जिजीविषा – (कहानी संग्रह);
लेखकः लता तेजेश्वर ‘रेणुका’;
प्रकाशकः सुरभि प्रकाशन
(किताबघर प्रकाशन समूह का उपक्रम),
प्रीत विहार, दिल्ली-110002;
प्रथम संस्करण – 2024,
पृष्ठ संख्याः 101; मूल्यः ₹195 /- मात्र।
‘जिजीविषा’ कहानी संग्रह में मात्र दो कहानियां हैं – पहली ‘जिजीविषा’ और दूसरी – ‘वह कौन था…?’
‘जिजीविषा’ उड़ीसा के छोटे से गाँव की कहानी है। वहाँ के पहनावे में बिना ब्लाउज की एक साड़ी होती है; जिसके लपेटने का तरीका भी विशिष्ट रहता है। भले ही साधन व सुविधाओं का अभाव था गाँव में, किन्तु वह स्थान प्रकृति के अकूत सौंदर्य से भरपूर था। जिजीविषा मुख्य रूप से हेमलता की कहानी है। लेकिन फिर भी जब इसको पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि इसका हर पात्र शीर्षक से संबद्ध है।
जिजीविषा का अर्थ होता है जीने की इच्छा या जीने की चाह। लेकिन जब जीने की चाह या इच्छा के लिए हम जिजीविषा शब्द का प्रयोग करते हैं तो चाह या इच्छा में तीव्रता की अनुभूति भी होती है। तीव्र इच्छा या तीव्र चाह। कहानी को पढ़ते हुए लगता है कि यह जिजीविषा सिर्फ़ हेमलता से ही नहीं बल्कि हर पात्र से जुड़ी हुई है।
इस कहानी में प्रकृति है, प्रकृति की गोद में, आवश्यक संसाधनों से रहित गाँव की मनोहारी छवि है, भोले-भाले लोग हैं, स्त्रियों का दर्द है कि वे मेहनत करती हैं और पुरुष उनकी कमाई को शराब में उड़ाते हैं और मना करने पर पिटाई की तकलीफ़ भी है।
मुंबई में रहने वाली हेमलता डॉक्टर है जो अपना महानगर छोड़ कर इस प्रकृति की गोद में ग़रीबों के प्रति सेवाभाव से संकल्पित होकर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध यहाँ काम करने आई थी। यह उसका स्वयं का निर्णय था।
वह दयार्द्र हृदय और करुण भाव की स्वामिनी है। गाँव के लोग मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी तरसते थे। पक्की सड़क तो थी नहीं। पानी के लिए भी औरतों को दो-दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। जमीन थी लेकिन पथरीली। खंबे थे लेकिन बिजली अक्सर नदारद रहती थी। गाँव शहर से 200 किलोमीटर दूर था।
हेमलता के अलावा इसमें प्रेमा है; जो हेमलता के घर का सारा काम करती है। उसी के भरोसे हेमलता की माँ हेमलता के प्रति निश्चिंत हैं। वह जानती है कि वह हेमलता का पूरा ध्यान रखती है।
दूसरे प्रमुख पात्र- बेहद धार्मिक, सेवाभावी और मरीजों के प्रति पूर्णतः समर्पित वरिष्ठ डॉक्टर परमानन्द दास हैं; जिन्हें पैसों से नहीं सिर्फ़ सेवा से प्यार था।
तीसरा प्रमुख पात्र अर्णव है जो पहले फ़ोर्स में था। लेकिन कारगिल युद्ध में उसके एक पैर में गोली लग जाती है और उसका पैर काटना पड़ता है। उसे नकली पैर लगा दिया जाता है। घर में वह और उसकी माँ बस दो ही प्राणी थे। माँ को ट्यूमर होने के कारण वह फ़ौज की नौकरी छोड़कर पुलिस में एसएसपी होकर काम करने लगता है।
एक परिवार सीता और राघव का है, जो एक संतान के लिए तरस रहे हैं। सीता घोर निराशा में है। हेमलता उसे आश्वस्त करती है कि आजकल मेडिकल तकनीक बहुत आगे बढ़ गई है। वह उसे आईवीएफ़ के बारे में बताती है और समझाती है कि शहर में उसकी सहेली जो डॉक्टर है वह इस काम को कर देगी और इसमें हेमलता उसकी सहायता करेगी। फिर वह माँ बन सकेगी।
हेमलता अपनी सहेली से बात कर के उसकी मदद करती है और उसे दो बच्चों की माँ बनने का सुख मिल जाता है। अधिक असुविधाओं के बीच में कोरोना महामारी भी अपने पैर फैला लेती है। डॉक्टर परमानंद और हेमलता, जी जान से सब लोगों की सेवा करते हैं। उन्हें कोरोना के बारे में बताकर सख़्त हिदायत के साथ, किस तरह से रहना है यह बताते हैं।
कोरोना में अर्णव की ड्यूटी गुम्मा गाँव में लगती है। गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने में एक जगह जब वह गाड़ी से नीचे उतरता है तो दुर्घटनावश उसके पैर में चोट लग जाती है। गाँव में एक ही सरकारी अस्पताल था। ये लोग अस्पताल पहुँचते हैं। वहाँ अर्णव की मुलाकात हेमलता से होती है।
ड्रेसिंग के पश्चात हेमलता उसे 15 दिन क्वॉरेंटाइन होने की सलाह देती है। इस तरह यह इन दोनों का पहला परिचय था। डॉक्टर परमानंद भूख प्यास को भूलकर दिन-रात कोरोना के मरीजों की अस्पताल में देखरेख करते हैं, बाद में अर्णव भी इस टीम में सम्मिलित हो जाता है और उस अभावग्रस्त अस्पताल में जितनी हो सकती है उतनी सरकारी सहायता उपलब्ध करवाता है।
डॉ. परमानंद स्वयं कोरोना की शिकार हो जाते हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर की बेहद कमी थी। एक युवा मजदूर रोहिला, जो अपनी बूढ़ी माँ का एकमात्र सहारा था, उसे बचाने के लिये जबरदस्ती अपना। ऑक्सीजन सिलेंडर उसे लगवा देते हैं और स्वयं मृत्यु को स्वीकार कर लेते हैं।
यह प्रसंग काफ़ी दुःखी करता है। एक डॉक्टर का यह समर्पण याद रखने योग्य है और इस कहानी का प्रेरणा तत्व है।
अर्णव हेमलता के प्रति गंभीर था। वह अस्पताल में यथासंभव सरकारी सहायता मुहैया करवा रहा था। अंततः कोरोना ख़त्म होता है; पर इस बीच अर्णव और हेमलता बहुत पास आ जाते हैं। गाँव की स्थिति काफ़ी सुधर चुकी थी। अतः हेमलता पुन: मुंबई लौट आती है और फिर अर्णव और हेमलता का विवाह हो जाता है।
शीर्षक कहानी लगभग एक लघु उपन्यास जितनी लंबी है। 70 पेज लंबी है यह कहानी। अगर इस कहानी का मूल्यांकन विधा के तौर पर किया जाये तो यह कहानी उपन्यास विधा सी नजर आती है। कहानी अमूमन इतनी लंबी नहीं हुआ करती।
कहानी में मूल कथानक से संबद्ध आवश्यक प्रासंगिक संदर्भ रहते जरूर हैं, पर वह इशारों में चलते हैं; उन्हें अधिक विस्तार नहीं दिया जाता। ऐसा नहीं है कि कहानी को संक्षिप्त किए जाने की गुंजाइश नहीं है। अगर कहानीकार चाहे तो इस कहानी का संपादन किया जा सकता है।
इस कहानी की खूबसूरती इसका प्रारंभ है। जिसे प्राकृतिक सौंदर्य के वर्णन से सजाया गया है। सिर्फ़ कहानी की ही नहीं, यह गाँव की भी खूबसूरती है और गाँव की विशेषता भी। जो भी वहाँ आता है वह वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य से मुग्ध हो जाता है।
दूसरी विशेषता यह है कि गाँव के लोगों से उड़िया भाषा में बातचीत वहाँ की भाषाई मधुरता और सौंदर्य को भी दर्शाता है। यहाँ तक कि डॉक्टर हेमलता भी उनके साथ रहकर उस भाषा को काफ़ी हद तक सीख जाती हैं ताकि मरीजों की परेशानी को समझने में सुविधा हो।
कोरोना का विस्तृत वर्णन थोड़ा बोझिल महसूस होता है। कहानी कई मुद्दों को एक साथ लिये चलती है। इस कहानी को पढ़ते हुए पता चलता है कि विकास का रथ आज भी कई गाँवों तक नहीं पहुँच पाया है। सड़कें हों तो रथ गाँव तक पहुँचे।
शराब का दुष्प्रभाव इस तरह हावी है कि मेहनत करके भी स्त्री से पैसे छीन लिए जाते हैं और वह न देने पर पिटती है। हर तरह से स्त्री ही पिसती है।
इस कहानी का मूल और इसका प्रेरणा तत्व डॉक्टर परमानंद का परिश्रम, सेवा भाव और त्याग है। आज के डॉक्टरों केलिये, जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है, सेवा का कोई मोल नहीं। हेमलता भी एक बेहतरीन डॉक्टर है और हेमलता का मुंबई जैसे शहर को छोड़कर गाँव में समर्पित भाव से योगदान देना यह संदेश देता है कि हमें शहरों की सुविधाओं से दूर साधनहीन गाँवो की तरफ भी देखने की ललक होनी चाहिये। तब शायद जान पाएं कि प्यार और अपनेपन से भरा हुआ जीवन कितना सुकून देता है।
इस संग्रह की दूसरी कहानी ‘वह कौन था’ शीर्षक से है। यह कहानी थोड़ी वीभत्स लगी। यह समुद्र तट पर रहने व खुले आसमान को चादर व धरती को बिछौना मानकर सोने वाले अभावग्रस्त लोगों का रात के अंधेरे में पत्थर से मार कर खून करता है पर क्यों और वह कौन है? इसका पता अंत तक नहीं चलता।
नीलिमा करैया जी, आपकी इस समीक्षा से पता चलता है कि आप रचना की तह तक जाकर उसका सम्यक विश्लेषण करने में सिद्धहस्त हैं। साहित्य में लंबी कहानियां लिखी गई है लेकिन पात्र सीमित होते हैं। आपकी समीक्षा से पता चलता है कि यह कहानी लघु उपन्यास के ज्यादा निकट है। पात्र और घटनाओं में विविधता है। फिलहाल आपने कहानी के हर पहलू को छुआ है। छोड़ा कुछ भी नहीं है। बढ़िया समीक्षा के लिए बधाई आपको
प्रिय नीलिमा जी,
लता तेजेश्वर रेणुका की कहानी ‘जिजीविषा’ पर आपकी इतनी खुली और संवेदनात्मक समीक्षा पढ़ी कि लगा, कहानी पढ़ने का सुख भी साथ ही साथ मिल रहा है।
एक गहरे लगाव और निर्मल हृदय से लिखी समीक्षा ऐसी ही होती है, जो खुद को बीच से हटाकर पाठक को सीधे लेखक से रूबरू करवा देती है।
मैंने ‘जिजीविषा’ पढ़ी तो नहीं, पर आपका पात्रों, घटनाओं और कथावस्तु का सटीक वर्णन पढ़कर मुझे भी लगा, यह कहानी नहीं, एक लघु उपन्यास ही है। कहानी इतने विस्तृत और प्रदीर्घ विवरण का बोझ संभाल नहीं सकती।
मैंने आपकी यह पहली ही समीक्षा पढ़ी है नीलिमा जी। पर आपकी संतुलित और सुलझी हुई दृष्टि का कायल हो गया।
यों भी आपका लिखा जो भी पढ़ा है, यहां तक कि ‘पुरवाई’ में प्रकाशित रचनाओं पर विस्तृत टिप्पणियां, तो मन में कुछ उजास सी हुई। आप पूरे मन और संवेदना के साथ डूबकर लिखती हैं। इसलिए आपके लिखे शब्द भुलाए भूलते नहीं हैं।
‘पुरवाई’ में रामदरश मिश्र जी पर लिखे मेरे संस्मरण पर आपने जो शब्द लिखे, वे मैंने आदरणीय मिश्र जी को भेज दिए थे। कल उनका फोन आया, और बार-बार वे आपकी स्नेहपूर्वक चर्चा करते हुए, आपको आशीष दे रहे थे। वे एक सौ एक बरस के हैं, पर आपके शब्द उन्हें याद रहे, और वे उनके कायल भी हो गए। बाबा तुलसीदास के शब्दों में, ‘निर्मल मति’ हो, तभी यह चमत्कार संभव होता है।
आप और लिखें। बहुत लिखें। इसी तरह निर्मल हृदय और खुले नजरिए से लिखें। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं और साधुवाद!
जिजीविषा के प्रति आपकी टिप्पणी और आपके स्नेहिल शब्द हमारी ताकत हैं बाबूजी। आपका आशीर्वाद प्रेरणा बन हमें लिखने की ताकत देगा।आपको हमारा लेखन पसंद आता है, भले ही वह टिप्पणी हो; यह हमारे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। आदरणीय मिश्रा जी से हमारा सादर प्रणाम जरूर कहियेगा
नीलिमा जी जिजीविषा कहानी संग्रह की समीक्षा इतने गहन भाव से किया है आपने कि बिना पढ़े ही पूरी कहानी समझ आ गई। बहुत सूक्ष्मदृष्टि से उसका अध्ययन किया आपने जो दूसरों के लेखन को महत्व को दर्शा रहा है। आपको साधुवाद।
बहुत ही सार्थक और रोचक समीक्षा आपने सृजित की है। दरअसल समीक्षा करने से पहले किसी भी समीक्षक को कृति को पढ़ना समझना और गुनना पड़ता है।तब अनुभव जनित भावों को सारगर्भितता के सांचे में ढाल कर समीक्षा नामक मानसिक भोजन तैयार होता है।
वर्तमान में समीक्षक कम और वृतांत प्रिय या लेखक मित्र अधिक हो गए हैं।सो समीक्षा नामक विधा अब सरस्वती रूप में लुप्त प्रायः है।
अच्छा लगा ,इस समीक्षा को पढ़ कर । पुरवाई पत्रिका परिवार और समीक्षक को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
बहुत बहुत शुक्रिया आपका सर। यह टिप्पणी टॉनिक की तरह है प्रोत्साहन की दृष्टि से। आपको पढ़कर लिखा कि हमारा लिखना सार्थक हुआ। प्रकाश मनु जी की टिप्पणी से खून व आत्मविश्वास बढ़ा व आपसे आत्मिक बल व उत्साह। शुक्रिया आपका।
नीलिमा करैया जी, आपकी इस समीक्षा से पता चलता है कि आप रचना की तह तक जाकर उसका सम्यक विश्लेषण करने में सिद्धहस्त हैं। साहित्य में लंबी कहानियां लिखी गई है लेकिन पात्र सीमित होते हैं। आपकी समीक्षा से पता चलता है कि यह कहानी लघु उपन्यास के ज्यादा निकट है। पात्र और घटनाओं में विविधता है। फिलहाल आपने कहानी के हर पहलू को छुआ है। छोड़ा कुछ भी नहीं है। बढ़िया समीक्षा के लिए बधाई आपको
जिजीविषा कहानी संग्रह – समीक्षा की आपने अच्छी समीक्षा की लखन लाल पाल जी! तहेदिल से आपका शुक्रिया। वैसे हर रचना आपकी बारीक दृष्टि से गुजराती है।
प्रिय नीलिमा जी,
लता तेजेश्वर रेणुका की कहानी ‘जिजीविषा’ पर आपकी इतनी खुली और संवेदनात्मक समीक्षा पढ़ी कि लगा, कहानी पढ़ने का सुख भी साथ ही साथ मिल रहा है।
एक गहरे लगाव और निर्मल हृदय से लिखी समीक्षा ऐसी ही होती है, जो खुद को बीच से हटाकर पाठक को सीधे लेखक से रूबरू करवा देती है।
मैंने ‘जिजीविषा’ पढ़ी तो नहीं, पर आपका पात्रों, घटनाओं और कथावस्तु का सटीक वर्णन पढ़कर मुझे भी लगा, यह कहानी नहीं, एक लघु उपन्यास ही है। कहानी इतने विस्तृत और प्रदीर्घ विवरण का बोझ संभाल नहीं सकती।
मैंने आपकी यह पहली ही समीक्षा पढ़ी है नीलिमा जी। पर आपकी संतुलित और सुलझी हुई दृष्टि का कायल हो गया।
यों भी आपका लिखा जो भी पढ़ा है, यहां तक कि ‘पुरवाई’ में प्रकाशित रचनाओं पर विस्तृत टिप्पणियां, तो मन में कुछ उजास सी हुई। आप पूरे मन और संवेदना के साथ डूबकर लिखती हैं। इसलिए आपके लिखे शब्द भुलाए भूलते नहीं हैं।
‘पुरवाई’ में रामदरश मिश्र जी पर लिखे मेरे संस्मरण पर आपने जो शब्द लिखे, वे मैंने आदरणीय मिश्र जी को भेज दिए थे। कल उनका फोन आया, और बार-बार वे आपकी स्नेहपूर्वक चर्चा करते हुए, आपको आशीष दे रहे थे। वे एक सौ एक बरस के हैं, पर आपके शब्द उन्हें याद रहे, और वे उनके कायल भी हो गए। बाबा तुलसीदास के शब्दों में, ‘निर्मल मति’ हो, तभी यह चमत्कार संभव होता है।
आप और लिखें। बहुत लिखें। इसी तरह निर्मल हृदय और खुले नजरिए से लिखें। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं और साधुवाद!
स्नेह, प्रकाश मनु
जिजीविषा के प्रति आपकी टिप्पणी और आपके स्नेहिल शब्द हमारी ताकत हैं बाबूजी। आपका आशीर्वाद प्रेरणा बन हमें लिखने की ताकत देगा।आपको हमारा लेखन पसंद आता है, भले ही वह टिप्पणी हो; यह हमारे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। आदरणीय मिश्रा जी से हमारा सादर प्रणाम जरूर कहियेगा
नीलिमा जी जिजीविषा कहानी संग्रह की समीक्षा इतने गहन भाव से किया है आपने कि बिना पढ़े ही पूरी कहानी समझ आ गई। बहुत सूक्ष्मदृष्टि से उसका अध्ययन किया आपने जो दूसरों के लेखन को महत्व को दर्शा रहा है। आपको साधुवाद।
बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। आप समीक्षा को महसूस कर पाईं रेखा जी।
बहुत ही सार्थक और रोचक समीक्षा आपने सृजित की है। दरअसल समीक्षा करने से पहले किसी भी समीक्षक को कृति को पढ़ना समझना और गुनना पड़ता है।तब अनुभव जनित भावों को सारगर्भितता के सांचे में ढाल कर समीक्षा नामक मानसिक भोजन तैयार होता है।
वर्तमान में समीक्षक कम और वृतांत प्रिय या लेखक मित्र अधिक हो गए हैं।सो समीक्षा नामक विधा अब सरस्वती रूप में लुप्त प्रायः है।
अच्छा लगा ,इस समीक्षा को पढ़ कर । पुरवाई पत्रिका परिवार और समीक्षक को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
बहुत बहुत शुक्रिया आपका सर। यह टिप्पणी टॉनिक की तरह है प्रोत्साहन की दृष्टि से। आपको पढ़कर लिखा कि हमारा लिखना सार्थक हुआ। प्रकाश मनु जी की टिप्पणी से खून व आत्मविश्वास बढ़ा व आपसे आत्मिक बल व उत्साह। शुक्रिया आपका।