Wednesday, February 11, 2026
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सूर्यकांत शर्मा द्वारा ‘महानदी’ कविता-संग्रह की समीक्षा

पुस्तक : महानदी कविताएं
कवि : मीन केतन प्रधान
प्रकाशक : विश्व हिंदी अधिष्ठान, नया रायगढ़ ,छत्तीसगढ़
मूल्य : ₹200
आईएसबीएन : 978-93-6175-838-6
कुल पृष्ठ : 144
कहते हैं सृजन शीलता को, कभी किसी लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार या साहित्य को गुरु मानते हुए यदि आप निरंतर, पूरी निष्ठा से पढ़ने और गुनते हैं; तो सतत अभ्यास और प्रयास के पश्चात  आप अपनी छाप छोड़ने में उसी प्रकार  सक्षम हो सकते हैं।जब विद्यार्थी या शोधार्थी या आम जन भी, अपने चैतन्य और अनुभव जनित प्रयासों और अपने अनुभवों से उसे अनु प्राणित कर लिखते हैं।तब  वही रचनाकर्म स्वयंमेव ही साधु! साधु! साधु!की पात्रता स्वतः ही प्राप्त कर लेता है समीक्षित काव्य संग्रह यथा महानदी (कविताएं )पढ़ कर तो यही विश्वास होता है।

छायावाद के जनक आदरणीय मुकुटधर पांडे के साहित्य के प्रति अनुराग और योगदान को सभी साहित्य प्रेमी, शोधार्थी,विद्यार्थी, अध्यापक और साहित्य के चितेरे भली भांति जानते हैं।उनका महानदी से आत्मानुराग और कुररी पक्षी से प्रेम उनकी रचना ‘कुररी ‘ की छापअंतरराष्ट्रीय स्तर की रही है।

वे करुणा भाव को पौराणिक ग्रंथों से लेकर के प्राचीन,अतीत और वर्तमान संदर्भ में भी पैरोकार रहे।यही परम्परा वर्तमान काव्य संग्रह में भी परिपाटी या संस्कारों की मानिंद जीवंत और प्रचलन में है।कम से कम समीक्षित काव्य संग्रह महानदी को देखकर सुनकर तो ऐसा ही लगता है। इस  संग्रह के लेखक पूर्व प्रोफेसर एवं विभाग के अध्यक्ष हिंदी श्री मीन केतन प्रधान जी हैं और वे विश्व हिंदी अधिष्ठान न्यास रायगढ़ छत्तीसगढ़ की संस्थापक तथा संयोजक भी है इसी न्यास से यह पुस्तक प्रकाशित भी हुई है।आचार्य मीन केतन प्रधान भी प्रतिष्ठित साहित्यकार मुकुटधर पांडे के क्षेत्र से ही हैं और वह क्षेत्र महानदी पावन पुण्य सलिला के आसपास ही है और  हाँ! वे उस महान विभूति  अनन्यतम के फैन भी हैं।यह एक और सुखद आश्चर्य  है कि डॉक्टर मीन केतन प्रधान की रचनाओं की पृष्ठभूमि और प्रेरणा स्त्रोत भी महा नदी ही है और साथ ही साथ उन्होंने कुररी कविताओं की श्रृंखला यथा कुररी एक कुररी दो और कुररी तीन इस काव्य संग्रह में सम्मिलित की है। जिसका संकेत शुरू के शब्दों में दिया गया है।

कोरोना काल यानी करु काल की विशेषताओं और उसके प्रभावों से करुणा के भाव को जोड़ते हुए कुररी कविताओं की श्रृंखला एक अलग सी नज़ीर पेश करती है। काव्य प्रेमियों की जानकारी के लिए यह बताना नितांत आवश्यक है कि इस श्रृंखला की तीनों कविताओं का कथ्य और शिल्प सरसी छंद के तहत सृजित किया गया है।सरसी छंद में 16 और 11 मात्राओं के चरण होते हैं। इसकी गति धीमी भी होती है यह छंद मार्मिक भाव, दुख  और करुणा भावों को दर्शाने का एक उपयुक्त छंद है ।इसकी विशेषता यह भी है कि इसमें गेयता की संघनता देखते ही बनती है।
इस काव्य संग्रह की शेष रचनाएं छंद मुक्त हैं।  यह संग्रह रूप और कथ्य के बीच का तालमेल प्रस्तुत करता है कवि ने तकनीकी भाव को भी प्रधानता दी है यथा कंप्यूटर में वर्तनी इत्यादि का प्रयोग बहुत ही सधे अंदाज में किया गया है।काव्य शास्त्र या साहित्यिक मापदंडों के अनुसार यदि देखा जाए तो साहित्यिक उद्देश्य की सार्थकता तभी है जब व्यापक जन पक्ष धरता के साथ वह रचना और कवि खड़ा हो। दूसरे शब्दों हम कह सकते हैं कि मानव अस्मिता को पहचानना और उसे समझ कर में मानव मूल्यों के साथ स्थापित करना ही साहित्यिक उद्देश्य होना चाहिए।

आचार्य मीनकेतन प्रधान द्वारा कुररी श्रृंखला यथा कुरी एक,दो और तीन, छायावाद के जनक मुकुटधर पांडे जी की अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रचना की ओर ध्यान खींचती है। परंतु यहां पर  कवि ने उन तीनों कविताओं में अलग-अलग सोच के साथ इन रचनाओं को प्रस्तुत किया है।यदि हम कुररी- एक, की बात करें तो यह कुररी या  क्रौंच ऐसा पक्षी है जो कविता में अपने साथी को खोज रही है, कोरोना काल की बात भी यहां हो  रही है और पक्षी के दुख को या अकेलेपन को उन्होंने कोरोना काल की के दौरान जो अकेले रह गए उनकी जाने की पीड़ा को सामूहिक रूप भी यहां पर जोड़ा  गया है,बानगी प्रस्तुत है

करू काल में पंछी विदेशी बता रहा वह बात/ खोज रहा बिछड़े साथी को हो गई बहुत रात।
बिखरी होगी कहीं चाँदनी
घना यहाँ अवसाद/महानदी तट का गाँव वही फिर आ जाता याद।
वहीं इस रचना का दूसरा पक्ष यथा महानदी तट पर बसे गाँव और आस पास के वातावरण की सुंदरता,अवसाद से विश्वास की ओर कवि चलता है,शायद महामारी का कम होते जाना और फिर कवि सकारात्मकता को भी प्रस्तुत करता है और फिर  चंद्रयान की बात करना यथा
डर लगता यहाँ सांस लेना/हर दिशा रहे साफ़।कोविड भगा चन्द्र यान उड़ा/जगा नया विश्वास।

वहीं इसी श्रृंखला की दूसरी कविता में पर्यावरण की चिंता, प्रकृति पर होने वाले कुप्रभाव और कोरोना के साथ साथ विज्ञान पर रचना के माध्यम से कवि ने अपनी बात कही है। कुछ बानगियां –
महानदी पुल से दिख जाता/गाँव का वही छोर।
अनाजों में दवा ज़हरीली खेती में व्यापार/दिखती नहीं यहाँ बरसों से कुररियों की कतार।
भागे चकवा- चकवी जोड़े वैसी नहीं पुकार/
कोरोना से सहमी दुनिया मारे लोग अनजान लॉकडाउन में शहर सुना भीड़ लगी शमशान।
वही इस श्रृंखला की तीसरी और अंतिम कविता में बचपन, यादों में गुजरे वक्त की बात ,वर्तमान से संतुलन पर कवि ने बल दिया है। अस्तु यह संग्रह पाठकों को रचनाओं के माध्यम से महानदी,प्रकृति , कोरोना काल,पर्यावरण के सरोकार और संतुलन पर एक नई दिशा का पुख्ता सा ताज़गी भरा अहसास दिलाने में सक्षम है।

सूर्यकांत शर्मा
द्वारका नई दिल्ली।
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1 टिप्पणी

  1. अच्छी समीक्षा। सूर्यकांत जी बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।

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