेखक को सराहते हैं, तो उनके कमजोर पक्षों की ओर भी ईमानदारी से संकेत करते हैं। आज का रचनाकार लघुकथाओं में आत्मकेंद्रित लेखकीय हस्तक्षेप की प्रवृत्ति से ग्रस्त प्रतीत होता है। वह ‘मैं’ के बोध से बाहर निकलने में असमर्थ दिखाई देता है, जिसके परिणामस्वरूप उसकी रचनाएँ प्रभावक्षमता और वस्तुनिष्ठता से वंचित रह जाती हैं। इस प्रवृत्ति की तीखी और सार्थक आलोचना सुपेकर ने अपने समीक्षात्मक लेखों में अत्यंत स्पष्टता और सजगता के साथ की है। पुस्तक में समाहित आलेख लघुकथा के विभिन्न सैद्धांतिक, भाषिक, और प्रस्तुति-आधारित पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। प्रमुख आलेखों में शामिल हैं : लघुकथा का मंचीय पाठ : कुछ तत्व, आपदाकाल और लघुकथाएँ, संवेदना की सृष्टि भूमि – लघुकथा, लघुकथा में भाषाई सौंदर्य, लघुकथा और उज्जैन, वैश्विक परिवेश और हिन्दी लघुकथा। इन आलेखों में सुपेकर ने लघुकथा को केवल साहित्यिक विधा न मानकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताया है। वैश्विक परिवेश वाला लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें वे हिन्दी लघुकथा को अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भों से जोड़ते हैं।
यह पुस्तक उन्होंने लघुकथा विमर्श से जुड़े सभी मनीषियों को समर्पित की है। यह समर्पण लेखक के विनम्र स्वभाव और समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह केवल एक लेखक की किताब नहीं, बल्कि पूरे लघुकथा-जगत का साझा दस्तावेज बन जाती है। सुपेकर जी की भाषा सहज, प्रवाहमयी और आलोचनात्मक अनुशासन से युक्त है। वे किसी भी विचार को गंभीरता से, परंतु बोझिल भाषा के बिना प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक का आवरण पृष्ठ आकर्षक है और उसका डिज़ाइन विषय के अनुकूल प्रतीत होता है। आज जब लघुकथा एक लोकप्रिय, मगर उपेक्षित समझी जाने वाली विधा के रूप में जानी जाती है, तब “अन्वीक्षण” जैसे ग्रंथ की महत्ता और बढ़ जाती है। यह पुस्तक नवोदित लघुकथाकारों के लिए मार्गदर्शक, अनुभवी रचनाकारों के लिए चिंतन का विषय और शोधकर्ताओं के लिए दुर्लभ संदर्भ सामग्री है।
यह न केवल लघुकथा की आलोचना और समीक्षा का उदाहरण प्रस्तुत करती है, बल्कि यह सिखाती है कि एक लेखक सिर्फ लिखने से नहीं, बल्कि साहित्य के लिए लड़ने से भी बड़ा बनता है। “अन्वीक्षण” लघुकथा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपस्थिति है। यह पुस्तक साहित्य की उस विधा को न केवल पहचान देती है, बल्कि उसकी आवाज़ को मंच, पाठ्यक्रम और विमर्श में स्थायी स्थान दिलाने का प्रयास भी करती है। यह केवल एक लेखक की कृति नहीं, बल्कि एक साहित्यिक आन्दोलन की अभिव्यक्ति है। हर गंभीर लघुकथाकार, शोधार्थी, संपादक और साहित्यप्रेमी को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि चिंतन, मनन और लेखन की प्रेरणा भी जगाती है। प्रस्तुत पुस्तक लघुकथा की स्वीकार्यता एवं लोकप्रियता में अभिवृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण और उपयोगी भूमिका निभाएगी। यह पुस्तक न केवल वर्तमान में लघुकथा विधा पर कार्य कर रहे रचनाकारों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है, बल्कि भविष्य में इस क्षेत्र में अनुसंधान और लेखन करने वालों के लिए भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में प्रतिष्ठित होगी।