Monday, July 22, 2024
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विजय कुमार तिवारी की कलम से – ‘लोकतंत्र के पहरुए’ की राजनीतिक चेतना

समीक्षित कृति : लोकतंत्र के पहरुए(उपन्यास); उपन्यासकार : पद्मा शर्मा;
मूल्य : रु 350/- प्रकाशक : सान्निध्य बुक्स, दिल्ली
साहित्य की औपन्यासिक विधा का अपना महत्व है। हिन्दी में उपन्यास खूब लिखे गये हैं,लिखे जा रहे हैं और हिन्दी साहित्य उपन्यास लेखन से समृद्ध है। जीवन चेतना,जीवन का विस्तृत स्वरुप, चरित्रों का पूर्ण चित्रण,भावनाओं की पूर्ण अभिव्यक्ति आदि के लिए जिन विस्तारों की आवश्यकता महसूस हुई,उसकी पूर्ति उपन्यास लेखन द्वारा ही संभव था। विस्तार से उल्लेख किए बिना मनुष्य का मन संतुष्ट नहीं होता या जो कहना चाहता है,कह नहीं पाता,ऐसे हालात में उपन्यास लिखकर उसकी प्रतिपूर्ति करता है। चरित्र आधारित उपन्यास, ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक उपन्यास,यथार्थ कथ्य-कथानक के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक चिन्तन के उपन्यास आदि के साथ अब तो भावनाओं और गहरे राजनीतिक अनुभवों को समेटे नाना तरह के उपन्यास लिखे और पढ़े जा रहे हैं। कथ्य-कथानक के साथ-साथ जीवन के छोटे से छोटे सन्दर्भ उपन्यास में होते हैं।  उपन्यास लेखन की यह सबसे अच्छी खूबसूरती है। उपन्यास में मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन उभरता है या कोई कालखण्ड, कोई घटनाक्रम विस्तार पाता है। कभी-कभी कहानियाँ भी औपन्यासिक पृष्ठभूमि लिए होती हैं या कई बार कोई उपन्यास भी एक कहानी ही होता है।
अभी मेरे सामने ग्वालियर,मध्य प्रदेश की बहुचर्चित लेखिका पद्मा शर्मा का उपन्यास “लोकतंत्र के पहरुए” है। अपनी ओर से उन्होंने ‘अपनी बात’ या ‘आत्म निवेदन जैसा कुछ भी नहीं लिखा है। पद्मा  शर्मा जी ने इस उपन्यास को 34 खण्डों में विस्तार दिया है। इसके आवरण पृष्ठों पर अनेक साहित्यकारों के विचार उद्धृत हैं जिनसे लेखिका और उनके चिन्तन के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट होता है।
साहित्यकार महेश कटारे लिखते हैं,”सियासत और पूंजी की दुरभिसंधि सर्वहारा समाज को प्रलोभन का शिकार बनाकर अपने पक्ष में कैसे बाहुबली तैयार करती है,संचार माध्यमों को खरीदकर किन-किन हथकंडों से वोटों की दौलत को लूटती है—स्त्रियाँ हर दल में असुरक्षित हैं। तथाकथित लोकतंत्र के पहरुओं की व्यावहारिक कार्यप्रणाली की साजिशों को बेनकाब करता उपन्यास है-“लोकतंत्र के पहरुए।” डा० भगवान स्वरुप चैतन्य की टिप्पणी देखिए-“लोकतंत्र के पहरुओं की जनक्रांति चेतना का गाँव के ताकतवर साहूकारों,दबंगों,जमींदारों द्वारा दमन का जैसा चित्रांकन इस उपन्यास में हुआ है वह इसे समसामयिक राजनीतिक कथा साहित्य में निस्संदेह एक अनिवार्य पठनीय कृति बनाता है।” ऐसे ही नरेन्द्र पुंडरीक, डा० संतोष श्रीवास्तव,डा० बजरंग बिहारी तिवारी,एस.आर. हरनोट,ए. असफल, राजनारायण बोहरे,डा० एम. फिरोज खान,कुसुमलता सिंह और रामजन्म पाठक के विचार उपन्यास के बारे में बहुत कुछ कहते हैं। इस तरह देखा जाए तो पद्मा शर्मा ने सशक्त राजनीतिक चेतना का उपन्यास लिखा है जिसकी पठनीयता और चर्चा दोनों उल्लेखनीय है।
मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में हिन्दी प्राध्यापन करते हुए पद्मा शर्मा ने निरंतर लेखन किया है। उनके अनेक कहानी संग्रह,उपन्यास,कविता संग्रह, निबंध संग्रह,आलोचनात्मक पुस्तक,शोध पुस्तक सहित संपादित पुस्तकें छप चुकी हैं। उनकी रचनाओं का आकाशवाणी व दूरदर्शन पर प्रसारण होता रहा है और उन्हें साहित्य-लेखन के लिए अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
कोई भी रचनाकर लेखन शुरु करता है तो बहुत सी चीजें एक साथ जुड़ती चली जाती हैं। पद्मा शर्मा अपने उपन्यास के पात्र पंडित सुदर्शन का नख-शिख व भाव वर्णन करती हैं तो साथ-साथ भाषा,बोली, शैली आदि भी गढ़ती चलती हैं-“चेहरे पर तेज और अकड़ी सुतवां नाक,श्वेत वर्ण,होंठों पर स्थायी गुलाबीपन और उससे सटी हुई काले-सफेद बालों की घनी नुकीली मूँछें–।” ऐसा चित्रण तभी होता है जब कोई खूब डूब चुका होता है,कथ्य-कथानक में,चरित्र में और भाव-संवेदना में। अपने हक व न्याय के लिए खड़ा हुए और संघर्ष किए बिना कहाँ कुछ मिलता है। कुछ चीजें घटित होते हुए दिखाई देती हैं जैसे आदिवासी मजदूरों का विरोध,उनका पूरी मजदूरी माँगना,खेत मालिकों द्वारा माँगे मान लेना और मजदूरों का जीत जाना। कुछ चीजें भीतर-भीतर घटित होती हैं और समाज की एकता को प्रभावित करती है जैसे खेत मालिकों का घुटने टेक देना और भीतर ही भीतर क्रोध में बौखलाना। पद्मा शर्मा लिखती हैं-‘वह क्रोध खदक कर वैर का रुप धारण कर गया।’ घटनाक्रम तेजी से घटित होने लगा,विनय को फोन करना,धोखे से आक्रमण करके लहूलुहान कर देना,रैली निकालना। पद्मा शर्मा ने लिखा है-‘दबंग शक्ति चौकन्नी हो गई—पुलिस चक्करघिन्नी हो गई।’ फगुनिया का लड़का गायब हो गया,किसी की झोपड़ी में आग लग गई,अनेक झोपड़ियों की बिजली गुल हो गई,नदी किनारे की बैठक में तय हुआ,मधुबा बोला-‘यहाँ से सब कुच करने की तैयारी करो।’
पंडित जी की विशाल हवेली है,वे दूरदर्शी हैं और आगामी चुनाव की तैयारी में लग गये हैं। सबको जिम्मेदारियाँ सौंप रहे हैं। जिम्मेदारियाँ सौंपने और किसको क्या देना है,किससे क्या लेना है,तय करते हुए उनकी दूरदर्शिता देखी जा सकती है। उन्होंने फार्म भरने की तैयारी कर ली है। लगता है,पद्मा शर्मा जी ने किसी विधायक या एम.पी की तैयारी को बहुत करीब से देखा है। जगना की देहयष्टि व उसकी निष्ठा के बारे में वर्णन किया है और यह भी लिखा कि राजनीति की छत्रछाया में दहशतगर्द पनपते हैं। गाँव के बड़े-बूढ़ों के तौर-तरीकों के बारे में यथार्थ चित्रण करते हुए वे लिखती हैं-उनकी झुर्री वाली त्वचा में समाज का दर्द छिपा हुआ है। सभी ने जगना को आशीर्वाद दिया। गाँव के चौपाल का जीवन्त दृश्य उपस्थित हुआ है। बच्चे खेल रहे हैं,गीत गा रहे हैं,बूढ़े लोग अपनी-अपनी धुन में हैं। जगना पंडित जी के पर्चा भरने के दिन गाँव वालों को ले जाने आया है। जगना अपने नाम को लेकर सजग है। उपन्यासकार ने नाम को लेकर ऊँची-नीची जाति का जो चित्र खींचा है,शायद उतना सही नहीं है। घर के अपने बड़े लोग जिस नाम से बुलाना शुरु करते हैं,वही नाम प्रचलित हो जाता है। जगन्नाथ नाम में से नाथ के हटते जाने से ईश्वर से दूर होने का भाव रोचक है और प्रश्न खड़ा करता है।
जिला मजिस्ट्रेट गायत्री सिंह को चुनाव आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया है। मुस्तैदी से सारी व्यवस्था में लगी हुई हैं,हिदायतें दे रही हैं,बैठकें कर रही हैं और बारीकी से स्थितियों का आकलन कर रही हैं। उधर जगना गाँव वालों को समझा रहा है कि कोई भी गड़बड़ नहीं करना। किसी युवा को समझाता है,वोट डालने के समय तुम्हारा नाम,पिता का नाम सब बता दूँगा। डरने की जरुरत नहीं है। पंडित जी के फार्म हाउस में सबके रहने की व्यवस्था है। एक हाल में पुरुष और दूसरे हाल में स्त्रियों को रखा गया। संतो भी यहीं आ गई। पद्मा जी लिखती हैं-“सब मस्ती में थे। सुख में इतने डूबे कि आँख मूँदे भीतर तक डूबकर इन क्षणों को जी लेना चाहते थे। बढ़िया खाना,सरकारी दुकान की शराब,सब बन-ठन कर थे।” पंडित सुदर्शन जी जिला अध्यक्ष हैं,अब विधायक बनने की चाह जगी है। उन्होंने अपने व्यवहार-विचार में बदलाव किया है, छुआछूत छोड़ दलितों के साथ बैठते हैं। गायत्री सिंह प्रशिक्षण का मुआयना करने पहुँच गईं। मीडिया वाले भी साथ में थे और फोटो ले रहे थे। विनय पांडेय पुनः सक्रिय हो रहा है,आज वह भी कलक्टर के साथ है। उसने छोटा सा विडियो अपने सभी माध्यमों पर डाल दिया। पद्मा शर्मा ने बारीकी से हर चीज को समझा हैं और बेहतरीन तरीके से उपन्यास की कथा वस्तु को आगे बढ़ा रही हैं।
आठवें खण्ड में पंडित जी चिन्तित हैं-कहीं पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो?पुत्र के साथ टिकट को लेकर उनका संवाद रोचक,हास्य और व्यंग्य से भरा हुआ है। पद्मा शर्मा जी की समझ देखिए, ”लिखती हैं-पहले मंत्र से काम होते थे,फिर तंत्र काम करने लगा। फिर यंत्र प्रचलन में आए और अब षड्यंत्र ने जगह ले ली है। बिना इसके राजनीति में सफल नहीं हो सकते।” पिता-पुत्र संवाद के माध्यम से आज की राजनीति,चुनाव की सारी कवायद,मैनिफेस्टो बनाना, नामांकन के दिन बड़ी भीड़ और जोरदार प्रचार जैसे सभी बिन्दुओं पर पद्मा शर्मा ने विस्तार से चिन्तन किया है। उन्होंने कहा-“पर्चा,चर्चा और खर्चा ही चुनाव का आधार है। हर दिन के हिसाब से नहीं,हर घंटे के हिसाब से रुपया खर्च होगा। इसीलिए तो कहा जाता है कि धन,मन और तन से चुनाव लड़ा जाता है।”
गायत्री सिंह के कार्यालय मे अफरा-तफरी है,लोग अतिव्यस्त हैं मानो देश के प्रजातंत्र के यही असली पहरेदार हैं। मीटिंग के लिए सारे अधिकारी अपना-अपना काम छोड़कर भागे चले आ रहे हैं। इस भाग-दौड़ का,आपसी संवाद का,हास्य-व्यंग्य का,कलेक्टर के भाषण का और ‘विनय उवाच’ में छपे समाचार ‘घोड़े की बला तबेले के सिर’ का पद्मा शर्मा ने वर्णन किया है। गायत्री सिंह एसडीएम,एडीएम, तहसीलदार,नायब तहसीलदार की मीटिंग में जरुरी हिदायतें दे रही हैं। विनय पांडेय ने समाचार छापा-‘सौतेले बेटों के बाद सगे बेटों से गुफ्तगू।’ टिकट मिलते ही पंडित जी दूसरे दावेदार गुप्ता जी के यहाँ पहुँच गये,उनका पैर छू लिए और बोले-“ये समझना कि मैं नहीं,आप ही चुनाव लड़ रहे हैं,सब आपको ही सम्हालना है।” नामांकन के दिन भीड़ और गाजे-बाजे के साथ पंडित जी ने पर्चा दाखिल किया। विनय पांडेय ने आदिवासियों के परंपरागत परिधान पर कटाक्ष करते हुए समाचार छापा। पंडित सुदर्शन जी बेटे को गुरुमंत्र दे रहे हैं-“राजनीति में सगे बाप पर भी विश्वास नहीं करना।”
राजनीति के निरस माहौल में लेखिका तनिक रस घोलना चाहती हैं,लिखती हैं-‘जगना की आँखों में सन्तो का मोहक चेहरा घूम रहा था। उसके शरीर में प्रेम के स्फुलिंग तरंगित हो रहे थे।’ जगना-सन्तो के बीच का संवाद और युवा कवयित्री आयुषी ढेंगुला की प्रेम की कविता के साथ पति-पत्नी के सुखद संयोग का दृश्य-चित्रण पद्मा शर्मा  का साहस  ही है। सन्तो की स्मृतियों के बहाने उपन्यासकार ने सुन्दर प्रेम-कथा को विस्तार दिया है। खण्ड 13 व 14 में सन्तो-जगना के प्रेम-प्रसंग के जीवन्त चित्रण में पद्मा शर्मा के मन की उड़ान को समझा जा सकता है। करण जगना से कहता है,”हमारे जीवन में सम्बन्धों की कुल पाँच सीढ़ियाँ हैं-देखना,अच्छा लगना, चाहना,पाना। ये चार सीढ़ियाँ तो बहुत ही सरल है। परन्तु पाँचवीं जो सबसे अहम एवं मुश्किल सीढ़ी है,वो है ‘निभाना’।” भगोरिया मेले में लड़का लड़की को भगा कर ले जाने की आदिवासियों की संस्कृति माने बिना विवाह नहीं होगा। जगना ने दोने से गुलाल लेकर सन्तो के गालों पर लगा दिया। बदले में सन्तो ने भी उसके दोने से गुलाल लेकर लगाया। जगना ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों तेजी से भाग गये। दोनों की शादी हो गयी। पद्मा शर्मा ने आदिवासियों के रीति-रिवाजों का गहन अध्ययन किया है। उपन्यास में उनकी बुंदेली बोली और तौर-तरीकों को खूब अच्छे तरीके से चित्रण हुआ है।
साहित्य की अपनी मर्यादा है,पात्रों के मन की उड़ान अपनी है,रचनाकार सतत सक्रिय रहते हुए उसमें तालमेल बैठाता रहता है और कड़ियाँ बुनता चलता है। दुनिया भर में चुनाव प्रक्रियाएं जटिल हैं, खर्चीली,समय साध्य और देश का हर नागरिक किसी न किसी तरीके से जुड़ा रहता है। पद्मा शर्मा  खण्ड 15 में  कलक्टर कार्यालय में नामांकित दस्तावेजों की संवीक्षा का चित्र दिखाती हैं। नाम वापसी के लिए अभ्यर्थी का उपस्थित होना जरुरी है। विनय पांडेय ने समाचार में लिखा,इस बार पुराने नेता सुदर्शन तिवारी,’भैया सुदर्शन तिवारी’ के नये अवतार में हैं। पद्मा शर्मा ने समाचार लेखन में हास्य-व्यंग्य का पुट डाला है-पंडित जी की पत्नी प्रचार करते समय ‘भैया सुदर्शन तिवारी’ कैसे बोल पाएंगी। खण्ड 16 रोचक और हास्य-व्यंग्य से भरा है। उन्होंने बुंदेली, हिन्दी,संस्कृत और अंग्रेजी शब्दों से अपने लेखन को समृद्ध किया है। चुनाव की तैयारी का वर्णन कम रोचक नहीं है। करण पढ़ा-लिखा है,आदिवासियों के जीवन,उनका इतिहास, संस्कृति,प्रचलित देवी-देवताओं और महान पूर्वजों के बारे में,उनके संघर्षों के बारे में बताता है। सारा संवाद प्रश्नोत्तर के माध्यम से लिखना और समझाना, पद्मा शर्मा के शैक्षणिक ज्ञान का परिचय है। करण ने सबको मार्मिक पावी लोककथा सुनाई। सब लोग दुख में डूब गये। चुनाव की तैयारी,डमी उम्मीदवार,पुलिस की चेकिंग,दूसरे के द्वारा दूसरे का वोट डालना और बूथ कैप्चरिंग जैसे नैतिक-अनैतिक प्रसंग लिखकर पद्मा जी ने अपने यथार्थ लेखन का धर्म निभाया है।
खण्ड 21,पद्मा शर्मा रसिक भाव से लिखती हैं-सन्तो ने मेकअप किया है,मस्त होकर नाच रही है और जगना मोहित होकर देख रहा है। दृश्य बदलता है,पंडित जी का भांजा दामोदर नशे की हालत में आ धमकता है। कल से ही उसकी निगाह सन्तो पर है। उसने सन्तो को पकड़ा,अधिक रुपये दिए। वे पात्रों के मनोविज्ञान का उल्लेख करती हैं,पंडित जी के बदलते सोच का चित्रण करती हैं और संदेश देती हैं कि राजनीति किसी को नहीं छोड़ती है। पुलिस जगना को उठा ले गयी। पत्रकार,पुलिस और साधारण कार्यकर्ता का खेल शुरु है। पंडित जी चुनाव जीत गये। जुलूस,बधाइयाँ और बीच में जगना की महतारी का निवेदन,पंडित जी को रंग मे भंग जैसा लगा। विनय पांडेय लिखते हैं अपने अखबार में-“राजा वही रहते हैं बस पालकी के कहार बदल जाते हैं।” जगना को जेल हो गयी है। वहीं बैठे-बैठे उसके द्वारा हवेली के लिए किए हुए कार्य याद आ रहे हैं। घर की हालत बदतर हो गयी है। उसने विरोधी पार्टी के गिरधारी से हाथ मिला लिया। पंडित जी ने सलाहकार के तौर पर आनन्दवर्धन को नियुक्त कर लिया।
गिरधारी की पार्टी ने जगना को जिला का महामंत्री बना दिया। उसने अखबार में पढ़ा-कुपोषण की कवर स्टोरी। भारत को दुनिया भर में बदनाम करने की साजिशें चलती रहती हैं। खबर इस प्रकार है-‘बलाला गाँव में कुपोषण का बोलबाला।’ यह खबर सुनियोजित तरीके से तैयार हुई है। ‘विनय उवाच’ ने उस बच्चे की मौत की सूचना छापी जिसकी तस्वीर लेख के साथ छपी थी। टीवी पर जोरदार बहस चल रही है। सत्ताधारी और विरोधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है। पद्मा जी ऐसी टीवी बहसो को लेकर लिखती हैं- कभी कोई सुखद परिणाम इससे नहीं मिले हैं। जगना उस गाँव पहुँचा। बच्चे के पिता की बेबसी की बातें दूसरी कहानी कह रही हैं परन्तु मीडिया,सत्ता और विरोधी,व्यवस्था, प्रशासन सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। पद्मा शर्मा ने जीवन्त और यथार्थ वर्णन किया है। अधिकारी,नेता,डाक्टरों की पूरी टीम,पुलिस-प्रशासन,पत्रकार सभी दौड़ रहे हैं। ‘कुपोषण’ को जगना समझ रहा है और अन्न वितरण की विसंगति को भी। उसे लग रहा है-सब खानापूर्ति है,समस्या का निदान नहीं। पानी के टैंकर आ रहे हैं,सबको साबुन दिया जा रहा है,दवाइयाँ,दलिया,सोयाबीन, मूँगफली,चना,मक्का की बाटी बाँटी जा रही है। राजनीति की चौपड़ बिछाई जा रही है। गाँव वालों के बाल,नाखून काटे जा रहे हैं। खेती की जमीन पर हेलीपैड बन रहा है,दिल्ली से बड़े पदाधिकारी आने वाले हैं। यहाँ हास्य है,व्यंग्य और गरीबों का मजाक है। पद्मा शर्मा के सशक्त लेखन का प्रमाण भी है।
बुंदेली बोली के शब्दों का अपना चमत्कार है। हिन्दी दूसरी बोलियों को आत्मसात करती है और रचनाकार धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। पद्मा शर्मा भी इस तरह हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। जगना घूनमथान-सा बैठा हुआ है। गिरधारी से मिलकर गाँव की महिलाओं को अगरबत्ती,साबुन बनाने के बारे में विस्तार से बातें करता है। पंडित जी ने पंचायत सभासद के लिए दामोदर का नामांकन फार्म भरवा दिया है। जगना की पार्टी से नरेश को फार्म भरना है। वह कहता है-‘मावा नाटे मावा राज’ यानी हमारे गाँव में हमारा राज। जगना को दामोदर की हार से अधिक मतलब है। पंडित जी का भाषण चल रहा है और दामोदर बाबू कोई पोर्न विडियो में मग्न हैं। किसी ने भडाफोड़ कर दिया। जगना पंडित जी के ही तरीकों से उन्हें मात देने में लगा है। पद्मा शर्मा को आज की राजनीति खूब पता है। उन्होंने भी हेलीपैड बाबा को खोज निकाला है। दृश्य बिल्कुल जाना-पहचाना है। आजकल देश-दुनिया में बाबा की चर्चा है। यह सम्पूर्ण प्रसंग लेखिका ने रोचक तरीके से लिखा है। अगले दिन चुनाव है। तैयारी जोरों पर है। चुनाव दल गाँव पहुँच गया है। सारी प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं। वोट डाले जा रहे हैं। सरपंच पद की प्रत्याशी की पत्नी झंकारी देवी दल-बल के साथ पहुँचती है। खबर फैलती है कि उन्होंने स्कूल को घेर लिया है। डंडाधारी सिपाहियों ने भीड़ को तीतर-बितर किया। बलाला गाँव का जिम्मा जगना ने लिया है। पेटियों को ले उड़ा और कुछ देर बाद वापस कर गया। दामोदर चुनाव हार गया। समाचार छपा कि यह पंडित जी की हार है।
पद्मा शर्मा अपने लेखन में हास्य का पुट देना चाहती हैं। बहुत दिनों से करण से जगना की भेंट नहीं है। अचानक कोई सूट-बूट पहने,काला चश्मा लगाए कार से उतरता है,जगना पहचान नहीं पाता। करण अब के.एस,एक्का, एसडीएम बनकर किसी केस की तहकीकात में आया है। मामला पंडित सुदर्शन जी के किसी रिश्तेदार का है। करण के माध्यम से पद्मा जी विभागों में लड़कियों के शोषण की बात करती हैं। खण्ड 32 आते-आते लेखिका का धैर्य चूकता दिख रहा है,कहीं कोई पूर्वाग्रह है जो उनके मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है। सारी जाँच-पड़ताल के पीछे पूर्वाग्रह और जातीय बातें अधिक हैं। इस पूरे प्रसंग को किंचित निष्पक्षता के साथ लिखा जाना चाहिए था,फिर भी उन्होंने समाज की सच्चाई को लिखा है। लेखन का अपना प्रवाह होता है,चीजें,घटनाएं स्वतः जुड़ती जाती हैं और पाठक को बाँधे रहती है। यहाँ वह प्रवाह तनिक प्रभावित लगता है और कड़ियाँ एक-दूसरे से और बेहतर तरीके से जोड़ी जा सकती थीं। सरकार ने सीट को महिला के लिए घोषित कर दिया। जगना के पैर के नीचे की जमीन खिसक गई है। गिरधारी सहित सबने सन्तो को उम्मीदवार बनाने की सलाह दी। बहुत ना-नुकुर के बाद सन्तो भी साथ निकलने लगती है। विनय पांडेय ने भी साथ देने की बातें की। हेलीपैड बाबा की चरण वंदना होती है। सन्तो का टिकट पाने का प्रसंग राजनीति पर कलंक ही है। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं,सब मिले हुए हैं। कोई किसी का नहीं है। स्त्री को कदम-कदम पर शोषण झेलना है। उपन्यास का अंत भावुक कर देने वाला है। निश्चित ही पद्मा शर्मा ने हमारे समाज का भयावह राजनीतिक दृश्य दिखलाया है।
सम्पूर्ण उपन्यास में पद्मा शर्मा ने अनेक सूत्र वाक्यों को जोड़ा है जो रोचक हैं,ज्ञानवर्धक और प्रसंगानुसार प्रभाव डालने वाले हैं –
1-समझदार इंसान वह नहीं होता जो ईंट का जवाब पत्थर से देता है, बल्कि वो होता है जो चोट को अवसर में तब्दील कर लेता है।
2-दिमाग की गर्मी ज्यादा ज्वलनशील होती है, सब कुछ जला देती है।
3-व्यक्ति के जीवन में संतान के सुख और उसकी खुशी से अधिक कुछ भी नहीं होता है।
4-ख्वाहिश मनुष्य को जीने नहीं देती–मनुष्य ख्वाहिश को कभी मरने नहीं देता।
5-लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं, माथे पे खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती है, जमीन पे खिंच जाएँ तो सरहद बना देती है, रिश्ते पे खिंच जाएँ तो दीवार बना देती है।
6-बिना मेहनत के कुछ नहीं मिलता, ईश्वर चिड़िया को खाना जरुर देता है, लेकिन घोसले में नहीं।
7-सलाह हारे हुए की, तजुर्बा जीते हुए का और दिमाग खुद का इंसान को कभी हारने नहीं देता।
8-इंसान जब चिन्तामुक्त रहता है तब उसके मन में प्यार की ग्रन्थि पलती है। प्रेम का सम्बन्ध मस्तिष्क से ही तो है।
9-किसी भी युद्ध की तैयारी का अन्तिम चरण भी युद्ध ही होता है।
10- एक असन्तुलित मन अपनी दिशा और संवेदनशीलता खो देता है।
11- अपनों का साथ आवश्यक है—सुख हो तो बढ़ जाता है, दुख हो तो बँट जाता है।
12- विश्वास एक छोटा शब्द है–पढ़ने मे सेकंड लगता है, सोचो तो मिनट लगता है, समझो तो दिन लगता है पर साबित करने में जिंदगी लगती है।
13- जल्दी जागना हमेशा फायदेमंद होता है, फिर चाहे वो अपनी नींद से हो–अहम से हो–वहम से हो–या अपने सोए हुए जमीर से हो।
14- राजनीति के सुगंधित वृक्ष से विषधर लिपटे रहते हैं। जो भी उसकी छाँह लेने जाता है—बदले में उसे विष ही मिलता है।

समीक्षक – विजय कुमार तिवारी
(कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190
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